Monday, March 30, 2020

प्रारम्भ के पहले दिव्य-दृष्टि

प्रारम्भ के पहले दिव्य-दृष्टि

मेरे इस जीवन की एक अलग यात्रा में ”दिव्य“ शब्द का जो दर्शन हुआ वह इस प्रकार है। ”दिव्य“ शब्द का प्रयोग वेदों के समय से ही हो रहा है और वह दूसरे शब्दों के साथ मिलकर ”दिव्य दृष्टि“, ”दिव्य रूप“, ”दिव्य दिन“, ”दिव्य वर्ष“, ”दिव्य युग“ इत्यादि के रूप में हमारे सामने है। अनेक विद्वान व तत्वद्रष्टाओं ने इस दिव्य शब्द का अनेक-अनेक प्रकार से अर्थ बतायें हैं। यहाँ दिव्य शब्द के प्रयोग व उसके अर्थ को नीचे दिया जा रहा है जिससे हम सभी को उसके अर्थ के प्रति समझ बन सकें।

01. ”महाभारत“ का युद्ध और ”गीता“ ज्ञान का प्रारम्भ जिस दृश्य से होता है, वह है-”संजय“ और ”धृतराष्ट्र“ के बीच वार्तालाप। जिसमें महर्षि व्यास द्वारा युद्ध को देखने व धृतराष्ट्र को उसका जैसा हो रहा है वैसा ही हाल सुनाने के लिए संजय को एक दृष्टि दी जाती है जिसे हम सभी ”दिव्य दृष्टि“ के नाम से जानते हैं। 

02. ”अखिल विश्व गायत्री परिवार“ के संस्थापक, ”युग निर्माण योजना“ के संचालक व 3000 से भी अधिक पुस्तक-पुतिकाओं के लेखक पं0 श्रीराम शर्मा आचार्य (जन्म-20 सितम्बर, 1911, मृत्यु-2 जून, 1990), जिनके कई लाख समर्थक-सदस्य हैं, के अनुसार ”दिव्य का अर्थ देवता नहीं हो सकता। ऋग्वेद (2,164.46) में कहा गया है-अग्नि रूपी सूर्य को इन्द्र मित्र वरूण कहते हैं। वही दिव्य सुपर गुरूत्मान है। निरूक्त दैवत काण्ड (7,18) में कहा गया है-जो दिवि में प्रकट होता है उसे दिव्य कहते हैं। दिवि, द्य को कहते हैं। नैघण्टुक काण्ड में दिन के 12 नाम लिखे हैं उनमें द्यु शब्द भी दिन का वाचक है। अब दिव्य का अर्थ हुआ कि-जो दिन में प्रकट होता है। और यह प्रत्यक्ष है कि दिन में सूर्य ही प्रकट होता है। अतः दिव्य सूर्य का नाम है। ऋग्वेद (1,16ः3,10) के मन्त्र में कहा गया है कि-आग का घोड़ा (सूर्य) है। इसमें भी सूर्य का ही वर्णन है। वेद में दिव्य नाम सूर्य का है, देवता को दिव्य कदापि नहीं कहते। व्याकरण से भी दिव्य शब्द का अर्थ देवता नहीं बनता। दिव् धातु में स्वार्थेयत प्रत्यय लगाने से दिव्य शब्द बनता है। इसकी व्युत्पत्ति यह हुई-दिव भवं दिव्यन अर्थात जो दिवि में प्रकट होता है। अतः दिव्य केवल सूर्य ही को कहते हैं। दिवि द्यु को कहते हैं और द्यु दिन का नाम है। देवता शब्द दूसरें देवातल आदि सूत्रों से बनता है। इस कारण भी दिव्य और देवता शब्दों का आपस में कोई सम्बन्ध नहीं है। दिव्य शब्द और देवता शब्द बनाने के रूप ही अलग-अलग हैं।“

