Monday, March 16, 2020

विश्व शान्ति के लिए मन का मानकीकरण केवल शब्द नहीं बल्कि उसके मानक का निर्धारण व प्रकाशन हो चुका है।

विश्व शान्ति के लिए मन का मानकीकरण केवल शब्द नहीं बल्कि उसके मानक का निर्धारण व प्रकाशन हो चुका है।
(सन् 2000-2001 ई0 के बीच श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा सर्वजीत साधना भवन, रेनुकूट, सोनभद्र (उ0प्र) भारत, पिन-231217 में दिया गया वक्तव्य)

हिन्दू धर्म के धर्म शास्त्रों में पुराण नामक धर्म शास्त्र विभिन्न स्तरीय मानक चरित्रों के कथाओं का प्रक्षेपण है जिससे ब्रह्मा परिवार व्यक्ति एवं व्यक्ति परिवार का मानक चरित्र, विष्णु परिवार सामाजिक व्यक्ति एवं सामाजिक परिवार का मानक चरित्र तथा शिव-शंकर परिवार वैश्विक-ब्रह्माण्डीय व्यक्ति एवं वैश्विक-ब्रह्माण्डीय परिवार का मानक चरित्र के रुप में प्रक्षेपित है। प्रक्षेपण का अर्थ है- उस मानक चरित्र में गुणों के संगम के साथ प्रस्तुत करना। स्वयं हिन्दू भी वर्तमान समय में इससे भ्रमित हो चुके हैं। वे समझते हैं कि ब्रह्मा, विष्णु व शिवशंकर नाम से शरीर धारी मनुष्य रुप में कभी थे या हैं। उन्हें यह समझना चाहिए कि मनुष्य को मानवीय व्यवहारों द्वारा आदर्श एवं मानक चरित्र की ओर ले जाने के लिए पुराणों का सृजन किया गया था परन्तु कालान्तर से यह वर्तमान समय में उस दृष्टि से मनुष्य हट गया। धर्म शास्त्र हमेशा से एकात्मता व मनुष्य को आदर्श मानव के रुप में निर्माण के लिए सृजित किये जाते रहे हैं। जब-जब मनुष्य जिस रुप में समझने में सक्षम होता है उस रुप में उसका सृजन किया जाता रहा है। नये शास्त्र साहित्यों का सृजन हिन्दू धर्म में लगातार होता चला आ रहा है। 
हिन्दू धर्म तो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को ही देवता के रुप में देखता है। जिसके परिणामस्वरुप ही तैंतीस करोड़ देवी देवताओं की चर्चा धर्म शास्त्रों में मिलती है जिसका आधार मात्र यह है कि मनुष्य इसी प्रकृति द्वारा सृजित है फलस्वरुप ब्रह्माण्ड के जिन-जिन वस्तुओं से वह प्रभावित होता है, उसकी दृष्टि में वे सभी देवी-देवता के ही रुप हैं। स्वाभाविक है मनुष्य जिनसे संरक्षण प्राप्त करता है वे पूज्यनीय ही होते हैं बावजूद इन सभी देवी-देवताओं के मूल रुप से देवी- देवताओं का त्रिस्तरीय संरचना ही सर्वोच्च है। ब्रह्मा-मूल स्तरीय, विष्णु- मध्यम स्तरीय तथा शिव-शंकर सर्वोच्च और अन्तिम स्तरीय। शिव-शंकर का स्वरुप विश्व-ब्रह्माण्डीय होने से वे सर्वत्र विद्यमान हैं इसी कारण वे सर्वमान्य और सार्वाधिक पूज्यनीय हैं। वर्तमान समय के विश्व समाज में जिस प्रकार से भूमण्डलीकरण हो रहा है उसमें विश्व शान्ति व विश्व कल्याण के लिए अब केवल शिव तन्त्र ही शेष अन्तिम मार्ग है। क्योंकि मात्र शिव और उनका तन्त्र ही सर्वत्र विद्यमान हैं। ईश्वर या शिव या आत्मा या ब्रह्म और कुछ भी नहीं सिर्फ सिद्धान्तों का समुच्चय अर्थात् सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त ही हैं। विश्वमानक - शून्य श्रृखला और कुछ भी नहीं विश्व कल्याण व शान्ति के लिए सिद्धान्तों का समुच्चय शिव तन्त्र है। जो व्यक्ति स्तर से ब्रह्माण्ड स्तर तक की व्याख्या करने में पूर्ण सक्षम है। व्यक्ति जब तक इस सर्वोच्च स्तर तक नहीं उठता तब तक उसे यह समझना चाहिए कि वह ईश्वर के सम्बन्ध में कुछ भी नहीं जानता है और न ही ईश्वर का लाभ उठा सकता है। क्योंकि ईश्वर को मानने या न मानने से कोई कल्याण होने वाला नहीं जब तक कि ईश्वर को समझा न जाय ईश्वर को समझने का अर्थ होता हैै उन सिद्धान्तों को समझना जिससे व्यक्ति से लेकर ब्रह्माण्ड संचालित हो रहा है। फलस्वरुप मानवीय व्यवहारों को भी समझने की शक्ति आ जाती है जिससे उन रास्तों से जीने की कला का ज्ञान हो जाता है। जिस पर विरोध कम हो। साथ ही समन्वय की विचारधारा सहित वह सभी गुण स्वतः प्रकट होने लगते हैं। जो एक आदर्श मानक मानव के लिए आवश्यक होते हैं। ईश्वर मनुष्य की गुणवत्ता मापने का एक पैमाना है।  कोई भी व्यक्ति अपने गुणों को धारण कर ब्रह्मा, विष्णु या शिव-शंकर रुप में व्यक्त हो सकता है परन्तु सर्वोच्चता के शिखर पर एक-एक ही हो सकता है।
महाशिवरात्रि की रात शिव और शक्ति के मिलन की रात हैै। पुराणों में शिव को धारण करने वाले शंकर तथा शक्ति को धारण करने वाली पार्वती है। इसलिए इस रात को ही शंकर-पार्वती के विवाह द्वारा मिलन के रुप में प्रक्षेपित किया गया है। शक्ति के बिना शिव का आभास नहीं होता उसी प्रकार शिव के बिना शक्ति की उपयोगिता नहीं समझ में आती। शिव, शक्ति बिना अधूरे हैं तो शक्ति, शिव बिना अधूरी हैं। दोनों का मिलन ही एक दूसरे के अस्तित्व का प्रमाण है। यह शक्ति ही माया, प्रकृति, नारी तथा शिव ही मायापति, पुरुष, नर के रुप में जाने जाते हैं। जब व्यक्ति प्रकृति के संरक्षण में जीता है तब वह संतान रुप में होता है, जब व्यक्ति प्रकृति से प्रेम करता है तब वह प्रेमी के रुप में होता है तथा जब व्यक्ति प्रकृति पर विजय प्राप्त करता है तब वह पति के रुप में होता है, इसी को मायापति कहते हैं। मुझे प्रकृति ने ही उत्पन्न किया, संरक्षण दिया जिससे कि मैं उससे प्रेम कर सकूँ और विजय प्राप्त कर सकूँ। मेरा प्रकृति के प्रति प्रेम, समर्पण, श्रद्धा, विश्वास यदि न होता तो विजय का परिणाम सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त मुझसे व्यक्त न होता। मन के विश्वमानक का प्रस्तुतीकरण सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के प्रति मेरे असीम प्रेम का ही परिणाम है जिसके लिए मैं प्रकृति द्वारा उत्पन्न और संरक्षित किया गया था। धरती पर मेरे शरीर धारण का उद्देश्य यहीं था जो पूर्ण हुआ। विश्व कल्याण के समस्त प्रकाशित मार्गों से युक्त शरीर में स्थित मैं एक सार्वभौम आत्मा हूँ। जो अपना कार्य सम्पन्न कर मुक्त हो जायेगा। 
सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त एक समन्वयीकृत सिद्धान्त है जिसका विस्तार सभी विषयों में प्रवेश उसी भाँति करता है जिस प्रकार शिव को सर्वव्यापी कहा जाता है परिणामस्वरुप धारणकर्ता व्यक्ति किसी भी विषय के साथ जुड़ने पर उसके मूल तक आसानी से पहुँचकर शीघ्रता से कुशलता प्राप्त कर लेता है। ऐसी स्थिति में ऐसे व्यक्ति का सम्बन्ध अनेकों विषयों से होता है तथा समाज में उसके अनेकों रुप व्यक्त होते है और सम्बन्ध रखने वाले अलग-अलग व्यक्ति अलग-अलग रुप में उसे देखते हैं परिणामस्वरुप व्यक्तियों के समक्ष भ्रम की स्थिति उत्पन्न होने लगती है जबकि धारणकर्ता व्यक्ति अभिनेता की भाँति विषयों से जुड़कर सफलतापूर्वक अभिनय करता चला जाता है।
सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त आधारित शास्त्र-साहित्य विश्वमानक - शून्य श्रंृखला वहीं शास्त्र है जिससे विश्व समाज मार्ग दर्शन प्राप्त कर स्वयं का कल्याण सहित विश्व की एकता के साथ उसका नियन्त्रण करेगा। समाज में अराजकता, अव्यवस्था और विकेन्द्रीकृत मानव शक्ति का एक ही उपाय है- मन का विश्वमानक तथा पूर्ण मानव निर्माण। यदि विश्व समाज ऐसा नहीं कर सकता है तो मनुष्यता की सारी शक्ति अराजकता और अव्यवस्था के लिए ही खर्च होती चली जायेगी इसलिए आवश्यक है कि संयुक्त राष्ट्र संघ और सदस्य देशों के द्वारा पूर्ण मानव निर्माण की तकनीकी द्वारा पूर्ण मानव निर्माण करना चाहिए क्योंकि ऐसी प्रक्रिया एक लम्बी अवधि की प्रक्रिया होती है जबकि समय व्यतीत होने के साथ-साथ सार्वभौम प्राकृतिक बल द्वारा व्यक्ति और समाज की यहीं अन्तिम परिणति है अर्थात् मन के विश्वमानक स्तर पर प्रत्येक व्यक्ति व समाज का आना सुनिश्चित है जो उसके पूर्णता का प्रमाण है।
लोकतन्त्र का धर्म-विश्वधर्म है अर्थात् वर्तमान अर्थों में सभी धर्मों का समन्वयरुपी धर्म जिसमें सभी धर्मों के आध्यात्मिक सिद्धान्तों का समन्वय हो। जो मनुष्य के ज्ञान व कर्मज्ञान मात्र से सीधे जुड़ता हो न कि जीवन शैली से। निश्चित रुप से यह आवश्यकता है कि विश्व में एक धर्म हो, एक प्रबन्ध हो, एक शिक्षा हो तथा एक कर्मज्ञान हो जो अब मनुष्य की इच्छा नहीं बल्कि सावभौम प्राकृतिक बल द्वारा यह आवश्यकता उत्पन्न हो जायेगी। अन्यथा मनुष्यता ही खतरे में पड़ जायेगी। इसलिए इसके लिए विश्व के नीति निर्धारक स्वयं ही विवश हो जायंेगे।
भारत विश्व व्यापक होने की ओर नहीं बल्कि अपने सीमा में संकुचित होने की ओर बढ़ चुका है कारण सिर्फ वोट की राजनीति तथा ध्येय से दूर हटकर श्रेय की ओर नेतृत्वकर्ताओं का बढ़ जाना है। ऐसा कोई प्रयत्न या वक्तव्य नहीं दिखाई पड़ता जिससे विश्व शान्ति व कल्याण के लिए कोई प्रक्रिया प्रारम्भ होने की झलक दिखाई पड़े।
मैं एक योजनाबद्ध व परिणाम को जानते हुए इस कार्य को सम्पन्न किया। अब मेरा अगला लक्ष्य भौतिक विज्ञान की ओर से ब्रह्माण्ड की व्याख्या व सम्पूर्ण समन्वयीकृत सिद्धान्त को खोजने के लिए प्रयत्नशील ब्रिटिश ब्रह्माण्ड वैज्ञानिक प्रो0 स्टीफेन हाकिंग की सहायता दर्शन क्षेत्र के सहयोग द्वारा करना है जिससे वे अपने कार्य को इसी जीवन में सम्पन्न कर सकें। सम्पूर्ण एकीकृत सिद्धान्त व सार्वभौम सिद्धान्त इत्यादि के पूर्ण विवादमुक्त स्वरुप के व्यक्त हो जाने से धर्म और ईश्वर सम्बन्धी धारणा का यथार्थ रुप विश्व के समक्ष स्पष्ट हो जायेगा जिससे विश्व को एक नई दिशा मिलेगी और शायद विश्व के उज्ज्वल भविष्य के लिए वह नई सुबह भी होगी।


सत्य-मार्गदर्शन

सत्य-मार्गदर्शन

1. अरे युवाओं तुम्हें किस तरह, कैसे और कितना जोर देकर समझाऊॅ कि तुम जिस ज्ञान और कर्मज्ञान की प्राप्ति के लिए बृद्धावस्था को अधिकृत करते हों या समझते हों कि इससे क्या मिलेगा? ये सब आध्यात्मिक विषय है, परन्तु मुर्खों उससे ही तो मै ”लव कुश सिंह“ से प्रथम एवं अन्तिम सार्वजनिक प्रमाणित भोगेश्वर विश्वात्मा समन्वयाचार्य ”विश्वमानव“ बना। उसी ज्ञान से तो ”श्रीकृष्ण“ प्रथम एवं अन्तिम व्यक्तिगत प्रमाणित योगेश्वर विश्वात्मा बने और ”नरेंन्द्र नाथ दत्त“, ”स्वामी विवेकानन्द“ बने। तुम अगर इतनी उंचाई और मूल तक नहीं जा सकते तो कम से कम अपने लम्बे जीवन को तो नियंत्रित, सुव्यवस्थित और योजनाबद्ध कर संचालित कर सकते हो। क्या मैं, श्रीकृष्ण और नरेन्द्र नाथ बृद्ध थे। अरे हमने उस उम्र में स्वपे्ररित होकर ज्ञान ग्रहण और मनन किया जिस उम्र में तुम उम्र के प्रभावों में सोते-जागते रंगीन सपने देखते रहते हों। फिर भी तुम नहीं समझ सकते तो तुम पर मुझे दया आती है और जोर देकर कहने के लिए ही मैं तुम्हंे मूर्ख और अज्ञानी कह रहा हूॅ। अन्यथा तुम्हारा शरीर है, तुम्हारा मन है चाहे जैसे भी संचालन करो। 

2. अरे मेरे युवा जन तुम कितने अज्ञानी और मूर्ख हो कि तुम एक रुपया और एक क्षण समय भी उस ज्ञान के लिए नहीं दे सकते जिससे तुम्हारे अपने जीवन संचालन के लिए अनन्त मार्ग खुल जाते हैं परन्तु सैकड़ो पृष्ठ के अश्लील साहित्य, हजारो पृष्ठों के शैैक्षणिक साहित्य, मनोरंजन और क्षणिक आनन्द देने वाले विषयों के पीछे तुम हजारो रुपयों सहित वर्षाें समय बीता देते हो। क्या तुम्हारे पास दो-चार सौ पृष्ठों के ज्ञान साहित्य पढ़ने का भी समय नहीं? मैं यह नहीं कहता कि तुम उन्हंे त्याग दो परन्तु तुम ज्ञान के विषयों को स्वतः ग्रहण करते रहो जो वर्तमान शैैक्षणिक पाठ्यक्रम में नहीं है। इससे तुम्हारे उस आनन्द को स्थिरता और जीवन प्राप्त होगा। यदि ऐसा नहीं करते तो तुम भाग्य को जिम्मेदार नहीं ठहरा सकते तब तुम्हें स्वयं को ही कहना होगा। कि हाय मैं कितना मूर्ख था। और सच मानों मैं तुम्हें युवा पशु शक्ति के सिवा कुछ नहीं कहूंगा।

3. ऐ मानवों तुम एक कार्य सत्य और सर्वोत्तम करते रहे हो वह यह कि जब तुम गलती कर उसके परिणामों का दुःख भोगते हो तब तुम ईश्वर को उसका जिम्मेदार ठहराते हो। क्योंकि वह ईश्वर कोई और नहीं तुम स्वयं हो। इसलिए तुम स्वयं ही गलती करते हो और तुम स्वयं ही जिम्मेदार हो। यही श्रीकृष्ण ने कहा, यही शंकराचार्य, श्री रामकृष्ण, स्वामी विवेकानन्द और पुनः मैं भी तुमसे यही कह रहा हूंॅ। तुम जिस दिन यह समझ जाओगे कि तुम स्वयं ही कर्ता हो, तुम्हारे कल्याण का शुभारम्भ हो जायेगा। और यदि यह गलत है। तो तुम्हें इन सब से महान व्यापक बनकर प्रमाण प्र्रस्तुत करने पडेगें क्योंकि ये सब प्रमाणिकता को प्राप्त है। अब तुम्हारे सामने दो रास्ते हैं या तो इस कथन को स्वीकार करो या इनसे महान बनो। दोनांे रास्तों में तुम्हारा ही कल्याण हैं।

4. हे मध्यम वर्गीय पथ प्रदर्शनाभिलाषी युवकों तुम अपने श्रद्धेय जनों से मार्गदर्शन चाहते हो। अवश्य चाहो मगर यह ध्यान रखना कि समय चक्र की वर्तमान स्थिति यह है कि सामान्यतः दो तरह के श्रद्धेय जन मिलेंगे। एक जो सदा ही संघर्षशील बनने और लगातार असफलता के बावजुद भी कन्धे से कन्धा मिलाकर तुम्हें सफलता के लिए प्रेरित करते रहेंगे क्यांेकि वे जानते हैं कि तुम ही उनके भविष्य हो और सदा श्रद्धा बनाये रखने का यही रास्ता भी है। दूसरे जो सदा ही तुम्हें निराश और हतोत्साहित ही करते रहेगंे क्यांेकि यदि वे अपने जीवन में सफलता प्राप्त किये हैं तो यह सोचते हैं कि अब कोई मेरे जैसा सफलता प्राप्त नहीं कर सकता और यदि वे अपने जीवन में असफलता को प्राप्त हुये है तो वे फिर किसी से भी सफलता की उम्मीद न करेंगे। इस प्रकार के श्रद्धेय श्रेष्ठ जन त्याग या भोग उपरान्त त्याग के पात्र है श्रद्धा के पात्र नहीं। वे युवा बड़े ही भाग्यशाली हैं जिन्हंे पहले प्रकार के श्रद्धेय श्रेष्ठ जनों का मार्गदर्शन प्राप्त है।

