Saturday, March 14, 2020

डाॅ0 हरिवंश राय बच्चन - ”मधुशाला“

डाॅ0 हरिवंश राय बच्चन  - ”मधुशाला“
         
परिचय -
27 नवम्बर 1907 को श्री हरिवंश राय बच्चन जी का जन्म कायस्थ परिवार में इलाहाबाद (उ0प्र0) में हुआ था। बाल्यकाल में इन्हें बच्चन नाम से पुकारा जाता था जिसका शाब्दिक अर्थ ”बच्चा“ या ”सन्तान“ होता है। कालान्तर में वे इसी नाम से प्रसिद्ध हुए और वह एक ”सरनेम“ के रूप में पहचान बन गई। आपने पहले उर्दू की शिक्षा उसके उपरान्त प्रयाग विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में स्नातकोत्तर (एम.ए.) तथा कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से पीएच.डी. की डिग्री प्राप्त की। सन् 1926 में 19 वर्ष की अवस्था में आपका विवाह 14 वर्षीया श्यामा बच्चन से हुआ जिनकी मृत्यु टी.बी. बीमारी से सन् 1936 में हो गई। 5 वर्ष बाद सन् 1941 में आपने पंजाबी तेजी सूरी से विवाह किया जो रंगमंच व गायन से जुड़ी थी। आपके इस परिवार में दो पुत्र अमिताभ व अजिताभ जन्म लिए। श्री अमिताभ बच्वन आगे चलकर हिन्दी सिनेमा के एक प्रसिद्ध अभिनेता के रूप में स्थापित हुए।
श्री हरिवंश राय बच्चन, अंग्रेजी में शिक्षा प्राप्त करने के बावजूद हिन्दी के सार्वाधिक लोकप्रिय कवियों में से एक हैं। अपने जीवन में इन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अध्यापन का कार्य, आल इण्डिया रेडियो, भारत सरकार के विदेश मंत्रालय में हिन्दी विशेषज्ञ तथा राज्य सभा के मानोनित सदस्य भी रहे। अपनी कृतियों के लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार, सोवियत लैण्ड नेहरू पुरस्कार, एफ्रो एशियाई सम्मेलन के कमल पुरस्कार, विड़ला फाउण्डेशन के सरस्वती पुरस्कार, सन् 1976 में भारत सरकार द्वारा साहित्य व शिक्षा के क्षेत्र में पद्म भूषण से सम्मानित किया जा चुका है। भारत सरकार ने उन पर डाक टिकट भी जारी किया है। राजभाषा समिति के अध्यक्ष पद पर रहने के दौरान उन्होंने भारत सरकार के सौराष्ट्र मंत्रालय को गृह मंत्रालय और परराष्ट्र मंत्रालय को विदेश मंत्रालय का नाम देने में उनका योगदान रहा है। श्री हरिवंश राय बच्चन जी का देहांत 18 जनवरी 2003 को मुम्बई में हो गया था। बच्चन जी ने काव्य, आत्मकथा, रचनावली व अन्य क्षेत्रों में 50 से अधिक पुस्तकें लिखीं।
बच्चन और उनके कृतित्व पर साहित्यकारों व अन्य की राय -
”बच्चन मुख्यतः मानव भावना, अनुभूति, प्राणों की ज्वाला तथा जीवन संघर्ष के आत्म निष्ठ कवि हैं। मैंने कभी उसके लिए ठीक ही लिखा था-
अमृत हृदय में, गरल कंठ में, मधु अधरों में,
आस तुम वीणा धर कर में जन-मन-मादन!“ - सुमित्रानन्दन पंत

”ऐसी अभिव्यक्तियां नई पीढ़ी के लिए पाथेय बन सकेंगी, इसी में उनकी सार्थकता भी है।“ 
- डाॅ0 शिवमंगल सिहं सुमन
”...(बच्चन की रचनाओं में) समूचा काल और क्षेत्र भी अधिक गहरे रंगो में उभरा है।“ 
- डाॅ0 हजारी प्रसाद द्विवेदी
”मैं सिर्फ कविता लिखती थी। डाॅ0 धर्मवीर भारती के कहने पर जब मैंने गद्य लिखना शुरू किया तब पुष्पा भारती ने कहा था - पद्मा गद्य लिखने से पहले बच्चन जी का गद्य पढ़ो, वैसा लिखने की कोशिश करो। जब कवि गद्य लिखता है तब कविता संग-संग चलनी चाहिए। उनका गद्य अद्भुत है।“ - पद्मा सचदेवा
”बाबूजी हम पर लदते नहीं थे। न तो व्यक्तिगत रूप से और न ही सामाजिक या और किसी रूप से। उनकी इस प्रकृति का अहसास मुझे बचपन से ही हो गया था। इससे जुड़ी मैं आपको दो घटनाएँ बताता हूँ। एक मेरे स्कूल-टाइम की है और दूसरी सन् 1985 की है। जब मैं नैनीताल में पढ़ रहा था तो बीमारी की वजह से मैं ’श्रेष्ठ अभिनेता’ प्रतियोगिता में भाग नहीं ले पाया। इस कारण से मैं काफी उदास था। ऐसे में मुझे बाबूजी का सन्देश मिला - गर तुम्हारे मन हो तो अच्छा, गर न हो तो और भी अच्छा। 
हालांकि उस समय मैं इसका अर्थ समझ नहीं पाया था। दूसरी घटना राजनीति में प्रवेश के दौरान की है। जब बाबूजी को मैंने अपना यह फैसला सुनाया, तो वे परेशान हो उठे, लेकिन उन्होंने कहा- गर तुम्हें लगता है कि तुम जो कर रहे हो वह उचित है तो मैं तुम्हें नहीं रोकूंगा। और मुझे जल्दी ही महसूस हो गया कि मेरा यह फैसला गलत है। बावजूद इसके उन्होंने मेरा पूरा-पूरा साथ दिया।
मुझे मधुशाला जीवन की शाला लगती है। उन्होंने साहित्य की एक नई धारा का प्रवर्तन किया। इस हालावाद में उन्होंने सिर्फ मदिरा का बखान नहीं किया है बल्कि मधुशाला के माध्यम से जीवन को समझाया है, जीवन के मूल सिद्धान्त पर रोशनी डाली है। मधुशाला ही नहीं उनकी हर पुस्तक में एक गहरी दृष्टि है, एक विशेष दृष्टिकोण मिलता है।“ - अमिताभ बच्चन (फिल्म जगत के महानायक)

”बच्चन हिन्दी काव्य के प्रेमियों के सबसे अधिक प्रिय कवि हैं, और उनकी मधुशाला लगभग छः दशक से लोकप्रियता के सर्वोच्च शिखर पर विराजमान है। सर्वप्रथम 1935 में प्रकाशित होने के बाद अब तक इसके अनेक संस्करणों की कई लाख प्रतियाँ पाठकों तक पहुँच चुकी है। महाकवि पन्त के शब्दों में - ’मधुशाला की मादकता अक्षय है’। मधुशाला, बच्चन की एक ऐसी कृति है जिसने लोगों को दिवाना बना दिया। लोकनायक जय प्रकाश नारायण जैसे जमीन से जुड़े नेता अपने आन्दोलन की अलख बच्चन जी की कविताओं से जलाते थे, वहीं गाँधी जी मधुशाला की रूबाईयाँ सुनकर प्रसन्न हो गये थे। मधुशाला में हाला, प्याला, मधुबाला और मधुशाला के चार प्रतीकों के माध्यम से कवि ने अनेक क्रान्तिकारी, मर्मस्पर्शी, रागात्मक एवं रहस्यपूर्ण भावों को वाणी दी है। अगर बच्चन की कृतियां अनूदित होकर विश्व के अन्य देशों में पहुँचती, तो हाला, प्याला और मधुबाला के रसिक काव्य पर वहाँ के लोग भी झूमते और उसकी मस्ती नोबेल पुरस्कार वालों तक पहुँचती। हालांकि जो सम्मान और आदर बच्चन को भारतीय लोगों ने दिया, वह नोबेल से कई-कई गुणा ज्यादा है।“
- ”मधुशाला“ के सम्पादक (हिन्द पाॅकेट बुक्स की ओर से)

”मधुशाला के बहुत से पाठक और श्रोता एक समय समझा करते थे, कुछ शायद अब भी समझते हों, कि इसका लेखक दिन-रात मदिरा के नशे में चूर रहता है। वास्तविकता यह है कि ’मदिरा’ नामधारी द्रव से मेरा परिचय अक्षरशः बरायनाम है। नशे से इनकार नहीं करूँगा। जिन्दगी ही एक नशा है। कविता भी एक नशा है। और भी बहुत से नशे है।“ - हरिवंश राय बच्चन