03. ”ज्ञान व संस्कृति“ और ”बाबा भोलेनाथ“ की नगरी काशी (वाराणसी, उ0प्र0, भारत) के बनारसी संस्कृति में दिव्य शब्द का अन्य शब्द के साथ प्रयोग कर ”दिव्य निपटान“, ”दिव्य स्नान“, ”दिव्य आनन्द“ की परम्परा है। इस परम्परा का वाहक काशी (वाराणसी) का अस्सी मुहल्ला है जिस पर प्रो0 काशी नाथ सिंह द्वारा पुस्तक ”काशी की अस्सी“ भी लिखा गया है और फिल्म भी बना है। काशी ज्ञान की नगरी है। यहाँ के लोगों का जन्म ही ज्ञान में होता है और ज्ञान में ही जीवन जीते है, ज्ञान ही बोलते हैं तथा ज्ञान में ही शरीर त्याग करते हैं। इनकी जीवन शैली और भाषा में सारा शास्त्र समाहित होता है। इसके उदाहरण को केवल ”दिव्य निपटान“ के अर्थ से ही जाना जा सकता है। सुबह हो या शाम, सामने गंगा बह रही हो, उपर खुला आकाश हो, भांग को गोला पेट में जा चुका हो, और जब किनारे पर निपटने (नित्य क्रिया) करने बैठते हैं तो बनारसी उसे ”दिव्य निपटान“ कहते हैं अर्थात उस प्रकार से क्रिया जिसमें कुछ भी बनावटी न हो अर्थात प्राकृतिक हो उसे ”दिव्य“ कहते हैं। इस प्रकार आधुनिक सुविधाओं से युक्त शौचालय में नित्य क्रिया करना बनारसी ज्ञान में किसी भी स्थिति में ”दिव्य निपटान“ नहीं हो सकती। इसी प्रकार कपड़े पहनकर नहाना ”दिव्य स्नान“ नहीं और आधुनिक सुख-सुविधाओं से आनन्द में होना ”दिव्य आनन्द“ नहीं।
सन् 1893 से सन् 1993 के 100 वर्षो के समय में विश्व के बौद्धिक शक्ति को जिन्होंने सबसे अधिक हलचल दी वे हैं-धर्म की ओर से स्वामी विवेकानन्द और धार्मिकता की ओर से आचार्य रजनीश”ओशो“। दृष्टि के सम्बन्ध में इनके निम्न विचार हैं। स्वामी विवेकानन्द के अनुसार-”अनात्मज्ञ पुरूषों की बुद्धि एकदेश-दर्शिनी होती है। आत्मज्ञ पुरूषों की बुद्धि सर्वग्रासिनी होती है। आत्मप्रकाश होने से, देखोगे कि दर्शन, विज्ञान सब तुम्हारे अधीन हो जायेगे।“ (राम कृष्ण मिशन, विवेकानन्दजी के संग में, पृष्ठ-118) आचार्य रजनीश ”ओशो“ के अनुसार-”श्रीराम कितने ही बड़े हों, लेकिन इस मुल्क के चित्त में वे पूर्ण अवतार की तरह नहीं हैं, अंश हैं उनका अवतार। उपनिषद् के ऋषि कितने ही बड़े ज्ञानी हों, लेकिन अवतार नहीं हैं। श्रीकृष्ण पूर्ण अवतार हैं। परमात्मा अगर पृथ्वी पर पूरा उतरे तो करीब-करीब श्रीकृष्ण जैसा होगा। इसलिए श्रीकृष्ण इस मुल्क के अधिकतम मन को छु पाये हैं; बहुत कारणों से। एक तो पूर्ण अवतार का अर्थ होता है, मल्टी-डाइमेंन्सनल; जो मनुष्य के समस्त व्यक्तित्व को स्पर्श करता हो। श्रीराम वन-डाइमेंन्सनल है। अब तक श्रीकृष्ण को पूरा प्रेम करने वाला आदमी नहीं हुआ। क्योंकि पूरे श्रीकृष्ण को प्रेम करना तभी सम्भव है, जब वह आदमी भी मल्टी-डाइमेंन्सनल हो। हम आम तौर पर एक आयामी होते हैं। एक हमारा ट्रैक होता है व्यक्तित्व का, एक रेल की पटरी होती है, उस पटरी पर हम चलते है। जो एक गुरू बोल रहा है, वह अनन्त सिद्धों की वाणी है। अभिव्यक्ति में भेद होगा, शब्द अलग होगें, प्रतीक अलग होगें मगर जो एक सिद्ध बोलता है, वह सभी सिद्धो की वाणी है। इनसे अन्यथा नहीं हो सकता है। इसलिए जिसने एक सिद्ध को पा लिया, उसने सारे सिद्धों की परम्परा को पा लिया। क्यांेकि उनका सूत्र एक ही है। कुंजी तो एक ही है, जिससे ताला खुलता है अस्तित्व का।“
उपरोक्त विचारों से यह स्पष्ट होता है कि ”दिव्य“ का अर्थ सीधा सा प्राकृतिक रूप अर्थात ”जैसा है ठीक वैसा ही“ है तथा ”दिव्य दृष्टि“ का अर्थ सर्वग्रासिनी या बहुआयामी (मल्टी-डाइमेंन्सनल) दृष्टि होता है। इस प्रकार ब्रह्मा का ”दिव्य रूप“ चार सिर वाला, विष्णु का ”दिव्य रूप“ चार हाथ वाला और शिव-शंकर का ”दिव्य रूप“ पाँच सिर वाला पुराणों में प्रक्षेपित है। किसी भी वस्तु को एक दिशा से देखकर उसके वास्तविक रूप लम्बाई, चैड़ाई, ऊँचाई इत्यादि के साथ नहीं देख सकते। हम सभी अपनी आँखों से ही आँखों या पूरे शरीर को नहीं देख सकते। उसके लिए हमें दर्पण की आवश्यकता पड़ती है अर्थात स्वयं से बाहर आकर ही पूरे को देखना सम्भव हो पाता है। इसी प्रकार पृथ्वी को देखने के लिए हमें पृथ्वी से बाहर जाना पड़ता है और सारी पृथ्वी के विकास के चिन्तन के लिए मन को पृथ्वी से बाहर ले जाना पड़ता है। ”विश्वशास्त्र“ ऐसे ही मन की स्थिति का परिणाम है। वर्तमान और भविष्य के समय के लिए सबसे सत्य दृष्टि तो यही है-

