Tuesday, March 31, 2020

मानव और पूर्ण मानव

मानव और पूर्ण मानव

इस ब्रह्माण्ड में अन्य जीवों की भाँति मनुष्य भी एक जीव है। एक मात्र मनुष्य के सामने यह अवसर है कि वह पशु मानव से पूर्ण मानव व ईश्वरीय मानव तक ज्ञान-ध्यान-चेतना का प्रयोग कर स्वयं को ऊपर उठा सकता है।
कुछ वर्षों पहले वैज्ञानिक डाॅ0 फ्रेड हाॅयल भारतवर्ष आये थे। विज्ञान भवन में उन्होंने कहा था-”अंतरिक्ष की गहराइयाँ जितनी अनन्त की ओर बढ़ेंगी, उसमें झाँककर देखने से मानवीय अस्तित्व का अर्थ और प्रयोजन उतना ही स्पष्ट होता चला जायेगा। शर्त यह रहेगी कि हमारी अपनी अन्वेषण बुद्धि का भी विकास और विस्तार हो। यदि हमारी बुद्धि, विचार और ज्ञान मात्र पेट, प्रजनन, तृष्णा, अहंता तक ही सीमित रहता है, तब तो हम पड़ोस को भी नहीं जान सकेंगे, पर यदि इन सबसे पूर्वाग्रह मुक्त हों तो ब्रह्माण्ड इतनी खुली और अच्छे अक्षरों में लिखी चमकदार पुस्तक है कि उससे हर शब्द का अर्थ, प्रत्येक अस्तित्व का अभिप्राय समझा जा सकता एवं अनुभव किया जा सकता है।“
वस्तुतः चेतना का मुख्य गुण है-विकास। जहाँ भी चेतना या जीवन का अस्तित्व विद्यमान दिखाई देता है, वहाँ अनिवार्य रूप से विकास, वर्तमान स्थिति से आगे बढ़ने की हलचल दिखाई देती है। इस दृष्टि से मनुष्यों, जीव-जन्तु और पेड़-पौधों को ही जीवित माना जाता है। परन्तु भारतीय आध्यात्म की मान्यता है कि जड़ कुछ है ही नहीं, सब कुछ चैतन्य ही है। सुविधा के लिए स्थिर, निष्क्रिय और यथास्थिति में बने रहने वाली वस्तुओं को जड़ कहा जाता है, परन्तु वस्तुतः वे प्रचलित अर्थो में जड़ है ही नहीं। सृष्टि के इस विराट रूप, क्रमिक विस्तार एवं सतत गतिशीलता के मूल में झाँकने पर वैज्ञानिक पाते है कि यह सब एक सुनियोजित चेतना की विधि व्यवस्था के अन्तर्गत सम्पन्न हुआ क्रियाकलाप है।
इस सम्पूर्ण विवेचन से यह निष्कर्ष निकलता है कि मनुष्य को यह नहीं समझना चाहिए कि वह इस सृष्टि का सर्वतः स्वतन्त्र सदस्य है और उसे कर्म करने की जो स्वतन्त्रता मिली है, उसके अनुसार वह इस सृष्टि के महानियंता की नियामक व्यवस्था द्वारा निर्धारित दण्ड से भी बच पायेगा। इस विराट ब्रह्माण्ड में पृथ्वी का ही अस्तित्व एक धूलिकण के बराबर नहीं है तो मनुष्य का स्थान कितना बड़ा होगा? फिर भी मनुष्य नाम का यह प्राणी इस पृथ्वी पर कैसे-कैसे प्रपंच फैलाये हुये है यह जानने और उसे उस अन्तिम मार्ग से परिचय कराने हेतु ही ”विश्वशास्त्र“ को प्रस्तुत किया गया है। वस्तुतः यथार्थ में ऐसा होना चाहिए कि जीवकोपार्जन हेतु ज्ञान व कर्म मनुष्य-मनुष्य के अनुसार अलग-अलग हो सकते हैं परन्तु जीवन का ज्ञान एक ही होना चाहिए और यदि मानव जाति के नियंतागण ऐसा कर सके तो भविष्य की सुरक्षा हेतु बहुत बड़ी बात होगी। साथ ही ब्रह्माण्ड के अनेक रहस्यों को जानने के लिए मनुष्य के शक्ति का एकीकरण भी कर सकने में हम सफल होगें।
