Sunday, March 15, 2020

युग परिवर्तन और परिवर्तनकर्ता का शास्त्रीय आधार

युग परिवर्तन और परिवर्तनकर्ता का शास्त्रीय आधार
शुक्रवार, 21 दिसम्बर, 2012 ई. 
के बाद
शनिवार, 22 दिसम्बर, 2012 ई. 
से
दूसरे और अन्तिम दृश्य काल, 
8वें मनवन्तर सांवर्णि मनु, 
दसवें और अन्तिम अवतार-कल्कि महावतार, 
पाँचवें, प्रथम और अन्तिम स्वर्णयुग, 
नये शास्त्र और नये व्यास 
के आरम्भ का शास्त्रीय आधार
काल, समय या युग परिवर्तन कब होगा? कैसे होगा और किस मानव शरीर के द्वारा होगा? और भविष्य के प्रति जिज्ञासा मानव स्वभाव का सबसे रूचिकर विषय है। इस आधार पर अनेक व्यापार भी चल रहें हैं। उपरोक्त प्रश्नों के हल को पाने के लिए हमें मानव सभ्यता के प्रारम्भ से चले आ रहे और समय-समय पर अन्य धर्म शास्त्रों के मान्यताओं तथा भविष्यवक्ताओं के विषय में जानना आवश्यक होगा।

अ. हिन्दू शास्त्र व मान्यता के अनुसार 
प्राचीन हिन्दू खगोलीय और पौराणिक पाठ्यों में वर्णित समय चक्र आश्चर्यजनक रूप से एक समान है। प्राचीन भारतीय भार और मापन पद्धतियाँ, अभी भी प्रयोग में हैं। इसके साथ-साथ ही हिन्दू ग्रन्थों में लम्बाई, भार, क्षेत्रफल मापन की भी इकाईयाँ परिमाण सहित उल्लेखित हैं। हिन्दू समय मापन (काल व्यवहार) में नाक्षत्रीय मापन, वैदिक समय इकाईयाँ, चाँद्र मापन, ऊँष्ण कटिवन्धीय मापन, पितरों की समय गणना, देवताओं की काल गणना, पाल्या इत्यादि हैं।

1. वेद व पुराण के अनुसार 
हिन्दू पुराण के अनुसार ब्रह्माण्ड का सृजन क्रमिक रूप से सृष्टि के ईश्वर ब्रह्मा द्वारा होता है जिनकी जीवन 100 ब्राह्म वर्ष होता है। ब्रह्मा के 1 दिन को 1 कल्प कहते हैं। 1 कल्प, 14 मनु (पीढ़ी) के बराबर होता है। 1 मनु का जीवन मनवन्तर कहलाता है और 1 मनवन्तर में 71 चतुर्युग (अर्थात 71 बार चार युगों का आना-जाना) के बराबर होता है। ब्रह्मा का एक कल्प (अर्थात 14 मनु अर्थात 71 चतुर्युग) समाप्त होने के बाद ब्रह्माण्ड का एक क्रम) समाप्त हो जाता है और ब्रह्मा की रात आती है। फिर सुबह होती है और फिर एक नया कल्प शुरू होता है। इस प्रकार ब्रह्मा 100 वर्ष व्यतीत कर स्वयं विलिन हो जाते हैं। और पुनः ब्रह्मा की उत्पत्ति होकर उपरोक्त क्रम का प्रारम्भ होता है। गिनीज बुक आॅफ वर्ल्ड रिकार्ड्स ने कल्प को समय का सर्वाधिक लम्बा मापन घोषित किया है।
काल मनवन्तर के मनु के नाम  अवतार
भूतकाल 1. स्वायंभुव मनु यज्ञ  
भूतकाल 2. स्वारचिष मनु विभु 
भूतकाल 3. उत्तम मनु सत्यसेना
भूतकाल 4. तामस मनु हरि
भूतकाल 5. रैवत मनु वैकुण्ठ
भूतकाल 6. चाक्षुष मनु अजित
वर्तमान 7. वैवस्वत  वामन
भविष्य 8. सावर्णि मनु सार्वभौम
भविष्य 9. दत्त सावर्णि मनु रिषभ
भविष्य 10. ब्रह्म सावर्णि मनु विश्वकसेन
भविष्य 11. धर्म सावर्णि मनु धर्मसेतू 
भविष्य 12, रूद्र सावर्णि मनु सुदामा
भविष्य 13. दैव सावर्णि मनु योगेश्वर
भविष्य 14. इन्द्र सावर्णि मनु वृहद्भानु
हम वर्तमान में ब्रह्मा के 58वें वर्ष में 7वें मनु-वैवस्वत मनु के शासन में श्वेतवाराह कल्प के द्वितीय परार्ध में, 28वें चतुर्युग का अन्तिम युग-कलियुग के ब्रह्मा के प्रथम वर्ष के प्रथम दिवस में विक्रम सम्वत् 2069 (सन् 2012 ई0) में हैं। वर्तमान कलियुग ग्रेगोरियन कैलेण्डर के अनुसार दिनांक 17-18 फरवरी को 3102 ई.पू. में प्रारम्भ हुआ था। इस प्रकार अब तक 15 नील, 55 खरब, 21 अरब, 97 करोड़, 61 हजार, 624 वर्ष इस ब्रह्मा के सृजित हुए हो गये हैं
विश्व का सृजन, विनाश और पुनः सृजन प्रत्येक 43,20,000 वर्ष के बाद होता है। जो एक के बाद एक आने वाले चार युग क्रमशः 1. सतयुग (स्वर्णयुग, आयु-1728000 वर्ष), 2. त्रेतायुग (रजतयुग, आयु-1296000 वर्ष), 3. द्वापरयुग (ताम्रयुग, आयु-864000 वर्ष), 4. कलियुग (लौहयुग, आयु-432000 वर्ष) है। प्रथम युग के बाद आने वाला युग अपने पहले के युग से कम आयु का होता है। ये चारो युग 25,920 वर्ष के चक्र में विभाजित होते हैं। प्रत्येक चक्र में चार राशियाँ क्रमशः कुंभ, वृष, सिंह और वृश्चिक बारी - बारी से आते-जाते हैं। चारो राशि चक्र को संयुक्त रूप से राशि चक्र (जोडिएक साइकिल) कहते हैं। प्रत्येक राशि 25,920 वर्ष के चैथे हिस्से 6,480 (या 6,500) वर्ष में आना-जाना होता है। इस समय हमारा प्रवेश कुंभ राशि में हो रहा है।
चतुर्युग के युगों में विशेष कला के साथ विष्णु के अवतार होते हैं। वर्तमान चतुर्युग में भगवान विष्णु के अभी तक 9 अवतार क्रमशः मत्स्य, कूर्म, वाराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण व बुद्ध हो चुके हैं। दसवाँ कल्कि अन्तिम महाअवतार अभी होना है जो सफेद घोड़े पर सवार होकर हाथ में तलवार लेकर समस्त बुराईयों का नाश करेगें, ऐसी मान्यता है। (इन अवतारों के विषय में हम आगे विस्तृत रूप से पढ़ेगें)
ब्रह्मवैवर्त, विष्णु, भागवत, पद्म, गरूण तथा भविष्य पुराण में भगवान विष्णु के दसवें तथा महावतार ”कल्कि“ का वर्णन है। कहा गया है कि कलियुग शुरू होने के 5000 वर्ष बाद, 10,000 वर्षो तक भक्ति का प्रभाव बढ़ेगा। कलियुग के अन्त से भगवान विष्णु के अवतार से जुड़ी तथा शिव की भविष्यवाणीयाँ हैं, जो सृष्टि के संहारक व सर्जक हैं।
भागवत पुराण में सैद्धान्तिक रूप से एक ऐसे ग्रहण का उल्लेख पाया जाता है जो एक अवतार की सच्चाई का प्रमाण माना गया है।
यदा चन्द्रश्च सूर्यश्च तिक बृहस्पति ।  एक राशै समेश्यन्ति तदा भवति तत्कृता ।।  (श्रीमद् भागवत पुराण, स्कन्द-12, अध्याय-2)
अर्थात जब पुख नक्षत्र चन्द्रमा, सूर्य और बृहस्पति एक राशि समानवस्था में एकत्रित होते हैं तो सतयुग का आरम्भ होता है।
ऐसी अवस्था में सूर्य और चन्द्रमा को ग्रहण लगना अनिवार्य होता है। यह योग कहलाता है। यह योग परमेश्वर या प्रकट होने वाले अवतार या सुधारक की सत्यता को दिखाता है। महर्षि व्यास रचित और ईश्वर के आठवें अवतार श्री कृष्ण के मुख से व्यक्त श्रीमद्भगवद्गीता में भी अवतार के होने का प्रमाण मिलता है।
यदा-यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारतः। अभियुत्थानम् धर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।। (श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय-4, श्लोक-7)
अर्थात हे भारत! जिस काल में धर्म की हानि होती है, और अधर्म की अधिकता होती है। उस काल में ही मैं अपनी आत्मा को प्रकट करता हूँ।

2. पं0 श्रीराम शर्मा आचार्य के अनुसार 
”अखिल विश्व गायत्री परिवार“ के संस्थापक, ”युग निर्माण योजना“ के संचालक व 3000 से भी अधिक पुस्तक-पुतिकाओं के लेखक पं0 श्रीराम शर्मा आचार्य (जन्म-20 सितम्बर, 1911, मृत्यु-2 जून, 1990), जिनके कई लाख समर्थक-सदस्य हैं, के द्वारा लिखित व विश्लेषित पुस्तक ”युग-परिवर्तन: कैसे और कब“ में काल सम्बन्धित शास्त्रीय व्याख्या व कलयुग की समाप्ति का तथ्य प्रस्तुत किया गया है।
इस पुस्तक के भूमिका में लिखा है- ”सभी एक स्वर से यह कह रहें हैं कि प्रस्तुत वेला युग परिवर्तन की है। इन दिनों जो अनीति व अराजकता का साम्राज्य दिखाई पड़ रहा है, इन्हीं का बोलबाला दिखाई दे रहा है, उसके अनुसार परिस्थितियों की विशमता अपनी चरम सीमा पर पहुँच गयी है। ऐसे ही समय में भगवान ”यदा-यदा हि धर्मस्य“ की प्रतिज्ञा के अनुसार असन्तुलन को सन्तुलन में बदलने के लिए कटिबद्ध हो ”संभवामि युगे युगे“ की अपनी प्रतिज्ञा को पूरा करने के लिए आते रहें हैं। ज्योतिर्विज्ञान प्रस्तुत समय को जो 1850 ई. सदी से आरम्भ होकर 2005 ई. सदी में समाप्त होगा- संधि काल, परिवर्तन काल, कलियुग के अन्त तथा सतयुग के आरम्भ का काल मानता चला आया है।
                                          