5. ऐ भारत के दलित, पीड़ित, शोषित आम जनता तुम सरकार को दोषी ठहराते हो। तुम तो यह भी नहीं जानते कि कौन सा रास्ता तुम्हारे कल्याण का अन्तिम रास्ता है इसलिए तुम हर बार अपने नेताओं के बातों में आ जातें हो और ठगे से रह जाते हो। पहले तुम अपने इस सार्वभौम ज्ञान-कर्मज्ञान, द्वारा कल्याण के आखिरी रास्ते को पहचानों फिर तुम्हंे कोई नहीं ठग सकता। यहाॅ तक कि तुम स्वयं को भी नहीं ठग सकतें।

6. हे माता-पिता, गुरू आचार्य, भगवान और अभिभावक पद स्वरूप भारत के नेतृत्वकत्र्ताआंे तुम अपने सन्तान पद स्वरूप आम जनता को दोषी ठहराते हो, तुम अपनी और राष्ट्रीय नीति को सन्तानों की इच्छा के अनुसार तय करना चाहते हो। हमारी जनता और युवा शक्ति तो बहुमुखी दिशाओं में बहुत कुछ चाहती है। क्या तुम उन्हें वो सब दे दोगे। तुम अपने पद को भूल जाते हो। तुम्हंे अपने बच्चों को वह सब देना होगा जो उनके विकास के लिए अतिआवश्यक है और वह सब नहीं ही देना होगा जो उन्हेेें विनाशकारी रास्ते पर ले जाते है। यह मत भूलो कि वे तुम्हारे भविष्य स्वरूप हैं। क्या तुम अपने भविष्य को ही कुचल देना चाहते हो? क्या तुम अपनी श्रद्धा स्वयं ही खोना चाहते हो? मत भूलों कि उनसे तुम हो, तुमसे वो नहीं।

7. हे युवाओं तुम्हारी ओर से श्रद्धेय श्रेष्ठ जनों को यही सन्देश है कि - हे श्रद्धेय श्रेष्ठजन आप वास्तव में श्रद्धा के पात्र हैं क्योंकि मैंने अपने पूर्वजन्म के उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु आपसे यह भौतिक शरीर प्राप्त किया जैसा कि आपने भी किया है। परन्तु आप मेरे उद्देश्यों की पूर्ति के कर्तव्य पथ पर खड़े होकर अपनी ही श्रद्धा को स्वयं खोने का प्रयत्न न करें। यदि आप शारीरिक और आर्थिक रूप से सक्षम होते हुये भी सहयोग न करना चाहते हो तो न करें परन्तु मानसिक सहयोग में आपका न तो शारीरिक और न ही आर्थिक क्षति होती है फिर क्यों सर्वोच्च और अन्तिम शक्तिशाली अस्त्र मन व वाणी से मुझे मृत्यु की ओर ले जा रहे हंै। क्या आप नहींे जानते इससे तो आपकी श्रद्धा ही मृत्यु को प्राप्त हो रही है।

8. हे, मध्यमवर्गीय श्रद्धेय श्रेष्ठजन वर्तमान समय में आप में से अधिक का युद्धक्षेत्र कुरूक्षेत्र संकुचित होकर आपका अपना परिवार ही बन चुका है। आपका उस पर अधिपत्य है ही, फिर भी आप अपने आश्रितों से शारीरिक, मानसिक और आर्थिक युद्ध कर, न जाने क्यों, उसे ही जीतने में अपना गर्व समझते है। यह आपका दुश्मन रूप नहीं है, तो और क्या है? क्या आपको पता नहीं कि आपकी हार और जीत दोनों दिशाओं से स्वयं आपके परिवार, आश्रितों और स्वयं आपकी श्रद्धा का ही पतन होता है। यदि इस जीवन में शरीर धारण करने का आपका उद्देश्य यही है तो चिन्ता न करें आपके परिवार और अन्य आश्रितों की रक्षा करते हुये आपके इस उद्देश्य की पूर्ति यथायोग्य फल देकर आपके आश्रित अवश्य पूर्ति कर देगंे। जब आप स्वयं अपने भविष्य की रक्षा नहीं कर सकते तो किसी और के भविष्य को कैसे देख सकते है। प्रत्येक ही अपने भविष्य का दृष्टा और निर्माता है। वह अपने रास्ते में पड़ने वाले पत्थर को हटायेगा ही।

9. हे श्रेष्ठ श्रद्धेयजन आप अपने अश्रितों को स्वयं अपनी श्रद्धा की उन्नति के लिए इस प्रकार प्रेरित कर सहयोग करें-यदि आपके आश्रित शारीरिक उन्नति कर चुके हंै। तब उन्हें मानसिक और आर्थिक उन्नति की ओर, यदि मानसिक और आर्थिक उन्नति कर चुके हो तो आध्यात्मिक उन्नति की ओर, यदि आध्यात्मिक उन्नति कर चुके हो तो ऐतिहासिक आध्यत्मिक उन्नति अर्थात धर्म की ओर शारीरिक, आर्थिक, मानसिक सहयोग कर प्रेरित करें। यदि ऐतिहासिक आध्यात्मिक उन्नति की ओर हो तो उनका सहयोग प्राण रहने तक समर्पित रूप से करें। यदि आपके आश्रित इसके विपरीत हो तो उनके अधिकारों को प्रदान कर यथाशीघ्र सम्बन्ध विच्छेद कर ले अन्यथा वह पारिवारिक मूल्य की अवनति का कारण बन जायेगा।

10. हे पारिवारिक सम्बन्धों के बीच रहने वालों मानवों तुम सदा एक ही विचार में एक निष्ठ रहो कि तुम किस प्रकार उपलब्ध संसाधनों का प्रयोग कर पारिवारिक उन्नति में सहयोग कर सकतें हो। यह मूल्यांकन करना और सोचना कि अन्य ने क्या किया, अवनति का मार्ग है। तुम यह नहीं जानते कि जो दूसरो का मूल्यंाकन प्राथमिकता के साथ करते हैं, उनके पास अपने मूल्यांकन का समय ही नहीं बच पाता परिणामस्वरूप उन्नति का कारण न बन आलोचना करने वाले बन जाते है। जो अपना मूल्यांकन प्राथमिकता के साथ करते है। वे दूसरे का मूल्यांकन आवश्यकता पड़ने पर करते है परिणामस्वरूप उन्नति का कारण बनते हंै। इस मूल्यांकन में सदा याद रखना शारीरिक, मानसिक और आर्थिक, आध्यात्मिक, ऐतिहासिक आध्यात्मिक आर्थात धर्म के सहयोग का मूल्यांकन क्रमशः मूल और निम्न, मध्यम, सर्वोच्च, अन्तिम चक्र क्रम में होता है। जहाॅ ऐतिहासिक आध्यात्मिक सहयोग हो वहाॅ किसी भी अनुपात में अन्य सहयोग से अधिक अन्तिम और अमूल्य होता है, जिसमें पूर्ण समर्पण, समर्थन और सहयोग करना चाहिए क्योंकि वह सभी मूल्यों को एक साथ उन्नति की ओर ले जाता है। क्यांेकि यह सबसे बाहरी चक्र होकर सभी आन्तरिक चक्रों पर प्रभाव डालता है।

11. हे मेरे युवा जब तुम्हारे कर्तव्य पथ पर तुम्हारे श्रद्धेय श्रेष्ठ जन ही बाधक बन खडे़ हो जायें तो तुम्हें दो रास्तों मेे से किसी एक को चुनना होगा प्रथम-श्री राम की भाॅति आदर्श चरित्र को प्रस्तुत करते हुये प्रत्येक पारिवारिक असफलता का कलंक ढोते हुये अपनी मानसिक मृत्यु के साथ श्रद्धेय श्रेष्ठ जनों के समक्ष पूर्ण समर्पण। दूसरा-श्री कृष्ण की भाॅति श्रद्धापूर्वक उनके प्रभाव क्षेत्र से दूर रहना या विश्वमानव की भाॅति सत्य दृढ़ होकर प्रत्यक्ष युद्ध। इस प्रकार चलने से पूर्व यह ध्यान देना कि तुम्हारी जीत के साथ सैकड़ो युवाओं को बल प्राप्त होगा और हार के साथ हजारो युवाओं का बल टूटेगा क्योंकि तुम उन श्रद्धेय श्रेष्ठ जनों द्वारा उदाहरण स्वरूप प्रचारित किये जाओगे। जीत के लिए तुम्हें इन श्रद्धेय जनों से प्रारम्भ में जो स्वेच्छा से संसाधन प्राप्त हो, प्राप्त करते रहो पुनः साम, दाम, दण्ड, भेद की रीति से प्राप्त करते कार्य करते रहो। यदि बीच में ही तुम्हें स्वयं के द्वारा संसाधन मिलने लगे या तुम्हारा कार्य पूर्णता को प्राप्त हो जाये तो इनका पूर्ण रूप से त्याग कर दो। आवश्यकता पड़े तो यथा योग्य कर्मफल भी दो और कहो ऐसा मैं नहीं सिद्धान्त कर रहा है, न कि मेरा चरित्र है। श्रद्धेय श्रेष्ठ जन इसी योग्य है। ऐसे ही श्रेष्ठ जन भविष्य रूपी युवाओं के सबसे बड़े दुश्मन होते है। जो अंहकार वश युवाओं को मृत्यु तक पहुॅचाने तक भी नहीं रूकते।

12. हे ईश्वर स्वरूप माता-पिता-गुरू श्रद्धेय जन आपकी ओर से युवाओं को यही सन्देश है कि-हे मेरे भविष्य रूपी युवाओं तुम उठो जागों और तब तक कत्र्तव्य पथ पर आगे बढ़ते रहो जब तक अपने लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर लेते। तुमसे कौन जीत सकता है? भला भविष्य से भी कोई जीत सकता है? तुम सत्य-पथ पर चलते हुये उन सभी का वध कर डालों जो गुलाम भारत के अंग्रेजों से भी दुष्ट आत्माओं को लेकर भारतीय मानव शरीर में विराजमान है। क्या होगा? फल आधारित पाश्चात्य कानून में वध की सजा का कोई प्राविधान नहीं है। सिर्फ हत्या का है, उसकी भी प्रमाणिकता-गवाहों पर, मुक्ति-जमानत से तथा फैसला-भ्रष्ट हाथों में है। तुम्हारी इच्छा थी कि देश के लिए सीमा पर स्वयं को बलि चढ़ाना, उसका अवसर तो कभी-कभी आता है लेकिन तुम्हारे लिए तो सम्पूर्ण भारत देश में चल रहे दुष्ट आत्माओं और सत्य आत्माओं के बीच युद्ध में बलि के लिए अवसर ही अवसर है। सम्पूर्ण रूप से दुष्ट आत्माओं का वध इसलिए आवश्यक हो गया है कि ये उन्हें भी शोषित करने से नहीं चुकते जो बेरोजगारी से रोजगार की प्रथम सीढ़ी और अपना पेट भी ठीक ढंग से नहीं भर पाते। कभी मै भी तुम्हारे समक्ष कर्तव्य पथ पर बाधा डालने या इन रूपों में मिलॅू तो मेरा भी वध करने में पीछे न हटना लेकिन क्या तुम ऐसा कर पाओंगे? तुम तो वर्तमान समय में दिशाभ्रमित असंगठित, उम्र प्रभावों में कैद, गैर जिम्मेदार, इच्छा को कर्म में परिणत न करने वाले और पशुवत् हो गये हो। तुम देश की सीमा पर इसलिए जाना चाहते हो कि तुम्हें वहाॅ अपने नहीं मिलेंगे और यहाॅ अपने भी होगें तुम दुश्मनों को भी अपने पराये की नजर से देखते हो, दुश्मन तो सिर्फ दुश्मन होता है। अभी तो तुम देश भक्त नहीं बन सके फिर तुम विश्व भक्त कैसे बन पाओंगे। जबकि विश्व को विश्वभक्त देना सिर्फ भारत का ही कर्तव्य और दायित्व है।

13. हे देवी, शक्ति स्वरूप नारीयों, तुम अपने अधिकारो की माॅग करती हो, यहाॅ माॅगने से फूटी कौड़ी भी नहीं मिलती, यहाॅ छिना जाता है। छिनने के लिए तुममे शक्ति होनी चाहिए। क्या ज्ञान और वाणी का एक दूसरे के बिना कोई अस्तित्व है? क्या प्रेम और कर्म का एक दूसरे के बिना कोई अस्तित्व है? क्या शिव और शक्ति का एक दूसरे के बिना कोई अस्तित्व है? पहले अपने अन्दर शिव को धारण करने का कर्तव्य करो फिर अधिकार तुम्हारे चरणों में होगा। यही अर्धनारीश्वर है, यही पुरूषत्व है और इसे प्राप्त करने का प्रयत्न पुरूषार्थ है। सदियों से जिस ज्ञान से तुम्हें वंचित रखा गया था। वह तो अब तुम्हारे अधिकार में आ गया है। इससे बड़ा अधिकार और तुम्हें क्या मिल सकता है। पहले इसे आत्मासात् करो। शेष छोटे अधिकार स्वतः मिल जायेंगे। और तुम देवी-शक्ति के रूप में व्यक्त हो जाओगी। ठीक यही स्थिति शिवरूप दलित शोषित नरों के साथ भी है।

14. हे परिणय सूत्रों में बँधकर गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करने जा रहे युवकांे और युवतियों तथा बँध चुके पति और पत्नियों, क्या तुम जानते हो तुम्हारे दीर्घ सफल सम्बन्धों का स्वरूप क्या है? तुम मे से प्रत्येक ही अर्धनारीश्वर स्वरूप है। यदि तुम ऐसे पारिवारिक स्तर में हो जहाॅ सिर्फ भोग करना है, तब तुम में से प्रत्येेक को एकात्म ज्ञान और एकात्म वाणी धारण करनी होगी। यदि तुम ऐसे पारिवारिक स्तर में हो जहाॅ तुम्हें कर्म और भोग दोनों करना है, तब तुम में से प्रत्येक को एकात्म ज्ञान और एकात्म वाणी सहित एकात्म कर्म और एकात्म प्रेम धारण करनी होगी। यदि तुम इस प्रकार रहना चाहते हो कि तुम कर्म और भोग न करते हुये भी तुम्हें कर्म और भोग करना है, तब तुम्हें एकात्म ज्ञान-एकात्म वाणी और एकात्म कर्म-एकात्म प्रेम सहित एकात्म ध्यान और एकात्म समर्पण को धारण करना होगा। जिसका अर्थ क्रमशः एकात्म अर्थात समभाव या अद्वैत या सेंटर या एकत्व की ओर बढ़ता हुआ ज्ञान, वाणी, कर्म, प्रेम, काल या समय चिंतन और समर्पण है। और धारणकत्र्ता अर्धनारीश्वर स्वरूप क्रमशः ब्रह्मा-सरस्वती, विष्णु-लक्ष्मी और शिव शंकर-शक्ति पार्वती है। तब पत्नियों के लिए पति परमेश्वर तथा पतियों के लिए पत्नि शक्ति स्वरूप होगी। अन्यथा इन स्वरूपों में अपूर्ण धारण युक्त सांसारिक मानवों की भाॅति उलझा हुआ गृहस्थ जीवन ही होगा।

15. अरे मुर्खों तुम ये सोचते हो कि मैं बड़ा भाग्यशाली, महान और विषेशरूप से अवतरित हो जन्म ग्रहण किया हूॅ। इस बिन्दु पर सोचो कि भगवान शंकर, भगवान कृष्ण, स्वामी विवेकानन्द की मुख्य इच्छा युक्त मन अर्थात सूक्ष्म शरीरों का स्थूल सूक्ष्म शरीर विश्वमानव के रूप में भौतिक शरीर ग्रहण किया है। या लव कुश सिंह नामक शरीर ने अपने मन स्तर को निम्न से उच्च, उच्च से उच्चतर, उच्चतर से उच्चतम, उच्चतम से सर्वोच्च और अन्तिम तक उठाकर उन सूक्ष्म शरीरों को धारण कर विश्वमानव रूप में व्यक्त किया है। क्या तुम दृश्य पदार्थ विज्ञान को नहीं जानते किसी भी परमाणु में इलेक्ट्रानो की संख्या बढ़ाकर उसमें सभी तत्वों के गुणों को व्यक्त किया जा सकता है यही इलेक्ट्रान तो मन या सूक्ष्म शरीर है जिसे निम्न से सर्वोच्च तक बढ़़ाते हुये किसी भी स्तर के महापुरूष के गुण को व्यक्त किया जाता है। जिस प्रकार परमाणु वही रहता है पिछले गुण तत्व मृत्यु को प्राप्त हो नये गुण तत्व व्यक्त हो जाते है या इच्छानुसार मृत्यु को प्राप्त गुण तत्व को पुनः व्यक्त किया जाता है। इसी प्रक्रिया से शंकर, शिव बने। कृष्ण, योगेश्वर अदृश्य विश्वात्मा कृष्ण बनें। जब कृष्ण, नरेन्द्र और मेरा जन्म हुआ था तो क्या हम सभी उस क्षण सम्पूर्ण विश्व में अकेले जन्म लिये थे? फिर उसी क्षण जन्म लेने वाले अन्य का तो पता ही नहीं हैं। अब तुम कहोगे परिस्थिति और वातावरण। परिस्थिति और वातावरण कुछ बने बनाये मिलते है कुछ पुरूषार्थ द्वारा बनाया जाता है। हमने यह पहले शुरू कर दिया था तुम अब शुरू करोगे बस यही अन्तर है।