जब मनुष्य वैश्विक ज्ञान-ध्यान-चेतना से मुक्त केवल स्वयं में ही स्थित रहता है तब वह मानव है, जब मनुष्य वैश्विक ज्ञान-ध्यान-चेतना से युक्त स्वयं में ही स्थित रहता है तब वह पूर्ण मानव है और जब मनुष्य वैश्विक ज्ञान-ध्यान-चेतना से युक्त होकर विश्व-ब्रह्माण्ड को अपना कार्य क्षेत्र समझ उसके लिए कार्य करता है तब वह ईश्वरीय मानव की अवस्था में होता है।
मनुष्य के समक्ष अनेक तर्क हैं, समस्यायें हैं, प्रश्न हैं, सफलताएँ हैं, असफलताएँ हैं। इसलिए उसे ऐसा भी लगता है कि कोई पूर्ण मानव नहीं हो सकता। अगर इसे स्वीकार भी कर लिया जाये तो क्या इस पूर्णता के लक्ष्य को पाने के लिए प्रयत्न भी बन्द कर देना चाहिए? तब तो मनुष्य, मानव से हिंसक पशु मानव में परिवर्तित होने लगेगा। इसलिए पूर्ण मानव का एक मापदण्ड निर्धारित कर हमें उस ओर ही जाना होगा, कम से कम लक्ष्य सत्य-शिव-सुन्दर होगा तो हम जितना भी उस ओर चल सकंे, सत्य-शिव-सुन्दर के ही दिशा में हमारा विकास होगा।
युग के अनुसार सत्यीकरण का मार्ग उपलब्ध कराना ईश्वर का कर्तव्य है आश्रितों पर सत्यीकरण का मार्ग प्रभावित करना अभिभावक का कर्तव्य हैै। और सत्यीकरण के मार्ग के अनुसार जीना आश्रितों का कर्तव्य है जैसा कि हम सभी जानते है कि अभिभावक, आश्रितों के समझने और समर्थन की प्रतिक्षा नहीं करते। अभिभावक यदि किसी विषय को आवश्यक समझते हैं तब केवल शक्ति और शीघ्रता से प्रभावी बनाना अन्तिम मार्ग होता है। विश्व के बच्चों के लिए यह अधिकार है कि पूर्ण ज्ञान के द्वारा पूर्ण मानव अर्थात् विश्वमानव के रुप में बनना। हम सभी विश्व के नागरिक सभी स्तर के अभिभावक जैसे-महासचिव संयुक्त राष्ट्र संघ, राष्ट्रों के राष्ट्रपति-प्रधानमंत्री, धर्म, समाज, राजनीति, उद्योग, शिक्षा, प्रबन्ध, पत्रकारिता इत्यादि द्वारा अन्य समानान्तर आवश्यक लक्ष्य के साथ इसे जीवन का मुख्य और मूल लक्ष्य निर्धारित कर प्रभावी बनाने की आशा करते हैं। क्योंकि लक्ष्य निर्धारण वक्तव्य का सूर्य नये सहस्त्राब्दि के साथ डूब चुका है। और कार्य योजना का सूर्य उग चुका है। इसलिए धरती को स्वर्ग बनाने का अन्तिम मार्ग सिर्फ कर्तव्य है। और रहने वाले सिर्फ सत्य-सिद्धान्त से युक्त संयुक्तमन आधारित मानव है, न कि संयुक्तमन या व्यक्तिगतमन के युक्तमानव।
यदि हमें अपनी आने वाली पीढ़ी को एक सुरक्षित और शक्ति और लाभ ;च्वूमत-च्तवपिजद्ध के उद्देश्य से मुक्त बौद्धिक विकासशील पृथ्वी उपहार स्वरूप देना है तो हमें पूर्ण मन से युक्त मानव-विश्वमानव का निर्माण प्रारम्भ करना होगा जो वर्तमान सहित भविष्य की आवश्यकता भी है। और इस आवश्यकता का संकेत अन्तिम ऊँचाई के नेतृत्व से स्पष्ट दिखता भी है। बौद्धिक विकास का अनन्त मार्ग न होने से वैचारिक टकराव की सम्भावना सदैव बढ़ती है।
एक श्रृंखला (Chain) को आगे बढ़ाने के लिए उसके प्रथम कड़ी को आगे बढ़ाना होगा तभी सभी कड़ी आगे बढ़ेगी। केवल पीछे अर्थात नीचे की कड़ी को या बीच के किसी कड़ी को आगे बढ़ाने से वह अगली कड़ी के लिए बाधक या प्रतियोगिता ही उत्पन्न कर सकता है। वैश्विक एकीकरण और पूर्णता के लिए आ गई बौद्धिक कमी की पूर्ति ही ”विश्वशास्त्र“ के रूप में व्यक्त हुआ है।

