Monday, March 16, 2020

अनिर्वचनीय कल्कि महाअवतार भोगेश्वर श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा विश्व शान्ति का अन्तिम सत्य-सन्देश

अनिर्वचनीय कल्कि महाअवतार भोगेश्वर श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“  द्वारा विश्व शान्ति का अन्तिम सत्य-सन्देश 

प्रकाशित खुशमय तीसरी सहस्त्राब्दि के साथ यह एक सर्वोच्च समाचार है कि नयी सहस्त्राब्दि केवल बीते सहस्त्राब्दियों की तरह एक सहस्त्राब्दि नहीं है। यह प्रकाशित और विश्व के लिए नये अध्याय के प्रारम्भ का सहस्त्राब्र्दि है। केवल वक्तव्यों द्वारा लक्ष्य निर्धारण का नहीं बल्कि स्वर्गीकरण के लिए असिमीत भूमण्डलीय मनुष्य और सर्वोच्च अभिभावक संयुक्त राष्ट्र संघ सहित सभी स्तर के अभिभावक के कर्तव्य के साथ कार्य योजना पर आधारित। क्योंकि दूसरी सहस्त्राब्दि के अन्त तक विश्व की आवश्यकता, जो किसी के द्वारा प्रतिनिधित्व नहीं हुई उसे विवादमुक्त और सफलतापूर्वक प्रस्तुत किया जा चुका है। जबकि विभिन्न विषयों जैसे- विज्ञान, धर्म, आध्यात्म, समाज, राज्य, राजनिति, अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्ध, परिवार, व्यक्ति, विभिन्न संगठनों के क्रियाकलाप, प्राकृतिक, ब्रह्माण्डीय, देश, संयुक्त राष्ट्र संघ इत्यादि की स्थिति और परिणाम सार्वजनिक प्रमाणित दृश्य रुप में थे।
विज्ञान के सर्वोच्च आविष्कार के आधार पर अब यह विवाद मुक्त हो चुका है कि मन केवल व्यक्ति, समाज, और राज्य को ही नहीं प्रभावित करता बल्कि यह प्रकृति और ब्रह्माण्ड को भी प्रभावित करता है। केन्द्रीयकृत और ध्यानीकृत मन विभिन्न शारीरिक सामाजिक और राज्य के असमान्यताओं के उपचार का अन्तिम मार्ग है। स्थायी स्थिरता, विकास, शान्ति, एकता, समर्पण और सुरक्षा के लिए प्रत्येक राज्य के शासन प्रणाली के लिए आवश्यक है कि राज्य अपने उद्देश्य के लिए नागरिकों का निर्माण करें। और यह निर्धारित हो चुका है कि क्रमबद्ध स्वस्थ मानव पीढ़ी के लिए विश्व की सुरक्षा आवश्यक है। इसलिए विश्व मानव के निर्माण की आवश्यकता है, लेकिन ऐसा नहीं है और विभिन्न अनियन्त्रित समस्या जैसे- जनसंख्या, रोग, प्रदूषण, आतंकवाद, भ्रष्टाचार, विकेन्द्रीकृत मानव शक्ति एवं कर्म इत्यादि लगातार बढ़ रहे है। जबकि अन्तरिक्ष और ब्रह्माण्ड के क्षेत्र में मानव का व्यापक विकास अभी शेष है। दूसरी तरफ लाभकारी भूमण्डलीकरण विशेषीकृत मन के निर्माण के कारण विरोध और नासमझी से संघर्ष कर रहा है। और यह असम्भव है कि विभिन्न विषयों के प्रति जागरण समस्याओं का हल उपलब्ध करायेगा।
मानक के विकास के इतिहास में उत्पादों के मानकीकरण के बाद वर्तमान में मानव, प्रक्रिया और पर्यावरण का मानकीकरण तथा स्थापना आई0 एस0 ओ0-9000 एवं आई0 एस0 ओ0-14000 श्रृंखला के द्वारा मानकीकरण के क्षेत्र में बढ़ रहा है। लेकिन इस बढ़ते हुए श्रृंखला में मनुष्य की आवश्यकता (जो मानव और मानवता के लिए आवश्यक है) का आधार ‘‘मानव संसाधन का मानकीकरण’’ है क्योंकि मनुष्य सभी (जीव और नीर्जीव) निर्माण और उसका नियन्त्रण कर्ता है। मानव संसाधन के मानकीकरण के बाद सभी विषय आसानी से लक्ष्य अर्थात् विश्व स्तरीय गुणवत्ता की ओर बढ़ जायेगी क्यांेकि मानव संसाधन के मानक में सभी तन्त्रों के मूल सिद्धान्त का समावेश होगा।
 वर्तमान समय में शब्द -‘‘निर्माण’’ भूमण्डलीय रुप से परिचित हो चुका है इसलिए हमें अपना लक्ष्य मनुष्य के निर्माण के लिए निर्धारित करना चाहिए। और दूसरी तरफ विवादमुक्त, दृश्य, प्रकाशित तथा वर्तमान सरकारी प्रक्रिया के अनुसार मानक प्रक्रिया उपलब्ध है। जैसा कि हम सभी जानते हैं कि मानक हमेशा सत्य का सार्वजनिक प्रमाणित विषय होता है न कि विचारों का व्यक्तिगत प्रमाणित विषय। अर्थात् प्रस्तुत मानक विभिन्न विषयों जैसे- आध्यात्म, विज्ञान, तकनीकी, समाजिक, नीतिक, सैद्धान्तिक, राजनीतिक इत्यादि के व्यापक समर्थन के साथ होगा। ‘‘उपयोग के लिए तैयार’’ तथा ‘‘प्रक्रिया के लिए तैयार’’ के आधार पर प्रस्तुत मानव के विश्व स्तरीय निर्माण विधि को प्राप्त करने के लिए मानव निर्माण तकनीकी WCM-TLM-SHYAM.C (World Class Manufactuing–Total Life Maintenance- Satya, Heart, Yoga, Ashram, Meditation.Conceousness) प्रणाली आविष्कृत है जिसमें सम्पूर्ण तन्त्र सहंभागिता (Total System Involvement-TSI) है औरं विश्वमानक शून्य: मन की गुणवत्ता का विश्वमानक श्रृंखला (WS-0 : World Standard of Mind Series) समाहित है। जो और कुछ नहीं, यह विश्व मानव निर्माण प्रक्रिया की तकनीकी और मानव संसाधन की गुणवत्ता का विश्व मानक है। जैसे- औद्योगिक क्षेत्र में इन्स्टीच्यूट आॅफ प्लान्ट मेन्टीनेन्स, जापान द्वारा उत्पादों के विश्वस्तरीय निर्माण विधि को प्राप्त करने के लिए उत्पाद निर्माण तकनीकी डब्ल्यू0 सी0 एम0-टी0 पी0 एम0-5 एस (WCM-TPM-5S (World Class Manufacturing-Total Productive Maintenance-Siri (छँटाई), Seton (सुव्यवस्थित), Sesso (स्वच्छता), Siketsu (अच्छास्तर), Shituke (अनुशासन) प्रणाली संचालित है। जिसमें सम्पूर्ण कर्मचारी सहभागिता (Total Employees Involvement) है।) का प्रयोग उद्योगों में विश्व स्तरीय निर्माण प्रक्रिया के लिए होता है। और आई.एस.ओ.-9000 (ISO-9000) तथा आई.एस.ओ.-14000 (ISO-14000) है।
युग के अनुसार सत्यीकरण का मार्ग उपलब्ध कराना ईश्वर का कर्तव्य है आश्रितों पर सत्यीकरण का मार्ग प्रभावित करना अभिभावक का कर्तव्य हैै। और सत्यीकरण के मार्ग के अनुसार जीना आश्रितों का कर्तव्य है जैसा कि हम सभी जानते है कि अभिभावक, आश्रितों के समझने और समर्थन की प्रतिक्षा नहीं करते। अभिभावक यदि किसी विषय को आवश्यक समझते हैं तब केवल शक्ति और शीघ्रता से प्रभावी बनाना अन्तिम मार्ग होता है। विश्व के बच्चों के लिए यह अधिकार है कि पूर्ण ज्ञान के द्वारा पूर्ण मानव अर्थात् विश्वमानव के रुप में बनना। हम सभी विश्व के नागरिक सभी स्तर के अभिभावक जैसे- महासचिव संयुक्त राष्ट्र संघ, राष्ट्रों के राष्ट्रपति- प्रधानमंत्री, धर्म, समाज, राजनीति, उद्योग, शिक्षा, प्रबन्ध, पत्रकारिता इत्यादि द्वारा अन्य समानान्तर आवश्यक लक्ष्य के साथ इसे जीवन का मुख्य और मूल लक्ष्य निर्धारित कर प्रभावी बनाने की आशा करते हैं। क्योंकि लक्ष्य निर्धारण वक्तव्य का सूर्य नये सहस्त्राब्दि के साथ डूब चुका है। और कार्य योजना का सूर्य उग चुका है। इसलिए धरती को स्वर्ग बनाने का अन्तिम मार्ग सिर्फ कर्तव्य है। और रहने वाले सिर्फ सत्य-सिद्धान्त से युक्त संयुक्तमन आधारित मानव है, न कि संयुक्तमन या व्यक्तिगतमन के युक्तमानव।
आविष्कार विषय ”व्यक्तिगत मन और संयुक्तमन का विश्व मानक और पूर्णमानव निर्माण की तकनीकी है जिसे धर्म क्षेत्र से कर्मवेद: प्रथम, अन्तिम तथा पंचमवेदीय श्रृंखला तथा शासन क्षेत्र से WS-0 : मन की गुणवत्ता का विश्व मानक श्रृंखला तथा WCM-TLM-SHYAM.C तकनीकी कहते है। सम्पूर्ण आविष्कार सार्वभौम सत्य-सिद्वान्त अर्थात सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में व्याप्त अटलनीय, अपरिवर्तनीय, शाश्वत व सनातन नियम पर आधारित है, न कि मानवीय विचार या मत पर आधारित।“
सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में व्याप्त एक ही सत्य-सिद्धान्त द्वारा व्यक्तिगत व संयुक्त मन को एकमुखी कर सर्वोच्च, मूल और अन्तिम स्तर पर स्थापित करने के लिए शून्य पर अन्तिम आविष्कार WS-0 श्रृंखला की निम्नलिखित पाँच शाखाएँ है। 
1. डब्ल्यू.एस. (WS)-0        : विचार एवम् साहित्य का विश्वमानक
2. डब्ल्यू.एस. (WS)-00       : विषय एवम् विशेषज्ञों की परिभाषा का विश्वमानक
3. डब्ल्यू.एस. (WS)-000      : ब्रह्माण्ड (सूक्ष्म एवम् स्थूल) के प्रबन्ध और क्रियाकलाप का विश्वमानक
4. डब्ल्यू.एस. (WS)-00000    : मानव (सूक्ष्म तथा स्थूल) के प्रबन्ध और क्रियाकलाप का विश्वमानक
5. डब्ल्यू.एस. (WS)-00000    : उपासना और उपासना स्थल का विश्वमानक
भारत सरकार इस श्रृंखला को स्थापित करने के लिए संसद में प्रस्ताव प्रस्तुत कर अपने संस्थान भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) के माध्यम से समकक्ष श्रृंखला स्थापित कर विश्वव्यापी स्थापना के लिए अन्तर्राष्ट्रीय मानकीकरण संगठन (ISO) के समक्ष प्रस्तुत कर सकता है। साथ ही संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO) में भी प्रस्तुत कर संयुक्त राष्ट्र संघ के पुर्नगठन व पूर्ण लोकतंत्र की प्राप्ति के लिए मार्ग दिखा सकता है। 
संयुक्त राष्ट्र संघ सीधे इस मानक श्रृंखला को स्थापना के लिए अपने सदस्य देशो के महासभा के समक्ष प्रस्तुत कर अन्तर्राष्ट्रीय मानकीकरण संगठन व विश्व व्यापार संगठन के माध्यम से सभी देशो में स्थापित करने के लिए उसी प्रकार बाध्य कर सकता है, जिस प्रकार ISO-9000 व ISO-14000 श्रृंखला का विश्वव्यापी स्थापना हो रहा है।  

“शासन और शासक, विकासात्मक हो या विनाशात्मक। प्रणाली कोई भी हो- एकतन्त्रात्मक अर्थात राजतन्त्र या बहुतन्त्रात्मक लोकतन्त्र। वह तब तक अब स्थायी और अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो सकता जब तक कि वह अपने उद्देश्य की प्राप्ति के अनुरूप जनता का निर्माण और उत्पादन न करें। हमारा उद्देश्य है- ‘अपने सीमित कर्म सहित असीम मन युक्त मानव का निर्माण और उत्पादन’, जिसके लिए हमारे सम्मुख दो मार्ग है- एक-गणराज्यों का संघ भारत, दूसरा-राष्ट्रों का संघ संयुक्त राष्ट्र संघ। दोनों एक ही है। बस कर्म क्षेत्र की सीमा में अन्तर है। दोनों का उद्देश्य एक है बस कार्य अलग है। भारत का अपने जनता के प्रति कर्तव्य और दायित्व तथा विश्व के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा ऐसी विवादमुक्त प्रबन्ध नीति उपलब्ध कराना है जिससे दोनों अपने उद्देश्य को निर्वाध गति से प्राप्त करें। जबकि संयुक्त राष्ट्र संघ को सिर्फ अपने अधीन कार्य सम्पादन ही करना मात्र है। उसे प्रबन्ध नीति का आविष्कार नहीं करना है। वह कर भी नहीं सकता और न ही किया क्योंकि वह पाश्चात्य के प्रभाव मण्डल में है। पाश्चात्य के पास सत्य के आविष्कार का इतिहास नहीं है। जबकि प्राच्य के पास सनातन से सत्य के आविष्कार का व्यापक संक्रमणीय, संग्रहणीय और गुणात्मक रूप से अनुभव संग्रहीत है। अब भारत व्यक्तिगत प्रमाणित भाव आधारित सत्य नहीं कहेगा क्योकि अब सार्वजनिक प्रमाणित कर्म, व्यक्त और मानक आधारित समय आ गया है। जो विश्व व्यापी रूप से पदार्थ विज्ञान और आध्यात्म विज्ञान सहित प्राच्य और पाश्चात्य संस्कृतियों में सार्वजनिक रूप से प्रमाणित होगा। और उस विवादमुक्त प्रबन्ध नीति से जब मूल अधिकार शिक्षा द्वारा मनुष्य का निर्माण और उत्पादन होगा। तब भारत तथा संयुक्त राष्ट्र संघ को उसका उद्देश्य प्राप्त होगा अन्यथा वह रोको-रोको, निरोध-निरोध वाले कानून में ही अधिकाधिक समय व धन खर्च करता रहेगा। जिसकी जटिलता बढ़ते ही जाना है। भारत और संयुक्त राष्ट्र संघ दोनों में से किसी के प्रारम्भ से मनुष्य का ”विश्वमानव“ के रूप में निर्माण और उत्पादन प्रारम्भ हो जायेगा। विश्व के सभी देशों के बीच संस्कृतियों का मिश्रण तेजी से हो रहा है ऐसी स्थिति में उसे मानव संसाधन जो कि समस्त निर्माण और उत्पादन का मूल है, का भी विभिन्न विषयों की भांति मानकीकरण तथा विश्व प्रबन्ध के लिए प्रबन्ध का मानकीकारण करना ही होगा। सम्पूर्ण विश्व में निर्माण से उत्पन्न उत्पाद की गुणवत्ता का मानक, संस्था की गुणवत्ता ISO-9000 फिर प्रकृति के कत्र्तव्य व दायित्व को स्वयं का कर्तव्य व दायित्व मानकर पर्यावरण की गुणवत्ता का मानक ISO-14000 स्वीकारा जा चुका है तो फिर गुणवत्ता से युक्त प्रकृति की भाँति स्वयं मनुष्य अपना गुणवत्ता का मानकीकारण कब करेगा? वह मार्ग जो अभी तक उपलब्ध नहीं था वह  विश्वमानक: शून्य (WS-0) - मन की गुणवत्ता का विश्व मानक श्रृंखला के रूप में उपलब्ध हो चुका है जो मेरा कत्र्तव्य था और अब अन्य मानवों का अधिकार है। संसाधन, ज्ञान-विज्ञान, तकनीकी से युक्त पृथ्वी कमल की भाँति खिलने को उत्सुक है, मानवता का रचनात्मक सहयोग लेकर भारत तथा संयुक्त राष्ट्र संघ, उसके खिलने में सहयोग करें जो उसका कर्तव्य और दायित्व है। जिस पर मनुष्य ईश्वर रूप में विराजमान हो सके।” - लव कुश सिंह “विश्वमानव”


क्यों असम्भव था व्यक्ति, संत-महात्माओं-धर्माचार्यो, राजनेताओं और विद्वानो द्वारा यह अन्तिम कार्य ?

क्यों असम्भव था व्यक्ति, संत-महात्माओं-धर्माचार्यो, राजनेताओं और विद्वानो द्वारा यह अन्तिम कार्य ?

विज्ञान, धर्म, राज्य, समाज, परिवार और व्यक्ति के विश्व, भारत, अन्तर्राष्ट्रीय, राज्य, भारतीय समाज, भारतीय परिवार और भारतीय व्यक्ति स्तर पर व्यक्त सार्वजनिक प्रमाणित सिद्धान्तों अर्थात् परिणामों का प्रयोग करते हुए वर्तमान शासन प्रणाली स्वस्थता सहित शासन प्रणाली के अनुसार वैश्विक एकता की स्थापना तथा मनुष्य जीवन के प्रत्येक विषय के वर्तमान तथा भविष्य के लिए व्यवहारिक स्वरुप को प्रदान करना मनुष्य के लिए चुनौती और ईश्वर के लिए शेष कार्य बन चुकी थी। जिसके निम्न कारण सार्वजनिक रुप से व्यक्त हो चुके थे।

1. व्यक्तिगत मन से युक्त व्यक्ति से यह कार्य इसलिए असम्भव था क्योंकि 
व्यक्ति संकीर्ण होकर स्वयं से बाहर नहीं निकल पा रहा था। जबकि सभी सार्वजनिक प्रमाणित परिणाम उसके समक्ष व्यक्त थे।

2. संयुक्त मन से युक्त व्यक्ति से यह कार्य इसलिए असम्भव था क्योकि 
व्यक्ति स्वंयं से बाहर निकलकर संयुक्त मन से युक्त अवश्य हो चुका था परन्तु सभी सार्वजनिक प्रमाणित परिणाम उसके सामने व्यक्त होने के बावजूद एक साथ उसकी दृष्टि में नहीं थे। सिर्फ वे ही सिद्धान्त उन सभी संयुक्त मन से युक्त व्यक्तियों के समक्ष अलग-अलग रुप से व्यक्त थे जिस विषय की ओर से विशेषीकृत होकर व्यक्ति संयुक्त मन में स्थापित हुआ था। अर्थात् जो अध्यात्म की ओर से आ रहा था वह अध्यात्म के परिणाम को तो जानता था परन्तु अन्य विषयों की ओर से व्यक्त परिणामों को नहीं जानता था। इसी प्रकार जो विज्ञान की ओर से आया था वह विज्ञान के परिणामों को तो जानता था परन्तु अध्यात्म की ओर के परिणामों को नहीं जानता था। यदि दोनों को जानता था तो अन्य के परिणामों को नहीं जानता था।

3. संत-महात्माओं-धर्माचार्यो से यह कार्य इसलिए असम्भव था क्योंकि
उनकी स्थिति संयुक्त मन से युक्त व्यक्ति की स्थिति से भिन्न नहीं थी। उनकी मानसिक विकास की गति नीचे से उपर अर्थात् शाखा से जड़ की ओर होती है जबकि भगवान विष्णु के आठवें व्यक्तिगत प्रमाणित पूर्णावतार श्रीकृष्ण ने यह स्पष्ट रुप से कहा था कि यह संसार उल्टे वृक्ष के समान है जिसका जड़ (मूल) उपर तथा शाखाएं संसार में व्याप्त हैं। संत-महात्मा अपनी-अपनी परम्परा अनुसार अपने शाखा की ओर से मन की उच्चता द्वारा सिर्फ शाखा के मूल तक ही जाकर उसी को वृक्ष का मूल मान बैठते हैं। यदि वे वृक्ष के मूल तक पहुँचते तो संसार के सभी विषय में व्याप्त मूल की शाखायें उन्हें प्राप्त हो जाती। संत-महात्मा अपनी-अपनी परम्परा अनुसार शाखा से मूल की ओर गति में इतने बद्ध और सार्वजनिक रुप से व्यक्त हो जाते हैं कि उनका फिर वापस लौटना या ऐसे सत्य-विचार का समर्थन करना जो उनकी महत्ता को सीमित करता है, उनके आत्म-सम्मान या अहंकार पर आघात होता है। इस कारण यह कार्य सन्त-महात्माओं से भी होना असम्भव था। साथ ही विशेष वेशधारी होने के कारण भी सम्भव नहीं था क्योंकि समय अन्तिम अवतार के अवतरण के लिए निर्मित था और प्रत्येक पूर्णावतार विशेष वेशधारी नहीं बल्कि संसार के अनुसार अर्थात् कालानुसार सामान्य वेशधारी होता है और यदि यह कार्य संत-महात्मा पूर्ण ही करने में सक्षम होते तो अन्तिम अवतार के लिए कार्य ही शेष न रह जाता। 

4. राजनेताओं से यह कार्य इसलिए पूर्ण होना असम्भव था क्योकि 
उनकी सीमा मात्र साम, दाम, दण्ड, भेद की रीति से सत्ता प्राप्ति तक ही थी। उनकी प्राथमिकता सत्ता होती है जनकल्याण नहीं, परिणामस्वरुप उनकी सम्पूर्ण बुद्धि शक्ति सत्ता प्राप्ति में ही खर्च होती थी। सत्ता प्राप्ति के बाद जन कल्याण के कार्य विवशता होती थी न कि कर्तव्य और दायित्व। उनकी समस्त नीति वर्तमान पर आधारित होती है न कि भविष्य की आवश्यकता पर। चाहें उनके लिये ही वह नीति क्यों न समय का निर्माण करती हो। परन्तु यह उनके समझ से परे का विषय होता है। परिणामस्वरुप उन्हें हमेशा अपने वक्तव्य बदलने व स्पष्ट करने पड़ते हैं।

5. विद्वानों के समूह द्वारा यह कार्य इसलिए असम्भव था क्योकि 
विद्वानों की दृष्टि अपने विषय की ओर से विद्वता सिद्ध करने पर थी न कि अपने विषय की ओर से सार्वजनिक प्रमाणित परिणामों को व्यक्त कर सकारात्मक, रचनात्मक और समन्वयात्मक दृष्टि पर। परिणामस्वरुप न तो परिणाम व्यक्त होता था न ही समन्वय की स्थापना ही थी। यदि सम्भव भी हो जाता तो विश्व स्तर पर अवतार, पुनर्जन्म, एकेश्वर, साकार ईश्वर, मूल मानव जाति जैसे अनेक विज्ञान आधारित विषय अप्रमाणित ही रह जाते क्योंकि ये सिर्फ एक शरीर द्वारा ही सिद्ध हो सकते हैं न कि शरीरों के समूह से।

उपरोक्त सार्वजनिक प्रमाणित कारणों से मनुष्य के समक्ष यह कार्य चुनौती के रुप में व्यक्त थी तो ईश्वर के लिए स्पष्ट रुप से कार्य के रुप में। मनुष्य के मानसिक विकास की गति व्यक्तिगत मन से युक्त व्यक्ति से संयुक्त मन से युक्त व्यक्ति से सत्य सहित संयुक्त मन से युक्त व्यक्ति की ओर होता है जबकि अवतारों की गति सत्य सिद्धान्त सहित संयुक्त मन से युक्त शरीर की ओर से संयुक्त मन से युक्त शरीर से व्यक्तिगत मन से युक्त शरीर की ओर होता है। परिणामस्वरुप अवतारों के समक्ष पहले मूल फिर शाखाओं का स्वरुप व्यक्त होता है। मूल अर्थात् सत्य तथा शाखा अर्थात् सिद्धान्त और यहीं वृक्ष शास्त्र कहे जाते हैं।