16. हे सामाजिक, आध्यात्मिक और राजनीतिक विषयों में रूचि न लेने वालों और अन्य विषयों जैसे-खेल, मनोरजंन इत्यादि में प्राथमिकता से रूचि लेने वाले, क्या तुम यह नहीं जानते कि तुम स्वयं अपने को तो ठग ही रहे हो साथ ही परिवार, समाज, देश और विश्व को भी ठग रहे हो। तुम नहीं जानते कि वर्तमान समय की समस्त नीतिया तुम्हारे मत (वोट) पर आधारित है। यदि तुम सामाजिक, आध्यात्मिक, राजनीतिक और विश्व की नीतियों और प्रणालियों का मुख्य सिद्धान्त नहीं जानते तो तुम्हंे सरकार की आलोचना करने का अधिकार नहीं। सत्य कहूॅ तो मत देने का भी अधिकार नहीं। जिस प्रकार कक्षा पाॅच का प्रधानाध्यापक, कक्षा पाॅच तक का ही प्रमाण पत्र दे सकता है उससे उच्च कक्षा का नहीं, उसी प्रकार तुम सीमित ज्ञान रखकर उच्च ज्ञान का मूल्यांकन, सलाह, आलोचना और प्रमाण पत्र नहीं दे सकते। फिर तुम्हें सरकार द्वारा जो कहा जाय, जो दिया जाय उसे लेकर ही सन्तोष करो और मुॅह से एक आवाज भी न निकालो क्योकि तुम इसी के योग्य होगे।

17.   हे भारत के नेतृत्वकत्र्ताओ मैं यह नहीं जानता कि तुम भारत को विश्व में सबसे महान बनाना चाहते हो या उसे बेचकर अस्तित्व ही मिटा देना चाहते हो। परन्तु इतना जान लो तपोभूमि भारत में सत्य और आत्मा का निवास हैं। क्या कभी सत्य और आत्मा का अस्तित्व मिटाया जा सकता हैं? यदि तुम भारत को बेचना चाहते हो तब भी और यदि उसे महान बनाना चाहते हो तब भी, उसका रास्ता तो सिर्फ मेरे यहाॅ से ही गुजरता है जिसे तुम्हें पार करना ही पडे़गा क्योकि दोनों कार्यो के लिए तुम्हें शक्ति अवश्य चाहिए और वह सिर्फ तुम्हें यहीं मेरे पास से ही प्राप्त हो सकता है।

18. हे अन्तर्राष्ट्रीय, साम्प्रदायिक, जातिय और व्यक्तिगत युद्ध करने वालो, क्या वास्तविक रूप से तुम युद्ध करते हो? नहीं तुम युद्ध नहीं करते हो। युद्ध तो वह संकीर्ण विचार करता है। तुम तो मात्र मोहरे हो जिसे संकीर्ण विचार संचालित करता है। जब तुम उस व्यापक अनन्त सत्य विचार को जान जाओगे, फिर तुम न संचालित हो सकोगे न मोहरे ही बन सकोगे। तब तुममें प्रेम का अनन्त भाव उत्पन्न होगा लेकिन एकपक्षीय होगा तो युद्ध हमेशा होता रहेगा। ऐसे में तुम अपने अनन्त और व्यापक सत्य-विचार को उसे समझाओं, उसमें दबाव के साथ संचरण करो, फिर भी न समझे तो वध कर दो। यह हत्या नहीं यह वध है। हत्या सत्य भावों की होती है। वध संकीर्ण विचारों और भावों की होती है। और वध पूर्व उससे कहो-हे मानव यह न समझों कि तुम्हारा वध मेरा उद्देश्य है। मेरा उद्देश्य तुम्हारे ही कल्याण के लिए तुम्हे संकीर्ण विचार से व्यापक और अनन्त सत्य विचार में स्थापित करने का था परन्तु तुम संकीर्ण विचार से मोहरे की भाॅति संचालित होते हुये मुझ अनन्त सत्य विचार पर आघात कर रहे थे। मैं भी तो अनन्त व्यापक सत्य-विचार को संचालित कर तुम्हारा वध कर रहा हूॅ। सत्य तो यह है कि हम दोनों ही विचार के अधीनस्त हो ही एक दूसरे से युद्ध कर रहे है। यह अलग बात है कि मैं उच्च स्तरीय विचार से और तुम निम्न स्तरीय विचार से संचालित हो।

19. हे मानवों क्या तुम जानते हो कि तुम्हारे बीच रहते हुये भी तुम मुझे क्यों नहीं पहचान पाते? तो सुनों चूँकि तुम सांसारिक हो इसलिए तुम सांसारिक कर्मो व धन की प्राथमिकता वाला व्यापार नौकरी इत्यादि तथा उसके परिणाम-लाभ हानि इत्यादि से ही दूसरों को देखते हो न कि कर्म, ज्ञान और उद्देश्य से। परन्तु मैं तो तुम्हें सिर्फ कर्म, ज्ञान और उद्देश्य के आधार पर ही देखता हूॅ और इस आधार पर ही तुम्हारें समक्ष धर्म संकट उत्पन्न करता हूॅ। यदि तुम सफल होते हो तो तुम चुन लिये जाते हो, यदि असफल होते हो तो उसी भाॅति छोड़ दिये जाते हो जैसे तुम सभी निरर्थक-व्यर्थ कुडे़-करकटों को फेंक देते हो। इस धर्म संकट का उत्पन्नकत्र्ता, सफलता और असफलता का निर्णयकत्र्ता मैं ही होता हूॅ तुम्हें तो इस का आभास भी नहीं होने देता। तुम्हें तो तब पता लगता है जब तुम्हें फल दे दिया जाता है। हे मानवों तुम मुझे सिर्फ कर्म, ज्ञान और उद्देश्य से ही देख क्यांेकि मै भी तुम्हंे सिर्फ इन्हीं से देखता हूॅ। क्योकि संसार में शरीर धारण कर मैं तुम्हें भ्रमित करने के लिए सासांरिक कर्म ज्ञानावस्था में ही करता हूॅ। यदि अन्ततः तुम उससे भ्रमित नहीं होते तो तुम मेरे योग्य हो मेरे प्रिय हो जाते हो। तब तुम्हारी इच्छा ही मेरी इच्छा बन जाती है क्योंकि मेरी तो कोई इच्छा ही नहीं होती इसलिए तुम्हारे बीच रहते हुये मैं तुम्हारे जैसा ही होकर व्यवहार करता हूॅ और तुम शुद्धरूप से अपने जैसा ही मुझे समझते हो। जब तुम ज्ञानी, बुद्धिजीवी, महान इत्यादि समझते हो तो सच मानो मैं भी तुम्हे ऐसा ही समझता हूॅ। बस अन्तर यह होता है कि मैं तुम्हे मूर्ख और ज्ञानी दोनांे सिद्ध कर सकता हूॅ लेकिन तुम सिर्फ कह सकते हो सिद्ध नहीं कर सकते। इस सम्पूर्ण प्रक्रिया में मैं वही बोलता हूॅ जो मै कर्म करता हूॅ और उसकी सफलता और असफलता का ज्ञान मुझे ही होता हैं इसलिए भविष्य में क्या होना है अच्छी प्रकार जानता हूॅ लेकिन तुम तो वह बोलते हो जिसकी सफलता और असफलता का कर्म और ज्ञान दूसरे के अधीन होता है इस प्रकार सदा ही तुम्हारे अनुमान का गणित गलत ही सिद्ध होता है।

20. हे मानवों क्या तुम जानते हो भौतिकवाद और आध्यात्मवाद का व्यक्त मूल लक्षण क्या है? भौतिकवादी सीधे कर्म पर विश्वास करता है। जबकि आध्यात्मवादी ज्ञानयुक्त कर्म पर विश्वास करता है। भौतिकवादी का लक्ष्य धन होता है जबकि आध्यात्मवादी का लक्ष्य सिद्धान्त और नैतिकता होता है, धन मात्र साधन होता है साध्य नहीं। भौतिकवादी व्यक्ति किसी भी कर्म में धन के लिए बिना सोचे समझे शीघ्र प्रवृत हो जाता है जबकि आध्यात्मिक व्यक्ति कर्म के उद्देश्य को बिना सोचे कर्म में प्रवृत्त नहीं होता चाहे उससे कितना भी अधिक धन क्यों न प्राप्त होता हो। भौतिकवादी व्यक्ति समय अर्थात काल ध्यान से मुक्त हो कर्म करता है जबकि आध्यात्मिक व्यक्ति पूर्णतः समय के ध्यान से युक्त हो कार्य करता है। भौतिकवादी व्यक्ति योजना आधारित कर्म नहीं करता इसलिए उसे हमेशा कर्म, नीति वक्तव्य बदलने पड़ते है और उसका पिछला कर्म व्यर्थ चला जाता है। जबकि आध्यात्मिक व्यक्ति योजना आधारित कर्म करता है इसलिए उसे कर्म, नीति, बदलने नहीं पड़ते है। उसका प्रत्येक पिछला कर्म उसके अगले कर्म के साथ संग्रहणीय, संक्रमणीय एवम् गुणात्मक रूप से जुड़ता रहता है। भौतिकवादी व्यक्ति पहले कर्म करता है फिर उसके फल-सफलता और असफलता से ज्ञान प्राप्त करता है। आध्यात्मिक व्यक्ति पहले ज्ञान प्राप्त करता है फिर कर्म करता हैं जिससे उसके असफलता का अवसर कम हो जाता है। भौतिकवादी व्यक्ति इन्द्रिय-आॅख, नाक, कान, त्वचा, जीभ इत्यादि केन्द्रित इच्छाओं से संचालित होता है जबकि आध्यात्मिक व्यक्ति आत्मीय इच्छाओं से संचालित होता है। भौतिकवादी व्यक्ति का ज्ञान और कर्म चक्र छोटा होता है इसलिए वह शीघ्र ही तनाव में फॅस जाता है। जबकि आध्यात्मिक व्यक्ति का ज्ञान व कर्म चक्र बड़ा और व्यापक होता है इसलिए वह शीघ्रता से तनाव में नहीं फॅसता। विपरीत परिस्थितियों में भौतिकवादी व्यक्ति शारीरिक, आर्थिक और मानसिक तीनांे रूप से टूट जाता है। जबकि आध्यात्मिक व्यक्ति शारीरिक और आर्थिक रूप से टूटता है परन्तु वह मानसिक रूप से कभी नहीं टूटता। हे मानव मानसिक रूप से टूटना ही मृत्यु है इसलिए तू कुछ दिन बाह्य कर्मों को त्याग कर अकर्मण्य हो अन्तः कर्म से युक्त हो आध्यात्मिक बन और मानसिक रूप से स्वस्थ होकर कर्म करते हुये जीवन का भोग कर।

21. हे मानव क्या तुम जानते हो सत्य आधारित नींव पर अपना जीवन निर्माण करने से क्या लाभ हैं?  तो सुन सत्य आधारित जीवन निर्माण से लाभ यह है कि तुम्हें प्रत्येक उत्तर में बुद्धि नहीं लगानी पडे़गी और तुम्हारा पिछला उत्तर, अगले प्रत्येक उत्तर का प्रमाणिक आधार होगा। इससे यह लाभ होगा कि तुम्हारे मन के पास अन्य विषयों को सोचने समझने के लिए समय ही समय होगा जबकि झूठ आधारित जीवन निर्माण में प्रत्येक उत्तर में बुद्धि लगानी पड़ेगी और सम्पूर्ण समय अगले उत्तर के सोचने में ही मन लग जायेगा और अन्ततः तुम्हारे पास भविष्य के विषयों के लिए सोचने का समय ही न रहेगा। परिणामस्वरूप तुम पूर्णतः अपने द्वारा ही निर्माण किये गये चक्रव्यूह में फॅस जाओगे। सत्य आधारित जीवन विश्वसनीयता द्वारा आदर्श मानव का निर्माण कर धीरे-धीरे सम्बन्धों को बढ़ाता जाता है जबकि झूठ आधारित जीवन अविश्वसनीयता द्वारा अवसरवादी मानव का निर्माण कर धीरे-धीरे सम्बन्धों को कम करता जाता है। हे मानव, क्या झूठ से सत्य का फल निकल सकता है? इसलिए पहले आदर्श मानव बन फिर शेष जो कुछ तुम्हे चाहिए वे सब स्वतः ही तुम्हारे पास आकर्षित होते आयेगें क्योकि धन से मानव नहीं है, मानव से धन है। जब तुम झूठ आधारित जीवन का निर्माण कर मनुष्यत्व खो बैठोगे और पशुत्व को प्राप्त हो जाओंगे तब सम्बन्धों को खो बैठोगे। वैसे भी पशुओं का सम्बन्ध धन से नहीं होता, हाॅ पशु एक धन अवश्य होता है। जिसका उपयोग मनुष्य करते है। अर्थात तुम मनुष्यों के लिए प्रयोग में लाये जाने वाले एक मानव-पशु बन जाओगे। फिर तुम्हारा आजीवन शोषण ही होगा और तुम्हें पता भी न चलेगा। हे मानव, जीवन एक ‘‘वन वे ट्रैफिक रोड (एक ही दिशा में चलने के लिए सड़क)’’ हैं जिस पर बढ़ने के बाद लौटना मुश्किल होता है इसलिए भलि भाॅति सोचकर ही जीवन निर्माण के लिए अग्रसर हों।

22. हे मानवों, क्या तुम स्वार्थ और निःस्वार्थ में अन्तर जानते हो? तो सुनो इस जगत में बिना स्वार्थ कोई भी कर्म नहीं होता और न ही सम्भव है। स्वार्थवश ही बॅधकर सभी कर्म करते है। जब स्वार्थ व्यक्त होता है तो उसे व्यक्त स्वार्थ तथा जब अव्यक्त होता है तब अव्यक्त स्वार्थ कहते है। जब व्यक्त स्वार्थ का लाभ आधा-आधा स्व-कल्याण और लोक कल्याण के लिए होता है तब आदर्श मानव का स्वरूप व्यक्त होता है। जब व्यक्त स्वार्थ का अधिकतम लाभ लोक कल्याण के लिए होता है तब निःस्वार्थ मानव का स्वरूप व्यक्त होता हैं परन्तु किसी भी स्थिति में जितना बड़ा निःस्वार्थ कर्म होता है उतना ही बड़ा वह स्वार्थ कर्म होता है। हे मानव, मैं ही सबसे बड़ा स्वार्थी हूॅ और सबसे बडा निःस्वार्थी हूॅ क्यांेकि जिस प्रकार तुम अपने स्वार्थ को नहीं छोड़ सकते उसी प्रकार मैं भी अपने स्वार्थ को नहीं छोड़ सकता। यह अलग बात है कि तुम्हारा स्वार्थ सिर्फ तुम्हें ही लाभ पहुॅचाता है और मेरा स्वार्थ लोक कल्याण के लिए जन सामान्य को लाभ पहुॅचाता है। हे मानव, जिसका स्वार्थ अव्यक्त है वही शुद्ध रूप से स्वार्थी है तथा जिसका स्वार्थ व्यक्त है वही निःस्वार्थ की ओर है। इसलिए उसी के साथ सम्बन्ध और कार्य कर जिसका स्वार्थ व्यक्त है अन्यथा तू कभी भी विश्वासघात, शोषण और विपत्तियों में फॅस सकते हो। इसी प्रकार मैं ही सबसे बडा हिंसक हॅू और सबसे बड़ा अहिंसक हूॅ क्योंकि जिस प्रकार तुम व्यक्तिगत लाभ के लिए हिंसा पर उतर आते हो उसी प्रकार मैं लोक कल्याण के लिए हिंसा पर उतर आता हूॅ। परन्तु मेरी हिंसा, अहिंसा कही जाती है क्यांेकि उसका उद्देश्य अहिंसा और लोक कल्याण की स्थापना होती है।

23. हे अपनी पहचान बनाने के लिए संघर्षरत मानवों, तुम तो अपनी पहचान बनाने का मार्ग भी नहीं जानते। तुम अपनी पहचान का मार्ग बनाने के लिए इस प्रकार मार्गों को पहचानों। पहचान के ये मूल विषय है शारीरिक-निम्नतम, आर्थिक-मध्यम, मानसिक और आध्यात्मिक-सर्वोच्च तथा ऐतिहासिक आध्यात्मिक-अन्तिम एवम् क्रमशः उत्तरोत्तर बढ़ते हुये ये स्तर है- ग्राम या मुहल्ला, विकास क्षेत्र या नगर, अनुमण्डल, जनपद, मण्डल, प्रदेश, देश, विश्व और मध्यस्थ अन्य स्तर। शारीरिक पहचान सबसे कठिन पहचान का मार्ग है। आर्थिक पहचान, शारीरिक से थोड़ा कम कठिन मार्ग है। मानसिक और आध्यात्मिक पहचान सरल मार्ग है तथा ऐतिहासिक आध्यात्मिक पहचान दुर्लभ मार्ग है जो एक युग में एक बार ही आता है। हे मानव, जब ऐतिहासिक आध्यात्मिक दुर्लभ पहचान का मार्ग प्राप्त हो तब तुम किस पहचान के लिए संघर्ष कर रहे हो। तुम्हें इस मार्ग से जुड़कर ही पहचान प्राप्त करना चाहिए क्यांेकि सदा उच्च और व्यापक स्तरीय पहचान ही निम्न और सीमित स्तरीय पहचान को पहचान प्रदान करता है। निम्न और सीमित स्तरीय पहचान सदा उच्च और व्यापक पहचान का माध्याम या साधन होता है। इसलिए हे मानव, तू व्यापक स्तरीय ऐतिहासिक आध्यात्मिक पहचान में अपने निम्न स्तरीय पहचान को विलीन कर उसी भाॅति व्यापक पहचान को प्राप्त कर जिस प्रकार मृत्यु के बाद पुनः जीवन प्राप्त होता है। ऐसा न कर तू तो स्वयं अपनी पहचान खो देगा क्यांेकि जो पहचान व्यक्त अर्थात रेकार्डेड इत्यादि नहीं हो पाता वह तो वैसे ही कुछ समय बाद या तुम्हारी मृत्यु के बाद विलीन हो जाता है। फिर तू किस पहचान की बात करता है?