प्रस्तुत है ”मधुशाला“ की कुछ रूबाईयां-
17. धर्म-ग्रंथ सब जला चुकी है जिसके अन्तर की ज्वाला,
मन्दिर, मस्जिद, गिरजे-सबको तोड़ चुका जो मतवाला,
पंडित, मोमिन, पादरियों के फंदो को जो काट चुका,
कर सकती है आज उसी का स्वागत मेरी मधुशाला।
19. बने पुजारी प्रेमी साकी, गंगाजल पावन, हाला,
रहे फेरता अविरत गति से, मधु के प्यालों की माला,
”और लिये जा, और पिये जा“-इसी मंत्र का जाप करे,
मैं शिव की प्रतिमा बन बैठूँ, मन्दिर हो यह मधुशाला।
40. साकी बनकर मुरली आई, सात लिए कर में प्याला,
जिनमें वह छलकाती लाई, अधर-सुध-रस की हाला,
योगिराज कर संगत उसकी, नटवर नागर कहलाए,
देखो कैसों-कैसों को है, नाच नचाती मधुशाला।
46. दुतकारा मस्जिद ने मुझको, कहकर है पीने वाला,
ठुकराया ठाकुरद्वारे ने, देख हथेली पर प्याला,
कहाँ ठिकाना मिलता जग में, भला अभागे काफिर को?
शरणस्थली बनकर न मुझे यदि, अपना लेती मधुशाला।
47. पथिक बना मैं घूम रहा हूँ, सभी जगह मिलता हाला,
सभी जगह मिल जाता साकी, सभी जगह मिलता प्याला,
मुझे ठहरने का, हे मित्रो, कष्ट नहीं कुछ भी होता,
मिले न मन्दिर, मिले न मस्जिद, मिल जाती है मधुशाला।
48. सजें न मस्जिद और नमाजी, कहता है अल्लाताला,
सजधजकर, पर साकी आता, बन ठनकर, पीने वाला,
शेख, कहाँ तुलना हो सकती, मस्जिद की मदिरालय से,
चिर विधवा है मस्जिद तेरी, सदा-सुहागिन मधुशाला।
49. बजी नफीरी और नमाजी, भूल गया अल्लाताला,
गाज गिरी, पर ध्यान-सुरा में, मग्न रहा पीनेवाला,
शेख, बुरा मत मानो इसको, साफ कहूँ तो, मस्जिद को,
अभी युगो तक सिखलाएगी, ध्यान लगाना मधुशाला।
50. मुसलमान औ’ हिन्दू हैं दो, एक, मगर, उनका प्याला,
एक मगर, उनका मदिरालय, एक, मगर, उनकी हाला,
दोनों रहते एक न जब तक, मस्जिद-मन्दिर में जाते,
बैर बढ़ाते मस्जिद-मन्दिर, मेल कराती मधुशाला।
51. कोई भी हो शेख नमाजी, या पण्डित जपता माला,
बैर भाव चाहे जितना हो, मदिरा से रखने वाला,
एक बार बस मधुशाला के, आगे से होकर निकले,
देखूँ कैसे थाम न लेती, दामन उसका मधुशाला।
53. आज करे परहेज जगत, पर, कल पीनी होगी हाला,
आज करे इनकार जगत, पर, कल पीना होगा प्याला,
होने दो पैदा मद का महमूद, जगत में कोई, फिर,
जहाँ अभी है मन्दिर-मस्जिद, वहाँ बनेगी मधुशाला।
57. कभी नहीं सुन पड़ता, ’इसने, हा, छू दी मेरी हाला,
कभी न कोइ कहता, ’उसने, जूठा कर डाला प्याला,
सभी जाति के लोग यहाँ पर, साथ बैठकर पीते हैं,
सौ सुधारकों का करती है, काम अकेली मधुशाला।
58. श्रम, संकट, संताप सभी तुम, भला करते पी हाला,
सबक बड़ा तुम सीख चुके यदि, सीखा रहना मतवाला,
व्यर्थ बने जाते हो हरिजन, तुम तो मधुजन ही अच्छे,
ठुकराते हरि-मन्दिर वाले, पलक बिछाती मधुशाला।
62. आज मिला अवसर, तब फिर क्यों, मैं न छकूँ जी भर हाला,
आज मिला मौका, तब फिर क्यों, ढाल न लूँ जी भर प्याला,
छेड़ छाड़ अपने साकी से, आज न क्यों जी भर कर लूँ,
एक बार ही तो मिलनी है, जीवन की यह मधुशाला।
104. नहीं चाहता, आगे बढ़कर, छीनूँ ओरों का प्याला,
नहीं चाहता, धक्के देकर, छीनूँ औरों का प्याला,
साकी, मेरी ओर न देखो, मुझको तनिक मलाल नहीं,
इतना ही क्या कम आँखों से, देख रहा हूँ मधुशाला।
124. कहाँ गया वह स्वर्गिक साकी, कहाँ गई सुरभित हाला,
कहाँ गया स्वप्निल मदिरालय, कहाँ गया स्वर्णिम प्याला,
पीने वालों ने मदिरा का, मूल्य, हाय, कब पहचाना?
फूट चुका जब मधु का प्याला, टूट चुकी जब मधुशाला।
125. अपने युग में सबको अनुपम, ज्ञात हुई अपनी हाला,
अपने युग में सबको अद्भुत, ज्ञात हुआ अपना प्याला,
फिर भी वृद्धों से जब पूछा, एक यही उत्तर पाया-
अब न रहे वे पीनेवाले, अब न रही वह मधुशाला।
126. ”मैं“ को करके शुद्ध दिया, अब नाम गया उसको ”हाला“,
”मीना“ को ”मधुपात्र“ दिया, ”सागर“ को नाम गया ”प्याला“,
क्यों न मौलवी चैंकें, बिचकें, तिलक-त्रिपुंडी पंडित जी,
”मैं-महफिल“ अब अपना ली है, मैने करके ”मधुशाला“।
128. जितनी दिल की गहराई हो, उतना गहरा है प्याला,
जितनी दिल की मादकता हो, उतनी मादक है हाला,
जितनी उर की भावुकता हो, उतना सुन्दर साकी है,
जितना ही जो रसिक, उसे है, उतनी रसमय मधुशाला।
134. विश्व तुम्हारे विषमय जीवन, में ला पायेगी हाला,
यदि थोड़ी सी भी यह मेरी, मदमाती साकी बाला,
शून्य तुम्हारी घड़ीयाँ कुछ भी, यदि यह गुंजित कर पाई,
जन्म सफल समझेगी अपना, जग में मेरी मधुशाला।
नई रूबाई (1985)
देश दुश्मनों ने जब हम में, जहर फूट का था डाला,
भूल गये जो तब टूटी थी, लाखों प्यालो की माला?
सीख सबक उस कटु अनुभव से, अब हमने है क़स्द लिया-
फिर न बटेंगे पीने वाले, फिर न बँटेगी मधुशाला।

श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा स्पष्टीकरण
पूर्ण ब्रह्म परमात्मा, अपने पूर्ण रूप में व्यक्त होने के पूर्व अपने सभी विचारों को अंश-अंश में विभक्त कर भिन्न-भिन्न माध्यमों से व्यक्त कर देता है। जो पुस्तक सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त का अनुभव कराता है वह शास्त्र कहलाता है। सार्वभौम सत्य के ज्ञान को बहुमत विचार से जोड़ने पर ही बहुमत को ज्ञान की ओर ले जाया जाता है। आपका मदिरा माध्यम से बहुमत को ज्ञान की ओर ले जाने की कला, कुछ और नहीं धर्म स्थापना की ही एक कला थी। जिसे मैं आधुनिक युग की कबीर वाणी कहना चाहता हूँ। बस अन्तर यह है कि कबीर वाणी, सात्विक व्यक्तियों को अधिक अच्छी लगती है जबकि मधुशाला, देश में बढ़ते तामसिक मदिरा प्रयोगकर्ताओं को अच्छी लगी और लगती रहेगी। नोबेल पुरस्कार चुनने वालों की यह एक महान त्रुटि ही कही जायेगी, जो ”मधुशाला“ नामक शास्त्र उनके दृष्टि में नहीं आ पायी। जबकि धरती पर समय के साथ इस शास्त्र की लोकप्रियता सदैव वढ़ती ही रहेगी।
मेरा वश चले तो संसार के सभी मधुशाला को सदैव के लिए बन्द कर दूँ और यदि न हो सके तो सभी मधुशालाओं में आपकी जीवन्त चित्र के साथ आपके मधुशाला की रूबाईयों को उसमें लगवा दूँ ताकि एक तरफ प्याला होठों से लगे तो आँखों के सामने लिखी आपकी रूबाईयाँ धीरे-धीरे हाला के साथ दिल में उतरने लगे।
आप मदिरा नामक वस्तु से अपरिचित नहीं हैं परन्तु मैं भँलि-भाँति परिचित हूँ। मदिरा चाहे जो कुछ हो लेकिन वह चरित्र को संचालित करने में बड़ी सहायक है। आजकल यदि सत्य रूप में समाज में रहते हुए एकान्तवास करना हो तो बाजार में मदिरा का प्रयोग कर, निवास पर आसानी से एकान्तवास हो सकता है क्योंकि तब तक समाज में चरित्र इतना बिगड़ चुका होगा कि कोई आपको पूछेगा ही नहीं और आप आसानी से चिन्तन, मनन, लेखन कर सकते हैं। इस सम्बन्ध में ट्रकों के पीछे लिखा अज्ञात व्यक्ति द्वारा व्यक्त निम्नलिखित दो पँक्ति मुझे याद आ रहा है-
राम जन्म में दूध मिला, कृष्ण जन्म में घी।
कलयुग में शराब मिला, संभल-संभल के पी।
अन्य लोगों के लिए मदिरा चाहे जो रही हो परन्तु मेरे लिये तो इस कार्य को सम्पन्न करने में बड़ी सहायक सिद्ध हुई, वर्ना जिस क्षीर सागर की तलहटी (संसार का सबसे निम्न विचारों वाला स्तर) में मैं रहता था वहाँ बैठकर इस ”विश्वशास्त्र“ को रूप देना सम्भव ही नहीं होता।
परमात्मा के अंशावतार को अर्थात आपको, आपकी ही रूबाईयों की शैली में श्रद्धाजंलि स्वरूप यह रूबाई अर्पित करते हुए हमें आपार शान्ति का अनुभव होता है-
सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड देख चुका हूँ, 
अक्षय-अनन्त है मेरी हाला।
कण-कण में हूँ-”मैं ही मैं“, 
क्षयी-ससीम है तेरी प्याला ।
जिस भी पथ-पंथ-ग्रन्थ से गुजरेगा तू, 
हो जायेगा, बद्ध-मस्त और मत वाला।
”जय ज्ञान-जय कर्मज्ञान“ की आवाज,  
सुनाती, मेरी यह अक्षय-अनन्त मधुशाला।


