Action Plan of New Human, New India, New World based on Universal Unified Truth-Theory. According to new discovery World Standard of Human Resources series i.e. WS-0 Series like ISO-9000, ISO-14000 etc series
राष्ट्रों के संघ-संयुक्त राष्ट्र संघ को सत्य और अन्तिम मार्गदर्शन
प्रकाशित खुशमय तीसरी सहस्त्राब्दि के साथ यह एक सर्वोच्च समाचार है कि नयी सहस्त्राब्दि केवल बीते सहस्त्राब्दियों की तरह एक सहस्त्राब्दि नहीं है। यह प्रकाशित और विश्व के लिए नये अध्याय के प्रारम्भ का सहस्त्राब्र्दि है। केवल वक्तव्यों द्वारा लक्ष्य निर्धारण का नहीं बल्कि स्वर्गीकरण के लिए असिमीत भूमण्डलीय मनुष्य और सर्वोच्च अभिभावक संयुक्त राष्ट्र संघ सहित सभी स्तर के अभिभावक के कर्तव्य के साथ कार्य योजना पर आधारित। क्योंकि दूसरी सहस्त्राब्दि के अन्त तक विश्व की आवश्यकता, जो किसी के द्वारा प्रतिनिधित्व नहीं हुई उसे विवादमुक्त और सफलतापूर्वक प्रस्तुत किया जा चुका है। जबकि विभिन्न विषयों जैसे-विज्ञान, धर्म, आध्यात्म, समाज, राज्य, राजनिति, अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्ध, परिवार, व्यक्ति, विभिन्न संगठनों के क्रियाकलाप, प्राकृतिक, ब्रह्माण्डीय, देश, संयुक्त राष्ट्र संघ इत्यादि की स्थिति और परिणाम सार्वजनिक प्रमाणित दृश्य रुप में थे।
विज्ञान के सर्वोच्च आविष्कार के आधार पर अब यह विवाद मुक्त हो चुका है कि मन केवल व्यक्ति, समाज, और राज्य को ही नहीं प्रभावित करता बल्कि यह प्रकृति और ब्रह्माण्ड को भी प्रभावित करता है। केन्द्रीयकृत और ध्यानीकृत मन विभिन्न शारीरिक सामाजिक और राज्य के असमान्यताओं के उपचार का अन्तिम मार्ग है। स्थायी स्थिरता, विकास, शान्ति, एकता, समर्पण और सुरक्षा के लिए प्रत्येक राज्य के शासन प्रणाली के लिए आवश्यक है कि राज्य अपने उद्देश्य के लिए नागरिकों का निर्माण करें। और यह निर्धारित हो चुका है कि क्रमबद्ध स्वस्थ मानव पीढ़ी के लिए विश्व की सुरक्षा आवश्यक है। इसलिए विश्व मानव के निर्माण की आवश्यकता है, लेकिन ऐसा नहीं है और विभिन्न अनियन्त्रित समस्या जैसे-जनसंख्या, रोग, प्रदूषण, आतंकवाद, भ्रष्टाचार, विकेन्द्रीकृत मानव शक्ति एवं कर्म इत्यादि लगातार बढ़ रहे है। जबकि अन्तरिक्ष और ब्रह्माण्ड के क्षेत्र में मानव का व्यापक विकास अभी शेष है। दूसरी तरफ लाभकारी भूमण्डलीकरण विशेषीकृत मन के निर्माण के कारण विरोध और नासमझी से संघर्ष कर रहा है। और यह असम्भव है कि विभिन्न विषयों के प्रति जागरण समस्याओं का हल उपलब्ध करायेगा।
मानक के विकास के इतिहास में उत्पादों के मानकीकरण के बाद वर्तमान में मानव, प्रक्रिया और पर्यावरण का मानकीकरण तथा स्थापना आई0 एस0 ओ0-9000 एवं आई0 एस0 ओ0-14000 श्रृंखला के द्वारा मानकीकरण के क्षेत्र में बढ़ रहा है। लेकिन इस बढ़ते हुए श्रृंखला में मनुष्य की आवश्यकता (जो मानव और मानवता के लिए आवश्यक है) का आधार ”मानव संसाधन का मानकीकरण“ है क्योंकि मनुष्य सभी (जीव और नीर्जीव) निर्माण और उसका नियन्त्रण कर्ता है। मानव संसाधन के मानकीकरण के बाद सभी विषय आसानी से लक्ष्य अर्थात्् विश्व स्तरीय गुणवत्ता की ओर बढ़ जायेगी क्यांेकि मानव संसाधन के मानक में सभी तन्त्रों के मूल सिद्धान्त का समावेश होगा।
वर्तमान समय में शब्द-”निर्माण“ भूमण्डलीय रुप से परिचित हो चुका है इसलिए हमें अपना लक्ष्य मनुष्य के निर्माण के लिए निर्धारित करना चाहिए। और दूसरी तरफ विवादमुक्त, दृश्य, प्रकाशित तथा वर्तमान सरकारी प्रक्रिया के अनुसार मानक प्रक्रिया उपलब्ध है। जैसा कि हम सभी जानते हैं कि मानक हमेशा सत्य का सार्वजनिक प्रमाणित विषय होता है न कि विचारों का व्यक्तिगत प्रमाणित विषय। अर्थात्् प्रस्तुत मानक विभिन्न विषयों जैसे-आध्यात्म, विज्ञान, तकनीकी, समाजिक, नीतिक, सैद्धान्तिक, राजनीतिक इत्यादि के व्यापक समर्थन के साथ होगा। ”उपयोग के लिए तैयार“ तथा ”प्रक्रिया के लिए तैयार“ के आधार पर प्रस्तुत मानव के विश्व स्तरीय निर्माण विधि को प्राप्त करने के लिए मानव निर्माण तकनीकी WCM-TLM-SHYAM.C (World Class Manufactuing–Total
Life Maintenance-Satya, Heart, Yoga, Ashram,
Meditation.Conceousness)प्रणाली आविष्कृत है जिसमें सम्पूर्ण तन्त्र सहंभागिता (Total SystemInvolvement-TSI) है औरं विश्वमानक शून्य-मन की गुणवत्ता का विश्वमानक श्रृंखला (WS-0 : World Standard of Mind Series) समाहित है। जो और कुछ नहीं, यह विश्व मानव निर्माण प्रक्रिया की तकनीकी और मानव संसाधन की गुणवत्ता का विश्व मानक है। जैसे-औद्योगिक क्षेत्र में इन्स्टीच्यूट आॅफ प्लान्ट मेन्टीनेन्स, जापान द्वारा उत्पादों के विश्वस्तरीय निर्माण विधि को प्राप्त करने के लिए उत्पाद निर्माण तकनीकी डब्ल्यू0 सी0 एम0-टी0 पी0 एम0-5 एस (WCM-TPM-5S (World Class
Manufacturing-Total Productive Maintenance-Siri¼N¡VkbZ½]Seton (सुव्यवस्थित), Sesso(स्वच्छता), Siketsu (अच्छास्तर), Shituke (अनुशासन) प्रणाली संचालित है। जिसमें सम्पूर्ण कर्मचारी सहभागिता (Total Employees Involvement)है।) का प्रयोग उद्योगों में विश्व स्तरीय निर्माण प्रक्रिया के लिए होता है। और आई.एस.ओ.-9000 (ISO-9000) तथा आई.एस.ओ.-14000 (ISO-14000)है।
युग के अनुसार सत्यीकरण का मार्ग उपलब्ध कराना ईश्वर का कर्तव्य है आश्रितों पर सत्यीकरण का मार्ग प्रभावित करना अभिभावक का कर्तव्य हैै। और सत्यीकरण के मार्ग के अनुसार जीना आश्रितों का कर्तव्य है जैसा कि हम सभी जानते है कि अभिभावक, आश्रितों के समझने और समर्थन की प्रतिक्षा नहीं करते। अभिभावक यदि किसी विषय को आवश्यक समझते हैं तब केवल शक्ति और शीघ्रता से प्रभावी बनाना अन्तिम मार्ग होता है। विश्व के बच्चों के लिए यह अधिकार है कि पूर्ण ज्ञान के द्वारा पूर्ण मानव अर्थात्् विश्वमानव के रुप में बनना। हम सभी विश्व के नागरिक सभी स्तर के अभिभावक जैसे-महासचिव संयुक्त राष्ट्र संघ, राष्ट्रों के राष्ट्रपति-प्रधानमंत्री, धर्म, समाज, राजनीति, उद्योग, शिक्षा, प्रबन्ध, पत्रकारिता इत्यादि द्वारा अन्य समानान्तर आवश्यक लक्ष्य के साथ इसे जीवन का मुख्य और मूल लक्ष्य निर्धारित कर प्रभावी बनाने की आशा करते हैं। क्योंकि लक्ष्य निर्धारण वक्तव्य का सूर्य नये सहस्त्राब्दि के साथ डूब चुका है। और कार्य योजना का सूर्य उग चुका है। इसलिए धरती को स्वर्ग बनाने का अन्तिम मार्ग सिर्फ कर्तव्य है। और रहने वाले सिर्फ सत्य-सिद्धान्त से युक्त संयुक्तमन आधारित मानव है, न कि संयुक्तमन या व्यक्तिगतमन के युक्तमानव।
आविष्कार विषय-”व्यक्तिगत मन और संयुक्तमन का विश्व मानक और पूर्णमानव निर्माण की तकनीकी है जिसे धर्म क्षेत्र से कर्मवेद-प्रथम, अन्तिम तथा पंचमवेदीय श्रृंखला तथा शासन क्षेत्र से WS-0 : मन की गुणवत्ता का विश्व मानक श्रृंखला तथा WCM-TLM-SHYAM.C तकनीकी कहते है। सम्पूर्ण आविष्कार सार्वभौम सत्य-सिद्वान्त अर्थात् सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में व्याप्त अटलनीय, अपरिवर्तनीय, शाश्वत व सनातन नियम पर आधारित है, न कि मानवीय विचार या मत पर आधारित।“
सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में व्याप्त एक ही सत्य-सिद्धान्त द्वारा व्यक्तिगत व संयुक्त मन को एकमुखी कर सर्वोच्च, मूल और अन्तिम स्तर पर स्थापित करने के लिए शून्य पर अन्तिम आविष्कार WS-0 श्रृंखला की निम्नलिखित पाँच शाखाएँ है।
01.डब्ल्यू.एस.(WS)-0-विचार एवम् साहित्य का विश्वमानक
02.डब्ल्यू.एस.(WS)-00 -विषय एवम् विशेषज्ञों की परिभाषा का विश्वमानक
03.डब्ल्यू.एस.(WS)-000-ब्रह्माण्ड (सूक्ष्म एवम् स्थूल) के प्रबन्ध और क्रियाकलाप का विश्वमानक
04.डब्ल्यू.एस.(WS)-0000-मानव (सूक्ष्म तथा स्थूल) के प्रबन्ध और क्रियाकलाप का विश्वमानक
05.डब्ल्यू.एस.(WS)-00000-उपासना और उपासना स्थल का विश्वमानक
संयुक्त राष्ट्र संघ सीधे इस मानक श्रृंखला को स्थापना के लिए अपने सदस्य देशो के महासभा के समक्ष प्रस्तुत कर अन्तर्राष्ट्रीय मानकीकरण संगठन व विश्व व्यापार संगठन के माध्यम से सभी देशो में स्थापित करने के लिए उसी प्रकार बाध्य कर सकता है, जिस प्रकार ISO-9000 व ISO-14000 श्रृंखला का विश्वव्यापी स्थापना हो रहा है।
120 वर्ष पहले स्वामी विवेकानन्द का कथन जिसके 50 वर्ष बाद संयुक्त राष्ट्र संघ का गठन हुआ-
“समग्र संसार का अखण्डत्व, जिसकें ग्रहण करने के लिए संसार प्रतीक्षा कर रहा है, हमारे उपनिषदों का दूसरा भाव है। प्राचीन काल के हदबन्दी और पार्थक्य इस समय तेजी से कम होते जा रहे हैं। हमारे उपनिषदों ने ठीक ही कहा है-”अज्ञान ही सर्व प्रकार के दुःखो का कारण है।“ सामाजिक अथवा आध्यात्मिक जीवन की हो जिस अवस्था में देखो, यह बिल्कुल सही उतरता है। अज्ञान से ही हम परस्पर घृणा करते है, अज्ञान से ही एक एक दूसरे को जानते नहीं और इसलिए प्यार नहीं करते। जब हम एक दूसरे को जान लेंगे, प्रेम का उदय हेागा। प्रेम का उदय निश्चित है क्योंकि क्या हम सब एक नहीं हैं? इसलिए हम देखते है कि चेष्टा न करने पर भी हम सब का एकत्व भाव स्वभाव से ही आ जाता है। यहाँ तक की राजनीति और समाजनीति के क्षेत्रो में भी जो समस्यायें बीस वर्ष पहले केवल राष्ट्रीय थी, इस समय उसकी मीमांसा केवल राष्ट्रीयता के आधार पर और विशाल आकार धारण कर रही हैं। केवल अन्तर्राष्ट्रीय संगठन, अन्तर्राष्ट्रीय विधान ये ही आजकल के मूलतन्त्र स्वरूप है।” -स्वामी विवेकानन्द
वर्तमान में लव कुश सिंह “विश्वमानव” का कथन-
“शासन और शासक, विकासात्मक हो या विनाशात्मक। प्रणाली कोई भी हो-एकतन्त्रात्मक अर्थात् राजतन्त्र या बहुतन्त्रात्मक लोकतन्त्र। वह तब तक अब स्थायी और अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो सकता जब तक कि वह अपने उद्देश्य की प्राप्ति के अनुरूप जनता का निर्माण और उत्पादन न करें। हमारा उद्देश्य है-”अपने सीमित कर्म सहित असीम मन युक्त मानव का निर्माण और उत्पादन“ , जिसके लिए हमारे सम्मुख दो मार्ग है-एक-गणराज्यों का संघ भारत, दूसरा-राष्ट्रों का संघ संयुक्त राष्ट्र संघ। दोनों एक ही है। बस कर्म क्षेत्र की सीमा में अन्तर है। दोनों का उद्देश्य एक है बस कार्य अलग है। भारत का अपने जनता के प्रति कर्तव्य और दायित्व तथा विश्व के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा ऐसी विवादमुक्त प्रबन्ध नीति उपलब्ध कराना है जिससे दोनों अपने उद्देश्य को निर्वाध गति से प्राप्त करें। जबकि संयुक्त राष्ट्र संघ को सिर्फ अपने अधीन कार्य सम्पादन ही करना मात्र है। उसे प्रबन्ध नीति का आविष्कार नहीं करना है। वह कर भी नहीं सकता और न ही किया क्योंकि वह पाश्चात्य के प्रभाव मण्डल में है। पाश्चात्य के पास सत्य के आविष्कार का इतिहास नहीं है। जबकि प्राच्य के पास सनातन से सत्य के आविष्कार का व्यापक संक्रमणीय, संग्रहणीय और गुणात्मक रूप से अनुभव संग्रहीत है। अब भारत व्यक्तिगत प्रमाणित भाव आधारित सत्य नहीं कहेगा क्योकि अब सार्वजनिक प्रमाणित कर्म, व्यक्त और मानक आधारित समय आ गया है। जो विश्व व्यापी रूप से पदार्थ विज्ञान और आध्यात्म विज्ञान सहित प्राच्य और पाश्चात्य संस्कृतियों में सार्वजनिक रूप से प्रमाणित होगा। और उस विवादमुक्त प्रबन्ध नीति से जब मूल अधिकार शिक्षा द्वारा मनुष्य का निर्माण और उत्पादन होगा। तब भारत तथा संयुक्त राष्ट्र संघ को उसका उद्देश्य प्राप्त होगा अन्यथा वह रोको-रोको, निरोध-निरोध वाले कानून में ही अधिकाधिक समय व धन खर्च करता रहेगा। जिसकी जटिलता बढ़ते ही जाना है। भारत और संयुक्त राष्ट्र संघ दोनों में से किसी के प्रारम्भ से मनुष्य का ”विश्वमानव“ के रूप में निर्माण और उत्पादन प्रारम्भ हो जायेगा। विश्व के सभी देशों के बीच संस्कृतियों का मिश्रण तेजी से हो रहा है ऐसी स्थिति में उसे मानव संसाधन जो कि समस्त निर्माण और उत्पादन का मूल है, का भी विभिन्न विषयों की भांति मानकीकरण तथा विश्व प्रबन्ध के लिए प्रबन्ध का मानकीकारण करना ही होगा। सम्पूर्ण विश्व में निर्माण से उत्पन्न उत्पाद की गुणवत्ता का मानक, संस्था की गुणवत्ता ISO-9000फिर प्रकृति के कत्र्तव्य व दायित्व को स्वयं का कर्तव्य व दायित्व मानकर पर्यावरण की गुणवत्ता का मानक ISO-14000स्वीकारा जा चुका है तो फिर गुणवत्ता से युक्त प्रकृति की भाँति स्वयं मनुष्य अपना गुणवत्ता का मानकीकारण कब करेगा? वह मार्ग जो अभी तक उपलब्ध नहीं था वह विश्वमानक-शून्य (WS-0)-मन की गुणवत्ता का विश्व मानक श्रृंखला के रूप में उपलब्ध हो चुका है जो मेरा कत्र्तव्य था और अब अन्य मानवों का अधिकार है। संसाधन, ज्ञान-विज्ञान, तकनीकी से युक्त पृथ्वी कमल की भाँति खिलने को उत्सुक है, मानवता का रचनात्मक सहयोग लेकर भारत तथा संयुक्त राष्ट्र संघ, उसके खिलने में सहयोग करें जो उसका कर्तव्य और दायित्व है। जिस पर मनुष्य ईश्वर रूप में विराजमान हो सके।”-लव कुश सिंह “विश्वमानव”