एक गुण से देखना दृष्टि है, 
अनेक गुणों से एक साथ देखना दिव्य दृष्टि है, 
सिर्फ विद्वता को देखना दृष्टि दोष है 

और 

जो मन कर्म में न बदले, वह मन नहीं 
और व्यक्ति का अपना स्वरूप नहीं। 


Sunday, March 29, 2020

मेरा प्रकाट्य

मेरा प्रकाट्य


”मैं इस लव कुश सिंह नामक भौतिक शरीर को प्रणाम करता हूँ जिसके माध्यम से और उसका प्रयोग कर मैंने स्व को व्यक्त करने के लिए एवं मानव कल्याण हेतु इस शास्त्र को आपके समक्ष प्रस्तुत किया। साथ ही इस शरीर के माध्यम से नकारात्मक व सकारात्मक चरित्रों को व्यक्त कर विश्व के दर्पण के रूप में इसे प्रस्तुत किया। जिससे मानव यह जान सके कि मैं इन सब से मुक्त था। मैं प्रारम्भ से अन्त तक केवल उस शरीर पर ही ध्यान करता रहा हूँ जिससे यथार्थ धर्म की स्थापना करता हूँ शेष सभी तो साधन मात्र हैं। ध्यान के लिए यही मेरी सत्य विधि रही है। मंत्र, मूर्ति, प्रतीक, शब्द इत्यादि तो केवल उपविधियाँ हैं जिससे भटकाव भी सम्भव है।“
  -विश्वात्मा/विश्वमन