महर्षि वेदव्यास शास्त्र लेखन कला

महर्षि वेदव्यास शास्त्र लेखन कला
मानव सभ्यता के विकास के कालक्रम में कर्म कर अनुभव के ज्ञान सूत्र का संकलन ही वेद के रूप में व्यक्त हुआ जिससे आने वाली पीढ़ी मार्गदर्शन को प्राप्त कर सके और अपना समय बचाते हुए कर्म कर सके। अर्थात प्रत्येक साकार सफल नेतृत्व के साथ उसके अनुभव का निराकार ज्ञान सूत्र के संकलन की समानान्तर प्रक्रिया भी चलती रही। और यह सभी प्रक्रिया मानव जाति के श्रेष्ठतम विकास के लिए ही की जा रही थी। मनुष्य को युगानुसार शास्त्र का अध्ययन करना चाहिए लेकिन समाज पुराने में ही उलझ जाता है इसलिए ही विकास अवरूद्ध होता है। समाज को एकात्म करने के लिए शास्त्र की रचना करना व उसका प्रचार-प्रसार करने वाले व्यास कहलाये। जिनके द्वारा शास्त्र रचना के युगानुसार निम्न चरण पूरे हुए।
1. सार्वभौम आत्मा के ज्ञान द्वारा समाज को एकात्म करने के लिए शास्त्र - वेद 
वेदों को मूलतः सार्वभौम ज्ञान का शास्त्र समझना चाहिए। जिनका मूल उद्देश्य यह बताना था कि ”एक ही सार्वभौम आत्मा के सभी प्रकाश हैं अर्थात बहुरूप में प्रकाशित एक ही सत्ता है। इस प्रकार हम सभी एक ही कुटुम्ब के सदस्य है।“
जब वेद लोंगो के समझ में कम आने लगा या समाज उसी में उलझ गया और उससे समाज को एकात्म करना कठिन होने लगा तब उसके व्याख्या का शास्त्र उपनिषद् की रचना की गई।

2. सार्वभौम आत्मा के नाम द्वारा समाज को एकात्म करने के लिए शास्त्र - उपनिषद् 
उपनिषद्ों की शिक्षा उस सार्वभौम आत्मा के नाम के अर्थ की व्याख्या के माध्यम से उस सार्वभौम आत्मा को समझाना है।
जब उपनिषद् लोंगो के समझ में कम आने लगा या समाज उसी में उलझ गया और उससे समाज को एकात्म करना कठिन होने लगा तब पौराणिक वंशावली में हुए साकार विष्णु कर्तार, कमल कर्तार, ब्रह्मा कर्तार और रूद्र-शिव के निराकार एवं साकार रूप को प्रक्षेपित कर मानक चरित्र (व्यक्तिगत, सामाजिक और वैश्विक) का शास्त्र पुराण की रचना की गई। 

3. सार्वभौम आत्मा के कृति कथा द्वारा समाज को एकात्म करने के लिए शास्त्र - पुराण
वेद के ज्ञान सूत्र व उपनिषद् की वार्ता के अलावा मनुष्य को एकात्म करने के लिए दृश्य चित्र या वस्तु की आवश्यकता की विधि का प्रयोग ही पौराणिक देवी-देवता हैं। सार्वभौम आत्मा के कृति कथा द्वारा समाज को एकात्म करने के लिए पुराण शास्त्र ही देवी-देवताओं के उत्पत्ति का कारण है। जिसे उत्पन्न करने का कारण मानव को एक आदर्श मानक पैमाना व लक्ष्य देना था जिससे वे मार्गदर्शन प्राप्त कर सकें। वेद और उपनिषद् शास्त्र में देवी-देवता के स्थान पर मात्र प्रकृति-पुरूष का प्रतीक चिन्ह - शिवलिंग ही व्यक्त था। मनुष्य या कोई भी जीव जब अपने ईश्वर का रूप निर्धारित करेगा तब वह अपनी ही शारीरिक संरचना रूप में ही कल्पना कर सकता है। इस मानवीय रूप के निर्धारण में गुणों को वस्त्र-आभूषण, वाहन इत्यादि के प्रतीक के माध्यम से व्यक्त किया गया। पुराणों में निम्नलिखित विधि से देवी-देवताओं की उत्पत्ति की गयी है-

1. सार्वभौम आत्मा से ब्रह्माण्ड और उसके परिवार जैसे सूर्य, चाँद, ग्रह, नक्षत्र, नदी, समुद्र, पर्वत इत्यादि को देवी-देवता के रूप में एक मानवीय रूप द्वारा गुणों के अनुसार निरूपित कर प्रक्षेपित किया गया। जिससे यह ज्ञान प्राप्त हो सके कि उस अदृश्य ईश्वर की कृति यह ब्रह्माण्ड उसका दृश्य रूप है अर्थात यह दृश्य ब्रह्माण्ड ही हमारा दृश्य ईश्वर है। अर्थात जिस प्रकार हम ईश्वर से प्रेम करते हैं उसी प्रकार हमें इस दृश्य ईश्वर - ब्रह्माण्ड से प्रेम करना चाहिए जो हमें प्रत्यक्ष रूप में जीवन संसाधन उपलब्ध कराता है।

2. सार्वभौम आत्मा से मनुष्य और उसके परिवार को देवी-देवता के रूप में एक मानवीय रूप द्वारा गुणों के अनुसार निरूपित कर प्रक्षेपित किया गया। जिससे यह ज्ञान प्राप्त हो सके कि उस अदृश्य ईश्वर की कृति यह मनुष्य उसका दृश्य रूप है अर्थात यह दृश्य मनुष्य ही हमारा दृश्य ईश्वर है। अर्थात जिस प्रकार हम ईश्वर से प्रेम करते हैं उसी प्रकार हमें इस दृश्य ईश्वर - मानव से प्रेम करना चाहिए जो हमें प्रत्यक्ष रूप में जीवन संसाधन उपलब्ध कराता है। 
मनुष्य को उसके कार्य क्षेत्र के अनुसार सर्वोच्च आदर्श मानक चरित्र  प्रक्षेपित किये गये जिससे मनुष्य मार्गदर्शन प्राप्त कर सके। कार्य क्षेत्र अनुसार सर्वोच्च आदर्श मानक चरित्र निम्नवत् हैं-
अ. व्यक्तिगत कार्य क्षेत्र स्तर - बह्मा अर्थात एकात्मज्ञान परिवार 
ब. सामाजिक कार्य क्षेत्र स्तर - विष्णु अर्थात एकात्म ज्ञान सहित एकात्म कर्म परिवार     
स. वैश्विक/ब्रह्माण्डिय कार्य क्षेत्र स्तर -शिव-शंकर अर्थात एकात्म ज्ञान और एकात्म कर्म सहित एकात्म ध्यान परिवार
उपरोक्त के अनुसार यह स्पष्ट है कि शास्त्राकार लेखक द्वारा पौराणिक देवी-देवताओं में ब्रह्मा-विष्णु-शिवशंकर परिवार के कार्य क्षेत्रानुसार मानक के रूप में प्रक्षेपित किये गये थे। मनुष्य की इच्छा पाने की अधिक होती है अलावा इसके कि हो जाने की। ऐसे व्यक्ति जो हो जाने में विश्वास रखते थे वे ही धरती पर मनुष्य रूप में आये और अवतार हो कर चले गये। अवतार का अर्थ ही होता है सर्वोच्च लक्ष्य सिद्धान्त के अनुसार नीचे उतरना जबकि मनुष्य का अर्थ होता है नीचे से ऊपर की ओर बढ़ना। शास्त्राकार लेखक ने मानव जाति को ईश्वर की ओर विकास करने या ईश्वर के रूप में बन जाने के लिए इन देवी-देवताओं का रूप प्रक्षेपित किया था लेकिन ये पूजा और आयोजन में बदल गया और अन्य धर्म-सम्प्रदाय के आ जाने से यह एक विशेष धर्म का ही जाना जाने लगा। जिस प्रकार आम की लकड़ी से कुर्सी, मेज, दरवाजा, खिड़की बनाया गया और आम गायब होकर कुर्सी, मेज, दरवाजा, खिड़की हो गया उसी प्रकार सम्पूर्ण पृथ्वी के मनुष्य के मागदर्शन के लिए व्यक्त मानक देवी-देवताओं का अर्थ गायब होकर मूर्तिपूजा में बदलकर एक धर्म का हो गया।
जब पुराण लोंगो के समझ में कम आने लगा या समाज उसी में उलझ गया और उससे समाज को एकात्म करना कठिन होने लगा तब मानवीय वंशावली में हुए अनेक विभिन्न प्रकृति-चरित्र के साकार मानव और उनके निराकार एवं साकार रूप को प्रक्षेपित कर प्रकृति-चरित्र (व्यक्तिगत, सामाजिक और वैश्विक) का शास्त्र महाभारत की रचना की गई। 

4. सार्वभौम आत्मा के प्रकृति द्वारा समाज को एकात्म करने के लिए शास्त्र - महाभारत
महाभारत की शिक्षा अपनी प्रकृति में स्थित रहकर व्यक्तिगत प्रमाणित स्वार्थ (लक्ष्य) को प्राप्त करने के अनुसार सम्बन्धों का आधार बनाने की शिक्षा है। गीता कीे शिक्षा - गीता की मूल शिक्षा प्रकृति में व्याप्त मूल तीन सत्व, रज और तम गुण के आधार पर व्यक्त विषयों जिसमें मनुष्य भी शामिल है, की पहचान करने की शिक्षा दी गयी है और उससे मुक्त रहकर कर्म करने को निष्काम कर्मयोग तथा उसमें स्थित रहने को स्थितप्रज्ञ और ईश्वर से साक्षात्कार करने का मार्ग समझाया गया।
जब महाभारत लोंगो के समझ में कम आने लगा या समाज उसी में उलझ गया और उससे समाज को एकात्म करना कठिन होने लगा तब काल, चेतना, कर्मज्ञान एवं सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त और मानवी सिद्धान्त के एकीकरण सहित पूर्व के शास्त्र रचना का उद्देश्य का शास्त्र विश्वभारत समाहित विश्वशास्त्र की रचना की गई जिसका मुख्य गुण ”सार्वभौम“ है और महायोग-महामाया का अन्तिम उदाहरण बनाया गया।

