Wednesday, April 15, 2020

संग, सान्निध्य और पत्रावली

संग, सान्निध्य और पत्रावली

संग में और सान्निध्य में
01. हमारे देश में जो कुछ है सो वेदान्त धर्म ही है। पाश्चात्य के साथ तुलना करने से यह कहना ही पड़ता है कि हमारी सभ्यता उसके पासंग भर भी नहीं है, परन्तु धर्म के क्षेत्र में यह सार्वभौमिक वेदान्तवाद ही नाना प्रकार के मतावलम्बियों को समान अधिकार दे रहा है। इसके प्रचार से पाश्चात्य सभ्य संसार को विदित होगा कि किसी समय में भारतवर्ष में कैसे आश्चर्यजनक धर्म-भाव का स्फुरण हुआ था और वह अब तक वर्तमान है। (विवेकानन्द जी के संग में, पृष्ठ-3)
02. हिन्दुओं के बारह महीनों में कितने ही पर्व होते हैं और उनका उद्देश्य यही है कि धर्म में जितने बड़े बड़े भाव है उनको सर्वसाधारण में फैलायें। परन्तु इसमें एक दोष भी है। साधारण लोग इनका यथार्थ भाव न जान उत्सवों में ही मग्न हो जाते हैं और उनकी पूर्ति होने पर कुछ लाभ न उठा ज्यों के त्यों बने रहते हैं। इस कारण ये उत्सव धर्म के बाहरी वस्त्र के समान धर्म के यथार्थ भावों को ढांके रहते हैं। (विवेकानन्द जी के संग में, पृष्ठ-27)
03. अवतार तुल्य महापुरुष लोग समाधि अवस्था से जब “मैं“ अैर “मेरा“ राज्य में लौट आते हैं तब वे प्रथम ही नाद का अनुभव करते हैं। फिर नाद के स्पष्ट होने पर आंेकार का अनुभव करते हैं। ओंकार के पश्चात् शब्दमय जगत् का अनुभव कर अन्त में स्थूल पंच भौतिक जगत् को प्रत्यक्ष देखते हैं। किन्तु साधारण साधक लोग अनेक कष्ट सहकर यदि किसी प्रकार से नाद के परे पहुंचकर ब्रह्म की साक्षात् उपलब्धि करे भी, तो फिर जिस अवस्था में स्थूल जगत का अनुभव होता है वहां वे उतर नहीं सकते-ब्रह्म में ही लीन हो जाते हैं-“क्षीरे नीरवत्“। (विवेकानन्द जी के संग में, पृष्ठ-63)
04. मन में ऐसे भाव उदय होते हैं कि यदि जगत् के दुःख दूर करने के लिए मुझे सहस्त्रों बार जन्म लेना पड़े तो भी मैं तैयार हूँ। इससे यदि किसी का तनिक भी दुःख दूर हो, तो वह मैं करूंगा और ऐसा भी मन में आता है कि केवल अपनी ही मुक्ति से क्या होगा। सबको साथ लेकर उस मार्ग पर जाना होगा। (विवेकानन्द जी के संग में, पृष्ठ-67)
05. श्रीरामकृष्ण देव के अन्तर्धान होने पर स्वामी जी ने उपनिषदादि शास्त्रों में वर्णित संन्यास लेने की पद्धतियों को मंगवाकर उनके अनुसार श्रीगुरुदेव के चित्र के सम्मुख रखकर अपने गुरु भाईयों के साथ वैदिक मत से संन्यास ग्रहण किया था। (विवेकानन्द जी के संग में, पृष्ठ-71)
06. श्रीरामकृष्ण सिद्धाईयों की बड़ी निन्दा किया करते थे। वे कहा करते थे कि इन शक्तियों के प्रकाश की ओर मन लगाये रखने से कोई परमार्थ तत्वों को नहीं पहुंचता; परन्तु मनुष्य का मन ऐसा दुर्बल है कि गृहस्थों का तो कहना ही क्या है, साधुओं में भी चैदह आने लोग सिद्धाई के उपासक होते हैं। पाश्चात्य देशों में लोग इन जादुओं को देखकर निर्वाक हो जाते हैं। सिद्धाई लाभ करना बुरा है और वह धर्मपथ में विध्न डालता है। (विवेकानन्द जी के संग में, पृष्ठ-82)
07. समस्त ब्रह्माण्ड जब नित्य आत्मा ईश्वर का ही विराट शरीर है तब विरोध-विशेष स्थानों (तीर्थस्थान) के महात्म्य में आश्चर्य की क्या बात है? विशेष स्थानों पर उनका विशेष विकास है। कहीं पर आप ही से प्रकट होते हैं और कहीं शुद्ध सत्य मनुष्य के व्याकुल आग्रह से प्रकट होते हैं। फिर भी यह तुम निश्चित जानो कि इस मानव शरीर की अपेक्षा और कोई बड़ा तीर्थ नहीं है। इस शरीर में जितना आत्मा का विकास हो सकता है उतना और कहीं नहीं। (विवेकानन्द जी के संग में, पृष्ठ-98)
08. छात्रजीवन में (स्वामी विवेकानन्द) दिन भर अपने साथियों के साथ आमोद-प्रमोद में ही रहते थे। रात को घर के द्वार बन्द कर अपना अध्ययन करते थे। दूसरे किसी को यह नहीं जान पड़ता था कि वे कब अपना अध्ययन कर लेते थे। (विवेकानन्द जी के संग में, पृष्ठ-102)
09. इस संसार में निरी दुनियादारी है जो यथार्थ, साहसी और ज्ञानी है। वह क्या ऐसी दुनियादारी से कभी घबड़ाता है? “जगत चाहे जो कहे, क्या परवाह है, मैं अपना कत्र्तव्य पालन करता चला जाऊँगा“ यह वीरों की बातें हैं। यदि “वह क्या कहता है और क्या लिखता है“ ऐसी ही बातों पर रात-दिन ध्यान रहे तो जगत् में कोई महान कार्य हो ही नहीं सकता। (विवेकानन्द जी के संग में, पृष्ठ-105)
10. बहुत दिनों तक मास्टरी करने से बुद्धि बिगड़ जाती है। ज्ञान का विकास नहीं होता। दिन रात लड़कों के बीच रहने से धीरे-धीरे जड़ता आ जाती है; इसलिए आगे अब मास्टरी न कर। (विवेकानन्द जी के संग में, पृष्ठ-126)
11. जाकर सभी को यह बात सुना “तुम्हारे भीतर अनन्त शक्ति मौजूद है, उसी शक्ति को जागृत करो।“ केवल अपनी मुक्ति प्राप्त कर लेने से क्या होगा? मुक्ति की कामना भी तो महा स्वार्थपरता है। छोड़ दे ध्यान, छोड़ दे मुक्ति की आकांक्षा-मैं जिस काम में लगा हूँ उसी में लग जा। (विवेकानन्द जी के संग में, पृष्ठ-161)
12. अतः जब कर्म करके उसे शान्ति प्राप्त नहीं होती तभी साधक कर्मत्यागी बनता है। परन्तु देह धारण करके मनुष्य को कुछ न कुछ लेकर तो रहना ही होगा-क्या लेकर रहेगा बोल? इसलिए साधक दो चार सत्कर्म करता जाता है, परन्तु उस कर्म के फलाफल की आशा नहीं रखता, क्योंकि उस समय उसने जान लिया है कि उस कर्मफल में ही जन्म मृत्यु के नाना प्रकार के अंकुर भरे पड़े हैं। इसलिए ब्रह्मज्ञ व्यक्ति सारे कर्म त्याग देते हैं-दिखाने के दो चार कर्म करने पर भी उनमें उनके प्रति आकर्षण बिल्कुल नहीं रहता। ये ही लोग शास्त्र में निष्काम कर्मयोगी बताये गये हैं। (विवेकानन्द जी के संग में, पृष्ठ-193)
13. निष्क्रियता, हीनबुद्धि और कपट से देश छा गया है। क्या बुद्धिमान लोग यह देखकर स्थिर रह सकते हैं? रोना नहीं आता? मद्रास, बम्बई, पंजाब, बंगाल-कहीं भी तो जीवनी शक्ति का चिन्ह दिखाई नहीं देता। तुम लोग सोच रहे हो, “हम शिक्षित हैं“ क्या खाक सीखा है? दूसरों की कुछ बातों को दूसरी भाषा में रटकर मस्तिष्क में भरकर, परीक्षा में उत्तीर्ण होकर सोच रहे हो कि हम शिक्षित हो गये हैं। धिक्धिक्, इसका नाम कहीं शिक्षा है? तुम्हारी शिक्षा का उद्देश्य क्या है? या तो? क्लर्क बनना या एक दुष्ट वकील बनना, और बहुत हुआ तो क्लर्की का ही दूसरा रूप एक डिप्टी मजिस्टेªट की नौकरी यही न? इससे तुम्हे या देश को क्या लाभ हुआ? (विवेकानन्द जी के संग में, पृष्ठ-196)
14. सर्वेश्वर कभी भी विशेष व्यक्ति नहीं बन सकते। जीव है व्यष्टि; और समस्त जीवों की समष्टि है, ईश्वर। जीव में अविद्या प्रबल है; ईश्वर विद्या और अविद्या की समष्टि रूपी माया को वशीभूत करके विराजमान है और स्वाधीन भाव से उस स्थावर-जंगमात्मक जगत को अपने भीतर से बाहर निकाल रहा है। परन्तु ब्रह्म उस व्यष्टि-समष्टि से अथवा जीव-ईश्वर से परे है। ब्रह्म का अशंाश भाग नहीं होता। (विवेकानन्द जी के संग में, पृष्ठ-207)
15. मुख्य बात है मन को एकनिष्ठ बनाना। एक विषय में निष्ठा होने से मन की एकाग्रता होती है अर्थात् मन की अन्य वृत्तियाँ शान्त होकर एक विषय में ही केन्द्रित हो जाती है। बहुतों का बाहर की नियमनिष्ठा या विधि निषेध के झंझट में ही सारा समय बीत जाता है, फिर उसके बाद आत्मचिंतन करना नहीं होता। दिन रात विधि निषेधों की सीमा से आबद्ध रहने से आत्मा का प्रकाश कैसे होगा? जो आत्मा का जितना अनुभव कर सका उसके विधि निषेध उतने ही शिथिल हो जाते हैं। (विवेकानन्द जी के संग में, पृष्ठ-227)
16. सच्चे मनुष्य वही हैं जो इस सुख-दुख के द्वन्द्व-प्रतिघातों से तंग आकर भी विवेक के बल पर उन सभी को क्षणिक मान आत्मप्रेम में मग्न रहते हैं। मनुष्य तथा दूसरे जीव-जानवरों में यही भेद है जो चीज जितनी निकट होती है, उसकी उतनी ही कम अनुभूति होती है। आत्मा निकट से निकट है, इसलिए असंयत चंचल चित्त जीव उसे समझ नहीं पाते। (विवेकानन्द जी के संग में, पृष्ठ-246)
17. आखिर इस उच्च शिक्षा के रहने या न रहने से क्या बनता बिगड़ता है? यह कहीं ज्यादा अच्छा होगा कि यह उच्च शिक्षा प्राप्त कर नौकरी के दफ्तरों को खाक छानने के बजाय लोग थोड़ी सी यान्त्रिक शिक्षा प्राप्त करे जिससे काम-धन्धे में लगकर अपना पेट तो भर सकेंगे। (विवेकानन्द जी के सान्निध्य में, पृष्ठ-5)
18. पर ब्राह्मण का पुत्र सर्वदा ब्राह्मण ही नहीं होता, यद्यपि उसके ब्राह्मण होने की सम्भावना अवश्य रहती है। जाति से ब्राह्मण होना और गुणों से ब्राह्मण होना-ये दो भिन्न बातें हैं। भारत वर्ष में ब्राह्मण कुल मंे जन्म लेने से कोई ब्राह्मण कहलाने लगता है, पर पश्चिम में यदि कोई ब्राह्मण गुण युक्त हो तो उसे ब्राह्मण ही मानना चाहिए। यह स्पष्ट है कि मनुष्य के लिए एक जाति से दूसरी जाति में चला जाना सम्भव है। यदि नहीं है तो विश्वामित्र ब्राह्मण कैसे बन सके और परशुराम क्षत्रिय कैसे बन सके? (विवेकानन्द जी के सान्निध्य में, पृष्ठ-34)