24. हे मानवों, तुम्हारा यह मानव जीवन सांसारिकता का पालन करने के लिए नहीं, सांसारिकता पर विजय प्राप्त करने के लिए प्राप्त हुआ हैं। तुम्हारा यह जीवन प्रकृति का अनुसरण करने के लिए नहीं प्रकृति पर विजय प्राप्त करने के लिए प्राप्त हुआ है। इसलिए हे मानव, तू सांसारिकता और प्रकृति द्वारा संचालित न हो तू सांसारिकता और प्रकृति को ही संचालित करने का प्रत्यन करते हुये जीवन का समभाव से भोग कर। यही तेरा मनुष्य जीवन का उद्देश्य है।  

25. हे मानवों, क्या तुम ज्ञान और ध्यान में अन्तर और उसकी उपयोगिता को जानते हो? तो सुनो, सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड ही ज्ञान मय है परन्तु उसकी प्रमाणिकता समयानुसार उसकी व्यावहारिकता ही है अर्थात ज्ञान का अपना अस्तित्व सर्वव्यापी होते हुये भी वह ध्यान द्वारा अर्थात समयानुसार प्रयोग द्वारा ही प्रमाणित होता है। इस प्रकार यह प्रमाणित है कि ध्यान ही ज्ञान है न कि ज्ञान ही ध्यान है। हे मानवों, ज्ञानी समय से मुक्त होकर मात्र सत्य वाणियों की एक श्रृख्ंाला ही व्यक्त करता है जबकि ध्यानी समय से युक्त अर्थात समयानुसार होकर सत्य वाणियों की व्यावहारिकता व्यक्त करता है। जो मानव जीवन में ज्ञान की उपयोगिता को व्यक्त करता है। इसलिए हे मानव, तू ध्यानी बन क्यांेकि ध्यान ही तुम्हें ज्ञान की व्यावहारिकता, उपयोगिता और सर्वोच्चता का लाभ दे सकता है। यह ध्यान ही धर्म है कर्म हैं। इस ध्यान से ही वेद, वेदान्त, शास्त्र प्रमाणित होते है अन्यथा वे सत्य शब्दों की श्रृखंला मात्र ही हैं जो सुनने में तो प्रिय और सत्य होते है परन्तु व्यावहारिक नहीं। 

26. हे समन्वयीकृत ज्ञान और समन्वयीकृत दृश्य ज्ञान को न समझ सकने वालों, तुम इसे इस प्रकार समझों-समन्वयीकृत ज्ञान व्यक्तिगत प्रमाणित देश-काल मुक्त सत्य है जबकि समन्वयीकृत दृश्य ज्ञान सार्वजनिक प्रमाणित देश काल मुक्त कर्म ज्ञान है सिद्धान्त है। समन्वयीकृत ज्ञान का ही दृश्य रूप समन्वयीकृत दृश्य ज्ञान है। समन्वयीकृत ज्ञान व्यक्तिगत अर्थात व्यष्टि मोक्ष या मुक्ति के लिए हैं तो समन्वयीकृत दृश्य ज्ञान सार्वजनिक अर्थात समष्टि मोक्ष या मुक्ति के लिए है। समन्वयीकृत ज्ञान सत्य-ज्ञान है तो दृश्य ज्ञान सत्य-व्यावहारिकता है। ज्ञान के उदाहरण संत सम्प्रदाय के कबीर, रविदास, रैदास इत्यादि है तो दृश्य ज्ञान के उदाहरण उसी ओर बढ़ता श्री कृष्ण का गीतोपनिषद् तथा स्वामी विवेकानन्द का वेदान्त की व्यावहारिकता है। दृश्य ज्ञान का पूर्ण रूप विश्वमानव का कर्मवेद है। समन्वयीकृत ज्ञान निवृत्ति मार्गी के लिए तथा समन्वयीकृत दृश्य ज्ञान प्रवृत्ति मार्गीयों के लिए उपयोगी है। हे मानवों, जीवन है तो कर्म करना ही पड़ेगा इसलिए तू व्यक्तिगत मोक्ष या मुक्ति की चिन्ता छोड़ कर सार्वजनिक जीवन में प्रवृत्ति हो और सार्वजनिक मोक्ष या मुक्ति के लिए समन्वयीकृत दृश्य ज्ञान को आत्मसात् कर क्यांेकि तेरी व्यक्तिगत मुक्ति से समाज को क्या लाभ होगा? व्यक्तिगत मुक्ति के लिए तो पशु भी कर्म कर रहे है, तू तो मनुष्य हैं। ध्यान रख समन्वयीकृत ज्ञान द्वारा सामाजिक नियंत्रण मानसिक गुलामी है तथा समन्वयीकृत दृश्य ज्ञान द्वारा सामाजिक नियंत्रण ही मानसिक और आध्यात्मिक स्वतन्त्रता है। और यही तुम्हारी वास्तविक स्वतन्त्रता और मनुष्य जीवन का उद्देश्य है। यही सफल, सन्तुलित शक्तिशाली अदृश्य सत्ता का भी प्रबन्ध और संचालन सिद्धान्त है। जिसके द्वारा सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड नियंत्रित और विकसित होते हुए मुक्ति या मोक्ष की ओर बढ़ रहा है। हे मानव, तू भी इसी सूत्र के अनुसार अपने संगठन की योजना, प्रबन्ध और नियंत्रण कर क्योंकि यही प्रकृति संसाधन विकास और मानव संसाधन विकास का मूल सिद्धान्त है। जिसके अंशों से प्रभावित हो धीर-धीरे अनेक संगठन सफलता प्राप्त कर रहे हैं और जो पूर्ण सफल हैं वे इसी सिद्धान्त के पूर्ण प्रभाव में है।

27. हे भारत के मानवों, क्या तुम जानते हो भारत में असुरी प्रवृत्तियों के बढ़ने का क्या कारण है? तो सुनो आज के पूर्व जितने विदेशी व देशी स्थूल शरीर धारी सूक्ष्म शरीर भारत को नष्ट-भ्रष्ट कर डालने की अन्तिम इच्छा रखते हुये अपने स्थूल शरीर का त्याग भारत में कर चुके है। उन का सम्पूर्ण मन, अपने मन की पूर्णता के लिए योग्य वातावरण पाकर पुनः स्थूल शरीर धारण कर व्यक्त हो चुके हैं, भले ही वे भारतीय भूमि पर क्यों न जन्म ग्रहण किये हों परन्तु उनमें सूक्ष्म शरीर उन्हीं इच्छाओं को धारण कर व्यक्त है। जो भारत के परतन्त्रता के समय विदेशीयों की थी। यही नहीं उनका प्रभुत्व इस समय इतना बढ़ चुका है। कि वे भारतीय दैवी प्रवृत्त्यिों को भी असुरी प्रवृत्तियों में बदलने में सफलता भी प्राप्त करने लगी हैं। क्योंकि जिनका मन पर नियंत्रण नहीं होता उनका मन वातावरण के अनुसार बदल जाते है। और वर्तमान में सर्वत्र असुरी प्रवृत्ति का ही वातावरण प्रभावी है। इससे बचने का एक मात्र और अन्तिम उपाय है। दैवी प्रवृत्ति का वातावरण निर्माण जो मात्र आध्यात्मिक ज्ञान के प्रसार और प्रभुत्व द्वारा ही सम्भव है।

28. हे पौराणिक कथाओं को न मानने वालों क्या तुम जानते हो कि तुम उन कथाओं को क्यों नहीं मानते? तो सुनो तुम इसलिए उसे नहीं मानते क्योंकि तुम उन कथाओं में प्र्रक्षेपित सगुण-साकार-दृश्य शरीरों में स्वंय को केन्द्रित करते हो जबकि तुम्हें उनके गुणों में स्वंय को केन्द्रित करना चाहिए। तुम उन्हें इस वर्तमान समाज से दूर कहीें केन्द्रित कर देखते हो जबकि तुम्हे उसे वर्तमान के इस समाज में देखना चाहिए। तुम उन कथाओं में प्रक्षेपित चमत्कारों में स्वंय को केन्द्रित कर देखते हो। जबकि तुम्हें उसे सत्य के गुण अर्थात शक्तिमान रुप में देखना चाहिए। तुम लोको-स्वर्ग, ब्रह्म इत्यादि को उपर कहीं केन्द्रित कर देखते हो जबकि तुम्हें मन की उच्च. उच्चतर, और सर्वोच्च तथा अन्तिम स्तर रुप में देखना चाहिए तुम कथाओं में प्रक्षेपित स्थान, वातावरण, व्यवस्था, संसाधन इत्यादि में स्वयं को केन्द्रित कर देखते हो जबकि तुम्हें स्थान, वातावरण, व्यवस्था, संसाधन इत्यादि के गुणों में स्वयं को केन्द्रित कर देखना चाहिए। हे मानव इन कथाओं से व्यक्त अर्थ मानव जीवन के लिए सत्य और शाश्वत है न कि उसी रुप में प्रत्यक्ष दृश्य दर्शन और उसी रुप में पुनरावृति। इसलिए हे मानव, तू इन कथाओं से ज्ञान प्राप्त कर और अपने जीवन में विभिन्न प्रकार के प्रवृतियों की पहचान कर जीवन का निर्माण कर।

29. हे भूत-प्रेत, पिशाच, चुड़ैल, जिन्न इत्यादि को मानने वालों क्या तुम नहीं जानते कि यह मानव की सबसे निम्नतम स्तर की व्यक्तिगत प्रमाणित अदृश्य कृति है। क्या तुम्हें कभी ऐसा अनुभव नहीं हुआ कि तुम भ्रम में किसी वस्तु को कुछ दूसरी अन्य वस्तु समझ रहे थे। पुनः अगले क्षण में जब तुम्हारा वास्तविकता से परिचय हुआ तो तुम्हारा भ्रम समाप्त हो गया। ऐसी स्थिति में तुम्हारा मन निम्नतम भ्रम से उच्चतम सत्य में ही तो स्थापित हो गया था। ठीक यही स्थिति भूत-प्रेत इत्यादि के सम्बन्घ में भी है। ये उन्हीं को दिखते हैं जिनका मन निम्नतम स्तर पर केन्द्रित हो जाता है। जब यह कभी क्षण मात्र के लिए केन्द्रित होता है तब डर और शरीर में सिहरन-कम्पन उत्पन्न कर देता है। तथा जब यह ध्यान अर्थात सतत प्रवाह के रुप में मन में प्रवाहित होने लगता है तब अमानवीय निम्नतम क्रियायें व्यक्त होने लगती है। इसी को भूत-प्रेत इत्यादि से पीड़ित कहते हैं। चूंकि यह व्यक्तिगत प्रमाणित है इसलिए इसके मानने वाले कभी-कभी अन्य रोगों से पीड़ित दूसरे व्यक्ति पर अपना निम्नतम विचार प्रभावी कर देते हैं या कहते-कहते लाद देते हैं। और उस व्यक्ति का जीवन विनाश की ओर बढ़ा देते हैं। हे मानव, तू यह निश्चित रुप से जान यह भूत-प्रेत इत्यादि पूर्ण व्यक्तिगत प्रमाणित अदृश्य विषय है। जिसका सार्वजनिक प्रमाणित दृश्य रुप स्वयं मन की निम्नतम स्तर से प्रभावित व्यक्ति ही है। क्योंकि व्यक्ति का सम्पूर्ण निर्माण उसका मन ही करता है। इसलिए उच्च मन स्तर व्यक्ति इससे कभी प्रभावित नहीं होते और न ही मानते हैं। इसलिए हे मानव, तू सदा अपने मन को उच्च से उच्चतर, उच्चतर से उच्चतम और उच्चतम से सर्वोच्च और अन्तिम की ओर गति करा अपने मन को स्वयं के द्वारा निर्मित निम्नतम रोगों से मुक्ति दिलाने का प्रयत्न कर और भूत-प्रेत इत्यादि का विचार मानने के लिए किसी के उपर दबाव मत डाल क्योंकि ऐसा कर तू उसका हित नहीं करता।

30. हे पुनर्जन्म को न मानने वालों, क्या तुम सिर्फ अपने ही व्यक्तिगत प्रताणित अदृश्य मन को सर्वोच्च मानने की ठान चुके हो, तुम नहीं जानते कि संसार में प्रत्येक वस्तु का एक अदृश्य रूप भी है। यदि नहीं तो बताओं पानी गर्म करने पर धीरे-धीरे वह कहाँ चला जाता हैं? मोमबत्ती जलते-जलते कहाँ चला जाता है? तुम्हारा शरीर त्याग के बाद कहाँ चला जाता है? इत्यादि, इत्यादि। क्या तुम वर्तमान समय में हर क्षण सार्वजनिक प्रमाणित दृश्य पदार्थ विज्ञान में जन्म, स्थिति और मृत्यु में होने के बावजूद भी पदार्थ विज्ञान को असत्य कह सकते हो? यदि हाँ तो तुम ही असत्य सिद्व हो जाओगे। पदार्थ विज्ञान नहीं। यदि नहीें तो तुम्हें पुनर्जन्म मानना ही होगा और यह स्वीकार करना हीे होगा कि जब भी तुम विपत्तियों में फंसते हो वह तुम्हारे इस जीवन का कर्म हो सकता है। इसी प्रकार तुम्हारा सम्पूर्ण जीवन जो फल रुप में व्यक्त है वह पूर्व जीवन का कर्म है और इस जीवन का कर्म ही अगले जीवन के लिए फल होगा। हे मानव, तुम्हें इस जीवन में जो संसाधन, वातावरण इत्यादि प्राप्त हुये हैं, वे सब तुम्हारे पूर्व जीवन के अपूर्ण मन को पूर्णता प्रदान करने के लिए ही है इसलिए तू उसका पहचान कर और अपने मन को पूर्णता की ओर ले जाने का प्रयत्न कर। तू इस जीवन में क्या हो इसकी चिन्ता त्याग कर अगले जीवन में क्या होना है इसकी भी चिन्ता के साथ कर्म कर अन्यथा तू और भी बदतर जीवन लेकर अगले जीवन में व्यक्त होगें।

31.   हे अवतारो को न मानने वालो, क्या तुमने स्वयं अपने व्यक्तिगत जीवन में कभी ऐसा अनुभव नहीं हुआ जिसमें तुम्हें लगा हो कि तुम उत्थान के उच्चतम शिखर पर खड़े हो फिर अगले क्षण लगा हो कि तुम पतन की निम्नतम स्थिति पर खड़े हो। बस यही तो प्राकृतिक सत्य नियम या आदान-प्रदान है। ठीक यही घटना सम्पूर्ण समाज पर भी घटती है। कभी समाज उत्थान के उच्चतम शिखर पर तो कभी पतन की निम्नतम स्थिति पर खड़ा हो जाता है। समाज की स्थिति को सार्वजनिक रुप से सभी देख सकते है। परन्तु व्यक्ति की स्थिति को व्यक्तिगत रुप से सिर्फ व्यक्ति ही अनुभव कर सकता है। जब समाज अर्थात व्यक्तियों का समूह की स्थिति पतन अर्थात सांसारिकता में पूर्ण बद्ध अर्थात व्यक्तिगत लाभ ही सर्वोच्च आधारित हो व्यक्त हो जाता है तब व्यक्ति की स्थिति यह हो जाती है कि वह अपनी आंखें बन्द कर लेने मात्र से ही स्वयं को सुरक्षित समझने लगता है। हे मानव, जब ऐसी स्थिति आती है तब यह समझना चाहिए कि समाज पतन की निम्नतम स्थिति को प्राप्त हो गया है। और पूर्ण वेग के साथ समाज को उत्थान के उच्चतम शिखर पर पहुँचाने और व्यक्ति को आखें खुली रखकर सुरक्षित अनुभव कराने का अवतारों का समय हो गया है। क्योंकि परिवर्तन या आदान-प्रदान जो अटलनीय होता है। यह कार्य जिस मानव शरीर के माघ्यम से सम्पन्न होता है उसे ही अवतार कहते हैं। और उसके द्वारा व्यक्त ज्ञान ही सत्य-ज्ञान और सत्य-सिद्वान्त होते हैं। हे मानव, यह प्राकृतिक नियम या आदान-प्रदान जिस प्रकार प्रकृृति अपने अन्दर संचालित करती है उसी प्रकार तू भी अपने अन्दर इसे संचालित कर क्योंकि तू इसे यदि अपने अन्दर संचालित नहीं करेगा तो तू इस जीवन संघर्ष में पीछे रह जायेगा और उत्थान के वेग का लाभ उठा नहीं पायेगा। हे मानव, अवतार गण भी अपने अन्दर सतत परिवर्तन या आदान-प्रदान को ही संचालित करते हुये सम्पूर्ण समाज को उत्थान के शिखर पर पहुँचाते हैं न कि किसी चमत्कार से। चमत्कार तो सिर्फ अन्ध भक्ति उत्पन्न करता है जबकि आदान-प्रदान या परिवर्तन, कर्मज्ञान उत्पन्न करता है इसलिए चमत्कार आश्चर्यजनक हो सकता है परन्तु जीवन निर्माण के लिए लाभकारी नहीं हो सकता।