5. सार्वभौम आत्मा के काल, चेतना और कर्मज्ञान द्वारा समाज को एकात्म करने के लिए शास्त्र -विश्वशास्त्र: द नाॅलेज आॅफ फाइनल नाॅलेज 
विश्वशास्त्र की शिक्षा, उपरोक्त सभी को समझाना है और पूर्ण सार्वजनिक प्रमाणित काल, चेतना और ज्ञान-कर्मज्ञान से युक्त होकर कर्म करने की शिक्षा है। जिससे भारतीय शास्त्रों की वैश्विक स्वीकारीता स्थापित हो और देवी-देवताओं के उत्पत्ति के उद्देश्य से भटक गये मनुष्य को शास्त्रों के मूल उद्देश्य की मुख्यधारा में लाया जा सके। विश्वभारत कीे शिक्षा - विश्वभारत, विश्वशास्त्र के स्थापना की योजना का शास्त्र है, जो विश्वशास्त्र का ही एक भाग है। विश्वभारत, की शिक्षा अपनी प्रकृति में स्थित रहकर सार्वजनिक प्रमाणित स्वार्थ (लक्ष्य) को प्राप्त करने के अनुसार सम्बन्धों का आधार बनाने की शिक्षा है।
”कल्कि“ अवतार के सम्बन्ध में कहा गया है कि उसका कोई गुरू नहीं होगा, वह स्वयं से प्रकाशित स्वयंभू होगा जिसके बारे में अथर्ववेद, काण्ड 20, सूक्त 115, मंत्र 1 में कहा गया है कि ”ऋषि-वत्स, देवता इन्द्र, छन्द गायत्री। अहमिद्धि पितुष्परि मेधा मृतस्य जग्रभ। अहं सूर्य इवाजिनि।।“ अर्थात ”मैं परम पिता परमात्मा से सत्य ज्ञान की विधि को धारण करता हूँ और मैं तेजस्वी सूर्य के समान प्रकट हुआ हूँ।“ जबकि सबसे प्राचीन वंश स्वायंभुव मनु के पुत्र उत्तानपाद शाखा में ब्रह्मा के 10 मानस पुत्रों में से मन से मरीचि व पत्नी कला के पुत्र कश्यप व पत्नी अदिति के पुत्र आदित्य (सूर्य) की चैथी पत्नी छाया से दो पुत्रों में से एक 8वें मनु - सांवर्णि मनु होगें जिनसे ही वर्तमान मनवन्तर 7वें वैवस्वत मनु की समाप्ति होगी। ध्यान रहे कि 8वें मनु - सांवर्णि मनु, सूर्य पुत्र हैं। अर्थात कल्कि अवतार और 8वें मनु - सांवर्णि मनु दोनों, दो नहीं बल्कि एक ही हैं और सूर्य पुत्र हैं।
”सार्वभौम“ गुण 8वें सांवर्णि मनु का गुण है।  अवतारी श्रृंखला अन्तिम होकर अब मनु और मनवन्तर श्रृंखला के भी बढ़ने का क्रम है क्योंकि यही क्रम है। वैदिक-सनातन-हिन्दू धर्म के पुराणों में 14 मनुओं का वर्णन किया गया है। इन्हीं के नाम से मन्वन्तर चलते हैं। जो निम्नलिखित हैं-
1. मनुर्भरत वंश की प्रियव्रत शाखा 
अ. पौराणिक वंश  
वंश  अवतार काल
01. स्वायंभुव मनु यज्ञ  भूतकाल
02. स्वारचिष मनु विभु भूतकाल
03. उत्तम मनु सत्यसेना भूतकाल
04. तामस मनु हरि भूतकाल
05. रैवत मनु वैकुण्ठ भूतकाल
2. मनुर्भरत वंश की उत्तानपाद शाखा 
06. चाक्षुष मनु अजित भूतकाल
ब. ऐतिहासिक वंश  
07. वैवस्वत मनु वामन वर्तमान
स. भविष्य के वंश
08. सांवर्णि मनु सार्वभौम भविष्य
09. दत्त सावर्णि मनु रिषभ भविष्य
10. ब्रह्म सावर्णि मनु विश्वकसेन भविष्य
11. धर्म सावर्णि मनु धर्मसेतू  भविष्य
12, रूद्र सावर्णि मनु सुदामा भविष्य
13. दैव सावर्णि मनु योगेश्वर भविष्य
14. इन्द्र सावर्णि मनु वृहद्भानु भविष्य
पहले मनु - स्वायंभुव मनु से 7वें मनु - वैवस्वत मनु तक शारीरिक प्राथमिकता के मनु का कालक्रम हैं। 8वें मनु - सांवर्णि मनु से 14वें और अन्तिम - इन्द्र सांवर्णि मनु तक बौद्धिक प्राथमिकता के मनु का कालक्रम है इसलिए ही 9वें मनु से 14वें मनु तक के नाम के साथ में ”सांवर्णि मनु“ उपनाम की भाँति लगा हुआ है। अर्थात 9वें मनु से 14वें मनु में सार्वभौम गुण विद्यमान रहेगा और बिना ”विश्वशास्त्र“ के उनका प्रकट होना मुश्किल होगा। 
मात्र एक विचार- ”ईश्वर ने इच्छा व्यक्त की कि मैं एक हूँ, अनेक हो जाऊँ“  और ”सभी ईश्वर हैं“ , यह प्रारम्भ और अन्तिम लक्ष्य है। मनुष्य की रचना ”पाॅवर और प्राफिट (शक्ति और लाभ)“ के लिए नहीं बल्कि असीम मस्तिष्क क्षमता के विकास के लिए हुआ है। फलस्वरूप वह स्वयं को ईश्वर रूप में अनुभव कर सके, जहाँ उसे किसी गुरू की आवश्यकता न पड़ें, वह स्वंयभू हो जाये, उसका प्रकाश वह स्वयं हो।  एक गुरू का लक्ष्य भी यही होता है कि शिष्य मार्गदर्शन प्राप्त कर गुरू से आगे निकलकर, गुरू तथा स्वयं अपना नाम और कृति इस संसार में फैलाये, ना कि जीवनभर एक ही कक्षा में (गुरू में) पढ़ता रह जाये। एक ही कक्षा में जीवनभर पढ़ने वाले को समाज क्या नाम देता है, समाज अच्छी प्रकार जानता है। ”विश्वशास्त्र“ से कालक्रम को उसी मुख्यधारा में मोड़ दिया गया है। एक शास्त्राकार, अपने द्वारा व्यक्त किये गये पूर्व के शास्त्र का उद्देश्य और उसकी सीमा तो बता ही सकता है परन्तु व्याख्याकार ऐसा नहीं कर सकता। स्वयं द्वारा व्यक्त शास्त्र के प्रमाण से ही स्वयं को व्यक्त और प्रमाणित करूँगा- शास्त्राकार महर्षि व्यास (वर्तमान में लव कुश सिंह ”विश्वमानव“)
शब्द से सृष्टि की ओर...
सृष्टि से शास्त्र की ओर...
शास्त्र से काशी की ओर...
काशी से सत्यकाशी की ओर...
और सत्यकाशी से अनन्त की ओर...
                  एक अन्तहीन यात्रा...............................
वर्तमान सृष्टि चक्र की स्थिति भी यही हो गयी है कि अब अगले अवतार के मात्र एक विकास के लिए सत्यीकरण से काल, मनवन्तर व मनु, अवतार, व्यास व शास्त्र सभी बदलेगें। इसलिए देश व विश्व के धर्माचार्यें, विद्वानों, ज्योतिषाचार्यों इत्यादि को अपने-अपने शास्त्रों को देखने व समझने की आवश्यकता आ गयी है क्योंकि कहीं श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ और ”आध्यात्मिक सत्य“ आधारित कार्य ”विश्वशास्त्र“ वही तो नहीं है? और यदि नहीं तो वह कौन सा कार्य होगा जो इन सबको बदलने वाली घटना को घटित करेगा?
शनिवार, 22 दिसम्बर, 2012 से  प्रारम्भ हो चुका है-
1. काल के प्रथम रूप अदृश्य काल से दूसरे और अन्तिम दृश्य काल का प्रारम्भ।
2. मनवन्तर के वर्तमान 7वें मनवन्तर वैवस्वत मनु से 8वें मनवन्तर सांवर्णि मनु का प्रारम्भ।
3. अवतार के नवें बुद्ध से दसवें और अन्तिम अवतार-कल्कि महावतार का प्रारम्भ।
4. युग के चैथे कलियुग से पाँचवें युग स्वर्ण युग का प्रारम्भ।
5. व्यास और द्वापर युग में आठवें अवतार श्रीकृष्ण द्वारा प्रारम्भ किया गया कार्य “नवसृजन“ के प्रथम भाग ”सार्वभौम ज्ञान“ के शास्त्र ”गीता“ से द्वितीय अन्तिम भाग ”सार्वभौम कर्मज्ञान“, पूर्णज्ञान का पूरक शास्त्र“, लोकतन्त्र का ”धर्मनिरपेक्ष धर्मशास्त्र“ और आम आदमी का ”समाजवादी शास्त्र“ द्वारा व्यवस्था सत्यीकरण और मन के ब्रह्माण्डीयकरण और नये व्यास का प्रारम्भ।