पत्रावली
01. ब्रह्म ज्ञानी को भोजन किसी परिश्रम के बिना अपने आप मिल जाता है। वह जहाँ पाता है पानी पी लेता है, वह स्वेच्छानुसार सर्वत्र विचरण करता है-वह निर्भय, कभी जंगल में और कभी श्मशान में सो जाता है और जिस मार्ग पर जाने से वेद भी शेष हो जाते है, वहाँ वह संचरण करता है। वह बालको की तरह दूसरों की इच्छानुसार परिचालित होता है, कभी नंगा, कभी वस्त्रालंकारमण्डित रहता है। और कभी कभी तो उसका आच्छादन ज्ञान मात्र रहता है, कभी अबोध बालक की भाँति, कभी उन्मत्त के समान और कभी पिशाचवत् व्यवहार करता है। (पत्रावली भाग-1, पृष्ठ-40)
02. मैं व्याख्यान देते देते और इस प्रकार के निरर्थक वाद से थक गया हूँ। सैकड़ों प्रकार के मानवी पशुओं से मिलते-मिलते मेरा मन अशान्त हो गया है। मैं मेरी मनोनुकूल बात आपको बतलाता हूँ। मैं लिख नहीं सकता, मैं बोल नहीं सकता, परन्तु मैं गम्भीर विचार कर सकता हूँ और जब मुझे स्फुर्ति आ जाती है तो अग्निरूपी वचन बोल सकता हूँ। परन्तु यह होना चाहिए कुछ चुने हुए, केवल चुने हुये लोगों के सामने ही। वे यदि चाहे तो मेरे विचारों को ले जाकर चारों और फैला दे-परन्तु यह मैं नहीं कर सकता। यह तो कर्म का ठीक ही बंटवारा है, एक ही आदमी सोचने में और विचारों के प्रसार करने में सफल नहीं हो सकता। इस तरह के दिये हुए विचारों का मूल्य कुछ नहीं होता। सोचने वाले मनुष्य को अन्य कार्यों से मुक्त होना चाहिए, विशेषतः जबकि विचार आध्यात्मिक हो। (पत्रावली भाग-1, पृष्ठ-117)
03. पूर्णता का मार्ग यह है कि स्वयं पूर्ण बनने का प्रयत्न करना तथा कुछ थोड़े से स्त्री-पुरुषों को पूर्ण बनाने का प्रयत्न करना। “भला करने“ का मेरा यह अर्थ है कि कुछ असाधारण योग्यता के मनुष्यों का विकास, न कि “भैंस के आगे बीन बजाकर“ समय, स्वास्थ्य और शक्ति का नाश करना। (पत्रावली भाग-1, पृष्ठ-118)
04. मेरा जी चाहता है कि कुछ वर्षों तक मैं चुप हो जाऊँ और बिल्कुल न बोलूं। मैं स्वभाव से ही स्वप्न के राज्य में विचरण करने वाला और कर्मविमुख हूँ। भौतिक वस्तुओं का स्पर्श मेरी दृष्टि को अस्थिर कर देता है और मुझे दुःखी बनाता है। परन्तु हरि-इच्छा पूर्ण हो! (पत्रावली भाग-1, पृष्ठ-118)
05. जिस देश में करोड़ांे मनुष्य महुए के फूल खाकर दिन गुजारते हैं, और दस बीस लाख साधु और दस बारह करोड़ ब्राह्मण उन गरीबों का खून चूसकर पीते हैं और उनकी उन्नति के लिए कोई चेष्टा नहीं करते, क्या वह देश है या नरक? क्या वह धर्म है या पिशाच का नृत्य? भाई, इस बात को गौर से समझो-मैं भारत वर्ष को घूमघाम कर देख चुका और इस देश को भी देखा-क्या बिना कारण के कहीं कार्य होता है? क्या बिना पाप के सजा मिल सकती है। (पत्रावली भाग-1, पृष्ठ-123)
06. मैंने एक योजना सोची तथा उसे कार्यान्वित करने का मैंने दृढ़ सकल्प किया। कन्याकुमारी में माता कुमारी के मन्दिर में बैठकर, भारतवर्ष की अन्तिम चट्टान पर बैठकर, मैंने सोचा कि हम जो इतने संन्यासी घूमते फिरते हैं और लोगों को दर्शनशास्त्र की शिक्षा दे रहे हैं, यह सब निरा पागलपन है। क्या हमारे गुरुदेव नहीं कहा करते थे कि खाली पेट से धर्म नहीं होता? (पत्रावली भाग-1, पृष्ठ-124)
07. हमारी जाति अपनी स्वतंत्र सत्ता खो बैठी है और यही भारत की सारी आपत्ति का कारण है। हमें जाति को उसकी खोई हुई स्वतंत्र सत्ता वापस देनी ही होगी और निम्न जातियों को उठाना होगा। हिन्दू, मुसलमान, ईसाई सभी ने उनको पैरो तले रौंदा है। उनका उठाने वाली शक्ति भी अन्दर से अर्थात् सनातनमार्गी हिन्दुओं से ही आयेगी। प्रत्येक देश में बुराइयां धर्म के कारण नहीं, बल्कि धर्म को न मानने के कारण ही विद्यमान रहती है। अतः धर्म का कोई दोष नहीं, दोष मनुष्य का है। (पत्रावली भाग-1, पृष्ठ-124)
08. वह हार प्रेम का हार है और वह धागा धनीभूत प्रेम का भावरूप अपूर्व धागा है। मूर्ख तुम इस रहस्य को नहीं जानते हो कि वह असीम तत्व प्रेम के बन्धन में फंसकर मेरी मुट्ठी के अन्दर आ चुका है। क्या तुम्हे यह पता नहीं है कि वे जगन्नाथ प्रेमडोर से बंध जाते हैं-क्या तुम यह नहीं जानते हो कि इस विशाल विश्व के संचालक वृन्दावन की गोपियों की नूपुरध्वनि के साथ नाचते फिरते थे। (पत्रावली भाग-1, पृष्ठ-140)
09. यह तो तुम्हंे पता ही है कि रूपया रखना, यहाँ तक कि रूपया छूना भी मेरे लिए कठिन है। इसे मैं अत्यन्त कष्टदायक कार्य समझता हूँ और इससे मन अधोगामी बन जाता है। अतः कार्य संचालन तथा आर्थिक मामलों की व्यवस्था के लिए तुम लोगों को संगठित होकर किसी समिति की स्थापना करनी ही होगी। यहाँ पर जो मेरे मित्र हैं-आर्थिक मामलों की व्यवस्था वे ही करते हैं। अर्थ-विषयक इस भयानक झंझट से मुक्ति मिलने पर ही मैं सुख के श्वास ले सकूँगा। अतः तुम लोग जितना शीघ्र संगठित होकर मन्त्री तथा कोषाध्यक्ष बनकर मेरे मित्र तथा सहायकों से स्वयं पत्र व्यवहार कर सको, उतना ही तुम्हारे तथा मेरे लिए मंगल है। (पत्रावली भाग-1, पृष्ठ-164)
10. आलासिंगा (एक मद्रासी मित्र), यह निश्चित जानना कि भविष्य में तुमकों अनेक महान कार्य करने होंगे। यदि तुम उचित समझो तो कुछ बड़े आदमियों को राजी कर समिति के कार्यकत्र्ताओं के रूप में उनका नाम प्रकाशित करना-उनके नाम से बहुत कुछ कार्य होंगे, किन्तु वास्तव में कार्य तुमको ही करना होगा। (पत्रावली भाग-1, पृष्ठ-165)
11. हम ठीक वैसे ही हैं। गुलाम कीड़े-पैर उठाकर रखने की भी ताकत नहीं-बीबी का आंचल पकड़े ताश खेलते और हुक्का गुड़गुड़ाते हुए जिन्दगी पार कर देते हैं, और अगर उनमें से कोई एक कदम बढ़ जाता है तो सब के सब उसके पीछे पड़ जाते हैं-हरे हरे! (पत्रावली भाग-1, पृष्ठ-234)
12. सैकड़ों युगों के उद्यम से चरित्र का गठन होता है। निराश न होओ। सत्य का एक शब्द भी लोप नहीं हो सकता। वह दीर्घकाल तक चाहे कूड़े के नीचे भले ही दबा पड़ा रहे, परन्तु शीघ्र हो या देर से हो, वह प्रकट होगा ही। सत्य अनश्वर है, पवित्रता अनश्वर है। मुझे सच्चे मनुष्य की आवश्यकता है, मुझे शंख-ढपोल चेले नहीं चाहिए। (पत्रावली भाग-1, पृष्ठ-241)
13. परन्तु वही महात्मा काम कर सकता है जो दूसरों में परमाणु के बराबर गुण देखकर उसे पर्वत के समान मानता है और जिसे जगत् की भलाई छोड़कर कोई भी इच्छा नहीं है-“परगुणपरमाणु पर्वतीकृत्य“ इसलिए जिनकी मन्द गति है, जिनकी बुद्धि अज्ञान में डूबी हुई है और जो अनात्मा को ही सर्वस्व मानते हैं उन्हें अपनी बाल-क्रीड़ा करने दो। जब वे प्रबल कष्ट का अनुभव करेंगे तब वे उसी क्षण छोड़ देंगे। उन्हें चन्द्रमा पर थूकने दो, वह थूक उलटकर उन्हीं पर पड़ेगी। (पत्रावली भाग-1, पृष्ठ-256)
14. मैं बराबर न्यूयार्क और बोस्टन के बीच यात्रा करता रहा। इस देश के ये दो ही बड़े केन्द्र है, जिनमें से बोस्टन की मस्तिष्क से तुलना की जा सकती है और न्यूयार्क की जेब से। दोनों स्थानों में आशातीत सफलता प्राप्त हुई है। मैं समाचार पत्रों के वर्णन से उदासीन हूँ, इसलिए तुम यह आशा मुझसे न करो कि उनमें से किसी के उल्लेख मैं तुम्हे भेजूंगा। काम आरम्भ करने के लिए थोड़े से शोर की आवश्यकता थी, वह जरूरत से अधिक हो चुका है। (पत्रावली भाग-1, पृष्ठ-273)
15. मुझे चुपचाप शान्ति से काम करना अच्छा लगता है और प्रभु हमेंशा मेरे साथ हैं। यदि तुम मेरे अनुगामी बनना चाहते हो तो सम्पूर्ण निष्कपट होओ, पूर्णरूप से स्वार्थ त्याग करो,. . . और सबसे अधिक पूर्णरूप से पवित्र बनो। मेरा आशीर्वाद हमेंशा तुम्हारे साथ है। इस अल्पायु में परस्पर प्रशंसा का समय नहीं है। संग्राम के बाद किसने क्या किया इसकी तुलना करेंगे और एक दूसरे की यथेष्ट प्रशंसा करेंगे। (पत्रावली भाग-1, पृष्ठ-275)
16. अगले जाड़े में मैं लौट रहा हूँ। दुनिया में आग फूंक दूंगा, जो मेरे साथ चाहे आये, उसका भाग्य अच्छा है; जो न आयेगा, इहकाल तथा परकाल वह पड़ा ही रह जायेगा, उसे पड़े रहने दो। कुछ परवाह नही, तुम लोगों के मुंह तथा हाथों पर बागदेवी का अधिष्ठान होगा, हृदय में अनन्तवीर्य श्री भगवान अधिष्ठित होंगे-तुम लोगों से ऐसे कार्य सम्पादित होंगे कि जिन्हें देखकर दुनिया आश्चर्यचकित हो उठेगी। (पत्रावली भाग-1, पृष्ठ-281)
17. मुझे संसार से मधुर व्यवहार करने का समय नहीं है, और मधुर बनने का प्रत्येक यत्न मुझे कपटी बनाता है। चाहे स्वदेश हो या विदेश, परन्तु इस मूर्ख संसार की प्रत्येक आवश्यकता पूरी करने की अपेक्षा तथा निरन्तर स्तर का आसार जीवन व्यतीत करने की अपेक्षा मैं सहस्त्र बार मरना अच्छा समझता हूँ। (पत्रावली भाग-1, पृष्ठ-291)
18. अन्तः प्रेरणा से मनुष्य को काम करना चाहिए और यदि वह काम शुभ और कल्याणप्रद है तो अपनी मृत्यु के पश्चात्, शताब्दियों के बाद, समाज की भावना में परिवर्तन अवश्य ही उत्पन्न होगा। मन, प्राण और शरीर से हमें काम में लग जाना चाहिए। और जब तक हम एक और एक ही आदर्श के लिए अपना सर्वस्व त्यागने को तैयार न रहेंगे तब तक हम कदापि आलोक नहीं देख पायेंगे। जो मनुष्य जाति की सहायता करना चाहते हैं उन्हें उचित है कि अपना सुख और दुःख, नाम और यश और सब प्रकार के स्वार्थ की एक पोटली बनाकर समुद्र में फेंक दे और तब वे ईश्वर के समीप आये। सब गुरुजनों ने यही कहा और किया है। (पत्रावली भाग-1, पृष्ठ-300)
19. मैं आपकी पत्रिका सम्बन्धी विचार से पूरी तरह सहमत हूँ, परन्तु यह सब करने के लिए व्यवसाय बुद्धि का मुझमें पूरा अभाव है। मैं शिक्षा और उपदेश दे सकता हूँ और कभी कभी लिख सकता हूँ, परन्तु सत्य पर मुझे श्रद्धा है। प्रभु मुझे सहायता देंगे और मेरे साथ काम करने के लिए मनुष्य भी वही देंगे। मैं पूर्णतः शुद्ध, पूर्णतः निष्कपट और पूर्णतः निःस्वार्थ रहूं-यही मेरी एकमेंव इच्छा है। (पत्रावली भाग-1, पृष्ठ-309)
20. श्रीरामकृष्ण की कृपा से किसी व्यक्ति के चेहरे की ओर देखते ही मैं अपने स्वाभाविक संस्कार के द्वारा तत्काल ही भांप लेता हूं कि वह व्यक्ति कैसा है और मेरी धारणा प्रायः ठीक हुआ करती है। (पत्रावली भाग-1, पृष्ठ-313)
21. हर काम को तीन अवस्थाओं में से गुजरना होता है-उपहास, विरोध और फिर स्वीकृति। जो मनुष्य अपने समय से आगे विचार करता है, लोग उसे निश्चय ही गलत समझते हैं, इसलिए विरोध और अत्याचार हम सहर्ष स्वीकार करते हैं। (पत्रावली भाग-1, पृष्ठ-335)
22. मैं बराबर यह देख रहा हूँ कि मानव जब वेदान्त के महान गौरव की उपलब्धि करने लगता है, तब मन्त्रतन्त्रादि अपने आप छूट जाते हैं। जिस समय मनुष्य को सत्य के किसी उच्चतर अवस्था विशेष का आभास मिलता है, तत्काल ही तद्विषयक निम्नतर अवस्था स्वतः ही विलुप्त हो जाती है। संख्या बाहुल्य का कोई महत्व नहीं है। असंगठित जनता सौ वर्ष में भी जिस कार्य को नहीं कर सकती, कुछ थोड़े से निष्कपट, संगठित तथा उत्साही युवक एक वर्ष के अन्दर उससे कहीं अधिक कार्य कर सकते हैं। एक देह की ताप उसके निकटवर्ती अन्यान्य देहों में भी संक्रमित होता है-प्रकृति का यही नियम है।(पत्रावली भाग-1, पृष्ठ-337)
23. यदि हम इतिहास को देखें तो विदित होगा कि जो विचारधारा सर्वश्रेष्ठ होगी वही जीवित रहेगी, और निष्कलंक चरित्र के समान अन्य ऐसी कौन सी शक्ति है जो मनुष्य को यथार्थ योग्यता प्रदान कर सकती है? विचारशील मनुष्य जाति का ही भविष्य धर्म-अद्वैत होगा, इसमें सन्देह नहीं। और सब सम्प्रदायों में उन्हीं की विजय होगी जो अपने जीवन में सब से अधिक चरित्र का उत्कर्ष दिखा सकेंगे-चाहे वे सम्प्रदाय कितने ही दूर भविष्य में क्यों न जन्म लें। (पत्रावली भाग-1, पृष्ठ-339)
24. रामानुज का मत है कि बद्ध आत्मा या जीव की पूर्णता उसमें अव्यक्त या सूक्ष्म भाव से रहती है। जब इस पूर्णता का पुनः विकास होता है। तभी जीव मुक्त हो जाता है। परन्तु अद्वैतवादी कहता है कि ये दोनों बातें केवल भास मान होती है। न क्रमसंकोच है, न क्रमविकास। दोनों क्रियायें माया रूप है, केवल भास मान-परिदृश्यमान अवस्थामात्र। (पत्रावली भाग-1, पृष्ठ-346)
25. जगत के लिए-जिससे कि मुझे यह शरीर मिला है, देश के लिए-जिसने कि मुझे यह भावना प्रदान की है तथा मनुष्य जाति के लिए-जिसमें कि मैं अपनी गणना कर सकता हूँ-कुछ करना है। जितनी मेरी उम्र बढ़ रही है, उतना ही मैं “मनुष्य सब प्राणियों में श्रेष्ठ है“-हिन्दुओं की इस धारणा का तात्पर्य अनुभव कर रहा हूँ। मुसलमान भी यही कहते है, अल्ला न देवदूतों से आदम को प्रणाम करने के लिए कहा था। इवलिस ने ऐसा नहीं किया, इसलिए वह शैतान बना। यह पृथ्वी सब स्वर्गों से ऊँची है। सृष्टि का यही सर्वश्रेष्ठ विद्यालय है। केवल मनुष्य ही ईश्वर बन सकता तथा अन्य लोगों को पुनः मनुष्य जन्म मिलने के बाद फिर ईश्वरत्व की प्राप्ति हो सकती है। (पत्रावली भाग-1, पृष्ठ-348)
26. तुम्हारे सामने एक भयानक दलदल है-उससे सावधान रहना; सब कोई उस दलदल में फंसकर खतम हो जाता है। वर्तमान हिन्दुओं का धर्म न तो वेद में है और न पुराण में, न भक्ति में है और न मुक्ति में. . . धर्म तो भोजन पात्र में समा चुका है।. . . यही वह दलदल है। वर्तमान हिन्दू धर्म न तो विचार प्रधान ही है और न ज्ञान प्रधान, “मुझे न छुना, मुझे न छुना“ इस प्रकार की अस्पृश्यता ही उसका एक मात्र अवलम्बन है, बस इतना ही। (पत्रावली भाग-1, पृष्ठ-405)
27. श्रीरामकृष्ण देव की एक अत्यन्त संक्षिप्त जीवनी अंग्रेजी में लिखकर मैं भेज रहा हूँ। उसके बंगानुवाद के साथ छपवाकर महोत्सव में बेचना, वितरण करने से लोग प्रायः नहीं पढ़ते हैं, इसलिए कुछ मूल्य रखना चाहिए। खूब धूमधाम के साथ महोत्सव करना। (पत्रावली भाग-1, पृष्ठ-400)
28. कल रात मैंने खुद भोजन बनाया था। केशर, गुलाबजल, जावित्री, जायफल, दालचीनी, लौंग, इलायची, मक्खन, नींबू का रस, प्याज, किसमिस, बदाम, काली मिर्च, तथा चावल. . . ये सब मिलाकर ऐसी स्वादिष्ट खिचड़ी बनायी थी कि मैं स्वयं ही उसे गले से नीचे नहीं उतार सका। घर पर हींग नहीं थी, नहीं तो कुछ हींग मिला देने पर कम से कम निगलने में सुविधा होती। (पत्रावली भाग-1, पृष्ठ-445)
29. मेरे पिताजी यद्यपि वकील थे, फिर भी मेरी यह इच्छा नहीं कि मेरे परिवार में कोई वकील बने। मेरे गुरुदेव इसके विरोधी थे एवं मेरा भी यह विश्वास है कि जिस परिवार के कुछ लोग वकील हो उस परिवार में अवश्य ही कुछ न कुछ गड़बड़ी होगी। हमारा देश वकीलों से छा गया है-प्रतिवर्ष विश्वविद्यालयों से सैकड़ों वकील निकल रहे हैं। हमारी जाति के लिए इस समय कर्मतत्परता तथा वैज्ञानिक प्रतिभा की आवश्यकता है। (पत्रावली भाग-1, पृष्ठ-449)
30. बीस वर्ष की अवस्था में मैं ऐसा असहिष्णु और कट्टर था कि किसी से सहानुभूति नहीं कर सकता था। कलकत्ता मेंे रास्तों के जिस किनारे पर थियेटर है, उस किनारे से ही नहीं चलता था। अब तैंतीस वर्ष की उम्र में मैं वेश्याओं के साथ एक ही मकान में ठहर सकता हूँ-उनसे तिरस्कार का एक शब्द कहने का विचार भी मेरे मन में नहीं आयेगा। क्या यह अधोगति है? अथवा मेरा हृदय बढ़ता हुआ मुझे उस अनन्त प्रेम की ओर ले जा रहा है जो साक्षात् भगवान है। लोग कहते हैं कि वह मनुष्य जो अपने चारों ओर होने वाली बुराईयों को नहीं देख पाता, अच्छा काम नहीं कर सकता-वह एक तरह का अदृष्टवादी बना बैठा रहता हैं मैं तो ऐसा नहीं देखता हूँ। वरन् मेरी कार्य करने की शक्ति प्रचण्ड वेग से बढ़ रही है और साथ ही असीम सफलता भी मिल रही है। (पत्रावली भाग-2, पृष्ठ-4)
31. मैं प्रभु से प्रार्थना करता हूँ कि सैकड़ों वेश्याएं आये और उनके (श्रीरामकृष्ण) चरणों में अपना सिर नवाये और यदि एक भी सज्जन न आये तो भी कोई हानि नहीं। आओ वेश्याआंे, आओ शराबियों, आओ चोरों, सब आओ, श्री प्रभु का द्वार सबके लिए खुला है-“धनवान के ईश्वर के राज्य में प्रवेश करने की अपेक्षा ऊँट का सूई के छिद्र में घुसना सहज है।“ (पत्रावली भाग-2, पृष्ठ-24)
32. किसी मत विशेष का समर्थन किया जा रहा हो, ऐसी एक भी बात उसके सम्पादकीय लेख में नहीं रहनी चाहिए और सदा यह ख्याल रखना कि केवल भारत को नहीं, अपितु समग्र जगत् को सम्बोधित कर तुम बातें कह रहे हो और तुम जो कुछ कहना चाहते हो, जगत् उसके बारे में सम्पूर्ण अज्ञ है। (पत्रावली भाग-2, पृष्ठ-58)
33. आप तो अच्छी तरह से जानती हैं कि बाधा जितनी अधिक होती है, मेरे अन्दर की भावना भी उतनी ही जागृत हो उठती है। (पत्रावली भाग-2, पृष्ठ-66)
34. मैं यहाँ बहुत अच्छा हूँ क्योंकि शहरों में मेरा जीवन कष्टप्रद सा हो गया था। यदि राह में मेरी झलक भी दिख जाती थी तो तमाशा देखने वालों का जमघट लग जाता था। विख्याति में केवल दूध और शहद घुला हुआ नहीं मिलता। अब मैं बड़ी सी दाढ़ी बढ़ाने वाला हूँ जिसके बाल तो अब सफेद हो ही रहे हैं। इससे रूप पूज्यनीय हो जाता है और वह मुझे अमेंरिकन निन्दा करने वालांे से भी बचाती है। हे श्वेतकेश, तुम कितना क्या न छुपा सकते हो, धन्य हो तुम! (पत्रावली भाग-2, पृष्ठ-81)
35. बिस्तरे पर लेटने के साथ ही साथ मुझे कभी नींद नहीं आती थी-घण्टे दो घण्टे तक मुझे इधर-उधर करवट बदलनी पड़ती थी। इधर-उधर करवट बदलने की मेरी वह पुरानी आदत पुनः वापस लौट आयी है तथा रात्रि में भोजन के बाद गर्मी लगने लगती है। दिन में भोजन के बाद कोई खास गर्मी का अनुभव नहीं होता। हाँ एक बात और है, मैं सहज ही में मलेरिया ग्रस्त हो जाता हूँ। (पत्रावली भाग-2, पृष्ठ-92)
36. मुझे अपने बारे में बहुत कुछ कहना पड़ा, क्योंकि मुझे तुमको कैफियत देनी थी। मैं जानता हूँ कि मेरा कार्य समाप्त हो चुका-अधिक से अधिक तीन या चार वर्ष आयु के और बचे हैं। (चिरशान्ति में लीन के 4 वर्ष 11 माह 25 दिन पूर्व एक पत्र में लिखित) (पत्रावली भाग-2, पृष्ठ-115)
37. कुछ लोग किसी के नेतृत्व में सर्वोत्तम काम करते हैं। हर मनुष्य का जन्म पथ-प्रदर्शन के लिए नहीं होता है। परन्तु सर्वोत्तम नेता वह है जो “शिशुवत् मार्ग दर्शन करता है“। शिशु स्व पर आश्रित रहते हुए भी घर का राजा होता है। कम से कम मेरे विचार से यही रहस्य है--बहुतों को अनुभव होता है, पर प्रकट कोई-कोई ही कर सकते हैं। (पत्रावली भाग-2, पृष्ठ-153)
38. महान कठिनाई यह है: मैं देखता हूँ कि लोग प्रायः अपना सम्पूर्ण प्रेम मुझे देते हैं। परन्तु इसके बदले में मैं किसी को अपना पूरा-पूरा प्रेम नहीं दे सकता, क्योंकि उसी दिन कार्य का सर्वनाश हो जायेगा। परन्तु कुछ लोग ऐसे हैं जो ऐसा बदला चाहते हैं, क्योंकि उनमें व्यक्ति निरपेक्ष सर्वव्यापक दृष्टि का अभाव होता है। कार्य के लिए यह परमाआवश्यक है कि अधिक से अधिक लोगों का मुझसे उत्साहपूर्ण प्रेम हो परन्तु मैं स्वयं बिल्कुल निःसंग व्यक्ति-निरपेक्ष होऊं। नहीं तो ईष्र्या और झगड़ों में कार्य का सर्वनाश हो जायेगा। नेता को व्यक्तिनिरपेक्ष निःसंग होना चाहिए। (पत्रावली भाग-2, पृष्ठ-153)
39. तुम्हें मुसलमान लड़कों को भी लेना चाहिए परन्तु उनके धर्म को कभी दूषित न करना। तुम्हें यही करना होगा कि उनके भोजन आदि का प्रबन्ध अलग कर दो और उन्हें शुद्धाचरण, पुरुषार्थ और परहित में श्रद्धापूर्वक तत्परता की शिक्षा दो। यह निश्चय ही धर्म है। सब धर्मों के लड़कों को लेना हिन्दू, मुसलमान, ईसाई या कुछ भी हो, परन्तु धीरे-धीरे आरम्भ करना। (पत्रावली भाग-2, पृष्ठ-155)
40. चाहे और कुछ भी क्यों न हो, रूपये-पैसे, मठ-मन्दिर, प्रचारादि की सार्थकता ही क्या है? क्या समग्र जीवन का एकमेंव उद्देश्य शिक्षा नहीं है? शिक्षा के बिना धन-दौलत, स्त्री-पुरुषों की आवश्यकता ही क्या है? इसलिए रूपयों का नाश हुआ अथवा हार हुई-मैं इन बातों को न तो समझ ही पाता हूँ और न समझना ही चाहता हूँ। (पत्रावली भाग-2, पृष्ठ-162)
41. मेरा स्वास्थ्य ठीक है। रात में प्रायः उठना नहीं पड़ता, सुबह-शाम भात, आलू, चीनी जो कुछ मिलता है खा लेता हूँ। दवा किसी काम की नहीं है-ब्रह्म ज्ञानी के शरीर पर दवा का कोई असर नहीं होता! वह हजम हो जायेगी. . . कोई डर की बात नहीं है। (पत्रावली भाग-2, पृष्ठ-197)
42. साथ ही मेरी आयु भी समाप्त हो रही है-खासकर इस बात को सत्य मानकर ही मुझे चलना होगा। (चिरशान्ति में लीन के 2 वर्ष 11 माह 20 दिन पूर्व एक पत्र में लिखित) (पत्रावली भाग-2, पृष्ठ-206)
43. यूरोपियनों के साथ मैं भोजन करता हूँ इसलिए मुझे एक पारिवारिक देव-मंदिर से निकाल दिया गया था। मैं चाहता हूँ कि मेरी गठन इस प्रकार की हो कि प्रत्येक व्यक्ति अपनी इच्छानुसार मुझे मोड़ सके। किन्तु यह दुर्भाग्य की बात है कि मुझे ऐसा व्यक्ति देखने को नहीं मिलता जिससे कि सब कोई संतुष्ट हो। खासकर जिसे अनेक स्थलों में घूमना पड़ता है, उसके लिए सब को संतुष्ट करना संभव नहीं है। (पत्रावली भाग-2, पृष्ठ-211)
44. अपनी ओर से मैं अपने स्वभाव तथा नीति पर अवलम्बित हूँ-एक बार जिसको मैंने अपने मित्र रूप में माना है, वह सदा के लिए मेरा मित्र है। इसके अलावा भारतीय रीति के अनुसार बाहरी घटनाओं के कारणों का आविष्कार करने के लिए मैं भीतर की ओर ही देखता हूँ; मैं यह जानता हूँ कि मुझ पर चाहे जितनी भी विद्वेष व घृणा की तरंगे उपस्थित क्यों न हो, उसके लिए मैं जिम्मेंदार हूँ एवं यह जिम्मेंदारी एकमात्र मुझपर ही है। ऐसा न होकर उसका और कोई रूपान्तर होना संभव नहीं है। (पत्रावली भाग-2, पृष्ठ-212)
45. मेरे जीवन में मैंने अनेक गलतियां की है; किन्तु उसमें प्रत्येक का कारण रहा है अत्यधिक प्यार। अब प्यार से मुझे द्वेष हो गया है! हाय! यदि मेरे पास वह बिल्कुल न होता! भक्ति की बात आप कह रही है! हाय, यदि मैं निर्विकार और कठोर वेदान्ती हो सकता! जाने दो, यह जीवन तो समाप्त ही हो चुका। अगले जन्म में प्रयत्न करूंगा। (पत्रावली भाग-2, पृष्ठ-219)
46. मेरे लिए कार्य करना तभी संभव होता है, जबकि मुझे पूर्णतया अपने पैरों पर ही खड़ा होना पड़ता है। निःसंग दशा मंे मेरी शक्ति का विकास अधिक होता है। (पत्रावली भाग-2, पृष्ठ-227)
47. मुझे यह दिखायी दे रहा है कि वक्तृता-मंच से अब वाणी प्रचार करना मेरे लिए सम्भव नहीं है। इससे मैं आनन्दित ही हूँ। मैं विश्राम चाहता हूँ। मैं थक गया हूँ ऐसी बात नहीं है; किन्तु अगला अध्याय होगा-वाक्य नहीं, किन्तु अलौकिक स्पर्श, जैसा कि श्रीरामकृष्ण देव का था। (पत्रावली भाग-2, पृष्ठ-229)
48. मेरे अन्दर एक विराट परिवर्तन की सूचना दिखाई दे रही है-मेरा मन शान्ति से परिपूर्ण होता जा रहा है। मैं जानता हूँ कि माँ ही सब कुछ उत्तरदायित्व ग्रहण करेगी। मैं एक संन्यासी के रूप में ही मृत्यु को अलिंगन करूंगा। (पत्रावली भाग-2, पृष्ठ-247)
49. हम अपनी सारी शक्तियों को किसी एक विषय की ओर लगा देने के फलस्वरूप उसमें आसक्त हो जाते हैं तथा उसकी और भी एक दिशा है, जो नेतिवाचक होने पर भी उसके सदृश ही कठिन है-उस ओर हम बहुत कम ध्यान देते हैं-वह यह है कि क्षण भर में किसी विषय से अनासक्त होने की, उससे अपने को पृथक कर लेने की शक्ति। आसक्ति और अनासक्ति, जब दोनों शक्तियों का पूर्ण विकास होता है, तभी मनुष्य महान एवं सुखी हो सकता है। (पत्रावली भाग-2, पृष्ठ-248)