ईश्वर, अवतार और मानव की शक्ति सीमा

ईश्वर, अवतार और मानव की शक्ति सीमा

इस ब्रह्माण्ड में सभी वस्तु की एक शक्ति सीमा है। उसके ज्ञान से युक्त होने पर मनुष्य अपने कर्म-इच्छा-उम्मीद को एक सही वस्तु के साथ योग करा सकता है। अन्यथा एक समय बाद उसे ना-उम्मीद होना पड़ता है और उसके विश्वास को आघात पहुँचता है। उदाहरणस्वरूप यदि आप बिजली विभाग का काम टेलिफोन विभाग से या टेलिफोन विभाग का काम जल विभाग से उम्मीद कर बैठेंगे तो वह कभी भी पूरा नहीं होने वाला। इसमें गलती आपके ज्ञान की ही होगी और अपने विश्वास को खोने वाले आप स्वयं ही होगें। इसी प्रकार साइकिल, मोटरसाइकिल, कार, बस, रेलगाड़ी, हवाई जहाज की अपनी-अपनी गति सीमा है। यदि गति सीमा की जानकारी न हो और उसकी क्षमता से अधिक उससे उम्मीद कर बैठेंगे तो इसमें गलती आपके ज्ञान की ही होगी और अपने विश्वास को खोने वाले आप स्वयं ही होगें।
मनुष्य कर्म किये बिना बहुत सी उम्मीद ”दूसरों से” और ”दूसरों में“ देखने लगता है। मनुष्य का उपयोग करने वाले भी दूसरों को उम्मीद दिखाकर उनका विभिन्न प्रकार से उपयोग-दुरूपयोग सनातन से करता आ रहा है। इस क्रम में ईश्वर, अवतार और मानव की शक्ति सीमा क्या है, यह जानना आवश्यक है।

ईश्वर की शक्ति सीमा - 
ईश्वर अर्थात सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त, ब्रह्माण्ड में कहीं भी अर्थात उसके किसी भाग के भाग में अपने सतुलन-स्थिरता-एकता-शान्ति के लिए क्रम संकुचन (विनाश) और क्रम विकास (विकास) करता रहता है। यह कार्य रज या तम गुण के प्राथमिकता होने पर सत्व गुण के हस्तक्षेप द्वारा सम्पन्न होता है। पृथ्वी ग्रह पर यह अति-वृष्टि (अधिक वर्षा), अधिक सूखा, अधिक वर्फबारी, भूकम्प, महामारी इत्यादि द्वारा व्यक्त होता है। ईश्वर अपने उपस्थिति और इन क्रियाकलापों का सन्देश पृथ्वी के जीवों के माध्यम से व्यक्त करता है जो विकसित मस्तिष्क क्षमता के द्वारा ही समझा जा सकता है। ईश्वर के सब कार्य इतने विशाल हैं इसलिए ही उन्हें सर्वशक्तिमान कहा जाता है। ईश्वर के सभी क्रियाकलाप बिना किसी भेद-भाव के सम्पन्न होता है अर्थात एक समान रूप से सभी के लिए सम्पन्न होता है। ईश्वर अपने सम्बन्धितों की सहायता, उनके साथ के मानवों के माध्यम से मार्गदर्शन द्वारा करता है, सम्बन्धित उसका लाभ कैसे लें, ये उनके बुद्धि पर निर्भर करता है। 

अवतार की शक्ति सीमा - 
अवतार सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त को युगानुसार स्थापित करने के लिए व्यक्त होते हैं। इस स्थापना का क्रम सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त के अंश-अंश संक्रमणीय-गुणात्मक-संग्रहणीय-रचनात्मक रूप के बढ़ते क्रम से होता है। और अन्त में पूर्ण रूप व्यक्त होता है। युगानुसार स्थापना के लिए विधि पूर्ण प्रत्यक्ष से पूर्ण प्रेरक तक का मार्ग होता है। प्रत्यक्ष अवतार वे होते हैं जो स्वयं अपनी शक्ति का प्रत्यक्ष प्रयोग कर समाज का सत्यीकरण करते हैं। यह कार्य विधि समाज में उस समय प्रयोग होता है जब अधर्म का नेतृत्व एक या कुछ मानवों पर केन्द्रित होता है। प्रेरक अवतार वे होते हैं जो स्वयं अपनी शक्ति का अप्रत्यक्ष प्रयोग कर समाज का सत्यीकरण जनता एवं नेतृत्वकर्ता के माध्यम से करते हैं। यह कार्य विधि समाज में उस समय प्रयोग होता है जब समाज में अधर्म का नेतृत्व अनेक मानवों और नेतृत्वकर्ताओं पर केन्द्रित होता है। इन विधियों में से कुल मुख्य दस मुख्य अवतारों में से प्रथम सात (मत्स्य, कूर्म, वाराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, राम) अवतारों ने समाज का सत्यीकरण प्रत्यक्ष विधि के प्रयोग द्वारा किया था।  आठवें अवतार (श्रीकृष्ण) ने दोनों विधियों प्रत्यक्ष ओर प्रेरक का प्रयोग किया था। नवें (भगवान बुद्ध) और अन्तिम दसवें अवतार की कार्य विधि प्रेरक ही है। अवतार चूँकि सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त को युगानुसार स्थापित करने के लिए प्रकट होते हैं इसलिए वे ईश्वर की शक्ति के सुर अर्थात तालमेल में या समर्थित होते हैं। वे ईश्वर के किसी शक्ति सीमा को न तो रोक सकते हैं ना ही बदल सकते हैं और ना ही प्रयोग कर उत्पन्न कर सकते हैं लेकिन वे इतने समयानुसार वर्तमान होते हैं कि ईश्वर की शक्ति उनका सदैव समर्थन करती रहती है। अवतार अपने उपस्थिति और इन क्रियाकलापों का सन्देश मानवों को और भी अच्छा करने के विचार प्रसार से व्यक्त करते रहते हैं जो विकसित मस्तिष्क क्षमता के द्वारा ही समझा जा सकता है। अवतार के सब कार्य उस समय के समाज के लिए सर्वव्यापक होते हैं इसलिए ही उन्हें अवतार कहा जाता है। अवतार के सभी क्रियाकलाप बिना किसी भेद-भाव के सम्पन्न होता है अर्थात एक समान रूप से सभी के लिए सम्पन्न होता है। 

मानव की शक्ति सीमा - 
मनुष्य अपनी शारीरिक-आर्थिक-मानसिक शक्ति से निर्माण और विनाश दोनों कर सकता है। वह ईश्वर और अवतार के द्वारा सम्पन्न किये जाने वाले कार्य को जान सकता है, उससे बचने का मार्ग निकाल सकता है परन्तु उसे सम्पन्न होने से रोक नहीं सकता। मनुष्य, ईश्वर और अवतार के कार्यों की इच्छा प्रकट कर सकता है, उसकी उम्मीद अन्य मनुष्य को दिखा सकता है परन्तु उसे सम्पन्न नहीं कर सकता क्योंकि वह मनुष्य के शक्ति सीमा के अन्तर्गत नहीं आता। मनुष्य अपने उपस्थिति और इन क्रियाकलापों का सन्देश मानवों को बीच विचार प्रसार से व्यक्त करते रहते हैं जो सामान्य मस्तिष्क क्षमता के द्वारा असानी से समझा जा सकता है। मनुष्य के सब कार्य उस समय के समाज के अंश-अंश के लिए उपयोगी होते हैं इसलिए ही उन्हें मनुष्य कहा जाता है। मनुष्य के सभी क्रियाकलाप भेद-भाव से सम्पन्न होता है अर्थात एक समान रूप से सभी के लिए नहीं होता है।

व्याख्या - 
ईश्वर और अवतार के कार्य समष्टि (संयुक्त) कार्य कहे जाते हैं जबकि मनुष्य के कार्य व्यष्टि (व्यक्तिगत या अंश) कार्य कहे जाते हैं। इस समष्टि कार्य द्वारा ही काल व युग परिवर्तन होता है न कि सिर्फ चिल्लाने से कि ”सतयुग आयेगा“, ”सतयुग आयेगा“ से। यह समष्टि कार्य जिस शरीर से सम्पन्न होता है वही युगावतार के रूप में व्यक्त होता है। धर्म में स्थित वह अवतार चाहे जिस सम्प्रदाय (वर्तमान अर्थ में धर्म) का होगा उसका मूल लक्ष्य समष्टि कार्य होगा और स्थापना का माध्यम उसके सम्प्रदाय की परम्परा व संस्कृति होगी।
आध्यात्मिक सत्य, सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त का ही दूसरा समानार्थी शब्द है इसलिए उस अनुसार राष्ट्र की व्यवस्था का सत्यीकरण अवतार के कार्य क्षेत्र व शक्ति सीमा के अन्तर्गत आता है। कोई मनुष्य इसकी इच्छा तो कर सकता है परन्तु उसको पूर्ण नहीं कर सकता। ये अवश्य है कि इच्छा करने वाला विकसित मस्तिस्क का ही होगा क्योंकि बिना विकसित मस्तिष्क के ये शब्द व्यक्त हो ही नहीं सकता। विकसित मस्तिष्क, समष्टि मस्तिष्क होता है। इच्छा व्यक्त होने पर अवतार उसे अवश्य पूर्ण करते हैं क्योंकि यही उनके प्रकट होने का योग्य वातावरण होता है। 