लेखकों के आदि पुरूष प्रतीक व्यास

लेखकों के आदि पुरूष प्रतीक व्यास
किसी संस्था के मुख्य व्यक्ति, व्यक्ति नहीं बल्कि संस्था होता है। उसका पद ही उसका पहचान होता है और उसके द्वारा की गई समस्त कार्यवाही व्यक्ति की नहीं बल्कि संस्था की होती है। व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है परन्तु संस्थायें लम्बी अवधि तक चलती रहती है। उदाहरणस्वरूप वर्तमान समय में देश, संस्थायें और पीठ हैं। जैसे विदेशों में जाने पर जब किसी देश का मुख्य व्यक्ति कोई समझौता करता है तब वह देश होता है न कि व्यक्ति। प्राचीन समय में भी इसी प्रकार के अनेक पीठ थे और बनते चले गये जैसे- ब्राह्मण, परशुराम, विश्वामित्र, व्यास, वशिष्ठ, नारद, इन्द्र, गोरक्षपीठ (क्षत्रिय पीठ), शंकराचार्य पीठ (ब्राह्मण पीठ) इत्यादि। जब तक संस्था नहीं रहती तब तक व्यक्ति, व्यक्ति रहता है जब उसके द्वारा संस्था स्थापित हो जाती है तब व्यक्ति, व्यक्ति न रहकर संस्था हो जाता है। उस संस्थापक व्यक्ति के जीवन काल तक उसे साकार रूप में फिर उसके उपरान्त उसके निराकार रूप विचार का साकार रूप संस्था के रूप में समाज याद करता है। ऐसी स्थिति में जब संस्थापक व्यक्ति का नाम ही संस्था का नाम हो तब संस्था द्वारा किये गये समस्त कार्य एक भ्रमात्मक स्थिति को उत्पन्न करते हैं और एक लम्बे समय के उपरान्त यह नहीं समझ में आता कि वह संस्थापक व्यक्ति इतने लम्बे समय तक कैसे जिवित था? सत्य तो यह है कि शरीर मर जाता है लेकिन विचार या विचार पर किये गये कार्य नहीं मरते। इस सत्य के आधार की दृष्टि से यदि हम देखें तो स्थिति स्पष्ट हो जायेगी कि-
1. वशिष्ठ के सम्बन्ध में - सर्वप्रथम वशिष्ठ सूर्यवंश के प्रथम पुरूष महाराज इच्छवाकु के सामने पैदा होते हैं। दूसरी बार वशिष्ठ मैथिली वंश के यज्ञ में ऋत्विक कार्य सम्पन्न कराते हैं। इच्छवाकु से मैथिली वंश में चैथी पीढ़ी का अन्तर है। तीसरी बार वशिष्ठ राजा त्रिशंकु के समय में प्रकट होते हैं। चैथी बार वशिष्ठ राजा दिलीप के समय भी होते हैं पाँचवीं बार महाराजा दशरथ के समय उपस्थित होते हैं। छठवीं बार महाभारत काल में होते हैं जो आबू पर्वत पर अग्नि पैदा करके अग्नि से क्षत्रिय पैदा करते हैं।
2. नारद के सम्बन्ध में - युग कोई भी हो वहाँ नारद की उपस्थिति सदैव रहती है। नारद त्रेता के राम काल में भी हैं तो द्वापर के कृष्ण काल में भी और इनसे प्राचीन ब्रह्मा-विष्णु-महेश काल में भी।
3. विश्वामित्र के सम्बन्ध में - विश्वामित्र सूर्यवंश के 32वीं पीढ़ी के राजा हरिश्चन्द्र का राज्य दान में लेते हैं। फिर इसी वंश की 62वीं पीढ़ी में राजा दशरथ से यज्ञ रक्षार्थ उनके पुत्र राम और लक्ष्मण को साथ ले गये थे।
4. ब्राह्मण के सम्बन्ध में - यह एक विद्यापीठ था जो उस समय राजर्षि, ब्रह्मर्षि, देवऋषि इत्यादि उपाधियों को प्रदान करता था जैसे वर्तमान समय के शिक्षा संस्थान उपाधियाँ प्रदान कर रहीं हैं। संस्कृत विश्वविद्यालयों से आज भी शास्त्री, आचार्य, शिक्षा शास्त्री इत्यादि उपाधि उनको दी जा रहीं हैं जो इसके योग्य हैं। बिना कोई परीक्षा उत्तीर्ण किये विशेषज्ञता के आधार पर विश्वविद्यालय मानद उपाधि भी प्रदान करती हैं। 
5. परशुराम के सम्बन्ध में - त्रेता युग में जनकपुरी में सीता स्वयंवर के समय परशुराम उपस्थित होते हैं और द्वापर युग में भीष्म और कर्ण को भी शिक्षा देते हैं। साथ ही भविष्य के एक मात्र शेष अन्तिम अवतार कल्कि के भी वे गुरू होगें, ऐसा पुराण में है।
6. दुर्वासा के सम्बन्ध में - दुर्वासा ऋषि राम काल के थे जो अत्रि-अनुसूईया के पुत्र थे और राम वनवास समय में श्री राम से मिले भी थे। फिर दुर्वासा महाभारत काल में द्वापर के अन्त तक भी उपस्थित रहते हैं।
7. व्यास के सम्बन्ध में - समाज को एकात्म करने के लिए शास्त्र की रचना करना व उसका प्रचार-प्रसार करने के लिए व्यास सदैव हर युग में उपस्थित रहते हैं।
वैदिक काल में ऋषियों का वर्णन आया है। कुछ को छोड़कर सभी ऋषि परिवार वाले थे। वैदिक काल के ऋषि दार्शनिक,  विद्वान, योद्धा एवं कृषक तीनों थे। ऋचाओं को लिखने वाले ऋषियों को देवर्षि की संज्ञा प्राप्त थी। प्राचीन ऋषियों में बहुत से ऋषि, राजर्षि से ब्रह्मर्षि हो गये तथा ब्रह्मर्षि से राजर्षि भी हुए लेकिन इनकी संख्या कम है। आरम्भ में ब्राह्मण कोई जाति नहीं थी बल्कि यह विद्यापीठ था। यही कारण है कि अनेक राजर्षि, ब्रह्मर्षि उपाधि प्राप्त किये। यही नहीं प्राचीन वंशावली में भी सूर्य के 12 पुत्रों में बहुत से अग्निहोत्र करने के कारण ब्राह्मण की उपाधि धारण किये। सूर्य के पुत्र वरूण से ही ब्रह्म वंश चला जिसमें भृगु, वशिष्ठ, वाल्मिकि, जमदग्नि, पुलस्त्य थे जबकि ब्रह्म वंशीय भी विशुद्ध सूर्यवंशीय ही है। केवल अग्निहोत्र करने के कारण ही ये ब्राह्मण कहलाये।
जिस प्रकार लोग आत्मा की महत्ता को न समझकर शरीर को ही महत्व देते हैं उसी प्रकार लोग भले ही पढ़कर ही विकास कर रहें हो परन्तु वे शास्त्राकार लेखक की महत्ता को स्वीकार नहीं करते। जबकि वर्तमान समय में चाहे जिस विषय में हो प्रत्येक विकास कर रहे व्यक्ति के पीछे शास्त्राकार, लेखक, आविष्कारक, दार्शनिक की ही शक्ति है जिस प्रकार शरीर के पीछे आत्मा की शक्ति है।
सदैव मानव समाज को एकात्म करने के लिए शास्त्र-साहित्य की रचना करना लेखक का काम रहा है। सामूहिक रूप से ऐसे कार्य करने वाले को व्यास कहते हैं। चाहे वह आध्यात्म दर्शन (अद्श्य विज्ञान) के क्षेत्र में हो या पदार्थ विज्ञान (द्श्य विज्ञान) के क्षेत्र में हो। इस प्रकार सभी लेखकों के आदर्श आदि पुरूष व्यास ही हैं।