समाज

समाज

01. विज्ञान और आध्यात्मिकता
01. यदि हम अपने व्यक्तिगत एवं सामूहिक जीवन में वैज्ञानिक चेतना सम्पन्न एवं आध्यात्मिक एक साथ न हो पाए, तो मानवजाति का अर्थपूर्ण अस्तित्व ही संशय का विषय हो जाएगा। (विज्ञान और आध्यात्मिकता, पृष्ठ-9)
02. अवश्य, सदाचार बहुत महत्वपूर्ण है। यह सही है कि अपने विचारों एवं भावनाओं को अनुशासित किये बिना मनुष्य धर्म के लक्ष्य तक नहीं पहुँच सकता, लेकिन आचार किसी भी अर्थ में धर्म का अन्तिम लक्ष्य नहीं है। (विज्ञान और आध्यात्मिकता, पृष्ठ-17)
03. अन्त में देश-काल की सीमाओं में बद्ध ज्ञान का महामिलन उस ज्ञान से होगा जो इन दोनों से परे है, जो मन तथा इन्द्रियों के पहुँच से परे है-जो निरपेक्ष है, असीम है, अद्वितीय है। (विज्ञान और आध्यात्मिकता, पृष्ठ-36)
04. विज्ञान सहज निर्धारण एवं उसे प्राप्त करने की प्रेरणा लक्ष्यों एवं प्रेरणाओं की सिद्धि के उपायों के बारे में धर्म, परोक्ष या अपरोक्ष रूप से विज्ञान से बहुत कुछ सीख सकता है। विज्ञान यह बता सकता है कि अमुक लक्ष्य कैसे प्राप्त किया जाय। लेकिन वह यह नहीं बता सकता कि उसे कौन सा लक्ष्य प्राप्त करना चाहिए। (विज्ञान और आध्यात्मिकता, पृष्ठ -55)
05. अनुभव ही ज्ञान का एक मात्र स्रोत है। विश्व में केवल धर्म ही ऐसा विज्ञान है जिसमें निश्चयत्व का अभाव है, क्योंकि अनुभव पर आश्रित विज्ञान के रूप में उसकी शिक्षा नहीं दी जाती। ऐसा नहीं होना चाहिए। परन्तु कुछ ऐसे लोगों का एक छोटा समूह भी सर्वदा विद्यमान रहता है, जो धर्म की शिक्षा अनुभव के माध्यम से देते हैं। ये लोग रहस्यवादी कहलाते हैं। और वे हरेक धर्म में, एक ही वाणी बोलते हैं। और एक ही सत्य की शिक्षा देते हैं। यह धर्म का यथार्थ विज्ञान है। जैसे गणित शास्त्र विश्व के किसी भी भाग में भिन्न-भिन्न नहीं होते। वे सभी एक ही प्रकार के होते है तथा उनकी स्थिति भी एक ही होती है। उन लोगों का अनुभव एक ही है और यही अनुभव धर्म का रूप धारण कर लेता है। (विज्ञान और आध्यात्मिकता, पृष्ठ-70)
06. धर्म तात्त्विक (आध्यात्मिक) जगत के सत्यों से उसी प्रकार सम्बन्धित है, जिस प्रकार रसायन शास्त्र तथा दूसरे भौतिक विज्ञान भौतिक जगत के सत्यों से। रसायन शास्त्र पढ़ने के लिए प्रकृति की पुस्तक पढ़ने की आवश्यकता है। धर्म की शिक्षाप्राप्त करने के लिए तुम्हारी पुस्तक अपनी बुद्धि तथा हृदय है। सन्त लोग प्रायः भौतिक विज्ञान से अनभिज्ञ ही रहते हैं। क्योंकि वे एक भिन्न पुस्तक अर्थात् आन्तरिक पुस्तक पढ़ा करते हैं; और वैज्ञानिक लोग भी प्रायः धर्म के विषय में अनभिज्ञ ही रहते हैं क्योंकि वे भी भिन्न पुस्तक अर्थात् वाह्य पुस्तक पढ़ने वाले हैं। (विज्ञान और आध्यात्मिकता, पृष्ठ-71)
07. काल प्रवाह में सुसंगत परिवर्तन लाने के लक्ष्य को प्राप्त करना ऐसा आसान कार्य नहीं है जो इने गिने मुट्ठी भर उत्साही लोगों द्वारा चन्द दिनों में किया जा सके। यह कार्य लाखों लोगों के युग-युगान्तर तक किये गये साग्रह एवं निष्ठापूर्ण प्रयास द्वारा ही सम्भव है। इसके लिए हमारी शिक्षा पद्धति को पुनर्गठित करना होगा जिससे मानव के विचारों, आदर्शों एवं कार्यों को नई दिशा प्रदान की जा सके। (विज्ञान और आध्यात्मिकता, पृष्ठ-78)
08. सम्भवतः ऐसा समय आ रहा है जब इस भौतिकवादी समाज में एक नयी भावना का उदय होगा और वह यह कि ईश्वर-दर्शन प्रत्येक व्यक्ति के लिए सम्भव है; तब सभी के उस दिशा में संघर्ष न करने पर भी जो ईश्वर का प्रत्यक्ष प्रयोगात्मक अनुभव करना चाहंेगे उन्हें युग-चेतना से उपहास एवं संदेह के बदले, प्रोत्साहन प्राप्त होगा। (विज्ञान और आध्यात्मिकता, पृष्ठ-100)