श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ के उद्गार

श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ के उद्गार

1. व्यष्टि सत्य-धर्म-ज्ञान को ही हम देश-काल बद्ध सत्य-धर्म-ज्ञान अर्थात मानवीय कार्य अर्थात ब्रह्मचर्य एवं गृह्स्थ आश्रम कहते है। यही पंचन्द्रियग्राह्य एवं उनसे उपस्थापित अर्थात विज्ञान है तथा समष्टि सत्य-धर्म-ज्ञान को हम देश-काल मुक्त सत्य-धर्म-ज्ञान अर्थात ईश्वरीय सत्य-धर्म-ज्ञान अर्थात ईश्वरीय कार्य अर्थात वानप्रस्थ आश्रम कहते हैं। यही इन्द्रियातीत सूक्ष्म योगज शक्ति अर्थात वेद है। वर्तमान समय में इन आश्रमों के मूल सत्य को जानकर समाज में ही कार्य करना सम्भव है न कि किसी विशेष स्थल पर।
2. व्यष्टि सत्य-धर्म-ज्ञान से उच्च समष्टि सत्य-धर्म-ज्ञान होता है। समष्टि सत्य-धर्म-ज्ञान की जीत हमेशा निश्चित भी होती है। ज्ञान में कृष्ण ओर भीष्म पितामह दोनों ही बराबर थे लेकिन कृष्ण समष्टि सत्य-धर्म-ज्ञान के लिए अपने व्यष्टि सत्य-धर्म-ज्ञान को उसमें बँधे रहने के बाद भी छोड़ दिये थे जबकि भीष्म पितामह, इसके विपरीत कार्य किये थे।
3. ज्ञानी या शिक्षित वही हंै जो क्रियाकलापों के अध्ययन द्वारा कार्य के महत्व, क्षेत्र एवं भविष्य को समझ जाते हैं। जो नहीं समझ पाते वे सलाह लेने पर भ्रमित भी हो सकते है। लोग कहते है भाग्य से ज्यादा कुछ नहीं मिलता, मैं कहता हूँ ज्ञान व उसके अनुसार कर्म करने से ज्यादा कुछ भी प्राप्त नहीं होता। वहीं जब दृश्य भविष्य हो तो कर्म के साथ न जुड़ना दृश्य मूर्खता के प्रदर्शन के सिवा कुछ भी नहीं होता।
4. ज्ञानी अर्थात शिक्षित मानव के नीचे तीन स्तर हैं। उपर-साहित्यीकृत, मध्य-साक्षर एवं नीचे-निरक्षर। साहित्यीकृत मानव बिना स्वयं का ज्ञान रखे पुस्तकों पर आधारित रहते है। मध्य-साक्षर स्तर का मानव ज्ञानी एवं साहित्यीकृत मानव के बीच का संर्घषमय स्तर है। साहित्यीकृत स्तर बुद्धि को बद्ध कर देता है जबकि साक्षर स्तर साहित्यीकृत एवं ज्ञानी स्तर की ओर जाने के लिए खुला होता है। केवल ज्ञानी अर्थात शिक्षित स्तर ही मानव को प्रबन्धकीय नियंत्रण एवं नेतृत्व से युक्त कर अपने मालिक स्वयं या स्वतंत्र कर सकता है।
5. उच्च शिक्षा प्राप्त मनुष्य को अपनी शिक्षा के आधार पर, मध्यम शिक्षा प्राप्त मनुष्य को शिक्षा व अनुभव के आधार पर, स्वरोजगार में संघर्ष करना चाहिए जिससे वे स्वयं के साथ दूसरों को रोजगार उपलब्ध करा सके। ऐसे मनुष्य यदि नौकरी करते हैं तो वह अपना स्वार्थमय जीवन व्यतीत कर सकते है। वे अपने ज्ञान व विचारों को कार्य रूप नहीं दे सकते। ऐसे मनुष्य द्वारा स्वरोजगार की शिक्षा देना भी शोभा नहीं देता न ही उनके विचार प्रभावकारी होते हैं।
6. यदि तुम समग्र जगत के ज्ञान से पूर्ण होना चाहते हो तो पाँच भाव विचार एवं साहित्य, विषय एवं विशेषज्ञ, ब्रह्ममाण्ड (स्थूल एवं सूक्ष्म) प्रबन्ध या क्रियाकलाप मानव प्रबन्ध या क्रियाकलाप एवं उपासना स्थल का सामंजस्य कर एक मुखीकर जो। समग्र जगत का भविष्य हैं पूर्ण ज्ञान है। एकमन है। समान गठन का रहस्य है। 
7. सम्पूर्ण मानव समाज में पूछता हँू कि उनमें में से अधिकतम के मन की स्थिरता वर्तमान समय में किन विषयों पर केन्द्रित है। स्पष्ट है वर्तमान समय में न तो ज्ञान पर केन्द्रित है न ही इन्द्रिय पर बल्कि वह बाह्य विषयों धन एवं संसाधन पर केन्द्रित है। वे उनके लिए ही जीते हैं मरते हैं। यही उनका लक्ष्य है। और यह लक्ष्य पाश्चात्य विज्ञान के ज्ञान द्वारा ही प्राप्त हो सकता है। लेकिन उसकी स्थिरता तभी तक रह सकती है। जब उसके साथ आध्यात्म अर्थात ज्ञान हो और यह है वेदान्त न तो सिर्फ वेदान्त से कार्य होगा, न ही सिर्फ पाश्चात्य से बल्कि चाहिए उनका संयुक्त दृश्य ज्ञान व सर्वोच्च दृश्य कर्मज्ञान। जो मानव, मानव के लिए राजनीति करता है उसकी एक सीमा है वह एक सीमा तक जाकर उससे आगे नहीं बढ़ सकता क्योंकि वह मानक विहीन कार्य करता है। जो मानव, सत्य या ईश्वर या आत्मा के लिए राजनीति करता है वह असीम है। अर्थात वह मानक युक्त कार्य करता है। प्राकृतिक सन्तुलन के लिए आत्मा है। मानव के सन्तुलन के लिए धन है। प्रकृति के असीम मे मानव ससीम है।
8. आत्मा मानक है। मन का क्रम विकास एवं क्रम संकुचन मानव स्वयं करता है। जब यह मन दोनों दिशाओं में से किसी एक को पार करता है तब इस मन की तात्विक स्थिति, आत्मा अर्थात मानक की स्थिति में पहुॅच जाता है। यही स्थिति आत्म प्रकाश की स्थिति है। इस मानक का ज्ञान ही सत्य-धर्म है और लाने वाले कालानुसार सूत्र को ईश्वर नाम कहते हैं। मानक अर्थात आत्मा अर्थात सत्य-धर्म-ज्ञान स्थिर रहता है। लेकिन मन को इस ओर लाने वाले सूत्र भिन्न-भिन्न होते हैं और होंगे क्योकि जो उत्पन्न है, वह स्थिर नहीं है। अदृश्य काल में यह सूत्र अनेक होंगे लेकिन दृश्य काल के लिए हमेशा एक ही होगा क्यांेकि वह सार्वजनिक प्रमाणित होगा।
9. सभी सम्प्रदायों के मूल में जो निहित हैं। जिससे वे अपना जीवकोपार्जन करते हैं। वह हैं कर्म यह मानव का एक उत्पाद है। यह देश -काल बद्ध है। इस कर्म को सही दिशा में ले जाने के लिए मानक चाहिये- यह है ईश्वर या सत्य या आत्मा। यही ज्ञान है यह देश काल मुक्त है। यही वेद का सत्य ज्ञान है। यही धर्मनिरपेक्ष है, सर्वधर्मसमभाव है, धर्म है। जब मानक ज्ञान युक्त कार्य करते है। तब ब्रह्मभाव व्यक्त होता है। जो सभी सम्प्रदाय की आवश्यकता है। वर्तमान में समष्टि (समाज) दृश्य कर्म में केन्द्रित है। आवश्यकता है दृश्य कर्मज्ञान की। कर्मवेद-प्रथम, अन्तिम तथा पंचमवेद अर्थात विश्वमानक-शून्य श्रृंखला उसी सत्य का सत्य रूप है। जो बारम्बार परिष्कृत होकर शुद्ध रूप से व्यक्त हो चुका है। और संगम है सत्य ज्ञान व सत्य कर्म (अदृश्य एवं दृश्य) का।
10. ज्ञान का सामान्यीकरण पूर्णता की ओर अर्थात व्यष्टि एवं समष्टि की ओर तथा विशेषीकरण अपूर्णता अर्थात् सिर्फ व्यष्टि की ओर ले जाता है। वर्तमान शिक्षा प्रणाली मानव को विशेषीकरण की ओर ले जा रही है जो मानसिक पराधीनता, समाज के रूग्णता एवं विवाद का मुख्य कारण है। इस शिक्षा प्रणाली को पूर्ण बनाना अतिआवश्यक है क्योंकि अपूर्ण मानव मन को उत्पन्न करने का यही मुख्यश्रोत है। परिणाम पुरानी पीढ़ी एवं नई पीढ़ी के बीच टकराव एवं विवाद है।
11. अतः यदि भारत को महान बनाना है। भारतीय संविधान को विश्व संविधान में परिवर्तित करना है तो एकात्मकर्मवाद पर आधारित दृश्यकाल के लिए एक शब्द चाहिए। जो परिचित कराना मात्र हो, स्वभाव से हो, सन्तुलित हो, स्थिर हो, व्यापक हो, समष्टि हो, विद्यमान हो, सर्वमान्य हो, दृश्य हो, कारण युक्त हो, आध्यात्मिक एवं भौतिक कारण युक्त हो, विश्वभाषा में हो, सभी तन्त्रों, व्यक्ति से अन्तर्राष्ट्रीय संघ के सच्चे स्वरूप एवं विश्व के न्यूनतम एवं अधिकतम साझा कार्यक्रम को प्रक्षेपित करने में सक्षम हो। अदृश्य काल के विकास के सात चक्रों (पाँच अदृश्य कर्म चक्र, दो अदृश्य ज्ञान कर्म चक्र) को प्रक्षेपित करने में सक्षम हो, को स्थापित करना पडे़गा। वही नव विश्व निर्माण का सूत्र है, अन्तिम रास्ता है और उसकी प्रस्तुती प्रथम प्रस्तुती होगी। वही अन्तिम प्रस्तुती भी होगी क्योंकि सार्वजनिक प्रमाणित सत्य सिर्फ एक ही होता है।
12. क्या उस स्वर्ण सूत्र की भाषा हिन्दी, संस्कृत, उर्दु इत्यादि साम्प्रदायिक भाषा हो सकती है। कदापि नहीं। क्योकिं जो स्वर्ण सूत्र सम्पूर्ण मानव समाज, सभी सम्प्रदायों को जोड़ने वाली होगी वह विश्व भाषा अर्थात अंग्रेजी में ही होगी। नहीं तो वह विवादयुक्त हो जायेगा। इसकी अनुभूति स्वामी विवेकाननद जी को पूर्ण रूप से थी क्योंकि पाश्चात्य विज्ञान की उपयोगिता जिस प्रकार बढ़ रही थी। और उसके प्रत्येक आविष्कार का नामकरण विश्व भाषा में हो रहा था उसके आधार पर ही उन्होंने कहा था-‘‘हिन्दू भावों को अंग्रेजी में व्यक्त करना.... जिसे बच्चा-बच्चा  समझ सके’’। भाषा तो ज्ञान को व्यक्त करने का साधन मात्र है। इसलिए स्वर्ण सूत्र अंगे्रजी भाषा में ही है। जिसका अनुवाद विश्व के प्रत्येक भाषा में होगा ताकि सम्पूर्ण मानव समाज को एक सूत्र में बाँधा जा सके।
13. यदि ‘ओम’ शब्द अदृश्य काल में व्यष्टि को शान्ति प्रदान करने एवं ‘‘मैैं ही ब्रह्म हूँ’’ को सिद्ध करने का सूत्र अर्थात ईश्वर नाम है तो दृश्य काल के लिए शब्द या सूत्र ईश्वर नाम, व्यष्टि को शान्ति अर्थात ‘‘सभी ब्रह्म हैं’’ को सिद्ध करने में सक्षम होगा और वह विश्व भाषा में ही होगा नहीं तो विवादयुक्त हो जायेगा।
14. सम्पूर्ण मानव समाज मेें अव्यवस्था अशान्ति, शोषण, अस्थिरता अत्यादि विकास के बाधकों का अस्तित्व तब तक कायम रहेगा जब तक स्थूल कारण एवं पदार्थ पर केन्द्रित मानव मन की स्थिरता के लिए स्थूल गुणों से युक्त ईश्वर नाम का आविष्कार एवं स्थापना नहीं हो जाता और तब तक न ही काल परिवर्तन होगा न ही मानव समाज स्थिरता को प्राप्त करेगा।
15. ऋग्वेद ज्ञान आधारित है। सामवेद ज्ञान और गायन आधारित है, यजुर्वेद ज्ञान तथा प्रकृति एवम् मानव के संतुलन के लिए अदृश्य कर्म अर्थात अदृश्य यज्ञ आधारित हैं, अथर्ववेद ज्ञान एवम् औषधि आधारित है। अगला वेद जब भी होगा वह ज्ञान तथा प्रकृति एवम् मानव के सन्तुलन के लिए दृश्य कर्म अर्थात अदृश्य यज्ञ अर्थात् व्यष्टि एवम् समष्टि कर्मज्ञान पर आधारित होगा क्योंकि इसके अलावा और कोई रास्ता भी नहीं है।
16. ईश्वर नाम का उत्पत्तिकत्र्ता देश-काल मुक्त ज्ञान आधारित साहित्य को वेद कहते है। ईश्वर नाम के व्यापक अर्थ को व्यक्त करने वाले साहित्य को उपनिषद् कहते है। व्यष्टि या अदृश्य ईश्वर नाम के अर्थ को व्यक्त करने वाले साहित्य व्यष्टि-उपनिषद् तथा समष्टि या दृश्य ईश्वर नाम के अर्थ को व्यक्त करने वाले साहित्य को समष्टि उपनिषद् कहते है। ईश्वर नाम से उत्पन्न मानवीय साकार कथा साहित्य को पुराण कहते है।
17. आप सभी अपने धर्म पुस्तको को देखें उसमें दृश्य काल में प्रकृति एवम् मानव के सन्तुलन के लिए दृश्य कर्मज्ञान उपलब्ध नहीं है। क्योंकि वे ज्ञान के क्रम विकास द्वारा सर्वोेच्च स्तर तक तो पहँुच गये है। लेकिन उनका मार्ग अदृश्य काल का है। उस वक्त उन्हें दृश्य काल का आभास भी नहीं था।
18. मानव एवम् प्रकृति के प्रति निष्पक्ष, सन्तुलित एवम् कल्याणार्थ कर्मज्ञान के साहित्य से बढ़कर आम आदमी से जुड़ा कोई भी साहित्य कभी भी आविष्कृत नहीं किया जा सकता। यही एक विषय है। जिससे एकता, पूर्णता एवम् रचनात्मकता एकात्म भाव से लाई जा सकती है। संस्कृति से राज्य नहीं चलता। कर्म से राज्य चलता है। संस्कृति तभी तक बनी रहती है जब तक पेट में अन्न हो, व्यवस्थायें सत्य-सिद्धान्त युक्त हो, दृष्टि पूर्णमानव के निर्माण पर केन्द्रित हो। संस्कृति कभी एकात्म नहीं हो सकती लेकिन रचनात्मक दृष्टिकोण एकात्म होता है। जो कालानुसार, कर्मज्ञान और कर्म है। अदृश्य काल में अनेकात्म और दृश्य काल में एकात्म कर्मज्ञान होता है। और यही कर्म आधारित भारतीय संस्कृति है जो सभी संस्कृतियों का मूल हैंे।
19. प्रत्येक समय में धर्म ग्रन्थ, उस समय के राजनीतिक, आर्थिक एवम् सामाजिक व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने के लिए लिखे गये थे। जो समयानुसार सही भी थी। लेकिन यह आवश्यक नहीं कि वह हमेशा सही ही रहेगीं क्योंकि मानव समाज के बढ़ते बौद्धिक स्तर एवम् बदलते मानसिकता के परिणामस्वरूप मूल्यांकन का आधार भी बदलता रहता है। सम्पूर्ण मानव समाज चाहे जिस समय में क्यों न रहा हो लेकिन प्राकृतिक सत्य ही उसका मूल रहा है जो हमेशा रहेगा भी। 
20. तुम लोगों से मेरा एक सूत्रीय कहना यह है कि देखो ईश्वर भी अपनी स्थिरता, शान्ति एवम् एकता के लिए समान भाव से नियमानुसार व्यापार करते है। तुम भी ईश्वर के उस समान भाव से नियमानुसार व्यापार के दर्शन के ज्ञान से युक्त हो जाओ।
21. यह मानव क्रियाकलापों का विश्वमानक विश्व के सभी भूत, वर्तमान और भविष्य के महापुरूषों एवम् पुरूषों के क्रियाकलापों का मानक है। जिससे मैं भी बाहर नहीं हँू। क्योंकि मै भी एक मानव हूँ।
22. वर्तमान समय तक एवम् भविष्य में जितने भी महापुरुष हुये या होंगे उन सभी को तुम कर्मो के उपरान्त ही जानते हो यदि उन्हें तुम कर्म के पहले ही जान जाते तो उन्हें कर्म करने एवम् कष्ट उठाने की आवश्यकता ही क्यों पड़ती।
23. जब तक मानव रहेगा या अब तक जितने महापुरुष हुये या होगें उन सभी के क्रियाकलाप मानव क्रियाकलापों के विश्वमानक या ईश्वर की कार्यप्रणाली या व्यापार के दर्शन या विकास दर्शन से बाहर न थे, और न ही जा सकते हैं।
24. विश्वमानक की स्थापना किसी व्यक्ति की विचारधारा की स्थापना नही, न ही यह किसी सम्प्रदाय का विरोध है बल्कि यह सभी सम्प्रदायों का मूल है और कार्य निर्माण है जिसका वर्तमान समाज में पूर्ण अभाव हो गया है। जब तक इसकी पूर्ण स्थापना नहीं हो जाती तब तक न ही ”वसुधैव-कुटुम्बकम्“ एवं ”बहुजन हिताय-बहुजन सुखाय“ को सत्यार्थ कर सकते है, न ही मानव समाज शान्ति, एकता, स्थिरता एवं नैतिक उत्थान की ओर अग्रसर हो सकता है। यह विश्वमानव का मानव समाज के लिए श्राप है तथा आविष्कार एवं कार्य वरदान है।
25. सम्पूर्ण मानव समाज अपने अस्तित्व कि अन्तिम क्षणों तक चाहे क्यों न प्रयत्न कर ले विश्वमानक शून्य श्रृंखला की स्थापना ही उसकी एकता, स्थिरता एवं शान्ति का प्रथम एवं अन्तिम मार्ग है।
26. भारत में अनेकों महापुरूषों ने जन्म लिया लेकिन समाज उस सत्य को आत्मसात् नहीं कर पाया जब कि सभी सत्य-सिद्धान्त से युक्त थे। मैं इस सत्य को स्वीकार करता हूँ कि मैं भी ऐसा नहीं कर पाऊँगा क्यांेकि सुधारक से अधिक सुधरने की इच्छा प्रबल होनी चाहिए। इसलिए मैं आन्दोलन कदापि नहीं करना चाहता। वर्तमान समय मे ऐसे सिद्धान्त का अभाव है जिसमें कोई राजनीतिक दल अपने को सर्वश्रेष्ठ सिद्ध कर सके। यदि कोई दल भारत सहित विश्व के नेतृत्व इच्छा रखता है तो उसके नियंत्रणकर्ता इस सिद्धान्त (विश्वमानक शून्य श्रृंखला) को धारण करे जो अहिसंक अन्तिम मार्ग भी है अन्यथा यह तब तक मेरे पास रहेगा जब तक वे भारतीय प्राचीन ज्ञान के अनुरूप समाज का निर्माण करने में पूर्ण रूप से परास्त नहीं हो जाते।
27. तुम यदि यथाशीघ्र धर्म ज्ञान से युक्त होना चाहते हो तो ज्ञान के साहित्य-वेद का अध्ययन तुम्हारे लिए सबसे अधिक समय को लेने वाला होगा। यदि पुराण का अध्ययन करते हो तो कम, उपनिषद् का अध्ययन करते हो तो और भी कम, यदि गीता का अध्ययन करते हो तो और भी कम यदि विवेकानन्द के वेदान्त व्याख्या का अध्ययन करते हो तो और भी कम और कर्मवेद, प्रथम, अन्तिम तथा पंचमवेद अर्थात विश्वमानक शून्य श्रृंखला का अध्ययन करते हो तो यह सबसे कम समय को लेने वाला होगा। 
28. मानव जीवन में अब इतने अधिक विषय हो गये हैं कि वे वेद, पुराण, उपनिषद्, गीता इत्यादि के माध्यम से यदि ज्ञान प्राप्त करना चाहे तो उनकी अपनी जीवन निर्वाह की स्थिरता असन्तुलित हो सकती है। इसलिए अब उन्हें शुद्ध ज्ञान के साहित्य की आवश्यकता हो गई है। जिससे वे जीवन निर्वाह के लिये ज्ञान व संसाधन के लिए विज्ञान का ज्ञान प्राप्त कर सके।
29. मैं विश्वमानक शून्य श्रृंखला अर्थात कर्मवेद की स्थापना से न तो किसी के पद को छिनना चाहता हूँ और न ही ऐसी इच्छा है बल्कि मैं इस कार्य से मैं उन सभी पद को जो वर्तमान में विवाद, संदेह एवं अविश्वास से घिर गये है उनमें विश्वास एवं वास्तविक अर्थ को स्थापित करना चाहता हूँ।
30. मैं विश्वमानक शून्य श्रृंखला अर्थात कर्मवेद की स्थापना के महत्व, क्षेत्र एवं सर्वोच्चता से भली-भाँति परिचित हूॅ। फिर भी यह कहता हूँ कि विश्वमानव कोई अवतार नहीं, कोई ईश्वर नहीं, न ही कोई ईश्वर नाम है। यह मानव मन के सर्वोच्च स्तर अर्थात मानव एवं प्रकृति के प्रति निष्पक्ष एवं निःस्वार्थ कल्याणार्थो से युक्त मानव है जो प्रत्येक मानव के क्रम विकास का सर्वोच्च स्तर है। जहाँ तक प्रत्येक मानव को आना ही है। दृश्य रूप में इससे ज्यादा कोई स्वयं को सिद्ध भी नहीं कर सकता।
31. साधारण व्यक्ति मुझे साधारण रूप में देखते हैं, राजनेता, मुझे राजनेता के रूप में देखते हैं। व्यापारी, मुझे व्यापारी के रूप में देखते हैं। देश भक्त, मुझे देश भक्त के रूप में देखते हैं। ज्ञानी मुझे ज्ञानी के रूप में देखते हैं। अन्य जो जिस विषय से जुड़े है,ं वे मुझे उस रूप में देखते है। क्योंकि वे स्वंय को बद्ध करके देखते हैं। वे यदि स्वयं को व्यापक कर देखें तो पायेंगे मैं इन सब से मुक्त हूँ। मैं मुक्त था, मुक्त हँू, और मुक्त ही रहूँगा। लेकिन क्या वे ऐसा कर पायेंगे ? जितना शीघ्र वे ऐसा कर पाये उतना ही अच्छा हो। एक आकाश के नीचे सभी समान भाव से विकास करते है। क्या एक मानव को आकाश के रूप में स्वीकार कर पायेेंगे ? मेरा प्रत्येक कार्य स्वयं मेरा नहीं बल्कि सार्वजनिक व्यापक मानव के अधीन है।
32. यह विश्वमानक शून्य श्रृंखला अर्थात कर्मवेद का आविष्कार जो वर्तमान में पूर्ण हुआ आज के सौ वर्ष पहले भी पूर्ण हो सकता था। लेकिन उस वक्त इसकी स्थापना नहीं हो सकती थी क्योंकि विश्वमन, लोकतंत्र का मन है जिसका उस वक्त भारत में अभाव था और मूल मंत्र स्वरूप अन्तर्राष्ट्रीय संगठन- संयुक्त राष्ट्र संघ का गठन भी नहीं हुआ था। जब कि वर्तमान समय में भारत सहित संयुक्त राष्ट्र संघ को इसकी आवश्यकता है।
33. यह अद्वैत ही धर्म है, धर्मनिरपेक्ष है, सर्वधर्मसमभाव है, वेदान्त तथा मानव का सर्वोच्च दर्शन है, जहाँ से मानव विशिष्टताद्वैत, द्वैत एवम् वर्तमान में मानसिक गुलामी से गिरा है परन्तु पुनः मानव इसी के उल्टे क्रम से उठकर अद्वैत में स्थापित हो जायेगा तब वह धर्म में स्थापित एवम् विश्वमन से युक्त होकर पूर्ण मानव (ईश्वरस्थ मानव) को उत्पन्न करेगा।
34. एक ही वस्तु जीवन-मृत्यु, सुख-दुःख, अच्छे-बुरे के रूप में व्यक्त होती है। यह विभिन्नता प्रकारगत नहीं परिमाणगत है। और यह दोनों एक साथ रहते है। इसी प्रकार धर्म और  धर्मनिरपेक्ष (सर्वधर्मसमभाव) भी एक साथ रहते हैं। हम जितना धर्म के नजदीक होते हैं। ठीक उतना ही धर्मनिरपेक्ष (सर्वधर्मसमभाव) के नजदीक पाते है। जितना धर्मनिरपेक्ष के नजदीक होते हैं, ठीक उतना ही धर्म के नजदीक पाते है। बस यही बात धर्मज्ञानी के साथ होती है।