प्रकृति प्रदत्त नाम के अलावा जब व्यक्ति को आत्मज्ञान होता है तब वह स्वयं अपने मन स्तर का निर्धारण कर एक नाम स्वयं रख लेता है। जिस प्रकार ”श्रीकृष्ण“ नाम है ”योगेश्वर“ मन की अवस्था है, ”गदाधर“ नाम है ”श्रीरामश्रीकृष्ण परमहंस“ मन की अवस्था है, ”सिद्धार्थ“ नाम है ”बुद्ध“ मन की अवस्था है, ”नरेन्द्र नाथ दत्त“ नाम है ”स्वामी विवेकानन्द“ मन की अवस्था है, ”रजनीश“ नाम है ”ओशो“ मन की अवस्था है। उसी प्रकार लव कुश सिंह नाम है ”विश्वमानव“ मन की अवस्था है और उसी प्रकार व्यक्तियों के नाम, नाम है ”भोगेश्वर विश्वमानव“ उसकी चरम विकसित, सर्वोच्च और अन्तिम अवस्था है जहाँ समय की धारा में चलते-चलते मनुष्य वहाँ विवशतावश पहुँचेगा।



शिक्षण विधि और आशीर्वाद

शिक्षण विधि और आशीर्वाद

एक कोशिका से दूसरे कोशिका को ज्ञान के अग्रसरण/संचरण के द्वारा विकसित हो रहे जीवों में मानव, ज्ञान क्रान्ति के अन्तिम लक्ष्य के पास पहुँच रहा है। जीव आते हैं, जाते हैं, और समय की धारा में ज्ञान, संसाधन और अपनी पीढ़ी को आगे बढ़ा कर चले जाते हैं। कुल मिलाकर मनुष्य केवल प्रकृति के अदृश्य ज्ञान को दृश्य ज्ञान में परिवर्तित करने का माध्यम मात्र है। मानव की मात्र इतनी ही कहानी होते हुये भी वह आर्थिक लाभ पाने के मानवीय चक्र में ज्ञान पाने के ईश्वरीय चक्र से इतना दूर होते जा रहा है कि उसे यह नहीं पता कि वह स्वयं मानव जाति के अस्तित्व को ही इस कमलरूपी पृथ्वी पर विराजमान होने से पहले ही मिटा देना चाहता है।
इस क्रम में ज्ञान के अदृश्य संचरण से प्रारम्भ हुआ जीवन, फिर संकेत, फिर मौखिक, फिर भाषा लिपि, फिर हस्तलिखित पुस्तक, फिर मुद्रित पुस्तक से अब हम सभी डिजिटल विडियो-आॅडियो तक पहुँच चुके हैं। जहाँ हमारी यात्रा एक दृश्य जीव शिक्षक/गुरू से शुरू हुयी थी वहीं अब हम सभी एक अदृश्य मानव निर्मित अजीव शिक्षक/गुरू (डिजिटल विडियो-आॅडिया शैक्षणिक सामग्री) की ओर बढ़ रहे हैं। इस क्रम से सबसे बड़ा नुकसान ”समझ“ का हुआ। ”समझ“ गिरती गयी और मानव निर्मित संस्था द्वारा प्रमाणित योग्यता सबको प्राप्त होती गयी। और शब्दों के अर्थ ”समझ“ के अनुसार बदलते गये। एक कोशिका से दूसरे कोशिका को ज्ञान के अग्रसरण/संचरण का प्राकृतिक नियम व्यापार में बदल गया। शिक्षक/गुरू भी आर्थिक प्रणाली से संचालित होने लगे साथ ही विद्यार्थी/छात्र भी। जिस प्रकार मुख्य आत्मा के उपस्थिति में ब्रह्माण्ड संचालित और प्रकृति नाच रही है उसी प्रकार मनुष्य निर्मित ”मुद्रा“ से ब्रह्माण्ड तो संचालित नहीं हो सकता लेकिन मनुष्य जरूर नाच रहा है। विद्या अर्जन के इस विकास क्रम में जो बातें आयीं वे हैं-शिक्षा माध्यम, शिक्षक/गुरू, विद्यार्थी/छात्र और शिक्षा पाठ्यक्रम।

शिक्षा माध्यम
शिक्षा माध्यम उस माध्यम से सम्बन्धित है जिसके द्वारा एक शिक्षक/गुरू अपने विद्यार्थी/छात्र में ज्ञान का संचरण करता है जो भाषा, चित्र, संकेत, आवाज इत्यादि हो सकते हैं। इसके अलावा शिक्षक/गुरू की अपनी समझ की कला भी हो सकती है जिससे वह आसानी से अपने विद्यार्थी/छात्र में ज्ञान का संचरण कर दे।