”जितने दिनों से जगत है उतने दिनों से मन का अभाव-उस एक विश्वमन का अभाव कभी नहीं हुआ। प्रत्येक मानव, प्रत्येक प्राणी उस विश्वमन से ही निर्मित हो रहा है क्योंकि वह सदा ही वर्तमान है। और उन सब के निर्माण के लिए आदान-प्रदान कर रहा है।“ 
(धर्म विज्ञान, राम कृष्ण मिशन, पृष्ठ-27)
-स्वामी विवेकानन्द



एकात्म ध्यान (अदृश्य) एवं एकात्म समर्पण (दृश्य)

एकात्म ध्यान (अदृश्य) एवं एकात्म समर्पण (दृश्य)


”मैं उन सभी ईश्वर के अवतारों और शास्त्रों, धर्माचार्यों, सिद्धों, संतों, महापुरूषों, भविष्यवक्ताओं, तपस्वीयों, विद्वानों, बुद्धिजिवीयों, व्यापारीयों, दृश्य व अदृश्य विज्ञान के वैज्ञानिकों, सहयोगीयों, विरोधीयों, रक्त-रिश्ता-देश सम्बन्धियों, उन सभी मानवों, समाज व राज्य के नेतृत्वकर्ताओं और विश्व के सबसे बड़े लोकतन्त्र के संविधान को प्रणाम करता हूँ जिन्होंने मुझे व्यक्त होने के लिए, मेरे व्यक्त होने के पहले, वर्तमान में और भविष्य के लिए, इस मनुष्य समाज में मानव मन और साधन का निर्माण कर मुझे व्यक्त होने के लिए व्यापक आधार बना, मुझे व्यक्त होने पर विवश कर दिये। अगर ये न होते तो निश्चित रूप से मैं न होता और मुझ जैसा निश्चित रूप से कोई व्यक्त हो भी नहीं सकता।“
-लव कुश सिंह ”विश्वमानव“

”शास्त्र शब्द से अनादि अनन्त ”वेद“ का ही बोध होता है। धर्म शासन में वेद ही एकमात्र समर्थ है। पुराणादि अन्य धर्म ग्रन्थों को ”स्मृति“ संज्ञा देते हैं और जहाँ तक वे श्रुति के अनुगामी हैं, वहीं तक उनका प्रमाण्य है, आगे नहीं। सत्य के दो अंग है। पहला जो साधारण मानवों को पांचेन्द्रियग्राह्य एवम् उसमें उपस्थापित अनुमान द्वारा गृहीत है और दूसरा-जिसका इन्द्रियातीत सूक्ष्म योगज शक्ति के द्वारा ग्रहण होता है। प्रथम उपाय के द्वारा संकलित ज्ञान को ”विज्ञान“ कहते है, तथा द्वितीय प्रकार के संकलित ज्ञान को ”वेद“ संज्ञा दी है। वेद नामक अनादि अनन्त अलौकिक ज्ञानराशि सदा विद्यमान है। स्वंय सृष्टिकत्र्ता उसकी सहायता से इस जगत के सृष्टि-स्थिति-प्रलय कार्य सम्पन्न कर रहे हैं। जिन पुरूषों में उस इन्द्रियातीत शक्ति का आविर्भाव है, उन्हें ऋषि कहते है और उस शक्ति के द्वारा जिस अलौकिक सत्य की खोज उन्होंने उपलब्धि की है, उसे ”वेद“ कहते हैं। इस ऋषित्व तथा वेद दृष्टत्व को प्राप्त करना ही यथार्थ धर्मानुभूति है। साधक के जीवन में जब तक उसका उन्मेंष नहीं होता तब तक ”धर्म“ केवल कहने भर की बात है एवम् समझना चाहिए कि उसने धर्मराज्य के प्रथम सोपान पर भी पैर नहीं रखा है। समस्त देश-काल-पात्र को व्याप्त कर वेद का शासन है अर्थात वेद का प्रभाव किसी देश, काल या पात्र विशेष द्वारा सीमित नहीं हैं। सार्वजनिन धर्म का व्याख्याता एक मात्र ”वेद“ ही है।“(भगवान श्रीरामश्रीकृष्ण तथा संघ, श्रीरामश्रीकृष्ण मिशन, पृष्ठ-2) -स्वामी विवेकानन्द