35. जब सभी सम्प्रदायों को धर्म मानकर हम एकत्व का खोज करते हैं, तब दो भाव उत्पन्न होते हैं। पहला यह कि सभी धर्मो को समान दृष्टि से देखे।ं तब उस एकत्व का नाम सर्वधर्मसमभाव होता है। दूसरा यह है कि सभी धर्मों को छोड़कर उस एकत्व का देखे तब उस एकत्व की नाम धर्मनिरपेक्ष होता है। जब सभी सम्प्रदायों को सम्प्रदाय की दृष्टि से देखते है। तब उस एकत्व का नाम धर्म होता हैं। इन सभी रूपों में हम सभी उस एकत्व के ही विभिन्न नामों के कारण विवाद करते हैं। अर्थात जब नहीं जानते तब सर्वधर्मसमभाव और धर्मनिरपेक्ष कहते है। और  जब जान जाते है। तब धर्म कहते हैं। इसी प्रकार विश्वमानक-शून्य श्रृंखला उसी एकत्व का धर्मनिरपेक्ष एवम् सर्वधर्मसमभाव नाम तथा कर्मवेद प्रथम, अन्तिम तथा पंचमवेदीय श्रंृखला उसी एकत्व का धर्म युक्त नाम है। तथा इन समस्त कार्यो को जिस भौतिक शरीर के माध्यम से पूर्ण किया जा रहा हैं उसका धर्मयुक्त नाम ”लव कुश सिंह“ एवम् सर्वधर्मसमभाव तथा धर्मनिरपेक्ष नाम ”विश्वमानव“ है। जबकि मैं (आत्मा) इन सभी नामों से मुक्त है।
36. धर्म ज्ञान की वह अवस्था है जहाँ वह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को अपना स्वरूप समझता है। ऐसी अवस्था में स्वार्थ अर्थात् कार्य के परिणाम की इच्छा व्यक्त अवस्था में तथा मन विषयों से मुक्त होता है। ऐसे सत्य-धर्म-ज्ञान को धारण कर मानव शरीर, धार्मिक मनाव की अवस्था को प्राप्त होता है। ऐसे अवस्था को प्राप्त कर मानव अपने स्तर से ब्रह्माण्ड के क्रमिक विकास के लिए कार्य करना धार्मिक कार्य अर्थात् निःस्वार्थ कार्य कहलाता है। धर्म, कार्य का मार्ग है जिससे शान्ति प्राप्त होती हैं।
37. राजनीति सामाजिक विकास के नेतृत्व के लिए की जाती है जिसकी उद्देश्य एकता, शान्ति, स्थायित्व एवम् सन्तुलन है जिसका मार्ग धर्म निर्धारित करता है। और ज्ञान प्राकृतिक सत्य के ज्ञान से प्राप्त होता है।
38. हम विभिन्न वादो (मानव आविष्कृत धर्म) को धर्म समझकर उसके लिए समर्पित रहते है। फिर भी उनसें सन्तुलन एवं स्थिरता की प्राप्ति नहीं होती। वे इसलिए कि ये धर्म नहीं है। जो वाद है वह मात्र रहन-सहन की प्रक्रिया है। जो धर्म है उसकी कोई प्रक्रिया नहीं होती। वह ज्ञान है। वही सत्य है और प्राकृतिक धर्म है और वही सभी मानव आविष्कृत धर्मो का उत्पत्तिकत्र्ता है।
39. मानव समाज को जानना चाहिए कि समग्र जगत में बहुरूप में प्रकाशित एक ही सत्ता है जिसे आत्मा कहते है। इसलिए समष्टि आत्मा ही व्यष्टि आत्मा है। इस आत्मा का यथार्थ स्वरूप जिस प्रकार व्यष्टि रूप में व्यक्त होता है। ठीक उसी प्रकार समयोपरान्त समष्टि रूप में भी होता है। व्यष्टि से समष्टि रूप मंे व्यक्त होने के बीच का समय ही विवाद, अविश्वास, अशान्ति अनेकता इत्यादि का समय होता है।
40. समष्टि (समाज) का जन्म तो उसी दिन हो गया था जब मैं (आत्मा) एक से दो होता हुआ कई हो गया था। जिसकी पूर्ण प्रथम अनुभूति श्री रामकृष्ण देव ने की थी तथा अन्तिम व्याख्या स्वामी विवेकानन्द ने दी थी यह समष्टि अपनी परिपक्वता को तब प्राप्त होगा जब मानव समाज का प्रत्येक व्यक्ति समष्टि मन के गुण से पुर्णतया युक्त हो जायेगा।
41. मुझे इस बात का तनिक भी दुःख नहीं कि मैं (आत्मा) एक था फिर अलग-अलग कई हो गया। दुःख तो इस बात का है कि हम पुनः एक होने का प्रयत्न क्यों नहीं करते।
42. आत्मा भी सत्य है, ईश्वर भी सत्य है, मृत्यु भी सत्य है, यह जगत एक स्वप्न है तो क्या उसी क्षण मर जाना चाहिए, जिस क्षण हमें ज्ञान होता है? नहीं फिर भी कर्म करना पडे़गा। भगवान कृष्ण ने कहा है ‘‘कार्य की कुशलता ही योग है’’। और इस कार्य कुशलता का ज्ञान ही दृश्य ध्यान या दृश्ययोग या कर्म योग या विकास दर्शन या क्रियाकलापों का विश्वमानक है।
43. क्रिया-कारण नियम ही सर्वशक्तिमान है। इस कारण का ज्ञान ही धर्म का सर्वस्व है यह क्रिया ही ज्ञान है एवं उसकी प्रक्रिया का ज्ञान ही विज्ञान है। क्रिया ही प्राकृतिक सत्य विवाद मुक्त है। सार्वजनिक प्रमाणित सत्य है। जिसे भगवान कृष्ण ने ‘‘परिवर्तन ही संसार का नियम है’’ से सम्बोधित किया। पदार्थ विज्ञान ‘‘इस ब्रह्माण्ड में कुछ भी स्थिर नहीं है“ को व्यक्त किया। यह पुनः आदान-प्रदान के शब्द द्वारा व्यक्त किया जा रहा है जो सम्पूर्ण मानक का विषय है।
44. भगवान कृष्ण ने गीता उपदेश में कहा था ‘‘फल की इच्छा मुझ पर छोड़कर कर्म करों’’। ऐसा इसलिए कहा गया था कि व्यक्ति अपने आत्मा अर्थात प्रकृति में स्थिर होकर कार्य कर सकें न कि मन में स्थित होकर। लेकिन आत्मा की दिशा विवादमुक्त न हो सकी क्योंकि कार्य का दर्शन स्पष्ट न हो सका परिणामस्वरूप वर्तमान समाज में किये जा रहे कर्मों को हम गलत नहीं कह सकते। बिना उचित समय आये कोई भी ज्ञान समाज में व्यक्त नहीं होता। अब कार्य करने का समय आ गया है जो विश्वमानक अर्थात कर्मवेद है।
45. वैदिक काल में अदृश्य विज्ञान द्वारा ज्ञान अपने चरम विकास को प्राप्त कर चुका है। जिसके अन्तिम साहित्य को वेदान्त कहा गया। उसके उपरान्त कर्मज्ञान का विकास होना शुरू हुआ जिसका प्रथम प्रयत्न भगवान कृष्ण ने किया। और अब मानव एवं प्रकृति के प्रति निष्पक्ष सन्तुलित पूर्ण कर्मज्ञान के लिए कर्मवेद है। जब तक प्रत्येक व्यक्ति कर्मज्ञान से युक्त होकर स्वयं के आत्मविश्वास से कर्म नहीं करता तब तक ”मैं ही ब्रह्म हूँ“, ‘‘हम सभी ईश्वर है’’ धर्मनिरपेक्ष एवं सर्वधर्मसमभाव रूप से एकता एवं धर्म रूप से अद्धैत दर्शन को प्राप्त नहीं किया जा सकता । 
46. आश्रम का अर्थ है - अवस्था। यह मन, शरीर और कर्म के विषय में हो सकती है। प्रत्येक व्यक्ति अपने मन के स्तर के केन्द्रित स्थिति से ही संसार को देखता है। और अपने मन के अनुसार उसका मूल्याकंन करता है। योगेश्वर, परमहंस, भोगेश्वर, ओशो, बुद्ध, विश्वमानव, सांसारिक इत्यादि मानव के ये सब मन की अवस्थाएं है। शरीर की अवस्था में ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ तथा सन्यास आश्रम हैं। इसी प्रकार कर्म की अवस्था में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र आश्रम हैं। प्रत्येक व्यक्ति को यह अधिकार है तथा उस पर ही निर्भर है कि वह अपने मन, शरीर तथा कर्म के स्तर में परिवर्तन लाकर किसी भी आश्रम या अवस्था में प्रवेश कर सकता है।
47. ज्ञान तो शाश्वत से सर्वव्यापी है। आत्म ज्ञान या पूर्ण ज्ञान से युक्त सभी व्यक्ति हो सकते है परन्तु उसका संचालन काल के ज्ञान और उसके अनुसार कार्यप्रणाली अर्थात चेतना से होता है। कालानुसार ज्ञान ही ध्यान है। और ध्यान ही वास्तविक ज्ञान की प्रमाणिकता है। यही कारण है कि आध्यात्म चर्चा में निवृत्ति व प्रवृत्ति मार्गी प्रायः सहमत होते है। परन्तु काल और कालानुसार कार्यप्रणाली अर्थात चेतना का ज्ञान न होने से स्थापना स्तर पर सहमत नहीं हो पाते।
48. हम शरीर की अमरता को नहीं मानते, हम विचार की अमरता को मानते है। हम साकार ब्रह्म की अमरता को नहीं मानते, हम सार्वभौम सत्य-सिद्वान्त अर्थात निराकार ब्रह्म अर्थात मानक की अमरता को मानते हैं। मानकीकरण की ओर बढ़ते विश्व के लिए यह आवश्यक है कि शीघ्रताशीघ्र ही आदर्श वैश्विक व्यक्ति का निराकार सत्य स्वरूप का भी मानकीकरण कर शिक्षा द्वारा प्रत्येक व्यक्ति में स्थापित किया जाय। हमें आदर्ष व्यक्ति आधारित समाज नहीं बल्कि उसके निराकार सत्य स्वरूप अर्थात सत्य-सिद्वान्त अर्थात मानक आधारित समाज चाहिए जिससे हम प्रत्येक व्यक्ति के आदर्श का मूल्याकंन कर सकें। ध्यान रहे चरित्र को प्राथमिकता देने से सत्य-सिद्वान्त अर्थात मानक की अवनति होती है तथा सत्य-सिद्वान्त अर्थात मानक को प्राथमिकता देने से चरित्र समाज का दर्पण बन, समाज को ही प्रक्षेपित हो जाता है। और चरित्र की रक्षा स्वतः हो जाती है।
49. ऋग्वेद, ज्ञान आधारित है। सामवेद, ज्ञान और गायन आधारित है। यजुर्वेद, ज्ञान तथा प्रकृति एवम् मानव के सन्तुलन के लिए अदृष्य व्यक्तिगत प्रमाणित कर्म अर्थात् अदृश्य यज्ञ आधारित है। अथर्ववेद, ज्ञान तथा औषधि आधारित है। अगला वेद जब भी होगा वह ज्ञान तथा प्रकृति एवम् मानव के सन्तुलन के लिए दृश्य सार्वजनिक प्रमाणित कर्म अर्थात दृश्य यज्ञ आधारित होगा क्योंकि इसके अलावा और कोई मार्ग नहीं है। 
50. सर्वप्रथम मैं (आत्मा-कारण-CENTRE) व्यक्तिगत प्रमाणित अदृश्य रूप से क्रिया-TRADE- सृष्टि करते हुये उसमें अदृश्य रूप से व्याप्त होता हूँ और फिर अन्त में मैं (आत्मा-कारण-CENTRE) ही दृश्य रूप से क्रिया-TRADE सृष्टि करते हुये उससे सार्वजनिक प्रमाणित दृश्य रूप द्वारा व्यक्त होता हँू
51. मानव एवम् प्रकृति के प्रति निष्पक्ष, सन्तुलित एवम् कल्याणार्थ कर्मज्ञान के साहित्य से बढ़कर आम आदमी से जुड़ा कोई भी साहित्य कभी आविष्कृत नहीं किया जा सकता। यही एक विषय है जिससे एकता, पूर्णता एवम् रचनात्मकता एकात्मभाव से लायी जा सकती है। संस्कृति से राज्य नहीं चलता। कर्म से राज्य चलता है। संस्कृति तभी तक एकात्म बनी रहती है जब तक पेट में अन्न हो, व्यवस्थाएँ सत्य-सिद्धान्त युक्त हो, दृष्टि पूर्ण मानव के निर्माण पर केन्द्रित हो। संस्कृति कभी एकात्म नहीं हो सकती लेकिन रचनात्मक दृष्टिकोण एकात्म होता है जो कालानुसार कर्मज्ञान और कर्म है। अदृश्य काल में अनेकात्म और दृश्यकाल में एकात्म कर्मज्ञान होता है। और यही कर्म आधारित भारतीय संस्कृति है जो सभी संस्कृतियों का मूल है।
52. क्रिया-कारण सिद्वान्त ही सर्वशक्तिमान है। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड क्रिया का क्षेत्र है तथा इसके अतीत, कारण का ज्ञान ही देश-काल मुक्त अदृश्य व्यक्तिगत प्रमाणित सत्य-धर्म का सर्वस्व है। एवम् क्रिया ही ज्ञान है। क्रिया की प्रक्रिया का ही ज्ञान, विज्ञान है। क्रिया ही प्राकृतिक सत्य, सर्वव्यापी, अटलनीय, अपरिवर्तनीय, विवादमुक्त और सर्वमान्य है। सार्वजनिक प्रमाणित सत्य है जिसे भगवान योगेश्वर श्री कृष्ण ने ”परिवर्तन ही संसार का नियम है“ से सम्बोधित किया। दृश्य पदार्थ वैज्ञानिक आइन्सटाइन ने E=MC2 से सिद्ध किया और वर्तमान भौतिक युग ने ”इस ब्रह्माण्ड में कुछ भी स्थिर नही है“ को व्यक्त किया। यह पुनः ”आदान-प्रदान” के शब्द से व्यक्त किया जा रहा है। यही शब्द सम्पूर्ण मानक का विषय व सूत्र है।
53. सूक्ष्म परमाणु से बृहद् ब्रह्माण्ड तक सभी स्वयं अपनी स्थिरता, शान्ति और एकता के लिए क्रियाशील है। मैं (आत्मा) भी अपनी स्थिरता, शान्ति और एकता के लिए क्रियाशील हूँ अर्थात सभी अपने धर्म में बद्ध होकर स्वयं या केन्द्र या CENTRE की ओर ही व्यापार या आदान-प्रदान या TRADE कर रहे है। प्रत्येक वस्तु के धर्म या क्रिया या व्यापार या अदान-प्रदान या TRADE का एक चक्र है। सभी के मन स्तर चक्र अर्थात धर्म का चरम विकसित और अन्तिम चक्र मैं (आत्मा) हूँ। तुम सब इस ओर ही आ रहे हो बस तुम्हें उसका ज्ञान नहीं, उसका ज्ञान होगा कार्यो से क्योंकि कर्म, ज्ञान का ही दृश्य रूप है। एक ही देश काल मुक्त अदृश्य ज्ञान है-आत्मा। और एक ही देश काल मुक्त दृश्य कर्म है- आदान-प्रदान।
54. ईश्वर नाम का उत्पत्तिकत्र्ता देश-काल मुक्त ज्ञान आधारित साहित्य को वेद कहते है। ईश्वरनाम के व्यापक दर्शन अर्थात अर्थ को व्यक्त करने वाले साहित्य को उपनिषद् कहते है। अदृश्य व्यक्तिगत प्रमाणित ईश्वर नाम के व्यापक दर्शन अर्थात धर्म को व्यक्त करने वाला साहित्य को व्यष्टि उपनिषद् तथा दृश्य सार्वजनिक प्रमाणित ईश्वरनाम के व्यापक दर्शन अर्थात अर्थ को व्यक्त करने वाला साहित्य-समष्टि उपनिषद् कहते हैं। एकात्म को व्यक्त करने वाला देश काल मुक्त प्रक्षेपित सार्वजनिक प्रमाणित साकार कथा साहित्य की महापुराण तथा एकात्म को व्यक्त करने वाला देशकाल बद्ध प्रक्षेपित सार्वजनिक प्रमाणित साकार कथा साहित्य को पुराण कहते है
55. क्रियाकलापों के विश्वमानक के अनुसार कर्मशील प्रत्येक कत्र्ता स्वायत्तशासी इकाई संयुक्त मन के रूप में क्रियाकलापों के विश्वमानक के अनुसार कर्मशील अपने से बड़े स्वायत्तशासी इकाई या संयुक्त मन जो उसमें व्याप्त है के प्रति समर्पित और केन्द्रित रहते हुये आवश्यकतानुसार और समयानुसार क्रियाकलापों के विश्वमानक के अनुसार स्वायत्तशासी इकाई संयुक्त मन के रूप मे संयुग्मंन और विखण्डन, ब्रह्माण्ड (सूक्ष्म एवम् स्थूल) के प्रबन्ध और क्रियाकलाप का विश्वमानक कहलाता है। यही कर्मोपनिषद्-समष्टि का मूल सूत्र है।  
56. क्रियाकलापों के विश्वमानक के अनुसार कर्मशील प्रत्येक कत्र्ता स्वायत्तशासी इकाई एकल मन के रूप में क्रियाकलापों के विश्वमानक के अनुसार  कर्मशील अपने से बड़े स्वायत्तशासी इकाई एकल मन जो उसमें व्याप्त है के प्रति समर्पित व केन्द्रित रहते हुये आवश्यकता और समयानुसार क्रियाकलापों के विश्वमानक के अनुसार स्वायत्तशासी इकाई एकल मन के रूप मे संयुग्मन और विखण्डन, मानव (सूक्ष्म एवम् स्थूल) के प्रबन्ध और क्रियाकलाप का विश्वमानक कहलाता है। यदि कर्मोपनिषद्-व्यष्टि का मूल सूत्र है।
57. यदि तुम समग्र जगत के ज्ञान से पूर्ण होना चाहते हो तो पाँच भाव- विचार एवं साहित्य, विषय एवं विशेषज्ञ, ब्रह्माण्ड (स्थूल एवं सूक्ष्म) के प्रबन्ध और क्रियाकलाप, मानव (स्थूल एवं सूक्ष्म) के प्रबन्ध और क्रियाकलाप तथा उपासना स्थल का सामंजस्य कर एक मुखी कर लो। यही समग्र जगत का ज्ञान है, भविष्य है, रहस्य है, पूर्ण ज्ञान है, समाज गठन है, पुस्तकालय के ज्ञान से सर्वोच्च है। 58. जब व्यष्टिमन की शान्ति अन्तः विषयों जो सिर्फ अदृश्य विषय मन द्वारा ही प्रमाणित होता है, पर केन्द्रित होती है तो उसे व्यष्टि अदृश्य काल कहते हंै तथा जब व्यष्टिमन की शान्ति दृश्य विषयों अर्थात् बाह्य विषयों, जो सार्वजनिक रुप से प्रमाणित है पर केन्द्रित होता है तो उसे व्यष्टि दृश्यकाल कहते हैं इसी प्रकार सम्पूर्ण समाज का मन जब अदृश्य विषयों पर केन्द्रित होती है तो उसे समष्टि अदृश्य काल कहते हंै तथा जब सम्पूर्ण समाज का मन दृश्य विषयों पर केन्द्रित होता है तो उसे समष्टि दृश्यकाल कहते हैं।
59. व्यक्ति जब सम्पूर्ण समष्टि अदृश्य काल में हो तो उसे अदृश्य कर्म ज्ञान के अनुसार तथा जब सम्पूर्ण समष्टि दृश्य काल में हो तो उसे दृश्य कर्म ज्ञान के अनुसार कर्म करने चाहिए तभी वह ब्रह्माण्डिय विकास के लिए धर्मयुक्त या एकता बद्ध होकर कार्य करेगा।
60. मानक अर्थात् आत्मा अर्थात् सत्य-धर्म-ज्ञान स्थिर रहता है लेकिन मन को इस ओर लाने वाले सूत्र भिन्न-भिन्न होंगे क्योंकि जो उत्पन्न है वह स्थिर नहीं है। अदृश्य काल में यह सूत्र अनेक होंगे लेकिन दृश्य काल के लिए हमेशा एक ही होगा क्योंकि वह सार्वजनिक प्रमाणित होगा।
61. विचार प्रसार एवं विचार स्थापना में एक मुख्य अन्तर है। विचार प्रसार, विचाराधीन होता है। वह सत्य हो भी सकता है और नहीं भी हो सकता परन्तु विचार स्थापना सत्य होता है। विचार स्थापना में नीति प्रयोग की जाती है जिससे उसका प्रभाव सत्य के पक्ष में बढ़ता रहता है और यह विचार स्थापक एवं समाज पर निर्भर करता है जबकि विचार प्रसार में किसी नीति का प्रयोग नहीं होता है जिससे उसका प्रभाव पक्ष पर एवं विपक्ष दोनों ओर हो सकता है और वह सिर्फ समाज के उपर निर्भर करता हैै।
62.  सत्य-धर्म-ज्ञान किसी भी व्यक्ति विषेश या सम्प्रदाय विशेष का नहीं हो सकता। वह तो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में व्याप्त देश-काल-मुक्त सत्य-सिद्धान्त है जिसका विभिन्न धर्मों में समावेश की मात्रा पर ही उस धर्म की अमरता निर्भर करती है। इस आधार पर हम यह कह सकते हैं कि हिन्दू धर्म या वेदान्त धर्म या समष्टि धर्म ही विश्व का अन्तिम सत्य धर्म है। जिसका नाश नहीं किया जा सकता क्योंकि सत्य-सिद्धान्त अनश्वर है तथा शुद्ध दृश्य सत्य-धर्म-ज्ञान ही विश्व धर्म के रुप में व्यक्त हुआ है जो प्राचीन भारतीय वैदिक साहित्य में हजारों वर्ष पूर्व ही व्यक्त हो चुका है। विश्व धर्म और कुछ नहीं, सभी धर्मों के सत्य-धर्म-ज्ञान का संगम है, और जो सत्य है वह किसी भी सम्प्रदाय के व्यक्ति से व्यक्त हो सकता है, आवश्यक नहीं कि वह हिन्दू ही हो।
63. पूर्ण ज्ञान अर्थात् अपने मालिक स्वयं केन्द्र में स्थित मार्गदर्शक दर्शन (Guider Philosophy) अर्थात् G एवं विकास दर्शन (Development Philosophy) अर्थात् D है। इसकी परिधि आदान-प्रदान या व्यापार या क्रियाचक्र या क्रियान्वयन दर्शन (Operating Philosophy) अर्थात् O है। यहीं आध्यात्म अर्थात् अर्थात् अदृश्य विज्ञान का सर्वोच्च एवं अन्तिम आविष्कार है। तथा यहीं पदार्थ अर्थात् दृश्य विज्ञान द्वारा अविष्कृत परमाणु की संरचना भी है। जिसके केन्द्र में G के रुप में प्रोटान P है तथा D के रुप में न्यूट्रान N है। इसकी परिधि O के रुप में इलेक्ट्रान E है। प्राच्य अदृश्य आध्यात्म विज्ञान तथा पाश्चात्य दृश्य पदार्थ विज्ञान में एकता का यहीं सूत्र है। विवाद मात्र नाम के कारण है। जिसके अनुसार इलेक्ट्रान या क्रियान्वयन दर्शन में विभिन्न सम्प्रदायों, संगठनों, दलों के विचार सहित व्यक्तिगत विचार जिसके अनुसार अर्थात् अपने मन या मन के समूहों के अनुसार वे समाज तथा राज्य का नेतृत्व करना चाहते हैं। जबकि ये सार्वजनिक सत्य नहीं है। इसलिए ही इन विचारों की समर्थन शक्ति कभी स्थिर नहीं रहती जबकि केन्द्र या आत्मा या एकता में विकास दर्शन स्थित है। केन्द्र में प्रोटान की स्थिति अदृश्य मार्गदर्शक दर्शन या अदृश्य विकास दर्शन की स्थिति, चूँकि यह सार्वजनिक सत्य विकास दर्शन का अदृश्य रुप है इसलिए यह व्यक्तिगत प्रमाणित है। इसी कारण आध्यात्म भी विवाद और व्यष्टि विचार के रुप में रहा जबकि यह सत्य था। लेकिन न्यूट्रान की स्थिति दृश्य मार्गदर्शक दर्शन या दृश्य विकास दर्शन की स्थिति है इसलिए यह सार्वजनिक सत्य है सम्पूर्ण मानक है, समष्टि सत्य है, सत्य सिद्धान्त है जिसकी स्थापना से व्यक्ति मन उस चरम स्थिति में स्थापित होकर उसी प्रकार तेजी से विश्व निर्माण कर सकता है जिस प्रकार पदार्थ विज्ञान द्वारा आविष्कृत न्यूट्रान बम इस विश्व का विनाश कर सकता है। 