02. प्राच्य और पाश्चात्य
01. हिन्दू शास्त्र कहते हैं कि धर्म की अपेक्षा मोक्ष बहुत ही बड़ा है, किन्तु पहले धर्म करना होगा। बौद्धों ने इसी स्थान पर भ्रम में पड़कर, अनेक उत्पात खड़े कर दिये। अहिंसा ठीक है, निश्चय बड़ी बात है, कहने में बात तो अच्छी है, पर शास्त्र कहते हैं, तुम गृहस्थ हो, तुम्हारे गाल पर यदि कोई एक थप्पड़ मारे, और यदि उसका जवाब तुम दस थप्पड़ों से न दो, तो तुम पाप करते हो। “आततापिनमायान्तम्“ इत्यादि, हत्या करने के लिए यदि कोई आये तो ऐस ब्रह्मवध भी पाप नहीं है। ऐसा मनुस्मृति में लिखा है। यह ठीक बात है, इसे भूलना न चाहिए। वीरभोग्या वसुन्धरा-वीर्य प्रकाशित कीजिये, पृथ्वी का भोग कीजिए, तब आप धार्मिक होेंगे और गाली-गलौज सहकर चुपचाप घृणित जीवन बिताने से यहाँ नरक भोगना होगा और परलोक में भी वही होगा। यही शास्त्र मत है। (प्राच्य और पाश्चात्य, पृष्ठ-8)
02. जिस अवस्था में सत्वगुण की प्रधानता होती है उस अवस्था में निष्क्रिय हो जाता है तथा परम ध्यानावस्था को प्राप्त होता है। जिस अवस्था में रजोगुण की प्रधानता होती है। उस अवस्था में वह अच्छे-बुरे काम करता है तथा जिस अवस्था में तमोगुण की प्रधानता होती है, उस अवस्था में फिर वह निष्क्रिय, जड़ हो जाता है। (प्राच्य और पाश्चात्य, पृष्ठ-11)
03. केवल वैदिक धर्म में ही इन चारों वर्गों के साधन का उपाय है-धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। (प्राच्य और पाश्चात्य, पृष्ठ-14)
04. बौद्ध धर्म और वैदिक धर्म का उद्देश्य एक ही है। पर बौद्ध के उपाय ठीक नहीं है, यदि उपाय ठीक होता तो हमारा यह सर्वनाश कैसे होता? “समय ने सब कराया“ क्या यह कहने से काम चल सकता है? समय तथा कार्य-कारण के सम्बन्ध को छोड़कर काम कर सकेगा? (प्राच्य और पाश्चात्य, पृष्ठ-14)
05. अंग्रेजों के चरित्र में व्यवसाय बुद्धि तथा आदान-प्रदान की प्रधानता है। अंग्रेजों की आवश्यक विशेषता है समान भाग, न्याय विभाग। अंग्रेज राजा और कुलीन जाति के अधिकार को नतमस्तक होकर स्वीकार कर लेते हैं, परन्तु गांठ में से पैसा बाहर करना हो तो वे हिसाब मांगते हैं। (प्राच्य और पाश्चात्य, पृष्ठ-18)
06. देवता आस्तिक थे-उन्हें आत्मा में विश्वास था, ईश्वर और परलोक में विश्वास करते थे। असुरों का कहना था कि इस जीवन को महत्व दो, पृथ्वी का भोग करो, इस शरीर को सुखी रखो। इस समय हम इस बात पर विचार नहीं कर रहे कि देवता अच्छे थे या असुर। पर पुराणों को पढ़ने से पता चलता है कि असुर ही अधिकतर मनुष्यों की तरह के थे, देवता तो अनेक अंशों में हीन थे। (प्राच्य और पाश्चात्य, पृष्ठ-32)
07. हिन्दुओं का सिद्धान्त है कि यज्ञस्थल को छोड़कर किसी दूसरे स्थान पर जीव हत्या करना पाप है, किन्तु यज्ञ करके सुख से मांस भोजन किया जा सकता है। इतना ही नहीं, गृहस्थों के लिए ऐसे अनेक नियम है कि अमुक, अमुक स्थान पर हत्या न करने से पाप होगा-जैसे श्राद्धादि। उन सब स्थानों पर निमंत्रित होकर मांस न खाने से पशु जन्म होता है-ऐसा मनु ने लिखा है। जैन और बौद्ध कहते हैं कि हम तुम्हारा शास्त्र नहीं मानते, हत्या किसी प्रकार की भी नहीं की जा सकती। बौद्ध सम्राट अशोक की आज्ञा थी-“जो यज्ञ करेगा व निमंत्रण देकर मांस खिलायेगा वह दण्डित होगा“। आधुनिक वैष्णव कुछ और ही असमंजस में पड़े हैं उनके देवता राम और कृष्ण मद-मांस आदि उड़ा रहे हैं-यह रामायण और महाभारत में लिखा है। (रामायण, उत्तर 52, अयोध्या 33, महाभारत आदिपर्व) सीता देवी ने गंगा जी को मांस, भात और हजार कलशी मद्य चढ़ाने की मनौती मानी थी। वर्तमान काल में लोग शास्त्र की बातें भी नहीं मानते और महापुरुष का कहा हुआ है, ऐसा कहने से भी नहीं सुनते। (प्राच्य और पाश्चात्य, पृष्ठ-41)
08. सब पक्षों की राय जान-सुनकर मेरी तो यही राय होती है कि हिन्दू ही ठीक रास्ते पर है। अर्थात् हिन्दुओं की यह जो व्यवस्था है कि जन्म-कर्म के भेद से आहार आदि में भिन्नता होगी, यही ठीक सिद्धान्त है। मांस खाना अवश्य असभ्यता है। निरामिष भोजन ही पवित्र है। जिनका उद्देश्य, धार्मिक जीवन है, उनके लिए निरामिष भोजन अच्छा है और जिसे रात दिन परिश्रम करके प्रतिद्वन्द्विता के बीच में जीवन नौका खेनी है। उसे मांस खाना ही होगा। जितने दिन “बलवान की जय“ का भाव मानव समाज में रहेगा, उतने दिन मांस खाना ही पड़ेगा अथवा किसी दूसरे प्रकार की मांस जैसी उपयोगी चीजें खाने के लिए ढूंढ निकालनी होगी। (प्राच्य और पाश्चात्य, पृष्ठ-43)
09. ज्ञान का अर्थ है-बहु के भीतर एक को देखना। जो वस्तुएं अलग-अलग हैं, जिनमें अन्तर मालूम होता है, उनमें भी एक ऐक्य है। वह विशेष सम्बन्ध जिससे मनुष्य को इस एकत्व का पता लगाना है, “नियम“ कहलाता है। इसी को प्राकृतिक नियम भी कहते हैं। (प्राच्य और पाश्चात्य, पृष्ठ-81)
10. यूरोपीय पण्डितों का यह कहना कि आर्य लोग कहीं से घूमते फिरते आकर भारत में जंगली जाति को मार-काटकर और जमीन छीनकर यहाँ बस गये। केवल अहमको की बात है। आश्चर्य तो इस बात का है कि हमारे भारतीय विद्वान भी उन्हीं के स्वर में स्वर मिलाते हैं और वही सब झूठी बात हमारे बाल बच्चों को पढ़ाई जाती है-यही घोर अन्याय है। (प्राच्य और पाश्चात्य, पृष्ठ-96)
11. यूरोप का उद्देश्य है-सब को नाश करके स्वयं अपने को बचाये रखना। आर्यों का उद्देश्य था-सब को अपने समान करना अथवा अपने से भी बड़ा करना। (प्राच्य और पाश्चात्य, पृष्ठ-99)