इसलिए इस समय को युगसंधिकाल की वेला कहा गया है। कुछ रूढ़िवादी पण्डितों के अनुसार नया युग आने में अभी 3 लाख 34 हजार वर्ष की देरी है, किन्तु यह प्रतिपादन भ्रामक है, यह वास्तविक काल गणना करने पर पता चलता है। हरिवंशपुराण के भविष्य पर्व से लेकर श्री मद्भागवत्गीता का उल्लेख कर परम पूज्य गुरूदेव ने इसमें यह प्रमाणित किया है कि वास्तविक काल गणना के अनुसार सतयुग का समय आ पहुँचा। हजार महायुगों का समय जहाँ ब्रह्मदेव के एक दिवस के बराबर हो व ऐसे ही हजार युगों के बराबर रात्रि हो, वहाँ समझा जा सकता है कि काल की गणना को समझने में विद्वत्जनों द्वारा कितनी त्रुटि की गयी है। 
परमपूज्य गुरूदेव ने लिखा है कि 1980 ई0 से 2000 ई0 व बाद का कुछ समय अन्याय को निरस्त करने और सृजन को समुन्नत बनाने वाली, देव शक्तियों के प्रबल पुरूषार्थ के प्रकटीकरण का समय है। जब भी ऐसा होता है, तब दैवी प्रकोप विभीषिकाएँ विनाशकारी घटनाक्रम मनुष्य जाति पर संकटों के बादल के रूप में गहराने लगते हैं, ऐसी व्याधियाँ फैलती दिखाई देती हैं जो कभी न देखी, सुनी गयी, किन्तु समय रहते ही यह सब ठीक होता चला जाता है।
देखें तो, वस्तुतः विज्ञान के वरदानों ने मनुष्य को आज इतना कुछ दे दिया है कि सब कुछ आज उसकी मुट्ठी में है। द्रुतगामी वाहनों ने जहाँ आज दुनिया को बहुत छोटा बना दिया है, वहाँ इसका एक बहुत बड़ा प्रभाव मानव की मानसिक शान्ति, पारिवारिक’दाम्पत्य-जीवन एवं सामाजिकता वाले पक्ष पर भी पड़ा है। विज्ञान ने वरदान के साथ प्रदूषण को बढ़ाकर ओजोन परत को पतला कर पराबैगनी किरणों तथा अन्यान्य कैंसर को जन्म देने वाले घातक रोगाणुओं की पृथ्वी पर वर्षा का निमित्त भी स्वयं को बना लिया है। सात लाख मेगावाट अणु बमों की शक्ति के बराबर ऊर्जा प्रतिदिन पृथ्वी पर फंेकने वाला सूर्य इन दिनों कुपित है। सौरकलंक, सूर्य पर धब्बे बढ़ते चले जा रहे हैं। सूर्य ग्रहणों की एक श्रृंखला इस सदी के अन्त तक चलेगी जिसका बड़ा प्रभाव जीव समुदाय पर पड़ने की सम्भावना है।
परमपूज्य गुरूदेव एक दृष्टा, मनीषी, भविष्यवक्ता थे। जो भी उन ने 1940 ई0 से अब तक लिखा, समय‘समय पर वह सब होता चला गया। इस खण्ड में उनने अतिन्द्रिय दृष्टा महायोगी श्री अरविन्द से लेकर, बरार के विद्वान ज्योतिषि श्री गोपीनाथ शास्त्री, चुलैट, रोमारोलाँ, भविष्यवक्ता व हस्तरेखाविद् कीरों, महिला ज्योतिष बोरिस्का, बाइबल की भविष्यवाणीयाँ, नार्वे के प्रसिद्ध योगी आनन्दाचार्य, जीन डीक्सन, एण्डरसन गेरार्ड क्राइसे, चाल्र्स क्लार्क, प्रो. हटार, जमल वर्न, जार्ज बावेरी से लेकर कल्कि पुराण तथा आज के कम्प्यूटर युग में यूरोपिया द्वारा भविष्यवाणी करने वाले विद्वानों एल्विनटाॅफलर, फ्रिटजामा, प्रो0 हरीश मैकरे आदि का हवाला देते हुए, आने वाले दिनों के स्वरूप के विषय में लिखा है। उज्जवल भविष्य के दृष्टा परमपूज्य गुरूदेव ने समय-समय पर कहा है कि स्रष्टा को सुव्यवस्था और सुन्दरता ही प्रिय है।
संकटों की घड़ियाँ आसन्न दिखते हुए भी वह विश्वास नहीं छूटना चाहिए कि स्रष्टा अपनी इस अद्भ्ुात कलाकृति विश्वसुधा को, मानवी सत्ता को, सुरम्य, वाटिका को विनाश के गर्त में गिरने से पहले ही बचा लेता व अपनी सक्रियता का परिचय देता है। परिस्थितियों को उलटने का चमत्कार-युग परिवर्तन का उपक्रम रचने वाला पराक्रम करना ही इस युग के अवतार का प्रज्ञावतार का उद्देश्य है, यह भलि-भाँति आत्मसात् होता चला जाता है, पूज्यवर की पंक्तियों को पढकर, पूज्यवर ने लिखा है- ”अवतार सदा ऐसे ही कुसमय में होते रहे हैं, जैसा कि आज है। अवतारों ने लोक चेतना में ऐसी प्रबल प्रेरणा भरी है, जिसमें अनुपयुक्त को उपयुक्त में बदल देने का उत्साह लगने वाली संभावनाएँ सरल होती प्रतीत हों। दिव्य चक्षु युगान्तरीय चेतना को गंगावतरण की तरह धरती पर उतरते देख सकते हैं“ अपने 1990 ई0 के बसंत पर्व पर, महाकाल के संदेश में उनने प्रत्येक से प्रज्ञाअवतार के साथ, साझेदारी करने की बात को, समय की सबसे बड़ी समझदारी बताया तथा लिखा कि अब सभी के मन में ऐसी उमंगे उठनी चाहिए कि युग परिवर्तन की महाक्रान्ति में उनकी कुछ सराहनीय भूमिका निभ सकें। यह आमंत्रण सबके लिए है- ”इक्कीसवीं सदी-उज्जवल भविष्य“ का उद्घोष पूज्यवर ने आशावादिता की उमंगों को जिन्दा रखने के लिए दिया एवं उसी का सन्देश इस वांगमय में है।
  - ब्रह्मवर्चस
उनके अनुसार काल गणना के सन्दर्भ में युग शब्द का उपयोग अनेक प्रकार से होता है। जिन दिनो जिस प्रचलन का प्रभाव की बहुलता होती है उसे उसी नाम से पुकारा जाने लगता है। जैसे- ऋषियुग, सामंतयुग, जनयुग आदि। रामराज्य के दिनों की सर्वतोन्मुखी, प्रगति, शान्ति और सुव्यवस्था को सतयुग के नाम से जाना जाता है। कृष्ण की विशाल भारत निर्माण सम्बन्धी योजना के एक संघर्ष पक्ष को महाभारत नाम दिया जाता है। परीक्षित के काल में कलियुग के आगमन और उससे राजा के संभाषण अनुबंधों का पुराण गाथा में वर्णन है।
अब भी रोबोटयुग, कम्प्यूटरयुग, विज्ञानयुग आदि की चर्चा होती रहती है। अनेक लेखक अपनी रचनाओं के नाम युग शब्द जोड़कर करते हैं। जैसे यशपाल जैन का युगबोध आदि। यहाँ युग शब्द का अर्थ जमाने से है। जमाना अर्थात उल्लेखनीय विशेषता वाला जमाना, एक एरा, एक पीरीयड। इसी सन्दर्भ में आमतौर से ”युग“ शब्द का प्रयोग होता है।
युगों की गणना कितने प्रकार से होती है। उनमें एक गणना हजार वर्ष की है। प्रायः हर सहस्त्राब्दि में वातावरण बदल जाता है, परम्पराओं में उल्लेखनीय हेर-फेर होता है। बीसवीं सदी के अन्त और इक्कीसवीं सदी के प्रारम्भ को एक युग के समापन और दूसरे युग का शुभारम्भ माना गया है।
इसी भाँति पंचांगों में कितने ही संवत्सरों के आरम्भ सम्बन्धी मान्यताओं की चर्चा है। एक मत के अनुसार युग करोड़ो वर्ष का होता है। इस आधार पर मानवीय सभ्यता की शुरूआत के खरबों वर्ष बीत चुके हैं और वर्तमान कलयुग की समाप्ति में अभी लाखों वर्ष की देरी है। पर उपलब्ध रिकार्डो के आधार पर तत्ववेक्ताओं और इतिहासकारों का कहना है कि मानवीय विकास अधिकतम उन्नीस लाख वर्ष पुराना है, इसकी पुष्टि भी आधुनिक तकनीकों द्वारा की जा चुकी है।
काल गणना करते समय व्यतिरेक वस्तुतः प्रस्तुतीकरण के गलती के कारण है। ग्रन्थों में जो काल गणना बतायी गई है, उसमें सूर्य परिभ्रमण काल को चार बड़े खण्डों में विभक्त कर चार देवयुगों की कल्पना की गई है। एक देव युग को 4,32,000 वर्ष का माना गया है। इस आधार पर धर्मग्रन्थों में वर्णित कलिकाल की समाप्ति की संगति प्रस्तुत समय से ठीक-ठीक बैठ जाती है। यह सम्भव है कि विरोधाभास की स्थिति में लोग इस काल गणना पर सहज ही विश्वास न कर सकें, अस्तु यहाँ ”युग“ का तात्पर्य विशिष्टता युक्त समय से माना गया है। युग निर्माण योजना आन्दोलन अपने अन्दर यही भाव छिपाये हुये है। समय बदलने जा रहा है, इसमें इसकी स्पष्ट झाँकी है।
प्रत्येक संधिकाल का अपना विशेष महत्व होता है। सूर्योदय और सूर्यास्त का समय संधिकाल कहलाता है। यह दोनो समय ”पर्वकाल“ कहलाता है। साधना पर विश्वास करने वाले इन दोनों समयों में उपासना साधना का विशेष महत्व मानते हैं। मन्दिरों से आरती और मस्जिदों से आजान की ध्वनि इन्हीं संधिकाल में सुनाई देती है। सर्दी और गर्मी इन दो प्रधान ऋतुओं के मिलन काल पर आश्विन और चैत्र की नवरात्रियाँ होती हैं। इन दोनों बेलाओं को पुण्य पर्व माना जाता है। इस अवधि में साधकगण विशेष साधनाएँ करते हैं।
कलियुग की समाप्ति और सतयुग के शुरूआत के सम्बन्ध में आम धारणा है कि सन् 1989 से 2001 तक के बारह वर्षो का समय संधिकाल के रूप में होना चाहिए। इसमें मानवी पुरूषार्थयुक्त विकास और प्रकृति प्रेरणा में सम्पन्न होने वाली विनाश की दोनों प्रक्रियाएँ अपने-अपने ढंग से हर क्षेत्र में सम्पन्न होनी चाहिए। बारह वर्ष का समय व्यवहारिक युग भी कहलाता है। युग संधिकाल को यदि इतना मानकर चला जाय, तो इसमें कोई अत्ययुक्ति जैसी बात नहीं होगी। 
हर बारह वर्ष के अन्तराल में एक नया परिवर्तन आता है, चाहे वह मनुष्य हो, वृक्ष, वनस्पति अथवा विश्व-ब्रह्माण्ड सभी में यह परिवर्तन परिलक्षित होता है। मनुष्य शरीर की प्रायः सभी कोशिकाएँ, हर बारह वर्ष में स्वयं को बदल देती हैं। अतः स्थूल शरीर को इसकी प्रतीत नहीं हो पाती किन्तु है यह विज्ञान सम्मत। काल गणना में बारह के अंक का विशेष महत्व हैं। समस्त आकाश सहित सौरमण्डल को बारह राशियों, बारह खण्डों में विभक्त किया गया है। पंचांग और ज्योतिषि का ग्रह गणित इसी पर आधारित है। इसी का अध्ययन कर ज्योतिर्विद यह पता लगाते हैं कि अगामी समय के स्वभाव व क्रियाकलाप कैसे होने वाले हैं? पाण्डवों के बारह वर्ष के वनवास की अवधि की महत्ता और विशिष्टता को ही दर्शाते हैं। इस आधार पर यदि वर्तमान बारह वर्षो को उथल-पुथल भरा संधिकाल माना गया है, तो इसमें विसंगति जैसी बात नहीं है।
कुछ रूढ़ीवादी पण्डितों का कथन है कि कलियुग 4 लाख 32 हजार वर्ष का होता है। इस हिसाब से तो नया युग आने में 3 लाख 24 हजार वर्ष की देरी है। वर्तमान परिस्थितियों के पर्यवेक्षण से यह सत्य जैसा नहीं लगता। वास्तव में शास्त्रीय प्रतिपादन हर जगह विशिष्ट अर्थ रखते हैं। उन्हें उल्टा-पुल्टा जोड़ा गया है। उसी के कारण अंध मान्यताएँ फैलीं। प्रतिपादन गलत नहीं पर प्रस्तुतीकरण भ्रामक है। उसे समझा जाना चाहिए और उसका निराकरण किया जाना चाहिए। ग्रह-नक्षत्रों की भिन्न-भिन्न गति तथा उसके पृथ्वी पर पड़ने वाले भिन्न-भिन्न परिणामों को देखकर युग शब्द की समय अवधि भिन्न-भिन्न है।
वाजस संहिता (11,111) में मनुष्ययुग और देवयुग अलग-अलग स्पष्ट बताये गये हैं। ऋग्वेद ज्योतिपाठ में कहा गया है कि- बृहस्पति 12 राशि भोग लेते हैं तब एक युग आता है। एक राशि एक वर्ष की होती है। अतएव 12 राशियों का युग 12 वर्ष का हुआ। इसी प्रकार सूर्य की, चन्द्रमा की गणनाओं के हिसाब से युग की अवधि में काफी अन्तर है। वैज्ञानिकों ने खोज की है कि 11 वर्ष में सूर्य की अन्तर्दशा बदलती है। इस 12 वर्ष को ही उसका एक युग कहा जाता है। जहाँ 4 लाख 32 हजार वर्ष के एक-एक युग की कल्पना की गई है, वहाँ उसकी सुगति आर्षग्रन्थों की युग-गणना से किसी भी प्रकार नहीं बैठती। मनुस्मृति (मनु.1, 167-169) में लिखा है- ब्रह्माजी के अहोरात्र में सृष्टि के पैदा होने और नाश होने में जो युग माने गए हैं, वे इस प्रकार हैं- 4 हजार वर्ष और उतने ही शत अर्थात 4 सौ वर्ष की पूर्व संध्या और 4 सौ वर्ष की उत्तर संध्या, इस प्रकार कुल 4800 वर्ष का सतयुग। इसी प्रकार 3600 वर्ष का त्रेता, 2400 वर्ष का द्वापर और 1200 वर्ष का कलियुग। ज्योतिष मेधातिथि ने सोचा होगा कि कलियुग तो मुझ तक ही कई हजार वर्षो का व्यतीत हो चुका है, फिर 1200 वर्षो का नहीं हो सकता। श्रीमद्भागवत के स्कन्ध 12 अध्याय 2 के इस 34वें श्लोक के अनुसार - 4000 दिव्य वर्षो के अन्त में फिर सतयुग आयेगा जो मनुष्यों के मन और आत्मा में प्रकाश करेगा। मेधातिथि ने दिव्य शब्द का अर्थ देवता कर डाला और अभी तक प्रायः सभी पण्डित लोग ऐसा ही अर्थ करते रहें हैं। चूँकि एक मानुषी वर्ष के बराबर देवताओं का एक दिन होता है, यह विचार करके मेधातिथि ने भ्रम से 1200 वर्षो का कलियुग समझा और उन्हें देव वर्ष मानकर उसमें 360 से गुणा करके 432000 बना दिया और कलियुग की आयु लिख दी जो सर्वथा मिथ्या है। दिव्य का अर्थ देवता नहीं हो सकता। ऋग्वेद (2,164.46) मेें कहा गया है- अग्नि रूपी सूर्य को इन्द्र मित्र वरूण कहते हैं। वही दिव्य सुपर गुरूत्मान है। निरूक्त दैवत काण्ड (7,18) में कहा गया है-जो दिवि में प्रकट होता है उसे दिव्य कहते हैं। दिवि, द्य को कहते हैं। नैघण्टुक काण्ड में दिन के 12 नाम लिखे हैं उनमें द्यु शब्द भी दिन का वाचक है। अब दिव्य का अर्थ हुआ कि- जो दिन में प्रकट होता है। और यह प्रत्यक्ष है कि दिन में सूर्य ही प्रकट होता है। अतः दिव्य सूर्य का नाम है।
ऋग्वेद (1,16ः3,10) के मन्त्र में कहा गया है कि- आग का घोड़ा (सूर्य) है। इसमें भी सूर्य का ही वर्णन है। वेद में दिव्य नाम सूर्य का है, देवता को दिव्य कदापि नहीं कहते। व्याकरण से भी दिव्य शब्द का अर्थ देवता नहीं बनता। दिव् धातु में स्वार्थेयत प्रत्यय लगाने से दिव्य शब्द बनता है। इसकी व्युत्पत्ति यह हुई - दिव भवं दिव्यन अर्थात जो दिवि में प्रकट होता है। अतः दिव्य केवल सूर्य ही को कहते हैं। दिवि द्यु को कहते हैं और द्यु दिन का नाम है। देवता शब्द दूसरें देवातल आदि सूत्रों से बनता है। इस कारण भी दिव्य और देवता शब्दों का आपस में कोई सम्बन्ध नहीं है। दिव्य शब्द और देवता शब्द बनाने के रूप ही अलग-अलग हैं।
कुल्लूक भट्ट ने तो अपनी मनुस्मृति (1,71) की टीका में लिखा है- चारों युग मनुष्यों के हैं। इनके बराबर देवताओं का एक युग होता है। इसलिए सतयुग 4800 वर्षो का और कलियुग 1200 वर्षो का ही हुआ। मेधातिथि ने चारों युगों को देवताओं के युग और उनके वर्षो को देव वर्ष लिखा है जिसका खण्डन कुल्लूक भट्ट 500 वर्ष पहले ही कर चुके हैं। वास्तव में सूर्य की उत्तर-दक्षिण गति को ही दिव्य वर्ष कहते हैं जिसकी गति 360 संख्या की है। अर्थात उत्तरायण के 6 मास और दक्षिणायन के 6 मास के 360 दिन-रात मनुष्यों के हुए। इसी को दिव्य वर्ष कहते हैं। अतः दिव्य देवताओं का वर्ष नहीं है। इसलिए जो आगे 360 से 1200 को गुणा कर आये हैं, वह गुणा न किया तो कलियुग की ठीक आयु 1200 वर्षों की हुई।
हरिवंश पुराण के भविष्य पर्व में भी युगों का हिसाब इसी प्रकार बताया गया है-हे अरिदंम! मनुष्य लोक के दिन रात का जो विभाग बतलाया गया है। उसके अनुसार युगों की गणना सुनिए- 4000 वर्षो का एक कृतयुग होता है और उसकी संध्या 400 वर्ष की तथा उतना ही संध्यांश होता है। त्रेता का परिणाम 3000 वर्ष का है और उसकी संध्या तथा संध्यांश भी 300-300 वर्ष का होता है। द्वापर को 2000 वर्ष का कहा गया है और उसकी संध्या तथा संध्यांश 200-200 वर्ष के होते हैं। कलियुग को विद्वानों ने 1000 वर्ष का बतलाया है और उसकी संध्या तथा संध्यांश भी 100-100 वर्ष के होते हैं।
भागवत के तृतीय स्कन्ध में कहा गया है- चार, तीन, दो और एक। एक कृतादि युगों में यथाक्रम दैविगुण सैकड़ों की संख्या बढ़ती है। आशय यही है कि कृतयुग को 4000 वर्ष में 800 वर्ष जोड़कर 4800 वर्ष माने गये। इसी प्रकार शेष तीनों युगों की कालावधि समझी जाय। कुछ स्थानों पर मनुष्य के व्यवहार के लिए 12 वर्ष का एक युग भी माना गया है। जिसको 1000 से गुणा कर देने पर देवयुग होता है जिसमें चारों महायुगों का समावेश हो जाता है। इस 12 वर्ष के देवयुग को फिर 1000 से गुणा करने पर 1 करोड़ 20 लाख वर्ष ब्रह्मा का एक दिन हो जाता है जिसमें सृष्टि की उत्पत्ति और लय हो जाता है।
भगवान कृष्ण ने गीता में इसी युग की बात कही है- अहोरात्र को तत्वतः जानने वाले पुरूष समझते हैं कि हजार महायुगों का समय ब्रह्मदेव का एक दिन होता है और ऐसे ही 1000 युगों की उसकी रात्रि होती है। लोकमान्य तिलक ने इसका अर्थ स्पष्ट करते हुए लिखा है कि महाभारत, मनुस्मृति ओर यास्कनिरूक्त में इस युग गणना का स्पष्ट विवेचन आता है। लोकमान्य तिलक के अनुसार- हमारा उत्तरायण देवताओं का दिन है और हमारा दक्षिणायन उनकी रात है। क्योंकि स्मृति ग्रन्थों और ज्योतिष शास्त्र की संहिताओं में भी उल्लेख मिलता है कि देवता मेरू पर्वत पर अर्थात उत्तर धु्रव में रहते हैं। अर्थात दो अयनों में छः छः मास का हमारा एक वर्ष देवताओं के एक दिन-रात के बराबर और हमारे 360 वर्ष देवताओं के 360 दिन-रात अथवा एक वर्ष के बराबर होते हैं। कृत, त्रेता, द्वापर ओर कलि ये चार युग माने गये हैं। युगों की काल गणना इस प्रकार है कि कृत युग 4000 वर्ष, त्रेता युग 3000 वर्ष, द्वापर युग 2000 वर्ष ओर कलि युग 1000 वर्ष । परन्तु एक युग समाप्त होते ही दूसरा युग एकदम आरम्भ नहीं हो जाता। बीच में दो युगों के संधिकाल में कुछ वर्ष बीत जाते हैं। इस प्रकार कृत युग के आदि और अन्त में प्रत्येक ओर 400 वर्ष, त्रेता युग के आदि और अन्त में प्रत्येक ओर 300 वर्ष, द्वापर युग के आदि और अन्त में प्रत्येक ओर 200 वर्ष, कलि युग के आदि और अन्त में प्रत्येक ओर 100 वर्ष का सन्धिकाल होता है। सब मिलाकर चारो युगों का आदि-अन्त सहित सन्धि काल 2000 वर्ष का होता है। ये 2000 वर्ष और पहले बताये हुए सांख्य मतानुसार चारो युगों के 10000 वर्ष मिलाकर कुल 12000 वर्ष होते हैं।
इन गणनाओं के अनुसार हिसाब फैलाने से पता चलता है कि वर्तमान समय संक्रमण काल है। प्राचीन ग्रन्थों में हमारे इतिहास को 5 कल्पों में बाँटा गया है- 
1. हेमत् कल्प - 109800 वर्ष विक्रमीय पूर्व से आरम्भ होकर 85800 वर्ष पूर्व तक।
2. हिरण्यगर्भ कल्प - 85800 वर्ष विक्रमीय पूर्व से आरम्भ होकर 61800 वर्ष पूर्व तक।
3. ब्राह्म कल्प - 61800 वर्ष विक्रमीय पूर्व से आरम्भ होकर 37800 वर्ष पूर्व तक।
4. पाद्य्म कल्प - 37800 वर्ष विक्रमीय पूर्व से आरम्भ होकर 13800 वर्ष पूर्व तक।
5. बाराह कल्प - 13800 वर्ष विक्रमीय पूर्व से आरम्भ होकर वर्तमान समय तक चल रहा है।
अब तक बाराह कल्प के 1. स्वायम्भु मनु, 2. स्वरोचिष मनु, 3. उत्तम मनु, 4. तमास मनु, 5. रेवत मनु, 6. चाक्षषु मनु तथा 7. वैवस्वत मनु के मनवन्तर बीत चुके हैं और अब 7. वैवस्वत मनु तथा 8. सावर्णि मनु की अन्तर्दशा चल रही है।
कल्कि पुराण में बाराह कल्प के सावर्णि मनु के दक्ष, ब्रह्म, रूद्रदेव और इन्द्र सावर्णियों के मन्वन्तर बीत जाने पर अवतार होने और धरती में कलियुग की संध्या समाप्त होकर सतयुग प्रारम्भ होने का वर्णन आता है। सावर्णि मनु का आविर्भाव विक्रमी सम्वत प्रारम्भ होने के 5730 वर्ष पूर्व हुआ था। इन्द्र सांवर्णि के मन्वन्तर बाद ही कल्कि प्रकट होने की बात लिखी है जो कल्कि के जन्म से प्रारम्भ है और उसका काल वि0स0 4970 के आस-पास पाया जाता है।
कलियुग सम्वत् की जानकारी के लिए राजा पुलकेषिन द्वितीय चालुक्य ने विद्वान ज्योतिषियों से गणना कराई थी। दक्षिण भारत के इहोल नामक स्थान में प्राप्त शिलालेख में भी उसका उल्लेख सम्वत् 1969-1970 में पाया जाता है। इससे यही सिद्ध होता है कि भारत के बौद्ध प्रभाव को निरस्त करने वाले कल्कि का प्राकट्य सम्वत् 1969-1970 के आस-पास हो चुका है। इस सम्बन्ध में पुरातन इतिहास शोध-अधिष्ठान, मथुरा की ऐतिहासिक गवेषणाये बड़ी महत्वपूर्ण है। उसके शोधकर्ता ने भी उक्त तथ्य को माना है और अपनी विज्ञप्ति में ज्योतिष गणना का उल्लेख करते हुए स्वीकार किया है। इस समय ब्राह्म रात्रि का तमोमय सन्धिकाल है।
भागवत के दूसरे अध्याय में भी कलियुग की समाप्ति का स्पष्ट उल्लेख है- जब सप्तऋषि तारागण मघा नक्षत्र पर आये थे तब कलियुग आरम्भ हुआ और जब सप्तऋषि पूर्वाषाढ़ नक्षत्र में आ चुकेंगें तो 1200 वर्षों में कलियुग राजा नन्द के समय वृद्धि को प्राप्त हो जायेगा। जब भगवान कृष्ण अपने धाम को पधारे, उसी समय से कलियुग चल पड़ा। सप्तऋषि तारागण वर्तमान समय में कृतिका नक्षत्र पर हैं। अब तक यह एक बार 27 नक्षत्र पर घूम चुके हैं। इस प्रकार मघा से रेवती तक 18, एक बार का पूरा चक्र 27 और कृतिका तक 3 अर्थात कुल 48 नक्षत्र घूम चुके। इस प्रकार कलियुग सम्वत् 2000 में श्रावण, कृष्णा अमावस्या को पूरा हो जाता है। कलियुग समाप्त होने का ठीक समय - जिस समय चन्द्रमा, सूर्य और बृहस्पति एक ही समय पुष्य नक्षत्र में प्रवेश करते हैं, एक राषि में आते हैं तो कलियुग समाप्त होकर सतयुग आरम्भ होता है। यह योग सम्वत 2000 की श्रावण कृष्णा अमावस्या तद्नुसार 1 अगस्त सन् 1943 में आ चुका है।
महाभारत में भी इससे मिलता-जुलता वर्णन है- वर्तमान युग के समाप्त होने के समय बड़ी कठोर घटनाएँ घटेंगी और उत्तम वर्ण वाले मनुष्यों की धीरे-धीरे और उन्नति होने लगेगी। कुछ समय पश्चात् दैव की इच्छा से लोक की वृद्धि करने वाला संयम फिर आ जायेगा। जब तिष्य में चन्द्र, सूर्य और बृहस्पति एक राषि पर समान अंशों में आवेगें तो सतयुग फिर आरम्भ हो जायेगा। फिर यथा समय वर्षा हुआ करेगी, सब लोग स्वस्थ और प्रसन्न रहेंगे। तिष्य शब्द के दो अर्थ होते हैं- पौष मास या पुष्प नक्षत्र। पौष का अर्थ स्वीकार करने वालों के मत से कुछ वर्ष पूर्व यह आ चुका है और सतयुग आरम्भ हो गया है। पुष्प नक्षत्र मानने वालों के मत से यह योग श्रावण कृष्ण अमावस्या संवत 2000 में आ चुका है।
काल के निर्णय के सम्बन्ध में भगवान व्यास ने वेदान्त दर्शन के चतुर्थ प्रपाठक में अपना मन्तव्य इस प्रकार प्रकट किया है- मनुष्यों की सृष्टि दो प्रकार की होती है-एक क्रमोन्नति वाली और दूसरी क्रमावनति वाली। प्रथम प्रकार की क्रम से उन्नति करने वाली प्रजा भोग भूमि (जैसे यूरोप, अमेरिका आदि) में पायी जाती है और दूसरी प्रजा कर्मभूमि (जैसे भारत वर्ष) में मिलती है। क्रमोन्नति बीज वाले पहले अवनति और पीछे क्रमशः उन्नति होती जाती है। क्रमावनति बीज वालों की पहले उन्नति और पीछे क्रमशः अवनति होती है। क्रमावनति वालों के सत्य, त्रेता, द्वापर तथा कलियुग ये चार युग क्रमशः होते हैं। इसके विपरीत क्रमोन्नति वालों का प्रथम कलियुग होता है फिर क्रम से वृद्धि होते होते सतयुग की सी उत्तम अवस्था आ जाती है। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि जिन भारतवासियों की अभी अवनति हो रही है, उनकी पहले उन्नति हुई थी और जिन विदेशियों की इस समय उन्नति दिखलाई पड़ रही है, वे पहले अवनति की दशा में थे। इसका दृष्टान्त इस प्रकार है कि जैसे पक्षी आकाश में उड़ रहे हों तो उनमें से जो पक्षी क्रमशः ऊपर की ओर चढ़ रहा है उनकी उन्नति और जो नीचे उतर रहा हो उसकी अवनति का अनुमान करना चाहिए। इसी प्रकार पहले भारत में सतयुग की अवस्था थी जिसका क्रमशः त्रेता, द्वापर, कलियुग के रूप में ह्रास होता गया है। अब उसके पुनः गिरने के लक्षण स्पष्ट हो रहे हैं। इससे अनुमान लगाना भी असंगत नहीं कि अब कर्मभूमि भारत में कलियुग समाप्त होकर पुनः सतयुग की दशा आने वाली है। युग निर्धारण का यह अप्रत्यक्ष तरीका हुआ, जिसमें सीधे गणना द्वारा काल निर्णय न कर, उस समय की परिस्थितियों के आधार पर उसका अनुमान लगाया जाता है। भारतीय शास्त्रों में यह शैली भी प्रचलित है।
ऐतरेय ब्राह्मण में इस सम्बन्ध में एक प्रकरण बड़ा ही भावपूर्ण व शिक्षाप्रद है। एक ऋषि को हतोत्साहित और निराश देखकर इन्द्र उपदेश देते है-जिस समय समाज या व्यक्ति निद्रावस्था में बेखबर पड़े रहते हैं अर्थात अज्ञानावस्था में रहते हैं, उस समय कलियुग होता है। जब निद्रा भंग होकर जँभाई लेते है, चैतन्य जान पड़ते हैं, तब द्वापर होता है। फिर जब वे उठकर बैठ जाते हैं, तब त्रेता समझना चाहिए। जब वे खड़ा होकर चलने लग जायें अर्थात कत्र्तव्य-कर्मो में उचित रूप से संलग्न हो जाये, तब कृतयुग अथवा सत्ययुग समझ लेना चाहिए।
कृष्ण ने युद्ध रोकने के लिए समझाते हुए कहा था- जब संग्राम में श्वेत घोड़ों के सारथी कृष्ण को आगबबूले की तरह होते और महावीर अर्जुन को गाण्डीव धनुष से वज्राघात की सी टंकार करते देखोगे, तब न तो त्रेता ही रहेगा, न कृतयुग और न द्वापर। जब जप होम आदि किये हुये सूर्य के समान प्रखर तेज वाले कुन्तिपुत्र युधिष्ठिर को अपनी सेना की रक्षा करते और शत्रु की सेना जलाते देखोगे, तब न त्रेता रहेगा, न कृतयुग और न द्वापर।
महाभारत के हरिवंश पर्व में इससे भी अधिक स्पष्ट शब्दों में युग परिवर्तन के वे लक्षण बतालाये गये हैं, जो इस समय हमको अपने सम्मुख दिखलाई पड़ रहे हैं- कलि समाप्त होने पर उसके संध्यांश के समय प्रचण्ड व्याधियाँ उठ खड़ी होती है। प्रजा में असन्तोष बढ़ता है और घोर युद्ध भी होते हैं। जिनमें जनता का अत्यन्त नाश होता है। सतयुग आरम्भ होने के पहले एक बार पाप और अशान्ति की पराकाष्ठा हो जाती है। ऐसा होने पर ही समझना चाहिए कि कलियुग क्षीण हुआ। फिर सुधरी हुई परिस्थिति कृतयुग के रूप में प्रकट होती है और मनुष्यों में दिव्य गुणों का आविर्भाव होता है। उस समय शास्त्रों के आदेशानुसार लोग अध्यात्मवादी और ब्रह्मपरायण होने लगते हैं। 
हरिवंश पुराण में कलिकाल का वर्णन इस प्रकार किया गया है- लोग अन्न, वस्त्र तथा खाने-पीने की चीजों को भी चुराने लगेंगे। चोर आपस में ही चोरी करेंगे और एक-दूसरे को मारेंगे। इस प्रकार जब चोरों से चोरांे का नाश होगा, तब शान्ति होगी। रोगों से उनकी इन्द्रियों का क्षय होगा और आयु क्षय के क्रोध से परम विशाद को प्राप्त होगें। उन्हें साधुओं के पहल और दर्शन की इच्छा होगी और साधुओं से उपदेश ग्रहण करेंगे। रोगी रहने के कारण और सभी प्रकार के व्यवहार बन्द हो जाने के कारण सत्य वचन को बोलने लगेंगे। काम के न होने से धर्मशील हो जायेंगे। आयु क्षय और रोग होने के डर से दुराचार के करने में संकोच करेंगे और दान करने लगेंगे। प्रिय व सत्य बोलने के कारण जब वे सेवाभाव को अपनायेंगे तथा धर्म चारों ओर से आ पहुँचेगा। तब उनके मन में यह बात पैदा होगी कि अधर्म करना बुरा है और धर्म करना बहुत अच्छा है। तब सभी धर्म का उपदेश करेंगे और स्वयं धर्म पर चलेंगे। जिस क्रम से क्रमशः धर्म की जितनी हानि है, वैसे ही क्रम से धर्म की वृद्धि होगी। जब सतयुग और धर्म दोनों आ पहुँचेंगे तो सुख-सम्पत्ति आप ही आ जायेंगी। लोग मूर्ख, स्वार्थपरायण, लोभी, तुच्छ, नीच, कामना वाले, दुव्र्यवहार करने वाले, शाश्वत धर्म से पतित, पराये धर्म को चुराने वाले, पराई स्त्रियों में रत, कामी, दुरात्मा, ठग, भयंकर कर्म करने वाले हो जायेंगे। दुष्ट, राक्षस लोग ब्राह्मण रूप बनाकर फिरेंगे। राजा कानों पर विश्वास करने वाले होगें। ब्राह्मण लोग स्वाध्याय और धर्म-कर्म को छोड़कर अनीति एवं अभिमान का आश्रय लेंगे। चील कौओं की तरह अभक्ष भोजन करेंगे और मिथ्या व्रत करेंगे। जब युग का अन्त होने को होगा तो ऐसी बातें होने लगेंगे। महायुद्ध होगें, तोप, बम जैसे आग्नेय अस्त्रों की भयंकर गड़गड़ाहट होगी। अतिवृष्टि या अनावृष्टि होगी। साम्प्रदायिक दंगे, लूटमार, अग्निकाण्ड आदि के द्वारा बड़े भय उत्पन्न होगें। इस प्रकार के दृश्य युगान्त के समय होगें।