”वेद“ का अर्थ है-ईश्वरीय ज्ञान की राशि। विद् धातु का अर्थ है-जानना। वेदान्त नामक ज्ञानराशि ऋषि नाम धारी पुरूषों के द्वारा आविष्कृत हुई है। ऋषि शब्द का अर्थ है-मन्त्रद्रष्टा। पहले ही से वर्तमान ज्ञान को उन्होंने प्रत्यक्ष किया है। वह ज्ञान तथा भाव उनके अपने विचारों का फल नहीं था। जब कभी आप सुनें कि वेदों के अमुक अंश के ऋषि अमुक है, तब यह मत सोचिए कि उन्होंने उसे लिखा या अपनी बुद्धि द्वारा बनाया है, बल्कि पहले ही से वर्तमान भाव राशि के वे द्रष्टा मात्र है-वे भाव अनादि काल से ही इस संसार में विद्यमान थे, ऋषि ने उनका आविष्कार मात्र किया। ऋषिगण आध्यात्मिक आविष्कारक थे।-(हिन्दू धर्म, पृष्ठ-27)
-स्वामी विवेकानन्द



विश्व कल्कि ओलंपियाड (World Kalki Olympiad-WKO)

विश्व कल्कि ओलंपियाड (World Kalki Olympiad-WKO)
सुनिश्चित पुरस्कार रूपये एक करोड़


प्रस्तुत शास्त्र का मुख्य विषय ”मन का विश्वमानक-शून्य (WS-0) श्रंृखला और पूर्ण मानव निर्माण की तकनीकी-WCM-TLM-SHYAM.C है जो सम्पूर्ण विश्व के लिए सकारात्मक विचारों के एकीकरण के द्वारा मानव मस्तिष्क के एकीकरण के लिए आविष्कृत है। जिसे आविष्कारक ने इस चुनौती के साथ प्रस्तुत किया है कि यह विश्व व्यवस्था के लिए अन्तिम है। आविष्कार के मुख्य विषय के अलावा सभी आॅकड़े उस आविष्कार को आधार एवं पुष्टि प्रदान करने के लिए प्रयुक्त किये गये हैं जो वर्तमान समाज में पहले से ही प्रमाण स्वरूप विद्यमान हैं।
”सत्यकाशी ब्रह्माण्डीय एकात्म विज्ञान विश्वविद्यालय (स.ब्र.ए.वि.वि), ट्रस्ट इस आविष्कार को अन्तिम होने की पुष्टि करते हुये और उसके प्रति ध्यानाकर्षण करने हेतु यह घोषणा करता है कि जब तक मानव सृष्टि रहेगी तब तक मानव मस्तिष्क के एकीकरण और विश्व व्यवस्था, शान्ति, एकता, स्थिरता, एकीकरण सहित स्वस्थ लोकतन्त्र इत्यादि के लिए कोई दूसरा इससे अच्छा आविष्कार यदि प्रस्तुत होता है तब ट्रस्ट उस व्यक्ति/संस्था को भारतीय रूपये ;प्छब्द्ध 1 करोड़ का पुरस्कार प्रदान करेगी जो काल के दूसरे और अन्तिम दृश्य काल व युग के चैथे-कलियुग के अन्त और पाँचवें स्वर्णयुग के प्रारम्भ के दिन शनिवार, 22 दिसम्बर, 2012 से लागू होकर अनन्त काल तक चलता रहेगा।
31 दिसम्बर, 2021 तक उपरोक्त पुरस्कार यदि कोई व्यक्ति या संस्था इसे न प्राप्त कर सका तो प्रारम्भ 22 दिसम्बर, 2012 से 1 जनवरी, 2022 तक 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित मूल राशि को मूलधन के रूप में समायोजित कर उस राशि पर प्राप्त प्रत्येक वर्ष के ब्याज की राशि को प्रत्येक वर्ष ऐसे 10 शोध छात्रों को छात्रवृत्ति के रूप में वितरित की जायेगी जो विश्व एकीकरण की दिशा में किसी विषय में शोध के इच्छुक होगें। बावजूद इसके उपरोक्त 1 करोड़ रूपये का पुरस्कार अनन्त काल तक के लिए चलता ही रहेगा।
(चन्द्रेश कुमार)
मुख्य ट्रस्टी एवं अध्यक्ष
सत्यकाशी ब्रह्माण्डीय एकात्म विज्ञान विश्वविद्यालय (स.ब्र.ए.वि.वि)