03. जाति, संस्कृति और समाजवाद
01. संस्कृत में “जाति“ का अर्थ है वर्ग या श्रेणी विशेष। यह सृष्टि के मूल में ही विद्यमान है। विचित्रता अर्थात् जाति का अर्थ ही सृष्टि है। “एकोऽहं बहुस्याम्“-मैं एक हूँ अनेक हो जाऊँ। विभिन्न वेदों में इस प्रकार की बात पायी जाती है। सृष्टि के पूर्व एकत्व रहता है, सृष्टि हुई कि विचित्रता शुरु हुई। अतः यदि यह विचित्रता बन्द हो जाय तो सृष्टि का ही लोप हो जायेगा। जब तक कोई जाति शक्तिशाली और क्रियाशील रहेगी, तब तक वह विचित्रता अवश्य पैदा करेगी। ज्यांेहि उसका ऐसी विचित्रता उत्पादन करना बन्द होता है या बन्द कर दिया जाता है त्योंहि वह जाति नष्ट हो जाती है जाति का मूल अर्थ था एवं सैकड़ो वर्ष तक यही अर्थ प्रचलित था-प्रत्येक व्यक्ति को अपनी प्रकृति को, अपने विशेषत्व को प्रकाशित करने की स्वाधीनता। आधुनिक शास्त्र ग्रन्थों में भी जातियों का आपस में खाना-पीना निषिद्ध नहीं हुआ है और न किसी प्राचीन ग्रन्थ में अनका आपस में ब्याह-शादी करना मना है। तो फिर भारत के अधःपतन का कारण क्या था?-जाति सम्बन्धी इस भाव का त्याग। जैसे गीता कहती है-जाति नष्ट हुई कि संसार भी नष्ट हुआ। यह हमें सत्य ही प्रतीत होता है कि इस विचित्रता का नाश होते ही जगत का भी नाश हो जायेगा। आजकल का वर्ण विभाग यथार्थ जाति नहीं है, बल्कि जाति की प्रगति में वह एक रुकावट ही है (पत्रावली भाग-1, पृष्ठ-269)
02. प्रत्येक दास जाति का मुख्य दोष ईष्र्या होती है। ईष्र्या और मेंल का अभाव ही पराधीनता उत्पन्न करता है और उसे स्थायी बनाता है। जितना ही कोई राष्ट्र निर्बल या कायर होगा, उतना ही यह अवगुण अधिक प्रकट होगा। (पत्रावली भाग-1, पृष्ठ-239)
03. तुमने मांस खाने वाले क्षत्रियों की बात उठाई है। क्षत्रिय लोग चाहे मांस खाये या ना खाये, वे ही हिन्दू धर्म की उन सब वस्तुओं के जन्मदाता हैं जिनको तुम महत और सुन्दर देखते हो। उपनिषद् किसने लिखे थे? राम कौन थे? श्रीकृष्ण कौन थे? बुद्ध कौन थे? जैनों के तिर्थंकर कौन थे? जब कभी क्षत्रियों ने धर्म का उपदेश दिया, उन्होंने सभी को धर्म पर अधिकार दिया। और जब कभी ब्राह्मणों ने कुछ लिखा उन्होंने औरों को सब प्रकार के अधिकारों से वंचित करने की चेष्टा की। गीता और व्यास सूत्र पढ़ो या किसी से सुन लो। गीता में मुक्ति की राह पर सभी नर-नारियों, सभी जातियों और सभी वर्णों को अधिकार दिया गया है, परन्तु व्यास गरीब शूद्रों को वंचित करने के लिए वेद की मनमानी व्याख्या कर रहे हैं। क्या ईश्वर तुम जैसा मूर्ख है कि एक टुकड़े मांस से उसकी दया रुपी नदी में बाधा खड़ी हो जायेगी? अगर वह ऐसा ही है तो उसका मोल एक फूटी कौड़ी भी नहीं। (पत्रावली भाग-1, पृष्ठ-115)
04. हमारी अपनी भिन्न-भिन्न जातियों के होते हुए भी और एक जाति के अन्तर्गत उपजातियों में ही विवाह करने की हमारी वर्तमान प्रथा के रहते हुए भी (यद्यपि यह प्रथा सर्वत्र नहीं है) हमारा यह मानववंश हर तरह से मिश्रित वंश ही कहा जा सकता है। (जाति, संस्कृति और समाजवाद, पृष्ठ-5)
05. भारतवर्ष में यदि कोई उच्चतर जाति में उठना चाहता है, तो उसे पहले अपनी समग्र जाति को उन्नत करना होगा, और फिर उसकी उन्नति के मार्ग में रोकने वाला कुछ भी नहीं रहता। भारतवर्ष की सामाजिक व्यवस्था का आधार क्या है? वह है जाति-नियम, में जाति के लिए जन्म लेता है और जाति के लिए ही जीता है। जाति में जन्म लेने पर जाति के नियमों के अनुसार ही सम्पूर्ण जीवन बिताना होगा। या आधुनिक भाषा में इसे हम यों कह सकते हैं कि. . . पाश्चात्य मनुष्य मानों वैयक्ति रूप से जन्म लेता है और हिन्दू सामाजिक रूप में। (जाति, संस्कृति और समाजवाद, पृष्ठ-6)
06. हमारी जातियां और हमारी संस्थाएं हमें एक राष्ट्र के रूप में सुरक्षित रखने के लिए आवश्यक रही हैं और जब इस आत्मरक्षा की आवश्यकता नहीं रहेगी, तब ये स्वाभाविक रूप से नष्ट हो जायेंगी। (जाति, संस्कृति और समाजवाद, पृष्ठ-7)
07. ऊँची श्रेणी वालों को नीचे खींचने से समस्या हल नहीं हो सकती, बल्कि नीचे की श्रेणीवालों को उपर उठाने से ही वह हल होगी। और यही कार्य-प्रणाली हम अपने सभी ग्रन्थों में पाते हैं। (जाति, संस्कृति और समाजवाद, पृष्ठ-8)
08. यहाँ सहस्त्रों जातियां हैं, और कुछ जातियां तो ब्राह्मण-वर्ग में भी प्रवेश पा गयी है। कारण, किसी भी जाति वालों को “हम ब्राह्मण हैं“ ऐसी घोषणा करने से कौन रोक सकता है? इस प्रकार अपनी समस्त कठोरता के साथ, जाति निर्माण इसी तरह होता रहा है। मान लो, यहाँ ऐसी अनेक जातियां हैं, जिनमें प्रत्येक में दस हजार मनुष्य है। अगर ये लोग एकमत होकर कहें कि “हम अपने को ब्राह्मण कहेंगे“ तो उनके रोकने वाला कौन है? शंकराचार्य आदि शक्तिमान युग प्रवर्तक गण महान जाति-निर्माता थे। ((जाति, संस्कृति और समाजवाद, पृष्ठ-9-10)
09. भारत की यही योजना है कि प्रत्येक व्यक्ति को ब्राह्मण बनाया जाय; क्योंकि ब्राह्मण ही मानवता का आदर्श है। ऐसी जातियां हैं, जो ऊपर उठ चुकी हैं और बहुत सी जातियां ऊपर उठेंगी, जब तक कि सभी ब्राह्मण नहीं बन जाती। यही योजना है किसी को नीचे गिराये बिना हमेंे उनको ऊपर उठाना है। हमारे पूर्वर्जों का आदर्श पुरुष ब्राह्मण था। (जाति, संस्कृति और समाजवाद, पृष्ठ-10)
10. भारतवर्ष में. . . तुम्हारी जाति सब से ऊँची तब गिनी जायेगी, जब तुम किसी ऋषि से पूर्वज का सम्बन्ध जोड़ सको, अन्यथा नहीं। “ब्राह्मण आदर्श“ से मेरा मतलब क्या है? मेरा मतलब है-आदर्श ब्राह्मणत्व, जिसमें संसारी भाव बिल्कुल नहीं और यथार्थ ज्ञान प्रचुर मात्रा में हो। ब्राह्मण-जाति और ब्राह्मण-गुण दो भिन्न बातें हैं। भारत-वर्ष में मनुष्य अपनी जाति के कारण ब्राह्मण माना जाता है। पर पाश्चात्य देशों में तो वह ब्राह्मण गुणों के कारण ही ब्राह्मण माना जा सकेगा। (जाति, संस्कृति और समाजवाद, पृष्ठ-11)
11. भारतवर्ष में भी ब्राह्मण है, पर उन्होंने अपने भयंकर अत्याचार के कारण देश को नष्ट प्राय कर दिया है और फलतः जो कुछ उनमें स्वभाविक गुण थे, वे क्रमशः नष्ट होते जा रहे हैं। मेरे शिष्य सब ब्राह्मण हैं!. . . ब्राह्मण का पुत्र सदा ब्राह्मण ही होता है ऐसा नहीं। यद्यपि हर तरह सम्भावना तो यही है कि वह ब्राह्मण ही हो, फिर भी हो सकता है कि वैसा न भी हो। (जाति, संस्कृति और समाजवाद, पृष्ठ-13)
12. जब वह वेतन के लिए दूसरे की सेवा करने में लगा है, तब वह शूद्र है; जब वह अपने लाभ के लिए कोई व्यापार कर रहा है, तब वैश्य है, अत्याचार के विरूद्ध जब वह लड़ रहा है, तब उसमें क्षत्रिय के गुण प्रकट होते हैं; और जब वह परमेंश्वर का ध्यान करता है या अपना समय ईश्वरसम्बन्धी वार्तालाप में बिताता है, तब वह ब्राह्मण है, अतएव यह स्पष्ट है कि एक जाति दूसरी जाति में परिवर्तित हो जाना बिल्कुल सम्भव है। अन्यथा, विश्वामित्र ब्राह्मण और परशुराम क्षत्रिय कैसे हुए। (जाति, संस्कृति और समाजवाद, पृष्ठ-13)
13. हम पढ़ते हैं कि सत्ययुग में केवल एक ही जाति थी वह थी ब्राह्मण। हम महाभारत में पढ़ते हैं-प्रारम्भ में सारे संसार में केवल ब्राह्मण ही बसते थे और जैसे-जैसे उनकी अवनति होती गयी, उनकी भिन्न-भिन्न जातियां बनती गयी; और जब चक्र घुमेंगा, तब वे पुनः मूल स्थान ब्राह्मणत्व को प्राप्त होंगे। यह चक्र अब घूम रहा है-इसी बात की ओर मैं तुम्हारा ध्यान आकर्षित करना चाहता हूँ। (जाति, संस्कृति और समाजवाद, पृष्ठ-20)
14. आधुनिक प्रतिस्पर्धा के प्रचलित होने से देखो, जाति का कितना शीघ्र लोप हो रहा है। अब उसे मिटाने के लिए किसी धर्म की आवश्यकता नहीं है। उत्तर भारत में ब्राह्मण जाति के लोग दूकानदारी करते हुए तथा जूते और शराब बनाते हुए अनेक पाये जाते हैं ऐसा क्यों हुआ? प्रतिस्पर्धा के कारण वर्तमान राजशासन में किसी भी मनुष्य की अपनी आजीविका के लिए वह चाहे जो करे, स्वतंत्रता है। (जाति, संस्कृति और समाजवाद, पृष्ठ-26)
15. जाति प्रथा तो वेदान्त धर्म के विरूद्ध है। जाति एक सामाजिक रूढ़ी है और हमारे सभी महान आचार्य उसे तोड़ने का प्रयत्न करते आये हैं। बौद्ध धर्म से लगाकर सभी पंथों ने जाति के विरूद्ध प्रचार किया है, किन्तु प्रत्येक समय वह श्रृंखला दृढ़ होती ही। जाति तो केवल भारत वर्ष की राजनीतिक संस्थाओं से निकली हुई है; वह एक परम्परागत व्यावसायिक संस्था है। धर्म में कोई जाति नहीं होती, जाति तो केवल एक सामाजिक रूढ़ि है। (जाति, संस्कृति और समाजवाद, पृष्ठ-32)
16. कोई भी व्यक्ति, चाहे वह शूद्र हो या चाण्डाल, ब्राह्मण को भी तत्वज्ञान की शिक्षा दे सकता है। सत्य की शिक्षा अत्यन्त नीच व्यक्ति से भी ली जा सकती है-वह व्यक्ति किसी भी जाति या पन्थ का क्यों न हो। हमारे अधिकांश उपनिषद् क्षत्रियों के लिखे हुए हैं। भारतवर्ष में हमारे मध्य आचार्य अधिकतर क्षत्रिय ही थे और उनके उपदेश सदा सार्वभौमिक रहे हैं।. . . राम, कृष्ण, बुद्ध-जिनकी पूजा अवतार मानकर की जाती है-ये सब क्षत्रिय ही थे। (जाति, संस्कृति और समाजवाद, पृष्ठ-33)
17. उन लोगों को समाज पुरोहितों के अधिकार से तुरन्त वंचित कर देता है। उन तथाकथित ब्राह्मणों के ब्राह्मणत्व पर समाज की कोई श्रद्धा नहीं है, जो शिखा रखने के बदले बालों को संवारते हैं, जो अपने पुरातन आचारों और पूर्वजों की रूढ़ियों को त्यागकर अर्ध-यूरोपियन पोशाक पहनते हैं तथा परिश्रम से आये हुए रीति-रिवाजों का दोगले ढंग से पालन करते हैं। (जाति, संस्कृति और समाजवाद, पृष्ठ-41)
18. जो लोग पुरोहित-वर्ग के अधिपत्य को नष्ट करने की चेष्टा का दोष अन्य किसी एक व्यक्ति या जनसमूह के माथे मढ़ना चाहते हैं, उन्हें यह जान लेना चाहिए कि प्रकृति के अटल नियम के वशीभूत होकर ही ब्राह्मण जाति अपने ही हाथों अपनी कब्र खोद रही है; और यही होना भी चाहिए। उच्च घराने में जन्म लेने वाले और विशेष अधिकार रखने वाले प्रत्येक जाति के लोग अपने ही हाथों अपनी चिता तैयार करना अपना मुख्य कर्तव्य बना लें, यहीं अच्छा और उपयुक्त है। (जाति, संस्कृति और समाजवाद, पृष्ठ-42)
19. पुरोहिती दल भारतवर्ष के लिए अभिशाप स्वरूप है। क्या कोई मनुष्य अपने भाई को नीचे गिराकर स्वयं अपने को नीचे गिरने से बचा सकता है? क्या कोई स्वयं को चोट पहुंचाये बिना दूसरे को चोट पहुंचा सकता है। ब्राह्मणों और क्षत्रियों के अत्याचार अब स्वयं उन्हीं के सिरों पर चक्रवृद्धि ब्याज सहित टूट पड़े हैं और कर्मफल के अटल नियमानुसार उन्हें एक सहस्त्र वर्ष तक दासत्व और अधःपतन भोगना पड़ रहा है। (जाति, संस्कृति और समाजवाद, पृष्ठ-40-42)
20. मुझे इस बात का खेद है कि वर्तमान काल में जातियों के बीच इतना विवाद (विरोध) है। यह तो अवश्य बन्द होना चाहिए। यह दोनों ओर से निरर्थक है, विशेषकर उच्च जाति-वालों (ब्राह्मणों) की ओर से, क्योंकि अब इन अधिकारों और विशेष हकों के दिन बीत गये। समाज के प्रत्येक उच्च पदाधिकारों का कर्तव्य है कि वह अपने विशेषाधिकरों की कब्र आप ही खोदे और जितना शीघ्र हो, उतना ही सब के लिए बेहतर होगा। जितनी देर होगी, उतना ही वह सड़ेगा और उतनी ही बुरी मौत वह मरेगा। इसीलिए भारतवर्ष में ब्राह्मण का यह कर्तव्य है कि वह शेष मानव जाति की मुक्ति के लिए कर्मशील बने। यदि वह ऐसा करता है और जब तक वह ऐसा करता है तभी तक वह ब्राह्मण है; पर जब वह केवल पैसा कमाने में लग जाता है तब वह ब्राह्मण नहीं है। (जाति, संस्कृति और समाजवाद, पृष्ठ-50)
21. रक्षा का एक ही उपाय, अपनी स्थिति सुधारने का एक मात्र मार्ग, जो तुम निम्न जातिवालों को मैं बतलाता हूँ, वह है संस्कृत का अध्ययन। उच्च जातियों के साथ लड़ना-भिड़ना, उनके विरूद्ध लेख लिखना और कुड़कुड़ाना सब व्यर्थ है। उसमें कोई भलाई नहीं, उससे तो लड़ाई-झगड़े ही पैदा होते हैं; और इस राष्ट्र में जहाँ दुर्भाग्यवश पहले से ही फूट फैली हुई है, और भी अधिक फूट फैल जायेगी। जातियों को समतल करने का एक ही मार्ग है-उस संस्कृति को, उस शिक्षा को अपनाना, जो उच्चतर जातियों का बल है। इतना कर लेने पर तुम अपनी इष्ट वस्तु को प्राप्त कर लोगे। (जाति, संस्कृति और समाजवाद, पृष्ठ-69)
22. कोई भी व्यक्ति, जो ब्राह्मण होने का दावा करता है, अपने इस दावे को, पहले तो अपनी आध्यात्मिकता प्रकट कर और तत्पश्चात् दूसरों को भी उसी श्रेणी में उठाकर, प्रभावित करें। पर दिखायी यह देता है कि उनमें से अधिकतर ऐसे हैं, जो केवल जन्म के कारण मिथ्या अभिमान कर रहे हैं। ब्राह्मणों! सावधान! यह मृत्यु के लक्षण हैं! उठकर खड़े हो जाओ और अपने आस-पास के अ-ब्राह्मणों को उन्नत बनाकर अपना मनुष्यत्व, ब्राह्मणत्व दिखाओ। यह कार्य न तो स्वामी भाव से करो, और न ही इस कार्य में पूर्व तथा पश्चिम के अन्धविश्वास एवं कपट व्यवहार-युक्त घृणास्पद अहंभाव ही हो; यह कार्य तो केवल सेवा की भावना में किया जाय। कारण, यह निश्चित सत्य है कि जो सेवा करना जानता है, वही शासन करना भी जानता है। यदि कोई ब्राह्मण समझता है कि उसमें आध्यात्मिक संस्कृति के लिए विशेष योग्यता है, तो उसे खुले क्षेत्र में शूद्र के साथ उतर आने में क्या डर है? क्या बढ़िया घोड़ा अड़ियल टट्टू के साथ घुड़दौड़ करने में डरेगा? (जाति, संस्कृति और समाजवाद, पृष्ठ-71-73)
23. यदि शूद्र जाति में कोई असाधारण बुद्धि और योग्यता वाला मनुष्य पैदा हो जाय, तो समाज के प्रभावशाली उच्च वर्गवाले व्यक्ति तुरन्त उस पर पदवियों द्वारा सम्मान की वृष्टि करके उसे स्वयं अपने वर्ग में उठा लेते थे। इस प्रकार उसकी सम्पत्ति और बुद्धि की शक्ति का उपयोग अन्य जाति के लाभ के लिए हो जाता है, जब कि उसकी अपनी जाति वाले उसके गुणों से कोई लाभ नहीं उठा पाते थे। वशिष्ठ, नारद, सत्यकाम, जाबाल, व्यास, कृप, द्रोण, कर्ण तथा अन्य दूसरे, जिनके माता-पिता के सम्बन्ध में निश्चित जानकारी नहीं है, विशेष विद्वान या पराक्रमी होने के कारण ब्राह्मण या क्षत्रिय पद पर प्रतिष्ठित कर दिये गये थे; पर देखना यह है कि इस प्रकार उनके ऊपर चढ़ जाने से वेश्या, दासी, ढीमर या सूत जाति को क्या लाभ हुआ? फिर, इसके विपरीत, ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य वर्गों के पतित मनुष्य सदैव शूद्रों के पद पर नीचे उतार दिये जाते थे। (जाति, संस्कृति और समाजवाद, पृष्ठ-79)
24. ऐ भाइयों! सब लोग उठो! जागो! अब और कितनी देर तक सोते रहोगे?. . . अब तक ब्राह्मणों ने धर्म पर एकाधिपत्य कर रखा है; पर वे जब काल के प्रबल तरंग के विरूद्ध अपना एकाधिपत्य नहीं रख सकते, तब चलो, और ऐसे प्रयत्न करो कि देश भर में प्रत्येक को वह धर्म प्राप्त हो जाय। उनके मन में यह बैठा दो कि ब्राह्मणों के समान उनका भी धर्म पर वही अधिकार है। (जाति, संस्कृति और समाजवाद, पृष्ठ-85)
25. भारत की उच्च जातिवालों, तुम चाहे जितना भी अपने को आर्य पूर्वजों की संतान कहने का प्रदर्शन करो, चाहे जितना भी प्राचीन भारत के वैभव का रात दिन गुणगान करो और अपने जन्म के अभिमान में अकड़ते रहो-पर क्या तुम ऐसा समझते हो कि तुम सजीव हो? तुम तो दस सहस्त्र वर्षों से सुरक्षित रखे हुए मृत देह जैसे ही हो! भारतवर्ष में जो थोड़ी बहुत जीवन-शक्ति अभी भी है, वह उन्हीं में मिलेगी; जिन्हें तुम्हारे पूर्वज “चलते-फिरते, सड़े-गन्दे, मांस पिण्ड“ मानकर घृणा करते थे और यथार्थ में “चलते हुए मुर्दे“ तो तुम लोग हो। तुम्हारे घर-द्वारा, तुम्हारे साज-समान ऐसे निर्जीव और पुराने हैं कि वे अजायब-घर के नमूनों के समान दिखाई देते हैं और तुम्हारे रीति-रिवाज, चाल-ढ़ाल और रहन-सहन को देखकर कोई भी यही सोचेगा कि “नानी की कहानी“ सुन रहा है। (जाति, संस्कृति और समाजवाद, पृष्ठ-85)
26. अब ब्रिटिश राज-शासन में प्रतिबन्धरहित शिक्षा एवं ज्ञान प्रसार के दिनों में, उन सब वस्तुओं को अपने उत्तराधिकारियों को सौंप दो। यह बात यथा सम्भव शीघ्र कर डालो। तुम अपने को शून्य में लीन करके अदृश्य हो जाओ और अपने स्थान में “नव-भारत“ का उदय होने दो। उसका उदय हल चलाने वाले किसान की कुटिया से, मछुए, मोचियों और मेंहतरों की झोपड़ियों से हो। बनिये की दुकान से, रोटी बेचने वाले की भट्टी के पास से वह प्रकट हो। कारखानों, हाटों और बाजारों से वह निकले। वह “नव भारत“ अमराइयों और जंगलों से, पहाड़ों और पर्वतों से प्रकट हो। ये साधारण लोग सहस्त्रों वर्षों से अत्याचार सहते आये हैं-बिना कुड़बुड़ाये उन्होंने यह सब सहा है और परिश्रम में उन्होंने आश्चर्यकारक धैर्य शक्ति प्राप्त कर ली है। वे सतत् विपत्ति सहते रहे हें, जिससे उन्हें अविरल जीवन शक्ति प्राप्त हो गयी है। मुट्ठी भर अन्न से पेट भरकर वे संसार को कँपा सकते हैं। उनमें “रक्तबीज“ की अक्षय जीवनशक्ति भरी है। इसके अतिरिक्त उनमें पवित्र और नीतियुक्त जीवन से आने वाला वह आश्चर्यजनक बल है जो संसार में अन्यत्र नहीं मिलता। ऐसी शक्ति, ऐसा संतोष, ऐसा प्रेम और चुपचाप सतत् कार्य करने की ऐसी शक्ति और कार्य के समय इस प्रकार सिंह बल प्रकट करना-यह सब तुम्हे अन्यत्र कहाँ मिलेगा? भूतकाल के कंकाल! देखो तुम्हारे सामने तुम्हारे उत्तराधिकारी खड़े हैं-भावी भारत वर्ष खड़ा है। अपने अदृश्य होते ही तत्काल तुम पुनर्जात भारतवर्ष का वह प्रथम उद्घोष सुनोगे, जिसकी करोड़ो गर्जनाओं से सारे विश्व में यही पुकार गूँजती रहेगी-“वाह गुरु की फतह!“ (जाति, संस्कृति और समाजवाद, पृष्ठ-86-87)