32. हे समाजशास्त्रीयों, क्या तुम वर्तमान विदेशी मैकाले शिक्षा प्रणाली का सर्वोच्च फल जानते हो? तो सुन इस शिक्षा प्रणाली का मुख्य फल है-निर्भरता से युक्त मानव निर्माण और उद्देश्य है ऐसे ही मानव का निर्माण। न कि आत्म निभर्रता से युक्त मानव और उसका निर्माण। इसी कारण भारत में, शिक्षित होकर नौकरी ही मांगने वालों की भीड़ उत्पन्न हो गयी है। जो बिना नेतृत्वकर्ता या प्रबन्धक के संचालित ही नहीं हो पाती। हर परिस्थिति में उन्हें इंजनरुपी नेतृत्वकर्ता या प्रबन्घक की आवश्यकता पड़ती है। वे किसी भी स्थिति में स्वयं को नेतृत्वकर्ता और प्रबन्धक रुप में देख ही नहीं पाते, यहाँ तक की उनकी भाषा भी नहीं समझ पाते। मैकाले शिक्षा पद्धति राज्य तन्त्र के लिए ठीक है जिससे सरकार के सामने घुटने टेकने वाले अधिकतम होंगे और राजनेताओं का प्रभुत्व बना रहेगा परन्तु यह प्रजातन्त्र या लोकतंत्र या गणराज्य या समाज के लिए ठीक नहीं है। क्योंकि इसमें न तो लोकतंत्र स्वस्थता प्राप्त कर पायेगा, न ही मूल जन समस्याओं को ही कम किया जा सकता है। हे मानव, तू इस लोकतंत्र में मैकाले शिक्षा पद्धति में अनुपलब्ध पूर्ण ज्ञान का शिक्षा प्राप्त कर तथा आत्म निर्भर होकर देश तथा स्वस्थ लोकतंत्र की स्थापना में सहयोग, कर्तव्य और सेवा कर। यही सबसे बड़ी देश सेवा और देश भक्ति है क्योंकि जब तक सरकार मूल समस्याओं से ही घिरी रहेगी तब तक सरकार सर्वाेच्च समस्याओं पर कार्य ही न कर सकेगी।

33. हे धन लाभ के लिए सलाह माॅगने वालों, एक तरफ तुम सलाह भी माॅगते हो दूसरी तरफ तुम अपने ही ज्ञान मार्ग द्वारा ही धन लाभ प्राप्त करना चाहते हो। तुम्हीं बताओं तो फिर सलाह की उपयोेगिता और आवश्यकता क्यों हुई? और क्या हुई? यदि तुम पूरब को पाना चाहते हो तो मै तो कहूॅगा पूरब की ओर जाओं। यदि तुम पश्चिम के रास्ते पूरब को पाना चाहते हो तो पा सकते हो लेकिन रास्ता लम्बा होगा, कठिन होगा, संघर्षशील होगा, असफलता की स्थिति अधिक होगी और यदि तुम्हंे अपना यह रास्ता ही विश्वसनीय-प्रिय होगा तो मेरे सलाह की आवश्यकता क्या हैं? हे मानव, यदि तू किसी आध्यात्मिक व्यक्ति से सलाह माॅगेगा तो वह तुम्हें सर्वांगीण लाभ का ही सरल मार्ग बतायेगा। इससे यह न सोच कि जो तुम चाहते हो, वह व्यक्ति क्यों नहीं प्राप्त किया या क्यों नहीं सफल हुआ। तो सुन, तुम जो प्राप्त करना चाहते हो वह तुम्हारा साध्य अर्थात लक्ष्य है जब कि उस व्यक्ति का वह साधन अर्थात माध्यम है न कि लक्ष्य या साध्य है इसलिए वह उसे प्राप्त करने में सक्षम होते हुये भी प्राप्त नहीं करना चाहता।

34. हे जातिवाद करने वालो, तुम्हें तो जातिवाद करने भी नहीं आता, तुम तो अपने जाति के कुछ व्यक्तियों की सहायता मात्र कर समग्र जाति परिवार को भंयकर विरोध, असहयोग, अलगाव और हिंसा का शिकार बना देते हो, जानते हो इस प्र्रकार की जातिवाद को घृणित जातिवाद कहते हैं। हे मानव, तुम्हें मेरी तरह समग्र जाति को ज्ञान दान द्वारा स्वप्रेरित कर उपर उठाते हुये स्वस्थ जातिवाद करना चाहिए जिससे जातिवाद कहा भी न जा सके और जाति उत्थान भी हो जाये। क्यांेकि ज्ञान दान का कार्य प्रकृति आविष्कृत मानव जाति अर्थात लोक कल्याण के लिए होता है न कि किसी एक मानव आविष्कृत जाति के लिए। इस प्रकार तुम अपनी जाति के लिए प्रमाणिक आदर्श पुरूष भी बन जाओगे जिस पर तुम्हारी जाति गर्व करेगी क्यांेकि जिस जाति में तुम जन्म ग्रहण किये हो उससे सम्बन्ध विच्छेद न तुम्हारे वश में है न ही समाज के वश में है। तुम कोई भी उपाय निकालो समाज तुम्हें उस जाति और सम्प्रदाय से जोड़ेगा ही क्यांेकि समाज प्रत्येक को प्राथमिकता के साथ जाति के ही दृष्टि से देखने के दुर्गुण से ग्रसित हो चुका हैं।

35. हे नौकरी ओर नौकरी में आरक्षण माॅगने वाले क्या तुम नहीं जानते कि तुम अपने भविष्य को अवरूद्ध करने की मांग कर रहे हो? क्या तुम नहीं जानते कि भविष्य ज्ञान व व्यापार का है? भविष्य में ज्ञानीयों और व्यापारियो का ही प्रभुत्व होगा। क्या तुम नहीं जानते कि नौकरी और नौकरी में आरक्षण माॅगकर सदियों से प्रताड़ना सहने के बाद पुनः नये तरीके से प्रताड़ना में फॅसने का ही स्वयं माॅग कर रहे हो। क्या तुम नहीं जानते कि नौकरी शूद्रों का आधुनिक संस्कारित रूप है। क्या तुम नहीं जानते कि शूद्र से उच्च व्यापारी अर्थात वैश्य, वैश्य से उच्च क्षत्रिय अर्थात नेतृत्व और क्षत्रिय से उच्च ब्राह्मण अर्थात नियंत्रक है। इसलिए हे मानव अपने विकास के लिए उच्च गति करते हुए शूद्र से वैश्य, वैश्य से क्षत्रिय, क्षत्रिय से ब्राह्मण की ओर गति कर न कि निम्न गति या शूद्र से आधुनिक शूद्र की ओर। क्या तुम नहीं जानते कि वैश्य अर्थात व्यापारी और ब्राह्मण अर्थात नियंत्रक ही प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से सर्वोच्च है। इसलिए हे मानव तू ज्ञान और व्यापार अर्थात उद्यम के लिए माॅग कर, इसमें ही आरक्षण के लिए माॅग कर और इसमें ही प्रभुत्व स्थापित कर।

36. हे व्यापारियों तुम व्यापार के मुख्य सिद्धान्त-‘‘समभाव में स्थित हो प्राकृतिक सत्य या परिवर्तन या आदान-प्रदान को अपनी ओर केन्द्रित कर आदान-प्रदान करना’’ को सार्वजनिक रूप से व्यक्त क्यों नहीं कर देते। इससे तो तुम्हारा ही लाभ होगा क्योंकि जब अधिकतम व्यापारी होगें तब व्यापार स्वेच्छा, सरलता और एक दूसरे को समझते हुये सहभागिता से संचालित होगा। तुम सार्वजनिक घोषणा क्यों नहीं कर देते कि समभाव में स्थित हो शारीरिक आदान-प्रदान आधारित व्यापार निम्नतम, समभाव में स्थित हो आर्थिक आदान-प्रदान आधारित व्यापार-मध्यम तथा समभाव में स्थित हो मानसिक आदान-प्रदान आधारित व्यापार सर्वोच्च और अन्तिम लाभ देने वाला व्यापार है। हे मानव, तुम अधिक लाभ-प्राप्त करने के लिए क्रमशः शारीरिक, आर्थिक और मानसिक आधारित उस उत्तरोत्तर बढ़ते हुये क्रम के योग्य बनकर व्यापार कर। 

37. हे उद्योगपतियों, तुम उद्योगों के प्रबन्ध और संचालन योजना का मुख्य सिद्धान्त- ‘‘समभाव में स्थित और प्राकृतिक सत्य या परिवर्तन या आदान-प्रदान के ज्ञान से युक्त हो मूल पाॅच कर्म आदान-प्रदान, ग्रामीण, आधुनिकता, शिक्षा और विकास के क्षेत्र में शारीरिक, आर्थिक और प्राकृतिक सत्य या परिवर्तन या आदान-प्रदान को अपनी ओर केन्द्रित कर करना’’ को सार्वजनिक रूप से व्यक्त क्यों नहीं कर देते। इससे तो तुम्हारा ही लाभ होगा क्योंकि जब संघर्शशील उद्यमी सफलता प्राप्त करते हुये उद्योगों के क्षेत्र में बढ़ेगे तब सभी उद्योग स्वेच्छा, सुगमता, सरलता और एक-दूसरे को समझते हुये सहभागिता से संचालित होगा। तुम सार्वजनिक घोषणा क्यों नहीं कर देते कि पूर्ण संागठनिक सफलता का यही मूल मंत्र और सूत्र है।

38. हे नारियों क्या तुम जानती हो कि तुम्हारा ज्ञानी और ध्यानी बनना क्यों अतिआवश्यक है? तो सुनो, यह इसलिए आवश्यक है कि तुमसे वर्तमान और भविष्य दोनों निर्मित और प्रभावित होता है जबकि पुरूषों से सिर्फ वर्तमान ही प्रभावित और निर्मित होता है। यह कैसे होता है? तुम्हारे नियंत्रण में वर्तमान रूप-पति तथा भविष्यरूप-सन्ताने दोनों होती है। यही नहीं तुम्हीं से इन दोनों का मन निर्माण होता है। तुम्हारे पास जितना ज्ञान और ध्यान होता है वही अधिकतम सम्पर्क में रहने वाले सन्तानों और पति पर प्रभावी होकर उसी रूप में उनका निर्माण कर देता है। इसलिए हे नारियों, तु अपने व्यक्तिगत जीवन, पारिवारिक जीवन एवम् नारी जाति के सर्वांगीण विकास और पूर्णता का अति-आवश्यक ही नहीं इस अन्तिम रास्ते को पहचान तथा अवश्य ही ज्ञानी और ध्यानी बन।

39. हे युवाओं क्या तुम जानते हो महत्वाकांक्षी होने से क्या लाभ हैं? इससे लाभ यह होता है कि व्यक्ति के अन्दर कर्म की प्रबलता का सतत प्रवाह बढ़ता जाता है। और तुम हर क्षण अपने लक्ष्य को पाने के लिए कर्मशील, विचारक एवम् नीतिज्ञ गुणों को अपने अन्दर विकसित करते रहते हो जो तुम्हारे जीवन के लिए अतिआवश्यक है। परन्तु हे युवाओं महत्वाकांक्षा का यह अर्थ नहीं कि तुम अपने लक्ष्य को बिना योग्यता के ही प्राप्त करने का प्रयत्न करो, ऐसा कर तुम स्वयं को विनाश की ओर ही ले जाओगें क्यांेकि ऐसे में तुम निश्चित रूप से गलत साधनों का ही प्रयोग करोगे। महत्वाकांक्षी बनकर तुम उन योग्यताओं को प्राप्त करो जो तुम्हारे लक्ष्य के लिए सहायक और आवश्यक हो। इसलिए हे युवाओं, तू महत्वाकांक्षी बन और अपने जीवन के उद्देश्य को निश्चित कर उसे पाने का सतत प्रयत्न कर।

40. हे मानवों, क्या तुम जानते हो प्रतिज्ञा या संकल्प के क्या लाभ हैं? तो सुन, प्रतिज्ञा और संकल्प लेने से तुम्हें स्वयं को नियंत्रित करने का आधार प्राप्त होता है। परन्तु हे मानवों? प्रतिज्ञा और संकल्प को अपने जीवन का अन्तिम लक्ष्य कभी न बनाना क्योंकि कोई भी प्रतिज्ञा या संकल्प तुम्हारा जीवन नहीं हो सकता, वह जीवन को नियंत्रित करने का माध्यम मात्र होता है। इसलिए तू स्वयं को नियंत्रित करने के लिए संकल्प या प्रतिज्ञा कर अन्ततः उसके पालन का प्रयत्न कर और जब न पूर्ण हो सके तो नये व्यापक प्रतिज्ञा या संकल्प द्वारा उसे तोड़़ दे क्योंकि ध्यान रख प्रतिज्ञा करने वाला स्वेच्छा से, तू ही है। और स्वेच्छा से प्रतिज्ञा या संकल्प तोड़ने वाला भी तू ही हैं। इसमें दूसरे व्यक्ति का कोई लेना-देना नहीं है न ही उनके बातों पर ध्यान देने योग्य है क्यांेकि वे तो बिना प्रतिज्ञा के तुमसे भी निम्न कोटि के ही है। इसलिए हे मानवों, तू स्वयं को बाॅधने और नियत्रिंत करने के लिए प्रतिज्ञा या संकल्प ले।

41. हे मानवों, क्या तुम सिर्फ उगे या उगते हुये सूर्य को ही प्रणाम करते हो? या करना चाहते हो? तब तो तुम मूर्ख हो क्यांेकि उगते या उगे सूर्य को तो सभी प्रणाम करते हैं फिर तुममें और अन्य में कोई अन्तर नहीं हैं। उगता सूर्य या उगा सूर्य तो सभी को एक समान प्रकाश देता है। उसके सामने कोई विशेष नहीं होता, न ही कोई उसका अपना होता है। विशेष और अपना तो वह है जो यह पहचानता  और जानता है कि वह सूर्य है जो उगने के लिए ही अभी डुबा हुआ है। तब भी उसे श्रद्धा भाव से प्रणाम करता है। इसलिए हे मानव, तू उस उगने के लिए डुबे सूर्य की पहचान कर और उसे प्रणाम कर इससे तुममे श्रद्धा भाव और आस्था भाव उत्पन्न होगा और उगे हुये सूर्य के लिए तुम अनायास ही विशेष रूप से पहचाने जाओंगे। 

42. हे मानवों, क्या तुम जानते हो, कत्र्ता और द्रष्टा बनने से क्या लाभ है? तो सुन, कत्र्ता और द्रष्टा बनने से तुम्हें अपने ही कर्मो का निरीक्षण, गलतिया सुधारने का अवसर, कार्यकुशलता इत्यादि का ज्ञान प्राप्त होता है। सिर्फ कत्र्ता बनने से तुम्हें सिर्फ कर्मो का फल ही बार-बार भुगतना पड़ता है और सिर्फ द्रष्टा बनने से तुममे समय की उपयोगिता की पहचान का गुण समाप्त हो जाता हैं। परिणाम स्वरूप तुम सिर्फ मूकदर्शक बन जाते हो। क्या तुम नहीं जानते कि मूकदर्शक के हाथ कुछ नहीं लगता उसके पास से ही उसका लक्ष्य विकास और सफलता का मार्ग एवम् अवसर निकल जाता है और वह द्रष्टा ही बना रह जाता है। इसलिए हे मानव, तू न तो सिर्फ कत्र्ता बन न ही सिर्फ द्रष्टा बन बल्कि तू कत्र्ता और द्रष्टा दोनों बन यही तुम्हें जीवन संघर्ष में समयानुसार आगे की ओर ले जाने में सक्षम है।

43. हे ज्ञानी और सिद्धान्तवादी मानवों, ज्ञानी और सिद्धान्तवादी होना महत्वपूर्ण उपलब्धि है परन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि अपने ज्ञान व सिद्धान्त में दृढ़ता के कारण तुम विस्तृत कार्य क्षेत्र के अन्य ज्ञानी और सिद्धान्तवादी स्व रूप मानवों की पहचान ही न करो और न ही उसकी सहायता करो। इससे तो तुम्हारा ही अस्तित्व समाप्त हो जायेगा क्योंकि तुम उससे तो जुड़ ही नहीं पाओगे। हे ज्ञानी और सिद्धान्तवादी मानवों, ज्ञानी और सिद्धान्तवादी होने का अर्थ है- ज्ञानी और सिद्धान्तवादी के साथ स्व रूप मानवों के साथ उदारता, न कि दृढ़ता। समान विषय के ज्ञानी और सिद्धान्तवादी अनेक हो सकते हैं। यदि वे एक साथ न आये तो क्या समान विषयों के ज्ञानी और सिद्धान्तवादीयों का समाज बन सकता है?, कदापि नहीं। और तुम सब अलग-अलग समाप्त हो जाओगे। फिर ज्ञानी और सिद्धान्तवादी होने का अर्थ क्या होगा? इसलिए अपने विषय के ज्ञानी और सिद्धान्तवादी की पहचान करो और उसके कर्म क्षेत्र के विस्तार के अनुसार बिना समय गवाॅयें, स्वयं को उस स्तर पर स्थापित करो, यही शरीरोपरान्त भी अस्तित्व यथावत् रखने की बुद्धि है।

सत्य-अर्थ

सत्य-अर्थ 


(1) सम्बन्ध का सत्य आधार
(2) सिर्फ ज्ञानी होना कालानुसार अयोग्यता ही नही सृष्टि में बाधक भी
(3) सफलता की सरल और कालानुसार विधि
(4) ध्यान अभ्यास की कालानुसार विधि
(5) निर्माण के मार्ग और पूर्वी तथा पश्चिमी देशांे के स्वभाव
(6) मैं भविष्य या तू भूत? और वर्तमान का सत्य अर्थ
(7) आस्था या मूर्खता ? और आस्था का सत्य अर्थ
(8) ”निर्माण और उत्पादन“ भावना की उपयोगिता
(9) भारत और सयंुक्त राष्ट्र संघ को आह्वान
(10) ईश्वर, देवता और विज्ञान
(11) विद्रोही या सार्वजनिक प्रमाणित कृष्णकला समाहित विश्वमानव कला
(12) पहले संविधान या मनुष्य?
(13) नया, पुराना और वर्तमान
(14) मुझे (आत्मा) को प्राप्त करने का मार्ग
(15) प्राथमिकता किसकी- चरित्र की या सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त की?
(16) व्यक्त होने का कारण और व्यक्त होने में कष्ट
(17) कालजयी, जीवन और व्यर्थ साहित्य
(18) भाग्य और कर्म
(19) अवतार, महापुरूष और साधारण मानव
(20) मनुष्य जीवन के प्रकार
(21) गुरू के प्रकार