धर्म गुरूओं को समर्पित

विभिन्न धर्मो 
के 
वर्तमान धर्म गुरूओं 
को 
समर्पित
”विश्वशास्त्र“ साहित्य 
और 
मेरी अन्तिम इच्छा

”मैंनें बिना किसी धर्म के धर्म गुरू के मागदर्शन के ”विश्वशास्त्र“ की रचना स्वप्रेरणा से की है। वर्तमान समाज कहता है कि बिना गुरू के ज्ञान नहीं होता। इस सूत्र से मैं अभी भी अज्ञानी हूँ और मुझे ज्ञान की आवश्यकता अभी भी है। मैंने जीवन पर्यन्त प्रत्येक से कुछ न कुछ ज्ञान प्राप्त किया है इसलिए मेरा कोई एक गुरू नहीं हो सकता। मेरी इच्छा है कि वर्तमान समय में उपलब्ध विभिन्न धर्म के धर्म गुरूओं का मैं शिष्यत्व ग्रहण करूँ। शिष्य अपनी योग्यता प्रस्तुत कर चुका है। मुझे आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि विभिन्न धर्म के धर्म गुरूओं को मुझे शिष्य के रूप में स्वीकार करने पर गर्व का अनुभव होगा। जब समाज को यह विश्वास हो जाये कि मैं ही राष्ट्र-पुत्र स्वामी विवेकानन्द का सार्वजनिक प्रमाणित पुर्नजन्म हँू और उनके विश्व-बन्धुत्व के विचार के विश्वव्यापी स्थापना के लिए शासन प्रणाली के अनुसार प्रारूप प्रस्तुत किया हूँ तब मुझे किसी राष्ट्रीय स्तर के आयोजन में वैसा ही वस्त्र धारण कराया जाय जैसा कि राष्ट्र-पुत्र स्वामी विवेकानन्द ने शिकागो धर्म संसद वकृतता में धारण कर रखा था तथा ब्रह्माण्ड से मेरे असीम प्रेम को सार्वजनिक प्रमाणित सिद्ध किया जाये क्योंकि बिना व्यापक प्रेम के व्यापक कर्म नहीं हो सकता, न ही बिना व्यापक कर्म के व्यापक प्रेम हो सकता है। यह इसलिए है कि प्रेम व कर्म एक दूसरे के अदृश्य व दृश्य रूप है। और मैं कर्म करके ऋृषि, महात्मा या सन्यासी का वस्त्र पाना चाहता हूँ जिससे मैं यह जान सकूँ कि मैं इस योग्य हूँ। बस इतना ही समाज से मेरी अन्तिम इच्छा है।“
-लव कुश सिंह ”विश्वमानव“