शिक्षक/गुरू
स्वामी विवेकानन्द जी ने कहा था-”हम गुरु के बिना कोई ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकते। अब बात यह है कि यदि मनुष्य, देवता अथवा कोई स्वर्गदूत हमारे गुरु हो, तो वे भी तो ससीम हैं, फिर उनसे पहले उनके गुरु कौन थे? हमें मजबूर होकर यह चरम सिद्धान्त स्थिर करना ही होगा कि एक ऐसे गुरु हैं जो काल के द्वारा सीमाबद्ध या अविच्छिन्न नहीं हैं। उन्हीं अनन्त ज्ञान सम्पन्न गुरु को, जिनका आदि भी नहीं और अन्त भी नहीं, ईश्वर कहते हैं। गुरु के सम्बन्ध में यह जान लेना आवश्यक है कि उन्हें शास्त्रो का मर्म ज्ञान हो। वैसे तो सारा संसार ही बाइबिल, वेद, पुराण पढ़ता है, पर वे तो केवल शब्द राशि है। धर्म की सूखी ठठरी मात्र है। जो गुरु शब्दाडंबर के चक्कर में पड़ जाते हैं, जिनका मन शब्दों की शक्ति में बह जाता है, वे भीतर का मर्म खो बैठते हैं। जो शास्त्रों के वास्तविक मर्मज्ञ हैं, वे ही असल में सच्चे धार्मिक गुरु हैं। संसार के प्रधान आचार्यों में से कोई भी शास्त्रों की इस प्रकार नानाविध व्याख्या करने के झमेंले में नहीं पड़ा। उन्होनें श्लोकों के अर्थ में खींचातानी नहीं की। वे शब्दार्थ और भावार्थ के फेर मंे नहीं पड़े। फिर भी उन्होंने संसार को बड़ी सुन्दर शिक्षा दी। इसके विपरीत, उन लोगों ने जिनके पास सिखाने को कुछ भी नहीं, कभी एकाध शब्द को ही पकड़ लिया और उस पर तीन भागों की एक मोटी पुस्तक लिख डाली, जिसमें सब अनर्थक बातें भरी हैंे। भगवान श्री राम कृष्ण कहते थे-”जब एक बहुत बड़ी लहर आती है, तो छोटे-छोटे नाले और गड्ढे अपने आप ही लबालब भर जाते हैं। इसी प्रकार जब एक अवतार जन्म लेता है, तो समस्त संसार मंे आध्यात्मिकता की एक बड़ी बाढ़ आ जाती है और लोग वायु के कण-कण में धर्मभाव का अनुभव करने लगते हैं। अनात्मज्ञ पुरूषों की बुद्धि एकदेश-दर्शिनी (Single Dimensional) होती है। आत्मज्ञ पुरूषों की बुद्धि सर्वग्रासिनी (Multi Dimensional) होती है। आत्मप्रकाश होने से, देखोगे कि दर्शन, विज्ञान सब तुम्हारे अधीन हो जायेगे।“
कुल मिलाकर जैसी शिक्षा, वैसा शिष्य और अन्त में वैसा ही शिक्षक क्योंकि शिक्षा प्राप्ति के बाद बहुत से विद्यार्थी/छात्र अलग-अलग व्यापार के साथ ”पढ़ो और पढ़ाओ“ वाले व्यापार में भी जाते है और शिक्षक भी बनते हैं। अन्त में हल यही निकलेगा कि अदृश्य मानव निर्मित अजीव शिक्षक/गुरू (डिजिटल विडियो-आॅडिया शैक्षणिक सामग्री) के रूप में सामने आयेगा और सरकारी शिक्षा संस्थान मात्र एक पंजीकरण केन्द्र, परीक्षा केन्द्र संचालक और प्रमाण-पत्र दाता बनेगा।
शब्दों के अर्थ ”समझ“ के अनुसार बदलते रहने से शब्द ”आशीर्वाद“ के भी अर्थ बदल गये। वर्तमान में ”आशीर्वाद“ यूँ ही मिल जाते हैं। प्रारम्भ में यह ”आशीर्वाद“ ऋषि-मुनि-गुरू जन सिर्फ योग्य को ही प्रदान करते थे ताकि उनके शब्द कभी असत्य न हों। और यदि असत्य होने की सम्भावना दिखे तो उसे वे सत्य में परिवर्तित करने के लिए भी हर नीति का प्रयोग करते थे। ऐसे ही गुरू थे-गुरू द्रोणाचार्य। जिन्होंने सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर का ”आशीर्वाद“ अपने शिष्य अर्जुन को दिया था। और वे अपने ”आशीर्वाद“ को सत्य में परिवर्तित करने के लिए बीच में आ गये एकलव्य का नीति के अन्तर्गत अँगूठा माँगकर अपने ”आशीर्वाद“ की रक्षा की। यह मात्र एक सन्देश है-शब्द ”आशीर्वाद“ के सही अर्थ का।