(1) सम्बन्ध का सत्य आधार
”मैं जब भी आता हूँ, व्यक्ति मुझे पूर्व के नियमों और सांसारिकता में बँाधना चाहते हैं परन्तु मैं उन नियमों में बँधने जैसा दिखते हुये भी उससे सदा मुक्त रहता हँूू। नियम सांसारिक मनुष्य के लिए होते हैं। मेरा नियम सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त है। मैं स्वयं इसको व्यक्त कर इसी के अनुसार ही संचालित होता हूँ। मेरे सम्बन्धों का आधार सांसारिक सम्बन्ध रक्त और रिश्ता पर आधारित नहीं होता। मेरे सम्बन्धों का आधार नाम, रूप, गुण, कर्म, ज्ञान, काल, ध्यान, भाव और मेरा शास्त्र होता है। सार्वभौम सत्य-सिद्वान्त ही मेरा शास्त्र है। यही मेरी विधि है। इसी से मैं योगमाया और भोगमाया का संचालन करता हँू। इसी से मैं अपने पूर्व के सम्बन्धियों को वर्तमान में पहचान करता हँू। इसी के अनुसार मैं सदा से व्यक्त और अव्यक्त होता रहा हूँ“

(2) सिर्फ ज्ञानी होना कालानुसार अयोग्यता ही नही सृष्टि में बाधक भी
”ज्ञानी अर्थात समभाव अर्थात् सभी को उसी एक के रूप में देखना अर्थात् तू भी वही मैं भी वही अर्थात् व्यक्त और अव्यक्त एक समान अर्थात असमानता के पहचान से मुक्त अर्थात नीति मुक्त अर्थात शासकीय गुण से मुक्त अर्थात सत्य से युक्त और सिद्धान्त से मुक्त अर्थात् काल से मुक्त अर्थात परिणाम ज्ञान से मुक्त अर्थात अपने स्तर पर ही यथावत रहते हुये कर्मशील अवस्था। यह अवस्था वर्तमान दृश्य काल के लिए कालानुसार नहीं है अर्थात् अयोग्य भी है और बाधक भी। वर्तमान दृश्य काल की अवस्था ध्यान अर्थात ज्ञान का समय के साथ योग अर्थात् सभी को समभाव देखते हुये भी असमान देखना अर्थात् व्यक्त और अव्यक्त असमान अर्थात नीतियुक्त अर्थात शासकीय गुण से युक्त अर्थात सार्वभौम सत्य-सिद्वान्त से युक्त अर्थात् काल से युक्त अर्थात परिणाम ज्ञान से युक्त समभाव के साथ अपने स्तर से उच्चतम की ओर गति करते हुये अन्य को भी उच्चतम की ओर ले जाने की अवस्था है। व्यक्ति से विश्व स्तर तक के ज्ञान से समय को जोड़कर जो जितने विस्तार के कर्मक्षेत्र में स्वयं को व्यक्त कर सकता है। वह उतना ही व्यापक ध्यानी होगा। क्योंकि तभी उसका ज्ञान प्रमाणिकता को व्यक्त होगा। अर्थात ज्ञान ही ज्ञान नहीं, ध्यान ही ज्ञान है। ज्ञान हृदय को अच्छी लगने वाली सत्य-वाणी है तो ध्यान जीवन को संचालित करने वाला व्यावहारिक सिद्धान्त है। ध्यानी, ज्ञानी को सिर्फ उतनी ही सूचना देते हैं जो कालानुसार होती है। क्योंकि ज्ञानी बिना परिणाम ज्ञान सोचे ही व्यक्त कर देते हंै। ध्यानी परिणाम के पूर्व जोड़ना चाहते है। परन्तु ज्ञानी परिणाम के बाद जुड़ना चाहते हैं। जबकि परिणाम के बाद जुड़ने की आवश्यकता ही नहीं रह जाती क्योंकि कार्य सम्पन्न हो जाता है। इसलिए ज्ञानी सृष्टि में बाधक भी होते हैं। ध्यानी योजनाबद्ध कार्य करते हैं जिससे परिणाम उनके अधीन होता है। जबकि ज्ञानी योजनामुक्त कार्य करते हैं। इसलिए परिणाम अन्य के अधीन होता है। पुराणों में ज्ञानी के प्रक्षेपण ब्रह्मा तथा ध्यानी के प्रक्षेपण शिव-शंकर है।“

(3) सफलता की सरल और कालानुसार विधि
”स्वयं को विलीन अर्थात स्व या अहंकार को भुलाकर अपने रुचि के विषय क्षेत्र की वैश्विक स्थिति के अनुसार किसी भी प्रकार वैधानिक मार्ग से स्वयं का निर्माण अर्थात योग्य बनाकर उससे जोड़ देना सफलता का सरल और कालानुसार विधि है।“

(4) ध्यान अभ्यास की कालानुसार विधि
  ”जब तू भी ईश्वर, मैं भी ईश्वर अर्थात् सभी ईश्वर। तब स्वयं अपने आप की पूरी तस्वीर अपने समक्ष रख मन को एकाग्र कर यह चिंतन करना कि- ‘मैं इस शरीर से कैसे-कैसे विभिन्न प्रकार के कर्म कर रहा हँू, ध्यान अभ्यास की सरल विधि है। अभ्यास होने के उपरान्त ध्यान के कालानुसार विषय पर चिंतन, मन को एकाग्र कर करना ध्यान की सर्वोच्च, सर्वोत्तम और कालानुसार विधि है।“

(5) निर्माण के मार्ग और पूर्वी तथा पश्चिमी देशांे के स्वभाव
विभिन्न मतों द्वारा निर्माण के मार्ग का सूत्र है- ‘मतवाद के मार्ग से व्यक्ति, धर्म, राष्ट्र, मन्त्र, यन्त्र और तन्त्र का निर्माण’। स्वामी विवेकानन्द द्वारा निर्माण के मार्ग का सूत्र है-‘धर्म के मार्ग से व्यक्ति, धर्म, राष्ट्र, मन्त्र, यन्त्र और तन्त्र का निर्माण’। पं0 नारायण दत्त ‘श्रीमाली’ द्वारा निर्माण के मार्ग का सूत्र है- ‘मन्त्र, यन्त्र और तन्त्र के मार्ग से व्यक्ति, धर्म, राष्ट्र, मन्त्र, यन्त्र और तन्त्र का निर्माण’। आचार्य रजनीष ‘ओशो’ द्वारा निर्माण के मार्ग का सूत्र है- ‘व्यक्ति के मार्ग से व्यक्ति, धर्म, राष्ट्र, मन्त्र, यन्त्र और तन्त्र का निर्माण’। योगाचार्य बाबा रामदेव द्वारा निर्माण के मार्ग का सूत्र है- ‘योग के मार्ग से व्यक्ति, धर्म, राष्ट्र, मन्त्र, यन्त्र और तन्त्र का निर्माण’। मेरे द्वारा निर्माण के मार्ग का सूत्र है-‘राष्ट्र के मार्ग से व्यक्ति, धर्म, राष्ट्र, मन्त्र, यन्त्र और तन्त्र का निर्माण’। और मेरे राष्ट्र का अर्थ सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि विश्व सहित ब्रह्माण्ड है यदि भारत इस पर कार्य करता है तो साकार भारत सहित निराकार भारत अर्थात् विश्वभारत का निर्माण होगा अन्यथा सिर्फ निराकार भारत अर्थात् विश्वभारत का निर्माण होगा क्योंकि कम से कम लाभ और नीतिगत विषयों में पश्चिमी देश भारत से अधिक समझदार, क्रियाशील और अनुकूलन क्षमता वाला है। पश्चिमी देश इसे वैश्विक शासन की दृष्टि से देखेंगे जबकि भारत के नेतृत्वकर्ता पहले व्यक्तिगत लाभ का गणित आलस्य के साथ लगायेंगे। भारत के नेतृत्वकर्ता इस अज्ञानता में न पड़े कि जनता ज्ञानी, शिक्षित हो जायेगी तो उनके पद पर संकट आ जायेगा। ज्ञानी, शिक्षित होना चमत्कार नहीं एक लम्बी अवधि की प्रक्रिया है इसलिए नेतृत्वकर्ता राजनीतिज्ञ का वर्तमान जीवन तो उनके वर्तमान चरित्र के साथ ही व्यतीत हो ही जायेगी। यह एक युग कार्य है, कालजयी कार्य है जो राजनीति क्षेत्र नहीं दे सकती। ये है परिणाम का ज्ञान।

(6) मैं भविष्य या तू भूत? और वर्तमान का सत्य अर्थ
”तुम्हारें समझने, न समझने, मानने या न मानने से मेरे ऊपर कोई अन्तर नहीं पड़ता क्योंकि मेरा कार्य सिर्फ इतना था कि जिस प्रकार तुम वेद-उपनिषद्-पुराण का मार्गदर्शन आज भी अपने जीवन में प्रयोग करते हो। उसी प्रकार जब भी सत्य जीने की कला, पूर्ण ज्ञान-कर्मज्ञान, व्यक्ति प्रबन्ध और विश्व प्रबन्ध के क्षेत्र में आगे बढ़ो तो तुम्हें कर्मवेदः प्रथम, अन्तिम तथा पंचमवेद अर्थात् विश्वमानक - शून्य: मन की गुणवत्ता का विश्वमानक श्रृंखला से मार्ग दर्शन लेना ही पड़े या तुम इसमें ही विलीन हो जाओं। तुम समझते हो मैं या कोई अवतार भविष्य की बातें कहता है- कदापि नहीं, वह सदा वैयक्तिक और वैश्विक-रूप से वर्तमान होता है, तुम्हें भविष्य इसलिए लगता हैं क्योंकि तुम वैयक्तिक और वैश्विक रूप से भूतकाल होते हो। क्योंकि तुम सपनों में विचरण करते हो। ऐसे व्यक्तियों के विरोध और समर्थन दोनों के प्रभाव से मैं मुक्त होता हूँ। वर्तमान में होने का अर्थ यह नहीं है कि वैयक्तिक रूप से ही तुम वर्तमान में रहो। इसका अर्थ यह है कि तुम वैयक्तिक सहित वैश्विक रूप से वर्तमान में रहो। मैं वर्तमान से योग करने के लिए ही तो व्यक्त होता हूँ?“
(7) आस्था या मूर्खता ? और आस्था का सत्य अर्थ
”मैं (सार्वभौम आत्मा) अदृश्य रूप से भोग करते-करते यह संकल्प लिया कि मेरे इस सत्य रूप को संसार देखे। इसके लिए मैंने मानव शरीर को योग्य समझा और उसे संस्कारित करने की योजना बनाई और फिर विभिन्न शरीरों के माध्यम से संस्कारित करने के लिए शब्द, वेद, उपनिषद, अरण्यक, ब्राह्मण, वेदांग, स्मृति, मूर्ति, दर्शन, पूजा-उपासना, कर्मकाण्ड, यज्ञ, गृहसूत्र, धर्मसूत्र और वैयक्तिक आश्रम, सामाजिक आश्रम, प्रबन्ध सूत्र, शासन सूत्र इत्यादि की श्रृंखला को व्यक्त किया। परिणामस्वरूप मनुष्य शरीर मेरे योग्य बना। और मैं सर्वप्रथम इन समस्त संस्कारित करने की क्रिया को एकीकृत अर्थात् योग कर भोगेश्वर समाहित योगेश्वर रूप में व्यक्तिगत प्रमाणित रूप से व्यक्त होकर योगेश्वर रूप में संस्कारित करने के लिए गीतोपनिषद् को व्यक्त किया। फिर मैं अपने सत्य रूप सम्पूर्ण विषयों का भोग करते हुये योगेश्वर समाहित भोगेश्वर रूप में सार्वजनिक प्रमाणित रूप से व्यक्त होकर भोगेश्वर रूप में अन्तिम रूप से संस्कारित करने के लिए कर्मवेदः प्रथम, अन्तिम तथा पंचमवेद को व्यक्त कर दिया। परन्तु मैं देख रहा हूँ कि प्रत्येक संस्कारित करने की क्रिया जो उस काल के लिए आस्था का विषय था। उसके अगले काल के लिए संस्कारित करने की नयी क्रिया उपलब्ध हो जाने के बावजूद, मानव शरीर पिछले काल के संस्कारित करने वाली क्रिया के प्रति आस्था रखते हुये मूर्खता का स्पश्ट प्रदर्शन कर रहा है। सभी कालों में, सभी संस्कारित करने की क्रियाओं में मैं (सार्वभौम आत्मा) ही आस्था का विषय था परन्तु क्रिया के प्रति आस्था रखना मूर्खता का स्पष्ट प्रमाण ही तो है। चाहे वह व्यक्तिगत इच्छा से हो या सामाजिक प्रदर्शन की इच्छा से। इन समस्त संस्कारित करने के क्रिया के पीछे जो रहस्य आज तक गोपनीय था उसे मैंने तुम्हारें समक्ष सार्वजनिक प्रकाशित कर दिया है। अब कुछ भी गोपनीय नहीं। बावजूद इसके प्रत्येक मनुष्य अपनी मूर्खता रूपी आस्था को प्रदर्शित करने के लिए स्वतन्त्र है। परन्तु वह मुझ (सार्वभौम आत्मा) को प्राप्त नहीं कर सकता।“
 
(8) ”निर्माण और उत्पादन“ भावना की उपयोगिता
”निर्माण और उत्पादन“ आज के विकसित औद्योगिक युग में यह शब्द न तो अनजाना है और न हम यह कह सकते हैं कि हमारा व्यक्तिगत और सार्वजनिक जीवन इस शब्द में व्याप्त नहीं है। बल्कि यह कहें तो अधिक स्पष्ट होगा कि हम सभी के मन अन्य संगठन, दल, व्यक्ति, मत, विचार, देश, राज्य, विश्व, प्रकृति, ब्रह्माण्ड इत्यादि के प्रक्रिया द्वारा निर्मित और उत्पादित हो रहे है। और हम सभी स्वयं अपने अधीन अन्य मानव शरीर के मन को निर्मित और उत्पादित कर रहे है। इसलिए व्यक्ति, संगठन, दल, मत, देश व विश्व को यह सदा ध्यान में रखना होगा कि हम किसी के द्वारा निर्मित और उत्पादित हो रहे हैं तो किसी का निर्माण और उत्पादन हम कर रहे हैं। और प्रत्येक निर्माणकत्र्ता और उत्पादनकत्र्ता, स्वयं अपने उद्देश्य की प्राप्ति के लिए ही निर्माण और उत्पादन करता है। और इस कार्य में लगने वाले मनुष्य को उसका पारिश्रमिक विभिन्न रूपों- धन, नाम, यश, कीर्ति, आत्मीय सुख, सम्मान, इत्यादि के रूप में भुगतान होता है। आतंकवाद, धर्मनिरपेक्षता, दल या मत आधारित सम्प्रदाय इत्यादि का यही सूत्र है। इसलिए व्यक्ति को स्वयं अपने लिए यह ध्यान रखना होगा कि वह कहीं ऐसे विचार से निर्मित तो नहीं हो रहा जो स्वयं उसके लिए और देश सहित विश्व और ब्रह्माण्ड के लिए विनाशात्मक हो। क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति के विश्व व्यापक होने के लिए उसके जन्म से ही उसके निर्माण की प्रक्रिया माता-पिता, भाई-बहन, रिश्तेदार, पड़ोस, जाति, धर्म, मित्र, मत-सम्प्रदाय, नियम-संविधान, संघ, दल, संगठन, प्रदेश, देश इत्यादि अनेकों वातावरण द्वारा होती है। जो विश्वव्यापक होने के मार्ग में बैरियर है और व्यक्ति को इसे स्वीकार करते हुये पार करना होगा। इसलिए आवश्यक है कि पहले वह मन की सर्वोच्च और अन्तिम स्थिति-विश्वमन के व्यक्तरूप विश्वमानक: शून्य श्रृंखला से युक्त हो और फिर वहाँ से नीचे की ओर देखते हुये अपने स्वभाव को स्वीकार करे। ताकि उसका उच्च मानसिक स्तर द्वारा गलत उपयोग न हो सके।“