64. वर्तमान दृश्य पदार्थ विज्ञान के सत्य-सिद्धान्त के अनुसार सम्पूर्ण तत्व तीन अवस्थाओं में रहता है। जिनमें दो आभासी अवस्था तथा एक वास्तविक अवस्था। ये तीनों अवस्था क्रमशः ठोस, द्रव और गैस अवस्था है। इस तीनों अवस्थाओं में एक यदि उसकी सामान्य वातावरण में वास्तविक अवस्था है तो शेष दो उसकी विशेष वातावरण में आभासी अवस्था हो सकती है। जबकि परमाणु (न्यूक्लियस व इलेक्ट्रान) तीनों अवस्थाओं में विद्यमान रहता है। तत्वों में व्याप्त होने का सत्य-सिद्धान्त यह है कि परमाणु में इलेक्ट्रानों की संख्या के घटने बढ़ने से विभिन्न तत्व व्यक्त होते हैं। पुनः तत्वों के मिश्रण से विभिन्न यौगिक पदार्थ व्यक्त होते हैं अर्थात् एक ही परमाणु से इलेक्ट्रानों की संख्या को घटा-बढ़ाकर सभी तत्वों के गुणों को प्राप्त कर सकते हैं। यदि यह सम्भव हो कि एक चेतना युक्त परमाणु स्वयं अपने इलेक्ट्रानों को घटा-बढ़ा सके तो वह परमाणु सभी तत्वों के गुणों या प्रकृति को व्यक्त करने लगेगा। ऐसी स्थिति में उस जटिल परमाणु को किसी विशेष तत्व का परमाणु निर्धारित करना असमभव हो जायेगा। फिर उसे ”एक में सभी, सभी में एक“ कहना पड़ेगा अर्थात् उसकी निम्नतम एवं सर्वोच्चतम अन्तिम स्थिति ही उसकी निर्धारण योग्य प्रकृति होगी। वर्तमान अदृश्य आध्यात्म विज्ञान के अद्वैत सत्य-सिद्धान्त के अनुसार व्यक्ति भी तीन अवस्थाओं में रहता है जिसमें से दो आभासी अवस्था तथा एक वास्तविक अवस्था। ये तीनों अवस्था क्रमशः आत्मीय काल, अदृश्य काल तथा दृश्य काल अवस्था है। इन तीनों अवस्थाओं में यदि मन की एक वास्तविक अवस्था है तो शेष दो विशेष वातावरण में आभासी अवस्था हो सकती है। जबकि आत्मा सहित मन तीनों अवस्थाओं में रहता है। व्यक्ति के महत्ता के व्यक्त होने का सत्य-सिद्धान्त यह है कि व्यक्ति में मन की उच्चता और निम्नता से विभिन्न महत्ता के व्यक्तियों का व्यक्त होना होता है। पुनः इन व्यक्तियों के साथ आने से विभिन्न मतों पर आधारित सम्प्रदाय और संगठन व्यक्त होते हैं। अर्थात् एक ही व्यक्ति के मन की उच्चता एवं निम्नता से हम सभी महत्ता के व्यक्तियों, सम्प्रदायों और संगठनों के योग्य हो सकते हैं। अर्थात् प्रत्येक व्यक्ति में मन के निम्नतम स्थिति पशु मानव से सर्वोच्च और अन्तिम स्थिति विश्व मन से युक्त विश्वमानव तक को व्यक्त करने की सम्भावना नीहित है क्योंकि मानव वह चेतना युक्त आत्मा है जो स्वयं अपने मन की उच्चता एवं निम्नता पर आवश्यकता और समयानुसार नियन्त्रण कर सकता है और सभी तरह के व्यक्तियों या गुणों को व्यक्त कर सकता है। ऐसी स्थिति में उस जटिल व्यक्ति को किसी विशेष प्रकृति का व्यक्ति निर्धारण करना असम्भव हो जायेगा। फिर उसे ”एक में सभी, सभी में एक“ कहना पड़ेगा। अर्थात् उसकी निम्नतम पशु मानव और सर्वोच्चतम तथा अन्तिम विश्वमानव स्थिति ही उसकी निर्धारण योग्य प्रकृति होगी।
65. भारत के प्रचीन ऋषि बिना किसी यन्त्र की सहायता से यह जान चुके थे कि वस्तुओं का सम्पूर्ण नाश नहीं होता केवल उसका अवस्था परिवर्तन होता है जिस पर आधारित होकर ही उन्होंने विश्व कल्याणार्थ धर्म का आविष्कार किये थे। यह व्यक्तिगत प्रमाणित अदृश्य दिशा से धर्म का आविष्कार था। इसलिए ही यह धर्म विवाद का विषय रहा। परन्तु इसी विषय को भी पदार्थ विज्ञान ने भी सिद्ध कर दिखाया है, और इस ओर से सम्पूर्ण एकत्व का मन के विश्व मानक - शून्य श्रंृखला का आविष्कार सार्वजनिक प्रमाणित दृश्य दिशा की ओर से धर्म का आविष्कार। अब और कोई दिशा नहीं जिस ओर से धर्म का आविष्कार किया जा सके। परिणामस्वरुप यह अन्तिम विश्वव्यापी विवादमुक्त रुप से धर्म का आविष्कार है। 
66. सर्वोच्च और अन्तिम मन स्तर द्वारा व्यक्त ज्ञान-कर्मज्ञान के अन्तिम होने को इस प्रकार समझा जा सकता है। मान लीजिए बहुत से व्यक्ति हिमालय के चारो ओर से एवरेस्ट चोटी पर चढ़ रहे हैं। कुछ प्रारम्भ में हैं कुछ उससे ऊपर, कुछ और ऊपर, इस प्रकार से एक व्यक्ति शिखर पर बैठा है। प्रारम्भ से अन्तिम तक के व्यक्ति के पास वहाँ की स्थिति पर एक मन स्तर है। शिखर पर बैठा व्यक्ति अपने अन्तिम होने का प्रमाण सिर्फ दो मार्गों द्वारा व्यक्त कर सकता है। पहला यह कि वह उस अन्तिम स्तर का वर्णन करे। इस मार्ग में जब तक सभी व्यक्ति शिखर तक नहीं पहुँच जाते उसके अन्तिम होने की प्रमाणिकता सिद्ध नहीं हो पाती। इस मार्ग को व्यक्तिगत प्रमाणित ज्ञान का मार्ग कहते हैं। यह संतों का मार्ग है। दूसरा मार्ग यह है कि शिखर पर बैठा व्यक्ति अन्तिम को प्रारम्भ से अन्तिम तक के मनस्तर को इस भाँति जोड़े कि प्रत्येक मनस्तर पर बैठा व्यक्ति अपने स्थान से ही अन्तिम की अनुभूति कर ले। इस मार्ग को सार्वजनिक प्रमाणित कर्मज्ञान का मार्ग कहते हैं। प्रथम मार्ग जो कठिन मार्ग था, वह था श्रीकृष्ण का मार्ग। द्वितीय मार्ग जो सरल मार्ग है वह है- लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ का मार्ग जिसके अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को उसके मन स्तर की ओर से सार्वजनिक प्रमाणित सर्वव्यापी सर्वोच्च और अन्तिम कर्म-आदान-प्रदान या परिवर्तन से जोड़ दिया गया है जिससे उसके अतीत का अनुभव कर सीधे व्यक्तिगत प्रमाणित आत्मोन्भूति तथा विवादमुक्त सिद्धान्तों की प्राप्ति प्रत्येक मनुष्य कर सके। अन्तिम के पूर्ण प्रमाण प्रस्तुत कर देने के बावजूद व्यक्ति को यह अधिकार है कि वह इसे अन्तिम न होने का प्रमाण प्रस्तुत करे परन्तु ऐसा न हो कि सम्पूर्ण जीवन व्यर्थ के प्रयत्न में ही निकल जाये और हाथ कुछ भी न मिले। इसलिए बुद्धिमानी इसी में है कि अन्तिम का परीक्षण एक समय सीमा तक करें और व्यक्त मार्ग के अनुसार जीवन में धारण कर जीवन को संचालित करें।
67. इस वाह्य जगत को बृहद ब्रह्माण्ड तथा अन्तः जगत को क्षुद्र ब्रह्माण्ड कहते हैं। एक मनुष्य अथवा कोई भी प्राणी अर्थात् क्षुद्र ब्रह्माण्ड जिस नियम से गठित होता है उसी नियम से विश्व ब्रह्माण्ड अर्थात् वृहद ब्रह्माण्ड भी गठित है। जैसे हमारा एक मन व्यक्तिगत मन है। उसी प्रकार एक विश्वमन संयुक्त मन भी है। सम्पूर्ण जगत एक अखण्ड स्वरुप है वेदान्त उसी को ब्रह्म कहता है। ब्रह्म जब वृहद ब्रह्माण्ड के पश्चात् या अतीत में अनुभव होता हो तब उसे ईश्वर या परमात्मा कहते हैं। और जब ब्रह्म इस क्षुद्र ब्रह्माण्ड के पश्चात् या अतीत में अनुभव होता है तब उसे आत्मा कहते हैं। द्वैतवादी आत्मा और परमात्मा को दो मानते हैं जबकि अद्वैतवादी दोनों को एक ही मानते हैं। और इस आत्मा को ही मनुष्य के अन्दर स्थित ईश्वर या परमात्मा मानते हैं। अर्थात् इस मनुष्य से ही व्यक्तिगत मन और विश्व मन या संयुकतमन दोनों ही व्यक्त होता है। जिस मनुष्य शरीर से सर्वोच्च और अन्तिम, सर्वव्यापी संयुक्तमन या विश्वमन व्यक्त होगा उसी शरीर को हम ईश्वर या परमात्मा का साकार अन्तिम रुप या अवतार कहेंगे।
68. इस ईश्वर या परमात्मा के व्यक्तिगत प्रमाणित साकार प्रक्षेपण को पुराण में शिव-शंकर तथा सार्वजनिक प्रमाणित साकार प्रक्षेपण को पूर्णावतार कहते हैं। जिसका व्यक्त गुण सर्वोच्च और अन्तिम एकात्म ज्ञान और एकात्म कर्म समाहित एकात्म ध्यान होता है। इसके अंशों का प्रक्षेपण सार्वजनिक प्रमाणित साकार रुप में अंशावतार तथा व्यक्तिगत प्रमाणित साकार रुप मे विष्णु व ब्रह्मा कहते हैं। इसलिए ही पुराणों में शिव-शंकर से निकलते हुए विष्णु अर्थात् एकात्म ज्ञान समाहित एकात्म कर्म को तथा विष्णु से निकलते हुए ब्रह्मा अर्थात् एकात्म ज्ञान को प्रक्षेपित किया गया है। ब्रह्मा और विष्णु को देव तथा अन्तिम शिव-शंकर को महादेव कहते हैं।
69. इन तीनों देवताओं ब्रह्मा, विष्णु और शिव-शंकर के मूल गुणों के आधार पर उनके वास्तविक रुप अर्थात् चार वेदों को व्यक्त करने वाले चार मुखों से युक्त सृष्टिकर्ता ब्रह्मा का रुप, चार भुजाओं से युक्त पालनकर्ता विष्णु का रुप तथा ब्रह्मा और विष्णु समाहित पाँचों वेदों को व्यक्त करने वाले पाँच मुखों से युक्त कल्याण कर्ता शिव-शंकर का अन्तिम रुप, तीनों देवताओं का दिव्यरुप कहलाता है। जबकि ईश्वर या आत्मा या परमात्मा के व्यक्तिगत प्रमाणित सर्वव्यापी सत्य-आत्मा रुप को व्यक्तिगत प्रमाणित विश्वरुप तथा सार्वजनिक प्रमाणित सर्वव्यापी सिद्धान्त रुप को अन्तिम सार्वजनिक प्रमाणित विश्वरुप कहते हैं। ईश्वर या परमात्मा या आत्मा के पूर्णावतार के साकार रुप से विष्णु और शिव-शंकर के दिव्यरुप सहित सार्वजनिक प्रमाणित विश्वरुप का संयुक्त रुप व्यक्त होगा। इसलिए ही विष्णु और शिव-शंकर को एक दूसरे का रुप कहा गया है।
70. कार्य की प्रथम शाखा अर्थात् भुजा- कालानुसार व्यक्तिगत और संयुक्त विचारों-दर्शनों से युक्त अर्थात् सुदर्शन चक्र, जिससे निम्न और संकीर्ण विचारांे का परिवर्तन या बध होता है। दूसरी भुजा- उद्घोष अर्थात् शंख जिससे चुनौती दी जाती है। तीसरी भुजा- रक्षार्थ अर्थात् गदा जिससे आत्मीय स्वजनों की रक्षा की जाती है। चैथी और अन्तिम भुजा- निर्लिप्त अर्थात् कमल जिससे सांसारिकता और असुरी गुणो से मुक्त समाज में आश्रय पाना आसान होता है क्योंकि सांसारिकता और असुरी गुणों से युक्त व्यक्ति अपने अहंकारी दृष्टि से ही देखते हैं। परिणामस्वरुप अच्छे विचार को सुरक्षित विकास का अवसर प्राप्त होता है। इन सभी गुणों से युक्त हो शक्तिशाली और तीव्र वेग अर्थात् गरुड़ पक्षी रुपी वाहन से व्यक्त होना, ये ही पालनकर्ता विष्णु के मूल लक्षण हैं जिससे वे समाज में व्यक्त हो संसार का पालन करते हैं जो लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ के जीवन, कर्म व व्यक्त होने के मार्ग से पूर्ण प्रमाणित है और चतुर्भुज रुप है।
71. जिस प्रकार अदृश्य शिव अर्थात् अदृश्य विशेश्वर का प्रतीक चिन्ह शिव-लिंग है उसी प्रकार दृश्य शिव अर्थात् दृश्य भोगेश्वर का प्रतीक चिन्ह शिव-लिंग सहित सुदर्शन-चक्र और शंख है। कारण अन्तिम अवतार शिव-शंकर का पूर्णावतार है जिसमें विष्णु समाहित हैं। परिणामस्वरुप दृश्य शिव अर्थात् दृश्य भोगेश्वर का प्रतीक चिन्ह पूर्ण शिव तथा आधा विष्णु के प्रतीक चिन्ह से ही व्यक्त होगा। जिस प्रकार काशी अदृश्य विशेश्वर का निवास स्थान है उसी प्रकार सत्यकाशी दृश्य भोगेश्वर का निवास स्थान है।
72.  चारों वेदों के ज्ञान और अनेकों उपनिषद् समाहित ”गीता“ व्यक्तिगत प्रमाणित मार्ग से आत्म ज्ञान, दिव्य-दृष्टि, सर्वव्यापी रुप-विश्वरुप, चतुर्भुज दिव्यरुप तथा कर्म की ओर प्रेरित करने का शास्त्र साहित्य है। क्योंकि इस उपदेश को कहीं से भी दो व्यक्ति एक साथ सुन और देख नहीं रहे थे। जब तक कम से कम दो व्यक्ति एक साथ किसी विषय या घटना को देखें या सुने नहीं वह सार्वजनिक प्रमाणित नहीं कहलाती है। इस उपदेश को सुनने व देखने वालों में पहला स्थान - सिर्फ अर्जुन अकेले देख व सुन रहा था। दूसरा स्थान- वृक्ष पर धड़ से अलग बरबरीक का सिर सिर्फ देख रहा था। तीसरा स्थान- दिव्य दृष्टि के द्वारा संजय अकेले देखकर साथ बैठे अन्धे धृतराष्ट्र व अन्धी बनीं गान्धारी को वर्णन सुना रहा था। चैथा स्थान- दोनों पक्षों की सेना सिर्फ श्रीकृष्ण और अर्जुन के अलावा न तो कुछ देख पा रही थी न ही सुन पा रही थी । पाँचवां स्थान-स्वयं महाभारत शास्त्र साहित्य के रचयिता महर्षि व्यास जी अकेले देख व सुन रहे थे। इन पाँचों स्थितियों में कहीं भी ऐसी स्थिति नहीं है जिससे यह कहा जा सके कि गीता का उपदेश सार्वजनिक प्रमाणित रुप से दिया गया था बल्कि यह व्यक्तिगत प्रमाणित रुप से सिर्फ अर्जुन को व्यक्तिगत रुप सेे दिया गया था और विश्वरुप भी सिर्फ व्यक्तिगत प्रमाणित रुप से ही देखा गया था न कि सभी व्यक्ति जिनकी अलग-अलग स्थितियाॅ है उनके लिए। इस प्रकार व्यक्त आत्म ज्ञान सत्य होते हुए भी व्यक्तिगत प्रमाणित ही है। गीतोपनिषद् व्यक्तिगत सम्पूर्ण समाधान का शास्त्र साहित्य है न कि सार्वजनिक सम्पूर्ण समाधान का शास्त्र साहित्य यदि वह सम्पूर्ण समाधान का शास्त्र साहित्य होता तो ईश्वर के कुल दस अवतारों में दसवें और अन्तिम अवतार का कार्य क्या होता? अर्थात् उनके लिए कोई कार्य शेष नहीं होता। ब्रह्मा के पूर्ण अवतार और ईश्वर के अंशावतार आदर्श व्यक्ति चरित्र से युक्त श्रीराम थे। विष्णु के पूर्णावतार तथा ईश्वर के व्यक्तिगत प्रमाणित पूर्णावतार आदर्श सामाजिक व्यक्ति चरित्र (व्यक्तिगत प्रमाणित आदर्श वैश्विक व्यक्ति चरित्र) से युक्त श्रीकृष्ण थे। तो शिव-शंकर के पूर्णावतार तथा ईश्वर के सार्वजनिक प्रमाणित पूर्णावतार आदर्श वैश्विक व्यक्ति चरित्र से युक्त पूर्णावतार का कार्य क्या होता?
73. ”गीता“ समाहित ”कर्मवेद: प्रथम, अन्तिम तथा पंचमवेद“ सार्वजनिक प्रमाणित मार्ग से आत्म ज्ञान, कर्म-ज्ञान, दिव्य-दृष्टि, सर्वव्यापी रुप-विश्वरुप, चतुर्भुज दिव्यरुप, पंचमुखी दिव्यरुप का शास्त्र साहित्य है। क्योंकि यह व्यक्ति से अनेक व्यक्ति और सम्पूर्ण विश्व एक साथ पढ़, सुन और देख सकता है। अर्थात् यह उपदेश सार्वजनिक रुप से दिया गया है न कि व्यक्तिगत रुप से। जिसमें कर्म करने की शिक्षा भिन्न-भिन्न अनेकों स्थितियों पर खड़े व्यक्ति के लिए दी गयी है। कर्मवेद, व्यक्ति सहित सार्वजनिक सम्पूर्ण समाधान का शास्त्र साहित्य है तथा शिव-शंकर के पूर्णावतार तथा ईश्वर के सार्वजनिक प्रमाणित पूर्णावतार आदर्श वैश्विक व्यक्ति चरित्र से युक्त पूर्णावतार से व्यक्त है।
74.  ”दिव्य रुप“ और ”विश्व रुप“ कभी साकार सार्वजनिक प्रमाणित नहीं हो सकता। वह जब भी होगा प्रथमतया ”गीता“ की भाँति व्यक्तिगत प्रमाणित निराकार तथा ”कर्मवेद“ की भाँति सार्वजनिक प्रमाणित निराकार रुप में। कारण वह व्यक्तिगत प्रमाणित निराकार आत्मा या सार्वभौम सत्य तथा सार्वजनिक प्रमाणित निराकार सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त की व्यापकता की एक साथ अनुभूति है। जो व्यापक ्रज्ञान उपदेशक के जीवन का व्यापक ज्ञान उसके बाद एक साथ देखने का गुण दिव्य दृष्टि के द्वारा ही देखी जा सकती है। कर्मवेद और विश्व मानक-शून्य श्रंृखला की असीम शाखाएं इसका उदाहरण हैं। ”गीता“ में अर्जुन को पहले व्यापक ज्ञान दिया गया फिर दिव्य दृष्टि दी गयी तब विश्व रुप और दिव्य रुप दिखाया गया। जो सेनाओं के होते हुए भी सिर्फ अर्जुन को ही दिखाई दिया। इसके लिए अर्जुन ही योग्य पात्र था क्योंकि वह उपदेशक के जीवन के अधिक पास से परिचित था जिससे वह दिव्य रुप और विश्व रुप को सरलता से देख सकता था। उपदेश के लिए दोनों सेनाओं से दूर रथ को ले जाना इसलिए आवश्यक था कि जो इसके योग्य पात्र न थे वे इसमें व्यवधान उत्पन्न न करें और न ही सुन सकें। परिणामस्वरुप उन्हें दिव्यरुप और विश्वरुप दिखाई नहीं दिया। सृष्टि का रुक जाना उसे कहते हैं जब सम्पूर्ण समाज की अन्तिम स्थिति से आगे निर्माण या सृष्टि नहीं होती तथा ऐसा व्यक्ति जो उसके आगे निर्माण की बात कर रहा हो और जो उस पर ही निर्भर है, उसे पीछे या भूतकाल के विषय में विवशतावश उलझा देने से सृष्टि अर्थात् आगे का निर्माण कार्य रुक जाता है। गीता उपदेश के समय ऐसा ही हुआ था क्योंकि उपदेश के लिए विवशतावश श्रीकृष्ण भूतकाल में चले गये थे इसलिए ही कहा गया है कि उपदेश के समय सम्पूर्ण सृष्टि अर्थात् समय रुक गया था।
75. ”परिवर्तन संसार का नियम है“ यह इसलिए नहीं कहा गया था कि वह संसार के लिए है मनुश्य के लिए नहीं। यह इसलिए कहा गया था कि मनुश्य अपने मनस्तर में परिवर्तन लाते हुए सदा उच्च से उच्चतर, उच्चतर से उच्चतम, उच्चतम से सर्वोच्च और अन्तिम की ओर गति करते रहे और कम समय में सांसारिकता से मन स्तर को उपर उठाकर परिवर्तन को धारण करते हुए सांसारिकता का संचालन कर सके। यदि मनुश्य परिवर्तन को संसार के लिए समझ स्वयं में परिवर्तन नहीं लाता तो यहीं परिवर्तन एस पर बुरा प्रभाव डालते हुए अन्ततः उसके षरीर को भी षीघ्र ही परिवर्तित कर देता है।
76. ”परिवर्तन संसार का नियम है“ यह इसलिए नहीं कहा गया था कि वह संसार के लिए है मनुष्य के लिए नहीं। यह इसलिए कहा गया था कि मनुष्य अपने मनस्तर में परिवर्तन लाते हुए सदा उच्च से उच्चतर, उच्चतर से उच्चतम, उच्चतम से सर्वोच्च और अन्तिम की ओर गति करते रहे और कम समय में सांसारिकता से मन स्तर को उपर उठाकर परिवर्तन को धारण करते हुए सांसारिकता का संचालन कर सके। यदि मनुष्य परिवर्तन को संसार के लिए समझ स्वयं में परिवर्तन नहीं लाता तो यहीं परिवर्तन एक समय पर बुरा प्रभाव डालते हुए अन्ततः उसके शरीर को भी शीघ्र ही परिवर्तित कर देता है।
77. जिस प्रकार अदृश्य हवा, बिजली इत्यादि का रुप बिना साधन के व्यक्त नहीं होता उसी प्रकार अदृश्य आत्मा का दृश्य रुप भी बिना साधन शरीर के व्यक्त नहीं होता। शरीर से एकात्म का व्यक्त होना ही आत्मा का व्यक्त होना है जब कि सम्पूर्ण विश्वव्यापी और सर्वोच्च एकात्म ज्ञान, एकात्म कर्म और एकात्म ध्यान का व्यक्त होना ही आत्मा का पूर्ण दृश्य व्यक्त होना है। जिस शरीर से एकात्म अर्थात् सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त व्यक्त होता है उसे साकार-सगुण-ईश्वर तथा सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त को निराकार निर्गुण ईश्वर कहते हैं। जिस प्रकार बिना सगुण (माध्यम या शरीर) के निर्गुण (हवा, बिजली, सत्य-सिद्धान्त) की प्रमाणिकता असम्भव है उसी प्रकार बिना निर्गुण के सगुण की प्रमाणिकता असम्भव है।
78. यदि वह पशु मानव नहीं तो प्रत्येक मानव का एक स्तरीय लक्ष्य होता है। वह उसको प्राप्त करने का प्रयत्न करता है। मैं अपना लक्ष्य प्राप्त कर चुका हूँ। हो सकता है किसी का लक्ष्य मैं होऊ, इसको पाने के लिए तुम्हें ही कर्म और प्रयत्न करना पड़ेगा। मेरी तो कोई इच्छा ही नहीं। भला दर्पण की भी कोई इच्छा होती है? दर्पण तो तुम्हारी इच्छा होती है। दर्पण तो तुम्हारे ही रूप को व्यक्त करता है। तुम मेरे जितना पास आते हो, ठीक उतना ही मैं भी पास आता हूँ। और यह बात दूर जाने में भी है। यह भाव कर्म में, प्रेम में, ज्ञान में, ध्यान में अर्थात सभी में है। क्योंकि मैं तुम पर ही निर्भर हूँ।