विद्यार्थी/छात्र
स्वामी विवेकानन्द जी ने कहा था-”जिस व्यक्ति की आत्मा से दूसरी आत्मा में शक्ति का संचार होता है वह गुरु कहलाता है और जिसकी आत्मा में यह शक्ति संचारित होती है उसे शिष्य कहते हैं।” हमारे दृष्टि में छात्र वे हैं जो किसी शैक्षणिक संस्थान के किसी शैक्षणिक पाठ्यक्रम में प्रवेश ले कर अध्ययन करतेे है। और विद्यार्थी वे हैं जो सदैव अपने ज्ञान व बुद्धि का विकास कर रहे हैं और उसके वे इच्छुक भी हैं। इस प्रकार सभी मनुष्य व जीव, जीवन पर्यन्त विद्यार्थी ही बने रहते हैं चाहे उसे वे स्वीकार करें या ना करें। जबकि छात्र जीवन पर्यन्त नहीं रहा जा सकता। कहा जाता है-”छात्र शक्ति, राष्ट्र शक्ति“, लेकिन कौन सी शक्ति? उसकी कौन सी दिशा? तोड़-फोड़, हड़ताल, या अनशन वाली या समाज व राष्ट्र को नई दिशा देने वाली? स्वामी विवेकानन्द को मानने व उनके चित्र लगाकर छात्र राजनीति द्वारा राष्ट्र को दिशा नहीं मिल सकती बल्कि उन्होंने क्या कहा और क्या किया था, उसे जानने और चिन्तन करने से राष्ट्र को दिशा मिल सकती है और ”छात्र शक्ति, राष्ट्र शक्ति“ की बात सत्य हो सकती है। हम सभी ज्ञान युग और उसी ओर बढ़ते समय में हैं इसलिए केवल प्रमाण-पत्रों वाली शिक्षा से काम नहीं चलने वाला है।
छात्रों की विवशता है कि उनके शिक्षा बोर्ड व विश्वविद्यालय जो पाठ्यक्रम तैयार करेगें वहीं पढ़ना है और छात्रों की यह प्रकृति भी है कि वही पढ़ना है जिसकी परीक्षा ली जाती हो। जिसकी परीक्षा न हो क्या वह पढ़ने योग्य नहीं है? बहुत बढ़ा प्रश्न उठता है। तब तो समाचार पत्र, पत्रिका, उपन्यास इत्यादि जो पाठ्यक्रम के नहीं हैं उन्हें नहीं पढ़ना चाहिए। शिक्षा बोर्ड व विश्वविद्यालय तो एक विशेष पाठ्यक्रम के लिए ही विशेष समय में परीक्षा लेते हैं परन्तु ये जिन्दगी तो जीवन भर आपकी परीक्षा हर समय लेती रहती है तो क्या जीवन का पाठ्यक्रम पढ़ना अनिवार्य नहीं है? 

शिक्षा पाठ्यक्रम
जो व्यक्ति या देश केवल आर्थिक उन्नति को ही सर्वस्व मानता है वह व्यक्ति या देश एक पशुवत् जीवन निर्वाह के मार्ग पर है-जीना और पीढ़ी बढ़ाना। दूसरे रूप में इसे ऐसे समझा जा सकता है कि ऐसे व्यक्ति जिनका लक्ष्य धन रहा था वे अपने धन के बल पर अपनी मूर्ति अपने घर पर ही लगा सकते हैं परन्तु जिनका लक्ष्य धन नहीं था, उनका समाज ने उन्हें, उनके रहते या उनके जाने के बाद अनेकों प्रकार से सम्मान दिया है और ये सार्वजनिक रूप से सभी के सामने प्रमाणित है। पूर्णत्व की प्राप्ति का मार्ग शारीरिक-आर्थिक उत्थान के साथ-साथ मानसिक-बौद्धिक उत्थान होना चाहिए और यही है ही। इस प्रकार भारत यदि पूर्णता व विश्व गुरूता की ओर बढ़ना चाहता है तब उसे मात्र कौशल विकास ही नहीं बल्कि राष्ट्रीय बौद्धिक विकास की ओर भी बढ़ना होगा। बौद्धिक विकास, व्यक्ति व राष्ट्र का इस ब्रह्माण्ड के प्रति दायित्व है और उसका लक्ष्य है। व्यक्ति व राष्ट्र के पूर्णत्व के लिए पूर्ण शिक्षा निम्नलिखित दो शिक्षा का संयुक्त रूप है-

अ-सामान्यीकरण (Generalisation)  शिक्षा
यह शिक्षा व्यक्ति और राष्ट्र का बौद्धिक विकास कराती है जिससे व्यक्ति व राष्ट्रीय सुख में वृद्धि होती है। वर्तमान समय में सामान्यीकरण शिक्षा की समस्या है। व्यक्तियों के विचार से सदैव व्यक्त होता रहा है कि-मैंकाले शिक्षा पद्धति बदलनी चाहिए, राष्ट्रीय शिक्षा नीति व पाठ्यक्रम बनना चाहिए। ये तो विचार हैं। पाठ्यक्रम बनेगा कैसे?, कौन बनायेगा? पाठ्यक्रम में पढ़ायेगें क्या? ये समस्या थी। और वह हल की जा चुकी है। जो भारत सरकार के सामने सरकारी-निजी योजनाओं जैसे ट्रांसपोर्ट, डाक, बैंक, बीमा की तरह निजी शिक्षा पाठ्यक्रम के रूप में पुनर्निर्माण-सत्य शिक्षा का राष्ट्रीय तीव्र मार्ग द्वारा पहली बार इसके आविष्कारक द्वारा प्रस्तुत है। जिसकी उपयोगिता सत्य समझ, जीवन ज्ञान, प्रबन्धकीय समझ, गुरूता और सत्य शिक्षकीय समझ में है। इससे किसी भी सरकारी संस्थान में नौकरी नहीं मिलती बल्कि इससें पद का सही उपयोग और सही दुरूपयोग का गुण आता है जो उस व्यक्ति पर ही निर्भर करता है न कि उस ज्ञान पर।