04. समाज नीति
01. सभी कालों में प्राचीन रितियों को नये ढंग में परिवर्तित करने से ही उन्नति हुई है। भारत में प्रचीन युग में भी धर्म प्रचारकों ने इसी प्रकार काम किया था। केवल बुद्ध देव के धर्म ने ही प्राचीन रिति और नीतियों का विध्वंस किया था भारत से उसके निर्मूल हो जाने का यहीं कारण है। (विवेकानन्द जी के संग में, पृष्ठ-19)
02. तथाकथित समाज-सुधार के विषय में हस्तक्षेप न करना क्योंकि पहले आध्यात्मिक सुधार हुये बिना अन्य किसी भी प्रकार का सुधार हो नहीं सकता (पत्रावली भाग-1, पृष्ठ-296)
03. लोगों को यदि आत्मनिर्भरषील बनने की शिक्षा नहीं दी जाय तो जगत के सम्पूर्ण ऐश्वर्य पूर्ण रुप से प्रदान करने पर भी भारत के एक छोटे से छोटे गाँव की भी सहायता नहीं की जा सकती। शिक्षा प्रदान हमारा पहला काम होना चाहिए, चरित्र एवं बुद्धि दोनो।के ही उत्कर्ष साधन के लिए शिक्षा विस्तार आवश्यक है (पत्रावली भाग-2, पृष्ठ-125)
04. मेरे भाई बिना अवरोध के कोई भी अच्छा काम नहीं हो सकता। जो अन्त तक प्रयत्न करते हैं उन्हें सफलता प्राप्त होती है। मेरा विस्वास है कि जब एक जाति, एक वेद, शान्ति और एकता होंगी तब सतयुग आयेगा। वह सतयुग का विचार ही भारत को पुनः जीवन प्रदान करेगा। विस्वास रखो। (पत्रावली भाग-1, पृष्ठ-127)
05. पिछले महापुरुष अब कुछ प्राचीन हो चले हैं। अब नवीन भारत है जिसमें नवीन ईश्वर, नवीन धर्म और नवीन वेद है। हे भगवान भूतकाल पर निरन्तर ध्यान लगा रखने की आदत से हमारा देश कब मुक्त होगा? अच्छा, अपने मत में थोड़ी कट्टरता भी आवश्यक है परन्तु दूसरे की ओर हमें विरोध भाव नहीं रखना चाहिए (पत्रावली भाग-1, पृष्ठ-442)
06. हमेशा यूरोप से सामाजिक तथा एशिया से आध्यात्मिक शक्तियों का उद्भव होता रहा है एवं इन दोनों शक्तियों के विभिन्न प्रकार के सम्मिश्रण से ही जगत का इतिहास बना है। वर्तमान मानवेतिहास का एक और नवीन पृष्ठ धीरे-धीरे विकसित हो रहा है एवं चारो ओर उसी का चिन्ह दिखाई दे रहा है। कितनी ही नवीन योजनाओं का उद्भव तथा नाश होगा, किन्तु योग्यतम वस्तु की प्रतिष्ठा सुनिश्चित है-सत्य और शिव की अपेक्षा योग्यतम वस्तु और हो ही क्या सकती है? (पत्रावली भाग-1, पृष्ठ-310)
07. बौद्ध धर्म और नव हिन्दू धर्म के सम्बन्ध में मेरे विचारों में क्रांतिकारी परिवर्तन हुआ है। उन विचारों को निश्चित रुप देने के लिए कदाचित मैं जिवित न रहूँ परन्तु उसकी कार्यप्रणाली का संकेत मैं छोड़ जाऊँगा और तुम्हें और तुम्हारे भ्रातृगणों को उस पर काम करना होगा (पत्रावली भाग-2, पृष्ठ-310)

05. भारत का ऐतिहासिक क्रम विकास और अन्य प्रबन्ध
01. जाति समस्या का सूत्रपात था एवं भारत में कर्मकाण्ड, दर्शन तथा जड़वाद के मध्य उस त्रिभुजात्मक संग्राम का मूल भी यही था। जिसका समाधान हमारे इस युग तक सम्भव नहीं हो पाया है। इस समस्या के समाधान का प्रथम प्रयास था-सर्वसमन्वय के सिद्धान्त का उपयोग, जिसने आदिकाल से ही मनुष्य को अनेकत्व में भी विभिन्न स्वरूपों में लक्षित एक ही सत्य के दर्शन की शिक्षा दी। इस सम्प्रदाय के महान नेता क्षत्रिय वर्ग के स्वयं श्रीकृष्ण एवम् उनकी उपदेशावली गीता ने, जैनियों, बौद्धों एवम् इतर जन सम्प्रदायों द्वारा लायी गयी उथल-पुथल के फलस्वरूप विविध क्रान्तियों के बाद भी अपने को भारत का “अवतार“ एवम् जीवन का यथार्थतम् दर्शन सिद्ध किया। यद्यपि थोड़े समय के लिए तनाव कम हो गया, लेकिन उसके मूल में निहित सामाजिक अभावों का-जाति परम्परा में क्षत्रियों द्वारा सर्वप्रथम होने का दावा एवम् पुरोहितों के विशेषाधिकार की सर्वविदित असहिष्णुता का-जो अनेक कारणों से दो थे-समाधान इससे नहीं हो सका। जातिभेद एवम् लिंगभेद को ठुकराकर कृष्ण ने आत्मज्ञान एवम् आत्मसाक्षात्कार का द्वार सब के लिए समान रूप से खोल दिया, लेकिन उन्होंने इस समस्या को सामाजिक स्तर पर ज्यों का त्यों बना रहने दिया। पुनः यह समस्या आज तक चली आ रही है। (भारत का ऐतिहासिक क्रम विकास और अन्य प्रबन्ध, पृष्ठ-6)
02. भारत के इतिहास में साधारणतः देखा गया है कि धार्मिक उथल-पुथल के बाद सदा ही एक राजनीतिक एकता स्थापित हो जाती है, जो न्यूनाधिक रूप से समस्त देश में व्याप्त हो जाती है। इस एकता के फलस्वरूप उसको जन्म देने वाला धार्मिक दृष्टिकोण भी शक्तिशाली बनता है। (भारत का ऐतिहासिक क्रम विकास और अन्य प्रबन्ध, पृष्ठ-14)
03. भौतिकीकरण की अर्थात् यान्त्रिक क्रिया-कलाप के स्तर की ओर अधिकाधिक खिंचते जाने की इच्छाएं-पशु मानव की है। इन्द्रियों के इन समस्त बन्धनों का निराकरण कर देने की इच्छा उत्पन्न होने पर ही मनुष्य के हृदय में धर्म का उदय होता है। इस प्रकार हम देखते हैं कि धर्म का समग्र अभिप्राय मनुष्य को इन्द्रियों के बन्धनों में फंसने से बचाना और अपनी स्वतंत्रता को सिद्ध करने में उसकी सहायता करना है। उस लक्ष्य की ओर निवृत्ति की इस शक्ति के प्रथम प्रयास को नैतिकता कहते हैं। समग्र नैतिकता का अभिप्राय इस अधःपतन को रोकना और इस बन्धन को तोड़ना है। समस्त नैतिकता को विधायक और निषेधात्मक तत्वों में विभक्त किया जा सकता है। (भारत का ऐतिहासिक क्रम विकास और अन्य प्रबन्ध, पृष्ठ-18)
04. प्रकृति तीन रूपों में प्राप्त होती है-ईश्वर, चेतन और अचेतन अर्थात् ईश्वर, व्यक्तितायुक्त आत्माएं और अचेतन प्राणी। इन सब की वास्तविकता ब्रह्म है, यद्यपि माया के कारण वह विविध प्रतीत होता है। किन्तु ईश्वर का दर्शन वास्तविकता के निकटतम और उच्चतम है। (व्यक्तितायुक्त) सगुण ईश्वर की धारणा मनुष्य के लिए सर्वोच्च सम्भव विचार है। ईश्वर में आरोपित समस्तगुण उसी अर्थ में सत्य है, जिसमें प्रकृति के गुण सत्य है। फिर भी हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि सगुण ईश्वर माया के माध्यम से देखा जाने वाला ब्रह्म ही है। (भारत का ऐतिहासिक क्रम विकास और अन्य प्रबन्ध, पृष्ठ-34)
05. जिस किसी जाति में शस्त्र-बल आता है, वह क्षत्रिय हो जाती है; जिस किसी जाति में ज्ञान-बल आता है, वह ब्राह्मण हो जाती है और जिस किसी जाति में धन-बल आता है, वह वैश्य हो जाती है। (भारत का ऐतिहासिक क्रम विकास और अन्य प्रबन्ध, पृष्ठ-38)
06. क्षत्रियत्व-ब्राह्मण बनने के लिए यह सोपान पार करना होगा। अतीत में कुछ ने पार कर लिया होगा, पर वर्तमान के लोगों को तो प्रत्यक्ष दिखाना होगा। (भारत का ऐतिहासिक क्रम विकास और अन्य प्रबन्ध, पृष्ठ-56)
07. इसलिए सब से बड़ी समस्या है इन विविध तत्वों का बिना उनका विशिष्ट व्यक्तित्व नष्ट किये हुये, समन्वय करना-उन्हें एक सूत्र में बांध देना। (भारत का ऐतिहासिक क्रम विकास और अन्य प्रबन्ध, पृष्ठ-56)
08. यही अद्वैत दर्शन की महिमा है जो एक तत्व का उपदेश देता है, व्यक्ति का नहीं; और फिर भी लौकिक और अलौकिक, दोनों ही प्रकार के व्यक्तियों को कार्य करने का पूर्ण अवसर देता है। (भारत का ऐतिहासिक क्रम विकास और अन्य प्रबन्ध, पृष्ठ-56)
09. भविष्य में यह होने जा रहा है। यदि शेष समस्त समुदायों के श्रम का उपयोग करने वाली एक जाति की शक्ति की अभिव्यक्ति कम से कम एक विशेष अवधि में आश्चर्यजनक फल उत्पन्न कर सकती है। तो फिर यहाँ उन समस्त जातियों का संचयन और केन्द्रीकरण होने जा रहा है, जिनके विचारों का और रक्त का सम्मिश्रण मन्द गति से, पर अनिवार्य रूप से होता आ रहा है। और मैं अपने मानस-चहुओं से उस भावी विराट-पुरुष को धीरे-धीरे परिपक्व होता देख रहा है-धरती के समस्त राष्ट्रों में कनिष्ठतम, सर्वाधिक महिमामण्डित और ज्येष्ठतम भारत का भविष्य। (भारत का ऐतिहासिक क्रम विकास और अन्य प्रबन्ध, पृष्ठ-57)
10. कलियुग में दान ही एकमात्र कर्म है। जब तक कर्म द्वारा शुद्ध न हो तब तक किसी को ज्ञान की प्राप्ति नहीं होती। आध्यात्मिक और लौकिक ज्ञान का दान। राष्ट्र की पुकार-त्याग, त्यागी पुरुष। (भारत का ऐतिहासिक क्रम विकास और अन्य प्रबन्ध, पृष्ठ-57)
11. सुदूर भविष्य में देख सकने की विचार-शक्ति और वर्तमान में अतीत पुनः प्रस्तुत कर सकने वाली स्मरण शक्ति हमारे लिए स्वर्गिक जीवन सुलभ बना देती है; वही हमें नरक का जीवन बिताने को भी विवश कर देती है। (भारत का ऐतिहासिक क्रम विकास और अन्य प्रबन्ध, पृष्ठ-67)
12. नियम कभी घटनाचक्र से, सिद्धान्त कभी व्यक्ति से भिन्न नहीं होता। अपनी सीमा के भीतर, पृथक पदार्थ की, क्रिया अथवा निष्क्रिय सम स्थिति की विधि ही नियम कही जाती है। (भारत का ऐतिहासिक क्रम विकास और अन्य प्रबन्ध, पृष्ठ-68)
13. नियम पदार्थों की यथास्थिति में है-इस विधि से कि पदार्थ एक दूसरे के प्रति कैसे क्रियमान होते हैं; न कि कैसे उन्हें होना चाहिए। (भारत का ऐतिहासिक क्रम विकास और अन्य प्रबन्ध, पृष्ठ-68)
14. आध्यात्मिक नियम, नैतिक नियम, सामाजिक नियम, राष्ट्रीय नियम-तभी नियम है जब वे प्रस्तुत आत्मिक और मानव इकाईयों के अंग हो और इन नियमों से शासित मानी जाने वाली प्रत्येक इकाई को कर्म की अनिवार्य अनुभूति हो। (भारत का ऐतिहासिक क्रम विकास और अन्य प्रबन्ध, पृष्ठ-68)
15. हमारा निर्माण नियम द्वारा और हमारे द्वारा नियम का निर्माण-यह चक्र चलता है। कुछ विशिष्ट परिस्थितियों में मनुष्य अनिवार्यतः क्या करता है, इस सम्बन्ध में सामान्य निष्कर्ष-एक उन परिस्थितियों के सम्बन्ध में मनुष्य पर लागू होने वाला नियम है। अचल, सार्वभौम मानवीय व्यापार ही मनुष्य का नियम है, जिससे कोई भी व्यक्ति बच नहीं सकता-किन्तु यह भी सत्य है कि अलग-अलग व्यक्तियों के कार्यों का योग ही सार्वभौम नियम है। पूर्ण योग या सार्वभौम अथवा असीम ही व्यक्ति का निर्माण कर रहा है और व्यक्ति अपने क्रिया से उस विधान को सजीव बनाये हुए है। इस अर्थ में नियम सार्वभौम का ही दूसरा नाम है। सार्वभौम व्यक्ति पर निर्भर है, व्यक्ति सार्वभौम पर निर्भर है। यह अनन्त शान्त अंशों से निर्मित है। (भारत का ऐतिहासिक क्रम विकास और अन्य प्रबन्ध, पृष्ठ-69)
16. आध्यात्मिक और नैतिक नियम प्रत्येक मनुष्य की क्रिया पद्धति नहीं है। शीलाचार, नैतिकता, और राष्ट्रीय नियमों के पालन की अपेक्षा इनका उल्लंघन ही अधिक किया जाता है। यदि ये सब नियम होते तो भंग कैसे किये जा सकते। (भारत का ऐतिहासिक क्रम विकास और अन्य प्रबन्ध, पृष्ठ-70)
17. प्रकृति के नियमों के विपरीत जाने की सामथ्र्य किसी भी व्यक्ति में नहीं है। तो फिर ऐसा क्यों है कि हम सर्वदा मनुष्य द्वारा नैतिक और राष्ट्रीय नियमों के भंग किये जाने की शिकायत सुनते हैं? (भारत का ऐतिहासिक क्रम विकास और अन्य प्रबन्ध, पृष्ठ-70)
18. राष्ट्रीय नियम, अपने सर्वोत्कृष्ट रूप में, राष्ट्र के बहुमत की इच्छा के मूर्त रूप है-सर्वदा एक अन्य स्थिति, न कि यथार्थ स्थिति। इस प्रकार प्राकृतिक नियमों के सम्बन्ध में प्रयुक्त “नियम“ शब्द का अर्थ सामान्यतः नीतिशास्त्र और मानव क्रियाओं की भूमिका में बहुत बदल जाता है। (भारत का ऐतिहासिक क्रम विकास और अन्य प्रबन्ध, पृष्ठ-70)
19. संसार के नैतिक नियमों का विश्लेषण करने पर और यथार्थ स्थिति से उनकी तुलना करने पर दो नियम सर्वोपरि ठहरते हैं। एक है अपने से प्रत्येक वस्तु के विकर्षण का नियम-हर व्यक्ति से अपने को पृथक करना जिसका परिणाम होता है, अन्ततः दूसरों की सुख-सुविधा की बलि देकर भी अपने अभ्युदय की सिद्धि। दूसरा है आत्म-बलिदान का विधान-अपनी चिन्ता से सर्वथा मुक्ति7सर्वदा केवल दूसरों का ध्यान करना। संसार में महान और सत्पुरुष वे हैं जिनमें यह दूसरी क्षमता प्रबल होती है। फिर भी ये दोनों शक्तियाँ साथ साथ संयुक्त रूप से काम कर रही है; प्रायः प्रत्येक व्यक्ति में वह मिली हुई पायी जाती है, एक या दूसरी प्रमुख होती है। चोर, चोरी करता है; पर शायद, किसी दूसरे के लिए जिसे वह प्यार करता है। (भारत का ऐतिहासिक क्रम विकास और अन्य प्रबन्ध, पृष्ठ-70)
20. मुक्ति ही विश्व की प्रेरक है और मुक्ति ही इसका लक्ष्य है। प्रकृति के नियम में ऐसी पद्धतियाँ हैं जिनके द्वारा हम जगदम्बा के निर्देशन में, उस मुक्ति तक पहुँचने का संघर्ष करते हैं। मुक्ति के लिए इस विश्वव्यापी संघर्ष की सर्वोच्च अभिव्यक्ति मनुष्य में मुक्त होने की सजग अभिलाषा के रूप में होती है। यह मुक्ति तीन प्रकार से प्राप्त होती है-कर्म, उपासना और ज्ञान से। कर्म-दूसरों की सहायता करने और दूसरों को प्रेम करने का सतत अविरत प्रयत्न। उपासना-प्रार्थना-वन्दना, गुणगान और ध्यान। ज्ञान-जो ध्यान से उत्पन्न होता है। (भारत का ऐतिहासिक क्रम विकास और अन्य प्रबन्ध, पृष्ठ-73)