3. अन्य के अनुसार 
दिनांक 24 अक्टूबर 1995 से 16 जुलाई 2000 तक का समय सर्वाधिक खगोलीय घटनाओं वाला समय रहा है। जिसमें 24 अक्टूबर 1995 अमावस्या दीपावली के दिन पूर्ण सूर्यग्रहण, 18 से 22 नवम्बर 1997 (पाँच दिन) तक आठ ग्रहों का 130 डिग्री के बीच आना फरवरी व मार्च 1999 में एक ही महीनें में दो पूर्ण चाँद, 11 अगस्त 1999 को पूर्ण सूर्य ग्रहण, 18 नवम्बर 1999 को उल्काओं की आतिशबाजी का नजारा, 22 दिसम्बर 1999 को 133 वर्ष बाद सबसे बड़ा चाँद, 5 मई 2000 को 26 डिग्री के बीच सूर्य-चाँद सहित पाँच ग्रहों का आना और 16 जुलाई 2000 गुरुपूर्णिमा के दिन ही पूर्ण चन्द्रग्रहण है। इसके अलावा सन् 1995 के अन्त में गणेश जी का दूध पीना तथा उत्तर भारत के शिव मन्दिरों में स्थित शिवलिंगों का रंग बदलना जिससे तीसरे नेत्र के खुलने का अनुमान अलग घटना है। (देखें- ”अमर उजाला“ इलाहाबाद संस्करण 25-6-1999) उपरोक्त अवधि के 1999 में ही सावन मास का मलमास या पुरुषोत्तम मास या अधिक मास या अधिमास के रुप में शिवभक्ति के लिए अतिरिक्त माह हुआ है। भारत के लिए उपरोक्त समय में ही स्वतन्त्रता और संविधान के 50 वर्ष भी पूरे हुए हैं। 14-15 अगस्त 1947 की रात जब भारत स्वतन्त्र हुआ था तब आठों ग्रह सहित सूरज चाँद अर्थात् पूरा सौरमण्डल भारत के आकाश में अनुपस्थित था जबकि उपरोक्त समय के स्वतन्त्रता दिवस 15 अगस्त 1999 को मंगल और चाँद को छोड़ सभी ग्रह और तारे पहली बार लाल किले पर झण्डा फहराने के समय उपस्थित थे। (देखें- ”दैनिक जागरण“ वाराणसी संस्करण, दिनांक 15-08-1999) इतना ही नहीं उपरोक्त समय में ही ईसाई, ईस्लाम और हिन्दू का महत्वपूर्ण दिन क्रमशः नया वर्ष 1 जनवरी 1998, रमजान का प्रारम्भ और वृहस्पतिवार (विष्णु का दिन) प्रथम बार एक ही दिन संयोग हुआ। उपरोक्त समय में ही ऐतिहासिक शिकागो वकृतता के बाद स्वामी विवेकानन्द के भारत लौटने का 100 वर्ष भी पूर्ण हुआ। उपरोक्त समय में ही शिकागो वकृतता के समय स्वामी विवेकानन्द के उम्र 30 वर्ष 7 माह 29 दिन के बराबर उम्र लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ ने 15 जून 1998 को पूर्ण किया है। 26 अक्टुबर 2000 को दिपावली तथा मुसलमानो का ज्योति पर्व ”मेराजुन्नबी“ की एकता। 17 नवम्बर 2000 को लियो (सिंह) राशि की ओर से उल्कापात, 13 दिसम्बर को जेमिनी (मिथुन) राशि की ओर से उल्कापात भी अलग घटना है।
खगोल व ज्योतिष विज्ञान के अनुसार उपरोक्त घटनायें युग की समाप्ति और भगवान के अवतरण के समय का सूचक होती हैं। वर्तमान कलियुग की आयु 4,32,000 वर्ष मानी गयी है। जिसका प्रारम्भ 18 फरवरी 3102 ई0 पू0 माना जाता है। सर्वज्ञपीठम् कालीमठ, वाराणसी के स्वामी ब्रह्मानन्द नाथ सरस्वती के अनुसार ग्रहण से उत्पादित पुण्य से कलियुग  का 10,000 वर्ष आयु कम हो जाता है। (देखें- ”अमर उजाला“ इलाहाबाद संस्करण, दिनांक- 11-08-1999 पूर्ण सूर्यग्रहण के अवसर पर प्रकाशित) और 821 वर्ष कलियुग का शेष रहने पर कल्कि अवतार का अवतरण माना गया है। इस प्रकार कलियुग का व्यतीत कुल वर्ष 5102 वर्ष हुआ और यदि कल्कि अवतार अभी होता है तो कलियुग के कुल आयु 4,32,000 में से 5102$821 वर्ष घटकर 4,26,071 वर्ष ग्रहण द्वारा उत्पादित पुण्य से समाप्त हो जाने चाहिए। जिसके लिए 43 ग्रहण की आवश्यकता है। खगोल वैज्ञानिकों का ऐसा अनुमान है कि वर्ष में सूर्यग्रहण की स्थिति 2 से 5 बार तक आती है। कलियुग के व्यतीत वर्ष 5102 वर्षों में क्या 43 ग्रहण नहीं आये होंगे? जबकि 20 मार्च 2015 तक 14 सूर्यग्रहण अभी होंगे। यदि यह माना जाय तो ग्रहण से उत्पन्न पुण्य सिर्फ भारत में ही होता है तो क्या 5102 वर्षों के दौरान भारत में 43 ग्रहण नहीं हुये होंगे ? जबकि चन्द्रग्रहण से उत्पादित पुण्य से कलियुग की आयु कम होना अलग है। इस प्रकार देखने पर कलियुग की आयु लगभग समाप्त हो चुकी है। 

ब. बौद्ध धर्म के अनुसार
बौद्ध धर्म में बुद्ध को विभिन्न रूप में व्यक्त कर विभिन्न शक्तियों के प्रतीक के रूप में माना जाता है। जैसे- विद्वता के बुद्ध - बुद्धा आॅफ विसडम या अवलोकितेश्वर (तिब्बती में चेनरेजिंग), सहिष्णुता के बुद्ध या मंजुश्री (तिब्बती में जामपाल यांग), महाकाल के बुद्ध इत्यादि। बुद्ध के साथ डुमा यी ग्रीन तारा, चकदुर, छनदुज्जी, चंडीज, जांबिया या पीली तारा, डुन्कर या बेट तारा आदि शक्तियों की पूजा होती है। तारा मुक्ति की देवी हैं। तारा के बहुत सारे रूप हैं। ग्रीन तारा दुःख से मुक्ति व रक्षा देती है। सफेद तारा दीर्घायु देती है। बुद्ध के महाकाल रूप में बुद्ध नरमुण्डो की माला पहने हैं। एक हाथ में पाश, दुसरे में मुगदर, तीसरे में डमरू और चैथे में सर्प। यह परम शांत, ध्यानस्थ बुद्ध का रौद्र रूप महाकाल है। शक्ति व भक्तों के लिए अभय का प्रतीक। यह बुद्ध पद्मासन में नहीं बैठे हैं बल्कि भीषण अग्नि के बीच तांडव कर रहें हैं। यह तिब्बत की तांत्रिक परम्परा के बुद्ध हैं।

स. यहूदी शास्त्र के अनुसार
यहूदी शास्त्र में बिना कोई समय निर्धारित किये स्पष्ट किया गया है कि एक समय ऐसा जरूर आयेगा जब पूरा विश्व एक ही ईश्वर, इजराइल का ईश्वर का पूजक हो जायेगा। वह ईश्वर किंग सोलोमन के जरिए प्रकट हुए किंग डेविड का वंशज होगा। मोशियाक इस विश्व का मानव होगा, यहूदी धर्म मानने वाला और धर्म-भीरू या ईश्वर भीरू होगा। उसके नेतृत्व के सम्मुख बुराई और निरंकुशता ठहर नहीं सकेगी। ईश्वर के प्रति ज्ञान विश्व में व्याप्त रहेगा। उसके अनुयायियों में सारी संस्कृतियों और देशों के लोग होगें। सारे इजराइली अपनी भूमि को वापस प्राप्त कर लेगें। मृत्यु सदा के लिए समाप्त हो जायेगी। सारे मृतक भी जी उठेगें। यहूदियों को शाश्वत् आहलाद एवं प्रसन्नता प्राप्ति होगी। सारे राष्ट्र कहेगें कि इजराइल के साथ गलत व्यवहार हुआ था। समस्त विश्व के लोग यहूदियों की ओर आध्यात्मिक मार्गदर्शन के लिए उन्मुख होगें। सारे युद्ध के हथियार नष्ट कर दिये जायेगें। वह इस विश्व को इस प्रकार सम्पूर्ण कर देगा कि सब मिलकर एक ही ईश्वर की एक साथ अराधना करेंगें।
मसीह का भावी आगमन यहूदी जाति के ऐतिहासिक विकास की पराकाष्ठा होगी। मसीह समस्त पृथ्वी पर ईश्वर का राज्य स्थापित करेंगे और मसीह के द्वारा ईश्वर यहूदी जाति के प्रति अपनी प्रतिज्ञाएं पूरी करेगा किन्तु बाइबिल के पूर्वाध में इसका कहीं भी स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता कि मसीह कब और कहाँ प्रकट होने वाले हैं। प्रारम्भ से ही कुछ यहूदियों और बाद के मुसलमानों ने बाइबिल के पूवार्ध में प्रतिपादित धर्म तथा दर्शन की व्याख्या अपने ढंग से की है। ईसाईयों का विश्वास है कि ईसा ही बाइबिल में प्रतिज्ञात मसीह है किंतु ईसा के समय में बहुत से यहूदियों ने ईसा को अस्वीकार कर दिया। आजकल भी यहूदी धर्मावलम्बी सच्चे मसीह की राह देख रहें हैं। 