ब-विशेषीकरण (Specialisation) शिक्षा
यह शिक्षा व्यक्ति और राष्ट्र का कौशल विकास कराती है जिससे व्यक्ति व राष्ट्रीय उत्पादकता में वृद्धि होती है। वर्तमान समय में विशेषीकरण की शिक्षा, भारत में चल ही रहा है जो सरकारी मान्यता प्राप्त शिक्षा पाठ्यक्रम से युक्त प्राइमरी से लेकर विश्वविद्यालय तथा प्रोफेशनल एजुकेशन-स्किल डेवलपमेंण्ट (कौशल विकास) के रूप में सामने है। 


शिक्षा, शिक्षक और शिक्षार्थी

शिक्षा, शिक्षक और शिक्षार्थी


जैसी तुम्हारी इच्छा वैसा करो

जैसी तुम्हारी इच्छा वैसा करो

पुस्तक का मुख-पृष्ठ: श्याम (काला)-श्वेत (सफेद) क्यों?

पुस्तक का मुख-पृष्ठ: श्याम (काला)-श्वेत (सफेद) क्यों?
काला (श्याम) 
काला रंग किसी भी रंग को दृष्य स्पेक्ट्रम से परावर्तित नहीं करता अर्थात सभी रंगों को अवशोषित कर लेता है। काला रंग गम्भीरता और अधिकार के रंग के रूप में देखा जाता है। ब्रिटीश सेना का ब्लैक वाॅच, वरिष्ठ हाईलैंड रेजिमेंण्ट है। जापानी संस्कृति में काला, बड़प्पन, आयु और अनुभव का एक प्रतीक है इसके विपरीत सफेद दासत्व, युवा और भोलेपन का प्रतीक है। ब्लैक अबु खलीफा हैं जो अक्सर अरब देशों के झण्डे में प्रयोग होता है। स्पेन में ब्लैक, बास्क स्वायत्त पुलिस दंगा नियंत्रण इकाईयों के रूप में जाना जाता है। स्नातकों के लिए शैक्षणिक पोशाक काले रंग का होता है। औपचारिक अवसरों पर काली टाई कार्य के रूप में जाना जाता है। ईसाई धर्म में उच्च वर्ग के धार्मिक व्यक्तियों द्वारा काला वस्त्र पहना जाता है। काला, हैसिडीक यहूदियों द्वारा पहना जाता है। काला बुरका मुस्लिम महिलाओं द्वारा पहना जाता है। वकील और न्यायाधीश अक्सर काले वस्त्र पहनते हैं। यूरोपीय शास्त्रीय संगीत या अन्य संगीत कार्यक्रम या गायन में कलाकारों द्वारा काले रंग के वस्त्र पहने जाते हैं। खगोल विज्ञान में अन्तरिक्ष को काला आकाश, जले हुये तारे को ब्लैक डुआर्फ, संघनित तारे को ब्लैक होल कहते हैं। काली सतह, प्रकाश को अवशोषित करने के कारण तापीय संग्राहक के रूप में प्रयोग किया जाता है। पश्चिमी समाज में काला शोक का प्रतीक माना जाता है। ग्रीस और इटली के समाज में विधवाएँ अपने शेष जीवन में काले वस्त्र पहनती हैं जबकि अफ्रीका और एशिया में सफेद शोक का प्रतीक है। अंग्रेजी विद्या में काला, अंधेरे, संदेह, अज्ञान और अनिश्चितता के अर्थ में प्रयोग होता है। काला सूर्य फासिज्म और ओकल्टीज्म से सम्बन्धित है। केन्या और तंजानिया के जनजातियों में काला रंग बारिश वाले बादल, जीवन और समृद्धि के प्रतीक से जुड़ा हुआ है। अमेरिका के मूल निवासी काले हैं जो मिट्टी से जुड़े हैं। हिन्दू अवतार श्रीकृष्ण और देवता शनि का अर्थ काले से है। मध्यकालीन ईसाई सम्प्रदाय काले को एक पूर्णता के रंग में देखता है। रस्ताफरी आन्दोलन काले को सुन्दर के रूप में देखता है। जापानी संस्कृति में काला सम्मान के साथ जुड़ा हुआ है। काली बिल्ली अच्छे और बुरे भाग्य दोनों के अर्थो में जाना जाता है। काला दिन या सप्ताह या माह आमतौर पर एक दुःखद दिन या सप्ताह या माह के रूप में लिया जाता है। 