वेद, ईश्वर, अवतार, गुरू और मरणोत्तर जीवन

वेद, ईश्वर, अवतार, गुरू और मरणोत्तर जीवन


01. वेद
01. वेद का अर्थ अनादि सत्यों का समूह है। वेदज्ञ ऋषियों ने इन सत्यों को प्रत्यक्ष किया था। बिना अतिन्द्रिय दृष्टि के साधारण दृष्टि से ये सत्य प्रत्यक्ष नहीं होते। इसी से वेद में ऋषि का अर्थ मन्त्रार्थ दर्शी है, यज्ञोपवीतधारी ब्राह्मण नहीं। ब्राह्मण आदि जाति विभाग वेद के बाद हुआ था। वेद शब्दात्मक अर्थात् भावात्मक है अथवा अनन्त भाव राशि की समष्टि को ही वेद कहते हैं। “शब्द“ इस पद का वैदिक प्राचीन अर्थ सूक्ष्म भाव है, जो फिर आगे स्थूल रुप से अपने को व्यक्त करता है इसलिए प्रलय काल में भावी सृष्टि का सूक्ष्म बीज समूह वेद में ही संपुटित रहता है। इसी से पुराण में पहले-पहल मीनावतार से वेद का उद्धार दिखाई देता है। प्रथमावतार से ही वेद का उद्धार हुआ। (विवेकानन्द जी के संग में, पृष्ठ-61)
02. भारत में यह सर्वसम्मत है कि “वेद“ शब्द में तीन भाग सम्मिलित हैं-संहिता, ब्राह्मण और उपनिषद्। इनमें से पहले दो भाग कर्म काण्ड सम्बन्धी होने के कारण अब लगभग एक ओर कर दिये गये हैं। सब मतों के निर्माताओं तथा तत्व ज्ञानियों ने केवल उपनिषदों को ही ग्रहण किया है। केवल संहिता ही वेद है, यह स्वामी दयानन्द का शुरु किया हुआ विल्कुल नया विचार है और पुरातनमतावलम्बी या सनातनी जनता में इसको मानने वाला कोई नहीं है। इस मतावलम्बन का कारण यह था कि स्वामी दयानन्द समझते थे कि संहिता की एक नई व्याख्या के अनुसार वे पुरे वेद का एक सुसंगत सिद्धान्त निर्माण कर सकेंगे। परन्तु कठिनाइयाँ कुछ कम न हुई, केवल वे अब ब्राह्मण (वेदो के एक भाग का नाम) भाग के सम्बन्ध में उठ खड़ी हुई और अनेक व्याख्याओं तथा प्रक्षिप्तता की कल्पनाओं का सहारा लेने पर भी बहुत कुछ कठिनाइयाँ शेष ही रह गयीं। अब यदि यह सम्भव है कि संहिता के आधार पर एक समन्वयपूर्ण धर्म का निर्माण किया जाये तो यह सहस्त्र गुना अधिक सम्भव है कि एक समन्वयपूर्ण और सामंजस्य युक्त मत उपनिषदों के आधार पर बन सकता है, फिर इसमें पहले से प्राप्त राष्ट्रीय सम्मति के विपरीत न जाना पड़ेगा। यहाँ भूतकाल के सब आचार्य तुम्हारा साथ देंगे तथा उन्नति के नये मार्गों का विशाल क्षेत्र तुम्हारे सामने खुला है। निस्सन्देह गीता हिन्दुओं की बाइबिल बन चुकी है और यह इस मान के सर्वथा योग्य भी है। परन्तु श्रीकृष्ण का व्यक्तित्व काल्पनिक कथाओं के झुण्ड में ऐसा आच्छादित हो गया है कि उनके जीवन से जीवनदायिनी स्फूर्ति प्राप्त करना असम्भव सा जान पड़ता है दूसरे, वर्तमान युग में नई विचार प्रणाली और नवीन जीवन की आवश्यकता है (पत्रावली भाग-2, पृष्ठ-97)
03. स्मृति और पुराण-सीमित बुद्धि वाले व्यक्तियों की रचनाएँ हैं और भ्रम, प्रमाद, भेद तथा द्वेष भाव से परिपूर्ण है। उनके कुछ अंश जिनमें मन की उदारता और प्रेम का आविर्भाव है, ग्रहण करने योग्य है और शेष सब का त्याग कर देना चाहिए। उपनिषद् और गीता सच्चे शास्त्र हैं, और राम, श्रीकृष्ण, बुद्ध, चैतन्य, नानक, कबीर आदि सच्चे अवतार हैं, क्योंकि उनके हृदय आकाश के समान विशाल थे। ओर इन सब में श्रेष्ठ हैं-रामश्रीकृष्ण। रामानुज, शंकर इत्यादि संकीर्ण हृदय वाले केवल पंडित मालूम होते हैं। वह प्रेम कहाँ है, वह हृदय जो दूसरों का दुःख देखकर द्रवित हो? पंडितों का शुष्क विद्याभिमान-जैसे-तैसे केवल अपने आप को मुक्त करने की इच्छा। परन्तु महाशय क्या यह सम्भव है़? क्या इसकी कभी सम्भावना थी या हो सकती है? क्या अहम भाव का अल्पांश भी रहने से किसी चीज की प्राप्ति हो सकती है? (पत्रावली भाग-2, पृष्ठ-95)
04. सभी देशों में, सभी काल में कर्मकाण्ड, सामाजिक रीति-नीति सदा ही परिवर्तित होते रहते हैं। एक मात्र ज्ञान काण्ड ही परिवर्तित नहीं होता। वैदिक युग में भी देख, कर्मकाण्ड धीरे-धीरे परिवर्तित हो गया, परन्तु उपनिषद् का ज्ञान प्रकरण आज तक भी एक ही भाव से मौजूद है, सिर्फ उसकी व्याख्या करने वाले अनेक हो गये। (विवेकानन्द जी के संग में, पृष्ठ-259)

02. वेदान्त
01. समग्र धर्म वेदान्त में ही है अर्थात् वेदान्त दर्शन के द्वैत, विशिष्टाद्वैत और अद्वैत। इन तीन स्तरों या भूमिकाओं में है और ये एक के बाद एक आते हैं तथा मनुष्य की आध्यात्मिक उन्नति के क्रम से तीन भूमिकाएं हैं। प्रत्येक भूमिका आवश्यक है। यहीं सार रुप से धर्म है भारत के नाना प्रकार के जातीय आचार व्यवहारों और धर्म मतों में वेदान्त के प्रयोग का नाम है-हिन्दू धर्म। यूरोप की जातियों के विचारों नें उसकी पहली भूमिका अर्थात् द्वैत का प्रयोग है-ईसाई धर्म। सेनेटिक जातियों में उसका ही प्रयोग है-इस्लाम धर्म। अद्वैतवाद ही अपनी योगानुभूति के आकार में हुआ-बौद्ध धर्म। इत्यादि, इत्यादि। धर्म का अर्थ है वेदान्त, उसका प्रयोग विभिन्न जातियों के विभिन्न प्रयोजन, पारिपार्शिवक अवस्था एवं अन्यान्य अवस्थाओं के अनुसार विभिन्न रुपों में बदलता ही रहेगा। मूल दार्शनिक तत्व एक होने पर भी तुम देखोगे कि शैव, शाक्त आदि हर एक ने अपने विशेष धर्ममत और अनुष्ठान पद्धति में उसे रुपान्तरित कर लिया है (पत्रावली भाग-1, पृष्ठ-318)
02. एक श्रेणी के वेदान्त वादियों का ऐसा ही मत है-वे कहते हैं “व्यष्टि की मुक्ति, मुक्ति का वास्तविक स्वरुप नहीं है। इस समष्टि की मुक्ति ही मुक्ति है।“ हाँ, इस मत के दोष-गुण अवश्य दिखाए जा सकते हैं (विवेकानन्द जी के संग में, पृष्ठ-255)

03. ईश्वर
01. जिस प्रकार मानवी शरीर एक व्यक्ति है और उसका प्रत्येक सूक्ष्म भाग जिसे हम “कोश“ कहते हैं एक अंश है। उसी प्रकार सारे व्यक्तियों का समष्टि ईश्वर है, यद्यपि वह स्वयं भी एक व्यक्ति है। समष्टि ही ईश्वर है, व्यष्टि या अंश जीव है। इसलिए ईश्वर का अस्तित्व जीवों के अस्तित्व पर निर्भर है जैसे कि शरीर का उसके सूक्ष्म भाग पर और सूक्ष्म भाग का शरीर पर। इस प्रकार जीव और ईश्वर परस्परावलम्बी हैं। जब तक एक का अस्तित्व है तब तक दूसरे का भी रहेगा। और हमारी इस पृथ्वी को छोड़कर अन्य सब उँचे लोकों में शुभ की मात्रा अशुभ से अधिक होती है। इसलिए वह समष्टि स्वरुप ईश्वर शिव स्वरुप, सर्वशक्तिमान और सर्वज्ञ कहा जा सकता है। ये गुण प्रत्यक्ष प्रतीत होते हैं। ईश्वर से सम्बद्ध होने के कारण उन्हें प्रमाण करने के लिए तर्क की आवश्यकता नहीं होती। ब्रह्म इन दोनों से परे है और वह कोई विशिष्ट अवस्था नहीं है वह एक ऐसी वस्तु है जो अनेकों की समष्टि से नहीं बनी है। वह एक ऐसी सत्ता है जो सूक्ष्मातित-सूक्ष्म से लेकर ईश्वर तक सब में व्याप्त है और उसके बिना किसी का अस्तित्व नहीं हो सकता सभी का अस्तित्व उसी सत्ता या ब्रह्म का प्रकाश मात्र है। जब मैं सोचता हूँ “मैं ब्रह्म हूँ“ तब मेरा यथार्थ अस्तित्व होता है ऐसा ही सबके बारे में है विश्व की प्रत्येक वस्तु स्वरुपतः वहीं सत्ता है (पत्रावली भाग-2, पृष्ठ-18)
02. सबका स्वामी (परमात्मा) कोई व्यक्ति विशेष नहीं हो सकता, वह तो सबकी समष्टि स्वरुप ही होगा। वैराग्यवान मनुष्य आत्मा शब्द का अर्थ व्यक्तिगत “मैं“ न समझकर, उस सर्वव्यापी ईश्वर को समझता है जो अन्तर्यामी होकर सबमें वास कर रहा हो। वे समष्टि के रुप में सब को प्रतीत हो सकते हैं ऐसा होते हुए जब जीव और ईश्वर स्वरुपतः अभिन्न हैं, तब जीवों की सेवा और ईश्वर से प्रेम करने का अर्थ एक ही है। यहाँ एक विशेषता है। जब जीव को जीव समझकर सेवा की जाती है तब वह दया है, किन्तु प्रेम नहीं। परन्तु जब उसे आत्मा समझकर सेवा करो तब वह प्रेम कहलाता है। आत्मा ही एक मात्र प्रेम का पात्र है, यह श्रुति, स्मृति और अपरोक्षानुभूति से जाना जा सकता है। भगवान चैतन्यदेव ने इसलिए यह ठीक कहा था-“ईश्वर से प्रेम और जीवों पर दया“ वे द्वैतवादी थे, इसलिए उनका अन्तिम निर्णय जिसमें वे जीव और ईश्वर में भेद करते हैं उनके लिए ठीक है परन्तु हम अद्वैत वादी हैं हमारे लिए जीव को परमात्मा से पृथक करना बन्धन का कारण है इसलिए मूल तत्व दया न होना चाहिए परन्तु प्रेम। हमारा धर्म करुणा नहीं वरन् सेवा धर्म है और सब में आत्मा ही को देखना है। (पत्रावली भाग-2, पृष्ठ-109)
03. “स ईशोऽनिर्वचनीयप्रेमस्वरुपः“-ईश्वर अनिर्वचनीय प्रेम स्वरुप है। नारद द्वारा वर्णन किया हुआ ईश्वर का यह लक्षण स्पष्ट है और सब लोगों को स्वीकार है। यह मेरे जीवन का दृढ़ विश्वास है। बहुत सेे व्यक्तियों के समूह कांे समष्टि कहते हैं और प्रत्येक व्यक्ति, व्यष्टि कहलाता है आप और मैं दोनों व्यष्टि हैं, समाज समष्टि है आप और मैं-पशु, पक्षी, कीड़ा, कीड़े से भी तुक्ष प्राणी, वृक्ष, लता, पृथ्वी, नक्षत्र और तारे यह प्रत्येक व्यष्टि है और यह विश्व समष्टि है जो कि वेदान्त में विराट, हिरण गर्भ या ईश्वर कहलाता है। और पुराणों में ब्रह्मा, विष्णु, देवी इत्यादि। व्यष्टि को व्यक्तिशः स्वतन्त्रता होती है या नहीं, और यदि होती है तोे उसका नाम क्या होना चाहिए। व्यष्टि को समष्टि के लिए अपनी इच्छा और सुख का सम्पूर्ण त्याग करना चाहिए या नहीं, वे प्रत्येक समाज के लिए चिरन्तन समस्याएँ हैं सब स्थानों में समाज इन समस्याओं के समाधान में संलग्न रहता है ये बड़ी-बड़ी तरंगों के समान आधुनिक पश्चिमी समाज में हलचल मचा रही हैं जो समाज के अधिपत्य के लिए व्यक्तिगत स्वतन्त्रता का त्याग चाहता है वह सिद्धान्त समाजवाद कहलाता है और जो व्यक्ति के पक्ष का समर्थन करता है वह व्यक्तिवाद कहलाता है। (पत्रावली भाग-2, पृष्ठ-288)
04. यन्त्र कभी नियम को उल्लंघन करने की कोई इच्छा नहीं रखता। कीड़ा नियम का विरोध करना चाहता है और नियम के विरुद्ध जाता है चाहे उस प्रयत्न में वह सिद्धि लाभ करे या असिद्धि, इसलिए वह बुद्धिमान है। जिस अंश में इच्छाशक्ति के प्रकट होने में सफलता होती है उसी अंश में सुख अधिक होता है और जीव उतना ही उँचा होता है परमात्मा की इच्छा शक्ति पूर्ण रुप से सफल होती है इसलिए वह उच्चतम है। (पत्रावली भाग-2,  पृष्ठ-290)
05. ईश्वर उस निरपेक्ष सत्ता की उच्चतम अभिव्यक्ति है, या यों कहिए, मानव मन के लिए जहाँ तक निरपेक्ष सत्य की धारणा करना सम्भव है, बस वहीं ईश्वर है। सृष्टि अनादि है और उसी प्रकार ईश्वर भी अनादि है (भक्ति योग, पृष्ठ-13)
06. यह सारा झगड़ा केवल इस “सत्य“ शब्द के उलटफेर पर आधारित है। “सत्य“ शब्द से जितने भाव सूचित होते हैं वे समस्त भाव “ईश्वर भाव“ में आ जाते हैं। ईश्वर उतना ही सत्य है जितनी विश्व की कोई अन्य वस्तु। और वास्तव में, “सत्य“ शब्द यहाँ पर जिस अर्थ में प्रयुक्त हुआ है, उससे अधिक “सत्य“ शब्द का कोई अर्थ नहीं। यहीं हमारी ईश्वर सम्बन्धी दार्शनिक धारण है। (भक्ति योग, पृष्ठ-21)