(9) भारत और सयंुक्त राष्ट्र संघ को आह्वान
”शासन और शासक, विकासात्मक हो या विनाशात्मक। प्रणाली कोई भी हो- एकतन्त्रात्मक अर्थात राजतन्त्र या बहुतन्त्रात्मक लोकतन्त्र। वह तब तक अब स्थायी और अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो सकता जब तक कि वह अपने उद्देश्य की प्राप्ति के अनुरूप जनता का निर्माण और उत्पादन न करें। हमारा उद्देश्य है- ‘अपने सीमित कर्म सहित असीम मन युक्त मानव का निर्माण और उत्पादन’, जिसके लिए हमारे सम्मुख दो मार्ग है- एक-गणराज्यों का संघ भारत, दुसरा-राष्ट्रों का संघ संयुक्त राष्ट्र संघ। दोनों एक ही है। बस कर्म क्षेत्र की सीमा में अन्तर है। दोनों का उद्देश्य एक है बस कार्य अलग है। भारत का अपने जनता के प्रति कर्तव्य और दायित्व तथा विश्व के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा ऐसी विवादमुक्त प्रबन्ध नीति उपलब्ध कराना है जिससे दोनों अपने उद्देश्य को निर्वाध गति से प्राप्त करें। जबकि संयुक्त राष्ट्र संघ को सिर्फ अपने अधीन कार्य सम्पादन ही करना मात्र है। उसे प्रबन्ध नीति का आविष्कार नहीं करना है। वह कर भी नहीं सकता और न ही किया क्योंकि वह पाश्चात्य के प्रभाव मण्डल में है। पाश्चात्य के पास सत्य के आविष्कार का इतिहास नहीं है। जबकि प्राच्य के पास सनातन से सत्य के आविष्कार का व्यापक संक्रमणीय, संग्रहणीय और गुणात्मक रूप से अनुभव संग्रहीत है। अब भारत व्यक्तिगत प्रमाणित भाव आधारित सत्य नहीं कहेगा क्योकि अब सार्वजनिक प्रमाणित कर्म, व्यक्त और मानक आधारित समय आ गया है। जो विश्व व्यापी रूप से पदार्थ विज्ञान और आध्यात्म विज्ञान सहित प्राच्य और पाश्चात्य संस्कृतियों में सार्वजनिक रूप से प्रमाणित होगा। और उस विवादमुक्त प्रबन्ध नीति से जब मूल अधिकार शिक्षा द्वारा मनुष्य का निर्माण और उत्पादन होगा। तब भारत तथा संयुक्त राष्ट्र संघ को उसका उद्देश्य प्राप्त होगा अन्यथा वह रोको-रोको, निरोध-निरोध वाले कानून में ही अधिकाधिक समय व धन खर्च करता रहेगा। जिसकी जटिलता बढ़ते ही जाना है। भारत और संयुक्त राष्ट्र संघ दोनों में से किसी के प्रारम्भ से मनुष्य का ”विश्वमानव“ के रूप में निर्माण और उत्पादन प्रारम्भ हो जायेगा। विश्व के सभी देशों के बीच संस्कृतियों का मिश्रण तेजी से हो रहा है ऐसी स्थिति में उसे मानव संसाधन जो कि समस्त निर्माण और उत्पादन का मूल है, का भी विभिन्न विषयों की भांति मानकीकरण तथा विश्व प्रबन्ध के लिए प्रबन्ध का मानकीकारण करना ही होगा। सम्पूर्ण विश्व में निर्माण से उत्पन्न उत्पाद की गुणवत्ता का मानक, संस्था की गुणवत्ता ISO-9000 फिर प्रकृति के कत्र्तव्य व दायित्व को स्वयं का कर्तव्य व दायित्व मानकर पर्यावरण की गुणवत्ता का मानक ISO-14000 स्वीकारा जा चुका है तो फिर गुणवत्ता से युक्त प्रकृति की भाँति स्वयं मनुष्य अपना गुणवत्ता का मानकीकारण कब करेगा? वह मार्ग जो अभी तक उपलब्ध नहीं था वह  विश्वमानक: शून्य (WS-0) - मन की गुणवत्ता का विश्व मानक श्रृंखला के रूप में उपलब्ध हो चुका है जो मेरा कत्र्तव्य था और अब अन्य मानवों का अधिकार है। संसाधन, ज्ञान-विज्ञान, तकनीकी से युक्त पृथ्वी कमल की भाँति खिलने को उत्सुक है, मानवता का रचनात्मक सहयोग लेकर भारत तथा संयुक्त राष्ट्र संघ, उसके खिलने में सहयोग करें जो उसका कर्तव्य और दायित्व है। जिस पर मनुष्य ईश्वर रूप में विराजमान हो सके।
(10) ईश्वर, देवता और विज्ञान
”जिस प्रकार दृश्य पदार्थ विज्ञान अपने रसायन विज्ञान द्वारा यह कहता है कि सम्पूर्ण दृश्य जगत नाभिक (न्यूट्राॅन और प्रोटान) और इलेक्ट्रान से युक्त परमाणु के संयुग्मन से व्यक्त तत्वों और उसके संयुग्मन से व्यक्त यौगिक द्वारा व्यक्त है तथा प्रत्येक में शक्ति है जिसका अध्ययन वह अपने भौतिक विज्ञान द्वारा करता है। ठीक उसी प्रकार अदृश्य आध्यात्म विज्ञान अपने आत्म विज्ञान द्वारा यह कहता है कि यह सम्पूर्ण दृश्य जगत आत्मा (मार्ग दर्शक और विकास दर्शन या सत्व गुण) और मन (क्रियान्वयन दर्शन) से युक्त सूक्ष्म के संयुग्मन से व्यक्त स्थूल और उसके संयुग्मन से व्यक्त यौगिक द्वारा व्यक्त है। तथा प्रत्येक में शक्ति है जिसका अध्ययन वह अपने तन्त्र विज्ञान द्वारा करता है।
मैं भारत (सार्वभौम आत्मा) सत्य स्वरूप में सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को अपना स्वरूप समझा और अपने स्वरूप को ब्रह्माण्ड समझा और उसी से व्यक्त सभी ग्रह, नक्षत्र, तारे, सूर्य, पृथ्वी, अग्नि, वायु, नदी, वृक्ष, अन्य जीव, जल इत्यादि को माना। मैं भारत (सार्वभौम आत्मा) को शिव तथा सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में सर्वव्यापी परिवर्तन या आदान-प्रदान या तन्त्र को शक्ति के रूप देखा। और जहाँ भी जिसमें भी व्यक्तिगत या सामूहिक जीव शरीर को प्रभावित कर देने वाली आदान-प्रदान की शक्ति को पाया उसे, उसके आत्म रूप को देवता तथा तंत्र रूप को देवी शक्ति का रूप दिया। इस प्रकार हम उनके प्रभाव के प्रति समर्पण या भक्ति, उपासना और पूजा करने लगे। परिणामस्वरूप हमारे पास इतने देवी-देवता हो गये कि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड ही हमारे लिए देवी-देवता है। और यदि ऐसा नहीं है तो निश्चय ही हमारा शरीर स्थायी होता।
पदार्थ विज्ञान अपने प्रत्येक आविष्कार द्वारा यह सिद्ध करता चला गया कि वायु देवता नहीं, विभिन्न गैसों का मिश्रण है, जल देवता नहीं हाइड्रोजन और आक्सीजन का यौगिक है, चन्द्रमा देवता नहीं पृथ्वी का उपग्रह है, मंगल, बृहस्पति इत्यादि देवता नही ग्रह हैं इत्यादि। ऐसा सार्वजनिक प्रमाणित रूप से मैं भारत भी मानता हँू परन्तु क्या पदार्थ विज्ञान यह बता सकता है कि उसे जान लेने मात्र से तथा उसके कुछ प्रभाव पर नियत्रंण प्राप्त हो जाने से उसके पूर्ण प्रभाव से कब तक बचा जा सकता है? हम कभी नहीं बचे और न कभी बच सकते हैं। हमें उससे हारना ही होगा। हमें उससे हारना ही है। हमने उन्हें देवी-देवता रूप में, इस रूप में नहीं देखा था जैसा कि वर्तमान में समझा जाता है। वर्तमान में समझा जाने वाला रूप जो मूर्तियों में दिखाई देता है वह उनके गुणों को प्रदर्शित करता मानवीय रूप में प्रक्षेपण है। क्योंकि मनुष्य या कोई भी प्राणी जब भी अपने ईश्वर की कल्पना करेगा तो वह स्वयं जैसे शरीर से युक्त अनेक गुणों के साथ ही देखेगा। हमने ईश्वर को सिद्वान्त या आदान-प्रदान या परिवर्तन से युक्त शरीर रूप में स्वीकारा था। जो जीवों को व्यक्तिगत या सामूहिक रूप से अनियंत्रित रूप में प्रभावित करती थी चाहे वह लाभकारी हो या हानिकारक। हम भारतीय सगुण मानव शरीर को ईश्वर के व्यक्त अवतार रूप में सिर्फ उसी को मानते है। और स्वीकार करते हो जो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को एकात्म रूप में स्वीकार करते हुये उसके स्थायित्व के लिए ब्रह्माण्ड और प्रकृति के सिद्धांतानुसार प्रबन्ध नीति स्थापित करता है। और उसका यह विचार सदैव सत्य रूप में विद्यमान रहता है। हम भारतीय ऐसे किसी सगुण मानव शरीर को ईश्वर रूप में स्वीकार नहीं करते जिसकी सीमा मात्र जीव जगत तक ही व्यक्त और एकात्म करने की होती है। क्योंकि ऐसे जीव मानव का विचार एक निश्चित समय तक ही विद्यमान रहकर विलीन हो जाता है। शरीर तो सभी का ही परिवर्तित होना निश्चित है।
(11) विद्रोही या सार्वजनिक प्रमाणित कृष्णकला समाहित विश्वमानव कला
मैं कभी भी किसी भी जीवन में विद्रोही नहीं था और न हँू, क्योकि विद्रोह तो उसे कहते है जो सामाजिक धारा, इन्द्रिय, सांसारिकता और सांसारिक प्रबन्ध का पूर्ण विरोध करता है। व्यक्तिगत प्रमाणित अदृश्य रूप से सर्वप्रथम मैं (सार्वभौम आत्मा) ”लव कुश“ के रूप में व्यक्ति ”राम“ के विरूद्ध चलकर ”राम“ में ही समाहित हो गया। व्यक्तिगत प्रमाणित दृश्य रूप से मध्य में मैं (सार्वभौम आत्मा) ”कृष्ण“ के रूप में समाज की धारा के विरूद्व चलकार समाज की धारा में ही व्यक्तिगत रूप से समाहित हो गया। इसलिए धारा के विरूद्ध अर्थात ”राधा“ प्रिय होते हुये भी मेरा लक्ष्य ”राधा“ नहीं थीं यही मेरा व्यक्तिगत प्रमाणित दृश्य कला अर्थात् व्यक्तिगत प्रमाणित दृश्य कृष्णकला थी। सार्वजनिक प्रमाणित दृश्य रूप से अन्त में मैं (सार्वभौम आत्मा) ”विश्वमानव“ के रूप में विश्व की धारा के विरूद्व चलकर विश्व की धारा में ही सार्वजनिक रूप से समाहित हो गया। यह मेरी सार्वजनिक प्रमाणित कृष्ण कला है। जो मुझे प्रिय होते हुये भी मेरा लक्ष्य नहीं है। क्या मैं (सार्वभौम आत्मा) ”लव कुश“, ”कृष्ण“ और ”विश्वमानव“ के रूप में एक ही नही हँू? क्या मेरी प्रिय कला-समाज के विरूद्व ”राधा“ और ”कृष्णकला“ एक ही नहीं है।
प्रत्येक पूर्णावतार के जीवन में उसके व्यक्त होने की कला तथा अगले पूर्णावतार के व्यक्त होने की कला का संकेत रूप दिया रहता है। ब्रह्मा के पूर्णावतार श्रीराम के जीवन मे वर्तमान परिस्थितियों पर कर्म करना राम कला थी जबकि लव कुश का व्यवहार-विरूद्व फिर समाहित होना अगले पूर्णावतार की कला का व्यक्तिगत प्रमाणित अदृश्य संकेत रूप था। विष्णु के व्यक्तिगत प्रमाणित पूर्णावतार श्रीकृष्ण के जीवन में रामकला समाहित समाज की धारा के विरूद्व चलकर समाज की धारा में ही समाहित हो जाना कृष्ण कला थी। जो कि अगले पूर्णावतार की कला का व्यक्तिगत प्रमाणित दृश्य संकेत रूप था। शिव-शंकर के पूर्णावतार तथा विष्णु के सार्वजनिक प्रमाणित पूर्णावतार के जीवन में कृष्णकला का सार्वजनिक प्रमाणित दृश्य रूप है। जबकि विश्व की धारा जहाँ तक पहँुच चुकी है, वहाॅ से स्वयं को जोड़ लेना ”विश्वमानव कला“ है।
(12) पहले संविधान या मनुष्य?
पहले मनुष्य नियम बनाता है, फिर उस नियम से मनुष्य स्वयं चलने अर्थात निर्मित होने लगता है। जैसे तुम व्यक्तिगत नियम बनाते हो, फिर स्वयं उसी नियम से निर्मित होने लगते हो। यदि तुम नियम बनाने लगते हो तो तुम मनुष्य कहे जाते हो अन्यथा तुम प्रकृति के नियम से निर्मित होने वाले प्रकृति के नियम के ज्ञान से मुक्त पशुमानव हो, क्योंकि पशुओं का कोई नियम नहीं होता उनका सिर्फ स्वभाव होता है। इसी प्रकार जब समाज (व्यक्ति समूह) के लिए नियम बनता है। तो वह संयुक्त मन का नियम होता है जिसे संयुक्त मन से युक्त विशेष मनुष्य बनाते हैं। और फिर बनाने वाले मनुष्य सहित समाज के व्यक्ति उसी नियम से संचालित अर्थात निर्मित होने लगते है। जैसे शासन व्यवस्था के संचालन के लिए सर्वप्रथम संयुक्त मन से युक्त मानवों ने नियम अर्थात संविधान बनाया, फिर बनाने वाले सहित राज्य के नागरिक उसी नियम अर्थात संविधान से संचालित अर्थात निर्मित हो रहे है। अब इस नियम से कोई राष्ट्रपति है, कोई प्रधानमंत्री, तो कोई मंत्री, सांसद, विधायक, जिलाधिकारी, कर्मचारी इत्यादि। और जब तक इनके साथ नियम का गुण है तब तक ये है। नहीं तो वे मनुष्य नागरिक है। इस क्रम में हम देखते है कि पहले मनुष्य, फिर संयुक्त मन से युक्त विशेष मनुष्य, फिर नियम अर्थात संविधान है फिर नियम अर्थात संविधान से विशेष मनुष्य है, और फिर अन्त में मनुष्य। उदाहरण रूप में- यदि कोई संविधान से विधायक है तो उसका पुत्र भी विधायक पुत्र कहा जायेगा। और यदि उसका पुत्र आगे बढ़कर मुख्यमंत्री या नीचे गिरकर चोर या कुछ और भी बन गया अर्थात अपने पिता से अलग दुसरे गुण में चला गया तो वह उस विशेष गुण द्वारा जाना जायेगा। फिर उसके पिता के विधायक होने से नहीं जाना जायेगा।
मैं भी प्रकृति के नियम के ज्ञान से मुक्त पशु मानव था। फिर व्यक्तिगत नियम से युक्त मनुष्य बना, फिर प्रकृति के नियम के ज्ञान से युक्त ज्ञानी मानव बना, फिर व्यक्तिगत प्रमाणित सत्य ज्ञान से युक्तमानव बना, फिर व्यक्तिगत प्रमाणित सत्य ज्ञान और संयुक्त मन से युक्त मानव बना। फिर व्यक्तिगत प्रमाणित सत्य, व्यक्तिगत प्रमाणित सिद्वान्त और संयुक्त मन से युक्त मानव बना। फिर मैं व्यक्तिगत प्रमाणित सार्वजनिक सत्य, व्यक्तिगत प्रमाणित सिद्वान्त और संयुक्तमन से युक्त मानव बना अन्त में मैं सार्वजनिक प्रमाणित सार्वजनिक सत्य, सार्वजनिक सिद्वान्त और संयुक्त मन से युक्त मानव बना।
इस क्रम में मैं जब व्यक्तिगत प्रमाणित सत्य, व्यक्तिगत प्रमाणित सिद्वान्त और संयुक्त मन से युक्त मानव था, तब समाज की शासन व्यवस्था के संचालन के लिए नियम अर्थात संविधान निर्माण में सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में व्याप्त प्रकृति अर्थात स्वभाव को तीन भागों में गुणों के आधार पर विभाजित किया। (1) सत्व गुण- सुख, ज्ञान और प्रकाश का स्वभाव अर्थात आत्मा और सुक्ष्म बुद्धि अर्थात मार्ग दर्शक और विकास दर्शन। (2) रज गुण - आंकाक्षा, इच्छा, सकाम कर्म का स्वभाव अर्थात भाव हृदय और मन अर्थात क्रियान्वयन दर्शन (3) तम गुण- अज्ञान, दुःख और अन्धकार का स्वभाव अर्थात अनात्म, प्राण इन्द्रिय और स्थूल शरीर अर्थात विनाश दर्शन। इन गुणों के नियम के आधार पर सभी जीव विभाजित किये गये। मनुष्य में चार विभाजन हुए। (1) सत्व गुण प्रधान-ब्राह्मण (2) रज गुण प्रधान-क्षत्रिय (3) रज- तम गुण प्रधान वैश्य (4) तम गुण प्रधान- शुद्र। और इस नियम को बनानंे वाला स्वंय मैं और समाज इसी नियम से निर्मित होने लगा। जिस प्रकार तुम्हारे द्वारा निर्मित संविधान के अनुसार कोई विधायक तभी तक विधायक कहा जा सकता है। जब तक उस नियम का गुण उसके साथ है उसी प्रकार मेरे द्वारा निर्मित संविधान से कोई ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र तभी तक कहा जा सकता है। जब तक उस नियम का गुण उसके साथ है। और उसका पुत्र तभी तक ब्राह्मण पुत्र, क्षत्रिय पुत्र, वैश्य पुत्र, या शूद्र पुत्र कहा जा सकता है जब तक कि वह अपने पिता के गुण के अनुसार है। अन्यथा वह अपने गुण के अनुसार ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शुद्र होगा। क्योंकि पहले मनुष्य है। फिर मनुष्य उस नियम या गुण अनुसार है। अन्त में फिर पुनः मनुष्य है। तुम पहले गुण से नहीं, पहले नियम या गुण के अनुसार उसके पिता मनुष्य को देखते है और उस अनुसार ही सन्तान को भी देखते चले जाते हो। इसलिए तुम उलझ गये हो। जिस प्रकार संविधान बनाने वाला स्वयं संविधान के अनुसार विभाजित हो गया उसी प्रकार मैं भी मूल मनुष्य में विभाजन कर उसी में से एक हो गया। मूल मानव जाति कौन है? व्यक्तिगत प्रमाणित अदृश्य बीज-सत्य से मत मतान्तरों का वृक्ष, शाखा, पत्ते, फूल और फल बने और अन्त में सार्वजनिक प्रमाणित दृश्य बीज सिद्वान्त है। यही चक्र है। सभी विवाद-शाखा, पत्ते, फूल और फल में है।
(13) नया, पुराना और वर्तमान
जिस प्रकार वाहन-कार का आविष्कार हुआ। फिर उसका नवीन संस्करण आया, पुनः फिर उसका नवीन संस्करण आया। इस प्रकार नवीनीकृत किया जा रहा है परन्तु हैं सभी कार। इसी प्रकार सत्य का आविष्कार हुआ। फिर उसका नवीन संस्करण आया पुनः फिर उसका नवीन संस्करण आया। इस प्रकार नवीनीकृत किया जा रहा है। परन्तु हैं सभी सत्य। जिस प्रकार वाहन ”कार“ वर्तमान है उसी प्रकार सत्य भी वर्तमान है सिर्फ उसके व्यवहार में लाने के लिए संस्करण नवीन हो रहे है। नवीन संस्करण की पहचान तभी हो सकती है जब पुराने संस्करण की पहचान हो और उसका ज्ञान हो। अन्यथा वह सब पुराना ही लगेगा या नया ही लगेगा। नवीन संस्करण अधिक व्यवहारिक होता है। इसलिए वह अधिक क्रिया-प्रतिक्रियापूर्ण होता है और यदि क्रिया-प्रतिक्रिया पूर्ण नहीं है तो उसके दो कारण होगें। पहला नवीनत्व के पहचानने का अभाव या दूसरा वह संस्करण नवीन ही नहीं है ”कार“ हो या ”सत्य“ उसका नवीन संस्करण तब तक आता रहेगा जब तक कि वह पूर्ण विकसित और व्यावहारिक रूप को प्राप्त नहीं कर लेता। और सिर्फ वही संस्करण स्थिरता और व्यवहार में रहेगा जो पूर्ण व्यावहारिक और विकसित होगा। शेष विकास के क्रम के इतिहास के रूप में जाने जायेंगे। ऐसा ही होता हैं।
(14) मुझे (आत्मा) को प्राप्त करने का मार्ग
”जब मुझे तुमसे मिलना होता है तो पहले मैं भाव फिर कर्म व्यक्त करता हँू। तुम भी ऐसा ही करते हो और यदि तुम मुझसे मिलते हो तो पहले मैं कर्म फिर भाव द्वारा तुम्हें देखता है। यदि तुम मुझे प्राप्त करना चाहते हो तो मेरे लिए कर्म करो। तुम पहले भाव देखते हो, मैं पहले कर्म देखता हूँ यहीं तुममें और मुझमें अन्तर है“
(15) प्राथमिकता किसकी- चरित्र की या सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त की?
”चरित्र को प्राथमिकता देने से सार्वभौम सत्य-सिद्वान्त की अवनति होती है। सार्वभौम सत्य-सिद्वान्त को प्राथमिकता देने से चरित्र समाज का दर्पण बन समाज को ही प्रक्षेपित हो जाता है। वर्तमान समय को सार्वभौम सत्य-सिद्वान्त की प्राथमिकता की आवश्यकता है चरित्र की प्राथमिकता उसके बाद आयेगी। श्रीकृष्ण, सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त को प्राथमिकता देते थे। इसलिए ही उनका जीवन और मन समाज का दर्पण था और उनकी हिंसा, अहिंसा थी। परिणास्वरूप कहते हैं- ‘तेरा मन दर्पण कहलाये तू देखे और दिखाये’ अर्थात तू कत्र्ता भी है और द्रष्टा भी है।“