गणराज्यों के संघ-भारत को सत्य और अन्तिम मार्गदर्शन
गणराज्यों का संघ भारत अपनी स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद से अब तक वाह्य जगत का विकास करते-करते इस मोड़ तक आ चुका है जहाँ से आगे की ओर जाने के लिए उसे अन्त-जगत का विकास करना होगा। इस विकास के न होने के कारण ही भारत के पास विवाद तो है परन्तु हल नहीं। विरोध तो है परन्तु हल के साथ विरोध नहीं। विरोध है पर उचित कारण के साथ विरोध नहीं। फलस्वरुप समाज (जनता) के अधिपत्य वाला गणराज्य, राज्य (व्यक्ति) समर्थित गणराज्य की ओर बढ़ गया है। वहीं दूसरी तरफ विवशता वश गणराज्य के सत्य रुप की ओर भी बढ़ रहा है। अन्त-जगत का विकास न होने के कारण यह स्पष्ट भी कर पाना मुश्किल हो गया है कि कौन से मुद्दे गणराज्य के हैं और कौन से मुद्दे सम्प्रदाय के हैं। विवादित मुद्दों की एक लम्बी श्रंृखला है जिनमें से कुछ को तो सिद्धान्त द्वारा हल किया जा सकता है परन्तु कुछ तो बिना नैतिक उत्थान के सम्भव ही नहीं हैं। क्योंकि हाथी पर अधिकृत हाथ में अंकुश युक्त महावत के नैतिकता पर ही यह निर्भर करता है कि वह अंकुश का प्रयोग हाथी को संचालित करने के लिए करे या हाथी को मौत देने के लिए करे। यह सिद्धान्त द्वारा नियन्त्रित नहीं हो सकता। विवादित मुद्दे जिस पर भारत क्रियाशील हो चुका है उनमें से प्रमुख हैं-संविधान-समीक्षा, शिक्षा-पाठ्यक्रम, धर्मस्थल विधेयक, प्रादेशिक स्वायत्तता, राज्यों का पुनर्गठन, महिला आरक्षण इत्यादि और भविष्य में आने वाले समय सीमा के अन्दर युवाओं को पैतृक सम्पत्ति का अधिकार। जो मुद्दे उठ चुके हैं उन्हें दबाया नहीं जा सकता क्योंकि वहाँ तक मनस्तर बढ़कर बीज रुप में व्यक्त होे गया है।
भारत को इस प्रस्तुत सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त से मार्गदर्शन प्राप्त कर अपने तथा संयुक्त राष्ट्र संघ के पुनर्गठन के लिए क्रियान्वयन करना चाहिए। यह सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त विरोध नहीं बल्कि वह जो कुछ समाज में अब तक के महामानवों द्वारा उपलब्ध कराया गया था जिसको स्वीकारने, मानने और समझने वाले हैं, उन सबको स्वीकार के साथ सत्य का प्रस्तुतीकरण है। जो एक तरह से स्वीकार और हल के साथ विरोध ही है। जिसका विकल्प किसी राजनीतिक दल, अन्य संगठन या मोर्चा के पास नहीं हो सकता क्योंकि सत्य का विकल्प सिर्फ सत्य होता है और वह एक ही होता है। भारतीय संविधान के अनुसार बिना संसद के विश्वास के कोई भी संवैधानिक परिवर्तन सम्भव नहीं है इसलिए इससे पहले की यह किसी दल का राजनीतिक मुद्दा बने, सामूहिक रुप से सभी राजनीतिक दल इसे संसद में प्रस्तुत करें और व्यापक चिंतन करके क्रियान्वयन के लिए मंजूरी दे। क्योंकि इसके समर्थन के बिना कोई भी व्यक्ति, दल, संगठन स्वयं अपने आप को भारतीय या भारत का शुभचिंतक भी नहीं कह सकता। भारत सत्य आधारित है और उस सत्य का देश-काल मुक्त सर्वव्यापी सार्वजनिक प्रमाणित स्वरुप व्यक्त हो आपके समक्ष प्रस्तुत है। सोचने का विषय है कि यदि उस राज्य का नाम हिन्दू हो या एक व्यक्ति से व्यक्त हुआ हो तो क्या उस सत्य को सत्य नहीं कहेंगे? यदि किसी मिठाई का नाम जहर रख दिया जाये तो क्या उस मिठाई को खाना छोड़ा जा सकता है? कदापि नहीं इससे तो स्वयं की ही हानि होगी। सत्य को स्वीकारने और आत्मसात करने पर एक तरह से हिन्दू और उस व्यक्ति का ही स्वीकार और आत्मसात करना हुआ। परन्तु नाम नहीं गुण देखें यहीं विकास का मार्ग है।
यदि सामूहिक रुप से संसद में इसे प्रस्तुत नहीं किया गया और यदि एक किसी दल का राजनीतिक मुद्दा भी न बना तो भी चिन्ता का विषय नहीं कम से कम यह जानकर खुशी होगी की भारत का शुभचिन्तक सिर्फ इस सिद्धान्त का आविष्कारकर्ता और उसका समूह ही है। नवमानव सृष्टिकर्ता ईश्वर (सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त) के आठवें अवतार भगवान श्रीकृष्ण द्वारा प्रारम्भ किया गया कार्य और प्रथम चरण के लिए व्यक्त व्यक्तिगत प्रमाणित आत्मा के निराकार स्वरुप का साहित्य ”गीता“ के प्रचार-प्रसार का परिणाम ही है जिससे आत्मीय प्राकृतिक बल सक्रिय होकर विवशता वश ग्राम, क्षेत्र, नगर जनपद स्तर पर पंचायत तथा प्रदेश और देश स्तर पर गणराज्य का अविकसित रुप व्यक्त हुआ है। क्योंकि ज्ञान बढ़ने से सिद्धान्त की प्राप्ति होती है और अब प्रारम्भ किया गया कार्य और अन्तिम चरण के लिए व्यक्त सार्वजनिक प्रमाणित आत्मा के निराकार स्वरुप का साहित्य-”कर्मवेद-प्रथम, अन्तिम तथा पंचमवेदीय श्रंृखला“ अर्थात्् ”विश्वमानक-शून्य-मन की गुणवत्ता का विश्व मानक श्रंृखला“ के प्रस्तुतीकरण के प्रभाव से विवशतावश व्यक्ति से विश्व तक को गणराज्य के सत्य रुप को प्राप्त करने के लिए विवश कर देगा। तुम कर्म करते-करते भारत का नाश करते हुए वहीं सिद्धान्त प्राप्त कर मुझ तक ही आओगे जो मैं पहले ही तुम्हारे सामने व्यक्त कर चुका हूँ। तुम वर्तमान भारत को भारत न बनने दो और मैं भविष्य का भारत सम्पूर्ण विश्व को भारत बनाने का यन्त्र-आध्यात्मिक-न्यूट्रान बम व्यापकता से छोड़ दिया हूँ। भारत का नाश करने वाले पहले तुम आराम से थे मैं परेशान था, अब तुम परेशान रहोगे मैं आराम करुँगा। तब ही मेरी जीत निश्चित है। ये हैं-मानवीय सीमा से परे की बुद्धि, चेतना और आत्मशक्ति! व्यक्तिगत प्रमाणित प्रथम समन्वयाचार्य योगेश्वर श्रीकृष्ण की व्यक्तिगत शिक्षा व्यक्ति के लिए थी-”समभाव (अद्वैत) में स्थित हो कर्म करो और परिणाम की इच्छा मुझ (आत्मा) पर छोड़ दो।“ और अब सार्वजनिक प्रमाणित अन्तिम समन्वयाचार्य भोगेश्वर श्री लव कुश सिंह विश्वमानव की सार्वजनिक शिक्षा व्यक्ति तथा संयुक्त व्यक्ति के लिए है-”समभाव (अद्वैत) में स्थित तथा परिणाम के ज्ञान से युक्त हो कर्म करो और परिणाम की इच्छा मुझ (आत्मा) पर छोड़ दो“ द्वारा प्रत्येक स्तर के व्यक्ति और संयुक्त व्यक्ति के लिए परिणाम का ज्ञान उसके समक्ष है।
ईश्वर के आठवें प्रत्यक्ष एवम प्रेरक व्यक्तिगत प्रमाणित पूर्णावतार श्री कृष्ण तथा विष्णु (एकात्म वाणी, एकात्म ज्ञान, एकात्म कर्म व एकात्म प्रेम) के पूर्णावतार के रुप में व्यक्त श्री कृष्ण का मुख्य गुण आदर्श सामाजिक व्यक्ति का चरित्र तथा अवतारी गुणों में साकार शरीर आधारित ”परशुराम परम्परा“ की असफलता को देखते हुये उसका नाश करके निराकार नियम आधारित ”परशुराम परम्परा“ को प्रारम्भ करना था। जिसके लिऐ वे विश्व मानक ज्ञान व व्यक्तिगत प्रमाणित विश्वशास्त्र-गीतोपनिषद् व्यक्त किये।
श्रीकृष्ण का नाम बेचने वाले सिर्फ भक्ति में ही लीन हैं। उनके मूल कार्य विश्व मानक ज्ञान तथा निराकार नियम आधारित ”परशुराम परम्परा“ का नाम ही नहीं लेते जबकि भारत तथा विश्वस्तर पर गणराज्य का सवरुप निम्नलिखित रुप में व्यक्त हो चुका है।
भारत में निम्न्लिखित रुप व्यक्त हो चुका था।
1.ग्राम, विकास खण्ड, नगर, जनपद, प्रदेश और देश स्तर पर गणराज्य और गणसंघ का रुप।
2.सिर्फ ग्राम और नगर स्तर पर राजा (ग्राम व नगर पंचायत अध्यक्ष) का चुनाव सीधे जनता द्वारा।
3.गणराज्य को संचालित करने के लिए संचालक का निराकार रुप-संविधान।
4.गणराज्य के तन्त्रों को संचालित करने के लिए तन्त्र और क्रियाकलाप का निराकार रुप-नियम और कानून।
5.राजा पर नियन्त्रण के लिए ब्राह्मण का साकार रुप-राष्ट्रपति, राज्यपाल, जिलाधिकारी इत्यादि।
विश्व स्तर पर निम्नलिखित रुप व्यक्त हो चुका था।
1.गणराज्यों के संघ के रुप में संयुक्त राष्ट्र संघ का रुप।
2.संघ के संचालन के लिए संचालक और संचालक का निराकार रुप-संविधान।
3.संघ के तन्त्रों को संचालित करने के लिए तन्त्र और क्रियाकलाप का निराकार रूप-नियम और कानून।
4.संघ पर नियन्त्रण के लिए ब्राह्मण का साकार रूप-पाँच वीटो पावर।
5.प्रस्ताव पर निर्णय के लिए सदस्यों की सभा।
6.नेतृत्व के लिए राजा-महासचिव।
श्रीकृष्ण की दिशा से शेष कार्य मानक कर्म ज्ञान का प्रस्तुतीकरण द्वारा नियम आधारित ”परशुराम परम्परा“ को पूर्णता प्रदान करना है। जिसके लिए निम्नलिखित की आवश्यकता है-
1.गणराज्य या लोकतन्त्र के सत्य रुप-गणराज्य या लोकतन्त्र के स्वरूप का विश्व मानक।
2.राजा और सभा सहित गणराज्य पर नियन्त्रण के लिए साकार ब्राह्मण का निराकार रूप-मन का विश्व मानक।
3.गणराज्य के प्रबन्ध का सत्य रूप-प्रबन्ध का विश्व मानक।
4.गणराज्य के संचालन के लिए संचालक का निराकार रूप-संविधान के स्वरूप का विश्व मानक।
5.साकार ब्राह्मण निर्माण के लिए शिक्षा का स्वरूप-शिक्षा पाठ्यक्रम का विश्व मानक।
आविष्कार विषय-”व्यक्तिगत मन और संयुक्तमन का विश्व मानक और पूर्णमानव निर्माण की तकनीकी है जिसे धर्म क्षेत्र से कर्मवेद-प्रथम, अन्तिम तथा पंचमवेदीय श्रृंखला तथा शासन क्षेत्र से WS-0 : मन की गुणवत्ता का विश्व मानक श्रृंखला तथा WCM-TLM-SHYAM.C तकनीकी कहते है। सम्पूर्ण आविष्कार सार्वभौम सत्य-सिद्वान्त अर्थात् सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में व्याप्त अटलनीय, अपरिवर्तनीय, शाश्वत व सनातन नियम पर आधारित है, न कि मानवीय विचार या मत पर आधारित।“
सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में व्याप्त एक ही सत्य-सिद्धान्त द्वारा व्यक्तिगत व संयुक्त मन को एकमुखी कर सर्वोच्च, मूल और अन्तिम स्तर पर स्थापित करने के लिए शून्य पर अन्तिम आविष्कार WS-0 : श्रृंखला की निम्नलिखित पाँच शाखाएँ है।
01.डब्ल्यू.एस.(WS)-0-विचार एवम् साहित्य का विश्वमानक
02.डब्ल्यू.एस.(WS)-00-विषय एवम् विशेषज्ञों की परिभाषा का विश्वमानक
03.डब्ल्यू.एस.(WS)-000-ब्रह्माण्ड (सूक्ष्म एवम् स्थूल) के प्रबन्ध और क्रियाकलाप का विश्वमानक
04.डब्ल्यू.एस.(WS)-0000-मानव (सूक्ष्म तथा स्थूल) के प्रबन्ध और क्रियाकलाप का विश्वमानक
05.डब्ल्यू.एस.(WS)-00000-उपासना और उपासना स्थल का विश्वमानक
भारत सरकार इस श्रृंखला को स्थापित करने के लिए संसद में प्रस्ताव प्रस्तुत कर अपने संस्थान भारतीय मानक ब्यूरो ¼BIS½ के माध्यम से समकक्ष श्रृंखला स्थापित कर विश्वव्यापी स्थापना के लिए अन्तर्राष्ट्रीय मानकीकरण संगठन ¼ISO½ के समक्ष प्रस्तुत कर सकता है। साथ ही संयुक्त राष्ट्र संघ ¼UNO½ में भी प्रस्तुत कर संयुक्त राष्ट्र संघ के पुर्नगठन व पूर्ण लोकतंत्र की प्राप्ति के लिए मार्ग दिखा सकता है।
भारत का संकट, हल, विश्वनेतृत्व की अहिंसक स्पष्ट दृश्य नीति,
सर्वोच्च संकट और विवशता
सामाजिक क्रान्ति या विकास सहित पूर्ण मानव निर्माण की प्रक्रिया एक लम्बी अवधि की प्रक्रिया है इसके लिए दूरगामी आवश्यकता को दृष्टि में रखते हुए कार्य करने की विधि के लिए बिन्दु का निर्धारण होता है। जो हमारे मार्गदर्शक होते हैं-
1.औद्योगिक क्षेत्र में Institute of Plant
Maintenance, JAPANद्वारा उत्पादों के विश्वस्तरीय निर्माण विधि को प्राप्त करने के लिए उत्पाद निर्माण तकनीकी-ॅWCM-TPM-5S (World
Class Manufacturing-Total Productive Maintenance Siri(छँटाई), Seton (सुव्यवस्थित), Sesso (स्वच्छता), Siketsu (अच्छास्तर), Shituke (अनुशासन) प्रणाली संचालित है। जिसमें सम्पूर्ण कर्मचारी सहभागिता (Total Employees Involvement) है। ये 5S मार्गदर्शक बिन्दु हैं।
3.श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा मानव के विश्व स्तरीय निर्माण विधि को प्राप्त करने के लिए मानव निर्माण तकनीकी WCM-TLM-SHYAM.C
(World Class Manufactuing–Total Life Maintenance-Satya, Heart, Yoga, Ashram,
Meditation.Conceousness)प्रणाली आविष्कृत है जिसमें सम्पूर्ण तन्त्र सहंभागिता (Total System
Involvement-TSI) है। ये SHYAM.C मार्गदर्शक बिन्दु हैं।
4.सोमवार, 9 जून 2014 को भारत के 16वीं लोकसभा के संसद के संयुक्त सत्र को सम्बोधित करते हुये श्री प्रणव मुखर्जी, राष्ट्रपति, भारत ने विकास व लक्ष्य प्राप्ति के कार्य के लिए अनके बिन्दुओं को देश के समक्ष रखें। जिसमें मुख्य था-
1.आध्यात्मिक एवं दार्शनिक विरासत के आधार पर साकार होगा एक भारत-श्रेष्ठ भारत का सपना।
2.सोशल मीडिया का प्रयोग कर सरकार को बेहतर बनाने की कोशिश।
3.सबका साथ, सबका विकास।
4.100 नये माॅडल शहर बसाना।
5.5T - ट्रेडिशन (Tradition), ट्रेड (Trade), टूरिज्म (Tourism), टेक्नालाॅजी (Technology), और टैलेन्ट (Talent) का मंत्र।
मन (मानव संसाधन) के विश्व मानक (WS)-0 श्रृंखला के विश्वव्यापी स्थापना के निम्नलिखित शासनिक प्रक्रिया द्वारा स्पष्ट मार्ग है।
1.जनता व जन संगठन द्वारा-जनता व जन संगठन द्वारा जनहित के लिए सर्वोच्च न्यायालय में यह याचिका दायर की जा सकती है कि सभी प्रकार के संगठन जैसे-राजनीतिक दल, औद्योगिक समूह, शिक्षण समूह जनता को यह बतायें कि वह किस प्रकार के मन का निर्माण कर रहा है तथा उसका मानक क्या है?