श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ की वाणी

श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ की वाणी

01. काशी (वाराणसी) की परम्परा सत्य के समर्थक एवम् प्रवर्तक के रूप में रही है। सत्य को किसी विशेष के समर्थन की आवश्यकता नहीं होती क्योंकि वह प्रत्यक्ष होता है। मुझे विश्वास है कि काशी अपने परम्परा का पालन अवश्य करेगा।
02. राम प्राकृतिक थे अर्थात व्यष्टि थे क्योंकि वे अपना कार्य परिस्थितियों के अनुसार कियेे जो उनके द्वारा निर्मित नहीं थे। कृष्ण सत्य थे अर्थात समष्टि थे क्योंकि वे अपना कार्य परिस्थितियों के अनुसार, अपने कार्य के लिये परिस्थितियोें का निर्माण कर किये जिसके फलस्वरूप अन्त में सभी परिस्थितियाँ उन पर ही निर्भर करने के लगी और वे यह कहने में सक्षम हुये ‘मै प्रकृति को नियंत्रित कर स्वयं उत्पन हूँ। जिसे कृष्ण चेतना के रूप में माना जाता है। कृष्ण में राम समहित थे। धर्म स्थापना का कार्य जब भी होता है वह कृष्ण चेतना से ही होता है। राम चेतना से नहीं।
03. राम अर्थात व्यष्टि अर्थात प्राकृतिक चेतना से धर्म स्थापना उस समय होता है जब धर्म संस्थापक के जन्म का समाज धर्म युक्त होता है। तथा कृष्ण समष्टि अर्थात सत्य चेतना से धर्म स्थापना उस समय होता है। जब धर्म स्थापना के जन्म समय का समाज अधर्मयुक्त होता है। राम के समय के उपरान्त से धर्म का लगातार ह्रास होता जा रहा है। इसलिए जब भी धर्म स्थापना होगा वह कृष्ण चेतना अर्थात सत्य चेतना से ही होगा।
043. रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानन्द के गुरू थे जिनके नाम उन्होने 1897 में ‘रामकृष्ण मिशन’’ की स्थापना की। वर्तमान काल क्रम में में 100 वर्ष बाद 1997 मंे ‘प्राकृतिक सत्य मिशन ’ की स्थापना लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा की जा रही है जो सभी सर्वोच्च कार्यों का नये नाम से अन्तिम रूप है। 
05. प्रकृति का अरिवर्तनीय, सर्वव्यापी, दृश्य, सर्वमान्य, विवादमुक्त, अटलनीय नियम आदान-प्रदान ही प्राकृतिक सत्य है। जब व्यक्ति प्राकृतिक होता है तो उसका अधिकतम नियंत्रण व्यक्ति के बाहर होता है। जब व्यक्ति सत्य होता है तो इसका अधिकतम नियंत्रण व्यक्ति के अधीन होता है। जिसका उच्चतम स्तर मृत्यु को छोड़कर सभी अदान-प्रदान पर नियंत्रण होता है।
06. जो प्राकृतिक है, वही भाग्यवादी है, बुद्धिबद्ध है, विषेशीकृत है। जो सत्य है, वही कर्मयोगी है, ज्ञानी है, सामान्यीकृत है। जो प्राकृतिक है वही व्यष्टि सत्य-धर्म-ज्ञान में स्थित है। जो सत्य है वही समष्टि सत्य-धर्म-ज्ञान में स्थित है।
07. वर्तमान काल सम्पूर्ण दृश्य काल में है परन्तु उसका ज्ञान न होने से यह काल अदृश्य एवम् दृश्य काल का मिश्रित काल प्रतीत होता है जो एक से चलकर अदृश्य काल एवं दृश्य काल से होता हुआ पुनः उस एक की ओर ही जा रही है। जब तक काल के पूर्णज्ञान व कर्मज्ञान का परिचय नहीं होता तब तक यह मिश्रित काल ही प्रतीत होगा और विवाद, अशान्ति एवम् अस्थिरता बढ़ती ही जायेगी।
08. व्यष्टि सत्य-धर्म-ज्ञान से साम, दाम, दण्ड, भेद की रीति से मुक्ति एवम् समष्टि सत्य-धर्म-ज्ञान का लगातार पालन करने का प्रयत्न ही सत्य है। यही कर्मयोग हैं। यही समष्टि सत्य-धर्म-ज्ञान की रक्षा है। यही धर्म की रक्षा है। जब-जब इसका अभाव हुआ धर्म की हानि हुयी और जब भी होगा, धर्म की हानि ही होगी।
09. काल परिवर्तन (अदृश्य से दृश्य) की घोषणा मानव सृष्टि में सिर्फ एक बार होती है। मैं अदृश्य से प्रारम्भ हुआ था तथा दृश्य में अन्त हो जाऊँगा। यह प्रारम्भ और अन्त में मैं एक ही हँू। काल परिवर्तन के उपरान्त सत्य-धर्म-ज्ञान का प्रयोग करके परिवर्तित काल के प्रत्येक विषय को विवाद मुक्त करना ही मेरा धर्म है। यह एक व्यापक कार्य है। ऐसे में कार्य से बद्ध होते हुए भी मुक्त होकर कार्य करना पड़ता है। यही माया मुक्त अवस्था है।
10. सत्य चेतना युक्त मानव को दो प्रकार के ज्ञान की आवश्यकता पड़ती है एक वह जो उसे जीवन निर्माण में सहायता करता है। जिससे वह अपने को आत्मप्रकाश की ओर ले जाता है। यही देश काल मुक्त ज्ञान अर्थात समष्टि सत्य-धर्म-ज्ञान कहलाता है। दूसरा वह जो कि आजीविका का निर्माण में सहायता करता है जिसमें वह अपने को जीवित व इन्द्र्रिय सुख प्राप्त करता है यही देश-काल-बद्ध ज्ञान अर्थात व्यष्टि सत्य-धर्म-ज्ञान कहलाता है।
11. व्यापार अर्थात आदान-प्रदान का दर्शन अर्थात आदान-प्रदान, ग्रामीण, आधुनिकता, विकास एवम् शिक्षा का शारीरीक, आर्थिक एवम् मानसिक क्षेत्र का विकास ही पाश्चात्य विज्ञान, संस्कृति एवम् भाव है। क्योंकि यह दिशा विहिन है अर्थात यह केन्द्र अर्थात एकता, शान्ति स्थिरता की ओर नहीं है। अर्थात इसमंे आध्यात्म एवम् धर्म की दिशा का अभाव है।
12. योग का अर्थ होता है-जुड़ना। और प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी विषय से अवश्य जुड़ता है। जब व्यक्ति मन द्वारा व्यष्टि अदृश्य विषयों सहित समष्टि दृश्य विषयों से जुड़ता है तो वह अदृश्य योगी कहलाता है। तथा जब व्यक्ति दृश्य विषयों से जुड़ता है तो वह दृश्य योगी कहलाता है। अदृश्य योगी निवृत्ति मार्गी तथा दृश्य योगी प्रवृत्ति मार्गी होते है। निवृत्ति मार्गी आध्यात्म विज्ञान में तथा प्रवृत्ति मार्गी आध्यात्मिकता सहित पदार्थ विज्ञान दोनो में प्रवेश करते है। धर्मज्ञान, आध्यात्म तथा पदार्थ विज्ञान दोनांे से मुक्त होने पर ही प्राप्त होता है। अदृश्य योगी की पहचान आप आसानी से कर सकते हैं। क्योंकि उन्हे योग में जाने के लिए एक विशेष वातावरण एवम् स्थिति में जाना पड़ता है। जबकि दृश्य योगी साधारण व्यक्ति की तरह समाज में रहकर क्रियाकलाप करते है। इसलिए इनको पहचानना मुश्किल हो जाता है। अदृश्य योगी आत्मा का अध्ययन करते हैं जबकि दृश्य योगी आत्मा सहित क्रियाकलाप का अध्ययन करते है। धर्म स्थापना हमेशा दृश्य योगी द्वारा ही होता है। धर्मज्ञान तक दोनांे योगी पहुँचते है। लेकिन अदृश्य योगी अर्थात निवृत्ति मार्गी समष्टि मन की स्थिति का ज्ञान न होने से वे समाज से प्राप्त अवश्य करते है। जबकि दृश्य योगी समाज से जितना प्राप्त करते हैं कहीं उससे ज्यादा समाज को देते है।
13. जो दृश्य योगी होता है लगातार क्रियाकलापों पर ही ध्यान देता है न कि साधना पर। जब उसे, व्यष्टि कार्य करना होता है तो व्यष्टि क्रियाकलापों पर और जब समष्टि कार्य करना होता है तो समष्टि क्रियाकलापों पर ही ध्यान केन्द्रित करता हैा। यही कारण है कि भगवान कृष्ण का जीवन साधना रहित जीवन था। और जो भी ऐसे कार्यो को करेगा उसका जीवन साधना रहित हो जायेगा।
14. जब जब मानव समाज भयंकर रोगों से ग्रस्त हुआ तो मानव ने ही ईश्वरस्थ होकर संजीवनी रूपी वेद से समाज को रोग मुक्त किया। वेद मूलतः मानव तथा प्रकति दोनों को संयुक्त रूप से सन्तुलन, स्थिरता एवम् शान्ति प्रदान करने में सक्षम होते है। वेद किसी भी मानव अविष्कृत सम्प्रदाय का नहीं, वह मूलतः प्रकृति आविष्कृत मानव सम्प्रदाय का है। वेदांे का ज्ञान शाश्वत, सत्य एवम् ईश्वरीय ज्ञान है। न कि वेद पुस्तक।
15. सामाजिक व्यवस्था तीन आधार पर टिकी है प्रथम-धर्म विज्ञान, द्वितीय-आध्यात्म विज्ञान अर्थात अदृश्य विज्ञान, तृतीय-पदार्थ विज्ञान अर्थात दृश्य विज्ञान। आध्यात्म विज्ञान के द्वारा व्यष्टि मन को सन्तुष्ट किया जाता जाता है। पदार्थ विज्ञान के द्वारा व्यष्टिमन एवम् समष्टिमन को सन्तुष्ट किया जाता है। और धर्म विज्ञान के द्वारा जब भी समाज रोगग्रस्त होता है तों उसे रोगमुक्त कर दिया जाता है।
16. आध्यात्म एवम् धर्म चर्चा में प्रायः निवृत्ति मार्गी एवम् प्रवृत्ति मार्गी (अदृश्य योगी एवम् दृश्य योगी) दोनों आपस में एक दूसरे से सहमत होते हैं। परन्तु उसकी स्थापना वही कर सकता है जो समष्टि मन की केन्द्रित वर्तमान स्थिति को निर्धारित कर सकता है। और उसके अनुसार सूत्र उपलब्ध करा सकता है। ऐसा न होने पर चर्चा का स्तर सहमत होते हुए भी वे दोनों स्थापना स्तर पर असहमत एवम् विवाद में हो जाते है।
17. जिस प्रकार व्यष्टि रोगों की मुक्ति के लिए एक चिकित्सक व्यष्टि शरीर के साथ आपरेशन करता है लेकिन वह कार्य अवैध नहीं कहा जाता उसी प्रकार समष्टि (समाज) रोगों की मुक्ति के लिए धर्मज्ञानी समाज का आपरेशन करता है ऐसे में उसके ऐसे भी कार्य जो अव्यावहारिक, असंगत एवम् अवैध दिखते है, नजर अंदाज कर दिये जाते हैं। क्योंकि अस्त से असत्य की उत्पत्ति तथा सत् से सत् की उत्पत्ति होती है।
18. पूर्ण ज्ञान तीन दर्शन का संयुक्त ज्ञान है। प्रथम-गाइडर फिलासोफी (मार्गदर्शन दर्शन), द्वितीय-आपरेटिंग फिलासोफी (क्रियान्वयन दर्शन), तृतीय-डेवलपमेन्ट फिलासोफी (विकास दर्शन) मार्गदर्शक दर्शन वेदान्त का अदृश्य अद्वैत दर्शन है। क्रियान्वयन दर्शन वेदान्त का अदृश्य एवम् दृश्य विशिष्टाद्वैत तथा द्वैत दर्शन है। विकास दर्शन वेदान्त का दृश्य अद्वैत दर्शन है। मार्गदर्शक दर्शन एवम् क्रियान्वयन दर्शन वर्तमान समाज में पूर्णतया प्रकृति एवम् मानव द्वारा प्रभावी हो चुकी है। विकास दर्शन स्वयं प्रकृति द्वारा आंशिक रूप से प्रभावी हो चुकी हैै। जिसका पूर्ण रूप ही विश्वमानक शून्य श्रृंखला अर्थात कर्मवेद प्रथम, अन्तिम तथा पंचमवेदीय श्रृंखला है।
19. भगवान कृष्ण ने कहा है ‘‘कर्म की कुशलता ही योग है’’ अर्थात सर्वोच्च कर्म की कुशलता, सर्वोच्च योग है और एकत्व, स्थिरत्व, शान्ति से युक्त होकर धारण करने वाला सर्वोच्च योगी अर्थात योगेश्वर है और कर्मक्षेत्र है- यही दृश्य मानव जगत। समस्त विषय मानव मन से उत्पन्न होकर वह दृश्य जगत में व्यक्त होता है। स्वर्ग की धारणा भी उच्च मन स्तर से उत्पन्न हुआ है। वह भी व्यक्त होगा। वह यही मृत्यु लोक ही होगा। वह तभी होगा जब हम स्वयं को शून्य को अर्थात मृत्यु स्थापित होकर कर्म करेंगे। यही योगेश्वर का रहस्य है। फिर तुम मृत्युलोक को ही स्वर्ग कहोगे। इसलिए मैं यह कहता हॅू कि यह वही सत्य है जिसे तुम वर्तमान में आत्मसात् करने की क्षमता खो बैठे हो। 
20. ओ भारत के सिद्ध पुरूषों, योगियों, बुद्धजीवियों, सामाजिक नेतृत्वकर्ताओं आप सब क्या तलाश कर रहे हैं आप यदि भारतीय प्राचीन ज्ञान द्वारा भारत सहित विश्व के निर्माण हेतू प्रयासरत है तो इसके लिए प्रयत्न समाप्त कर दें। वह सभी कुछ तलाश किया जा चुका है। आ जाये समाज में और विश्व कल्याण हेतू सत्य-धर्म-ज्ञान आचार्य का सर्वोच्च स्थान ग्रहण करें। देखे समाज बिखर कर विनाश की कगार पर खड़ा हो गया है।
21. मैं (आत्मा) जानता हँू कि तुम में से अधिकतम व्यक्ति ईश्वर नाम को धारण कर चुका है। इसलिए तुम्हें उसके वास्तविक अर्थ में स्थापित करने के लिए पूर्ण ज्ञान से युक्त होना पड़ेगा इस नाम के कारण ही तुम लड़ने में कम लड़ाने में अधिक कुशल हो गये हो। मैं चाहता हँू कि तुम सभी स्वार्थी बन जाओ जिसका स्तर स्वयं, ग्राम, क्षेत्र, जनपद, प्रदेश, देश या विश्व का में से कुछ भी चुन लो और अपने उस लड़ाने के गुण का प्रयोग करो जिससे एक ऐसे आत्मशक्ति आधारित युद्ध का जन्म हो जिसमें एक तरफ मैं रहूँ दूसरी तरफ सम्पूर्ण मानव समाज। विश्वास मानो आत्मशक्ति की विजय होगी और इस युद्ध का परिणाम सम्पूर्ण मानव समाज के लिए पूर्ण लाभकारी ही होगी। यदि मेरी बलि भी चढ़ गयी तो इसमें तुम्हारा क्या जायेगा?
22. हम राजतंत्र से निकलकर प्रजातंत्र (लोकतंत्र) की ओर बढ़ गये हैं जो मानव आविष्कृत राष्ट्र की सीमा में बद्ध हो गया है। लेकिन भविष्य में ये मानव आविष्कृत राष्ट्र की सीमा भी टूटकर पूर्ण प्रजातंत्र के लिए प्रकृति आविष्कृत राष्ट्र (विश्व) के रूप में परिवर्तित हो जायेगा, तभी हम पूर्ण प्रजातंत्र को प्राप्त कर पायेगें।
23. स्वतंत्रता के तीन स्तर है - निम्न - शारीरिक, मध्य-आर्थिक, उच्च-मानसिक। लेकिन पूर्ण स्वतंत्रता तभी आती है। जब आध्यत्मिक स्वतंत्रता प्राप्त होती है। वर्तमान विश्व राष्ट्र को पूर्ण स्वतन्त्रता की अत्यन्त आवश्यकता है। क्योंकि इसके बिना कार्य की दिशा निर्धारित करना असम्भव है। 
24. जब व्यक्ति एवम् देश के शरीर को स्वतंत्र करना था अर्थात प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम था। तब देश भक्तों की आवश्यकता थी। अब जब द्वितीय स्वतन्त्रता संग्राम का अवसर है तब देश भक्त (भारत भक्त) सहित राष्ट्र भक्त (विश्व भक्त) की आवश्यकता है। क्योंकि देशभक्त की भावना में दूसरे देश के प्रति अपनत्व नहीं आ पाती। दूसरे देश के प्रति अपनत्व की भावना तभी आ सकती है जब वह राष्ट्र भक्त हो। प्रकृति अविष्कृत राष्ट्र एक विश्व है। जिसमें मानव अविष्कृत राष्ट्र-देश समाहित हैं।
25. यह प्रश्न हो सकता है कि पूर्ण ज्ञान या पूर्ण स्वतन्त्रता के बाद समाज और लोकतंत्र बिखर नहीं जायेगा? ऐसा कदापि नहीं होगा बल्कि वह स्वस्थ हो जायेगा क्योंकि व्यक्ति समाज और लोकतंत्र का देश काल मुक्त ज्ञान एवम् कर्मज्ञान सभी में समान हो जायेगा और देश काल बद्ध ज्ञान एवम् कर्मज्ञान से युक्त होकर अपने अधिकार क्षेत्र में ही वे कार्य करेंगे। वर्तमान समय के तरह नहीं कि जो कर्म व्यक्ति को स्वयं कर लेने चाहिए उसे भी वे नेताओं पर छोड़े रहते है। 
26. प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से प्राप्त स्वतन्त्रता के उपरान्त भारत के संविधान का निर्माण हुआ जो सुरक्षा, कर्मफल एवम् पश्चिमी भाव आधारित संविधान है। अब द्वितीय एवम् पूर्ण स्वतंत्रता के उपरान्त भारतीय संविधान का विष्व संविधान में परिवर्तित करना हो तो शान्ति, कर्म-कारण एवम् भारतीय भाव आधारित संविधान का निर्माण करना होगा जो एकात्म कर्मवाद पर आधारित होना चाहिए न कि एकात्मवाद (एकात्म संस्कृति) पर आधारित। 
27. वर्तमान समय में प्रत्येक व्यक्ति का क्रियाकलाप विश्व स्तर तक को प्रभावित करने लगा है। ऐसी स्थिति में प्रत्येक व्यक्ति को इसके ज्ञान से युक्त करना आवश्यक है। जिसके लिए राष्ट्र एवम् देश को परिभाषित करना पडे़गा। प्रकृति अविष्कृत राष्ट्र विश्व है। तथा मानव अविष्कृत राष्ट्र देश है यदि ऐसा नहीं है तो हम कभी भी विश्व से नहीं जुड सकते क्योंकि राष्ट्र भक्त एवम् देश भक्त की सीमा मानव अविष्कृत राष्ट्र तक ही सीमित रह जायेगी। हमें अपने समस्त सम्बन्धों को विश्व राष्ट्र से जोड़ देना चाहिए।
28. राष्ट्र जिसे हमें विश्व के विभिन्न अंशों में से किसी एक को कहते है। वह मानव द्वारा सीमा बद्ध किया गया है। प्रकृति से उत्पन्न राष्ट्र विश्व है। मानवीय सत्य, प्राकृतिक सत्य में निहित है। यह प्राकृतिक सत्य मानव निर्मित राष्ट्रों को मानव द्वारा ही तोड़ने पर मजबूर कर देगा और उसे उसके द्वारा निर्मित विश्व राष्ट्र की प्राप्ति हो जायेगी। राष्ट्र एक था और उस एक को वह प्राप्त करेगा ही।
29. हम राजनीतिक पार्टियों से उनके क्रियाकलापों का मानक माँगते है जिन पर वे अपने कार्यो की माप करते है। हम जानते हैं कि उनके पास कोई मानक नहीं क्योंकि उन्हें कोई धर्म ज्ञान नहीं। वे कभी गाँधी के एक विचार को लेंगे कभी अम्बेडकर के, कभी कुरान के, कभी विवेकानन्द के, कभी राम के, कभी गीता के, कभी मनु के, कभी लेनिन के, कभी माक्र्स के और कभी जो मन में आये स्वंय बोल लिए। यही उनका मानक है लेकिन वे ये नहीं जानते कि ये सभी व्यक्ति किसी न किसी रूप में प्राकृतिक सत्य के ज्ञान से युक्त थे लेकिन इनका विषय सन्तुलित न होकर सिर्फ एक ही था।
30. यह अतिशीघ्र सोचने का विषय है कि एक तरफ हम दूसरे ग्रहों पर स्वयं को स्थापित करने का प्रयत्न कर रहे हैं। दूसरी तरफ परमाणु युद्ध जैसी स्थिति उत्पन्न कर रहे हैं। ऐसे वातावरण में हम दो तरह के भविष्य का निर्माण कर रहे हंै। प्रथम यह कि आने वाली पीढ़ी को शायद यह कहकर आधुनिक विज्ञान का परिचय कराना पडे़ कि यह हमारे पूर्वजांे की तकनीकी थी जो अब विलुप्त हो गयी है दूसरा यह कि दूसरे ग्रह पर स्थापित करने के बाद वहां से सम्बन्द्ध विच्छेद हो जाये और वहाँ भी कुछ पीढ़ियों के बाद यह कार्य जो सत्य था एक कहानी मात्र बनकर रह जाये। इन दोनों रास्तों में से किसी रास्तों पर चलने के लिए मानव निर्माण नहीं हुआ है। मानव का निर्माण सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को आत्मासात्््् करने के लिए हुआ है।
31. यदि भारत आज समृद्धि की ओर है। सोने की चिड़िया पुनः बनने की ओर है अगर इसका श्रेय किसी को है तो इसके साथ आज भी बेरोजगारी का चादर ओढे़ युवक, गंदे राजनीति को बढ़ावा, अपराध, शोषण, अपूर्ण शिक्षा प्रणाली, महिलाओं को अभी भी अधिकार न देना, भ्रष्टाचार मानव अविष्कृत धर्म एवम् जातियों को बढ़ाने की श्रेय भी उसी को है। 
32. हम बेरोजगारी को दान से, साम्प्रदायिक दंगों को कानून से, मानव अविष्कृत धर्म को मानव अविष्कृत धर्म से, स्वार्थ को स्वार्थ से, गंदे राजनीति को गंदे राजनीति से कभी समाप्त नहीं कर सकते। इन सभी का समाप्त करने का एक ही उपाय है वह है देश काल विवादमुक्त दृश्य प्राकृतिक सत्य धर्म का ज्ञान।
33. भारत की एकता को खतरा मानव अविष्कृत धर्मो के समर्थकांे से नहीं बल्कि उस भक्ति से है जो मानव ज्ञान को बद्ध कर देती है। यह भक्ति चाहे माँ का हो, पिता का हो, भाई का हो, बहन का हो, पुत्र का हो, पुत्री का हो, प्रेमी का हो, प्रेमिका का हो, अदृश्य ईश्वर/अल्ला का हो या किसी और का हो हमारे ज्ञान को अवरूद्ध कर देता है। हम प्रबन्धकीय क्षमता, नेतृत्वशीलता, संचालक गुणों को तो प्राप्त नहीं कर पाते साथ ही इन गुणों को पहचानने की क्षमता भी खो बैठते है। यह भक्ति उस काल का अविष्कार था जब मानव की आवश्यकतायें नगण्य थी। और हमारे मन को किसी के भक्ति पर केन्द्रित करने की आवश्यकता थी। आज हमारा मन जिन स्थूल आवश्यकताओं पर केन्द्रित है उसके प्राप्ति के लिए प्राकृतिक सत्य के ज्ञान की आवश्यकता है। जिससे प्रबन्धकीय क्षमता, संचलनकर्ता, दार्शनिक, आविष्कारक जैसे गुण उत्पन्न होते हैं। ये वर्तमान स्थूल आवश्यकतायें कभी भी भक्ति से प्राप्त नहींेेेे हो सकती। यदि हमें भक्ति करना है तो स्थूल आवश्यकताओं की कामना छोड़नी होगी। यदि स्थूल आवश्यकताओं को प्राप्त करना है तो प्राकृतिक सत्य के ज्ञान को धारण करना पडे़गा।
34. भारत के राजनीतिक पार्टियों की पचास वर्षो की उपलब्धियों को यदि देखें तो पायेगें कि कोई भ्रष्टाचार से युक्त मानव मन का निर्माण कर रहा है तो कोई बुद्धि बद्ध मानव मन का निर्माण कर रहा है। तो कोई जातिवाद एवम् सम्प्रदायवाद से युक्त मानव मन का निर्माण कर रहा है और इसके दोषी भी ये नहीं है क्योंकि जो ज्ञान उपलब्ध नहीं है उसके कारण उत्पन्न दोष का दोषी मैं हँू। आप स्वयं इन्हें नहीं पहचान सकते क्योंकि वेदान्त-सिद्धान्त का पूर्ण अभाव हो गया है। सत्य तो यह है कि कोई आप के लिए कार्य नहीं करता, सभी अपने लिए ही कार्य करते है। मैं भी यही कर रहा हँू। बस अन्तर यह है कि मेरी शान्ति एवं स्थिरता का पूर्ण अंश समष्टि धर्म में है और अन्य का व्यष्टि धर्म में है। 
35. निःस्वार्थ भाव से सामाजिक विकास एवं ज्ञान का मार्ग प्रशस्त करने वालो के संदेश से यह आवश्यक है कि लोग उसे निःस्वार्थ होकर ही समझने की कोशिश करें। यदि वे ऐसा नही करते तो निश्चय ही उनका मन ज्ञान पर केन्द्रित नहीं है। ऐसे में मार्ग प्रशस्त करने वाले इतिहास बन जाते है। और वे लोग जिनका मन ज्ञान पर केन्द्रित नहीं होता, भाग्य को कोसते रहते है। 
36. वह मनुष्य क्या करे ? जो धर्म, न्याय, सत्य की रक्षा करना चाहता हो लेकिन समाज में रहने के कारण उससे बड़े एवम् छोटे व्यक्ति भी है। यदि बड़े लोग ही अधर्म, अन्याय व असत्य पर हो तो विरोध करने पर स्वयं उसके चरित्र पर कलंक लगता है और विरोध न करने पर वह मनुष्य स्वयं अपनी नजर में अधर्मी, अन्यायी व असत्य पर चलने वाला हो जाता है। 