(16) व्यक्त होने का कारण और व्यक्त होने में कष्ट
”तपोभूमि भारत में निवास कर रहे देवताओं, यज्ञों की आहूतियों, ग्रहों के सम्मिलन, पूर्ण सूर्य एवम् चन्द्रग्रहण, पूर्वजन्म के संकल्प, सार्वभौम सत्य-सिद्वान्त की आवश्यकता, कर्म ज्ञान की भूख, समय की आवश्यकता, विश्वचिन्तकों की चिन्ता, मानवता के प्रति उठता दर्द, शहीदों की वर्तमान भारत पर रोती आत्माएँ, माताओं और विधवाओं के आँसू जिनके अपने भारत के लिए अपने खून बहाये, दलितों-मजदूरो जो शोषित होते हुए भी अपने खून-पसीने से भारत की इमारत को खड़ा किया, शान्ति के लिए परमाणु बम का विस्फोट, आधुनिक अस्त्र अर्थात कानून और नीति से विश्व शक्ति का आक्रमण, सेवकों का सेवाभाव, सखा और सखियों का असीम प्रेम, और इन सभी के साथ सम्पूर्ण विश्व सहित ब्रह्माण्ड के प्रति मेरा एकात्म प्रेम। ये ही मेरी शक्ति है। जिनके बल पर मै- सार्वभौम आत्मा व्यक्त हुआ हूँ। यदि ऐसा नहीं होता तो मैं भी तुम्हारी तरह अव्यक्त ही रहता। यह केवल मैं और सिर्फ मैं ही समझ सकता हूँ कि सभी मत-मतान्तर, अनेकों उपनिषद के एकीकरण और ऐकेश्वर की स्थापना सहित व्यक्तिगण प्रमाणित सार्वभौम आत्मा को प्रमाणित करने के लिए श्रीकृष्ण को योगेश्वर श्रीकृष्ण के रूप में व्यक्त होने में कितना सामाजिक व्यवधान उठाना पड़ा जबकि व्यक्तिगत कष्ट उन्हें नहीं के बराबर था। क्योंकि वे सार्वजनिक इच्छा पर व्यक्त हुए थे। और सिर्फ मैं ही यह समझ सकता हँू कि सम्पूर्ण और अन्तिम वैश्विक एकीकरण तथा ऐकेश्वर की स्थापना सहित आत्मा को सार्वजनिक प्रमाणित करने के लिए मुझे भोगेश्वर विश्वमानव के रूप में व्यक्त होने में कितना व्यक्तिगत व्यवधान उठाना पड़ा जबकि सार्वजनिक कष्ट नहीं के बराबर था क्योंकि मैं व्यक्तिगत इच्छा पर व्यक्त हुआ हूॅ। कृष्ण रूप में अन्त में मैनें परिणाम को प्राप्त किया था परन्तु विश्वमानव रूप में सर्वप्रथम मैं परिणाम को प्राप्त करूगाँ“
(17) कालजयी, जीवन और व्यर्थ साहित्य
सम्पूर्ण जगत् का सत्य, एकात्म की व्याख्या करने वाला प्रत्येक साहित्य कालजयी साहित्य कहलाता है। जो सत्य ज्ञान, आत्म ज्ञान, एकात्म ज्ञान, ब्रह्माण्डीय एकात्म, मानवीय एकात्म, समभाव की ओर प्रेरित करता है। जबकि सम्पूर्ण जगत् का सैद्धान्तिक सत्य-एकात्म सिद्धान्त की व्याख्या करने वाला प्रत्येक साहित्य जीवन साहित्य कहलाता है। जो सिद्धान्त ज्ञान, एकात्म कर्मज्ञान, ब्रह्माण्डीय कर्मज्ञान, मानवीय एकात्म कर्मज्ञान, एकात्म कर्मभाव की ओर प्रेरित करता है। कालजयी साहित्य अनेक हो सकता है। परन्तु जीवन साहित्य सिर्फ एक ही हो सकता है। जीवन साहित्य कालजयी साहित्य होता है। परन्तु कालजयी साहित्य आवश्यक नहीं कि वह जीवन साहित्य हो। कालजयी का अर्थ है- जो देश काल से मुक्त, सार्वकालिक, सर्वव्यापी, सर्वग्राही, सर्वमान्य, सार्वजनिक हो। जीवन का अर्थ है- जो देश काल से मुक्त, सर्वकालिक, सर्वव्यापी, सर्वग्राही, सर्वमान्य, सार्वजनिक, क्रियाकलाप हो। कालजयी साहित्य का उदाहरण- वेद उपनिषद्, संतो का साहित्य इत्यादि है तो जीवन साहित्य का उदाहरण व्यक्तिगत प्रमाणित गीता तथा सार्वजनिक प्रमाणित कर्मवेदः प्रथम अन्तिम तथा पंचमदेव एवम् आधारित उपनिषद् है इसलिए कर्मवेदीय साहित्य को मात्र कालजयी साहित्य सम्बोधित कर नजर अन्दाज कर देना सत्य नहीं है और न ही उसके सत्य अर्थ को समझना है। ऐसा साहित्य जो न तो कालजयी है और न ही जीवन साहित्य है - व्यर्थ साहित्य या देश काल बद्ध साहित्य कहलाता है। 

(18) भाग्य और कर्म
भाग्य, किसी कार्य के परिणाम को प्राप्त हो जाने पर उसके परिणाम से निर्धारित होने वाला विषय है, जबकि कर्म परिणाम को प्राप्त करने को क्रिया है। आलसी, कामचोर, इच्छाहीन भाव, पहले ही हार मानकर बैठे व्यक्तियों का कर्म से बचने के लिए भाग्य प्राथमिक औजार है। जबकि पुरूषार्थी, जागरूक, आत्मबली, जीत के लिए सतत् प्रयत्नशील और आसानी से हार न मानने वाले व्यक्तियों के लिए कर्म प्राथमिक औजार है। उदाहरण स्वरूप- प्रत्येक वर्तमान व इतिहास में व्यक्त महापुरूष को परिणाम रूप में देख कामचोर उन्हें भाग्य का तेज मानकर कर्म से अपना पीछा छुड़ा लेते है। जबकि पुरूषार्थी उन्हें सतत् कर्म और संघर्ष की प्रक्रिया के फलस्वरूप व्यक्त होने के उदाहरण स्वरूप मान कर्मशील रहते है। भाग्यवादियों का भाग्य अन्य प्रभावी तत्व आसानी से परिवर्तित कर सकता है अर्थात भाग्यवादियों का भाग्य अन्य के अधीन होता है। जबकि पुरूषार्थी का भाग्य स्वयं उनके अधीन होता है। इसलिए पुरूषार्थियों का भाग्य अन्य प्रभावी तत्व आसानी से परिवर्तित नहीं कर सकते।
(19) अवतार, महापुरूष और साधारण मानव
विश्व को कालानुसार एकात्म करने के लिए सार्वभौम सत्य-सिद्वान्त से युक्त होकर संसार में सिर्फ कर्म करने के लिए ही अवतार का अवतरण होता है। जबकि महापुरूष, एकात्म होने के लिए कर्म अर्थात पुरूषार्थ द्वारा सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त तक पहुँचता है। दूसरे रूप में अवतार की गति उपर से नीचे अर्थात मूलबीज सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त से शाखा संसार की ओर होती है जबकि महापुरूष की गति नीचे से उपर अर्थात शाखा संसार से मूलबीज सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त की ओर होती है। साधारण मानव में आत्मा का अस्तित्व होते हुये भी वह प्रकाशित या जागृत अवस्था में नहीं होता अर्थात उसकी गति या तो यथावत् अपने स्तर पर होती है या शाखा संसार से भी नीचे फूल और फल अर्थात परिणाम को प्राप्त अर्थात पतन की ओर। शारीरिक रूप में अवतार, महापुरूष और साधारण मानव का शरीर समान रूप से मानवीय शरीर होता है परन्तु अवतार का शरीर ब्रह्माण्ड समर्पित, महापुरूष का शरीर समाज समर्पित तथा साधारण मानव का शरीर जीव समर्पित होता है। अवतार अपने अवतारी श्रृंखला की अगली कड़ी तथा अवतारी सार्वभौम सत्य-सिद्वान्त से युक्त महापुरूष के पुनर्जन्म का संयुक्त रूप होता है जबकि महापुरूष सिर्फ पुनर्जन्म के रूप से युक्त उध्र्वगामी तथा साधारण मानव सिर्फ पुनर्जन्म के रूप में निम्नगामी होता है।

(20) मनुष्य जीवन के प्रकार
ऐसा मनुष्य जीवन जो अपने जीवन काल की अवधि में समाज और व्यक्ति के शारीरिक, आर्थिक और मानसिक कल्याणार्थ देश काल मुक्त योगदान दे जाता है, सकारात्मक मनुष्य जीवन कहलाता है। जबकि इसके विपरीत ऐसा मनुष्य जीवन जो अपने जीवन की अवधि में अपने कल्याणार्थ समाज और व्यक्ति से शारीरिक, आर्थिक व मानसिक देश काल मुक्त योगदान ले जाता है, नकारात्मक मनुष्य जीवन कहलाता है। सत्य और चरित्र की प्रधानता पर आधारित देश काल मुक्त मनुष्य जीवन, मानक मनुष्य जीवन तथा सार्वभौम सत्य और सिद्धान्त की प्रधानता पर आधारित देश काल मुक्त मनुष्य जीवन, दर्पण जीवन कहलाता है। जबकि ऐसा देश काल बद्ध मनुष्य जीवन जो उपरोक्त में से कोई भी न हो तो वह मनुष्य जीवन व्यर्थ मनुष्य जीवन कहलाता है। प्रत्येक पूर्णावतार का जीवन, मानक जीवन और दर्पण जीवन का मिश्रित रूप होता है। जैसे व्यक्तिगत प्रमाणित अदृश्य सत्य और चरित्र से युक्त आर्दश व्यक्ति का मानक जीवन तथा उस काल का मनुष्य जीवन के दर्पण रूप का मिश्रित जीवन ब्रह्मा के पूर्णावतार श्रीराम का जीवन। व्यक्तिगत प्रमाणित दृश्य सार्वभौम सत्य और सिद्वान्त से युक्त आर्दश सामाजिक व्यक्ति का मानक जीवन तथा उस काल के मनुष्य जीवन के दर्पण रूप का मिश्रित जीवन विष्णु के पूर्णावतार श्रीकृष्ण का जीवन। सार्वजनिक प्रमाणणित दृश्य सार्वभौम सत्य और सिद्वान्त से युक्त आर्दश वैश्विक व्यक्ति का मानक जीवन तथा उस काल के मनुष्य जीवन के दर्पण रूप का मिश्रित जीवन, शिव-शंकर के पूर्णावतार विश्वमानव का जीवन। पूर्णावतारांे के जीवन में मानक जीवन और दर्पण जीवन के मिश्रित होने के कारण अन्य मानव अवतारों के जीवन के सत्य अर्थ और रूप को समझ नहीं पाते हैं जबकि उन्हें इस प्रकार समझना चाहिए, जो धर्म स्थापना करता है वह सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त की प्राथमिकता वाला दर्पण जीवन का रूप तथा जो भाव द्वारा व्यवहार करता है, वह सत्य चरित्र की प्राथमिकता वाला मानव जीवन का रूप होता है। अन्तिम पूर्णावतार विश्वमानव द्वारा मानक जीवन अर्थात आर्दश वैश्विक मानव का सत्यरूप स्वयं से अलग इसलिए ही किया गया है। जिससें मानव अपने मानव जीवन को स्पष्ट रुप से पहचान सके। पूर्णावतार वास्ताविक जीवन का अभिनेता मात्र होता है। इसलिए वह प्रत्येक क्रियाकलापों में होते हुये भी नहीं होता।

(21) गुरू के प्रकार
गुरू अर्थात मार्गदर्शक। ऐसा गुरू जो एकात्म सार्वभौम सत्य-सिद्वान्त से जोड़ने अर्थात योग कराने की ओर प्रेरित करता हो सकारात्मक गुरू कहलाता। तथा ऐसा गुरू जो अनेकात्म या अलगाववाद से योग कराने की ओर प्रेरित करता है नकारात्मक गुरू कहलाता। जबकि ऐसा गुरू जो स्वयं से अपने स्वार्थ हित के लिए योग कराने के लिए प्रेरित करता है आडम्बरी अर्थात मानसिक गुलामी दाता गुरू कहलाता है।
ऐसा गुरू जो व्यक्ति के व्यक्तिगत मन को व्यक्तिगत रूप से एकात्म सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त से योग कराने की ओर प्रेरित करता है। सकारात्मक व्यक्तिगत प्रमाणित व्यष्टि अदृश्य गुरू कहलाता है। तथा ऐसा गुरू जो व्यक्ति के व्यक्तिगत मन को सार्वजनिक रूप से सार्वभौम एकात्म सत्य-सिद्वान्त से योग कराने की ओर प्रेरित करता है सकारात्मक व्यक्तिगत प्रमाणित व्यष्टि दृश्य गुरू कहलाता है  ऐसा गुरू जो व्यक्ति और शासन के संयुक्त मन को व्यक्तिगत रूप से एकात्म सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त से योग कराने की ओर प्रेरित करता है सकारात्मक सार्वजनिक प्रमाणित समष्टि अदृश्य गुरू कहालाता है। तथा ऐसा गुरू जो व्यक्ति और शासन के संयुक्त मन को सार्वजनिक रूप से एकात्म सार्वभौम सत्य-सिद्वान्त से योग कराने की ओर प्रेरित करता है सकारात्मक सार्वजनिक प्रमाणित समष्टि दृश्य गुरू कहलाता है।
इसी प्रकार नकारात्मक गुरू के भी नकारात्मक व्यक्तिगत प्रमाणित व्यष्टि अदृश्य, नकारात्मक व्यक्तिगत प्रमाणित व्यष्टि दृश्य, नकारात्मक सार्वजनिक प्रमाणित समष्टि अदृश्य तथा नकारात्मक सार्वजनिक प्रमाणित समष्टि दृश्य रूप होते है।
आडम्बरी अर्थात मानसिक गुलामी दाता गुरू अधिकतम रूप से व्यक्ति तक ही सीमित रहकर सक्रिय रहते है क्योंकि इनके स्वार्थ तुच्छ प्रकार के व्यक्तिगत ही होते है।
प्रत्येक अवतार सकारात्मक समष्टि गुरू का रूप तथा महापुरूष सकारात्मक व्यष्टि गुरू का रूप होता है। जब-जब समाज में सकारात्मक समष्टि गुरू का पूर्ण अभाव होता है तब-तब अवतार रूप में सकारात्मक समष्टि गुरू का अवतार होता है तथा सम्पूर्ण समष्टि कालानुसार सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त और संयुक्त मन से युक्त हो वर्तमान हो जाती है।