2.भारत सरकार द्वारा-भारत सरकार इस श्रृंखला को स्थापित करने के लिए संसद में प्रस्ताव प्रस्तुत कर अपने संस्थान भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) के माध्यम से समकक्ष श्रृंखला स्थापित कर विश्वव्यापी स्थापना के लिए अन्तर्राष्ट्रीय मानकीकरण संगठन (ISO) के समक्ष प्रस्तुत कर सकता है। साथ ही संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO)में भी प्रस्तुत कर संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO) के पुर्नगठन व पूर्ण लोकतंत्र की प्राप्ति के लिए मार्ग दिखा सकता है। संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO) के सन् 2046 ई0 में 100 वर्ष पूरे होने पर विश्व सरकार के गठन व विश्व संविधान के निर्माण का यही WS-0 श्रृंखला आधार सिद्धान्त है जो भारत अभी ही खोेज चुका है।
3.राजनीतिक दल द्वारा-भारत का कोई एक राष्ट्रीय राजनीतिक दल जिसकी राजनैतिक इच्छाशक्ति हो, वह विश्व राजनीतिक पार्टी संघ (WPPO) का गठन कर प्रत्येक देश से एक राजनीतिक दल को संघ में साथ लेते हुए संयुक्त राष्ट्र संघ पर स्थापना के लिए दबाव बना सकता है।
4.सयुंक्त राष्ट्र संघ (UNO) द्वारा-संयुक्त राष्ट्र संघ सीधे इस मानक श्रृंखला को स्थापना के लिए अपने सदस्य देशों के महासभा के समक्ष प्रस्तुत कर अन्तर्राष्ट्रीय मानकीकरण संगठन (ISO) व विश्व व्यापार संगठन के माध्यम से सभी देशों में स्थापित करने के लिए उसी प्रकार बाध्य कर सकता है, जिस प्रकार ISO-9000 व ISO-14000श्रृंखला का विश्वव्यापी स्थापना हो रहा है। विश्व व्यापार संगठन के ऊपर मन (मानव संसाधन) के विश्व मानक WS-0 श्रृंखला की स्थापना से भारत दबाव बना सकता है।
5.अन्तर्राष्ट्रीय मानकीकरण संगठन (ISO) द्वारा-अन्तर्राष्ट्रीय मानकीकरण संगठन सीधे इस श्रृंखला को स्थापित कर सभी देशों के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ व विश्व व्यापार संगठन के माध्यम से सभी देशों में स्थापित करने के लिए उसी प्रकार बाध्य कर सकता है, जिस प्रकार ISO-9000 व ISO-14000 श्रृंखला का विश्वव्यापी स्थापना हो रहा है।
मानव एवम् संयुक्त मानव (संगठन, संस्था, ससंद, सरकार इत्यादि) द्वारा उत्पादित उत्पादों को धीरे-धीरे वैश्विक स्तर पर मानकीकरण हो रहा है। ऐसे में संयुक्त राष्ट्र संघ को प्रबन्ध और क्रियाकलाप का वैश्विक स्तर पर मानकीकरण करना चाहिए। जिस प्रकार औद्योगिक क्षेत्र अन्तर्राष्ट्रीय मानकीकरण संगठन ¼International Standardization Organisation-ISO½ द्वारा संयुक्त मन (उद्योग, संस्थान, उत्पाद इत्यादि) को उत्पाद, संस्था, पर्यावरण की गुणवत्ता के लिए ISO प्रमाणपत्र जैसे-ISO-9000 व ISO-14000 श्रंृखला इत्यादि प्रदान किये जाते है उसी प्रकार संयुक्त राष्ट्र संघ को नये अभिकरण विश्व मानकीकरण संगठन ¼World Standardization Organisation-WSO½ बनाकर या अन्र्तराष्ट्रीय मानकीकरण संगठन को अपने अधीन लेकर ISO-0/WSO-0 का प्रमाण पत्र योग्य व्यक्ति और संस्था को देना चाहिए जो गुणवत्ता मानक के अनुरूप हों। भारत को यही कार्य भारतीय मानक व्यूरो ¼Bureau of Indian Standard-BIS½ के द्वारा IS-0 श्रंृखला द्वारा करना चाहिए। भारत को यह कार्य राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली ¼National Education System-NES½ व विश्व को यह कार्य विश्व शिक्षा प्रणाली ¼World Education System-WES½ द्वारा करना चाहिए।
जब कि यह शिक्षा प्रणाली भारत तथा संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा जनसाधारण को उपलब्ध नहीं हो जाती तब तक जन साधारण के व्यक्तिगत इच्छा की पूर्ति के लिए ”पुनर्निर्माण (RENEW-Real Education
National Express Way)“ द्वारा उपलब्ध करायी जा रही है।
21वीं शदी और भविष्य का समय अपने विराट समस्याओं को लेकर कह रहा है-”आओ विश्व के मानवों आओ, मेरी चुनौति को स्वीकार करो या तो तुम समस्याओं, संकीर्ण विचारधाराओं, अव्यवस्थाओं, अहंकारो से ग्रसित हो आपस में युद्ध कर अपने ही विकास का नाश कर पुन-विकास के लिए संघर्ष करो या तो तुम सभी समस्याओं का हल प्रस्तुत कर मुझे परास्त करो।“ ऐसे चुनौति पूर्ण समय में विश्व के अन्य देशों के समक्ष कोई चिन्ता का विषय हो या न हो शान्तिदूत अहिंसक तपोभूमि भारत के समक्ष चिन्ता का विषय अवश्य है और सिर्फ वही ऐसी चुनौति को स्वीकार करने में सक्षम भी है। यह इसलिए नहीं कि उसके अन्दर विश्व नेतृत्व, विश्व शान्ति और विश्व शासक बनने की प्रबल इच्छा है। परन्तु इसलिए कि विश्व प्रेम, जीव ही शिव, शिव ही जीव उसका मुख्य आधार है। जिस पर आधारित होकर वह ब्रह्माण्डीय रक्षा, विकास, सन्तुलन, स्थिरता, एकता के लिए अहिंसक और शान्ति मार्ग से कत्र्तव्य करते हुये अन्य अपने भाइयों और बहनों के अधिकारों के लिए प्रेम भाव से सेवा और कल्याण करता रहा है। परन्तु उसके बदले भारत को सदा ही अन्य ने उन सिद्धान्तों को उसके व्यक्तिगत विचारधारा से ही जोड़कर देखा परिणामस्वरूप वे अपने अधिकार और कल्याण के मार्ग को भी पहचानने में असमर्थ रहे, बावजूद इसके प्रत्येक वैश्विक संकट की घड़ी मे भारत की ओर ही मुँह कर उम्मीद को देखते रहते हैं।
ऐसे समय में जब प्रकृति समाहित मानव, पशु, पक्षी यहाँ तक कि प्रत्येक जीव मानवों के व्यवहार से संत्रस्त हो चुके है, स्वयं भारत भी आन्तरिक और बाह्य दोनों संकटों से चिन्तित, असहाय, कत्र्तव्यों से विमुख और भ्रमित हो गया है। जो भारतीय भाव के विचारक, ज्ञानी बुद्धिजीवी, राजनेता इत्यादि के अन्तिम और पूर्ण उपलब्ध ज्ञान शक्ति का परिचायक ही है। फिर भी भारत निश्चिन्त है क्योंकि वह जानता है कि तपोभूति भारत में सत्य-आत्मा का निवास है। वह सत्य-आत्मा खुली आँखों से देखते हुये ऐसे उचित समय की ही प्रतीक्षा करता है जब वह स्वयं को स्थापित और अस्तित्व के प्रति विश्वास दिलाने के लिए व्यक्त कर सके। इस निश्चिन्तता के कारण ही सर्वत्र देशभक्ति भाव के गीतों, फिल्मों, पौराणिक कथाओं के दृश्य-श्रव्य माध्यमों से उसके स्वागत की तैयारी करता है। और अपने अपार प्रेम भाव से उसे कर्म करते हुये व्यक्त होने पर मजबूर कर देता है। और यह भारत ”हमें चिन्ता नहीं उनकी उन्हें चिन्ता हमारी है, हमारे नाव के रक्षक सुदर्शन चक्र धारी है।“ कहते हुये अपनी स्थिति और परिस्थिति पर सन्तोष की सांसें लेता है। जिसके सम्बन्ध में महर्षि अरविन्द के दिव्यदृष्टि से निकली वाणी-”भारत की रचना विधाता ने संयोग के बेतरतीब ईंटों से नहीं की है। इसकी योजना किसी चैतन्य शक्ति ने बनाई है। जो इसके विपरीत कार्य करेगा वह मरेगा ही मरेगा।“ अक्षरश-पूर्ण सत्य है।
यहाँ हम भारत की आन्तरिक और बाह्य संकट, उसके अन्तिम हल, विश्व नेतृत्व की अहिंसक नीति और उसके पश्चात् उत्पन्न हुये सर्वोच्च और अन्तिम संकट सहित विवशता पर अन्तिम दृष्टि प्रस्तुत कर रहे है जो सत्य रूप में 21वीं शदी और भविष्य के सत्य चेतना आधारित विश्व के लिए भारत की ओर से कर्तव्य तथा अन्य के लिए अधिकार स्वरूप आखिरी रास्ता है।
भारत का वर्तमान और भविष्य का मूल आन्तरिक संकट-कानून, संविधान, राजनैतिक प्रणाली का संकट, अर्थव्यवस्था का संकट, नागरिक समाज का संकट, राष्ट्रीय सुरक्षा का संकट तथा मूल बाह्य संकट-पहचान और विचारधारा का संकट तथा विदेशनीति का संकट है जो देखने में तो आम जनता से जुड़ा हुआ नहीं लगता परन्तु यह संकट आम जनता के उपर पूर्ण रूप से प्रभावी है। आम जनता मूलत-दो विचारों से संचालित है। एक-जो उसके जीवन से सीधे प्रत्यक्ष रूप से जुड़ा देश-काल बद्ध ज्ञान है। जैसे-व्यक्तिगत शारीरिक, आर्थिक, मानसिक आधारित चिकित्सीय, तकनीकी, विज्ञान, व्यापार, विचार एवम् साहित्य आधारित होकर स्वयं का अपना प्रत्यक्ष जीवकोपार्जन करना। दूसरा-जो उसके जीवन से अप्रत्यक्ष रूप से जुड़ा हैं जैसे-सार्वजनिक या संयुक्त, शारीरिक, आर्थिक, मानसिक आधारित चिकित्सीय, तकनीकी, ज्ञान, व्यापार, विचार एवम् साहित्य आधारित होकर स्वयं का अपना सहित परिवार, देश, समाज, विश्व का जीवकोपार्जन करता है। ये ही परिवार, समाज, देश, विश्व की नीतियाँ है। पहले के बहुमत के कारण व्यक्ति व्यक्तिगत अर्थात् भौतिकवाद में स्थित होकर परिवार, समाज, देश, विश्व पर आधारित विचारांे, व्यवस्थाओं और नीतियों की अवनति करता हैं परिणामस्वरूप उपरोक्त संकट सहित स्वयं अपने देश, विश्व के प्रति भक्तिभाव समाप्त कर देता है। जबकि दूसरे के बहुमत के कारण स्वयं अपने जीवकोपार्जन सहित जीवन और संयुक्त जीवन दोनों व्यवस्थित होता है। वर्तमान समय में पहले का पूर्ण बहुमत स्थापित होकर अब दूसरे की बहुमत स्थापित होने की ओर समय चक्र की गति हैं जिसका उदाहरण ही 21वीं सदी और भविष्य के प्रति चिन्ता व्यक्त हो रही है और इसके विपरीत स्थापित बहुमत इस चिन्ता से मुक्त भी होकर स्वयं अपनी सत्ता की चिन्ता में लगा हुआ है। जबकि हमारा सार्थक कर्तव्य देश-काल मुक्त विचारों की और बढ़ते समय चक्र की ओर भी गति प्रदान करना होना चाहिए तभी उपरोक्त संकट से मुक्ति पायी जा सकती है।
भारत के इस आन्तरिक और बाह्य संकट का अन्तिम स्थापना स्तर तक का हल ही अहिंसक, सुरक्षित, एक, स्थिर, विकास, शान्ति और सत्य चेतना युक्त विश्व के निर्माण के लिए विवादमुक्त, दृश्य, सर्वमान्य, सार्वजनिक प्रमाणित विश्वमानक शून्य श्रंृखला-मन की गुणवत्ता का विश्वमानक श्रृंखला श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा आविष्कृत सर्वोच्च और अन्तिम आविष्कार है। जो सम्पूर्ण एकता के साथ वर्तमान लोकतन्त्र का धर्म और धर्मनिरपेक्ष या सर्वधर्मसमभाव आधारित शास्त्र और उसकीे स्थापना शासनिक प्रक्रिया के अनुसार है। जो पूर्ण मानव स्वस्थ समाज, स्वस्थ लोेकतन्त्र, स्वस्थ उद्योग तथा स्वस्थ अर्थव्यवस्था की प्राप्ति का अन्तिम रास्ता हैं। विश्वमानक-शून्य श्रंृखला की क्रिया द्वारा फल की प्राप्ति जो इसकी उपयोगिता भी है, की प्रक्रिया का मुख्य सिद्धान्त-”जिस प्रकार परमाणु में इलेक्ट्रानों की संख्या घटा-बढ़ाकर निम्नतम से उच्चतम, सर्वोच्च और अन्तिम तत्वों तक सभी की प्राप्ति की जा सकती है। उसी प्रकार प्रत्येक व्यक्ति के मन को उच्चतम, सर्वोच्च और अन्तिम स्थिति तक के ज्ञान को अपने प्रत्येक क्रिया की प्रतिक्रिया के ज्ञान से युक्त होकर क्रिया कर प्राप्त कर सकता है।“