महर्षि वेदव्यास

महर्षि वेदव्यास
भगवान विष्णु के 24 अवतार (1. श्री सनकादि, 2. वराहावतार, 3. नारद मुनि, 4. नर-नारायण, 5. कपिल, 6. दत्तात्रेय, 7. यज्ञ, 8. ऋषभदेव, 9. पृथु, 10. मत्स्यावतार, 11. कूर्म अवतार, 12. धन्वन्तरि, 13. मोहिनी, 14. हयग्रीव, 15. नृसिंह, 16. वामन, 17.गजेन्द्रोधारावतार, 18. परशुराम, 19. वेदव्यास, 20. हन्सावतार, 21. राम, 22. कृष्ण, 23. बुद्ध, 24. कल्कि) का वर्णन श्री विष्णु पुराण एवं श्री भविष्य पुराण में स्पष्ट उल्लेख है। 
श्री विष्णु पुराण (अध्याय-तीन) के अनुसार - यह सम्पूर्ण विश्व उन परमात्मा की ही शक्ति से व्याप्त है, अतः वे ”विष्णु“ कहलाते हैं। समस्त देवता, मनु, सप्तर्षि तथा मनुपुत्र और देवताओं के अधिपति इन्द्रगण, ये सब भगवान विष्णु की ही विभूतियाँ हैं।
सूर्य अपनी पत्नी छाया से शनैश्चर, एक और मनु तथा तपती, तीन सन्तानें उत्पन्न कीं। सूर्य-छाया का दूसरा पुत्र आठवाँ मनु, अपने अग्रज मनु का सवर्ण होने से सावर्णि कहलाया। नवें मनु दक्ष सावर्णि होगें दसवें मनु ब्रह्मसावर्णि होगें, ग्यारहवाँ मनु धर्म सावर्णि बारहवा मनु रूद्रपुत्र सावर्णि तेरहवा रूचि रूद्रपुत्र सावर्णि चैदहवा मनु भीम सावर्णि।
प्रत्येक चतुर्युग के अन्त में वेदों का लोप हो जाता है, उस समय सप्तर्षिगण ही स्वर्गलोक से पृथ्वी में अवतीर्ण होकर उनका प्रचार करते हैं। प्रत्येक सत्ययुग के आदि में (मनुष्यों की धर्म-मर्यादा स्थापित करने के लिए) स्मृति-शास्त्र के रचयिता मनु का प्रादुर्भाव होता है। 
इन चैदह मनवन्तरों के बीत जाने पर एक सहस्त्र युग रहने वाला कल्प समाप्त हुआ कहा जाता है। फिर इतने समय की रात्रि होती है।
स्थितिकारक भगवान विष्णु चारों युगों में इस प्रकार व्यवस्था करते हैं- समस्त प्राणियों के कल्याण में तत्पर वे सर्वभूतात्मा सत्ययुग में कपिल आदिरूप धारणकर परम ज्ञान का उपदेश करते हैं। त्रेतायुग में वे सर्वसमर्थ प्रभु चक्रवर्ती भूपाल होकर दुष्टों का दमन करके त्रिलोक की रक्षा करते हैं। तदन्तर द्वापरयुग में वे वेदव्यास रूप धारण कर एक वेद के चार विभाग करते हैं और सैकड़ों शाखाओं में बाँटकर बहुत विस्तार कर देते हैं। इस प्रकार द्वापर में वेदों का विस्तार कर कलियुग के अन्त में भगवान कल्किरूप धारणकर दुराचारी लोगों को सन्मार्ग में प्रवृत्त करते हैं। इसी प्रकार, अनन्तात्मा प्रभु निरन्तर इस सम्पूर्ण जगत् के उत्पत्ति, पालन और नाश करते रहते हैं। इस संसार में ऐसी कोई वस्तु नहीं है जो उनसे  भिन्न हो।
प्रत्येक द्वापर युग में विष्णु, व्यास के रूप में अवतरित होकर वेदों के विभाग प्रस्तुत करते हैं। श्री विष्णु पुराण (अध्याय-तीन) के अनुसार - वेद रूप वृक्ष के सहस्त्रों शाखा-भेद हैं, उनका विस्तार से वर्णन करने में तो कोई भी समर्थ नहीं है अतः संक्षेप यह है कि प्रत्येक द्वापरयुग में भगवान विष्णु व्यासरूप से अवतीर्ण होते हैं और संसार के कल्याण के लिए एक वेद के अनेक भेद कर देते हैं। मनुष्यों के बल, वीर्य और तेज को अलग जानकर वे समस्त प्राणियों के हित के लिए वेदों का विभाग करते हैं। जिस शरीर के द्वारा एक वेद के अनेक विभाग करते हैं भगवान मधुसूदन की उस मूर्ति का नाम वेदव्यास है। इस वैवस्वत मनवन्तर (सातवाँ मनु) के प्रत्येक द्वापरयुग में व्यास महर्षियों ने अब तक पुनः-पुनः 28 बार वेदों के विभाग किये हैं। पहले द्वापरयुग में ब्रह्मा जी ने वेदों का विभाग किया। दूसरे द्वापरयुग के वेदव्यास प्रजापति हुए। तीसरे द्वापरयुग में शुक्राचार्य जी, चैथे द्वापरयुग में बृहस्पति जी व्यास हुए, पाँचवें में सूर्य और छठें में भगवान मृत्यु व्यास कहलायें। सातवें द्वापरयुग के वेदव्यास इन्द्र, आठवें के वसिष्ठ, नवें के सारस्वत और दसवें के त्रिधामा कहे जाते हैं। ग्यारहवें में त्रिशिख, बारहवें में भरद्वाज, तेरहवें में अन्तरिक्ष और चैदहवें में वर्णी नामक व्यास हुए। पन्द्रहवें में त्रव्यारूण, सोलहवें में धनंन्जय, सत्रहवे में क्रतुन्जय और अठ्ठारवें में जय नामक व्यास हुए। फिर उन्नीसवें व्यास भरद्वाज हुए, बीसवें गौतम, इक्कीसवें हर्यात्मा, बाइसवें वाजश्रवा मुनि, तेइसवें सोमशुष्पवंशी तृणाबिन्दु, चैबीसवें भृगुवंशी ऋक्ष (वाल्मीकि) पच्चीसवें मेरे (पराशर) पिता शक्ति, छब्बीसवें मैं पराशर, सत्ताइसवें जातुकर्ण और अठ्ठाइसवें कृष्णद्वैपायन। अगामी द्वापरयुग में द्रोणपुत्र अश्वत्थामा वेदव्यास होगें। इस प्रकार अठ्ठाईस बार वेदों का विभाजन किया गया। उन्होंने ही 18 पुराणों की रचना की। 
हिन्दू धर्म शास्त्रों के अनुसार महर्षि व्यास त्रिकालज्ञ थें तथा उन्होंने दिव्य-दृष्टि से देख कर जान लिया कि कलियुग में धर्म क्षीण हो जायेगा। धर्म के क्षीण होने के कारण मनुष्य नास्तिक, कर्तव्यहीन और अल्पायु हो जायेगें। एक विशाल वेद का सांगोपांग अध्ययन उनके सामथ्र्य से बाहर हो जायेगा। इसलिए महर्षि व्यास ने वेद का चार भागों में विभाजन कर दिया जिससे कि कम बुद्धि एवं कम स्मरण शक्ति रखने वाले भी वेदों का अध्ययन कर सके। व्यास जी ने उनका नाम रखा - ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद। वेदों का विभाजन करने के कारण ही व्यास जी वेदव्यास नाम से विख्यात हुये। ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद को क्रमशः अपने शिष्य पैल, जैमिनि, वैशम्पायन और सुमन्तुमुनि को पढ़ाया। वेद में निहित ज्ञान के अत्यन्त गूढ़ तथा शुष्क होने के कारण वेद व्यास ने पाँचवें वेद के रूप में पुराणों की रचना की जिनमें वेद के ज्ञान को रोचक कथाओं के रूप में बताया गया है। पुराणों को उन्होंने अपने शिष्य रोम हर्षण को पढाया। व्यास जी के शिष्यों ने अपनी अपनी बुद्धि के अनुसार उने वेदों की अनेक शाखाएँ बना दीं। व्यास जी ने महाभारत की रचना तीन वर्षो के अथक परिश्रम से की थी। व्यास जी का उद्देश्य महाभारत लिखकर युद्ध का वर्णन करना नहीं, बल्कि इस भौतिक जीवन की निःसारता को दिखाना है। उनका कथन है कि भले ही कोई पुरूष वेदांग तथा उपनिषदों को जाने लें, लेकिन वह कभी विचक्षण नहीं हो सकता क्योंकि यह महाभारत एक ही साथ अर्थशास्त्र, धर्मशास्त्र तथा कामशास्त्र है। महाभारत के सम्बन्ध में स्वयं व्यास जी की ही उक्ति सटिक है- ”इस ग्रन्थ में जो कुछ है, वह अन्यत्र हैं परन्तु जो इसमें नहीं, वह अन्यत्र कहीं भी नहीं है।“ श्रीमद्भागवतगीता विश्व के सबसे बड़े महाकाव्य ”महाभारत“ का ही अंश है। व्यासजी ने पुराणों तथा महाभारत की रचना के पश्चात् ब्रह्मसूत्रों की रचना भी यहाँ की थी। वाल्मीकि की ही तरह व्यास भी संस्कृत कवियों के लिए पूज्य हैं। महाभारत में उपाख्यानों का अनुसरण कर अनेक संस्कृत कवियों ने काव्य, नाटक आदि की सृष्टि की है। संस्कृत साहित्य में वाल्मीकि के बाद व्यास ही श्रेष्ठ कवि हुए हैं। इनके लिए काव्य ”आर्य काव्य“ के नाम से विख्यात है।
पौराणिक-महाकाव्य युग की महान विभूति महाभारत, 18 पुराण, श्रीमदभागवत, ब्रह्मसूत्र, मीमांसा जैसे अद्वितीय साहित्य दर्शन के प्रणेता वेदव्यास का जन्म आषाढ़ पूर्णिमा को लगभग 3000 ई0पू0 में हुआ था। वेदांत दर्शन-अद्वैतवाद के संस्थापक वेदव्यास ऋषि पराशर के पुत्र थे। पत्नी आरूणी से उत्पन्न इनके पुत्र थे- महान बालयोगी शुकदेव।


लेखक / शास्त्राकार

लेखक / शास्त्राकार
किसी भाषा के शब्दों से अपने विचार को लिखित रूप से प्रस्तुत करने वाले चरित्र को लेखक कहते हैं। एक लेखक शब्दों को एक सही क्रम में रखकर कुछ अर्थ और समझ को व्यक्त करने वाला कलाकार होता है।
जिस प्रकार लोग आत्मा की महत्ता को न समझकर शरीर को ही महत्व देते हैं उसी प्रकार लोग भले ही पढ़कर ही विकास कर रहें हो परन्तु वे शास्त्राकार लेखक की महत्ता को स्वीकार नहीं करते। जबकि वर्तमान समय में चाहे जिस विषय में हो प्रत्येक विकास कर रहे व्यक्ति के पीछे शास्त्राकार, लेखक, आविष्कारक, दार्शनिक की ही शक्ति है जिस प्रकार शरीर के पीछे आत्मा की शक्ति है। सदैव मानव समाज को एकात्म करने के लिए शास्त्र-साहित्य की रचना करना लेखक का काम रहा है। वही सत्य अर्थो में सभी से अभिनय करवाता है क्योंकि मनुष्य का चरित्र वही है जो उसका विचार है। और सभी विचारों को समाज में फैलाने वाला शास्त्राकार, लेखक ही है।
एक लेखक, शास्त्राकार नहीं हो सकता लेकिन एक शास्त्राकार, लेखक हो सकता है क्योंकि एक लेखक, लेखन की कला को जानता है। यदि उसे शास्त्राकार बनना है तो उसे अपने मन को ऊँचाई को समग्रता, सार्वभौमिकता और एकात्मता की ओर ले जाना पड़ेगा। सामान्य रूप में एक लेखक विशेषीकृत विषय का लेखक होता है तो शास्त्राकार समग्रता, सार्वभौमिकता और एकात्मता को धारण किया हुआ एकात्मता को विकसित करने के लिए लिखता है। दोनों में अन्तर मात्र मन की ऊँचाई का होता है। एक लेखक नीचे का पायदान है तो शास्त्राकार उसका सर्वोच्च मानक है। जो लेखक शब्दों का जितना व्यापक कलाकार होगा जिससे समझ विकसित हो वह उतना ही लम्बे समय तक याद किया जाने वाला लेखक बनता है। 