द. ईसाई शास्त्र के अनुसार
ईसाई और यहूदी धर्मशास्त्र में भी अनेक पैगम्बरों का विवरण मिलता है। जैसे- जोशुआ, जाजस, सैम्युअल, किंग्स, ईसा, जेरेमियाह, एजिकिल और उप पैगम्बर होसिया, जोएल, एमाॅस, ओबेदिया, मिकाह, नाहुम, हबाक्कुक, जेफनिया, हगाई, जेयरिसाइ एवं मलाची।
”बुक आॅफ एजीकील“ और ”बुक आॅफ रिवीलेशन“ में  शेर, बैल, मनुष्य तथा बिच्छु के चार मुख वाले एक जीव फरिश्ते का विवरण प्राप्त होता है। जिसके चार पंख भी हैं। यह जीव बिजली की गति से चारो दिशाओं में चल सकता है। हर एक जीव के पास एक चक्र है जो चक्र में चक्र के रूप में निर्मित है और परिधि पर चारो ओर आँखे बनी हुयी है। ऐसे चार जीव खींचे जाने वाले रथ पर सवार हो योद्धा के रूप में ईश्वर युद्ध रथ में सवार होकर एजीकील के पास आता है।
ईसाई धर्म ग्रन्थ इस बात की भविष्यवाणी करती है कि मृत्यु से फिर उत्थान होगा तथा जीवन हर्ष और उल्लास से भर जायेगा। वे सभी ईसाई अभी जो उत्तरदायित्व की अपनी उम्र तक नहीं पहुँचे हैं। क्राइस्ट के चारो ओर एकत्र होकर ईश्वर राज्य के शुरूआत होने का स्वागत करेंगें।
उपरोक्त दोनो ग्रन्थों में चतुर्थांशों के विषय में भी चेतावनी व संदेश है कि जब चार राशियों में जब किसी में प्रवेश होता है तब एक बड़ा परिवर्तन घटित होता है और इस समय जब हम कुंभ राशि में प्रवेश कर रहें है, तब एक परिवर्तन घटित होगा जो प्रलय कारक निश्चित रूप से हो सकता है।
युग परिवर्तन की भविष्यवाणी बाइबिल भी स्पष्ट शब्दों में कहती है। पवित्र आत्मा यीशु ने सैंट जोहन की 15ः26 एवं 16ः7 से 15 में एक सहायक भेजने की भविष्यवाणी की है। बाईबिल की भविष्यवाणी के अनुसार अगर यह सहायक 20वीं सदी के अन्त से पहले-पहले उत्पन्न नहीं हुआ तो बाईबिल की भविष्यवाणी स्वयं ही असत्य प्रमाणित हो जायेगी। परन्तु ऐसा असम्भव है। क्योंकि उस महान आत्मा यीशु ने उस सहायक को भेजने के लिए ही अपने प्राणों की आहूति दी थी। यह तथ्य सैंट जोहन के 16ः7 से स्पष्ट प्रमाणित होता है- ”तो भी तुमसे सच कहता हूँ कि मेरा जाना तुम्हारे लिए अच्छा है क्योंकि यदि मैं न जाऊँ तो सहायक तुम्हारे पास न आयेगा। परन्तु यदि मैं जाऊँगा तो उसे तुम्हारे पास भेज दूँगा और अपने कहे के अनुसार उस पवित्र आत्मा ने अपने जीवन को स्वेच्छा से बली चढ़ा दिया“

य. इस्लाम शास्त्र के अनुसार
इस्लाम, ”अल-कियामह“ (हश्र का दिन या कयामत का दिन) के विषय में बताता है जिसके निश्चित समय के विषय में अल्लाह के अलावा किसी को नहीं पता परन्तु कयामत और पुर्नरूत्थान का दिन जरूर आएगा। जिसके अनुसार हर इंसान चाहे वह मुस्लिम हो या गैर मुस्लिम अपने कर्म के लिए उत्तरदायी और उसका फैसला होगा। परन्तु वह कब होगा यह किसी को मालूम नहीं। 
कयामत आने के लक्षण के विषय में कहा गया है कि- नमाज उपेक्षित होगी, दैहिक रोग बढ़गें, पापी नेता होगें, वफादार व झूठों में फर्क करना मुश्किल होगा, लोग जानबूझकर झूठ बोलेगें, जकात (दान) देना बोझ माना जायेगा, अल्लाह को मानने वालों का अपमान होगा, वह अपने आसपास की बुराइयों को देख द्रवित होगें, उनका दिल ऐसे घुलेगा जैसे संमदर के पानी में नमक घुलता है पर वह कुछ भ्ीी कर नहीं पायेगें। बरसात अच्छी नहीं होगी, यह बेमौसमी होगी। पुरूष-पुरूषों के साथ और महिलाएं-महिलाओं के साथ व्यभिचार करेंगी। औरतों का ही राज होगा। बच्चे माँ-बाप को अनसुना करेगें, दोस्त दोस्तों के साथ बुरा व्यवहार करेगें, पापों को गम्भीरता से नहीं लिया जायेगा। मस्जिदें बाहर से सुन्दर होंगी और वहाँ इबादत भी होंगी लेकिन दिलों में बैर और नफरत होगी। फिर पश्चिम से एक इंसान आयेगा, जो मेरे कमजोर लोगों पर हुकूमत करेगा। लोग सोने के अक्षरों में कुरान तैयार करवायेगें पर उस पर अमल नहीं करेगें। कुरान को गाकर पढ़ा जायेगा। सूदखोरी बढ़ेगी। गाने वाली औरतों की संख्या बढ़ जायेगी। अमीर समय बिताने के लिए, मध्यम दर्जें के लोग व्यापार के लिए और गरीब दान पाने के लिए हज करेगें।

र. सिक्ख धर्म के अनुसार
सिक्खों के पवित्र ग्रन्थ-”दशम ग्रन्थ“ में भी कल्कि अवतार का वर्णन है। अधिकतर हिन्दू ग्रन्थों के अनुसार हम जिस युग में जी रहें है, यह अंधकार का युग - कलियुग है जो चार युगो का अन्तिम युग है।

ल. मायां कैलण्डर के अनुसार
मायां, उस क्षेत्र के निवासी थे, जिसे हम मीजोमेरिका कहते हैं- दक्षिण पूर्वी मैक्सिको, व यूकाटन पेनिनसुला, गुआटेमला, बिलाइज, उत्तर-पश्चिम होनडूरल व उत्तर-पश्चिमी एस सल्वाडोर। मायां ने अपने क्लासिक युग (250-900 सी.ई.) के दौरान अपने जटिल कैलेण्डर को विकसित किये। यही कैलेण्डर लोगों के आकर्षण का केन्द्र बना हुआ है। क्योंकि वह 21 दिसम्बर, 2012 को जल प्रलय पर केन्द्रित है। केवल एक ज्ञात माया शिलालेख है, जो कि नष्ट तथा टूटी-फूटी है। पुरालेखशास्त्री डेविड स्टुआर्ट ने इसका अनुवाद किया है जिसमें तीन कैलेण्डर एक तारीख का सन्दर्भ है।
”तेरह बकतुन चार अहाऊ में खत्म होगें, तीसरा कनकिन, यह ... होगा नौ सहायक देवों का अवतरक.....“
नौ देवता शून्य दिन को लौटेगें, जो कि मकर संक्रान्ति होगी। ये नौ देवता, एक व्यक्ति के रूप में देखे जाते हैं तथा नौ देवताओं के आगमन की भविष्यवाणी ”द चीलम वालम आॅफ तिजीमिन“ में भी मिलती है।
मायां कलैण्डर में 20 दिन बराबर 1 युईनल, 18 युईनल बराबर 1 तुन, 20 तुन बराबर 1 कातुन, 20 कातुन (400 वषों से कम) बराबर 1 बकतुन, 13 बकतुन बराबर 1 युग के होता था। और इसका 1 चक्र बनता है। जो 1,87,200 दिन या लगभग 5,125 वर्ष का होता है। और यह हमारे इस वर्तमान युग को परिभाषित करता है।
मैकमसन के अनुसार- वर्तमान समय में 13 बकतुन व 4 अहाऊ का दिन 21 दिसम्बर, 2012 है और देवताओं की वापसी की भविष्यवाणी मिलती है और वे नौ दुःख में उठेगें, अफसोस... और जब अँधरे सागर में आग के यज्ञपात्र में उठेगा, तो उस पीढ़ी के लिए मुरझायें फल का दिन होगा। वर्षा नहीं होगी। सूरज का चेहरा अलग तरह से चमकेगा। गहनों के अम्बार लग जायेगें। महान आत्माएं जहाँ भी होगीं, सभी के लिए अच्छे तोहफे मिलेगें। अभी बकतुन 13 आ रहा है, आपके पुरखों के वे आभूषण ला रहा है, जो मैंनें आपको बताए। फिर प्रभु अपने नन्हों से मिलने आएगा सभंवतः ”मृत्यु के बाद“ ही उसके प्रवचन का विषय होगा। वर्तमान में बकतुन नाव में आ रहा है। यहाँ भी 2012 का ही जिक्र है। यह 21 दिसम्बर, 2012 को पूरा होगा, जब लांग काउंट तिथि 13.0.0.0.0 तक पहुँचेगा। मायांवासीयों में इस बात पर असहमति है कि अगला दिन 0.0.0.0.1 होगा या 13.0.0.0.1। कुछ सोचते हैं कि पूरा बकतुन 13 अंक का ही होगा और 1.0.0.0.0 को पहला बकतुन शुरू होगा जो 400 तुन (अगले बकतुन) तक जायेगा। हमें यहाँ से नौ देवताओं की वापसी, मौसम का असर, सरकार से मोह भंग, यु.एफ.ओ जैसी वाली कोई वस्तु व जनसंहार की भविष्यवाणी मिलती है।
मायां कैलेण्डर व भविष्यवाणियाँ सन् 2012 को एक नये सृजन के रूप में लेता है, जब देवता लौटेगें, एक पुनर्जन्म प्रकार का अनुभव, निरंतर जन उद्भव, चेतना का उदय, मृत्यु के बहुत पास तक जाने का अनुभव, पूरी दुनिया में आध्यात्मिक जागरण, पैरानाॅरमल योग्यताओं में वृद्धि, मानवता की अगली उपजातियों का प्रकटीकरण, धरती की अन्तिम उम्मीद है। इसकी मानवता अपने पुराने खोल से निकलकर सहयोगी, टैलीपैथिक व करूणामयी धरती-प्रेमी के रूप में सामने आएगी।




9. नौवां अवतार: बुद्ध अवतार

चैथायुगः कलियुग
य. सार्वजनिक प्रमाणित अंश प्रेरक अवतार 
9. नौवां अवतार: बुद्ध अवतार 

ईश्वर के अंश अवतार
ब्रह्मा के अंश अवतार
विष्णु के अंश अवतार
महेश के अंश अवतार
                                       

बुद्ध अवतार (पूर्व कथा)
श्रीराम तथा श्रीकृष्ण के जीवन द्वारा प्रदर्शित आदर्शो पर चलकर भारत की खूब उन्नति हुई थी। लोगों ने समझ लिया था कि ईश्वर-प्राप्ति ही जीवन का उद्देश्य है, उसी में सुख-शान्ति है। इसीलिए वे लोग जीवन के सभी कर्म भगवान की प्राप्ति के लिए किया करते थे। इस प्रकार देश से पाप चला गया और सर्वत्र शान्ति की स्थापना हुई। 
शान्ति के माहौल में लोग क्रमशः आराम-पसन्द होने लगे ईश्वर और धर्म केवल बातों में रह गए; मान-ऐश्वर्य तथा सांसारिक सुख ही जीवन का सार, है, यही भाव प्रबल होने लगा। धर्म-कर्म गौरव की वस्तु हो गयी, लोग भूल गये कि इसका उद्देश्य शान्ति है। अपने-अपने वर्ण का गौरव बढ़ाने के लिए ही लोग धर्म का आचरण करने लगे। 
राजा-महाराजा अत्यन्त व्ययसाध्य योग-यज्ञ किया करते थे, परन्तु उसका उद्देश्य मान-यश हो गया। योगी तथा ब्राह्मण अत्यन्त कष्टसाध्य तपस्या करते हुए देहपात कर देते; परन्तु इस सबका एकमात्र उद्देश्य रह गया सम्मान, पूजाप्राप्ति तथा शिष्य बनाना। जाति का गौरव तथा संासारिक उन्नति को ही लेकर मानव भटक गया। देश से भगवान चले गये और धर्म का स्थान लोकाचार ने ग्रहण कर लिया। मनुष्य के प्राणों में सुख-शान्ति नहीं रही। जीवन भगवद्भक्ति-विहीन श्मशान में परिणत हुआ और उसमें धू-धूकर वासना की आग जलने लगी। 
कपिलवस्तु नगरी में शुद्धोदन नाम के एक राजा थे। काफी आयु में उनकी एक सन्तान हुई। ज्योतिषियों ने गणना करके बताया, ‘‘यह बालक संसार में रहे तो चक्रवर्ती राजा बनेगा और संन्यासी होगा तो जगद्गुरू होगा।’’ उसका नाम सिद्धार्थ रखा गया। खूब सुन्दर, बुद्धिमान तथा धीर’-स्थिर होने के कारण सबका उसके प्रति स्नेह था, बालसुलभ चपलता का उसमें अभाव था, यहाँ तक कि खेलकूद भी उसे पसन्द न था। आयु के साथ साथ उसकी गम्भीरता में भी वृद्धि होने लगी। राजा शुद्धोदन सर्वदा शंकित रहते कि बालक कहीं संन्यासी न हो जाय। इसीलिए वे सिद्धार्थ को सदा प्रफुल्ल रखने का प्रयास करते। 
बाल्यकाल से ही उसके हृदय में सर्व जीवों के प्रति समान रूप से दयाभाव दीख पड़ता। एक दिन देवदत्त नामक शाक्त बालक ने एक जंगली हंस पर तीर चलाया। आकाश में तीर से घायल होकर हंस सिद्धार्थ के निकट आ गिरा। सिद्धार्थ ने हंस को गोद में उठा लिया और तीर निकालकर उसे स्वस्थ कर दिया। देवदत्त अपना शिकार लेने को दौड़ता हुआ आया, परन्तु सिद्धार्थ किसी भी हालत में हंस देने को राजी नहीं हुए। इसी बात को लेकर दोनों के बीच विवाद छिड़ गया। निपटारे के लिए वृद्धों के पास जाने पर उन लोगों ने कहा, ‘‘जो प्राणी की रक्षा करता है, उसी का उस पर अधिकार होता है।’’
कपिलवस्तु नगर में एक कृषि-महोत्सव हुआ करता था। उस अवसर पर राजा, मंत्री आदि सभी खेतों में हल चलाते थे। इससे मिट्टी के भीतर से बहुत सारे कीट-पतंग बाहर निकल आते थे। उनमें से कुछ लोगों के पाँव-तले आकर मर जाते और बाकी को पक्षी पकड़कर खा जाते। जीवों के इस भयानक कष्ट को सह पाने में असमर्थ होकर सिद्धार्थ ने अपने पिता से यह प्रथा बन्द कर देने का अनुनय-विनय किया। 
गोपा (यशोधरा) नाम की एक रूप-गुणवती कन्या के साथ सिद्धार्थ का विवाह हुआ। उनके वैराग्यग्रसित मन को आमोद-प्रमोद में मग्न रखने के लिए राजा ने एक प्रमोद-उद्यान का निर्माण कराया, जिसमें प्रतिदिन नृत्य-गीत के आयोजन हुआ करते थे। सिद्धार्थ उनमें सम्मिलित होते, परन्तु अन्य लोगों के समान रस नहीं ले पाते। 
मनुष्य के दुःखों का कोई अन्त नहीं; एक को दूर करने पर दूसरा दुःख स्वतः ही आकर प्रकट हो जाता है। किसी के जीवन में दुःख देखते ही सिद्धार्थ का मन द्रवीभूत हो जाता और उन्हें इच्छा होती कि प्राण देकर भी यदि हो सके तो उस दुःख का मोचन किया जाय। एक दिन नगर-भ्रमण को निकलने पर उन्होंने देखा कि एक व्यक्ति रोग की पीड़ा से बड़ा कष्ट पा रहा है। इसके साथ ही उनके चिन्तनशील मन में हलचल मच गई और भ्रमण वहीं स्थगित कर देना पड़ा। 
एक अन्य दिन एक वृद्ध की दुर्दशा ने उनका ध्यान आकृष्ट किया। मानव-शरीर के इस सुनिश्चित परिणाम के विषय में सोचकर वे अधीर हो गए। दूसरे दिन एक अन्य दृश्य ने उन्हें और चंचल कर डाला। उन्होंने देखा कि एक मृत व्यक्ति को दाह करने हेतु श्मशान में लाया गया है और उसके स्त्री-पुत्र व्याकुल होकर रो रहे है। इस दृश्य ने सिद्धार्थ के मन में प्रबल वैराग्य का संचार किया। अहा! ऐसे अनित्य दुःखमय जीवन को लेकर हम लोग भूले हुए है! हो, तो फिर इस जीवन का मूल्य ही क्या है? सोचते-सोचते सिद्धार्थ इस विचार का कोई भी ओर-छोर न पा सके। 
एक दिन एक शान्तमूर्ति संन्यासी का निर्विकार भाव देखकर उनके मन में एक नवीन विचार का उदय हुआ। उन्होंने सोचा - मैं भी ऐसा ही संन्यासी होकर तपस्या करके देखूँगा कि जरा-व्याधि-मृत्यु से छुटकारा पाने का कोई उपाय है या नहीं। उन्होंने पिता के समक्ष अपनी इच्छा व्यक्त की। राजा यह सुनकर बड़े विचलित हुए, किसी भी युक्ति पर उन्होंने पुत्र के संन्यास का अनुमोदन नहीं किया; बल्कि कहीं सिद्धार्थ बिना बताए ही चले न जायँ, इसलिए उन्होंने कड़े पहरे की भी व्यवस्था कर दी। 
उन्हीं दिनों गोपा के एक पुत्र हुआ। सिद्धार्थ ने देखा कि वे क्रमशः संसार में उलझते जा रहे है; अतः अब देरी करना उचित न समझकर एक दिन आधी रात के समय उन्होंने राज्य छोड़कर प्रस्थान किया। 
सिद्धार्थ त्यागी के वेश में तपस्वियों के पास जाकर योग की शिक्षा ग्रहण करने लगे। उन दिनों लोग भाँति-भाँति की कठोर तपस्या करते थे और थोड़ी-सी कुछ अनुभूति होते ही अपने को सिद्ध समझकर उसका प्रचार करने लगते थे। सिद्धार्थ ने इसी श्रेणी के अनेक योगियों का शिष्यत्व स्वीकार कर उनके धर्ममतों में सिद्धि प्राप्त की। परन्तु उन्होंने देखा कि ये अनुभूतियाँ मनुष्य को जरा-मरण के हाथ से नहीं बचा सकती। इस पर उनके मन की अशान्ति और बढ़ गई। 
विभिन्न स्थानों पर घूमते-घूमते क्लान्त एवं निराश होकर सिद्धार्थ ने निश्चय किया कि वे स्वयं ही ध्यान-तपस्या आदि करके जरा-मरण के निवारण का उपाय ढूँढ़ निकालने का प्रयास करेंगे। अतः वे गया के निकट निरंजना नदी के तट पर स्थित ऊरूबिल्ब ग्राम के एक मनोहर स्थान पर योगासन में बैठकर ध्यान में डूब गए। पाँच अन्य साधक भी उनकी तपस्या एवं तेजस्विता पर मुग्ध होकर उनके शिष्य बन गये और सिद्धार्थ की सेवा में लग गए। 
सिद्धार्थ आहार-निद्रा को त्यागकर दिन-रात एकासन में बैठे ध्यान करने लगे। उपवास के कारण उनका शरीर इतना दुर्बल हो गया कि एक दिन स्नान करके नदी के तट पर चढ़ते समय वे मूर्छित हो गए। शिष्यों ने सोचा कि उनकी मृत्यु हो गयी है। मूच्र्छा टूटने पर उन्होंने सोचा कि इस प्रकार कठोरता के द्वारा शरीर बरबाद करने से सिद्धिलाभ सम्भव नहीं है। अतः वे पुनः आहार ग्रहण करने लगे। उन दिनों लोगों की धारणा थी कि अन्न-पान में कठोरता बरतना ही साधना है। सिद्धार्थ के उस कठोरता का त्याग कर देने पर शिष्यों ने सोचा कि उनका पतन हो गया है, अतः वे उन्हें छोड़कर चले गये। 
सिद्धार्थ का शरीर स्वस्थ एवं सबल हुआ। फिर ध्यान करते करते उनका मन निर्वाण-सागर में मिल गया और उन्हें बुद्धत्व की प्राप्ति हुई। आनन्द और शान्ति से उनका हृदय परिपूर्ण हो उठा। 
सिद्धार्थ बाल्यकाल से ही जीवों के दुःख से कातर थे। बुद्धत्व की उपलब्धि के साथ ही वे दुःखमोचन का उपाय जान गये, परन्तु मुक्ति अथवा निर्वाण की बातें किसे सुनाते? सामान्य जन तो ये बातें समझ नहीं सकते थे। उन्हीं पाँच शिष्यों की बात उन्हें याद हो आई। खोजते-खोजते वे उन्हें काशी के निकट सारनाथ में मिले। उनके उपदेशों से निर्वाण प्राप्त कर शिष्यगण कृतार्थ हो गये। फूल खिलने पर भ्रमरों का अभाव नहीं रहता। सैकड़ों लोग उनसे धर्म की शिक्षा पाने को आ जुटने लगे। अनेक लोग सर्वस्व त्यागकर संन्यासी होने लगे। 
शुद्धोदन अपने पुत्र के गौरव की बातें सुनकर बड़े आनन्दित हुए। उन्होंने बुद्धदेव को कपिलवस्तु ले आने को आदमी भेजा। बुद्धदेव का आगमन होने पर नगर के लोग उन्हें देखने को दौड़े आए। शुद्धोदन, गोपा आदि सबने निर्वाण-धर्म का उपदेश पाकर सुख-दुःख से मुक्ति पायी। शाक्यवंश के अनेक बालकों तथा युवकों ने संन्यास लेकर बुद्धदेव का अनुसरण किया; यहाँ तक कि बुद्धदेव का पुत्र राहुल भी संन्यासी हुआ। 
बुद्धदेव उत्तरी भारत में सर्वत्र निर्वाण-धर्म का उपदेश देते हुए भ्रमण करने लगे। जो साधकगण कठोर तपस्या के उपरान्त भी अभीष्ट नहीं प्राप्त कर पा रहे थे, बुद्धदेव की कृपा से उन लोगों ने सिद्धिलाभ किया। संसार की ज्वाला में भुनकर मर रहे सहस्त्रों लोगों को भी बुद्धदेव के उपदेशों से शान्ति मिली। घृणित-पतित के रूप में जिन्हें समाज में हेय दृष्टि से देखा जाता था, बुद्धदेव ने शिष्य बनाकर उनका भी उद्धार किया। भारत में पुनः धर्मभाव जाग उठा, लोगों के मन में शान्ति का संचार हुआ। 
अस्सी वर्ष की आयु में बुद्धदेव ने महानिर्वाण प्राप्त किया।

सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त अनुसार कथा
दृश्य काल के व्यक्तिगत प्रमाणित काल में सार्वजनिक प्रमाणित अंश दृश्य सत्य चेतना से युक्त संघ और योजना आधारित कलियुग के प्रारम्भ में नवें अवतार - बुद्ध अवतार के समय तक एकतन्त्रात्मक राज्यों का विकास, विभिन्न नेतृत्व मनों आधारित जातियों, हिंसा, कर्म का प्राथमिता का विकास हो उसकी दिशा प्रसार की ओर ही थी। कृष्ण के अंश अपूर्ण मन अर्थात् अंश सूक्ष्म शरीर के स्थूल शरीर ही बुद्ध थे परिणामस्वरूप वे स्वयं को पहचानकर कालानुसार आवश्यक मुख्य कार्य अर्थात् जनता द्वारा लोक धर्म शिक्षा और गणराज्य की स्थापना का शुभारम्भ का कार्य कर्मयोगी-वैरागी-सन्यासी की भाॅति पूर्ण किये। लोकधर्म शिक्षा के अन्तर्गत वे व्यक्तिगत कर्म के लिए -सत्यपात्र को दान नैतिकता के नियमों का पालन, अपने पुण्य का भाग दूसरों को देना, दूसरे द्वारा दिये गये पुण्य के भाग को स्वीकारना अपने त्रुटियों का सुधार, सम्यक-सिद्धान्त का श्रवण और प्रसार: सम्यक सिद्धान्त के अन्तर्गत - अन्धविश्वास तथा भ्रम रहित सम्यक दृष्टि, उच्च तथा बुद्धियुक्त सम्यक संकल्प, नम्रता-उत्सुक्तता-सत्यनिष्ठ युक्त सम्यक वचन, शान्तिपूर्ण-निष्ठापूर्ण-पवित्रता युक्त सम्यक कर्म, अहिंसा युक्त सम्यक आजीवन, आत्म निग्रह और आत्म प्रशिक्षण युक्त सम्यक व्यायाम, सक्रीय सचेतन मन युक्त सम्यक स्मृति, जीवन की यर्थाथता पर गहन अध्ययन युक्त सम्यक समाधि तथा यह लोक धर्म शिक्षा अनवरत चलती रहे इसलिए लोक शिक्षकों के रूप में साधुओं और भिक्षुओं का निर्माण सहित ‘‘बुद्धं शरणं गच्छामि’’ अर्थात् बुद्धि या प्रबुद्धों के शरण मंे जाओ और ‘‘धर्मम् शरणं गच्छामि’’ अर्थात् धर्म के शरण में जाओ का उपदेश देने का कार्य किये। गणराज्य स्थापना के शुभारम्भ के अन्तर्गत ग्राम, सभा, संघ या पंचायत से जुड़ने के लिए ‘‘संघ शरणं गच्छामि’’ का  उपदेश देने का कार्य किये।
यहाॅ ध्यान देने योग्य यह है कि कृष्णावतार के समय गणराज्य स्थापना के लिए व्यक्तिगत प्रमाणित दृश्य सत्य चेतना द्वारा अदृश्य मन में तय की गई सम्पूर्ण नीति का वह हिस्सा अर्थात् वह अपूर्ण मन जो कृष्ण पूर्ण नहीं कर पाये थे उसके कुछ प्राथमिक अंश जैसे -सन्यास, लोकधर्म, ध्यान अर्थातृ काल चिन्तन और गणराज्य व्यवस्था का बीज जो मानव समाज का नये सिरे से सृष्टि का प्रथम चरण था वही कार्य बुद्धावतार में पूर्व कृष्णावतार से प्राप्त कर्मयोगी मन द्वारा ही बुद्ध ने पूर्ण किया था। बुद्ध द्वारा दिया गया ‘‘सम्यक’’ शब्द एकात्म ध्यान अर्थात् समभाव युक्त काल चिन्तन का ही बीज था जो कृष्ण के जीवन में समाहित था और गीतोपनिषद् में अव्यक्त रहा। चूॅकि एकात्म ध्यान, भगवान शिव-शंकर का स्वरूप है इसलिए वे अगले अवतार की दृष्टि रखते हुये अपने प्रचार का समस्त केन्द्र शिव-शंकर से जुड़ी स्थली के निकट ही रखें। बुद्ध अपने समस्त कार्यो को स्वयं जानते हुये कोई दार्शनिक आधार इसलिए नहीं दिये कि दार्शनिक आधार देने पर वह गीतोपनिषद् और कृष्ण में समाहित हो जाता परिणामस्वरूप कृष्ण का विवशतावश ही सही हिंसक जीवन और हिंसा कर्म की प्रधानता की ओर बढ़ते समाज में अहिंसा आधारित नये मानव समाज की सृष्टि कार्य असफल हो जाता। बुद्ध की कार्यप्रणाली दार्शनिक न होकर व्यावहारिक थी जो कर्मज्ञान अर्थात् कर्मवेद का सूक्ष्म बीज था। जिसकी व्यापकता के लिए उन्होंने हिंसक राजा सम्राट अशोक को अपने शरण में कर आन्दोलन का रूप दिये जो उस समय तक का दार्शनिक दृष्टि से पूर्णमुक्त सबसे बड़ा धर्मिक आन्दोलन था जो उनके महानिर्वाण के बाद इमारतों, मन्दिरों और बौद्ध धर्म में परिणत हो गया। बुद्ध का पूर्व नाम ‘‘सिद्धार्थ’’ अर्थात् ‘‘वह जिसने अपना उद्देश्य पूर्ण कर लिया हो।“ बुद्ध, मन की एक व्यावहारिक अवस्था अर्थात् बुद्धि है जो ज्ञान के साथ काल चिन्तन के संयोग से उत्पन्न होती है। छः वर्षो की साधना उन्होनें उम्र की परिपक्वता, सामाजिक विश्वसनीयता, कालानुसार कार्य और कार्यनीति के निर्धारण के लिए की थी। चूॅकि सत्य चेतना के अन्तर्गत ही प्राकृतिक चेतना समाहित होती है इसलिए प्राकृतिक चेतना के अन्तर्गत कृष्णावतार में रूक्मणि का अपूर्ण मन अर्थात् सूक्ष्म शरीर यशोधरा के स्थूल शरीर द्वारा व्यक्त हो सिद्धार्थ से पुत्र प्राप्त कर पूर्ण हो गया। यदि बुद्ध व्यक्तिगत प्रमाणित दृश्य सत्य चेतना युक्त कृष्ण के अपूर्ण मन न होते तो वे बाह्य कारणों से प्रेरित होकर निष्काम कर्म की ओर बढ़ते परन्तु वे तो स्वयं अन्तः कारणों से प्रेरित थे जो उनमे कृष्ण के अपूर्ण मन का अंश था, से स्वयं अहैतुक कार्य के लिए कर्मयोगी बने थे। अब तब जो मन इस दैवी श्रृंखला विष्णु के अन्तिम दसवें अवतार के साथ पूर्ण होने के लिए अपूर्ण थे वे थे रामावतार के समय ‘‘लव और कुश’’ का संयुक्त एक मन, उर्मिला का अपूर्ण मन जो कृष्णावतार में सत्यभामा के रूप में पुनः अपूर्ण रह गया था। तथा कृष्णावतार में ही वे सभी नर-नारियों के अपूर्ण मन जो दास, संख्य, वात्सल्य, मधुर और अवैध प्रेम में बधकर संयुक्त एक अपूर्ण मन में परिवर्तित थे।
दृश्य काल के सार्वजनिक प्रमाणित दृश्य काल में सार्वजनिक प्रमाणित दृश्य सत्य चेतना से युक्त संघ और योजना आधारित कलियुग में दसवें अवतार के समय तक विश्व की स्थिति और विवाद मुक्त परिणामों का विवरण आगे है।


8. आठवां अवतार: श्री कृष्ण अवतार

तीसरायुगः द्वापरयुग
द. व्यक्तिगत प्रमाणित पूर्ण प्रेरक अवतार
8. आठवां अवतार: श्री कृष्ण अवतार
(मानक सामाजिक व्यक्ति चरित्र-महाभारत) 

ईश्वर के अंश अवतार शरीर धारण तिथि-भाद्रपद कृष्ण पक्ष-अष्टमी
ब्रह्मा के पूर्ण अवतार
विष्णु के पूर्ण अवतार
महेश के अंश अवतार