विश्वमानक-शून्य श्रंखला के पाँच शाखाओं में पहली शाखा-विश्वमानक-0-विचार एवम् साहित्य का विश्वमानक की उपयोगिता विभिन्न विषयों पर वैचारिक लेखन, रचना, दृश्य-श्रव्य कार्यक्रम जैसे-दूरदर्शन, फिल्म इत्यादि तथा मानव जीवन के लिए उपयोगी साहित्यों की दिशा निर्धारित करता है। दूसरी शाखा-विश्वमानक-00-विषय एवम् विशेषज्ञों की परिभाषा का विश्वमानक की उपयोगिता विभिन्न विषयों और उसके विशेषज्ञों की परिभाषा का अन्तिम व्यक्त परिभाषा का ज्ञान है। तीसरी शाखा-विश्वमानक-000-सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड (स्थूल तथा सूक्ष्म) प्रबन्ध और क्रियाकलाप का विश्वमानक की उपयोगिता एक ही सिद्धान्त द्वारा अदृश्य और दृश्य जगत के प्रबन्ध को स्पष्ट कर विभिन्न तन्त्रों पर आधारित संविधान निर्माण करने में है तथा सभी संयुक्त मन (पंचायत, राज्य, देश, संयुक्त राष्ट्र संघ एवम् अन्य मध्यस्थ संयुक्त मन) को एक ही सिद्धान्त पर क्रियाकलाप करने और उसकी दिशा निर्धारित करने में है। जिससे प्रत्येक संयुक्त मन की दिशा ब्रह्माण्डीय विकास की दिशा में कर शक्ति का उपयोग एक मुखी किया जा सके। चैथा-विश्वमानक-0000-मानव प्रबन्ध और क्रियाकलाप का विश्वमानक की उपयोगिता एक ही सिद्धान्त जिससे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड प्रबन्ध और क्रियाकलाप का विश्वमानक निर्धारित है, उसी से अदृश्य मानव (सूक्ष्म शरीर) तथा दृश्य मानव (स्थूल शरीर) के प्रबन्ध को स्पष्ट करने तथा उसके विभिन्न तन्त्रों को विवाद मुक्त करने में है। तथा सभी व्यक्तिगत मन (व्यक्ति) को एक ही सिद्धान्त जिससे संयुक्त मन का क्रियाकलाप और उसकी दिशा निर्धारित है, उसी सिद्धान्त से व्यक्ति के क्रियाकलाप करने और उसकी दिशा निर्धारित करने में है। जिससे प्रत्येक मानव के क्रियाकलाप की दिशा, संयुक्त मन के क्रियाकलाप की दिशा से जुड़कर विश्व विकास की दिशा में हो सके। जिससे सम्पूर्ण शक्ति एक मुखी होकर सम्पूर्ण मानव जाति प्राकृतिक संसाधनों और प्राकृतिक क्रियाकलापों से एकता रखते हुये, ब्रह्माण्डीय विकास और उसके रहस्यों को आविष्कृत करने में उपयोग कर सकें। यही सम्पूर्ण क्रियाकलापों का मानक ही कर्मज्ञान है, दृश्य कर्मज्ञान है। पाचवाँ-विश्वमानक-00000-उपासना स्थल का विश्वमानक की उपयोगिता मन को उन्हीं सिद्धान्तों पर केन्द्रीभूत करने का स्थल है जो विश्वमानक-000 और विश्वमानक-0000 में व्यक्त है।
इस विश्वमानक-शून्य श्रृंखला का स्वयं अपने देश सहित विश्वव्यापी स्थापना ही भारत का कत्र्तव्य और दायित्व सहित उन सभी सर्वोच्च भावों की प्राप्ति है जिसे अभी तक सामान्यत-संकीर्ण और एक विशेष सम्प्रदाय का विचार समझा जाता रहा है। इसकी स्थापना से भारत स्वयं अपने देश सहित विश्व के सभी देशों के प्रत्येक नागरिक को उसके दिशा और स्थान से ही संयुक्त राष्ट्र संघ तक को एकमुखी कर विश्व विकास की मुख्यधारा से जोड़ सकेगा। परिणामस्वरूप संकीर्ण विचारों से देशों को गुलामी देने वाले देशों पर व्यापक विचार-सत्य-सिद्धान्त का आवरण डाला जा सकेगा, जो विश्व कल्याण सहित भारत की अदृश्य सार्वभौमिकता का दृश्य सार्वभौमिकता में परिवर्तन का अन्तिम मार्ग है। इसकी विश्वव्यापी स्थापना की नीति ही भारत की सम्पूर्ण विदेश नीति का मुख्य सिद्धान्त है। इसके उपरान्त विदेश नीति के सूक्ष्म नियम स्वत-स्पष्ट हो जायेंगे। चूँकि यह भारतीय भाव द्वारा विश्व प्रबन्ध का अन्तिम जनतन्त्रीय सिद्धान्त की स्थापना का अन्तिम मार्ग है इसलिए भारतीय संसद को इसके स्थापना के प्रति, इसकी उपलब्धता के बावजूद निष्क्रिय रहना स्वयं भारत, आम जनता तथा मानवता के प्रति वे सभी नकारात्मक संज्ञा का व्यक्त रूप होगा जिसे सम्मिलित रूप से असुरी या पशु प्रवृति कहते हैं जिस प्रकार विश्वमानक-शून्य श्रृंखला की शाखायें और पुन-उन शाखाओं से निकली अनन्त शाखायें सम्पूर्ण बह्म्राण्ड के सभी विषयों को अपने बाहों में लेकर उनका सत्य रूप व्यक्त कर देती है उसी प्रकार इसके भारत तथा विश्वव्यापी स्थापना के भी अनेक स्पष्ट मार्ग है और यही इसकी स्थापना की अहिंसक स्पष्ट नीति है। इसके भारत तथा विश्वव्यापी स्थापना के निम्नलिखित मार्ग हैं-
भारत में इसकी स्थापना के दो मार्ग है, प्रथम-संसद सदस्यों के सर्वसम्मति से संसद द्वारा और द्वितीय आम जनता सहित संगठन द्वारा। प्रथम चूँकि लोकतन्त्र विचारों को बद्धकर सार्वजनिक सत्य को व्यक्त करने का तन्त्र है और यह सार्वजनिक सत्य ही प्रत्येक मानव अर्थात् आम जनता का यथार्थ है। आम जनता का तन्त्र ही लोकतन्त्र है। इसलिए भारतीय संसद जो विश्व में सबसे बड़ा लोकतन्त्र आधारित संसद है, जो लोकतन्त्रिक विश्व संसद का ही अविकसित रूप है, उसे शुद्ध रूप से जुड़े इस सार्वजनिक सत्य विश्वमानक-शून्य श्रृंखला को संसद सदस्यों की सर्वसम्मति से स्थापित कर लोकतन्त्र के परिपक्वता, स्वस्थता, विश्वास और व्यवस्था का अन्तिम माध्यम का परिचय देना चाहिए। इसके बाद ही स्व-तन्त्र, स्व-राज सहित विश्व के समक्ष यह कहा जा सकता है कि लोकतन्त्र ही विश्व व्यवस्था का सबसे सशक्त तन्त्र है जो जनता द्वारा, जनता के लिए और जनता द्वारा शासित तन्त्र है। इसमें संसद को जरा भी सन्देह नहीं होना चाहिए कि जो संसद का कत्र्तव्य और दायित्व है उसका आविष्कार एक सामान्य ग्रामवासी ने किया है जो भारत और भारतीय संसद की गरिमा को बढ़ाता ही है। आविष्कार संसद द्वारा हो या किसी और के द्वारा यदि वह उसके कत्र्तव्य और दायित्व को पूर्णता प्रदान करता है तो उसकी स्थापना संसद को सर्वसम्मति से की जानी चाहिए। अन्यथा संसद ही पूर्णरूप से आम जनता द्वारा विरोध का शिकार हो जायेगा। जिन संसद सदस्यों को इस सार्वजनिक सत्य विश्वमानक-शून्य श्रृंखला पर विरोध हो उन्हें मात्र विरोध ही नहीं बल्कि विरोध का उचित कारण और उसके सार्वजनिक सत्य व्यक्त हल के साथ विरोध करना चाहिए। अन्यथा वे स्वयं अपने ही नकारात्मक चरित्र को सार्वजनिक रूप से व्यक्त कर देंगे, इसका ध्यान उनको रखना चाहिए। इस कार्य में सदस्यों को यह ध्यान देना होगा कि विचारों का परिणाम ही सार्वजनिक सत्य होता है और सत्य के व्यक्त हो जाने पर विचारों का अस्तित्व सदा के लिए समाप्त हो जाता है। संसद द्वारा सर्वसम्मति हो जाने पर विश्वमानक-शून्य श्रृंखला राष्ट्रीय ऐजेन्डा हो जायेगी। विश्वमानक-शून्य श्रृंखला राष्ट्रीय एजेन्डा का सत्यरूप है ही परन्तु संविधान निर्देशित संसद में इसका सर्वसम्मति होना संवैधानिक रूप से आवश्यक है। राष्ट्रीय ऐजेन्डा के रूप में स्वीकार कर लिये जाने पर स्वयं सरकार को देश में क्रियान्वयन के लिए सर्वप्रथम काल परिवर्तन अर्थात् व्यक्तिगत प्रमाणित अदृश्य काल से सार्वजनिक प्रमाणित दृश्यकाल की घोषणा देश स्तर से करनी पड़ेगी क्योंकि जनता को यह बताना आवश्यक होगा कि वर्तमान समय में अधिकतम व्यक्ति का मन बाह्य विषयों की ओर संसाधनों पर केन्द्रित हो गया है। पुन-राष्ट्रीय पुनर्निर्माण समिति का गठन कर विश्वमानक-शून्य श्रृंखला को विस्तृत कर विवादमुक्त तन्त्रों पर आधारित भारतीय संविधान को व्यक्त कर (जो भारत के मूल संविधान से मिलकर पूर्ण विश्व संविधान में परिवर्तित हो जायेगा) विभिन्न मन्त्रालय और विभागों द्वारा प्रभावी कराना चाहिए। जिसमें सर्वप्रथम भारतीय मानक ब्यूरो में विश्वमानक-शून्य श्रृंखला के समकक्ष आई.एस.-शून्य श्रृंखला मानक विकसित कर लेना चाहिए। विश्वमानक-शून्य श्रृंखला के ज्ञान से परिपूर्ण होने के बाद ही संविधान संशोधन सार्थक होगा।
भारत में विश्वमानक-शून्य श्रृंखला की स्थापना का द्वितीय मार्ग आम जनता एवम् संगठनों द्वारा है। आम जनता और सामाजिक संगठनों को जनहित के लिए सर्वोच्च न्यायालय में जनहित याचिका, राजनीतिक दलों के मानक और संसद के कत्र्तव्य तथा दायित्व के लिए न्यायालय को बाध्य कराना है कि वह संसद तथा राजनीतिक दल अपने वास्तविक स्वरूप के लिए कार्य प्रारम्भ करें तथा मानव मन निर्माण करने के क्रियाकलाप का अपना मानक प्रस्तुत करें। इससे न्यायालय भी संविधानानुसार अपनी गरिमा तथा स्वयं उसको अपने लिए एक दिशा निर्देश स्थापित करने का सिद्धान्त प्राप्त हो जायेगा। व्यापारिक-औद्योगिक समूह को भारतीय मानक ब्यूरो में विश्वमानक-शून्य श्रृंखला के समकक्ष आई.एस.-शून्य श्रृंखला मानक विकसित करने के लिए कदम उठाने चाहिए। जिससे उन्हें यह लाभ होगा कि वे अपने संगठन-समूह को अन्तर्राष्ट्रीय गुणवत्ता के साथ अन्तर्राष्ट्रीय स्तर का मानव संसाधन विकसित करने का प्रमाण-पत्र प्राप्त करेंगे जो उन्हें विश्व बाजार के प्रतिस्पर्धा में सर्वोच्चता दिला सकेगा। यही नहीं उनके अपने आन्तरिक सुरक्षा, गुणवत्ता, प्रबन्धकीय इत्यादि के प्रशिक्षण में व्यय भी कम हो जायेगा क्योंकि पूर्ण ज्ञान से युक्त मानव संसाधन होने पर उनकी सूक्ष्म दृष्टि स्वत-ही इन गुणों से युक्त और रचनात्मक हो जायेगी। अन्तर्राष्ट्रीय स्तर का मानव संसाधन निर्माण से लाभ यह होगा कि उत्पादों के उपयोग की मानसिकता के विकास सहित कर्मज्ञान द्वारा आदान-प्रदान में गति आने से उनके उत्पादों के लिए बाजार सदा ही निर्मित होता रहेगा। परिणामस्वरूप ”मन्दी का दौर“ जैसे समस्याओं से मुक्ति पायी जा सकेगी। जो अर्थव्यवस्था और उसके मूल्य पर भी व्यापक अनुकूल प्रभाव डालेगा। राजनीतिक संगठनों को विश्वमानक-शून्य श्रृंखला की स्थापना के लिए उपरोक्त मार्गों से प्रेरित कर, संसद में प्रश्न उठाकर और आम जनता में अपने सिद्धान्त अर्थात् विश्वमानक-शून्य श्रृंखला सहित उसके लाभ के प्रसार से प्रयत्न करना चाहिए। इससे उन्हें लाभ यह होगा कि आम जनता का विश्वास, राष्ट्रीय एकता, स्वयं की लोकप्रियता, राजनैतिक अस्थिरता, देशभक्ति की स्थायी स्थिरता सहित विश्वभक्तों का निर्माण, सामाजिक परिवर्तन और निर्माण, सम्पूर्ण क्रान्ति इत्यादि जो भी भारत सहित विश्व के हित में सर्वोच्च और अन्तिम है, उस कार्य का ऐतिहासिक श्रेय उन्हें प्राप्त होगा।
भारत द्वारा विश्वमानक-शून्य श्रृंखला के विश्वव्यापी स्थापना के भी दो मार्ग है। प्रथम-भारत सरकार द्वारा, द्वितीय-भारत के किसी एक राजनीतिक दल द्वारा। प्रथम-राष्ट्रीय ऐजेन्डा जो विश्व राजनीति ऐजेन्डा भी है को भारत सरकार संयुक्त राष्ट्र संघ के समक्ष प्रस्तुत कर अपने पक्ष में अन्य देशों को साथ लेना चाहिए। चूँकि यह अहिंसक मार्ग से विश्व निर्माण, रक्षा, शान्ति, एकता, विकास, स्थिरता, कल्याण और सेवा के लिए नेतृत्व है इसलिए अन्य देशों के साथ आने में बाधा नहीं आयेगी इससे लाभ यह होगा कि संयुक्त राष्ट्र संघ, विश्व व्यापार संगठन के अन्तर्गत ट्रिप्स, यूनेस्को, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद, सी.टी.बी.टी.इत्यादि में संशोधन-पुनर्गठन-भागीदारी के लिए मार्ग आसान हो जायेगा जो सभी देशों की समस्या है। परिणामस्वरूप विश्व शिक्षा प्रणाली, विश्व मानकीकरण संगठन, विश्व संविधान एवम् संसोधित-पुनर्गठित संगठनों का जन्म होगा। विश्वमानक-शून्य श्रृंखला का मानक विकसित करने के लिए लोकतन्त्र व्यवस्था पर आधारित अन्तर्राष्ट्रीय मानकीकरण संगठन में इसके प्रति अन्य देशों से समर्थन प्राप्त कर आसानी से मान्यता प्राप्त किया जा सकता है। और समकक्ष आई0एस0ओ0-शून्य श्रृंखला विकसित की जा सकती है। विश्वमानक-शून्य श्रृंखला की स्थापना के लिए वर्तमान समय तथा भविष्य में और भी उपयुक्त समय भारत के अनुकूल ही है। क्योंकि जहाँ एक ओर उसे अभी सी.टी.बी.टी.पर हस्ताक्षर करने है, वहीं दूसरी ओर भारतीय भाव का अहिंसक सत्य-सिद्धान्त विश्वमानक-शून्य श्रृंखला की स्थापना का प्रस्ताव सी0टी0बी0टी0 के पीछे छुपी मानसिकता को आसानी से व्यक्त कर देगा। सी0टी0बी0टी0 दिशाहीन पदार्थ विज्ञान का परिणाम है तो विश्वमानक-शून्य श्रृंखला की स्थापना का प्रस्ताव सी0टी0बी0टी0 जैसी स्थिति ही उत्पन्न न हो उसका सिद्धान्त है। परिणामस्वरूप न चाहते हुये भी विश्व की संकीर्ण मानसिकता आधारित नेतृत्व वाले देश जो स्वयं अपनी जनता को मानसिक गुलाम बनाये हुये हैं, पर भी भारतीय भाव का सिद्धान्त स्वत-प्रभावी हो जायेगा। क्योंकि विश्व रक्षा के लिए इसकी स्थापना प्रत्येक देशों के लिए अनिवार्य हो जायेगी। विश्व चिंतक देश अैर संयुक्त राष्ट्र संघ इसके लिए विवश भी होगा क्योंकि विश्वमानक-शून्य श्रृंखला का विरोध स्वयं उसकी विश्व चिंतक, विश्व रक्षा, विश्व विकास, विश्व स्थिरता, विश्व शान्ति, विश्व एकता जैसी छवि को पूर्णरूप से ध्वस्त कर देगा। संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा स्वीकृत हो जाने की दिशा में सर्वप्रथम काल परिवर्तन विश्व स्तर से करनी पडे़गी क्योंकि विश्व के प्रत्येक नागरिक को यह बताना आवश्यक होगा कि वर्तमान समय में अधिकतम व्यक्ति का मन बाह्य विषयों अर्थात्् संसाधनों पर केन्द्रित हो गया है। उसके फलस्वरूप विश्वमानक-शून्य श्रृंखला की स्थापना अपने विभिन्न संगठनों के माध्यम से करना प्रारम्भ करेगा।