शास्त्र
सार्वभौम सत्य-सिद्वान्त अर्थात सार्वभौम एकात्म की ओर ले जाने वाले और उसके प्रति समझ को विकसित करने वाले विचार को शास्त्र कहते हैं तथा यह विचार जिस पुस्तक में संग्रहित किया जाता है उसे शास्त्र-साहित्य कहते हैं। शास्त्र-साहित्य, आध्यात्म अर्थात अदृश्य विज्ञान तथा भौतिक विज्ञान अर्थात दृश्य विज्ञान दोनों की ओर से हो सकते हैं। आध्यात्म की ओर से शास्त्र रचना करने वाले को ”व्यास“ नाम दिया गया है। 


स्वच्छ मन - स्वच्छ भारत - स्वस्थ भारत के लिए कल्कि महाअवतार के नौ रत्न

स्वच्छ मन - स्वच्छ भारत - स्वस्थ भारत के लिए कल्कि महाअवतार के नौ रत्न
1. NITI AAYOG (नीति आयोग)
2. UGC- University Grant Commission (विश्वविद्यालय अनुदान आयोग)
3. NCERT – National Council for Educational Research & Training (राष्ट्रीय शैक्षिक शोध एवं प्रशिक्षण आयोग)
4. BIS – Bureau of Indian Standard (भारतीय मानक ब्यूरो)
5. MHRD – Ministry of Human Resources Development (मानव संसाधन मंत्रालय, भारत)
6. NKC – National Knowledge Commission (राष्ट्रीय ज्ञान आयोग)
7. SUPREME COURT OF INDIA (भारत का सर्वोच्च न्यायालय)
8. PM – Prime Minister of India (प्रधान मंत्री, भारत)
9. PRESIDENT – President of India (राष्ट्रपति, भारत)
अर्थात ”आध्यात्मिक एवं दार्शनिक विरासत” के आधार पर ”एक भारत - श्रेष्ठ भारत“ के निर्माण की प्रक्रिया उपरोक्त 9 रत्नों पर ही निर्भर है।
”सम्भवतः ऐसा समय आ रहा है जब इस भौतिकवादी समाज में एक नयी भावना का उदय होगा और वह यह कि ईश्वर-दर्शन प्रत्येक व्यक्ति के लिए सम्भव है; तब सभी के उस दिशा में संघर्ष न करने पर भी जो ईश्वर का प्रत्यक्ष प्रयोगात्मक अनुभव करना चाहंेगे उन्हें युग-चेतना से उपहास एवं संदेह के बदले, प्रोत्साहन प्राप्त होगा। यदि हम अपने व्यक्तिगत एवं सामूहिक जीवन में वैज्ञानिक चेतना सम्पन्न एवं आध्यात्मिक एक साथ न हो पाए, तो मानवजाति का अर्थपूर्ण अस्तित्व ही संशय का विषय हो जाएगा। - स्वामी विवेकानन्द

”आध्यात्मिक का अर्थ केवल प्रवचन नहीं, बल्कि आध्यात्मिक सिद्धान्तों के आधार पर तन्त्रों का विकास कर उन्हें वैयक्तिक से वैश्विक जीवन में व्यावहारीकरण करना है” - अनिवर्चनीय कल्कि महाअवतार लव कुश सिंह ”विश्वमानव“