मेरे प्रेरक : विश्व-राष्ट्र पुत्र स्वामी विवेकानन्द

मेरे प्रेरक
विश्व-राष्ट्र पुत्र स्वामी विवेकानन्द


 ”भाईयों! हिन्दुओं के धार्मिक विचारों की यहीं संक्षिप्त रूपरेखा है। हो सकता है कि हिन्दू अपनी सभी योजनाओं को कार्यान्वित करने में असफल रहा हो, पर यदि कभी कोई सार्वभौमिक धर्म हो सकता है, तो वह ऐसा ही होगा, जो देश या काल से मर्यादित न हो, जो उस अनन्त भगवान के समान ही अनन्त हो, जिस भगवान के सम्बन्ध में वह उपदेश देता है, जिसकी ज्योति श्रीकृष्ण के भक्तों पर और ईसा के प्रेमियों पर, सन्तों पर और पापियों पर समान रूप से प्रकाशित होती हो, जो न तो ब्राह्मणों का हो, न बौद्धों का, न ईसाइयों का और न मुसलमानों का, वरन् इन सभी धर्मों का समष्टिस्वरूप होते हुये भी जिसमें उन्नति का अनन्त पथ खुला रहे, जो इतना व्यापक हो कि अपनी असंख्य प्रसारित बाहुओं द्वारा सृष्टि के प्रत्येक मनुष्य का प्रेमपूर्वक आलिंगन करें।... वह विश्वधर्म ऐसा होगा कि उसमें किसी के प्रति विद्वेष अथवा अत्याचार के लिए स्थान न रहेगा, वह प्रत्येक स्त्री और पुरूष के ईश्वरीय स्वरूप को स्वीकार करेगा और सम्पूर्ण बल मनुष्यमात्र को अपनी सच्ची, ईश्वरीय प्रकृति का साक्षात्कार करने के लिए सहायता देने में ही केन्द्रित रहेगा।“
(शिकागो वकृतता, 19 सितम्बर, 1893) -स्वामी विवेकानन्द 

  ”जीवन में मेरी सर्वोच्च अभिलाषा यह है कि ऐसा चक्र प्रर्वतन कर दूँ जो कि उच्च एवम् श्रेष्ठ विचारों को सब के द्वार-द्वार पर पहुँचा दे। फिर स्त्री-पुरूष को अपने भाग्य का निर्माण स्वंय करने दो। हमारे पूर्वजों ने तथा अन्य देशों ने जीवन के महत्वपूर्ण प्रश्नों पर क्या विचार किया है यह सर्वसाधारण को जानने दो। विशेषकर उन्हें देखने दो कि और लोग क्या कर रहे हैं। फिर उन्हंे अपना निर्णय करने दो। रासायनिक द्रव्य इकट्ठे कर दो और प्रकृति के नियमानुसार वे किसी विशेष आकार धारण कर लेगें-परिश्रम करो, अटल रहो। ”धर्म को बिना हानि पहुँचाये जनता की उन्नति“-इसे अपना आदर्श वाक्य बना लो।“ (विवेकानन्द राष्ट्र को आह्वान, राम कृष्ण मिशन, पृष्ठ-66) -स्वामी विवेकानन्द 

  ”उसी मूल सत्य की फिर से शिक्षा ग्रहण करनी होगी, जो केवल यहीं से, हमारी इसी मातृभूमि से प्रचारित हुआ था। फिर एक बार भारत को संसार में इसी मूल तत्व का-इसी सत्य का प्रचार करना होगा। ऐसा क्यों है? इसलिए नहीं कि यह सत्य हमारे शास्त्रों में लिखा है वरन् हमारे राष्ट्रीय साहित्य का प्रत्येक विभाग और हमारा राष्ट्रीय जीवन उससे पूर्णतः ओत-प्रोत है। इस धार्मिक सहिष्णुता की तथा इस सहानुभूति की, मातृभाव की महान शिक्षा प्रत्येक बालक, स्त्री, पुरुष, शिक्षित, अशिक्षित सब जाति और वर्ण वाले सीख सकते हैं। तुमको अनेक नामों से पुकारा जाता है, पर तुम एक हो।“  (जितने मत उतने पथ, राम कृष्ण मिशन, पृष्ठ-39) -स्वामी विवेकानन्द 



सार्वभौम सत्य मानक शिक्षा - पूर्ण ज्ञान का पूरक पाठ्यक्रम

सार्वभौम सत्य मानक शिक्षा - पूर्ण ज्ञान का पूरक पाठ्यक्रम