भारत द्वारा विश्वमानक-शून्य श्रृंखला के विश्व व्यापी स्थापना का द्वितीय मार्ग-उपरोक्त सभी नीतियों का प्रयोग करते हुये भारत का कोई एक राजनीतिक दल सत्य चेतना आधारित विश्व निर्माण के लिए विश्व राजनीतिक पार्टी संघ (डब्लू.पी.पी.ओ.) का गठन करने के लिए आगे आकर कर सकता हैं जिसमें प्रत्येक देश से एक राजनीतिक पार्टी को सदस्य बनाना चाहिए। जिससे लाभ यह होगा कि डब्लू.पी.पी.ओ.द्वारा संयुक्त राष्ट्र संघ पर दबाव बनाया जा सकेगा और प्रत्येक देश अपने देश की जनता का सर्वोच्च कल्याण कर अपने देश में दल की सर्वोच्चता स्थापित कर सकेगी। भारतीय राजनीतिक दल को भारत में समस्त सर्वोच्च और अन्तिम कार्य करने का श्रेय प्राप्त होगा।
सामाजिक परिवर्तन, निर्माण, नैतिक उत्थान और सम्पूर्ण एकता की प्राप्ति एक लम्बी अवधि की प्रक्रिया है। 21वीं सदी और भविष्य की आवश्यकता को देखते हुये उसका बीज अभी ही समाज में बोना होगा। जो आवश्यकता और विवशता भी बन चुकी हैं विश्वमानक-शून्य श्रृंखला उसी का बीज हैं। जिसकी स्थापना के लिए भारत सहित अन्य देशों के आम जनता, संगठन ओर सरकार को शीघ्रताशीघ्र ऐसा उसी भाँति करना चाहिए जैसे माता-पिता अपने बच्चे को समायानुसार आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराते है। ऐसा इसलिए भी करना चाहिए क्योंकि वर्तमान समय में नेतृत्वकत्र्ताओं, लोकतन्त्र, सरकार और भविष्य के प्रति जिस प्रकार अविश्वास बढ़ रहा है। उसे विश्वास में परिवर्तित करने का प्रथम और अन्तिम मार्ग यही है। उन्हें यथाशीघ्र इसकी स्थापना के लिए जुट जाना चाहिए क्योंकि वर्तमान नेतृत्वकत्र्ता, लोकतन्त्र, सरकार और जनता चाहे जैसे भी हो परन्तु भविष्य के नेतृत्वकत्र्ता, लोकतन्त्र, सरकार और जनता की पूर्ण स्वस्थता के कार्य का विश्व ऐतिहासिक श्रेय तो उन्हें कम से कम प्राप्त हो जायेगा। और यही हृदय परिवर्तन, आत्मप्रकाश, सत्यपक्षर्, इंश्वरीय शरण में आना इत्यादि कहा जाता है।
प्रत्येक सुख के साथ दुःख साया की भाँति लगा रहता है। यदि भारत और विश्व के समक्ष विश्वमानक-शून्य श्रृंखला के आविष्कार का सर्वोच्च और अन्तिम सुख है तो ठीक उतना व्यापक सर्वोच्च और अन्तिम दुःख भी है। कर्मशील लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ का वर्तमान और विवादमुक्त सत्य-विचार-शक्ति-सत्य-सिद्धान्त से युक्त होना ही भारत तथा विश्व के समक्ष सर्वोच्च संकट है। सम्पूर्ण विश्व कैसे एक भारतीय युवा के सत्य-विचार को अपने उपर प्रभावी होने देगा? भले ही यह सम्पूर्ण विश्व के कल्याण का एकमेव, सर्वोच्च और अन्तिम रास्ता हो। भले ही उस युवा का उद्देश्य मात्र इतना हो कि प्रत्येक विषय, पद, व्यक्ति, संगठन और देश अपने उद्देश्य को पूर्णरूप से अपने मार्ग से ही प्राप्त कर ले। और भले ही वह व्यक्ति से विश्व तक की आत्मा की आवाज ही क्यों न हो?
जब दृश्य सार्वजनिक सत्य व्यक्त होता है, जो मानव समाज में सिर्फ एक और अन्तिम बार ही व्यक्त होता है तब सम्पूर्ण संकीर्ण विचार और उससे युक्त अहंकार पर स्पष्ट आघात होता है परिणामस्वरूप अव्यक्त संकीर्ण विचार और अहंकार ही उसके धारणकत्र्ता के समक्ष संकट रूप में व्यक्त होता है परन्तु वे उसे न देखकर सत्य-विचार को ही संकट समझने लगते हैं। व्यक्ति से लेकर संयुक्त राष्ट्र संघ तक के अपने-अपने संकीर्ण विचार हैं जो सत्य-विचार के व्यक्त होने से इस प्रकार व्यक्त होंगे। चूँकि विश्वमानक-शून्य श्रृंखला ही संयुक्त राष्ट्र संघ के सम्पूर्ण उद्देश्यों को पूर्ण करने का प्रथम और अन्तिम मार्ग है इसलिए उसके द्वारा इसका स्वागत होगा परन्तु उसके विशेषाधिकार प्राप्त देश (वीटो पावर) और संकीर्ण विचारों पर आधारित देश इसका विरोध बिना किसी उचित कारण और समाधान के कर सकते है। यह उनकी अपनी शक्ति का दुरूपयोग तथा अपने देश की जनता और विश्व के भाविष्य को अशान्त करने का ही रूप ले सकता है। परिणामस्वरूप भारत की शान्ति और अहिंसक छवि विश्व के समक्ष स्पष्टरूप से स्थापित होगी। भारत के सामने यह संकट उसके वर्तमान संस्कृति-भूतकाल में हो चुके महापुरूषों के नाम पर झण्डे, डण्डे, शोषण, अत्याचार, आन्दोलन, जीवकोपार्जन, युवाओं को महत्व न देना, वर्तमान क्रियाकलापों पर आधारित होकर एक दूसरे पर कटाक्ष करना इत्यादि है न कि उन महापुरूषों के विचारों को परिष्कृत कर वर्तमान एवम् भविष्य के योग्य बनाना तथा युवाओं को अपना भविष्य समझकर कार्य करना है। भारतीय संसद के समक्ष संकट का कारण वर्तमान और भूतकाल पर बहस करना और भविष्य के आवश्यक मुद्दों को उठाकर जनता पर छोड़ देना है। प्राच्य आधारित धर्मक्षेत्र पर संकट का कारण अयोग्यता, अपूर्णता और आडम्बर युक्त स्वघोषित ईश्वर, अवतार और आचार्य है। पाश्चात्य आधारित राज्य क्षेत्र पर संकट का कारण नेताओं और उनके दलों का स्वार्थमय होकर राजनीति करना तथा भूतकाल के महापुरूषों, क्रान्तिकारियों, धर्मज्ञों के नामों को भुनाना, अन्य दलों का एक दृष्टि पर कटाक्ष करना है। अदृश्य आध्यात्म विज्ञान और दृश्य पदार्थ विज्ञान के समक्ष संकट उनका दिशाहीन होना है। प्रबन्ध-नीति-विचार के समक्ष संकट उनमें एकता का न होना है। समाज क्षेत्र के समक्ष संकट उनका आपस में समभाव का न होना है। सम्प्रदाय-संस्कृति-जाति के समक्ष संकट आपस में एक दूसरे के ऊपर अपनी सर्वोच्चता सिद्ध करना है। प्रौढ़-वृद्ध के समक्ष संकट वे जो न कर सके, उसका किसी से उम्मीद न करना और वे जो कर सके है, उससे अधिक कर पाने की किसी से उम्मीद न करना है। युवा शक्ति के समक्ष संकट-दिशा-विहीन, लक्ष्य-विहीन, दिग्भ्रमित, असंगठित, भौतिकता और स्वंय के निर्णित मार्ग को ही सम्पूर्ण समझना है। आम जनता के समक्ष संकट-ज्ञान ही समस्त दुःखों का नाशकर्ता है पर विश्वास न करना है। शरीर को ही प्राथमिकता देने वालों के समक्ष संकट उनका शारीरिक बल से ही संसार को झुका देने का भ्रम है। ईसाई मिशनरीयों का संकट-उनका अंग्रेजी प्रसार से ईसाईकरण करने का भ्रम है।
उपरोक्त व्यापक संकट सिर्फ मानसिक है। सिर्फ अपने मन को बदल देने से सबको अपने ही रास्ते से उसका लक्ष्य प्राप्त हो जाता है। यही मूल संकट है कि व्यक्ति अपनी इच्छा भी नहीं बदल सकते जिससे न तो उनका शारीरिक, न ही आर्थिक क्षति ही सम्भव है। परन्तु यह विश्व की विवशता है कि वह विवश होकर प्राकृतिक बल या संयुक्त मन बल से वह एकत्व की ओर ही जा रहा है। इसलिए इसकी स्थापना तो निश्चित है। परिणामस्वरूप सम्पूर्ण विश्व का मानसिक वध भी सुनिश्चित है। चाहे वह वर्तमान में हो या भविष्य में। चूँकि यह संकट वैचारिक है। वैयक्तिक नहीं इसलिए घातक अस्त्रों से मुक्त है बल्कि यह घातक अस्त्रों को ही समाप्त कर देने में सक्षम है। इस प्रकार विश्वमानव का शरीर संकट नहीं है। बल्कि उनके द्वारा आविष्कृत, अनियंन्त्रित, अपरिवर्तनीय, असंग्रहणीय, समस्त सर्वोच्च और अन्तिम व्यापकता से युक्त अन्तिम विचारांे का चक्र-सुदर्शन चक्र और पशु प्रवृत्तियों का नाश करने वाला सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त का अस्त्र-पशुपास्त्र है जिसका नब्बे प्रतिशत स्थापना संयुक्त मन द्वारा कर्म करते-करते ज्ञान की ओर बढ़ने से हो ही चुकी है। शेष दस प्रतिशत ही उसका सत्य-शिव और सुन्दर है। जिसकी स्थापना के उपरान्त ससीम जीवात्मा असीम विश्व में तथा असीम विश्व ससीम जीवात्मा में तथा ससीम जीवात्मा असीम परमात्मा में, निराकार साकार में, साकार निराकार में तथा आत्मा परमात्मा मंे, परमात्मा आत्मा में एकाकार होकर समस्त विश्व प्रेममय और कर्ममय होकर धरती पर स्वर्ग निर्माण में एकजुट हो एक ही आवाज में कहेगा-”वाहे गुरू की फतह।“
जैसे जैसे मानव जाति का सम्राज्य इस पृथ्वी पर बढ़ता जा रहा है वेेसे ही वह विभिन्न समस्याओं से भी घिरता जा रहा है। समस्यायें भी विभिन्न प्रकार की है जिन्हें मूलत-दो भागों में बाॅटा जा सकता है या यूॅ कहें कि इन दो समस्याओं से अलग कोई और समस्या है ही नहीं। प्रथम व्यष्टी या व्यक्तिगत समस्या तथा द्वितीय समष्टि या सामाजिक या सार्वजनिक या संयुक्त समस्या। प्रथम प्रकार की समस्या का मूल कारण स्वंय व्यक्ति या और द्वितीय प्रकार की समस्या होती है जबकि द्वितीय प्रकार की समस्या का मूल कारण व्यक्ति ही होता है क्योकि समष्टि नाम का कोई व्यक्ति नहीं होता। वह व्यक्ति का समूह ही होता है अर्थात्् व्यक्ति ही समष्टि समस्या को जन्म देता है। उसके उपरान्त ही समष्टि समस्या, के रूप में पुन-व्यक्ति को प्रभावित करती है।
उपरोक्त दोनों समस्याओं के समाधान के लिए दो रास्ते हैं प्रथम व्यक्ति को सत्य से जोड़ा जाय तब समष्टि स्वत-सत्य से जुड़ जायेगा। दूसरा यह है कि समष्टि को सत्य से जोड़ा जाय तो व्यक्ति स्वंय सत्य से जुड़ जायेगा। यहाँ आवश्यक है कि सत्य और विचार अर्थात्् दर्शन को स्पष्ट रूप से समझ लिया जाय। विचार कई हो सकते हैं सत्य एक होता है। विचार व्यक्ति होता है सत्य समष्टि होता है। विचार को कार्य में बदलने के बाद सत्य का जन्म होता है। विचार छोटा चक्र है, सत्य एक बड़ा, सर्वोच्च और अन्तिम चक्र है। विचारों का अन्त सत्य है। विचार व्यक्तिगत सत्य है जबकि सत्य सार्वजनिक सत्य है। अर्थात्् सम्पूर्ण या विश्व या अन्तर्राष्ट्रीय अर्थात्् समष्टि मानक है। और जो मानक है वह विचार या व्यक्तिगत विचार कभी भी नहीं हो सकता। सार्वजनिक सत्य, विचारों को प्रतिबद्ध करने वाली लोकतन्त्र प्रणाली की चरम विकसित अवस्था है। इसलिए स्वस्थ लोकतन्त्र की प्राप्ति के लिए प्रथम तथा सार्वजनिक सत्य, व्यक्त करना पड़ेगा फिर व्यवस्थाओं को उसके अनुसार स्थापित करना पड़ेगा। विचार को देश-काल बद्ध है जबकि सत्य देश-काल मुक्त है।
व्यष्टि हो या समष्टि दोनों को कर्म करना पड़ता है। कर्म की प्रणाली भी दो ही प्रकार की होती है। प्रथम-पहले कर्म फिर ज्ञान, द्वितीय-पहले ज्ञान फिर कर्म। प्रथम कार्य प्रणाली में समस्यायें अधिक उत्पन्न होती है। द्वितीय प्रकार के कार्यप्रणाली में समस्यायें कम उत्पन्न होती हैं। वर्तमान लोकतन्त्र प्रणाली में कर्म पहले हो रहा है ज्ञान बाद में प्राप्त हो रहा है इसलिए ही नियम कानून तो बनते हैं परन्तु उनका दूरगामी प्रभाव शून्य ही प्राप्त होता है। अभी तक यह स्पष्ट किया जा रहा था कि सत्य और विचार क्या है ? और कार्य प्रणाली के मार्ग क्या है?