लक्ष्य - गणराज्यों का संघ - देश और देशों का संघ - विश्व राष्ट्र

लक्ष्य - गणराज्यों का संघ - देश और देशों का संघ - विश्व राष्ट्र
ईश्वर (सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त) के छठें अंश अवतार परशुराम के समय तक मानव जाति का विकास इतना हो गया था कि अलग-अलग राज्यों के अनेक साकार शासक और मार्गदर्शक राजा हो गये थे उनमें से जो भी राज्य समर्थक असुरी गुणों से युक्त थे उन सबको परशुराम ने साकार रुप में वध कर डाला। परन्तु बार-बार वध की समस्या का स्थाई हल निकालने के लिए उन्होंने राज्य और गणराज्य की मिश्रित व्यवस्था द्वारा एक व्यवस्था दी जो आगे चलकर ”परशुराम परम्परा“ कहलायी। व्यवस्था निम्न प्रकार थी-
1. प्रकृति में व्याप्त तीन गुण- सत्व, रज और तम के प्रधानता के अनुसार मनुष्य का चार वर्णों में निर्धारण। सत्व गुण प्रधान - ब्राह्मण, रज गुण प्रधान- क्षत्रिय, रज एवं तम गुण प्रधान- वैश्य, तम गुण प्रधान- शूद्र।
2.गणराज्य का शासक राजा होगा जो क्षत्रिय होगा जैसे- ब्रह्माण्डीय गणराज्य में प्रकृति जो रज गुण अर्थात् कर्म अर्थात् शक्ति प्रधान है।
3. गणराज्य में राज्य सभा होगी जिसके अनेक सदस्य होंगे जैसे- ब्रह्माण्डीय गणराज्य में प्रकृति के सत्व, रज एवं तम गुणों से युक्त विभिन्न वस्तु हैं।
4. राजा का निर्णय राजसभा का ही निर्णय है जैसे- ब्रह्माण्डीय गणराज्य में प्रकृति का निर्णय वहीं है जो सत्व, रज एवं तम गुणों का सम्मिलित निर्णय होता है। 
5. राजा का चुनाव जनता करे क्योंकि वह अपने गणराज्य में सर्वव्यापी और जनता का सम्मिलित रुप है जैसे- ब्रह्माण्डीय गणराज्य में प्रकृति सर्वव्यापी है और वह सत्व, रज एवं तम गुणों का सम्मिलित रुप है।
6. राजा और उसकी सभा राज्य वादी न हो इसलिए उस पर नियन्त्रण के लिए सत्व गुण प्रधान ब्राह्मण का नियन्त्रण होगा जैसे- ब्रह्माण्डीय गणराज्य में प्रकृति पर नियन्त्रण के लिए सत्व गुण प्रधान आत्मा का नियन्त्रण होता है।
ईश्वर (सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त) के सातवें अंश अवतार श्रीराम ने इसी परशुराम परम्परा का ही प्रसार और स्थापना किये थे। 
ईश्वर (सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त) के आठवें अवतार श्रीकृष्ण के समय तक स्थिति यह हो गयी थी राजा पर नियन्त्रण के लिए नियुक्त ब्राह्मण भी समाज और धर्म की व्याख्या करने में असमर्थ हो गये। क्योंकि अनेक धर्म साहित्यों, मत-मतान्तर, वर्ण, जातियों में समाज विभाजित होने से व्यक्ति संकीर्ण और दिग्भ्रमित हो गया था और राज्य समर्थकों की संख्या अधिक हो गयी थी परिणामस्वरुप मात्र एक ही रास्ता बचा था- नवमानव सृष्टि। इसके लिए उन्होंने सम्पूर्ण धर्म साहित्यों और मत-मतान्तरों के एकीकरण के लिए आत्मा के सर्वव्यापी व्यक्तिगत प्रमाणित निराकार स्वरुप का उपदेश ”गीता“ व्यक्त किये और गणराज्य का उदाहरण द्वारिका नगर का निर्माण कर किये । उनकी गणराज्य व्यवस्था उनके जीवन काल में ही नष्ट हो गयी परन्तु ”गीता“ आज भी प्रेरक बनीं हुई है।
  ईश्वर (सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त) के नवें अवतार भगवान बुद्ध के समय पुनः राज्य एकतन्त्रात्मक होकर हिंसात्मक हो गया परिणामस्वरुप बुद्ध ने अहिंसा के उपदेश के साथ व्यक्तियों को धर्म, बुद्धि और संघ के शरण में जाने की शिक्षा दी। संघ की शिक्षा गणराज्य की शिक्षा थी। धर्म की शिक्षा आत्मा की शिक्षा थी। बुद्धि की शिक्षा प्रबन्ध और संचालन की शिक्षा थी जो प्रजा के माध्यम से प्रेरणा द्वारा गणराज्य के निर्माण की प्रेरणा थी। 
  ईश्वर (सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त) के दसवें और अन्तिम अवतार के समय तक राज्य और समाज स्वतः ही प्राकृतिक बल के अधीन कर्म करते-करते सिद्धान्त प्राप्त करते हुए पूर्ण गणराज्य की ओर बढ़ रहा था परिणामस्वरुप गणराज्य का रुप होते हुए भी गणराज्य सिर्फ राज्य था और एकतन्त्रात्मक अर्थात् व्यक्ति समर्थक तथा समाज समर्थक दोनों की ओर विवशतावश बढ़ रहा था। 
जिस प्रकार केन्द्र में संविधान संसद है, प्रदेश में संविधान विधान सभा है उसी प्रकार ग्राम नगर में भी संविधान होना चाहिए जिस प्रकार केन्द्र और प्रदेश के न्यायालय और पुलिस व्यवस्था है उसी प्रकार ग्राम नगर के भी होने चाहिए कहने का अर्थ ये है कि जिस प्रकार की व्यवस्थाये केन्द्र और प्रदेश की अपनी हैं उसी प्रकार की व्यवस्था छोटे रुप में ग्राम नगर की भी होनी चाहिए। संघ (राज्य) या महासंघ (केन्द्र) से सम्बन्ध सिर्फ उस गणराज्य से होता है प्रत्येक नागरिक से नहीं संघ या महासंघ का कार्य मात्र अपने गणराज्यों में आपसी समन्वय व सन्तुलन करना होता है उस पर शासन करना नहीं तभी तो सच्चे अर्थों में गणराज्य व्यवस्था या स्वराज-सुराज व्यवस्था कहलायेगी। यहीं राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी की प्रसिद्ध युक्ति ”भारत ग्राम (नगर) गणराज्यों का संघ हो“ और ”राम राज्य“ का सत्य अर्थ है। 
प्रबन्ध का विश्वमानक  (World Standard of Management) के अनुसार - प्रत्येक स्वायत्तशासी इकाई या मन अपने से बड़े स्वायत्तशासी इकाई या मन जो उसमें व्याप्त है, के प्रति समर्पित और केन्द्रित रहते हुये आवश्यकता और समयानुसार स्वायत्तशासी इकाई या मन के रूप में संयुग्मन और विखण्डन आधारित प्रबन्ध, प्रबन्ध का विश्व मानक कहलाता है।  
क्रियाकलापों के विश्व मानक के अनुसार (World Standard of Management & Activity) के अनुसार - कर्मशील प्रत्येक कत्र्ता स्वायत्तशासी इकाई या मन के रूप में क्रियाकलापों के विश्व मानक के अनुसार कर्मशील अपने से बड़े स्वायत्तशासी इकाई या मन जो उसमें व्याप्त है, के प्रति समर्पित और केन्द्रित रहते हुये आवश्यकता और समयानुसार क्रियाकलापों के विश्व मानक के अनुसार स्वायत्तशासी इकाई या मन के रूप में सयुग्मन और विखण्डन, प्रबन्ध और क्रियाकलाप का विश्व मानक कहलाता है।
उपरोक्त के अनुसार - जिस राज्य क्षेत्र स्तर तक में ”एक” का विचार स्थापित करना हो, उस स्तर के क्षेत्र की छोटी इकाई को गणराज्य के रूप में निर्माण करके उनका सम्बन्ध सीधे उस राज्य से होना चाहिए। नियंत्रण हेतु बीच के जितने भी स्तर होंगे वे विकास में बाधक ही होंगे और वह गणराज्य का सत्य रूप नहीं कहलायेगा।
भारत देश के संविधान के प्रस्तावना में निम्नलिखित संकल्प हैं-
”हम भारत के लोग, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न धर्म निरपेक्ष समाजवादी लोकतन्त्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए और इसके सब नागरिकों के लिए सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्त, धर्म, विश्वास व पूजा की स्वतन्त्रता, हैसियत तथा अवसर की समानता प्राप्त करने के लिए और राष्ट्र की एकता तथा एक बद्धता बनाये रखते हुये सभी में बन्धुत्व की भावना बढ़ाने के लिए संकल्प होकर अपनी इस संविधान में आज तारीख 26 नवम्बर 1949 ई0 मिती मार्गशीर्ष, शुक्ला सप्तमी, सम्वत् दो हजार छः विक्रमी को एतद्वारा इस संविधान को अंगीकृत अधिनियमित तथा आत्मापिर्त करते है।“
भारत देश के संविधान के प्रस्तावना में ”समाजवादी लोकतन्त्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए“ वाक्य आता है। अवतारी श्रृंखला अनुसार, प्रबन्ध और क्रियाकलाप के विश्वमानक अनुसार और भारतीय संविधान के अनुसार देखा जाये तो ”आध्यात्मिक एवं दार्शनिक विरासत के आधार पर एक भारत - श्रेष्ठ भारत“ निर्माण के लिए ग्राम पंचायत और नगर पंचायत का अपना संविधान उसी रूप में होना चाहिए जिस रूप में भारत का है। क्योंकि भारतीय गणराज्य में सबसे छोटी इकाई यही हंै, और इनका सीधा सम्बन्ध केन्द्र से होना चाहिए। बीच के क्षेत्र पंचायत, जिला पंचायत, राज्य सरकार या कोई अन्य स्तर की कोई आवश्यकता ही नहीं है। ये गणराज्य के स्वरूप के अनुसार बीच के           बाधक हैं और गणराज्य की एकता और विकास में बाधा उत्पन्न करते हैं। इनके न रहने से राज्यों के प्राकृतिक संसाधन विवाद, बार-बार चुनाव, राजनीतिक अस्थिरता और राजनीतिक भ्रष्टाचार आम जनता के विकास में बाध उत्पन्न करती है। गणराज्य के सत्य रूप में प्राकृतिक संसाधन या तो ग्राम-नगर गणराज्य के होते है या भारत गणराज्य के। भारत में निम्न्लिखित रुप व्यक्त हो चुका है-
1. ग्राम, विकास खण्ड, नगर, जनपद, प्रदेश और देश स्तर पर गणराज्य और गणसंघ का रुप।
2. सिर्फ ग्राम व नगर स्तर पर राजा (ग्राम व नगर पंचायत अध्यक्ष ) का चुनाव सीधे जनता द्वारा।
3. गणराज्य को संचालित करने के लिए संचालक का निराकार रुप- संविधान। 
4. गणराज्य के तन्त्रों को संचालित करने के लिए तन्त्र और क्रियाकलाप का निराकार रुप-नियम और कानून।
5. राजा पर नियन्त्रण के लिए ब्राह्मण का साकार रुप- राष्ट्रपति, राज्यपाल, जिलाधिकारी इत्यादि। 
अवतारी श्रृंखला के अनुसार गणराज्य के मुख्य नेतृत्व (प्रधानमंत्री/राष्ट्रपति) का चुनाव जनता द्वारा सीधे किया जाता है न कि सदस्यों द्वारा। 
भारत के सम्बन्ध में यदि ”एक भारत - श्रेष्ठ भारत“ का निर्माण करना हो तो भारतीय गणराज्य के मुख्य नेतृत्व का चुनाव सीधे जनता द्वारा होना चाहिए। जिस प्रकार भारतीय गणराज्य की सबसे छोटी इकाई ग्राम पंचायत और नगर पंचायत में उसके मुख्य नेतृत्व (अध्यक्ष/ग्राम प्रधान) ज्यादातर व्यवस्था में सीधे जनता द्वारा चुने जाते हैं। जबकि बीच के क्षेत्र पंचायत, जिला पंचायत, राज्य सरकार में उसके मुख्य नेतृत्व (अध्यक्ष) सदस्यों द्वारा चुने जाते हैं। यही स्थिति भारत के मुख्य नेतृत्व के सम्बन्ध में भी है।
विश्व राष्ट्र के लिए वर्तमान व्यवस्था में गणराज्य देशों का संघ, विश्व राष्ट्र होना चहिए। जिसका स्वरूप वर्तमान समय में संयुक्त राष्ट्र संघ है जहाँ निम्नलिखित रुप व्यक्त हो चुका है-
1. गणराज्यों के संघ के रुप में संयुक्त राष्ट्र संघ का रुप।
2. संघ के संचालन के लिए संचालक और संचालक का निराकार रुप- संविधान।
3. संघ के तन्त्रों को संचालित करने के लिए तन्त्र और क्रियाकलाप का निराकार रुप- नियम और कानून।
4. संघ पर नियन्त्रण के लिए ब्राह्मण का साकार रुप-पाँच वीटो पावर।
5. प्रस्ताव पर निर्णय के लिए सदस्यों की सभा।
6. नेतृत्व के लिए राजा- महासचिव।
विश्व राष्ट्र के लिए यदि ऐसा हो सके तो गणराज्य का सत्य रूप इस प्रकार होना चाहिए - सम्पूर्ण विश्व के ग्राम-नगर गणराज्य का सम्बन्ध सीधे विश्व राष्ट्र से। जिससे देशों के सीमा विवाद हमेशा के लिए समाप्त हो जायें और मनुष्यता की शक्ति - एकीकृत विश्व विकास के लिए एकीकृत हो सके। 
संयुक्त राष्ट्र संघ सदस्य देशों का एक ऐसा संगठन है जो अन्तराष्ट्रीय शान्ति एवम् सुरक्षा और ऐसी ही राजनैतिक, आर्थिक एवम् सामाजिक परिस्थितियों को बनायें रखने के लिए वचनबद्व है। संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर में मुख्य रूप से निम्न उद्देश्य दिये गये है जो किसी भी देश के घरेलू मामले में दखल देने की अनुमति प्रदान नहीं करता।
1. अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर शान्ति व सुरक्षा बनाये रखना।
2. राष्ट्रों के बीच, उनके सम्मान, अधिकार और आत्मनिर्णय के आधार पर मैत्रीपूर्ण सम्बन्धों तथा सहयोग का विकास करना।
3. आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक समस्याओं को सुलझाने के लिए तथा मनवीय अधिकारों और उनके मौलिक स्वाधीनता के प्रति सम्मान भावना बढ़ाने के लिए अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर मिलकर कार्य करना और सहयोग प्राप्त करना।
4. इन समान उद्देश्यों की सिद्धि के लिए उन सभी राज्यों की सहायता का केन्द्र बनना।
संयुक्त राष्ट्र संघ का चार्टर ही उसका संविधान कहलाता है जिसमें 10 हजार शब्द, 111 धारा तथा 19 अध्याय है। संविधान के अनुसार- ”प्रत्येक राष्ट्र को अपनी सम्पदा और प्राकृतिक संसाधनों पर स्वतन्त्रता पूर्वक सम्पूर्ण प्रभुत्व जमाने का। अपने राष्ट्रीय अधिकार क्षेत्र के अन्तर्गत किसी भी विदेशी पूंजी निवेश को नियंत्रित करने और उस पर अधिकार चलाने का और विदेशी सम्पत्ति को राष्ट्रीयकृत करने, विसम्पत्तिकृत करने या उसके स्वामित्व का स्थानान्तरण करने का अधिकार प्राप्त है।“
और यह सब तभी सम्भव है जब भारत स्वयं को ”आध्यात्मिक एवं दार्शनिक विरासत के आधार पर एक भारत - श्रेष्ठ भारत“ निर्माण करके एक मानक गणराज्य के रूप में स्वयं को विश्व के समक्ष प्रस्तुत करे। ऐसा करने से यही उदाहरण विश्व के लिए मागदर्शक बन जायेगा। और भारतीय दर्शन की सर्वश्रेष्ठता के साथ उपयोगिता और गुरूता दोनों सिद्ध होगी।