सफेद (श्वेत) 
मानव संस्कृति में सफेद रंग को शुद्धता और पवित्रता के रूप में जाना है। सफेद को भूत, शुद्धता, बड़प्पन, कोमलता, खालीपन, भगवान, अभाव, शान्ति, स्वच्छ, सूर्य का प्रकाश, समर्पण, अच्छा, स्वर्गदूत, नायक इत्यादि के सन्दर्भ में भी प्रयोग किया जाता है। सूर्य के प्रकाश में सभी रंगो का मिश्रण होता है। भारतीय परम्परा में सफेद शोक और मृत्यु का रंग है। पश्चिमी सभ्यता में सफेद शुद्धता और बेगुनाही का प्रतिनिधित्व करता है। श्वेत पत्र, सरकारी क्षेत्रों में एक ऐसे रिपोर्ट के लिए कहा जाता है जो किसी मुद्दे पर विशेषज्ञ द्वारा सत्य का खुलासा किया जाता है। सफेद को कई धर्मो में शान्ति और पवित्रता की दृष्टि से देखा जाता है। मुस्लिम लोगों द्वारा हज यात्रा के समय सफेद वस्त्र पहना जाता है। यूरोपीय और जापानी शादियों में दुल्हन का वस्त्र सफेद होता है। वैज्ञानिक और डाॅक्टर के अलावा बहुत से खेलों के खिलाड़ी सफेद वस्त्र पहना करते हैं।

काला (श्याम) और सफेद (श्वेत)
काला और सफेद सबसे अधिक विपरीत दृश्य प्रभाव उत्पन्न करता है और दिन और रात, अच्छाई और बुराई के सन्दर्भ में प्रयुक्त होता है। ताओ धर्म में यिन और यांग काले और सफेद रंग में दिखया गया है। शतरंज और चेकर्स जैसे खेल में भी दो विरोधीयों को काले और सफेद से दिखाया गया है। ब्लैक बेल्ट, मार्शल आर्ट में उपलब्धि और वरिष्ठता का प्रतीक है जबकि सफेद बेल्ट का रैंक कम होता है। ब्रिटीश पुलिस वाहन परम्परागत रूप से काले और सफेद थे।
सभी रंगों को मिला देने पर काला रंग बन जाता है अर्थात काले रंग में सभी रंग समाहित हो जाते है। सृष्टि भी ब्लैक होल (श्याम शून्य) से प्रारम्भ होता हैं और उसी में सघंनित हो जाता है। ब्रह्माण्ड का अधिकांश भाग अंधकार अर्थात काले रंग में ही है। प्रकाश, सदैव अंधकार को हटाने का प्रयत्न करता है क्योंकि साम्राज्य तो सदैव अंधकार का ही है। यह प्रयत्न ही चेतना है। इस शास्त्र का मुख पृष्ठ में काला और सफेद इसलिए रखा गया है जिसका 

प्रथम कारण
यह शास्त्र सभी रंगों अर्थात विचारों को अपने में समाहित करता है और साथ ही सृष्टि करने के लिए प्रकाश फैलाता है जिससें विभिन्न शुद्ध और सत्य रंग अर्थात विचार निकलते हैं। महाभारत की रचना करने वाले महर्षि व्यास ने भी अपने नायक सृष्टिकर्ता को श्रीकृष्ण अर्थात काला ही नाम दिया है जिनसे व्यक्त गीता ज्ञान सभी रंगों अर्थात विचारों को अपने में समाहित करता है और साथ ही सृष्टि करने के लिए प्रकाश फैलाता है जिससें विभिन्न शुद्ध और सत्य रंग अर्थात विचार निकलते हैं।

द्वितीय कारण
हमारा लक्ष्य पूर्णज्ञान के इस शास्त्र को जन-जन तक पहुँचाना है इसलिए प्रथमतया सस्ते दर पर उपलब्ध कराने हेतु इसे काले और सफेद में मुद्रण कराया गया है जिससे इसे सस्ता बनाया जा सके। इसके उपरान्त इसका आकर्षक-सुन्दर-रंगीन संस्करण भी मुद्रित कराया जायेगा क्यांेकि हम जानते हैं कि यह शास्त्र प्रत्येक घर में एक लम्बे अवधि और घर के प्रत्येक सदस्य की आवश्यकता है।