अब हम पुन-समस्याओं के समाधान के रास्तों पर आते हैं। समस्यायें कभी भी पूर्णत-समाप्त नहीं होती सिर्फ उनको कम करने का प्रयास होता है। मानव सदा से अपने कर्मो का अधिकतम उपयोग और परिणाम प्राप्त करने का प्रयत्न किया है। जिसके परिणामस्वरूप वर्तमान का व्यक्त रूप है। समस्याओं के समाधान के रास्तों में प्रथम रास्ता कठिन और वर्तमान समय में प्रभावहीन है क्योंकि व्यक्ति को सत्य से जोड़ने के दो मार्ग हैं। प्रथम व्यक्ति ही व्यक्ति को सत्य से जोड़े । ऐसे में व्यक्ति के जन्म दर और व्यक्ति को सत्य से जोड़ने वालों की जन्म दर में इतना अधिक अन्तर है कि उसकी स्थिति साइकिल सवार द्वारा राजधानी एक्सप्रेस को पीछे छोड़ने का प्रयत्न है। और सत्य ज्ञान का भी अभाव है। जिसके परिणामस्वरूप विभिन्न जन जागरण कार्यक्रम भी असफलता को प्राप्त कर अनुपयोगी प्रतीत हो रहे है। द्वितीय-समष्टि ही व्यक्ति को सत्य से जोड़े। दूसरे रूप में समस्याओं के समाधान के रास्तों में यही द्वितीय मार्ग ही अर्थात्् समष्टि को सत्य से जोड़ने का रास्ता है जिससे व्यक्ति को सत्य से जोड़ने का कार्य भी पूर्ण हो जाता है। यह मार्ग प्रभावकारी, आसान और अन्तिम इसलिए है कि शिक्षा का विकास जिस तेजी से हो रहा है और प्रत्येक के लिए शिक्षा आवश्यक बनती जा रही है उसी तेजी से इस माध्यम से व्यक्ति का जन्म के साथ सीधा सम्बन्ध भी है। इस माध्यम से सत्य शिक्षा द्वारा व्यक्ति को सत्य से जोड़ने की गति भी जन्म दर के समान होगी । मात्र यही मार्ग, स्वस्थ लोकतन्त्र, स्वस्थ समाज, नैतिक उत्थान, विश्व शान्ति, एकता, विश्व स्थिरता, विश्व विकास सहित शक्ति का विश्व विकास के प्रति उपयोगिता का अन्तिम मार्ग है।
सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को प्रभावित करने वाली तीन शक्तियाॅ या चक्र या मार्ग है। प्रथम-सर्वोच्च और अन्तिम-प्राकृतिक या आत्मीय या सत्य-धर्म-ज्ञान चक्र, द्वितीय-व्यष्टि चक्र, तृतीय-समष्टि चक्र। प्रथम चक्र को ही एकता चक्र कहते हैं जिसका प्राच्य, पाश्चात्य, राज्य, समाज, धर्म, धर्मनिरपेक्ष, सर्वधमसमभाव, सम्प्रदाय इत्यादि के सर्मथकों में कोई भी इसे अस्वीकार नहीं कर सकता अन्यथा वह बह्माण्ड विरोधी सिद्ध हो जायेगा। द्वितीय एवम् तृतीय चक्र विज्ञान आधारित चक्र है। द्वितीय चक्र-व्यष्टि चक्र की सर्वोच्च, प्रथम एवम् अन्तिम स्थिति व्यक्तिगत प्रमाणित अदृश्य विज्ञान-आध्यात्म विज्ञान आधारित है। जिसके अन्तर्गत विभिन्न मत, दर्शन, विचार समाहित है। और आधारित विभिन्न सम्प्रदाय, दल, संगठन इत्यादि संचालित हो रहे हैं। यही व्यष्टि धर्म भी है। इस चक्र की उपयोगिता मात्र व्यष्टि मन को सन्तुलन, स्थिरता और शान्ति प्रदान करता है। चंूकि यह व्यक्तिगत प्रमाणित होता है इसलिए इनके विभिन्न छोटे छोटे चक्रों के समर्थकों में विवाद भी होते हैं। तृतीय चक्र-समष्टि चक्र की सर्वोच्च, प्रथम एवम् अन्तिम स्थिति सार्वजनिक प्रमाणित दृश्य विज्ञान-पदार्थ विज्ञान आधारित है जिसके अन्तर्गत पदार्थिक सत्य समाहित है। और आधारित भौतिक समाज संचालित हो रहें हैं। इस चक्र की उपयोगिता मात्र व्यष्टि एवम् समष्टि को संसाधन उपलब्ध कराना हैं और बाह्य केन्द्रित व्यष्टि मन को शान्ति, स्थिरता और सन्तुलन प्रदान करना है। चंूकि यह सार्वजनिक प्रमाणित होता है इसलिए इसमें विवाद का कोई भी रास्ता नहीं है। व्यक्तिगत प्रमाणित अदृश्य विज्ञान-आध्यात्म विज्ञान का दृश्य रूप-सार्वजनिक प्रमाणित दृश्य विज्ञान-पदार्थ विज्ञान अर्थात्् व्यक्तिगत प्रमाणित अदृश्य पदार्थ विज्ञान का सार्वजनिक प्रमाणित दृश्य आध्यात्म विज्ञान, विज्ञान की दो अदृश्य एवम् दृश्य अवस्था है। प्रथम चक्र सत्य-धर्म-ज्ञान चक्र की उपयोगिता दोनों दिशाहीन चक्रो-व्यष्टि एवम् समष्टि चक्रो को एकता की दिशा में बांधे रखना है। दूसरे रूप में समष्टि चक्र, प्रथम चक्र से मिलकर समष्टि धर्म को उत्पन्न करता है।
चूँकि कालानुसार कर्मज्ञान की उपलब्धता नहीं थी इसलिए वर्तमान समय में तीनों शक्तियों की प्रथम, सर्वोच्च और अन्तिम स्थिति अपने निम्नतम स्थिति व्यक्ति शरीर में स्थापित हो चुकी है। प्रथम चक्र-व्यक्ति शरीर के बाह्य आडम्बरों, द्वितीय चक्र-शारीरिक शक्ति तथा तृतीय चक्र व्यक्ति समूह की शक्ति अर्थात् लोकतन्त्र के रूप में स्थापित हो चुकी है। लोकतन्त्र सार्वजनिक सत्य का समर्थकों का समूह है परन्तु यह आवश्यक नहीं कि वह सम्पूर्ण एकता की ओर ही हो। स्वस्थ लोकतन्त्र की चरम स्थिति सम्पूर्ण एकता की दिशा अर्थात् प्रथम चक्र की चरम स्थिति की दिशा की ओर ही होकर प्राप्त किया जा सकता है न कि वर्तमान लोकतन्त्र के निम्नतम स्थिति की दिशा से।
इस ब्रह्माण्ड में कुछ भी स्थिर नहीं है जिसे वर्तमान का पदार्थ विज्ञान भी स्वीकार करता है। और जो स्थिर नहीं है वह अपनी स्थिरता के लिए क्रियाशील है। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को प्रभावित करने वाली तीनों शक्तियों में प्रथम शक्ति-आत्मीय शक्ति पर कोई भी शक्ति अपना प्रभाव नहीं डाल सकती इसलिए यह शक्ति अपनी शक्ति, एकता एवम् स्थिरता के लिए शाश्वत से सक्रिय है। इस शक्ति का सम्बन्ध एक जीवन से नहीं बल्कि कई जीवन से होता है। द्वितीय शक्ति-व्यष्टि शक्ति मूलत-दो प्रकार से सक्रिय है-प्रथम-निवृत्तिमार्ग और द्वितीय प्रवृत्तिमार्ग। निवृत्ति मार्ग इस जगत को असत्य मानकर व्यष्टि चिन्तन आधारित अदृश्य विज्ञान-आध्यात्म विज्ञान द्वारा शान्ति, स्थिरता को प्राप्त करता है। वह इस जगत से जितना प्राप्त करता है उससे कम ही लौटा पाता है उसका समस्त कार्य शुद्ध रूप से स्वंय के लिए ही होता है। यह मार्ग समाज तथा राज्य से पूर्णत-निष्क्रीय होता है। यह मार्ग सिर्फ स्वयं की मुक्ति के लिए ही सक्रिय होता है। इस मार्ग की चरम स्थिति प्रथम शक्ति अर्थात् आत्मीय शक्ति से योग होता है। यदि जीवन है तो कर्म किये बिना कोई भी नहीं रह सकता इसलिए योग के उपरान्त यदि कोई सूत्र समाज तथा राज्य के लिए प्राप्त होते है तो वह उसके अनुसार स्वयं तथा दूसरों के लिए कर्म करता है और वह प्रवृत्ति मार्ग में परिवर्तित हो जाता है। अन्यथा वह निवृत्ति मार्ग में ही कर्म करता है। प्रवृत्ति मार्ग इस जगत को सत्य मानकर समष्टि चिन्तन आधारित दृश्य एवम् अदृश्य विज्ञान द्वारा शान्ति, स्थिरता को प्राप्त करता है। वह इस जगत से जितना प्राप्त करता है उससे अधिक उसे लौटा देता है। उसका समस्त कार्य स्वयं सहित समाज और राज्य की शान्ति एवम स्थिरता के लिए होता है। तथा समाज तथा राज्य में पूर्णत-सक्रिय होता है। इस मार्ग का जीवन ही प्रथम शक्ति-आत्मीय शक्ति की स्थिरता, शान्ति और एकता की प्राप्ति की ओर एक जीवन होता है। तृतीय शक्ति-समष्टि शक्ति सार्वजनिक सत्य के द्वारा कर्म करके स्वयं, समाज तथा राज्य को शान्ति, स्थिरता प्रदान करता है। तृतीय शक्ति और प्रवृत्तिमार्गी का संयुक्त जीवन प्रथम शक्ति-आत्मीय शक्ति की स्थिरता, शान्ति और एकता का सर्वोच्च, अन्तिम और व्यक्त सम्पूर्ण जीवन होता है। शुद्ध रूप से तृतीय शक्ति से युक्त होकर कर्म करने वाले भौतिकता आधारित प्रवृत्ति मार्ग कहे जाते हैं।
लोकतन्त्र व्यष्टि विचारों को प्रतिबन्धित कर सार्वजनिक विचार अर्थात् सत्य को प्रकाशित करने का माध्यम है जिसकी चरम विकसित स्थिति सार्वजनिक सत्य या समष्टि सत्य अर्थात् सम्पूर्ण मानक अर्थात् सत्य-सिद्धान्त है। जो मतों द्वारा व्यक्त होता है। प्रश्न यह कि लोकतन्त्र मन के तन्त्र जैसे-शिक्षा पाठ्यक्रम कर नीति, विदेश नीति, आरक्षण नीति, आर्थिक नीति, उद्योग नीति, मुद्रा प्रवाह इत्यादि के सत्य सिद्धान्त के बिना ज्ञान के ऐसे निवृत्ति मार्गी और वे जिन्हे इन तन्त्रों का ज्ञान नहीं है, क्या वे अपना मत देकर लोकतन्त्र को स्वस्थता की ओर ले जा रहे हैं? जब तक सत्य-सिद्धान्त द्वारा इन तन्त्रों को विवादमुक्त कर उसे शिक्षा पाठ्यक्रम द्वारा व्यक्ति में स्थापित नहीं किया जाता लोकतन्त्र की स्वस्थता, समाज की स्वस्थता, नैतिक उत्थान, विश्व शान्ति, विश्व एकता, विश्व रक्षा, विश्व स्थिरता सहित विश्व विकास की कामना करना असम्भव है।
समाज हो या राज्य, प्राच्य हो या पाश्चात्य, धर्म हो या धर्मनिरपेक्ष या सर्वधर्मसमभाव, एकता के लिए कर्म करने का सार्वजनिक विरोध हम नहीं कर सकते। क्योंकि यही हमारा उद्देश्य है। आधुनिक दृश्य पदार्थ विज्ञान कहता है। परमाणु संरचना में इलेक्ट्रानों की संख्या के घटने-बढ़ने से ही विभिन्न तत्वों का जन्म हुआ है और विभिन्न तत्वों के योग से विभिन्न पदार्थो का। इसी प्रकार प्राच्य अदृश्य आध्यात्म विज्ञान कहता है। मन की उच्चतम एवम् निम्नतम अवस्था से ही उच्च एवम् निम्न विचार अर्थात् दर्शन युक्त व्यक्ति का जन्म होता है। जिससे व्यक्ति का महत्व और महानता व्यक्त होती है। पुन-ऐसे व्यक्तियों के समूह से सम्प्रदाय, संगठन दल इत्यादि का जन्म होता है। यह इलेक्ट्रान और मन दोनों अस्थिर, आदान-प्रदान युक्त क्रियाशील विषय है। इनसे पूर्ण मुक्ति पर ही केन्द्र या आत्मा या एकता के दर्शन को प्रापत किया जा सकता है। इलेक्ट्रान और मन की स्थिति क्रियान्वयन दर्शन की स्थिति तथा केन्द्र या आत्मा या एकता की स्थिति विकास दर्शन की स्थिति होती है। इसलिए कर्मवेद-प्रथम, अन्तिम तथा पंचमवेद (धर्मयुक्तनाम) अर्थात् WSO:0 श्रंखला-मन की गुणवत्ता का विश्वमानक (धर्मनिरपेक्ष और सर्वधर्मसमभाव नाम) कहता है-”पूर्ण ज्ञान अर्थात्् अपने मालिक स्वंय केन्द्र में स्थित मार्गदर्शन (Guider philosophy)अर्थात् G एवम् विकास दर्शन ¼Development philosophy)अर्थात् D है। इसकी परिधि या आदान-प्रदान या व्यापार या क्रियाचक्र या क्रियान्वयन दर्शन (Operating philosophy)अर्थात् व् है। यही आध्यात्म अर्थात् अदृश्य विज्ञान का सर्वोच्च एवम् अन्तिम आविष्कार है। तथा यही पदार्थ अर्थात् दृश्य विज्ञान द्वारा अविष्कृत परमाणु की संाचना भी है। जिसके केन्द्र में G के रूप में प्रोटान-P तथा D के रूप में न्यूट्रान-N है। इसकी परिधि O के रूप में इलेक्ट्रान-E है। प्राच्य अदृश्य आध्यात्म विज्ञान तथा पाश्चात्य दृश्य पदार्थ विज्ञान में एकता का यही सूत्र है। विवाद मात्र नाम के कारण है।“
जिसके अनुसार इलेक्ट्रान या क्रियान्वयन दर्शन में विभिन्न सम्प्रदायों, संगठनों, दलों के विचार सहित व्यक्तिगत विचार हैं। जिसके अनुसार अर्थात् अपने मन या मन के समूहों के अनुसार वे समाज तथा राज्य का नेतृत्व करता हैं। जबकि ये सार्वजनिक सत्य नहीं है। इसलिए ही उन विचारों की समर्थन शक्ति कभी स्थिर नहीं रहती है। जबकि केन्द्र या आत्मा या एकता में विकास दर्शन स्थित है। केन्द्र में प्रोटॅान की स्थिति अदृश्य मार्गदर्शक दर्शन या अदृश्य विकास दर्शन की स्थिति, चंूकि यह सार्वजनिक सत्य विकास दर्शन का अदृश्य रूप है। इसलिए यह व्यक्तिगत प्रमाणित है। इसी कारण आध्यात्म भी विवाद और व्यष्ठि विचार के रूप में रहा जबकि यह सत्य था। लेकिन न्यूट्रान की स्थिति दृश्य मार्गदर्शन दर्शन या दृश्य विकास दर्शन की स्थिति है। इसलिए यह सार्वजनिक सत्य है। सम्पूर्ण मानक है, समष्टि सत्य हैं, सत्य-सिद्धान्त है। जिसकी स्थापना से व्यक्ति का मन उस चरम स्थिति में स्थापित होकर उसी प्रकार तेजी से विश्व निर्माण कर सकता है जिस प्रकार पदार्थ विज्ञान द्वारा अविष्कृत न्यूट्रान बम इस विश्व का विनाश कर सकता है। इस प्रकार WSO-0 श्रृंखला मन के निर्माण द्वारा विश्व निर्माण के प्रति प्रयोग करना कर्तव्य भी है तथा दायित्व भी है। 100 वर्ष पूर्व स्वामी विवेकानन्द जी ने अपने जीवन की इच्छा को व्यक्त करते हुये कहा था कि-”जीवन में मेरी सर्वोच्च अभिलाषा यह है कि ऐसा चक्र प्रर्वतन कर दूॅ जो कि उच्च एवम् श्रेष्ठ विचारों को सब के द्वार-द्वार पर पहुंचा दे। फिर स्त्री-पुरूष को अपने भाग्य का निर्माण स्वंय करने दो। हमारे पूर्वजों ने तथा अन्य देशों ने जीवन के महत्वपूर्ण प्रश्नों पर क्या विचार किया है यह सर्वसाधारण को जानने दो। विशेषकर उन्हें देखने दो कि और लोग क्या कर रहे हैं। फिर उन्हे अपना निर्णय करने दो। रासायनिक द्रव्य इकट्ठे कर दो और प्रकृति के नियमानुसार वे किसी विशेष आकर को धारण कर लेगें-परिश्रम करो, अटल रहो। ”धर्म को बिना हानि पहुॅचाये जनता की उन्नति“-इसे अपना आदर्श वाक्य बना लो।“ (”स्वामी विवेकानन्द राष्ट्र को आह्वान“, पृष्ठ-66 से)। क्या यह स्वामी विवेकानन्द की इच्छा की पूर्ति का कार्य नहीं है?