37. समाज, जाति या धर्म आधारित होती है। यह जाति प्रकृति द्वारा निर्धारित विभिन्न जीवों की जातियाँ है। तथा धर्म, ज्ञान है। प्रकृति द्वारा निर्धारित जातियों में मानव एक जाति है जिसका समाज, मानव समाज है। जो प्रकृति से अलग नहीं है। प्रकृति से मिलकर मानव प्राकृतिक समाज का निर्माण करता है। तथा धर्म, प्राकृतिक धर्म कहलाता है।
38. जो धर्म है। वह एकतावादी है। जो वाद है वह अलगावादी है, सम्प्रदायवादी है ये न ही एकतावादी है और न ही धर्म ज्ञान से युक्त है। समाजवाद, धर्म का तथा सम्प्रदायवाद, वाद अर्थात अधर्म का स्वरूप है।
39. यह मै नहीं जानता कि मेरा भविष्य क्या है, लेकिन मै यह जानता हूँ कि मंै संपूर्ण मानव समाज को धर्म का अर्थ समझाने के लिए प्रयत्नरत हूँ जिस ओर बढ़ा प्रत्येक कदम ही अर्थ को प्रदर्शित एवम उसके रहस्य को उजागर करता कदम होगा। जिसका अन्त खुद के अन्तिम संस्कार को जलाने के अलावा किसी अन्य विधि से करवाने की इच्छा होगी। जिसका उद्देश्य किसी मानव अविष्कृत धर्म को प्रभावित करना नहीं बल्कि धर्म इन संस्कारों से मुक्त है को प्रमाणिक आधार देना होगा।
40. राजनीति, धर्म की स्थापना की सम्पूर्ण नीति है जिसका उद्देश्य ब्रह्माण्ड के विकास के लिए एकता एवम् शान्ति को सन्तुलित बनाये रखना है। यह धर्म, प्राकृतिक धर्म है, न कि मानव अविष्कृत धर्म। यही राजनीति जब मानव अविष्कृत धर्म की स्थापना एवम् व्यक्तिगत स्वार्थ अर्थात विकास के लिए की जाती तो कूटनीति कहलाती है। वर्तमान समय में राजनीति शून्य अवस्था को तथा कूटनीति चरम अवस्था को प्राप्त है।
41. माया मुक्ति के पाँच रास्ते कर्म, ज्ञान, राज, प्रेम एवम् भक्ति योग है, ये स्थूल एवम् सूक्ष्म दोनों कार्यो में समयानुसार उपयुक्त है। ये मानव की असीम शक्तियाँ भी है। जिसके ज्ञान से मनुष्य को संघर्शशीलता, नेतृत्व क्षमता, धार्मिक कार्य, राजनीति, समय की पहचान जैसे गुण उत्पन्न होते है। इन रास्तों की अज्ञानता ही मनुष्य के दुःख का कारण है। क्योंकि इन रास्तांे की अज्ञानता ही समस्याओं का हल निकालने में             बाधक बनती है। समाज ने समयानुसार उपयोगी इन रास्तों की जब भी उपेक्षा की है तब अधर्म, अन्याय, और असत्य की सत्ता कायम हुई है।
42. सभी मानव अविष्कृत धर्म राजतन्त्र के साम्राज्यवादी व्यवस्था में अविष्कृत किये गये हैै। जो अलगाववादी है जबकि धर्म एकतावादी है। वर्तमान समय में हम राजतंत्र एवम् साम्राज्यवादी व्यवस्था से निकलकर लोकतन्त्र एवम् राष्ट्रवादी व्यवस्था में आ गये है। हमें मजबूरन साम्राज्यवादी व्यवस्था को भूलना पड़ेगा। जब तक हम ऐसा नहीं करते हम अव्यवस्था एवम् अशान्ति का शिकार होते रहेंगे। हमें लोकतंत्र का धर्म व उसका धर्मशास्त्र निर्धारित करना पड़ेगा।
43. अपराध, निजी स्वार्थ के लिए किया गया अधार्मिक कार्य है। निजी स्वार्थ के लिए किया गया कार्य अपराध जो धर्म युक्त हो             अपराध नहीं होता है। उसी प्रकार सामाजिक विकास के लिए किया गया अपराध, अपराध नहीं होता क्यांेकि धार्मिक कार्य जिस प्रकार अज्ञानी को ज्ञान देना, विकास कार्य करना, मुर्खों को यथावत् छोड़ देना है उसी प्रकार धार्मिक कार्य में बाधा उत्पन्न करने वालों का विनाश भी             धार्मिक कार्य है लेकिन यह धर्म प्रकृति अविष्कृत धर्म होना चाहिए, मानव अविष्कृत धर्म (वाद) नहीं।
44. जिसे हम स्वर्ग या जन्नत कहते हैं वह अच्छे विचार, व्यवहार एवम् कार्य का परिणाम है। जिससें हमें सुख प्राप्त होता है। वहीं जिसे हम नरक या जहन्नुम कहते है। वह बुरे विचार, व्यवहार एवम् कार्य के परिणाम है। जिससे हमें दुःख प्राप्त होता है। जो यहीं हमारे जीवन में हमें और हमारे परिवार को भुगतना पड़ता है। यह व्यवहार ही मानव के मन में हमारे प्रति व्यवहार का निर्माण करवाता है। चाहे वह उस व्यक्ति द्वारा प्रकट रूप में महसूस हो या न हो, यही भविष्य में हमारे सुख एवम् दुःख का निर्माण एवम् वातावरण पैदा करता है। इस विश्व से बाहर नरक या स्वर्ग नाम की कोई जगह नहीं है। 
45. थोड़ा स्वार्थ आने से अव्यवस्था आती है। थोड़ा निःस्वार्थ होने से व्यवस्था ठीक होने लगती है। थोड़ा सोने से कुछ खो जाना पड़ता है। थोड़ा जागने से कुछ बच जाता है। थोड़े समय के कारण कोई मर जाता है। थोड़े समय के कारण कोई जिन्दगी पा जाता है। यह थोड़ा बड़ी अजीब चीज है। थोड़ा स्वार्थी एवम् अज्ञानी होने से मन्दिर, मस्जिद टूट जाते है। दंगा हो जाता है। भ्रष्टाचार बढ़ जाता है। इसलिए हम आपको थोड़ा निःस्वार्थ एवम् निष्पक्ष होकर वक्त को पहचानने के लिए कह रहे है। इसलिए हमने थोड़ा सा ही कार्य किया, अपने मानव समाज के लिए, देश के लिए, विश्व के लिए। इस थोड़े से कार्य का हमारा उद्देश्य विषय, विशेषज्ञ, परिभाषा, शिक्षा, मानव विभेद, मानव क्रियाकलाप, नीति, अपराध एवम् मानव अविष्कृत धर्मो का विश्व मानकीकरण एवम् स्थापना है। आपका थोड़ा सहयोग प्राप्त हो तो निःस्वार्थ कुछ थोड़ा छोटा-छोटा कार्य और करना चाहुँगा।
46. यह बड़े दुःख ही बात है कि भारत जैसा देश जो दर्शन का जन्मदाता रहा है। आज तक विषय और विशेषज्ञों की परिभाषा, मानव क्रियाकलापों, मानव विभेद, शिक्षा, नीति, अपराध एवम् मानव अविष्कृत धर्मों का मानकीकरण नहीं कर सका। और न ही दृश्य गुणों से युक्त अर्थात लोकतंत्र के लिए धर्म, ईश्वरनाम, पूजास्थल एवम् धर्म ग्रन्थ का आविष्कार कर सका। यह इस बात को प्रदर्शित करता है कि हमारा मन ज्ञान पर नहीं बल्कि पद, प्रतिष्ठा, पूजास्थल, धन, मानव अविष्कृत धर्मो एवम् जातियों, वेशभूषा, संस्कृति, भोजन, मनोरंजन, भाषा एवं अनुपयोगी साहित्यों के सृजन पर टिकी हुयी है। साहित्य से समाज की रूचि कम होने के कारण भी यही है। हमारा मन पूर्णतः धन पर केन्द्रित हो गया है और वह भी चाहे जैसे कर्मो से। यही कारण भी रहा कि शिक्षा का उद्देश्य नौकरी द्वारा धन कमाने से हो गया। यदि पूर्ण शिक्षा प्रणाली होती तो देश बेराजेगारी से नही घिरा होता। शिक्षा का उद्देश्य धन कमाना तो होता लेकिन वह नौकरी के साथ उद्यम भी होता। यह सोचनें का विषय है कि यदि शिक्षा के प्रति भावना ये बन गयी हो कि ‘‘जिस शिक्षा से नौकरी नहीं वह शिक्षा क्यों’’? तो इस भावना को उत्पन्न करने का जिम्मेदार कौन है? जबकि ज्ञान से कर्म है, धर्म है, धन है, नेतृत्वकत्र्ता की पहचान है।
47. हम सभी को इस प्रश्न विचार करना होगा कि मानव जब पशु मानव के सहजात ज्ञान अवस्था से साधारण ज्ञान अवस्था में आया तो उसे प्राकृतिक सत्य का प्रथम अनुभव हुआ। उसके उपरान्त ही मानव ने सूक्ष्म विज्ञान के द्वारा ईश्वर, अल्ला, गाॅड का अविष्कार किया। तब से लेकर वर्तमान तक मानव आविष्कृत धर्म विद्वानों ने उस अदृश्य विवादमुक्त ईश्वर, अल्ला, गाॅड की ओर ही मानव का मन केन्द्रित करते रहे जबकि धार्मिक स्थलों के साथ जुड़ी घटनाये जो हुयी, हो रही है, होती रहेगी, सर्वज्ञ है। क्या कारण था कि धर्मं विद्वानों ने आज तक उस देश, काल मुक्त प्राकृतिक सत्य की ओर मानव का मन केन्द्रित नहीं किये। ऐसा नहीं कि वे प्राकृतिक सत्य ज्ञान से युक्त नहीं है। मानव आविष्कृत धर्म विद्वानों की यह अवस्था ज्ञानी मानव की स्वार्थमय अवस्था थी और है। यदि प्राकृतिक सत्य की ओर मानव मन को केन्द्रित कर देते तो उनकी सत्ता भी समाप्त हो सकती थी। और वे सुख साधन से वंचित हो सकते थे। यही वे कारण हैं जिनसे वे सिर्फ सूक्ष्म कार्य में मानव का ध्यान केन्द्रित करते रहते है। ईश्वर, अल्ला, गाॅड के अवतार द्वारा सामाजिक परिवर्तन की शिक्षा देने वाले, मानव की सेवा करने की शिक्षा एवं कार्य करने की शिक्षा के बजाए वे अपनी सेवा कराने में व्यस्त रहते हैं।
48. प्राकृतिक सत्य के ज्ञान के बिना मानव अन्य जीव की भाँति सिर्फ जीव है।
49. मानव प्रकृति के अदृश्य ज्ञान को दृश्य ज्ञान में परिवर्तित करने का माध्यम मात्र है।
50. जो ससीम में असीम है, जो बद्ध में मुक्त है, जो पक्ष में निष्पक्ष है, जो साधारण में असाधारण, जो शक्ति में महाशक्ति है, वही विजेता है, वही आश्चर्य है और वहीं समर्पण है।
51. मनुष्य के अन्दर उत्साह, धर्म, न्यायप्रियता व सत्यता के गुण सर्वप्रथम माता-पिता या अभिभावक से ही प्राप्त होते हैं लेकिन माता-पिता या अभिभावक में ही ये गुण न हो तो सन्तानों या आश्रितों का क्या दोष?
52. पहले मनुष्य सिर्फ कार्य करता था फिर भूतकाल के कार्यों के सीख से वर्तमान में कार्य करने लगा। वर्तमान समय में वहीे मानव सफलता को प्राप्त करता है जो भूतकाल के सीख भविष्य की आवश्यकताओं के अनुसार वर्तमान में कार्य करता है। 
53. किसी भी कार्य को करने में सफलता और असफलता दो रास्ते होते है लेकिन न करने में सिर्फ असफलता का एक ही रास्ता होता है।
54. उद्देश्य गलत अर्थात अधर्म युक्त होने पर, अच्छा कर्म अर्थात धर्म युक्त कार्य भी में विनाश का कारण होता है उद्देश्य अच्छा अर्थात धर्म युक्त होने पर, गलत अर्थात अधर्म युक्त कार्य भी विकास का कारण होता है।
55. कौन कहता है कि मोक्ष प्राप्त करना है, तुम्हारा यह मनुष्य जीवन ही सबसे बड़ा मोक्ष है बस तुम्हे कर्मज्ञान का ज्ञान न होने के कारण यह जीवन दुःखमय लगता है। तुम कर्म-ज्ञान से युक्त हो जाओ यह बात स्वतः प्रमाणित हो जायेगी।
56. वेद, सूक्ष्म विज्ञान द्वारा उत्पादित या अविष्कृत एक साहित्य है जो उस काल के ज्ञान, विज्ञान, सामाजिक, आर्थिक, मानसिक, शारीरिक स्थिति की व्यक्त अवस्था हैै।
57. धर्म ग्रन्थ, धार्मिक कार्य करने के ज्ञान का व्यक्त अवस्था है जो साहित्य है। सूक्ष्म कार्य करने का धर्म ग्रन्थ, सूक्ष्म धर्म ग्रन्थ तथा स्थूल कार्य करने का धर्म ग्रन्थ, स्थूल धर्म ग्रन्थ कहलाता है।
58. पूजा स्थल, सूक्ष्म विज्ञान द्वारा आविष्कृत एक ऐसा स्थल है जहाँ मानव के सूक्ष्म कारण केन्द्रित अस्थिर मन को स्थिरता प्राप्त होती है। यह विधि मानव के स्थूल कारण एवम् विषयों पर केन्द्रित मन को कभी भी स्थिरता प्रदान नहीं कर सकती।
59. कर्म एवम् उद्देश्य प्राप्ति, बिना दृढ़ निश्चय के नहीं होता। दृढ़ निश्चय जीवन की एक तपस्या है, तपस्या में परीक्षा, अग्निपरीक्षा, धर्मसंकट आते ही है। जिससे मनुष्य को हारना नहीं चाहिए उसके बाद तो रास्ते स्वतः ही खुल जाते है।
60. माया मुक्ति या मोह मुक्ति या निःस्वार्थ का अर्थ यह नहीं कि मनुष्य अपने जीवन उपयोगी सभी संसाधनों एवं सम्बन्धों का त्याग कर दें। इसका अर्थ है कि संसाधनों एवं सम्बन्धों से व्यक्ति इस प्रकार जुड़ा रहे जैसे उन सम्बन्धों एवम् संसाघनों के रहने से कोई दुःख नहीं तो इसके न रहने से भी कोई दुःख न हो।
61. ‘रामायण’ व ‘महाभारत’ दो ऐसे ग्रन्थ है जिसमें पहले में मुख्यतः घर के सभी चरित्र तथा दूसरे में मुख्यतः समाज के सभी चरित्रों का चित्रण है जो आज भी हो रहा है आगे भी होता रहेगा। इनसे हमें शिक्षा लेकर चरित्र में धारण करना चाहिए। इनकी भक्ति से अच्छा इन्हे पढ़ना ही बेकार है।
62. माता और पिता तीन कारण से होते हैै - जन्म कारण, ज्ञान कारण एवम् कर्म कारण। शास्त्रों में माता पिता आचार्य को ईष्वर का सम्मान प्राप्त है। जिनका सम्मान तभी तक बना रहता है जब तक इन तीनों कारणों में से ये कम से कम दो कारणों से युक्त होतें है। और तभी तक पारिवारिक एवम् सामाजिक स्वथता बनी रहती है।
63. जिस प्रकार नियम होने से टूटने पर अव्यवस्था फैलती है। और नियम न रहने पर नियमबद्ध होने से अव्यवस्था फैलती है। उसी प्रकार मानव का मन और ज्ञान एक था। इनका अलग होना ही अव्यवस्था, अस्थिरता, एवम् असंतुलन का कारण है। हम अपने मन और ज्ञान को पुनः एक साथ कर दे तो धर्म को स्वतः ही समझ जायेंगे।
64. मानव प्रकृति से उत्पन्न, प्रकृति से युक्त एक ऐसा जीव है जिसका मन एवं ज्ञान पृृथक है जिसके कारण एक ही साधारण ज्ञान अर्थात द्वन्द अवस्था में रहता है। इन दोनांे का योग ही मानव को सन्तुलन एव् स्थिरता प्रदान करता है। यही अवस्था मानव की ज्ञानातीत अवस्था होती है।
65. साहित्य काल के आर्थिक, सामाजिक, शारीरिक, मानसिक, स्थिति का व्यक्त अवस्था है। जिसका सृजन प्रत्येक व्यक्ति को किसी न किसी विषय पर करना चाहिए। ये शोध, अनुसंधान, इत्यादि के स्रोत है। जो ज्ञान के योग्य होती है, भक्ति के नहीं। 
66. प्रत्येक त्याग के बाद जो हम खोते हैं उससे अधिक उपलब्धि हमारे साथ होती है प्रत्येक स्वार्थ के साथ जो हम पाते है उससे अधिक हम खोते है। यह बात अलग है कि हमें प्राकृतिक सत्य का ज्ञान न होने से यह नहीं जान पाते कि हमनें क्या खोया? क्या पाया ? यह हमारी अज्ञानता है जो हमारे विकास में बाधक है।
67. हम कहाँ है? यह हमने नहीं सोचा लेकिन हम उस स्थिर, संतुलित, विवाद मुक्त अदृश्य कारण सत्य-धर्म-ज्ञान (ईश्वर, अल्ला, गाॅड) इत्यादि के दृश्य विवाद युक्त प्राकृतिक सत्य-धर्म-ज्ञान का अध्ययन करते हुये विकास कर उस स्थिर, संतुलित, विवाद युक्त, अदृश्य कारण        सत्य-धर्म-ज्ञान की ओर स्थायित्व एवं संतुलन प्राप्ति के लिए बढ़ रहे है।
68. हम अगर यह सोचे कि धर्म, ज्ञान, मन एवं मानव में इस पृथ्वी पर इनका आने का क्रम क्या था तो पायेगें, पहले मानव आया जो मन और ज्ञान से युक्त था, फिर मन और ज्ञान अलग हो गया तब धर्म की उत्पत्ति हुई। उसके उपरान्त मानव आविष्कृत धर्मो की उत्पत्ति हुई और पुनः उस धर्म के वास्तविक अर्थ की ओर बढ़ रहे है।
69. भाषा, गुणों को प्रदर्शित करता हुआ शब्दों का ऐसा संग्रह है जिससे मानव एक दूसरे से सम्पर्क स्थापित करता है। शब्द के गुण का ज्ञान न  होने से अर्थात नाम के गुण का भाव न होने से वह शब्द निरर्थक, गुणरहित, ध्वनि मात्र बनकर रह जाती है। यही मंत्र और ईश्वर नाम का रहस्य है।
70. गुण अवगुण तो हर मनुष्य मेें होते हैं। किसी विशेष अवगुण के कारण ही मनुष्य घृणा का पात्र बनता है लेकिन उससे सभी गुणों का नाश नहीं होता। उसके उस अवगुण में भी कोई न कोई कारण अवश्य छिपी रहती है। यह अलग बात है कि हम उसे जानना नहींें चाहते।
71. ज्ञान से भरे संसार में एक अज्ञानता या मूर्खता का कार्य उसे समस्त संसार में मूर्खता का कारण बनाता है। उसी प्रकार अज्ञानता से भरे संसार में एक ज्ञानता या बुद्धिमता का कार्य उस समस्त संसार में प्रसिद्धि का कारण बनाता है। हमें स्वयं की प्रसिद्धि के लिए वक्त का पहचान करना पड़ेगा नहीं तो वक्त हमें भी पहचानने से इन्कार कर देगा।
72. किसी भी कार्य को करने के लिए पहला कदम है दृढ़ संकल्प, दूसरा कदम है उपलब्ध सुविधा या सूचना, जिससे योजना का जन्म होता है। इसके उपरान्त ही कोई कार्य सम्भव है। सूचना के लिए सम्पर्क आवश्यक है। सम्पर्क ही न रहे तो कोई भी कार्य असम्भव ही नहीं नामुमकिन हैै।
73. विकास के दो अलग कार्यो में दो अलग-अलग व्यक्तियों में मतभेद हो सकता है। उसका मूल्यांकन विकास की गति, कार्यो द्वारा प्राप्त साख तथा कार्य के भविष्य के आधार पर कर मतभेद समाप्त करना चाहिए। यदि कार्यों द्वारा प्राप्त साख व्यक्तिगत है तो मूल्यांकन हमेशा सामाजिक साख से कम होगा।
74. भविष्य के आधार पर कार्य करना उचित ही नहीं सर्वोत्तम है। प्रकृति में उपलब्ध सभी विषयों को अध्ययन के रूप में लेना चाहिए। क्योंकि प्रकृति हमारे ज्ञान के अनुसार नहीं चलता बल्कि वह अपने ही नियमानुसार चलता है उसमें से किसी प्रकार के ज्ञान की आवश्यकता असमय भी पड़ सकती है।
75. असाधारण एवम् साधारण व्यक्ति में एक ही अन्तर है। पहला व्यक्ति सभी गलत कार्य ज्ञानयुक्त अवस्था में करता है। जो समाज मे भौतिक साधन व ज्ञान उपलब्ध कराता है। दूसरा व्यक्ति अनजाने अर्थात अज्ञानयुक्त अवस्था में करता है जिससे समाज में विनाश अवस्था उत्पन्न होती है।
76. व्यक्ति का ज्ञान दो प्रकार का होता है बाह्य एवं अन्तः। बाह्य ज्ञान द्वारा उसका मूल्यांकन सभी कर लेते हैै। लेकिन अन्तः ज्ञान का मूल्यांकन करने के लिए मूल्यांकनकत्र्ता में भी अन्तः ज्ञान का होना आवश्यक है ऐसा न होने पर अन्तः ज्ञानी तो सभी को मूल्यांकन कर लेता है। लेकिन बाह्य ज्ञानी सिर्फ स्वयं का ही मूल्यांकन करवाता है वह कभी भी दूसरों का मुल्यांकन नहीं कर पाता।
77. जरा सोचिए हमारी मंजिल क्या है? हम क्या चाहते है? उसको प्राप्त करने के लिए हमारा दृढ़ निश्चयता कितनी है और उसके लिए कार्य कितना कर रहें है। हमारे पास उपलब्धता क्या है। अनुपलब्धता की जानकारी कितने लोंगो को है। वक्त को पहचानने की उपलब्धता कितनी है। यदि हम में ये सब नहीं है तो मंजिल विहिन व्यक्ति पशु के समान है, मनुष्य उद्देश्यपूर्ण कार्य करता है। पशुओं का अपना कोई उद्देश्य नहीं होता है।
78. जब किसी व्यक्ति का क्रियाकलाप समाज की समझ में न आये तथा ये क्रियाकलाप समाज के लिए नुकसानदायक हों तो वही व्यक्ति समाज का असामाजिक तत्व है। जिसका डटकर विरोध करना चाहिए। तथा जब किसी व्यक्ति का क्रियाकलाप समाज की समझ में न आये तथा ये क्रियाकलाप समाज के लिए नहीं बल्कि उसे स्वयं के लिए नुकसानदायक हो तो वह व्यक्ति असामाजिक तत्व हो ही नहीं सकता। तब उसका हर शब्द रहस्यमय होता है। उसका हर सम्भव सहयोग ही उचित है।
79. तुम स्वयं को केन्द्र मानकर इस समाज के विभिन्न विषयों के आदान-प्रदान को गति दो। यही तुम्हारा अधिकार है। जो जितने बड़े आदान-प्रदान की योजना बनाता है। वही समाज का नियंत्रण करता है। यदि वह एकता, स्थिरता एवम् शान्ति की ओर है तो यही ईश्वरीय कार्य है। व्यक्त ब्रह्म भाव है। जो तुम में से प्रत्येक कर सकता है। जिसमें तुम स्वयं को एक प्रबन्धक मात्र ही समझो।
80. यदि हमें किसी व्यक्ति से क्रोध है तो हम बदला अवश्य लेंगें। यदि हमंे परिवार से क्रोध है तो हम बदला अवश्य लेंगें। यदि हमें देश से क्रोध है तो हम बदला अवश्य लेंगें। यदि हमंें विश्व से क्रोध है तो हम बदला अवश्य लेंगंे। लेकिन यह बदला उसके विनाश से नहीं बल्कि स्वयं के विकास एवम् बेहतर व्यवस्था को देकर लेंगंे। हम क्रोध में ही जीयेंगेे, क्रोध में ही मरेंगे। लेकिन क्रोध विकास का होगा, विनाश का नहीं।
81. हमें स्वयं से निष्पक्ष होने के लिए, निःस्वार्थ होने के लिए मन को स्वयं से बाहर लाना होगा। परिवार से निष्पक्ष एवम् निःस्वार्थ होने के लिए मन को परिवार से बाहर लाना होगा। देश से निष्पक्ष एवम् निःस्वार्थ होने के लिए मन को देश से बाहर लाना होगा। विश्व से निष्पक्ष एवम् निःस्वार्थ होने के लिए मन को विश्व से बाहर लाना होगा। हम कभी भी मन को स्वयं से, परिवार से, देश से, विश्व से जोड़कर निष्पक्ष एवम् निःस्वार्थ नहीं हो सकते। उसी प्रकार बिना मानव अविष्कृत धर्मो से बाहर आये धर्म को नहीं जान सकते।
82. कौन कहता है कि तुम्हे जन्म दिया गया है। तुम स्वतः ही अपने पूर्व जन्मो के अधूरे संकल्पोें को पूर्ण करने हेतू अपने योग्य माता-पिता सहित वातावरण का चुनाव कर जन्म लेते हो और अपने संकल्पो को पूर्ण करते हो। यह मनुष्य जीवन तुम्हे पूर्व जन्म के अधूरे संकल्प अर्थात मुक्ति अर्थात आध्यात्मिक स्वतंत्रता के लिए प्राप्त हुआ है। और यदि तुम इसे नहीं पहचान पाते तो पुनः निम्न योनि को प्राप्त होते हो। यह पूर्णतः तुम्हारे अधीन है कि तुम पूर्व जन्म के संचित शुद्धता को कम करो या अधिक संग्रहित कर लो। यह मेंरे इस जीवन से सार्वजनिक रूप से प्रमाणित है।
83. महान व्यक्ति का जन्म विशेष रूप से नहीं होता है। प्रत्येक व्यक्ति ही महान व्यक्ति है। यह महानता प्राकृतिक सत्य के ज्ञान से उत्पन्न होती है। तथा उसका पुष्टिकरण कार्यों द्वारा होती है।
84. हम प्राकृतिक सत्य का अध्ययन करते हुए चाहे जितना भी विज्ञान युक्त क्यों न हो जाये। हम प्राकृतिक सत्य से आगे नहीं जा सकते क्योकि यह मानवीय ज्ञान से ही उत्पन्न है। हमारा ज्ञान तभी स्थायित्व एवम् संतुलन को प्राप्त करेगा जब हम सम्पूर्ण रूप से प्राकृतिक सत्य के ज्ञान से युक्त एवं आवश्यकताओं से तृप्त हो जायेगा।
85. मनुष्य अपनी परिस्थितियों का निमार्णकत्र्ता, नियंत्रणकर्ता एवम् भोगकर्ता है। यह यदि स्वयं के अज्ञानता के कारण उत्पन्न हुई हैं। तो भक्ति और ईश्वर जैसी भावना को उत्पन्न करता है। यदि दूसरे के अज्ञानता के कारण उत्पन्न हुयी है तो स्वयं में ज्ञान को उत्पन्न करता है। यदि ज्ञान द्वारा स्वयं तथा समाज के विकास के लिए उत्पन्न की गयी है तो राजनीति कहलाती है तथा यही सिर्फ स्वयं के विकास के लिए उत्पन्न की गयी है तो कूटनिति कहलाती है। जो भविष्य किये गये कार्यो द्वारा स्पष्ट होती है।