विश्व सरकार के लिए पुनः भारत द्वारा शून्य आधारित अन्तिम आविष्कार

विश्व सरकार के लिए पुनः भारत द्वारा शून्य आधारित अन्तिम आविष्कार

शून्य का प्रथम आविष्कार का परिचय
शून्य (0), दशमलव संख्या प्रणाली में संख्या है। यह दशमलव प्रणाली का मूलभूत आधार भी है। किसी भी संख्या को शून्य से गुणा करने से शून्य प्राप्त होता है। किसी भी संख्या को शून्य से जोड़ने या घटाने पर वही संख्या प्राप्त होती है।
शून्य का आविष्कार किसने और कब किया यह आज तक अंधकार के गर्त में छुपा हुआ है परन्तु सम्पूर्ण विश्व में यह तथ्य स्थापित हो चुका है कि शून्य का आविष्कार भारत में ही हुआ है। ऐसी भी कथाएँ प्रचलित हैं कि पहली बार शून्य का आविष्कार बाबिल में हुआ और दूसरी बार माया सभ्यता के लोगों ने इसका आविष्कार किया पर दोनों ही बार के आविष्कार संख्या प्रणाली को प्रभावित करने में असमर्थ रहे तथा विश्व के लोगों ने इसे भुला दिया। फिर भारत में हिन्दुओं ने तीसरी बार शून्य का आविष्कार किया। हिन्दुओं ने शून्य के विषय में कैसे जाना यह आज भी अनुत्तरित प्रश्न है। अधिकतम विद्वानों का मत है कि पाँचवीं शताब्दी के मध्य में शून्य का आविष्कार किया गया। सन् 498 में भारतीय गणितज्ञ एवं खगोलवेक्ता आर्यभट्ट ने कहा ”स्थानं स्थानं दसा गुणम्“ अर्थात दस गुना करने के लिए संख्या के आगे शून्य रखो। और शायद यही संख्या के दशमलव सिद्धान्त का उद्भव रहा होगा। आर्यभट्ट द्वारा रचित गणितीय खगोलशास्त्र ग्रन्थ आर्यभट्टीय के संख्या प्रणाली में शून्य तथा उसके लिए विशिष्ट संकेत सम्मिलित था। इसी कारण से उन्हें संख्याओं को शब्दों में प्रदर्शित करने का अवसर मिला। प्राचीन बक्षाली लिपि में, जिसका कि सही काल अब तक निश्चित नहीं हो पाया है परन्तु निश्चित रूप से उसका काल आर्यभट्ट के काल से प्राचीन है, शून्य का प्रयोग किया गया है और उसके लिए उसमें संकेत भी निश्चित है। उपरोक्त उदाहरणों से स्पष्ट है कि भारत में शून्य का प्रयोग ब्रह्मगुप्त रचित ग्रन्थ ब्रह्मस्फुट सिद्धान्त में पाया गया है। इस ग्रन्थ में नकारात्मक संख्याओं और बीजगणितीय सिद्धान्तों का भी प्रयोग हुआ है। 7वीं शताब्दी जो ब्रह्मगुप्त का काल था, शून्य से सम्बन्धित विचार कम्बोडिया तक पहुँच चुके थे और दस्तावेजों से ज्ञात होता है कि बाद में ये कम्बोडिया से चीन तथा अन्य मुस्लिम संसार में फैल गये। इस बार भारत में हिन्दुओं के द्वारा आविष्कृत शून्य ने समस्त विश्व की संख्या प्रणाली को प्रभावित किया और सम्पूर्ण विश्व को जानकारी मिली। मध्य-पूर्व में स्थित अरब देशों ने भी शून्य को भारतीय विद्वानों से प्राप्त किया। अन्ततः 12वीं शताब्दी में भारत का यह शून्य पश्चिम में यूरोप तक पहुँचा।

शून्य आधारित अन्तिम आविष्कार का परिचय
आविष्कार विषय ”व्यक्तिगत मन और संयुक्तमन का विश्व मानक और पूर्णमानव निर्माण की तकनीकी है जिसे धर्म क्षेत्र से कर्मवेद: प्रथम, अन्तिम तथा पंचमवेदीय श्रृंखला तथा शासन क्षेत्र से WS-0  मन की गुणवत्ता का विश्व मानक श्रृंखला तथा WCM-TLM-SHYAM.C  तकनीकी कहते है। सम्पूर्ण आविष्कार सार्वभौम सत्य-सिद्वान्त अर्थात सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में व्याप्त अटलनीय, अपरिवर्तनीय, शाश्वत व सनातन नियम पर आधारित है, न कि मानवीय विचार या मत पर आधारित। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में व्याप्त एक ही सत्य-सिद्धान्त द्वारा व्यक्तिगत व संयुक्त मन को एकमुखी कर सर्वोच्च, मूल और अन्तिम स्तर पर स्थापित करने के लिए शून्य पर अन्तिम आविष्कार (WS-0) : श्रृंखला की निम्नलिखित पाँच शाखाएँ है। 
1. डब्ल्यू.एस .(WS-0) : विचार एवम् साहित्य का विश्वमानक
2. डब्ल्यू.एस. (WS-00) : विषय एवम् विशेषज्ञों की परिभाषा का विश्वमानक
3. डब्ल्यू.एस. (WS-000) : ब्रह्माण्ड (सूक्ष्म एवम् स्थूल) के प्रबन्ध और क्रियाकलाप का विश्वमानक
4. डब्ल्यू.एस. (WS-0000) : मानव (सूक्ष्म तथा स्थूल) के प्रबन्ध और क्रियाकलाप का विश्वमानक
5. डब्ल्यू.एस. (WS-00000) : उपासना और उपासना स्थल का विश्वमानक

इस प्रकार विश्व सरकार के लिए पुनः भारत द्वारा शून्य आधारित अन्तिम आविष्कार पूर्ण हुआ है।
(आविष्कार के विस्तृत जानकारी के लिए ”विश्वशास्त्र“ अध्याय-तीन देखें“)


एक ही मानव शरीर के जीवन, ज्ञान और कर्म के विभिन्न विषय क्षेत्र से मुख्य नाम

एक ही मानव शरीर के जीवन, ज्ञान और कर्म के विभिन्न विषय क्षेत्र से मुख्य नाम