प्रगतिशील मानव समाज में मानव का विकास जैसे-जैसे होता गया उसके परिणामस्वरूप विभिन्न सामाजिक-असामाजिक विषय क्षेत्रों का भी विकास होता गया। समाज में प्रत्येक विषय क्षेत्रों की एक महत्वपूर्ण भूमिका है। जिसमें किसी भी क्षेत्र को पूर्ण रूप में महत्वहीन नहीं कह सकते न ही पूर्ण रूप से महत्वपूर्ण कह सकते है। क्योंकि क्षेत्र कोई भी हो मानव की अपनी दृष्टि ही उसके उपयोग और दुरूपयोग से उस क्षेत्र को महत्वहीन, महत्वपूर्ण या सामाजिक-असामाजिक रूप में निर्धारण करती है। इसलिए मानव की दृष्टि जब तक विषय क्षेत्र के गुण, अर्थ, उपयोगिता और दुरूपयोगिता के ज्ञान पर केन्द्रीत नहीं होगी तब तक किसी भी क्षेत्र को निश्चित रूप से पूर्ण-महत्वपूर्ण निर्धारण कर पाना असम्भव है। यहाँ यह कहा जा रहा है कि वाह्य विषय क्षेत्र चाहे कोई भी हो वह मूलत-मानव द्वारा ही संचालित, आविष्कृत, नियमित और स्थापित की जाती है। इसलिए मानव का ज्ञान और कर्मज्ञान ही प्रत्येक विषय क्षेत्र की उपयोगिता और दुरूपयोगिता का निर्धारण करता है।
प्रत्येक विषय का विकास सतत होता रहता है। आज हम जो कुछ भी उत्पाद व्यावहार में देखते है वह और यहाँ तक कि मानव का निर्माण भी एक लम्बे प्रक्रिया, सुधार, परीक्षण, रखरखाव इत्यादि का ही परिणाम है। सतत विकास के परिणामस्वरूप ही वह अपनी पूर्णता और अन्तिम स्वरूप को प्राप्त होता है। भारत के विकास का मूल मन्त्र भी विकास की प्रक्रिया को पार करते हुऐ अपने पूर्ण और अन्तिम स्वरूप में व्यक्त हो चुका है। भारत के पूर्ण मूलमन्त्र के स्वरूप का बीज भूतपूर्व प्रधानमन्त्री स्व0 लाल बहादुर शास्त्री ने ”जय जवान-जय किसान“ का नारा देकर कियेे। यह बीज समयानुसार भारत की मूल आवश्यकता थी, जो आज भी है और आगे भी रहेगी। यहाँ से भारत के मूलमन्त्र के स्वरूप का विकास प्रारम्भ होता है। मई 1998 में परमाणु बम परीक्षण के उपरान्त प्रधानमंन्त्री श्री अटल बिहारी बाजपेयी ने इस मूलमंन्त्र के स्वरूप के विकास क्रम में ”जय विज्ञान“ जोड़कर मूलमन्त्र के स्वरूप को ”जय जवान-जय किसान-जय विज्ञान“ के रूप में प्रस्तुत किये। जो समयानुसार आज की आवश्यकता है। जो आगे भी रहेगी।
”जय जवान-जय किसान-जय विज्ञान“ तक ही भारत के मूलमन्त्र का पूर्ण विकसित अर्थात् अन्तिम स्वरूप नहीं है क्योंकि जवान-किसान-विज्ञान तीनों स्थान पर मानव ही बैठा है इसलिए मूलमन्त्र के स्वरूप में जब तक मानव के निर्माण का सूत्र नहीं होगा तब तक मूलमन्त्र का स्वरूप भी पूर्ण नहीं हो सकता। इसी कमी को पूर्ण कर पूर्णता प्रदान करने के लिए ”विश्वबन्धुत्व“, ”वसुधैव-कुटुम्बकम्“, ”बहुजन हिताय-बहुजन सुखाय“, ”एकात्म मानवतावाद“ की स्थापना के लिए एकात्मकर्मवाद आधारित सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त (धर्मयुक्त नाम-कर्मवेद-प्रथम, अन्तिम तथा पंचमवेदीय श्रृखला अर्थात् धर्मनिरपेक्ष-सर्वधर्मसम्भाव नाम-विश्वमानक-शून्य श्रृखंला-मन की गुणवता का विश्व मानक) का आविष्कार कर ”जय ज्ञान-जय कर्मज्ञान“ को जोड़कर भारत के मूलमन्त्र को पूर्ण और अन्तिम स्वरूप-”जय जवान-जय किसान-जय विज्ञान-जय ज्ञान-जय कर्मज्ञान“ को व्यक्त किया गया है। जो समयानुसार आज की आवश्यकता है जो आगे भी रहेगी। चूँकि भारत का सर्वोच्च और अन्तिम व्यापक रूप ही विश्व है। अर्थात् भारत ही विश्व है और विश्व ही भारत है। इसलिए यह मूलमन्त्र भारत का ही नहीं सम्पूर्ण विश्व का अन्तिम मूलमन्त्र है।
”ज्ञान“ जिससे हम अपने विचारो को एकता-समभाव-बन्धुत्व-धैर्य रूप में प्रस्तुत करने में सक्षम होते है। जैसा कि मई 1998 में भारत ने परमाणु बम परीक्षण के उपरान्त उठे विश्वव्यापी विवाद को समाप्त करने के लिए ”ज्ञान“ का प्रयोग कर अपने विचारों की समभाव रूप में विश्व में समक्ष रखने में सफल हुआ। ”कर्मज्ञान“ जिससे हम समभाव में स्थित हो कर्म करते है। अर्थात् ईश्वरत्व भाव से उपलब्ध संसाधनों पर आधारित हो कर्म करते हैं। ”ज्ञान“ से हम सिर्फ एकता-समभाव-बन्धुत्व-धैर्य की भाषा बोल सकते हैं जबकि ”कर्मज्ञान“ से कार्य करते हुए एकता-समभाव-बन्धुत्व-धैर्य की भाषा बोल सकते है। ”ज्ञान“ यथावत् स्थिति बनाये रखते हुए शान्ति का प्रतीक है। तो ”कर्मज्ञान“ विकास करते हुये शान्ति बनाये रखने का प्रतीक है। ज्ञानावस्था में कर्म प्राकृतिक चेतना अर्थात् शुद्धरूप से वर्तमान स्थिति में प्राथमिकता से कर्म करना, के अन्तर्गत होता है जबकि कर्मज्ञानावस्था में कर्म प्राकृतिक चेतना समाहित सत्य चेतना अर्थात् भूतकाल का अनुभव, भविष्य की आवश्यकता के साथ प्राथमिकता के साथ वर्तमान में कार्य करना, के अन्तर्गत होता है। वर्तमान और भविष्य की आवश्यकताओ को देखते हुऐ मात्र ”ज्ञान“ से ही अब विकास सम्भव नहीं है। क्यांेकि यह अवस्था ”नीतिविहीन“ अवस्था है। अब ”नीतियुक्त“ अवस्था कर्मज्ञानावस्था की आवश्यकता है। जिसके अभाव के कारण ही संसाधनों के होते हुये भी बेरोजगारी, अपराधों का विकास, विखण्डन इत्यादि विनाशक स्थिति उत्पन्न हो रही है। इस कर्मज्ञान का आविष्कार सम्पूर्ण विश्व के मानवजाति के लिए महानतम उपलब्धि हैं।
पिछले वर्षो में लोकसभा चुनाव में विश्व के सबसे बड़े लोकतन्त्र के मतदाताओं ने ऐसी स्थिति उत्पन्न कर दी जिससे फलस्वरूप स्पष्ट जनादेश किसी भी राजनीतिक दल को प्राप्त न हो सका। राजनीतिक अस्थिारता को दूर करने के लिए कई दलों ने मिलकर सरकार का गठन किया जिससे एक नई संस्कृति की शुरूआत हुई थी और कार्यप्रणाली ”न्यूनतम साझा कार्यक्रम“ पर आधारित हुई थी। यह न्यूूनतम साझा कार्यक्रम वही कार्यक्रम था। जो सरकार बनाने वाले दलों और समर्थन करने वाले दलों के कार्यक्रम में सामान्य था। यह न्यूनतम साझा कार्यक्रम एकात्मकर्मवाद का क्रम संकुचित अर्थात्् सूक्ष्म बीज था। न्यूनतम साझा कार्यक्रम जब सम्पूर्ण मानव समाज अर्थात्् विश्व स्तर तक उठकर आविश्कृत किया जा तो वह उसी एकात्मकर्मवाद के क्रम संकुचित बीज का विकसित अर्थात्् सर्वोच्च स्तर होगा और वह ”विश्व व्यवस्था का न्यूनतम एवम अधिकतम साझा कार्यक्रम कहलाएगा।“
जब तक व्यक्ति अपने मन को एकात्मवाद के सर्वोच्च स्तर पर केन्द्रित कर उसे सत्यार्थ करने का प्रयत्न किया तब-तब वह व्यक्ति महापुरूष के रूप में व्यक्त हुए। जबकि औषधि आधारित अर्थववेद में इस एकात्मवाद की उपयोगिता का ज्ञान पहले से ही विद्यमान है। जिसके सम्बन्ध में स्वामी विवेकानन्द जी कहते हैं-”अत-यदि भारत को महान बनाना है, तो इसके लिए आवश्यकता है संगठन की, शक्ति संग्रह की और बिखरी हुई इच्छाशक्ति को एकत्र कर उसमें समन्वय लाने की। अथर्ववेद संहिता की एक विलक्षण ऋचा याद आ गयी जिसमें कहा गया है, ”तुम सब लोग एक मन हो जाओ, सब लोग एक ही विचार के बन जाओ। एक मन हो जाना ही समाज गठन का रहस्य है बस इच्छाशक्ति का संचय और उनका समन्वय कर उन्हें एकमुखी करना ही सारा रहस्य है।“ (देखें ”नया भारत गढ़ो“ पृष्ठ संख्या-55) एकात्म भाव के सम्बन्ध में स्वामी जी कहते हैं-”यह भी न भूलना चाहिए कि हमारे बाद जो लोग आएंगे, वे उसी तरह हमारे धर्म और ईश्वर सम्बन्धी धारणा पर हँसेंगे, जिस तरह हम प्राचीन लोगों के धर्म और ईश्वर की धारणा पर हँसते हैं। यह सब होने पर भी, इन सब ईश्वर सम्बन्धित धारणाओं का संयोग करने वाला एक स्वर्ण सूत्र है और वेदान्त का उद्देश्य है-इस सूत्र की खोज करना। भागवान कृष्ण ने कहा है-”भिन्न भिन्न मणियाँ जिस प्रकार एक सूत्र में पिरोयी जा सकती हैं, उसी प्रकार इन सब विभिन्न भावों के भीतर भी एक सूत्र विद्यमान है।“ (देखें ”ज्ञानयोग“, पृष्ठ संख्या-65) और स्वर्ण सूत्र के सम्बन्ध में स्वामी जी कहते हैं-एक शब्द में वेदान्त का आदर्श है-मनुष्य के सच्चे स्वरूप को जानना।“ (देखें ”विवेकानन्द राष्ट्र को आह्वान“, पृष्ठ सं0-48)। पं0 दीनदयाल उपाध्याय जी की अनुभूति भी एकात्मभाव के सर्वोच्च स्तर पर केन्द्रित थी जिसे ”एकात्म मानवतावाद“ के रूप में जाना जाता है।
विश्व शान्ति, एकता एवम् विकास के लिए गठित अन्तर्राष्ट्रीय संघ-संयुक्त राष्ट्र संघ के द्वारा धीरे-धीरे स्वास्थ्य, व्यापार, संचार, पर्यावरण इत्यादि को अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर विचार कर उसे स्थापित किया जा रहा है। जो वर्तमान समय में मनुष्य के भविष्य की आवश्यकता है। क्योंकि बढ़ते जनसंख्या के कारण प्रतयेक व्यक्ति के क्रियाकलाप का प्रभाव किसी न किसी रूप में विश्व व्यवस्था पर भी पड़ रहा है। परिणामस्वरूप यह आवश्यक हो गया है कि आने वाली शदी और उसके उपरान्त के समय के लिए ”विश्व व्यवस्था का न्यूनतम एवम् अधिकतम साझा कार्यक्रम“ का आविष्कार एवम् स्थापना हो। तभी मानव समाज स्वंय को लगातार विकास की ओर अग्रसर करता रह सकता है।
वर्तमान समय में भारत अपने शारीरिक स्वतन्त्रता और संविधान के पचासवें वर्ष को मना चुका है। जिसके सम्बन्ध में उस वर्ष संसद में ”पचास वर्ष की उपलब्धियां एवम् आवश्यकता“ पर संसद सदस्यों द्वारा विचार प्रस्तुत किये गये। हमारे सामने यह प्रश्न है कि स्वस्थ समाज और स्वस्थ लोकतन्त्र की प्राप्ति किस प्रकार हो? यह तभी सम्भव हो पाएगा, जब ”विश्व व्यवस्था का न्यूनतम एवम् अधिकतम साझा कार्यक्रम को आविष्कृत कर उसे विश्व शिक्षा के रूप में स्थापित किया जाय, जिससे प्रत्येक व्यक्ति ही विश्व हो जाय। शिक्षा के सम्बन्ध में स्वामी विवेकानन्द जी का कहना था कि ”शिक्षा का मतलब यह नहीं है कि तुम्हारे दिमाग में ऐसी बहुत सी बातें इस तरह ठूस दी जाय जो आपस में लड़ने लगे और तुम्हारा दिमाग उन्हें जीवन भर में हजम न कर सके। जिस शिक्षा से हम अपना जीवन निर्माण कर सकें, मनुष्य बन सकें, चरित्र गठन कर सकें और विचारों का सामन्जस्य कर सकें, वही वास्तव में शिक्षा कहलाने योग्य है। यदि तुम पांच ही भावों को हजम कर तदनुसार जीवन और चरित्र गठन कर सके हो तो तुम्हारी शिक्षा उस आदमी की अपेक्षा वहुत अधिक है, जिसने एक पूरी की पूरी लाइब्रेरी ही कण्ठस्थ कर ली है।“ (देखें ”भारत में विवेकानन्द“, पृष्ठ सं0-252)।