86. जो सपने देखता है, वह सोचता है। जो सोचता है, वह कार्य करता है। जो गलतियाँ करता है, वह गलतियाँ सुधारता है। जो गलतियाँ सुधारता है, वह सफल होता है।
87. धन अर्जित करने की इच्छा मनुष्य का गुण है, जो उसके स्थायित्व प्राप्ति के लिए आवश्यक भी है लेकिन इसे प्राप्त करने के लिए कौन से रास्ते अपनाने पड़े इसी से उसके चरित्र का मूल्यांकन होता है।
88. वर्तमान समय के विज्ञान युग में प्रत्येक व्यक्ति संसाधनो के लिए बहुत परेशान है। फिर भी व्यक्ति स्वतः के विकास के लिए कम, दूसरों के विनाश और सलाह के लिए अधिक सोचता है। यह विनाश का रास्ता है। और जब यह एक परिवार, संगठन, देश, राष्ट्र में उत्पन्न हो जाए तो विनाश निश्चित है।
89. इस संसार में मानव के लिए कुछ भी असंभव नहीं है। जो आज असंभव लग रहा है उसे मानव कल अवश्य प्राप्त कर लेगा। यह मानव का ऐसा गुण है जिसके कारण वह विकास की चरम सीमा को प्राप्त कर विनाश को प्राप्त करेगा।
90. प्रकृति के सभी जीव गंुणों में अलग-अलग है। जिससे उनकी पहचान होती हैै। कुछ जीव ऐसे भी है जो समरूप है। उनमें मनुष्य के अन्दर सिर्फ सोचने की क्षमता उत्पन्न हो जाने के कारण जीवन रहस्य मतभेदों में उलझ गया। जिनमे मानव आविष्कृत एक रास्ते को उचित कहना असम्भव है।
91. इस प्रकृति के सभी जीव, प्रकृति में उपलब्ध पदार्थाें को उपभोग करते है। प्रकृति के जीवों में मानव एवम् सूकर सर्वाहारी है मानव भोजन से मन को जोड़कर करता है इसलिए वह इसे धर्म से जोड़ता है जबकि धर्म और भोजन का कोई सम्बन्ध नहीं है।
92. विकास, उस सामाजिक, आर्थिक, मानसिक, शारीरिक के संतुलन विकास को प्रदर्शित करता है। जिससे स्थायित्व एवं संतुलन प्राप्त होता है।
93. सम्पूर्ण विश्व के मानव समाज से हमारा कहना है कि कम से कम वे सामाजिक नेतृत्व के चुनाव में स्वयं को निःस्वार्थ करें। क्योंकि इस गलत नेतृत्व के चुनाव से सम्पूर्ण विश्व प्रभावित होता है। जिसका प्रभाव उन पर भी पड़ता है इस अव्यवस्था के जिम्मेदार हम स्वयं होते है।
94. यदि हमें कुछ पाना है तो स्वयं अपने लिए हमें जासूसी करना होगा कि हम कौन है ? हम क्या चाहते है ? हमारा अस्तित्व क्यों है ? हम मानव के विभिन्न स्तर में कहाँ है ? हमनें जो खोया उसके बदले मंे निश्चित रूप से मिला, वह क्या है ? मानव का सबसे कठिन कार्य, स्वयं का समाज में मूल्यांकन ज्ञात करना है। जिसके आधार पर वह परिस्थितियों को मुट्ठी में रख सकता है।
95. जिस प्रकार हम राजतंत्र से निकल कर प्रजातंत्र की ओर आ गये है। उसी प्रकार हम साम्राज्यवादी व्यवस्था से निकल कर राष्ट्रवादी व्यवस्था में सीमा बद्ध हो गये है। यह प्रजातंत्र समाजवादी व्यवस्था है, न कि साम्राज्यवादी इसलिए राष्ट्रवादी व्यवस्था ही समाजवादी व्यवस्था है, न कि साम्प्रदायवादी व्यवस्था है।
96. ग्रामीण का व्यापक अर्थ, किसी मानव के उसके आर्थिक, मानसिक एवं शारीरिक स्तर से कम उपलब्धता को प्राप्त मानव को प्रदर्शित करता हैै। अर्थात प्रत्येक मानव के नीचे ग्रामीण मानव है। इनका विकास ही उस मानव का विकास है। जिनके उपर उनसें सम्बन्धित है। इनका विनाश या शोषण उस मानव को आर्थिक, मानसिक, शारीरिक रूप से अस्थिर एवं असंतुलित कर देता है।
97. प्राकृतिक सत्य दृश्य है यह देश (स्थिति)-काल (समय) मुक्त एवं विवाद मुक्त भी है। इसका ज्ञान ही उस अदृश्य विवादमुक्त कारण   सत्य-धर्म का ज्ञान है। यही ज्ञान ही मानव का सत्य-धर्म-ज्ञान है। यही ज्ञान ही सम्पूर्ण स्थिर ज्ञान है। यही ज्ञान मानव में प्रबन्धकीय क्षमता, नेतृत्व शीलता, दार्शनिक गुण एवं संचालक गुणों को जन्म देता है जिससे मानव महानता, स्थायित्व एवं संतुलन की ओर बढ़ता है।
98. विश्व, जिसे हम भूमण्डल (जल मण्डल सहित) या पृथ्वी के नाम से जानते है। इसके समस्त संसाधन के उपभोगकर्ता इस पर रहने वाले जीव है विश्व उनका है। इस पर वे स्वतंत्र थे। स्वतंत्र रहना चाहते है और स्वतंत्र विचरण की ओर बढ़ रहे है। मानव अपने ज्ञान का विकास कर सभी जीवों में श्रेष्ठ हो गया। वह भी इस विश्व में स्वतंत्र विचरण की ओर बढ़ रहा है। यह विश्व ही उसका राष्ट्र है, इस स्वतंत्रता में बाधा ही विवाद का कारण है।
99. यह न देखें कि अन्य को क्या प्राप्त हो रहा है। यह देखें कि आप क्या प्राप्त कर सकते है। अन्यथा कुछ भी प्राप्त न कर पायेगें। 
100. किसी व्यक्ति की महानता व सफलता, नौकरी प्राप्त कर जीवन यापन में निहित नहीं है। यह जीवन एक रंगमंच है जहाँ प्रदर्शन की आवश्यकता है, जितना अच्छा प्रदर्शन होगा, उतने ही महानता को हम प्राप्त होगे। सभी प्रदर्शन का निर्देशन इच्छाओं को प्राप्त करने का दृढ़ संकल्प करता है।
101. संस्कृति, मानव समाज के रहन-सहन की स्थिति है जो साहित्य द्वारा व्यक्त होता हैै। इस संस्कृति को कभी हम एक समान न रख पायें है। और न रख पायेंगंे।
102. सफलता कीमत मांगती है, सफलता जितनी बड़ी होगी, कीमत उतनी ऊँची होगी। लेकिन विफलता कि कीमत चूकाने की अपेक्षा सफलता की कीमत चूकाना हमेशा बेहतर है।
103. आधुनिकता, विज्ञान के ज्ञान के नवीनतम उपलब्धियों को व्यवहार में लाना है। जिससे विकास होता है। ज्ञान स्थिर एवं विज्ञान गतिशील होता है। विज्ञान के गति के साथ ही विकास होता है। नवीनतम उपलब्धियों को व्यवहार में लाना ही अनुकूलन है।
104. धर्म केवल ज्ञान से सम्बन्धित है। यह मंत्र, तंत्र, यंत्र, पूजास्थल, ग्रन्थ, वेशभूषा, भोजन, संस्कृति, रहन-सहन, दाह संस्कार विधि से कोई     सम्बन्ध नहीं रखता। यह मात्र मानव अविष्कृत धर्मो (वाद) के आविष्कारों के द्वारा अपने मानव को संस्कारित एवं स्वयं के अस्तित्व के पहचान के लिए निर्धारित है।
105. ईश्वर, अल्ला, गाॅड इत्यादि शब्द, सूक्ष्म विज्ञान द्वारा उत्पादित या अविष्कृत शब्द है। जो मानव के सूक्ष्म कारण केन्द्रित अस्थिर मन को स्थिरता प्रदान करतें है।
106. शिक्षा मानव ज्ञान के बढ़ाने का साधन है। माध्यम है। जिसका स्वरूप स्थिर ज्ञान अर्थात प्राकृतिक सत्य का ज्ञान, गतिशील ज्ञान अर्थात विज्ञान का ज्ञान तथा उनको व्यक्त करने का भाषा ज्ञान के सम्मिलित रूप से पूर्ण शिक्षा कहलाती है।
107. विनाश, विकास के मुख्य घटक सामाजिक, आर्थिक, मानसिक, शारीरिक से असंतुलित विकास का परिणाम है। जिससे स्थायित्व एवम् संतुलन प्राप्ति में बाधा पहुँचती है।
108. विषय, मन द्वारा अनुभूति की जाने वाली समस्त तथ्य है। जो विषय देश-काल बद्ध हैं वे दृश्य विषय है। जो देश काल मुक्त है वे अदृश्य विषय हैंै। देश-काल मुक्त दृश्य विषय सिर्फ एक विषय प्राकृतिक सत्य है।
109. सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड, प्राकृतिक सत्य द्वारा प्रभावित क्षेत्र है। जिसमें मानव भी शामिल हैै। इसलिए मानव प्रकृति के सभी विषयों से प्रभावित होता है। यह सम्बन्द्ध ही विज्ञान का सम्पूर्ण स्रोत है। यह प्रभाव दिनों दिन बढ़ता जा रहा है। क्योंकि मानव प्रकृति से दूर हटता जा रहा है।
110. स्वर, भाषा का ध्वनि रूप है। जिसकी तीव्रता से मन की स्थिति की अभिव्यक्ति स्पष्ट होती है।
111. मानक, एक ऐसा दृश्य, विवादमुुक्त सर्वमान्य विषय है। जिसके आधार पर विषयोें का मूल्यांकित एवम् परिभाषित किया जाता है। मानव समाज के सभी विषयों का सम्पूर्ण मानक प्राकृतिक सत्य-धर्म-ज्ञान है। जो देश-काल एवम् विवादमुक्त है तथा दृश्य भी है।
112. विज्ञान का उपयोग धर्म तथा दुरूपयोग अधर्म का स्वरूप होता है। चाहे वह सूक्ष्म विज्ञान हो या स्थूल विज्ञान।
113. कार्य सूक्ष्म हो या स्थूल उसका मूल पाँच कर्म ही है। ये हैं आदान-प्रदान, ग्रामीण, आधुनिकता, विकास एवम् शिक्षा को प्राकृतिक सत्य और धर्म के ज्ञान से युक्त होकर इसी की ओर आगे बढ़ाना, ये कार्य ही कर्म योग है।
114. मनुष्य परिस्थितियों का दास अवश्य है। लेकिन वह मृत्यु जैसी परिस्थिति का दास पूर्णरूप से है। शेष परिस्थितियांे का दास वह नहीं है। यदि वह है तो उस व्यक्ति के ज्ञान की स्थिति को कमजोर रूप में प्रकट करता है। जिसे वह आध्यात्म (अदृश्य आध्यात्म) या प्राकृतिक सत्य (दृश्य आध्यात्म) के द्वारा शक्तिशाली बना सकता है।
115. देश-काल मुक्त दृश्य ज्ञान अर्थात प्राकृतिक सत्य ज्ञान, एकता, शान्ति एवम् आत्मनिर्भरता को तथा देश-काल मुक्त अदृश्य ज्ञान अर्थात मानव अविष्कृत धर्म का ज्ञान विभिन्नता, अशान्ति एवम् समर्पण को उत्पन्न करता है।
116. शिक्षा का उद्देश्य धन अर्जित करना तो है। जो उसे स्थायित्व प्रदान करता है। साथ ही समाज को उचित आवश्यकता प्रदान करना, अन्याय और भ्रष्टाचार के विरूद्ध आवाज भी उठाना है जो अपनत्व एवम् स्वार्थ की भावना से पूर्णतया मुक्त हो।
117. सभी मानव, धर्म में ही स्थित है लेकिन उसके ज्ञान की आवश्यकता मात्र एक ही कारण से होती है वह यह कि धर्म ज्ञानी अपने प्रत्येक कार्यो को लगातार समष्टि की ओर ले जाता है जिससे उसका परिणाम स्वंय एवं समाज के लिए अच्छा होता है जबकि धर्म अज्ञानी इसके विपरीत।
118. धर्म स्थापना का कार्य एक ही सूत्र से होता है वह यह कि समष्टि (समाज) का मन जिस अवस्था तक पहुँच गया है वहाँ से उसका केन्द्रियकरण। अदृश्य (व्यक्तिगत प्रमाणित) काल में यह अदृश्य ईश्वर नाम के दर्शन द्वारा तथा दृश्य (सार्वजनिक प्रमाणित) काल में यह दृश्य ईश्वर नाम के दर्शन द्वारा होता है। यही ईश्वर की स्थिरता का रहस्य भी है। केन्द्रियकरण का अर्थ मन को उसकी प्रकृति में स्थापित करना होता है।
119. धर्म स्थापना का कार्य ईश्वर की कार्यप्रणाली के अनुसार कोई भी मानव करने के लिए स्वतन्त्र है लेकिन समष्टि को धर्मपालन के लिए प्रेरित एवं लगातार धर्म में बाॅधे रहने का कार्य करने वाला ब्राह्मण कहलाता है तथा धर्म स्थापना करने वाला साकार ब्रह्म (अवतार) कहलाता है।
120. धर्म स्थापना की आवश्यकता तभी पड़ती है जब धर्मज्ञान पूर्ण लुप्त हो जाता है। तब धर्म ज्ञानी ईश्वर की कार्यप्रणाली के अनुसार मानव शरीर द्वारा ज्ञान उपलब्ध करा देता है जिससे एकता, स्थिरता एवं शान्ति के साथ सभी विषय अपने शुद्ध अर्थ को प्राप्त हो जाते है।
121. सबसे बड़ा अधर्म तो तब होता है जब व्यक्ति उसी धर्म के रक्षार्थ नियुक्त होता है और सत्य का साक्षात्कार होने के बाद भी निष्क्रीय रहता है। 
122. आशीर्वाद देना हमारी सत्य संस्कृति है। आशीर्वाद देने वाला सत्य प्रेमी है। आशीर्वाद देकर अपने शब्दों को सत्यापित करने के लिए कर्म करना सत्य सम्बन्ध उत्पन्न करता है। यह एक ओर से होने पर अधूरा सम्बन्ध तथा दो या कई ओर से होने पर ईश्वरीय समाज को उत्पन्न करता है। जहाँ एकता एवं शान्ति का प्रयत्न है, वहीं धर्म है।
123. धर्मज्ञान की पूर्ण लुप्तता का आभास मूल तीन सम्बन्धो में विवाद से ही प्रकट हो जाता है- रक्त सम्बन्ध (निकटस्थ), रिश्ता सम्बन्ध (मध्यस्थ) एवं देश सम्बन्ध (दूरस्थ)। श्री राम (ब्रह्मा के पूर्णावतार) देश सम्बन्ध, श्री कृष्ण (विष्णु के पूर्णावतार) रिश्ता सम्बन्ध कारण से व्यक्त हुये थे। अब शिव-शंकर के पूर्णावतार का कारण, रक्त सम्बन्ध ही होगा। 
124. मुझे वेद, पुराण, अन्य धर्म पुस्तको, दर्शन, जीवनी, भाषा और आधुनिक शास्त्र इत्यादि के विशेष अध्ययन का अवसर नहीं मिला। मैं सिर्फ इतना जानता हूँ कि उन सभी महापुरूषांे के सपनांे का समाज कैसा होना चाहिए, जो इतिहास के अनुभव से युक्त एवं दर्शन, पुराण अन्य धर्म पुस्तकों द्वारा समर्थित हो, विवादमुक्त हो और उसे मैं व्यक्त कर सकूँ। जो वर्तमान मानव समाज की आवश्यकता भी है। मैं तो मात्र उस दृश्य कर्म ज्ञान को उपलब्ध करा रहा हूॅ। 
125. मानव जीवन में अब इतने अधिक विषय हो गये है कि ज्ञान के लिए उन्हे सिर्फ एक शास्त्र की आवष्यकता हो गयी है जिससे वे शीघ्रताशीघ्र मूल सत्य ज्ञान से जुड़ जाये। और जीवन निर्वाह के लिए विज्ञान के ज्ञान के लिए समय बच जाये।
126. व्यक्ति जब पूर्ण अदृश्य काल में हो तो उसे अदृश्य कर्मज्ञान के अनुसार तथा जब पूर्ण दृश्य काल में हो तो उसे दृश्य कर्मज्ञान के अनुसार कर्म करने चाहिए। तभी वह ब्रह्माण्डीय विकास के लिए धर्म युक्त कार्य करेगा।
127. समाज में जब व्यष्टि धर्म की अधिकता होती है, तब अव्यवस्था बढ़ती है। और जब समष्टि धर्म की अधिकता होती है तब समाज व्यवस्थित रहता है। धर्म युक्त समाज तब होता है जब अधिकतम व्यक्ति दोनो धर्माे अर्थात व्यष्टि व समष्टि धर्म पर समान दृष्टि रखते हुए कार्य करते है।
128. ज्ञान से आप है, ज्ञान से ही मैं हूँ। ज्ञान से पूजा स्थल है। ज्ञान से ही चाॅद है। ज्ञान से ही सूर्य है। ज्ञान से ही ईश्वर हैं। अल्ला और गाॅड है। ज्ञान से ही धर्म है। ज्ञान से ही धन है ज्ञान नहीं तो न ही ये विषय हैं, न ही किसी विषय की अनुभूति है। अर्थात ज्ञान ही धर्म है। ज्ञान ही सत्य है। यह ज्ञान यदि देश काल मुक्त दृश्य है तो सर्वमान्य सत्य-धर्म-ज्ञान है, यदि देश काल मुक्त अदृश्य है तो विवादयुक्त     सत्य-धर्म-ज्ञान है।
129. सत्य या ज्ञान या ईश्वर या आत्मा का सम्बन्ध वेशभूषा, रहन-सहन, भोजन, वातावरण इत्यादि बाह्य विषयों से नहीं होता। न ही उसे प्राप्त करने के लिए किसी प्रक्रिया की अनिवयार्यता ही है। से मात्र साधन अवश्य हो सकते है पर यह अतिआवश्यक नहीं है। मैं स्वयं सत्य प्राप्ति के लिए अदृश्य काल के निर्धारित उन सभी नियमों को तोड़कर व्यक्त हुआ हँू। मेरा यह जन्म इसका प्रत्यक्ष एवम् सार्वजनिक रूप से प्रमाणित जीवन है।
130. मैं अदृश्य मार्गदर्शन दर्शन से अव्यक्त रूप से विकसित होकर, दृश्य विकास दर्शन (दृश्य मार्गदर्शन दर्शन) द्वारा व्यक्त होकर स्थिरता, शान्ति एवम् एकता को प्राप्त होता हूँ। मुझे वे प्राप्त करते हैं जो अदृश्य मार्ग द्वारा मुझ तक आते हंै। और जो प्रवृति मार्ग अर्थात दृश्य मार्ग द्वारा मुझ तक आते हैं उनमें मै स्वयं होता हूँ। जो अदृश्य या दृश्य क्रियान्वयन दर्शन में उलझ जाते है उन्हें मैं इस जीवन में प्राप्त नहीं हो पाता।
131. मैं यह नहीं जानना चाहता कि आज के पहले समाज, देश, विश्व इत्यादि की व्यवस्था क्या थी? और आज क्या है? मै सिर्फ यह जानता हूँ कि क्या होनी चाहिए जो निष्पक्ष हो, निःस्वार्थ हो और वह सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त आधारित हो।
132. मुझे इस बात का दुःख है कि चाहकर भी मैं अपने नाम, मानव आविष्कृत धर्म व जाति से मुक्त नहीं हो सकता क्योंकि यह नाम, धर्म एवम् जाति ही वर्तमान समाज का मूल आधार है। यह उसी समाज द्वारा मुझे प्रदान किया गया है। मेरे न चाहने के बावजूद भी वह मेरे जीवन के साथ जोड़ा ही जायेगा एवम् उस आधार पर मूल्याकिंत भी किया जायेगा। मेरे जीवन में वह सबसे महत्वपूर्ण व महान व्यक्ति होगा जो मुझे ऐसे उपाय से अवगत करा दें जिससे मैं अपने नाम, जाति व धर्म से मुक्ति पा सकूँ ताकि मुझे मानव आविष्कृत धर्म व जाति से न जोड़ा जा सके।
133. मानव आविष्कृत धर्म कहता है बार-बार के जन्म-मृत्यु से मुक्त होना ही हमारा लक्ष्य है। जिसके कारण हम अपने जीवन को और दुःखमय बना देते है। लेकिन जब तक इस विश्व का प्रत्येक मानव साधारण ज्ञान से ज्ञानातीत अवस्था अर्थात प्राकृतिक सत्य के ज्ञान से युक्त एवम् व्यवहार मुद्रा को भावातीत नहीं कर लेता तब तक मैं मानव आविष्कृत धर्म के अनुसार जन्म-मृत्यु से मुक्त नहीं होना चाहता और बार-बार जन्म लेकर कर्म करना चाहता हँू।
134. तुम इस जन्म में या किसी जन्म में यदि मोक्ष या मुक्ति प्राप्त करना चाहते हो तो अपने मन की इच्छा को मार डालो। इस स्थिति में तुम्हारी स्थिति ऐसी होनी चाहिए कि तुम्हारा मन सभी विषयो में होते हुये भी किसी भी विषय में न रहे। क्योंकि यही मन की इच्छा सूक्ष्म शरीर के रूप में परिवर्तित होकर पुर्नजन्म के लिए बाध्य करता है। और तुम्हें सुख एवम् दुःख का अनुभव कराता है।
135. जहाँ सघर्ष है, वहीं चेतना है। इसके दो रूप हैं। प्रथम- चेतना जो दूसरों (मानव या प्रकृति) द्वारा उत्पन्न की जाती है तथा व्यक्ति उस परिस्थिति के अनुसार कार्य करता है, प्राकृतिक चेतना या व्यष्टि चेतना कहलाती है। दूसरी- चेतना जो स्वयं व्यक्ति द्वारा उत्पन्न की जाती है तथा व्यक्ति उस परिस्थिति के अनुसार कार्य करता है, सत्य चेतना या समष्टि चेतना कहलाती है। दूसरे रूप में प्राकृतिक चेतना केवल अन्य द्वारा उत्पन्न वर्तमान परिथितियों पर कार्य करना तथा सत्य चेतना परिणाम ज्ञान से युक्त, भूतकाल का अनुभव तथा भविष्य की आवश्यकतानुसार वर्तमान में कार्य करना है। अर्थात प्राकृतिक चेतना में आदान-प्रदान का नियंत्रण दूसरों के अधीन तथा सत्य चेतना में आदान-प्रदान का नियंत्रण स्वयं व्यक्ति के अधीन होता है।
136. मानव समाज को जानना चाहिए कि समग्र जगत, बहुरूप में प्रकाशित एक ही सत्ता है। जिसे आत्मा कहते है। इसलिए समष्टि आत्मा ही व्यष्टि आत्मा है। इस आत्मा का यथार्थ रूप जिस प्रकार व्यष्टि रूप में व्यक्त होता है, ठीक उसी प्रकार समयोपरान्त समष्टि रूप में भी व्यक्त होता है। एक ही सत्ता का व्यष्टि रूप एवम् समष्टि रूप में व्यक्त होने के बीच का समय ही विवाद, अविश्वास, अशान्ति, अनेकता इत्यादि का समय होता है। वर्तमान समय ऐसा ही समय है।
137. व्यष्टि क्रियाकलापों का स्वरूप ही समष्टि क्रियाकलापों में व्यक्त होता है। यदि सूक्ष्म दृष्टि से देखें तो व्यक्ति से व्यक्ति के सम्बन्ध के बीच एक न्यूनतम साझा कार्यक्रम है। इस सीमा को पार करने पर वह सम्बन्ध टूट जाता है। इसके समष्टि स्वरूप को व्यक्त करता भारत का लोकतंत्र है जिसमे ”न्यूनतम साझा कार्यक्रम“ कार्यक्रम व्यक्त हुआ। जिसका विकसित रूप ही ”विश्व का न्यूनतम एवम् अधिकतम साझा कार्यक्रम“ है। जब यही सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त से युक्त हो जायेगा तब वह विश्वमानक-शून्य श्रृंखला में अन्तिम को प्राप्त कर लेगा।
138. विश्व स्तरीय समस्यायें भी है। विश्व स्तरीय सत्य चेतना अर्थात एकता, शान्ति, स्थिरता की ओर बढ़ता कदम भी है। और समस्याओं का विवादमुक्त हल विश्वमानक-शून्य श्रृंखला अर्थात कर्मवेद: प्रथम, अन्तिम तथा पंचम वेद भी है।
139. मंै यह भलि-भाँति जानता हूँ कि यदि मैं वेशधारी सन्यासी या संत होता तो मुझे धन, समर्थन, यश आदि सभी कुछ प्राप्त हो जाता क्योंकि वर्तमान जन समुदाय में ऐसे कार्य को करने वालो के साथ ऐसा ही होता है। मैं ऐसा इसलिए नहीं होना चाहता कि फिर मैं यह कैसे कह सकता हूँ कि तुम में से प्रत्येक व्यक्ति यह कार्य कर सकता है। क्योंकि तुम सब शुद्ध, बुद्ध एवम् मुक्त आत्मा हो और यह शक्ति तुम में भी विद्यमान है। तुम सब मेरे स्वरूप ही हो।
140. सत्य, आत्मसात करने का विषय है न कि विचार करने का विषय।
141. जो मन कर्म में न बदले वह मन नहीं और व्यक्ति का अपना स्वरूप नहीं।
142. ज्ञान को जानो, वाणी को जान जाओगे। प्रेम को जानो, कर्म को जान जाओगे। ध्यान को जानो, समर्पण को जान जाओगे। क्योंकि ज्ञान, प्रेम और ध्यान का ही व्यक्त रूप वाणी, कर्म और समर्पण है। वाणी, कर्म और समर्पण को जान लेने पर तुम व्यक्ति को जान जाओगे।
143. आजीवन प्रयोगशाला के तरह कर्मो का प्रयोग करके ज्ञान की ओर जाने से अच्छा है, कुछ समय अकर्मण्य होकर पहले ज्ञान पर प्रयत्न करना।
144.  मन की व्यापकता ही शक्ति है और मन की संकीर्णता ही दुर्बलता है। मन का विषयों से मुक्त होना ही ”मुक्ति“ अर्थात ”निर्वाण“ या ”मोक्ष“ है। और ऐसी अवस्था में होकर कर्म करना ही कर्मयोग है। अनासक्त कर्म है।
145. विज्ञान से संसाधन तथा ज्ञान से जीवन का निर्माण होता है।
146. यह न देखें कि अन्य को क्या प्राप्त हो रहा है। यह देखें कि आप क्या प्राप्त कर सकते हैं। अन्यथा आप कुछ भी प्राप्त न कर पायेगें।
147. मनुष्य को भाग्य से ज्यादा नहीं बल्कि उसके ज्ञान, ध्यान और कर्म से ज्यादा कुछ भी प्राप्त नहीं होता।