श्रीकृष्ण अवतार (पूर्व कथा)
इस जगत् में कुछ भी ज्यादा दिन नहीं चलता। रामराज्य भी कुछ काल बाद स्वार्थ राज्य में परिणत हुआ। राजागण स्वेच्छाचारी हो गए और आपस में लड़-झगड़कर प्रजा का सर्वनाश करने लगे। शास्त्र के नियम उठ गये और उनका स्थान विभिन्न प्रकार के कुत्सित लोकाचारों ने ले लिया। लोग अन्धे के समान उन सब नियमों का पालन कर अधः पतित होने लगे; बड़े बड़े पण्डित तथा धार्मिक जन भी उन नियमों के हाथ से नहीं बच सके। समाज में, परिवार में और धर्म में मनुष्य को कोई स्वाधीनता नहीं रह गई। 
युधिष्ठिर के समान धार्मिक व्यक्ति ने भी जुए के खेल में अपने भाई तथा पत्नी को धन-दौलत के समान दाँव पर लगा दिया था। भरी सभा में द्रौपदी के चीरहरण का प्रयास हुआ। भीष्म, द्रोण, भीम, अर्जुन-कोई भी प्रतिवाद करने का साहस नहीं दिखा सका, जबकि वे भारत-विख्यात वीर पुरूष थे। यदुवंशियों ने नशे की हालत में एक-दूसरे का वध कर डाला। इन सारी घटनाओं के द्वारा स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है कि समाज कितने परिमाण में दुर्नीतियों का शिकार हो चुका था। 
मनुष्य को शान्ति का पथ दिखाने के लिए इस बार श्रीहरि ने बलराम और कृष्ण रूप धारण किया। परन्तु केवल बलराम को ही अवतार कहा जाता है, श्रीकृष्ण की दशावतारों में गणना नहीं होती है। यद्यपि दोनों की लीला अभेद है, यथापि हम यथासाध्य प्रचलित मत का ही अनुसरण करेंगे। 
भोजवंशीय अभिजित राजा के पुत्र आहुक बड़े प्रतापवान राजा थे। उनके दो पुत्र थे - देवक और उग्रसेन। बलराम तथा कृष्ण की माता देवकी देवक की पुत्री थी। यदुवंशीय वसुदेव के साथ देवकी का विवाह हुआ। उग्रसेन का पुत्र कंस अपने पिता को बन्दी बनाकर स्वयं राजा हो गया। उसके दुराचार और अत्याचार से सभी त्रस्त थे। देवकी के विवाह के समय देववाणी हुई कि उनकी आठवीं सन्तान कंस का वध करेगी। कंस यह सुनते ही देवकी का वध करने को अद्यत हुआ। वसुदेव ने बड़ी कठिनाई से उसे इस हत्या से विरत किया और उसके सामने प्रतिज्ञा की कि देवकी के गर्भ से जन्मी प्रत्येक सन्तान वे कंस के हाथों सौंपते जाएँगे। इसके बावजूद कंस ने अपनी बहन तथा बहनोई को कारागार में बन्द करके रख दिया। 
वसुदेव की रोहिणी नाम की एक अन्य पत्नी भी थी; वसुदेव कारागार में थे, अतः रोहिणी असहाय होकर अपने मित्र नन्द-गोप के यहाँ व्रज में निवास करने लगीं। देवकी के गर्भ से एक-एक कर छह सन्तानों ने जन्म लिया। कंस प्रत्येक नवजात शिशु की हत्या करता गया। सप्तम गर्भ की सन्तान दैवी उपाय से रोहिणी के पास पहुँच गई। सबको लगा कि सातवें मास देवकी का गर्भ नष्ट हो गया है। उसी से ये तीसरे राम - बलराम उत्पन्न हुए। देवकी के अष्टम गर्भ से श्रीकृष्ण ने जन्म लिया। वसुदेव ने बड़ी कुशलता से नन्द-पत्नी यशोदा की नवजात कन्या के साथ श्रीकृष्ण को बदल दिया। कंस ने उसी कन्या की हत्या करने के बाद अपनी बहन तथा बहनोई को मुक्त कर दिया। 
बलराम और कृष्ण नन्द की सन्तानों के रूप में पलने लगे। शैशव काल से ही उनके चरित्र में असाधारण विशेषताएँ व्यक्त होने लगी थीं। कृष्ण का रंग साँवला और बलराम का वर्ण गोरा था। देखने में अत्यन्त सुन्दर, अदम्य बलशाली और बुद्धि-व्यवहार में विज्ञ होने के कारण गोप-गोपिकाएँ उन्हें अपनी सन्तानों से भी अधिक स्नेह करते थे। व्रज के ग्वाल-बाल उन्हें छोड़कर क्षण भर भी नहीं रह पाते थे। गाय चराते समय वे नित्य नये खेल तथा मनोरंजन के उपाय निकालकर गोप-बालकों को आनन्दित करते थे। वन में विभिन्न प्रकार के हिंसक जन्तु थे, बलराम-कृष्ण ने उनका संहारकर व्रजभूमि को निरापद किया। दीर्घकाल तक निवास के फल-स्वरूप ब्रजभूमि में अच्छी घास का अभाव हो गया था। फिर उन दिनों लकड़बग्धों का भी उपद्रव बढ़ गया था। उन्होंने प्रस्ताव रखा, ‘‘यमुना के तट पर वृन्दावन नामक एक स्थान है। जैसा वह देखने में सुन्दर है, वैसे ही वहाँ घास की भी प्रचुरता है; वहाँ स्थानान्तरित हो जाने पर गोपवृन्द को हर प्रकार से सुविधा होगी।’’ बलराम-कृष्ण के उत्साहित करने पर ब्रजवासी वृन्दावन चले गए। इस प्रकार उन्होंने सभी विषयों में नवीनता और उन्नति का मार्ग दिखाकर गोप जाति में नवजीवन का संचार किया। 
एक दिन गायें वन के भीतर चर रही थीं और ग्वाल-बाल खेल में मग्न थे। उसी समय जंगल में दावानल जल उठा। देखते-ही-देखते हवा के झोकों से आग चारों ओर फैल गयी। गायंे भयभीत होकर इधर-उधर भागने लगीं और इस प्रकार संकट में और भी वृद्धि हो गयी। बलराम तथा कृष्ण असीम साहस और धैर्य का परिचय देते हुए गायों तथा गोपबालों को धीरे धीरे एकत्र कर वन से बाहर ले आए। 
वृन्दावन के निकट एक सरोवर था, जिसमें अनेक काले काले विषधर साँप निवास करते थे और चरते-चराते किसी गाय या गोपबाल के उधर जाते ही उसे काट लेते थे। बाल-गोपालों की सहायता से बलराम-कृष्ण ने उन साँपों को मारकर असीम साहस दिखाया। प्रलम्ब तथा धेनुक नामक दो वन्य जन्तुओं को बलराम ने अकेले ही मार डाला। पुराणों में अनेक असुरों के वध की बातें हैं, पर वे इतनी अद्भुत तथा असम्भव लगती हैं कि उन पर विश्वास नहीं किया जा सकता। सार रूप में कहा जा सकता है कि बलराम-कृष्ण ने बाल्यकाल से ही ऐसे बल, बुद्धि एवं साहस का प्रदर्शन किया कि लोगों ने उनके विषय में अनेक असम्भव घटनाओं की कल्पना कर डाली थीं। 
शान्त स्वभाव गोप कुल के नवजागरण तथा बलराम-कृष्ण की अपूर्व कीर्ति-कथा विभिन्न प्रकार से अतिरंजित होकर कंस के कानों में भी जा पहुँची। पश्चिमी भारत उसके प्रताप से कम्पित हो रहा था। अपने घर के पास ही गोपगण जाग उठे हैं - यह समाचार वह पचा नहीं सका। देवकी के सभी सन्तानों का तो वह अपने ही हाथों संहार कर चुका था, तो फिर ये दो बालक कहाँ से आ टपके! विभिन्न प्रकार की आशंकाओं से उसका मन आन्दोलित एवं ईष्र्या से दग्ध हो उठा। गोपकुल का गर्व चूर किये बिना उसे शान्ति नहीं मिल सकती थी। परन्तु अपने पिता को उसने बन्दी बना लिया था, भानजों की हत्या कर डाली थी और सैकड़ों प्रकार से लोगों पर अत्याचार करने के कारण कोई भी उसका मित्र नहीं रह गया था। अत्याचारी का मान बड़ा दुर्बल होता है। उसे प्रकट रूप से गोपों के साथ शत्रुता करने का साहस नहीं हुआ। उसने एक चाल का सहारा लिया। 
कंस एक यज्ञ का आयोजन करने लगा। वृन्दावन के गोपगण उसी की प्रजा थे, अतः उसने यज्ञ के उपलक्ष्य में करस्वरूप उन्हें दूध-दही लाने का आदेश दिया। अक्रूर को इस समाचार के साथ वहाँ भेजा गया। कंस ने अकेले में अक्रूर को बता दिया था कि छल-बल से या चाहे जैसे भी हो बलराम-कृष्ण को मथुरा ले आना होगा। अक्रूर भी कंस के मित्र न थे, उन्होंने सारी बातें बलराम-कृष्ण को बता दीं। उस समय दोनों भाइयों की आयु सोलह वर्ष से भी कम थी। 
नन्द आदि गोपगण राजा का आदेश पाकर दूध-दही लिए मथुरा आये। बलराम-कृष्ण ने भी अपने ग्वाल-बाल मित्रों के साथ उत्सव देखने के निमित्त उनका अनुगमन किया। राजधानी में पहुँचकर वे लोग डकैतों के समान लूट-पाट करने लगे। उनका सौन्दर्य तथा साहस देखकर नागरिकों का ध्यान उनकी ओर आकृष्ट हुआ। माली विभिन्न प्रकार के पुष्प तथा मालाएँ लेकर राजमहल में जा रहा था। उन लोगों ने माली से वह सब छीनकर स्वयं पहन लिया और आनन्द मनाने लगे। धोबी राजा के पोशाक आदि लेकर जा रहा था, इन लोगों ने उसे लूटकर स्वयं धारण कर लिया। इन दो बालकों में क्या ही असीम साहस था! जिस कंस के भय से सभी संत्रस्त रहते थे, ये लोग उसी की राजधानी में उसी की वस्तुएँ छीन-झपट रहे थे। जैसा कि स्वाभाविक था, सारा समाचार कंस तक जा पहुँचा। कंस क्रोध में पागल-सा हो गया। 
उत्सव के निमित्त राजसभा में भी विभिन्न प्रकार के आमोद-प्रमोद की व्यवस्था हुई थी। कंस ने कुवलयापीड़ नामक एक पागल हाथी को मुख्य द्वारा पर खड़ा कराने के बाद, बलराम तथा कृष्ण को उत्सव दिखाने के बहाने बाुलावा देकर उसी रास्ते ले आने की व्यवस्था भी कर दी थी। महावत को बता दिया था कि वह उन्हें हाथी के पैरों तले रौंद डाले। यदि वे किसी प्रकार हाथी से बच भी निकले, तो फिर उन्हें मारने की एक अन्य व्यवस्था भी थी। उसकी सभा में अनेक पहलवान थे, जिसमें चाणूर तथा मुष्टिक सर्वप्रधान थे। कंस ने उन्हें बता रखा था कि बलराम-कृष्ण के दरबार में आते ही उन्हें कुश्ती लड़ने की चुनौती देकर मार डालना होगा। चैदह-पन्द्रह वर्ष के दो बालकों को मारने के लिए बड़ी पक्की ही व्यवस्था हुई थी। 
बलराम-कृष्ण उत्सव देखने के लिए राजसभा की ओर चले। सिंहद्वार पर कुवलयापीड़ ने उन पर आक्रमण किया। असीम बलशाली राम क्षण भर में ही हाथी के पीछे जा पहुँचे और उसकी पूँछ पकड़कर खींचने लगे। हाथी के जी-जान से आगे बढ़ने का प्रयास करने पर बलराम ने अचानक ही उसे छोड़ दिया और साथ ही हाथी लुढ़ककर धरती पर गिर पड़ा। कृष्ण सामने ही थे। वे उछलकर उसके मस्तक पर चढ़ गए और पाद-प्रहार के द्वारा उसकी खोपड़ी का कचूमर निकाल दिया। इसी बीच बलराम भी दौड़कर आए और हाथी के दोनों दाँत उखाड़कर दोनों हाथों से उसे उसके शरीर में चुभोने लगे। हाथी भयानक स्वर में चीत्कार करने लगा। चारों ओर सैकड़ों लोग एकत्र होकर काफी शोरगुल मचाने लगे। हाथी के प्राण-पखेरू उड़ गए। 
इसके पूर्व भी वे नगर में हलचल मचा चुके थे और इस घटना से राज्यसभा में उपस्थित सभी लोगों की दृष्टि उनकी ओर आकृष्ट हुई। सभी इन दोनों भाइयों को देखने दौड़े। सैकड़ों लोग उन्हें घेरकर तरह-तरह के प्रश्न पूछने लगे। एक साँवले तथा दूसरे गौर वर्ण होने पर भी दोनों भाई रक्त से लाल हो गए थे, हाथों में हाथी के दाँत थे, कपड़े से कमर कसे हुए थे - इसी अवस्था में सैकड़ों नागरिकों से घिरे हुए वे सभा में प्रविष्ट हुए। बालकों की मनोहर मूर्ति और भी मनोहर होकर सबके हृदय में स्नेह का संचार कर रही थी। पर दुष्ट कंस की दृष्टि में ये यम के समान भयंकर प्रतिभाव हुए। अपने कर्तव्य में अक्षम होकर वह स्तम्भित रह गया। 
चाणूर ने कृष्ण को और मुष्टिक ने बलराम को द्वन्द्व-युद्ध की चुनौती दी। वे लोग भीमकाय और बदसूरत थे और बालक बलराम-कृष्ण कोमलजात तथा बड़े सुन्दर थे। अतः इस असमान द्वन्द्व-युद्ध में सबकी सहज सहानुभूति बलराम-कृष्ण के साथ ही रही। काफी देर तक युद्ध चलता रहा, परन्तु आखिरकार उन्होंने अद्भूत कुशलता के साथ चाणूर तथ मुष्टिक दोनों को मार डाला। 
चाणूर और मुष्टिक के धराशायी हो जाने पर कंस भय से मरणासन्न हो गया। कृष्ण सहासा उछलकर मंच पर चढ़ गये और घूँसों के प्रहार से कंस के मस्तक से मुकुट को गिराकर उसके बाल पकड़कर सिंहासन के नीचे जमीन पर फेंक दिया और उस पर लात-घूँसों की भयंकर वर्षा करने लगे। सिंहासन के निकट कृष्ण को देखते ही कंस घबराकर जड़वत् हो गया था। इसके पूर्व हुई घटनाओं के द्वारा बलराम-कृष्ण ने सभा में उपस्थित सबके मन में अभूतपूर्व भाव का संचार किया था और अब इस अकल्पनीय घटना से सभी स्ताम्भित रह गये। किसी ने चूँ तक नहीं की। अन्त में कृष्ण के पाँव की भयानक ठोकर खाकर जब कंस खून की उल्टी करते हुए जीभ निकालकर मर गया और यह समाचार पाकर अन्तःपुर की नारियाँ भीषण चीत्कार करते हुए रूदन करने लगीं, तब मानो सबके होशो-हवास वापस लौटे। इसी बीच बलराम-कृष्ण ने वसुदेव के चरणों में प्रणाम किया और वे उनका आलिंगन करने के बाद अपने बाकी सगे-सम्बन्धियों के साथ उनका परिचय कराने लगे। अनेक सभासदों को इसके पूर्व ही बलराम-कृष्ण का परिचय प्राप्त हो चुका था। बलराम-कृष्ण द्वारा नगर में तरह तरह के उपद्रव प्रारम्भ करने पर प्रायः सभी प्रमुख व्यक्ति समझ गये थे कि वसुदेव के इन दो पुत्रों द्वारा कुछ न कुछ होने वाला है। किसी को भी कंस से प्रेम न था। अतः अब सभी जी खोलकर बलराम-कृष्ण को आशीर्वाद देने लगे। 
बलराम-कृष्ण ने राजा उग्रसेन को कारागार से मुक्त कर दिया। वे पुनः मथुरा के राजा हो गए। बलराम-कृष्ण अब तक गोपों के घर में थे। उनकी शारीरिक शिक्षा तो अच्छी हो चुकी थी, परन्तु अब तक क्षत्रियोचित उपनयन, वेदाध्ययन आदि नहीं हो सका था। वसुदेव ने महर्षि गर्ग के हाथों उनका उन्नयन संस्कार कराकर उन्हें अवन्ती नगर में स्थित संदीपनी मुनि के पास वेदाध्ययन के लिए भेज दिया। वे श्रुतिधर थे, अतः अल्प काल में ही सर्व शास्त्रों में पारंगत होकर घर लौट आए। 
उग्रसेन के राजा हो जाने पर भी, व्यवहार में बलराम और कृष्ण राज्य चलाने लगे। मगध का राजा जरासन्ध कंस का श्वसुर था। अपने दामाद के वध का बदला लेने के लिए उसने मथुरा को घेर लिया, परन्तु बलराम-कृष्ण की वीरता के सम्मुख पराजित होकर उसे पलायन करना पड़ा। बलराम-कृष्ण यदुवंशी युवकों को एकत्र कर उन्हे युद्ध की शिक्षा देने लगे। जरासन्ध ने भी उत्तरोत्तर बड़ी से बड़ी सेना लेकर बारम्बार मथुरा पर आक्रमण किया। इस प्रकार वह सत्रह बार युद्ध करने आया, परन्तु हर बार पराजित होकर लौट जाने को बाध्य हुआ। 
बलराम-कृष्ण ने देखा कि जरासन्ध का सारा क्रोध उन्हीं दोनों पर है और उनके मथुरा रहते जरासन्ध युद्ध करने से बाज नहीं आएगा। यादवगण युद्ध करते करते थक चुके थे, राजकोष खाली हो चला था और दुर्ग भी टूट गया था। ऐसी अवस्था में युद्ध जारी रखना सम्भव न था। अतः उन्होंने मथुरा में ठहरना उचित न मानकर दक्षिणापथ की राह ली। 