भूमण्डलीकरण या अन्तर्राष्ट्रीयकरण के युग में पिछले वर्षो गेट समझौता (विश्व व्यापार संगठन) द्वारा बाजार का भी अन्तर्राष्ट्रीयकरण किया गया। जिसके परिणामस्वरूप देश के मानक (भारतीय मानक व्यूरो) से उठकर विश्व मानक (अन्तर्राष्ट्रीय मानकीकरण संगठन) में मानव द्वारा निर्मित उत्पादों का मानकीकरण होने लगा। इस प्रकार औद्योगिक इकाइयों को वाह्य विषयों के निर्माण की गुणवत्ता का आई0 एस0 ओ0-9000 श्रृंखला तेजी से प्रदान की जाने लगी। इस श्रृंखला की तेजी से सफलता एवं उत्पादों के उपयोग की मानसिकता तभी तक बनीं रह सकती है। जब समाज, संगठन एवं मानव द्वारा निर्माण किये जा रहे मानव मन की गुणवत्ता की श्रृंखला आई0 एस0 ओ0-शून्य श्रृंखला को स्थापित किया जाय अर्थात्् अन्त-विषय मानव मन में स्थापित किया जाय। यह मन की गुणवत्ता का मानक या विश्वमन या आई0 एस0 ओ0-शून्य श्रृंखला ही ”विश्व व्यवस्था का न्यूनतम एवं अधिकतम साझा कार्यक्रम“ होगा।
प्रश्न यह है कि सेक्युलर अर्थात्् धर्म निरपेक्ष या सर्वधर्मसमभाव भारतीय संविधान के समर्थन में ”अथर्ववेद का एकमन“, ”कृष्ण का एक सूत्र“, ”वेदान्त का उद्देश्य-स्वर्ण सूत्र“, ”स्वामी विवेकानन्द का एक शब्द एवं पाँच भाव“ एवं ”पं0 दीनदयाल उपाध्याय का एकात्म मानवतावाद“ को किस प्रकार अविष्कृत एवं सत्यार्थ किया जाये क्योंकि ये सभी धर्मयुक्त नाम हैं। अर्थात्् भारतीय संविधान के अनुसार अयोग्य है। अर्थात्् इस अविष्कार का प्रत्येक नाम धर्मनिरपेक्ष एवं सर्वधर्मसमभाव नाम युक्त होना चाहिए।
लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा इस सम्बन्ध में अधिक स्पष्ट कहा गया है-”यदि तुम समग्र जगत के ज्ञान से पूर्ण होना चाहते हो तो पाँच भाव-विचार एवं साहित्य, विषय एवं विशेषज्ञ, ब्रह्माण्ड (स्थूल एवं सूक्ष्म) के प्रबन्ध और क्रियाकलाप, मानव (स्थूल एवं सूक्ष्म) के प्रबन्ध और क्रियाकलाप तथा उपासना स्थल का सामंजस्य कर एक मुखी कर लो। यही समग्र जगत का ज्ञान है, भविष्य है, रहस्य है, पूर्ण ज्ञान है, समाज गठन है, पुस्तकालय के ज्ञान से सर्वोच्च है।“ विचार के सम्बन्ध में कहा गया है-”यह अद्वैत (एकत्व) ही धर्मनिरपेक्ष है, सर्वधर्मसमभाव है। वेदान्त तथा मानव का सर्वोच्च दर्शन है। जहाँ से मानव विशिष्टाद्वैत, द्वैत एवं वर्तमान में मतवाद के मानसिक गुलामी में गिरा है परन्तु मानव पुन-इसी के उल्टे क्रम से उठकर अद्वैत में स्थापित हो जायेगा। तब वह धर्म में स्थापित एवं विश्वमन से युक्त होकर पूर्ण मानव अर्थात्् ईश्वरस्थ मानव को उत्पन्न करेगा।“ साहित्य के सम्बन्ध में कहा गया है कि-”मानव एवं प्रकृति के प्रति निष्पक्ष, संतुलित एवं कल्याणार्थ कर्म ज्ञान के साहित्य से बढ़कर आम आदमी से जुड़ा साहित्य कभी भी आविष्कृत नहीं किया जा सकता। यहीं एक विषय है जिससे एकता, पूर्णता एवं रचनात्मकता एकात्म भाव से लाई जा सकती है। संस्कृति से राज्य नहीं चलता कर्म ज्ञान से राज्य चलता है। संस्कृति तभी तक स्वस्थ बनी रहती है जब तक पेट में अन्न हो, व्यवस्थाएं सत्य सिद्धान्त युक्त हों, दृष्टि पूर्ण मानव निर्माण पर केन्द्रित हो। संस्कृति कभी एकात्म नहीं हांे सकती लेकिन रचनात्मक दृष्टिकोण एकात्म होता है जो कालानुसार कर्म ज्ञान और कर्म है। अदृश्य काल में अनेकात्म तथा दृश्य काल में एकात्म कर्म ज्ञान अर्थात्् एकात्म रचनात्मक दृष्टिकोण होता है यहीं कर्म आधारित भारतीय संस्कृति है जो प्रारम्भ में भी था और अन्त में पुन-स्पष्ट हो रहा है यहीं सभी संस्कृतियों का मूल भी है।“ काल के सम्बन्ध में कहा गया है-”जब व्यष्टिमन की शान्ति अन्त-विषयों जो सिर्फ अदृश्य विषय मन द्वारा ही प्रमाणित होता है, पर केन्द्रित होती है तो उसे व्यष्टि अदृश्य काल कहते हंै तथा जब व्यष्टि मन की शान्ति दृश्य विषयों अर्थात्् वाह्य विषयों, जो सार्वजनिक रुप से प्रमाणित है पर केन्द्रित होता है तो उसे व्यष्टि दृश्यकाल कहते हैं इसी प्रकार सम्पूर्ण समाज का मन जब अदृश्य विषयों पर केन्द्रित होती है तो उसे समष्टि अदृश्य काल कहते हंै तथा जब सम्पूर्ण समाज का मन जब दृश्य विषयों पर केन्द्रित होता है तो उसे समष्टि दृष्यकाल कहते हैं“ कर्म ज्ञान के सम्बन्ध में कहा गया है कि-”व्यक्ति जब सम्पूर्ण समष्टि अदृश्य काल में हो तो उसे अदृश्य कर्म ज्ञान के अनुसार तथा जब सम्पूर्ण समष्टि दृश्य काल में हो तो उसे दृश्य कर्म ज्ञान के अनुसार कर्म करने चाहिए तभी वह ब्रह्माण्डीय विकास के लिए धर्मयुक्त या एकता बद्ध होकर कार्य करेगा।“ स्वर्ण सूत्र के सम्बन्ध में कहा गया है कि-”मानक अर्थात्् आत्मा अर्थात्् सत्य-धर्म-ज्ञान स्थिर रहता है लेकिन मन को इस ओर लाने वाले सूत्र भिन्न-भिन्न होंगे क्योंकि जो उत्पन्न है वह स्थिर नहीं है। अदृश्य काल में यह सूत्र अनेक होंगे लेकिन दृश्य काल के लिए हमेशा एक ही होगा क्योंकि वह सार्वजनिक प्रमाणित होगा।“ स्वर्ण सूत्र के गुण के सम्बन्ध में कहा गया है कि-”अत-यदि भारत को महान बनना है, विश्वगुरु बनाना है, भारतीय संविधान को विश्व संविधान में परिवर्तित करना है तो एकात्मकर्मवाद पर आधारित दृश्य काल के लिए एक शब्द चाहिए जो परिचित हो, केवल उसकी शक्ति का परिचय कराना मात्र हो, स्वभाव से हो, स्थिर हो, समष्टि हो, दृश्य हो, सम्पूर्ण हो, विवादमुक्त हो, विश्वभाषा में हो, आध्यात्मिक एवं भौतिक कारण युक्त हो, सभी विश्वमन के तन्त्रों, व्यक्ति से संयुक्त राष्ट्र संघ के सच्चे स्वरुप एवं विश्व के न्यूनतम एवं अधिकतम साझा कार्यक्रम को प्रक्षेपित करने में सक्षम हो, मानव एवं प्रकृति के विकास में एक कड़ी के रुप मंे निर्माण के लिए सक्षम हो, मानव एवं प्रकृति के विकास के कल्याणार्थ, निष्पक्ष, सर्वोच्च दृश्य ज्ञान व दृश्य कर्म ज्ञान का संगम हो अदृश्य काल के विकास के सात चक्रों (पाँच अदृश्य कर्म चक्र एवं दो अदृश्य ज्ञान कर्म चक्र जो सभी सम्प्रदायों और धर्मों का मूल है) को दृश्य काल के सात चक्रों (पाँच दृश्य कर्म चक्र, एक दृश्य ज्ञान कर्म चक्र और एक अदृश्य ज्ञान कर्म चक्र) को प्रक्षेपित करने में सक्षम हो, को स्थापित करना पड़ेगा। यह भारत सहित नव विश्व निर्माण का सूत्र है, अन्तिम रास्ता है और उसका प्रस्तुतीकरण प्रथम प्रस्तुतीकरण होगा।“ जिसके सम्बन्ध में स्वामी विवेकानन्द जी ने कहा था कि ”हिन्दू भावों को अंग्रेजी में व्यक्त करना, फिर शुष्क दर्शन, जटिल पौराणिक कथाएँ और अनूठे आश्चर्यजनक मनोविज्ञान से ऐसे धर्म का निर्माण करना, जो सरल, सहज और लोकप्रिय हो और उसके साथ ही उन्नत मस्तिष्क वालों को संतुष्ट कर सके-इस कार्य की कठिनाइयों को वे ही समझ सकते हैं, जिन्होंने इसके लिए प्रयत्न किया हो। अद्वैत के गुढ़ सिद्धान्त में नित्य प्रति के जीवन के लिए कविता का रस और जीवन दायिनी शक्ति उत्पन्न करनी है। अत्यन्त उलझी हुई पौराणिक कथाओं में से जीवन प्रकृत चरित्रों के उदाहरण समूह निकालने हैं और बुद्धि को भ्रम में डालने वाली योगविद्या से अत्यन्त वैज्ञानिक और क्रियात्मक मनोविज्ञान का विकास करना है और इन सब को एक ऐसे रुप में लाना पड़ेगा कि बच्चा-बच्चा इसे समझ सके। (पत्रावली, पृष्ठ-425)“ वर्तमान समय में विवादास्पद शब्द ”सेक्युलर“ को स्पष्ट करते हुए लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा कहा गया है कि-”जब सभी सम्प्रदायों को धर्म मानकर हम एकत्व की खोज करते हैं तब दो भाव उत्पन्न होते हैं। पहला-यह कि सभी धर्मों को समान दृष्टि से देखें तब उस एकत्व का नाम सर्वधर्मसमभाव होता है। दूसरा-यह कि सभी धर्मों को छोड़कर उस एकत्व को देखें तब उसका नाम धर्म निरपेक्ष होता है। जब सभी सम्प्रदायों को सम्प्रदाय की दृष्टि से देखते हैं तब एक ही भाव उत्पन्न होता है और उस एकत्व का नाम धर्म होता है। इन सभी भावों में हम सभी उस एकत्व के ही विभिन्न नामों के कारण विवाद करते हैं अर्थात्् सर्वधर्मसमभाव, धर्मनिरपेक्ष एवं धर्म विभिन्न मार्गों से भिन्न-भिन्न नाम के द्वारा उसी एकत्व की अभिव्यक्ति है। दूसरे रुप में हम सभी सामान्य अवस्था में दो विषयों पर नहीं सोचते, पहला-वह जिसे हम जानते नहीं, दूसरा-वह जिसे हम पूर्ण रुप से जान जाते हैं। यदि हम नहीं जानते तो उसे धर्मनिरपेक्ष या सर्वधर्मसमभाव कहते हैं जब जान जाते हैं तो धर्म कहते हैं। इस प्रकार आई0 एस0 ओ0-शून्य श्रृंखला उसी एकत्व का धर्मनिरपेक्ष एवं सर्वधर्मसमभाव नाम तथा कर्मवेद-प्रथम, अन्तिम तथा पंचमवेदीय श्रृंखला उसी एकत्व का धर्मयुक्त नाम है तथा इन समस्त कार्यों को सम्पादित करने के लिए जिस शरीर का प्रयोग किया जा रहा है उसका धर्मयुक्त नाम-लव कुश सिंह है तथा धर्मनिरपेक्ष एवं सर्वधर्मसमभाव सहित मन स्तर का नाम विश्वमानव है जब कि मैं (आत्मा) इन सभी नामों से मुक्त है।“
विचार प्रसार एवं विचार स्थापना के लिए कहा गया है कि-”विचार प्रसार एवं विचार स्थापना में एक मुख्य अन्तर है। विचार प्रसार, विचाराधीन होता है। वह सत्य हो भी सकता है और नहीं भी हो सकता परन्तु विचार स्थापना सत्य होता है। विचार स्थापना में नीति प्रयोग की जाती है जिससे उसका प्रभाव सत्य के पक्ष में बढ़ता रहता है और यह विचार स्थापक एवं समाज पर निर्भर करता है जबकि विचार प्रसार में किसी नीति का प्रयोग नहीं होता है जिससे उसका प्रभाव पक्ष पर एवं विपक्ष दोनों ओर हो सकता है और वह सिर्फ समाज के उपर निर्भर करता हैै।“
इस प्रकार एकात्मकर्मवाद सत्य अर्थों में प्राच्य एवं पाश्चात्य, समाज एवं राज्य, धर्म, धर्मनिरपेक्ष एवं सर्वधर्मसमभाव की एकता के साथ स्वस्थ लोकतन्त्र, स्वस्थ समाज, स्वस्थ उद्योग, नैतिक उत्थान, विश्व व्यवस्था, विश्वएकता, विश्व शान्ति, विश्व विकास, विश्व के भविष्य और उसके नवनिर्माण का प्रथम माॅडल है जो वर्तमान समाज की आवश्यकता ही नहीं अन्तिम मार्ग है।