उन दिनों रेलवे, टेलीग्राफ तथा समाचार पत्रों का अस्तित्व नहीं था। बड़े कष्ट से दूतों के द्वारा एक प्रदेश का समाचार दूसरे प्रदेशों में पहुँचा करता था। बलराम-कृष्ण ने सोचा कि जरासन्ध को अब उनका समाचार नहीं मिल सकेगा। परन्तु जरासन्ध और उसके दूत बड़े चालाक थे। दूतों ने बलराम-कृष्ण विषयक सारा समाचार संग्रहित कर जरासन्ध के पास पहुँचा दिया। जरासन्ध ने मित्र-राज्यों की सम्मिलित विशाल सेना के साथ दक्षिणापथ की ओर अभियान किया। बलराम-कृष्ण के मौसा चेदिपति यह सब खबर पाकर बड़े ही विचलित हुए और उनकी सहायता के लिए एक चुनिन्दे सैनिकों को लेकर स्वयं ही जरासन्ध के पीछे पीछे चल पड़े। 
बलराम-कृष्ण गोमन्त (गोवा) नामक पर्वतीय क्षेत्र में थे। जरासन्ध ने उस राज्य पर आक्रमण किया। समतल क्षेत्रों के निवासी योद्धा के लिए पर्वतीय प्रदेश में युद्ध करना बड़ा कठिन होता है और स्थान अपरिचित हो तो इसे बिल्कुल ही असम्भव समझना चाहिए। परन्तु मूर्ख अहंकारी जरासन्ध ने अपनी सेना के साथ पर्वतीय प्रदेश में प्रवेश किया। बलराम-कृष्ण उस क्षेत्र से भली भाँति परिचित हो चुके थे। चेदिपति की सहायता से उन्होंने जरासन्ध तथा उसके मित्र राजाओं को ऐसी शिक्षा दी कि उनमें से कइयों ने तो किसी प्रकार भागकर अपने प्राण बचाए; सेना, तम्बू, रथ, रसद, अस्त्र-शस्त्र कुछ भी लौटकर नहीं आया। 
भागकर भी जरासन्ध से पीछा नहीं छुड़ाया जा सकता - यह देखकर बलराम-कृष्ण चेदिपति की सलाह पर पुनः मथुरा लौट आए। मथुरा नगरी समतल भूमि पर स्थित है, अतः उसे चारों ओर से घेरा जा सकता है। यदुवंश के योद्धाओं के साथ परामर्श करने के बाद वे लोग अपनी राजधानी समुद्रवेष्ठित द्वारावती (द्वारका) में ले आए और यादव वंश के युवकों को युद्धकला में प्रशिक्षित कर दिया। उनमें से श्रेष्ठ योद्धाओं की एक अजेय सेना का गठन करके, उसका नाम ‘नारायणी सेना’ रख दिया गया। श्रीकृष्ण युद्ध-कौशल में बेजोड़ थे। और बलराम शत्रु-संहार में अजेय तथा गदा-युद्ध में भारत के सर्वश्रेष्ठ वीर थे। उन्होंने हल के आकार का एक भयानक अस्त्र बनवाया था। उसे लेकर जब वे शत्रुसेना में प्रवेश करते तो किसी की खैर न थी। उनके शरीर में इतना बल था कि लोगों ने उन्हें बल का देवता मानकर उन्हें ‘बलदेव’ तथा ‘बलराम’ का नाम दे दिया था। हल उनका प्रधान अस्त्र था, अतः हलधर अथवा हलीराम उनका एक और नाम हुआ। 
कुशस्थली के राजा रेवत की एक अतीव रूपवती कन्या थी। राजा ने बलराम को उस कन्या का दान किया। विदर्भ के राजा भीष्मक की पुत्री रूक्मिणी का हरण करके उससे श्रीकृष्ण विवाह किया। रूक्मिणी के पुत्र प्रदुम्न ने अपने मामा की पुत्री शुभांगी के साथ विवाह किया। उन दिनों इसी प्रकार के विवाह की प्रथा थी। इस विवाह के उपलक्ष्य में बलराम ने कई दिन विदर्भ की राजधानी कुण्डिन में बिताए। उन दिनों राजाओं के बीच बाजी लगाकर पासा खेलने की प्रभा खूबे प्रचलित थी। इस खेल में जो जितना दक्ष होता, वह उतना ही सम्मानित होता और खेल न जानना बड़े लज्जा की बात मानी जाती थी। बलराम वीर पुरूष थे, इस तरह के बच्चों के खेल उन्हें बिल्कुल भी नहीं भाते थे। 
विवाह के उपलक्ष्य में कुण्डिन में दक्षिणात्य के अनेक राजा आए थे। वे सभी धर्मज्ञानरहित, जुआड़ी, छली तथा कलहप्रिय थे। बलराम बड़े सरल व्यक्ति थे। उन लोगों ने राम को पासा खेलने के लिए पकड़ा। वे सहमत हुए। अमनोयोग के साथ खेलते हुए पहले तो वे खूब हारे। राजागण और विशेषकर रूक्मी उनकी खूब हँसी उड़ाने लगे। यह उपहास क्रमशः निन्दा एवं अभद्रता में परिणत हुआ। तब बलराम के सावधानीपूर्वक खेलने पर प्रतिपक्ष हार गया। परन्तु उन लोगों ने हार को स्वीकार नहीं किया और उपहास आदि अवज्ञा करके बलराम को इतना नाराज कर दिया कि उन्होंने रूक्मी को द्वन्द्व-युद्ध के लिए चुनौती दे दी। मूर्ख राजागण बलराम के शान्त, सरल एवं निरहंकार स्वभाव को देखकर उनकी वीरता के बारे में अनुमान नहीं लगा सके थे। परन्तु जब युद्धक्षेत्र में उन्होंने खेल-खेल में ही रूक्मी का वध करने के बाद अन्य राजाओं को चुनौती दे, तो भय से सभी भाग खड़े हुए। 
कन्या का हरण करके विवाह करना क्षत्रियों के लिए बड़े गौरव की बात थी, क्योंकि इसमें वीरता को खूब अभिव्यक्ति मिलती थी। दुर्योधन ने अपनी पुत्री लक्षणा के विवाह हेतु एक स्वयंवर का आयोजन किया था। श्रीकृष्ण के पुत्र शाम्ब ने लक्षणा का हरण कर लिया। परन्तु राजाओं ने मिलकर शाम्ब को पकड़ लिया। बलराम जब शाम्ब को छुड़ाने गए, तो राजागण भय के मारे शाम्ब को मुक्त करने के लिए तैयार हो गए, परन्तु दुर्योधन उनसे सहमत नहीं हुआ। उनका बलराम के साथ युद्ध हो गया। बलराम जब अपनी गदा तथा हलास्त्र के साथ मैदान में उतरे, तो हस्तिनापुर की रक्षा करना कठिन हो उठा। सेना का संहार करने के बाद बलराम अपने हलास्त्र से किले की दिवारों को उखाड़ने लगे। दुर्योधन ने भयभीत होकर शाम्ब तथा लक्षणा को उनके हाथों सौंप दिया और गदा-युद्ध सीखने की अभिलाषा से वह उनका शिष्य बन गया। आशुतोष बलराम उस पर बड़े सन्तुष्ट हुए और पूरे हृदय के साथ उसे ऐसी शिक्षा दी कि दुर्योधन भी गदा-युद्ध में अपने गुरू के समान ही अजेय हो गया। 
बलराम की सुभद्रा नाम की एक बहन थी। उन्होंने अपने प्रिय शिष्य दुर्योधन को ही कन्या प्रदान करने की इच्छा व्यक्त की। परन्तु कृष्ण उसे सुभद्रा के उपयुक्त नहीं मानते थे। एक बार अर्जुन ने अपने भ्रमण के दौरान कुछ दिन उन लोगों के साथ निवास किया। कृष्ण के संकेत पर एक दिन वे सुभद्रा को लेकर भाग गये। इस पर बलराम अत्यन्त क्रुद्ध हुए और यादवसेना को अर्जुन को पकड़ लाने का आदेश दिया। यादवों ने अर्जुन पर आक्रमण किया। परन्तु सुभद्रा को सारथी के रूप में अर्जुन का रथ हाँकते देखकर वे लोग युद्ध करने को अग्रसर नहीं हुए। इस विषय में कृष्ण की भी सहमति है, यह जानकार बलराम का क्रोध क्षण मात्र में चला गया। युद्ध का उपक्रम विवाहोत्सव में परिणत हुआ। 
बलराम का हृदय बड़ा ही कोमल था। कृष्ण यह भलीभाँति जानते थे और इसीलिए बीच-बीच में उन्हें चिढ़ाकर मजा लिया करते थे। बलराम चाहे जितने भी नाराज हो जायँ पर किसी को कोई कष्ट होते देख तत्काल पिघल जाते। श्रीकृष्ण से उनका इतना लगाव था कि वे किसी विषय में उन्हें बिन्दु मात्र भी नाराज नहीं करना चाहते थे। जीवन भर युद्ध में बिताने पर भी उन्हें युद्ध से प्रेम न था; अन्याय का प्रतिकार क्षत्रियों का विशेष धर्म है, अतएव कर्तव्यबोध से उन्हें युद्ध करना पड़ता था। 
कौरव-पाण्डवों के बीच युद्ध की सम्भावना जानकर बलराम अत्यन्त व्यथित हुए। कृष्ण विवाद का निपटारा कराने हस्तिनापुर गए। बलराम को आशा थी कि उनके ऐसे कुशल भाई अवश्य ही विवाद को मिटाकर लौटेंगे। परन्तु दुर्योधन युद्ध करने को बड़ा उत्सुक था, अतः वह किसी भी कीमत पर समझौता करने को राजी न हुआ। श्रीकृष्ण अपने उद्देश्य में विफल होकर लौट आए। दुर्योधन बलराम के सुयोग्य शिष्य थे, अतः उन्हें दुर्योधन से बड़ा लगाव था। परन्तु जब वह श्रीकृष्ण के कहने पर भी युद्ध से विरत नहीं हुआ, तब वे बड़े मर्माहत हुए। सामने रहकर यह आपसी कलह देखना उनके लिए सम्भव न था। अतः वे तीर्थयात्रा के बहाने देश छोड़कर भ्रमण को निकल पड़े। 
तीर्थदर्शन करते हुए बलराम नैमिषारण्य जा पहुँचे। ऋषिगण वहाँ एक यज्ञ का अनुष्ठान कर रहे थे। उसी उपलक्ष्य में वे लोग सूतजातीय व्यास-शिष्य रोमहर्षण को व्यासपीठ पर बैठाकर पुराण-कथा सुन रहे थे। बलराम के वहाँ पहुँचने पर मुनियों ने उनका यथाविधि स्वावगत किया, परन्तु रोमहर्षण अपने आसन पर ही स्थिर बैठे रहे। बलराम ने उनका यह अहंकार देखकर क्रोध में उन पर एक आघात किया, जिससे उनकी तत्काल मृत्यु हो गई। ऋषिगण हाय-हाय कर उठे। बलराम द्वारा कारण पूछने पर उन लोगों ने बताया कि व्यासपीठ पर आसीन होने के बाद किसी को अभिवादन न करने का नियम है। बलराम को बड़ा पश्चाताप हुआ और उन्होंने प्रायश्चित करने की इच्छा व्यक्त की। मुनियों ने उन्हें बताया कि उनसे ब्रह्महत्या का पाप हो गया है और भारतवर्ष के समस्त तीर्थो का भ्रमण ही इसका प्रायश्चित है। 
विधाता के विधान को रोकने की किसी में सामथ्र्य नहीं है। कुरूक्षेत्र के युद्ध में जैसे अन्याय व निष्ठुरता का प्रदर्शन हुआ, बलराम के उपस्थित रहने से वैसा न हो पाता। परन्तु राजाओं का चरित्र यदि युद्ध के दौरान व्यक्त नहीं होता, तो मानव-जाति की शिक्षा नहीं हो पाती, क्षत्रिय कितने कलुषित हो चुके है - इसका पता नहीं चल पाता; भय के कारण दोनों पक्ष युद्ध से विरत हो जाते, परन्तु भीतर ही भीतर सारा पाप रह जाता। भगवान के करूणावतार बलराम के लिए इस युद्ध में भाग लेना सम्भव न था, इसीलिए भगवान ने उन्हें विशेष प्रयास से हटा दिया। उस समय कोई सोच भी नहीं सकता था कि इस युद्ध में पूरे भारत के राजा एकत्र होंगे और इतनी अल्प अवधि में ही सारा क्षत्रियकुल निर्मूल हो जायगा। 
बलदेव तीर्थो का भ्रमण करने लगे, परन्तु थोड़े ही दिनों में युद्ध सम्बन्धी भयानक संवाद पाकर वे विचलित हो उठे। प्रथमतः तो युद्ध ही बड़ा भयानक एवं बीभत्स था और फिर उसका समाचार भी काफी अतिरंजित होकर उनके पास पहुँचा था। प्रभास तीर्थ तक पहुँचते पहुँचते उनके सुनने में आया कि क्षत्रिय वर्ण का ध्वंस हो गया है, नारायणी सेना आदि सब समाप्त हो चुकी है, परन्तु दुर्योधन अब भी जीवित है। बलराम का मन आतंक से परिपूर्ण हो उठा और वे तीव्र गति से कुरूक्षेत्र आ पहुँचे। उस समय भीम तथा दुर्योधन, के बीच युद्ध चल रहा था। 
बड़ा ही बीभत्स दृश्य था। भीम तथा दुर्योधन दोनों ही क्रोध से उन्मत्त होकर पशु के समान एक-दूसरे पर आक्रमण कर रहे थे। दोनों ही मरणासन्न हो रहे थे। दुर्योधन गदा-युद्ध में अद्वितीय थे, अतः भीम हारते जा रहे थे। तभी भीम ने दुर्योधन की जाँघ पर गदा से चोट की, जिसके फलस्वरूप जाँघ टूट गई और दुर्योधन धरती पर गिर पड़ा; भीम उसके सिर पर गदाघात करने लगे। गदा-युद्ध में नाभि के नीचे आघात करने का नियम नहीं था, और गिरे हुए शत्रु को अपमानित करना तो उससे भी बड़ा अन्याय समझा जाता था। बलराम क्रोध के आवेश में हाथ में हल उठाए भीम पर आक्रमण करने को दौड़े। कृष्ण ने उन्हे पकड़कर मना किया और पूर्व की घटनाएँ बताने लगे- ‘‘इसी दुर्योधन ने अपने ही कुल की रानी द्रौपदी को सभा के बीच नंगा करने का प्रयास किया था, बारम्बार उसे अपनी जाँघ पर बैठने को कहा था; इसीलिये भीम ने प्रतिज्ञा की थी कि एक दिन वह दुर्योधन की जाँघ तोड़ डालेगा। अपनी प्रतिज्ञा के पालनार्थ ही भीम ने उसकी जाँघ पर आघात किया है।’’ अब कुछ और कहने की आवश्यकता नहीं हुई। बलराम को सारी बातें स्मरण हो आई। वे समझ गए कि कुरूक्षेत्र के इस जटिल घटनाक्रम के बीच श्रीकृष्ण के अतिरिक्त अन्य किसी के लिए भी अपनी मति को स्थिर रखकर कर्तव्य का निर्धारण कर पाना सम्भव नहीं है। उस भयानक स्थान पर उन्हें क्षण भर भी ठहरने की इच्छा नहीं हुई और वे तत्काल ही कुरूक्षेत्र से चल पड़े। 
कुरूक्षेत्र के युद्ध में श्रीकृष्ण अकेले ही युधिष्ठिर के पक्ष में सम्मिलित हुए थे। यदुवंश की सुशिक्षित वीर योद्धाओं की नारायणी सेना ने दुर्योधन का पक्ष लिया था। इसके फलस्वरूप यदुवंश के कई प्रमुख योद्धा कुरूक्षेत्र के युद्ध में भाग लेने से रह गए। बलराम-कृष्ण के साथ रहकर अनेकों बार युद्ध करने से इन लोगों को युद्धविद्या का असाधारण ज्ञान था। महाभारत युद्ध के बाद भारत में युद्ध की आवश्यकता नहीं रह गई थी और बिना युद्ध के यदुवंशी वीरों के लिए समय बिताना कठिन हो गया। मद्य-मांस उनका नित्य का आहार था, दम्भ-अहंकार उनके चरित्र का आभूषण था और मद्यपान कर दिन-रात तर्क-वितर्क, झगड़ा-टण्टा तथा जूआ खेलना उनका नित्यकर्म हो गया। कुरूक्षेत्र के समान एक महत्वपूर्ण युद्ध में भाग न ले पाने के कारण उन लोगों के मन में बड़ा खेद था। किसी युद्ध-विवाद के लिए वे लोग प्यासे हो उठे। कुरूक्षेत्र युद्ध के बाद बलराम-कृष्ण सभी विषयों में उदासीन हो चुके थे। तथापि उनके भय से ये लोग थोड़े शान्त रहते थे। अब उनकी निश्चेष्टता पर ये लोग और भी उन्मत्त हो उठे। 
बलराम-कृष्ण ने देखा कि इस युद्धप्रिय जाति को सँभालकर रखना बड़ा कठिन है। उन्हें किसी प्रकार उत्सव-आमोद-प्रमोद में बहलाकर रखने के उद्देश्य से बलराम-कृष्ण ने उन्हें लेकर प्रभास तीर्थ जाने का निश्चय किया और तदनुसार व्यवस्था करने का आदेश दिया। बड़े उत्साहपूर्वक सारा आयोजन होने लगा। मधु-मांस की भी खूब व्यवस्था हुई। 
प्रभास पहुँचकर सबने बड़ा शान्त भाव दिखलाया। परन्तु ज्यों-ज्यों यथेच्छा मधुपान करने से उन पर नशा चढ़ने लगा, त्यों-त्यों वे अदम्य हो उठे। पहले तो उनके बीच हास-परिहास शुरू हुआ और तदुपरान्त क्रमशः झगड़ा, हाथा-पाई और मार-पीट भी होने लगी। बलराम-कृष्ण ने यह सोचकर अस्त्र धारण कर लिया कि ये लोग शायद भय से शान्त हो जाएँगे। परन्तु इस पर वे लोग और भी भड़क उठे और एक-दूसरे की हत्या करने लगे। एक अन्य कुरूक्षेत्र का दृश्य अभिनीत होने लगा। सबके भीषण रूप से घायल या मृत हो जाने के बाद ही युद्ध थमा। बलराम-कृष्ण ने खड़े खड़े सब देखा। कोमल-हृदय बलराम इतना सब सहन नहीं कर सके और वहीं योगासान में बैठ समाधिमार्ग से वैकुण्ठ-लोक चले गए। यदुवंश के वृद्धों, नारियों तथा बालकों की रक्षा का भार दूत के मुख से अर्जुन को भेजने के बाद श्रीकृष्ण ने भी अपने ज्येष्ठ भ्राता का अनुसरण किया। 
कृष्णभक्त वेदव्यास ने हिन्दू धर्म की रक्षा तथा प्रचार हेतु अनेक ग्रन्थ लिखे और श्रीकृष्ण-चरित्र के आदर्श के रूप में निष्काम कर्मयोग का भारत में प्रचार किया। इससे मानव-जाति को शान्ति की उपलब्धि हुई।

सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त अनुसार कथा
दृश्य काल के व्यक्तिगत प्रमाणित काल में व्यक्तिगत प्रमाणित पूर्ण दृश्य सत्य चेतना से युक्त भक्ति और प्रेम आधारित द्वापर युग में क्षत्रिय जाति में जन्में और यादव जाति में पले विष्णु के आठवें अवतार - योगेश्वर श्री कृष्ण अवतार के जन्म तक वर्णाश्रम के चार नेतृत्व-मन खण्ड-खण्ड जन्म आधारित होकर अनेक नेतृत्व मनों जातियों में स्थापित हो चुकी थी। परिणामस्वरूप मूल मानव जाति उसमें खो चुकी थी। ‘परशुराम-परम्परा’ टूट रही थी जहाॅ थी वहाॅ भी ब्राह्मण धर्म-अर्धम की व्याख्या करने में असमर्थ, जनसंख्या और समस्याओं के बढ़ने के कारण एकतन्त्रात्मक विचार को स्वीकार न करने की ओर बढ़ रही थी। बहुदेववाद भी मनों को अलग कर रखा था। देश-सम्बन्ध, रिश्ता-सम्बन्ध पूर्ण रूप से टूटकर, रक्त सम्बन्ध टूटते हुये तेजी से प्रसार की ओर था। ऐसी स्थिति में कृष्ण की आत्मा व्यक्तिगत प्रमाणित सत्य-चेतना अर्थात् स्वयं द्वारा निर्मित परिस्थितियों में प्राथमिकता से भूतकाल का ज्ञान और भविष्य की आवश्यकतानुसार वर्तमान में कार्य करते हुये अपने उद्देश्यों को व्यक्तिगत रूप से उस समय व्यक्त करना जब उद्देश्य पूर्ण होने में कोई संदेह न हो, में स्थापित हो गयी। और वे कत्र्तव्य पथ पर अग्रसर हुये परिणामसवरूप श्रद्धेय श्रेष्ठजनों से श्रद्धा रखते हुये उनके प्रभाव से मुक्त रहकर कार्य करना, सम्पर्क में आये हुये सभी नर-नारियों को दास्य, संख्य, वात्सल्य, मधुर और अवैध प्रेम में स्वयं को मुक्त रखते हुये बाॅध देना, अपने बडे़ भाई बलराम को हल व मूसल धारण कराना, रूक्मिणी के स्वयंवर चुनने पर स्वयं अपना हरण करवा उसे प्रधानता देते हुये पूर्ण गृहस्थ सुख भोग करना, मानक गणराज्य या समाज के रूप में द्वारिका का निर्माण करना, साध्य (गणराज्य) को व्यक्त और साधन (प्रजा, सेना और गणराज्यों के राजा) दोनों का अव्यक्त प्रयोग या भोग करते हुये एकतन्त्रात्मक राजाओ के चरित्र का सार्वजनिक प्रदर्शन करवाकर उनका वध या पक्ष निर्धारण करना, सभी नेतृत्वकत्र्ता मनों अर्थात् जातियों के स्थायी एकीकरण सहित कर्म की ओर प्रेरित करने के लिए सम्पूर्ण उपनिषदों का सार-व्यक्तिगत प्रमाणित गीतोपनिषद् सहित अव्यक्त (निराकार) एवं व्यक्त (साकार) ऐकेश्वरवाद की स्थापना करने के लिए स्वयं को व्यक्तिगत प्रमाणित ईश्वर योगेश्वर रूप में प्रस्तुत करना इत्यादि सम्भव हो सका। कृष्ण का सम्पूर्ण जीवन विवशता वश हिंसात्मक प्रधान हो गणराज्य की स्थापना में लगा रहा और अन्त में उनके द्वारा स्थापित व्यवस्था उनके जीवन में ही नष्ट हो गयी।
ईश्वर के आठवें प्रत्यक्ष एवम प्रेरक व्यक्तिगत प्रमाणित पूर्णावतार श्री कृष्ण तथा विष्णु (एकात्व वाणी, ज्ञान ,कर्म व प्रेम) कें पूर्णावतार कें रुप में व्यक्त श्री कृष्ण का मुख्य गुण आर्दश सामाजिक व्यक्ति का चरित्र तथा अवतारी गुणों में साकार शरीर आधारित ”परशुराम परम्परा“ की असफलता को देखते हुये उसका नाश करकें निराकार नियम आधारित ”परशुराम परम्परा“ को प्रारम्भ किये। जिसके लिऐ वे मानक सार्वभौम सत्य ज्ञान-गीतोपनिषद् व्यक्त किये। 
श्रीकृष्ण का नाम बेचने वाले सिर्फ भक्ति में ही लीन हैं। उनके मूल कार्य मानक सार्वभौम सत्य ज्ञान तथा निराकार नियम आधारित ”परशुराम परम्परा“ का नाम ही नहीं लेते जबकि भारत तथा विश्वस्तर पर गणराज्य का स्वरुप निम्नलिखित रुप में व्यक्त हो चुका है। 
भारत में निम्न्लिखित रुप व्यक्त हो चुका था।
1. ग्राम, विकास खण्ड, नगर, जनपद, प्रदेश और देश स्तर पर गणराज्य और गणसंघ का रुप।
2. सिर्फ ग्राम स्तर पर राजा (ग्राम व नगर पंचायत अध्यक्ष ) का चुनाव सीधे जनता द्वारा।
3. गणराज्य को संचालित करने के लिए संचालक का निराकार रुप- संविधान। 
4. गणराज्य के तन्त्रों को संचालित करने के लिए तन्त्र और क्रियाकलाप का निराकार रुप-नियम और कानून।
5. राजा पर नियन्त्रण के लिए ब्राह्मण का साकार रुप- राष्ट्रपति, राज्यपाल, जिलाधिकारी इत्यादि। 
विश्व स्तर पर निम्नलिखित रुप व्यक्त हो चुका था।
1. गणराज्यों के संघ के रुप में संयुक्त राष्ट्र संघ का रुप।
2. संघ के संचालन के लिए संचालक और संचालक का निराकार रुप- संविधान।
3. संघ के तन्त्रों को संचालित करने के लिए तन्त्र और क्रियाकलाप का निराकार रुप- नियम और कानून।
4. संघ पर नियन्त्रण के लिए ब्राह्मण का साकार रुप-पाँच वीटो पावर।
5. प्रस्ताव पर निर्णय के लिए सदस्यों की सभा।
6. नेतृत्व के लिए राजा- महासचिव।
श्रीकृष्ण की दिशा से शेष कार्य मानक सार्वभौम कर्मज्ञान का प्रस्तुतीकरण द्वारा नियम आधारित ”परशुराम परम्परा“ को पूर्णता प्रदान करना है। जिसके लिए निम्नलिखित की आवश्यकता है-
1. गणराज्य या लोकतन्त्र के सत्य रुप- गणराज्य या लोकतन्त्र के स्वरुप का विश्व मानक।
2. राजा और सभा सहित गणराज्य पर नियन्त्रण के लिए साकार ब्राह्मण का निराकार रुप- मन का विश्व मानक।
3. गणराज्य के प्रबन्ध का सत्य रुप- प्रबन्ध का विश्व मानक।
4. गणराज्य के संचालन के लिए संचालक का निराकार रुप- संविधान के स्वरुप का विश्व मानक।
5. साकार ब्राह्मण निर्माण के लिए शिक्षा का स्वरुप- शिक्षा पाठ्यक्रम का विश्व मानक।
  यहाॅ ध्यान देने योग्य यह है कि कृष्ण के समय अधिकतम राज्य एकतन्त्रात्मक थी और उनका प्रसार भी तेजी से बढ़ रहा था। ऐसे में उन्हें ज्ञान द्वारा समझाकर गणराज्यों की स्थापना नहीं हो सकती थी। जो राज्य गणराज्य थे वहाॅ भी राजाओं के नियन्त्रण के लिए नियुक्त ब्राह्मण भी धर्म-अधर्म की व्याख्या करने में असफल हो चुके थे। विवशतावश उनके समक्ष हिंसा का एक मात्र रास्ता ही शेष था। परिणामस्वरूप उन्होनें व्यक्तिगत रूप से मानसिक वध तथा सार्वजनिक रूप से शारीरिक वध की नीति अपनायी। कृष्ण जानते थे कि राजा के चरित्र का सार्वजनिक प्रदर्शन करा उनके प्रजा को अपनी ओर आकर्षित किया जा सकता है क्योंकि प्रजा, राजा के आदेश को वाध्यतावश मानती है, उनके अन्तरात्मा को आदेश द्वारा नियन्त्रित नहीं किया जा सकता। परिणास्वरूप प्रजा का अदृश्य रूप से आत्मबल मेरी ओर हो जायेगा। अर्थात् मानसिक वध हो जायेगा। सिर्फ शारीरिक बल ही उनकी ओर रहेगा, और आत्मबल ही मूल है। इस ज्ञान का लाभ व्यावहारिक जीवन में प्रयोग करते हुये वे एकतन्त्रात्मक राजाओं के समक्ष स्वयं परिस्थिति उत्पन्न कर या गणराज्यों के राजा द्वारा उसे उत्पन्न करवा उनके चरित्र का सार्वजनिक प्रदर्शन चरम सीमा तक होने देकर, आवश्यक समझने पर स्वयं वध करते थे या राजाओं द्वारा वध करवाते थे या भविष्य के लिए छोड़ देते थे जिससे सर्वोच्च और अन्तिम युद्ध-महाभारत में सभी कृष्ण विरोधी एक पक्ष में हो जाये। उनका सम्पूर्ण लक्ष्य उस समय के सबसे बड़े राज्य हस्तिनापुर से ही पूर्ण हो सकता था इसलिए वहाॅ वे अपनी उपस्थिति बनाये रखने के लिए रिश्ता, मित्रता, गुरू, दूत इत्यादि विभिन्न चरित्रों से जुड़ गये थे। जब कौरव और पाण्डवों के बीच युद्ध निश्चित हो गया तब वे अपने एकात्मज्ञान और एकात्मध्यान शक्ति की अटलनीय सफलता को देखते हुये उन्होंने कौरवों पक्ष के माॅगने पर अपनी सेना स्वेच्छा से यह जानते हुये दे दिये कि उनका आत्मबल तो मेरे ही साथ है। और पाण्डव पक्ष के स्वयं उन्हें माॅग लिये जाने पर शस्त्र न उठाने की प्रतिज्ञा के साथ अर्जुन का सारर्थी इसलिए बन गये कि पाण्डवों की मुख्य शक्ति अर्जुन में ही नीहित थी, जिसके कारण युद्ध में पराजय, पलायन और आत्मबल कमजोर पड़ सकता था, युद्ध न होने के इस अन्तिम कारण को भी वे वश में कर युद्ध की अटलनीयता को मजबूती प्रदान कर दिये थे। इस स्थिति तक लाने में पक्षों का विभाजन कृष्ण ने इस प्रकार कर रखा था कि शारीरिक-शक्ति दोनों पक्षों का लगभग बराबर हो और आत्मबल पाण्डव पक्ष में हो जिससे युद्ध लम्बी अवधि तक चलकर सम्पूर्ण एकतन्त्रात्मक राज्य का नाश किया जा सके और पुनः नये सिरे से मानव की सृष्टि गीता ज्ञान द्वारा एकीकरण एवम् निराकार एवम् साकार ऐकेश्वरवाद की स्थापना द्वारा किया जा सके। युद्ध और विजय की सुनिश्चितता इसलिए आवश्यक थी कि तब तक कृष्ण के सम्पूर्ण योजना को दोनों पक्ष समझने लगे थे और युद्ध न होने या पराजय की स्थिति में कृष्ण ही संकट में आ जाते और जीवन भर का परिश्रम और उद्देश्य भी सफल न हो पाता। परन्तु युद्ध क्षेत्र में अर्जुन के अन्दर मोह से उत्पन्न वैराग्य के कारण जो गीता ज्ञान सार्वजनिक रूप से युद्धोपरान्त व्यक्त करना चाहते थे उसे विवशतावश अर्जुन को कर्म अर्थात युद्ध की ओर प्रेरित करने के लिए व्यक्तिगत रूप से व्यक्त करना पड़ा। परिणामस्वरूप युद्धोपरान्त सार्वजनिक प्रजा ज्ञान की महत्ता स्वीकार करने में असमर्थ हो निष्क्रिय-निर्जिव-अपुरूषार्थी और असहाय हो गयी। परिणामस्वरूप उनकी व्यवस्था यहाॅ तक कि स्वयं उनका यदुवंश भी नष्ट हो गया। और कृष्ण का सम्पूर्ण नीति या पूर्ण मन का कार्य गणराज्य व्यवस्था की सर्वोच्च स्थापना, सन्यास आश्रम, प्रजा को ज्ञान की शिक्षा, सार्वजनिक प्रमाणित साकार ऐकेश्वर ध्यान और मूल मानव जाति की स्थापना के लिए अपूर्ण रह गया। यहाॅ ध्यान देने योग्य यह है कि कृष्ण का ज्ञान सहित कर्म की ओर प्रेरित करता गीतोपनिषद् सार्वजनिक रूप से निराकार ऐकेश्वरवाद को ही प्रमाणित करने में सफल रहा क्योंकि ज्ञान की प्रमाणिकता ध्यान अर्थात् काल चिन्तन की प्राथमिकता के साथ सार्वजनिक प्रमाणित हो जाती हैै। ध्यान अर्थात् काल चिन्तन के साथ ज्ञान की व्यावहारिकता कर्मज्ञान तो कृष्ण के जीवन में था जिसके कारण वे सफल जीवन पूर्णकर व्यक्तिगत रूप से साकार ऐकेश्वर सिर्फ अर्जुन के समझ ही प्रस्तुत किये। सार्वजनिक प्रमाणित साकार ऐकेश्वर के बिना निराकार ऐकेश्वर भी प्रमाणित नहीं हो पाता क्योंकि गुण ही निराकार के उपस्थिति का प्रमाण है। कृष्ण स्वयं को सार्वजनिक प्रमाणित साकार ऐकेश्वर सिद्ध नहीं कर पाये वे ऐसा कर भी नहीं सकते थे क्योंकि फिर वहीं ज्ञान से सर्वोच्च ध्यान अर्थात् काल चिन्तन, धर्म की लगातार उन्नति, ज्ञान युक्त अवस्था में कर्म तथा स्थायी-स्वस्थ्य सर्वोच्च गणराज्य व्यवस्था स्थापित हो जाती फिर शेष दो विष्णु अवतारों की क्या आवश्यकता रह जाती? कृष्ण ‘‘परशुराम-परम्परा’’ को ही सुधार के साथ स्थापित करना चाहते थे जो एकतन्त्रात्मक राज्यों के नाश के बाद पुनः नये मानव समाज सृष्टि से प्रारम्भ होती, जिसकी आवश्यकता रामावतार में शुद्धात्मा बालकों लव और कुश द्वारा चुनौती दे व्यक्त की जा चुकी थी। रामावतार में श्रद्धेय श्रेष्ठ जनों से प्रभावित जीवन उनके कृष्णावतार में बलराम, कृष्ण, रूक्मणि और सत्यभामा का श्रद्धा पूर्वक श्रद्धेय श्रेष्ठजनों के प्रभाव से मुक्त रहकर व्यतीत हुआ। सीता के मन की पूर्णता रूक्मणि के रूप में कृष्ण के संग सुखमय गृहस्थ जीवन व्यतीत होकर पूर्ण हुआ परन्तु पुत्र शोक के कारण नया उद्देश्य इच्छा उत्पन्न हो गया और उनका मन पुनः अपूर्ण रह गया। लक्ष्मण-बलराम रूप में कृष्ण से बड़े बनकर पूर्णता को प्राप्त हुये। उर्मिला, सत्यभामा रूप में कृष्ण और रूक्मणि की सेवा कर पूर्णता प्राप्त की, परन्तु रूक्मणि के स्थान पर आने की नयी इच्छा ने उसके मन को अपूर्ण कर दिया। जिसका कारण प्रेम में शंका करना था। सीता के सूक्ष्म शरीर के स्थूल शरीर को पहचानने के लिए कृष्ण ने तब तक प्रतीक्षा की जब तक कोई स्वयं उन्हें वर न चुन ले क्योंकि कृष्ण यह जानते थे कि अपूर्ण मन या सूक्ष्म शरीर की पूर्णता के लिए स्थूल शरीर धारण करता है और वह स्वयं वर चुनेगी क्योंकि बल बिना पूर्व जन्म के प्राप्त किये प्रकट नहीं किया जा सकता। यदि ऐसा न होता तो स्वयं कृष्ण प्रेमावतार होते हुये भी उन प्रेमिकाओं में से किसी को अपनी पत्नी रूप में नही चुने बल्कि सभी को व्यक्त सान्निध्य में रख अवैध प्रेम में बाॅधकर अपूर्ण कर दिये। ये सभी वह अपूर्ण-मन के स्थूल शरीर थे जो रामावतार के समय अनेक नर-नारियों के मन अव्यक्त रूप से अपूर्ण थे। अनेकों जातियों में मूल मानव जाति के मिश्रित हो जाने से मूल मानव जाति के प्रतीक को उन्होंने यदुवंशी बलराम को हल व मूसल धारण करा अलग प्रस्तुत किया। 
जिस प्रकार सीमित मस्तिष्क से असीम या अपने से अधिक मस्तिष्क की सही व्याख्या नहीं की जा सकती उसी प्रकार श्री कृष्ण के मस्तिष्क को समझने के लिए श्रीकृष्ण के मस्तिष्क के बराबर या अधिक स्तर के मस्तिष्क की आवश्यकता होगी। और श्रीकृष्ण ही एक मात्र ऐसे आठवें अवतार हुए जिन्हें समझे बिना मानव संसाधन का विकास असंभव है। यहीं कारण है कि श्रीकृष्ण जितना भक्ति के योग्य हैं उससे अनन्त गुना अधिक समझने के योग्य हैं। श्रीकृष्ण के मस्तिष्क के स्तर की व्याख्या करने वाले संबुद्ध सद्गुरु आचार्य रजनीश ”ओशो“ की सत्य दृष्टि संसार में प्रवाहित होने के बावजूद भी अधिकतम मानव का दुर्भाग्य है कि या तो वे उनकी सत्य दृष्टि से अनभिज्ञ हैं या वे समझने के लिए प्रयत्न ही नहीं करते और अपने व्यक्तित्व को संकुचित कर डालते हैं। यहाँ ओशो द्वारा श्रीकृष्ण के लिए कुछ सत्य दृष्टि प्रस्तुत है ताकि एक मात्र शेष अन्तिम अवतार को पहचानने की दृष्टि निर्मित हो सके। और भविष्य के ”मस्तिष्क के प्राथमिकता वाले युग“ में जीने के लिए स्वयं को योग्य बना सकें। 
(1) अघोर का अर्थ होता है- सरल। किसी को ”घोरी“ कहो तो गाली हो सकती है घोर का अर्थ है- जटिल। अघोर का अर्थ होता है- सरल, बच्चे जैसा निर्दोष। अघोर तो सिर्फ थोड़े से बुद्धांे के लिए उपयोग में लाया जा सकता है। गौतम बुद्ध-अघोरी, कृष्ण-अघोरी, क्राइस्ट-अघोरी, लोओत्सु-अघोरी। गोरख-अघोरी। सरल निर्दोष, सीधे-साधे। इतने सरल कि गणित जीवन में है ही नहीं। हिसाब किताब लगाने का भाव ही चला गया है।
(2) कृष्ण वाममार्गी है। तुम बुद्ध से ज्यादा प्रभावित हो जाते है क्योंकि वह राजमहल छोड़कर जाते है। तुम कृष्ण की अगर प्रशंसा भी करते हो तो थोड़े दबे-दबे कंठ से, थोड़े डरे-डरे, थोड़े भयभीत। अगर लोग कृष्ण की प्रशंसा भी करते है तो गीता वाले कृष्ण की करते है। पूरे कृष्ण को स्वीकार करने की हिम्मत बहुत कम लोगों की है। क्योंकि कृष्ण तो तुम्हारे जैसे मालूम पड़ते है बल्कि तुमसे भी आगे बढ़े हुये। तुम्हारा कृष्ण का स्वीकार अधूरा है। तुम कृष्ण में से बहुत सी बातें काट छांट कर डालना चाहोगे। तुम कृष्ण में संशोधन करने को सदा तत्पर हो। कृष्ण को लोग अपने-अपने हिसाब से मानते है। जितना मान सकते है उतना मान लेते है। बाकी छोड़ देते है। कृष्ण को पहचानने के लिए बड़ी गहरी आँखें चाहिए। कृष्ण को पहचानने के लिए जब तक भीतर की आँख न खुली हो, तब तक पहचानना मुश्किल है। क्योंकि वे वहीं खड़े है, भेद तो कुछ भी नहीं। उपर से भेद नहीं है भीतर से भेद है। तो जब तक भीतर देखने की क्षमता न हो, तब तक तुम कृष्ण को न समझ पाओंगे।
(3) उसके लिए सब हंसी खेल है, सब लीला है। इसलिए हमने कृष्ण को पूर्णावतार कहा। राम गम्भीर हैं छोटी-छोटी बात का हिसाब रखते है। नियम मर्यादा से चलते है- मर्यादा पुरूषोत्तम है। कृष्ण अमर्याद है न कोई नियम है न कोई मर्यादा। कृष्ण के लिए जीवन लीला है।
(4) कृष्ण का महत्व अतीत के लिए कम भविष्य के लिए ज्यादा है। सच ऐसा है कि कृष्ण अपने समय से कम से कम पाँच हजार वर्ष पहले पैदा हुये। सभी महत्वपूर्ण व्यक्ति अपने समय से पहले पैदा होते हैं और सभी गैर महत्वपूर्ण व्यक्ति अपने समय के बाद पैदा होते हैं। बस महत्वपूर्ण और गैर महत्वपूर्ण में इतना फर्क है और सभी साधारण व्यक्ति अपने समय के साथ पैदा होते हैं महत्वपूर्ण व्यक्ति को समझना आसान नहीं होता। उसका वर्तमान और अतीत उसे समझने में असमर्थता अनुभव करता है जब हम समझने योग्य नहीं हो पाते तब हम उसकी पूजा शुरू कर देते हैं या तो हम उसका विरोध करते हैं। दोनों पूजाएँ हैं एक मित्र की एक शत्रु की।
(5) राम कितने ही बड़े हों, लेकिन इस मुल्क के चित्त में वे पूर्ण अवतार की तरह नहीं हैं, अंश हैं उनका अवतार। उपनिषद् के ऋषि कितने ही बड़े ज्ञानी हों, लेकिन अवतार नहीं हैं। कृष्ण पूर्ण अवतार हैं। परमात्मा अगर पृथ्वी पर पूरा उतरे तो करीब-करीब कृष्ण जैसा होगा। इसलिए श्रीकृष्ण इस मुल्क के अधिकतम मन को छु पाये हैं; बहुत कारणों से। एक तो पूर्ण अवतार का अर्थ होता है, मल्टी-डाइमेन्सनल; जो मनुष्य के समस्त व्यक्तित्व को स्पर्श करता हो। राम वन-डाइमेन्सनल है। अब तक कृष्ण को पूरा प्रेम करने वाला आदमी नहीं हुआ। क्योंकि पूरे कृष्ण को प्रेम करना तभी सम्भव है, जब वह आदमी भी मल्टी-डाइमेन्सनल हो। हम आम तौर पर एक आयामी होते हैं। एक हमारा ट्रैक होता है व्यक्तित्व का, एक रेल की पटरी हीेती है, उस पटरी पर हम चलते है। 
(6) कृष्ण का व्यक्तित्व बहुत अनूठा है अनूठेपन की पहली बात तो यह है कि कृष्ण हुए तो अतीत में लेकिन हैं भविष्य के। मनुष्य अभी भी इस योग्य नहीं हो पाया है कि कृष्ण का सम-सामयिक बन सके। अभी भी कृष्ण मनुष्य के समझ से बाहर है। भविष्य में यह सम्भव हो पायेगा कि कृष्ण को हम समझ पाये। इसके कुछ कारण हैं। सबसे बड़ा कारण यह है कि कृष्ण अकेले ही ऐसे व्यक्ति हैं जो धर्म की परम गहराइयों और ऊँचाइयों पर होकर भी गम्भीर नहीं हैं, उदास नहीं हैं, रोते हुए नहीं हैं साधारण सन्त का लक्षण रोता हुआ होना है। जिन्दगी से उदास, हारा हुआ, भागा हुआ। कृष्ण अकेले ही इस समग्र जीवन को पूरा ही स्वीकार कर लेते हैं। जीवन की समग्रता की स्वीकृति उनके व्यक्तित्व में फलित हुई है। इसलिए इस देश में और सभी अवतारों को आंशिक अवतार कहा है। कृष्ण को पूर्ण अवतार कहा गया है राम भी अंश ही हैं परमात्मा के, लेकिन कृष्ण पूरे परमात्मा हैं और यह कहने का, यह सोचने का, ऐसा समझने का कारण है। और वह कारण यह है कि कृष्ण ने सभी कुछ आत्मसात् कर लिया है। कृष्ण अकेले हैं तो शरीर को उसकी समस्त में स्वीकार कर लेते हैं, ‘टोटलिटी’ में। यह एक आयाम में नहीं सभी आयाम में सच है। 
(7) कृष्ण शान्तिवादी नहीं हैं, कृष्ण युद्धवादी नहीं है। असल में वाद का मतलब ही होता है कि दो में से हम एक चुनते है। एक अन्य वादी है। कृष्ण कहते हैं, शान्ति में शुभ फलित होता हो तो स्वागत है, युद्ध में शुभ फलित होता हो तो स्वागत है। कृष्ण जैसे व्यक्तित्व की फिर जरूरत है जो कहे कि शुभ को भी लड़ना चाहिए, शुभ को भी तलवार हाथ में लेने की हिम्मत चाहिए निश्चित ही शुभ जब हाथ में तलवार लेता है, तो किसी का अशुभ नहीं होता। अशुभ हो नहीं सकता क्योंकि लड़ने के लिए कोई लड़ाई नहीं है। लेकिन अशुभ जीत न पाये इसलिए लड़ाई है तो धीरे-धीरे दो हिस्सा दुनियाँ के बट जायेंगे, जल्दी ही जहाँ एक हिस्सा भौतिकवादी होगा और एक हिस्सा स्वतंत्रता, लोकतन्त्र, व्यक्ति और जीवन के और मूल्यों के लिए होगा। लेकिन क्या ऐसे दूसरे शुभ के वर्ग को कृष्ण मिल सकते है? मिल सकते हैं। क्योंकि जब भी मनुष्य की स्थितियाँ इस जगह आ जाती है। जहाँ कि कुछ निर्णायक घटना घटने को होती है, तो हमारी स्थितियाँ उस चेतना को भी पुकार लेती हैं, उस चेतना को भी जन्म दे देती है वह व्यक्ति भी जन्म जाता है। इसलिए मैं कहता हूँ कि कृष्ण का भविष्य के लिए बहुत अर्थ है।