 04. गुरु, शिष्य, अवतार और मन्त्र
01. जिस व्यक्ति की आत्मा से दूसरी आत्मा में शक्ति का संचार होता है वह गुरु कहलाता है और जिसकी आत्मा में यह शक्ति संचारित होती है उसे शिष्य कहते हैं (भक्ति योग, पृष्ठ-27)
02. “यथार्थ धर्म गुरु“ में अपूर्व योग्यता होनी चाहिए, और उसके शिष्य को भी कुशल होना चाहिए। जब दोनों ही अद्भुत और असाधारण होते हैं तभी अद्भुत आध्यात्मिक जागृति होती है अन्यथा नहीं (भक्ति योग, पृष्ठ-27)
03. सत्य स्वयं ही प्रमाण है उसे प्रमाणित करने के लिए किसी दूसरे साक्षी की आवश्यकता नहीं, वह स्व प्रकाश है। वह हमारी प्रकृति के अन्तः स्थल तक प्रवेश कर जाता है और उसके समक्ष सारी दुनियाँ उठ खड़ी होती है और कहती है-“यहीं सत्य है“ जिन आचार्यों के हृदय में सत्य और ज्ञान सूर्य के समान दैदिप्यमान होते हैं, वे संसार में सर्वोच्च महापुरुष हैं और अधिकांश मानव जाति द्वारा उनकी उपासना ईश्वर के रुप में होती है (भक्ति योग, पृष्ठ-31)
04. शिष्य के लिए यह आवश्यक है कि उसमें पवित्रता, सच्ची ज्ञान पिपासा और अध्यवसाय हो। अपवित्र आत्मा कभी यथार्थ धार्मिक नहीं हो सकती। धार्मिक होने के लिए तन, मन और वचन की शुद्धता नितान्त आवश्यक है (भक्ति योग, पृष्ठ-31)
05. गुरु के सम्बन्ध में यह जान लेना आवश्यक है कि उन्हें शास्त्रो का मर्म ज्ञान हो। वैसे तो सारा संसार ही बाइबिल, वेद, पुराण पढ़ता है, पर वे तो केवल शब्द राशि है। धर्म की सूखी ठठरी मात्र है। जो गुरु शब्दाडंबर के चक्कर में पड़ जाते हैं, जिनका मन शब्दों की शक्ति में बह जाता है, वे भीतर का मर्म खो बैठते हैं। जो शास्त्रों के वास्तविक मर्मज्ञ हैं, वे ही असल में सच्चे धार्मिक गुरु हैं (भक्ति योग, पृष्ठ-32)
06. संसार के प्रधान आचार्यों में से कोई भी शास्त्रों की इस प्रकार नानाविध व्याख्या करने के झमेंले में नहीं पड़ा। उन्होनें श्लोकों के अर्थ में खींचातानी नहीं की। वे शब्दार्थ और भावार्थ के फेर मंे नहीं पड़े। फिर भी उन्होंने संसार को बड़ी सुन्दर शिक्षा दी। इसके विपरीत, उन लोगों ने जिनके पास सिखाने को कुछ भी नहीं, कभी एकाध शब्द को ही पकड़ लिया और उस पर तीन भागों की एक मोटी पुस्तक लिख डाली, जिसमें सब अनर्थक बातें भरी हैं (भक्ति योग, पृष्ठ-33)
07. धर्म ही सर्वोच्च ज्ञान है-वहीं सर्वोच्च विद्या है। वह पैसों से नहीं मिल सकता और न पुस्तकों से ही। तुम भले ही संसार का कोना-कोना छान डालो, जब तक गुरु का आगमन नहीं होता, जब जक तुम धर्म को कहीं ना पाआंगे। और ये विधाता-निर्दिष्ट गुरु प्राप्त हों जाय जो उनके निकट बालकवत विश्वास और सरलता के साथ अपना हृदय खोल दो और साक्षात ईश्वर ज्ञान से उनकी सेवा करो। जो लोग इस प्रकार प्रेम और श्रद्धा सम्पन्न होकर सत्य की खोज करते हैं, उनके निकट सत्य स्वरुप भगवान सत्य, शिव और सौन्दर्य के अलौकिक तत्वों को प्रकट कर देते हैं (भक्ति योग, पृष्ठ-38)
08. वह भक्त सचमुच ही भाग्यशाली है जिसे ऐसा गुरु मिलता है जिये साक्षात्कार हो गया हो या परम पुरुष हो क्योंकि ऐसे गुरु केवल शिक्षा ही नहीं देते बल्कि अपने शिष्यों में शिक्षा के पालन हेतु शक्ति का संचार भी करते हैं। ऐसे आध्यात्मिक आचार्यों के शब्दों में दृढ़ विश्वास रहता है जो दूसरे साधनों से प्राप्त नहीं हो सकता और शिष्य ऐसे गुरु से दीक्षित होकर कभी अंधेरे में भटकता नहीं है बल्कि कठिन से कठिन पथ पर अग्रसर होता है। ऐसे आध्यात्मिक शिक्षक से एक बार सम्पर्क हुआ नहीं कि साधक की मंजिल प्राप्ति का विकास निश्चित हो जाता है। इसका अभिप्राय यह नहीं कि वह अपने उद्देश्य के लिए संघर्ष नहीं करेगा, बल्कि उसका संघर्ष सौ गुना कम हो जायेगा (योग क्या है, पृष्ठ-24)
09. दो प्रकार के लोग ईश्वर की मनुष्य रुप में उपासना नहीं करते। एक तो नर पशु, जिसे धर्म का कोई ज्ञान नहीं और दूसरे परमहंस, जो मानव जाति के सारी दुर्बलताओं के उपर उठ चुके हैं और जो अपनी मानवी प्रकृति की सीमा के भी उस पार चले गये हैं। उनके लिए सारी प्रकृति आलस्यरुप हो गयी है। वे ही भगवान को उनके असल स्वरुप में भज सकते हैं। (भक्ति योग, पृष्ठ-42)
10. साधारण गुरुओं से श्रेष्ठ एक और श्रेणी के गुरु होते हैं, और वे हैं-इस संसार में ईश्वर के अवतार। वे केवल स्पर्श से, यहाँ तक कि इच्छा मात्र से ही आध्यात्मिकता प्रदान कर सकते हैं। उनकी इच्छा मात्र से पतित से पतित व्यक्ति क्षण मात्र में साधु हो जाता है। वे गुरुओं के भी गुरु हैं-नरदेहधारी भगवान हैं। (भक्तियोग, पृष्ठ-39)
11. अवतार का अर्थ है जीवनमुक्त अर्थात् जिन्होंने ब्रह्मत्व प्राप्त किया है। अवतार विषयक और कोई विशेषता मेरी दृष्टि में नहीं है। ब्रह्मादिस्तम्यपर्यत्त सभी प्राणी समय आने पर जीवनमुक्ति को प्राप्त करेंगे, उस अवस्था विशेष की प्राति में सहायक बनना ही हमारा कर्तव्य है। इस सहायता का नाम धर्म है बाकी कुधर्म है। इस सहायता का नाम कर्म है। बाकी कुकर्म है। (पत्रावली भाग-1, पृष्ठ-328)
12. जिस आत्मा की इतनी महिमा शास्त्रों से जानी जाती है वह आत्मा का ज्ञान जिनकी कृपा से एक मुहूर्त में प्राप्त होता है, वे ही हैं सचल तीर्थ-अवतार पुरुष। वे जन्म से ही ब्रह्मज्ञ हैं और ब्रह्म तथा ब्रह्मज्ञ में कुछ भी अन्तर नहीं है-“ब्रह्म वेद ब्रह्मेव भवति“। आत्मा को तो फिर जाना नहीं जाता क्योंकि यह आत्मा ही जानने वाला और जनन करने वाला बना हुआ है यह बात पहले ही मैंने कही है। अतः मनुष्य का जानना उसी अवतार तक है जो आत्मस्थ है। मानव बुद्धि ईश्वर के सम्बन्ध में जो सबसे उच्च भाव ग्रहण कर सकती है, वह वहीं तक है। इसके बाद और जानने का प्रश्न नहीं रहता। उस प्रकार के ब्रह्मज्ञ कभी-कभी ही जगत में पैदा होते हैं। उन्हें कम लोग ही समझ पाते हैं। वे ही शास्त्र वचनों के प्रमाण स्थल हैं भव सागर के आलोक स्तंभ हैं। (विवेकानन्द जी के संग में, पृष्ठ-214)
13. बुद्ध अवतार में भगवान कहते हैं कि आधि भौतिक दुःख का कारण भेद ही है अर्थात् जन्मगत, गुणगत या धनगत। सब तरह का भेद इन दुखों का कारण है। आत्मा में लिंग, वर्ण या आश्रम या इस प्रकार का कोई भेद नहीं होता और जैसे कीचड़ के द्वारा कीचड़ नहीं धोया जाता उसी तरह से भेद भाव से अभेद साबित होना असम्भव है। श्रीकृष्ण अवतार में वे कहते हैं कि सब दुखों का मूल अविद्या है और निष्काम कर्म चित्त को शुद्ध करता है परन्तु “कर्म क्या है और अकर्म क्या है“ इसका निर्णय करने में महात्मा भी मोह में पड़ जाते हैं। जिस कर्म के द्वारा इस आत्मा भाव का विकास होता है वही कर्म है और जिसके द्वारा अनात्म भाव का विकास होता है वही अकर्म है। अतएव कर्म या अकर्म का निर्णय व्यक्तिगत, देशगत और कालगत परिस्थिति के अनुसार होना चाहिए। यज्ञ इत्यादि कर्म प्राचीन काल में उपयोगी थे तथा जातिगत कर्म भी। परन्तु वर्तमान काल के लिए वैसा नहीं है। रामश्रीकृष्ण अवतार में नास्तिक विचार ज्ञान रुपी तलवार से नष्ट होंगे और सम्पूर्ण जगत भक्ति और प्रेम से एक रुप होगा। दूसरे शब्दों में, उसका जीवन धन्य है जो इस अवतार के उपदेश को व्यवहार में लाये चाहे वह उन्हें स्वयं माने या न माने (पत्रावली भाग-1, पृष्ठ-373)
14. भगवान मनुष्य की दुर्बलताओं को समझते हैं और मानवता के कल्याण के निए नर देह धारण करते हैं। भगवान श्रीकृष्ण ने अवतार के सम्बन्ध में गीता में कहा है, “जब-जब धर्म की ग्लानि होती है और अधर्म का अभ्युत्थान होता है, तब-तब मैं अवतार लेता हूँ। साधुओं की रक्षा और दुष्टों के नाश के लिए तथा धर्म संस्थापनार्थ मैं युग-युग में अवतीर्ण होता हूँ।“ (गीता 4/7-9) मूर्ख लोग मुझ जगदीश्वर के यथार्थ रुप को न जानने के कारण मुझ नरदेह धारी की अवहेलना करते हैं। (गीता 9/11) (भक्ति योग, पृष्ठ-43)
15. भगवान श्री राम कृष्ण कहते थे-“जब एक बहुत बड़ी लहर आती है, तो छोटे-छोटे नाले और गड्ढे अपने आप ही लबालब भर जाते हैं। इसी प्रकार जब एक अवतार जन्म लेता है, तो समस्त संसार मंे आध्यात्मिकता की एक बड़ी बाढ़ आ जाती है और लोग वायु के कण कण में धर्मभाव का अनुभव करने लगते हैं।“ (भक्ति योग, पृष्ठ-43)
16. मतों आदि के बारे में मुझे यहीं कहना है कि कोई श्रीरामश्रीकृष्णदेव को अवतार आदि को स्वीकार करे तो अच्छा है, यदि न करे तो भी ठीक है। परन्तु सच बात तो यह है कि चरित्र के विषय में श्रीरामश्रीकृष्णदेव सबसे आगे बढ़े हुए हैं। उनके पहले जो अवतारी महापुरुष हुए हैं उनसे वे अधिक उदार, अधिक मौलिक और अधिक उन्नतशील थे, परन्तु इस नये अवतार या आचार्य की शिक्षा यह है कि योग, भक्ति, ज्ञान और कर्म के सर्वोच्च भावों का सम्मिलन होना चाहिए जिससे एक नये समाज का निर्माण हो सके। प्राचीन आचार्य निःसन्देह अच्छे थे परन्तु यह इस युग का नया धर्म है-अर्थात् योग, ज्ञान, भक्ति और कर्म का समन्वय-आयु और लिंग भेद के बिना, पतित से पतित तत्व में ज्ञान और भक्ति का प्रचार। पहले के अवतार ठीक थे, परन्तु श्रीरामश्रीकृष्ण के व्यक्तित्व में अच्छा समन्वय हो गया है। (पत्रावली भाग-1, पृष्ठ-441)
17. उन्हें (सिद्ध गुरुवों) मंत्र द्वारा शिष्यों में आध्यात्मिक ज्ञान का बीजारोपड़ करना पड़ता है। ये मंत्र क्या हैं? भारतीय दर्शन के अनुसार नाम और रुप ही इस जगत की अभिव्यक्ति के कारण हैं। मानवीय अन्तर्जगत में एक भी ऐसी चित्तवृत्ति नहीं रह सकती, जो नाम-रुपात्मक न हो। (भक्ति योग, पृष्ठ-44)
18. बृहत् ब्रह्माण्ड में भी ब्रह्मा, हिरण्यगर्भ या समष्टि महत् ने पहले अपने आप को नाम के, और फिर बाद में रुप के आकार में अर्थात् इस परिदृश्यमान जगत के आकार में अभिव्यक्त किया। (भक्ति योग, पृष्ठ-44)
19. यह सारा व्यक्त इन्द्रियग्राह्य जगत रुप है, और इसकें पीछे है अनन्त अव्यक्त स्फोट। स्फोट का अर्थ-समस्त जगत की अभिव्यक्ति का कारण शब्द-ब्रह्म है। समस्त नामों अर्थात् भावों की नित्य समवायी उपादान स्वरुप यह नित्य स्फोट ही वह शक्ति है, जिससे भगवान इस विश्व की सृष्टि करते हैं। यहीं नहीं बल्कि भगवान पहले स्फोट रुप में परिणत हो जाते हैं और तत्पश्चात् अपने को उससे भी स्थूल इस इन्द्रियग्राह्य जगत केे रुप में परिणत कर लेते हैं। (भक्ति योग, पृष्ठ-45)
20. इस स्फोट का एक मात्र वाचक शब्द है-“ऊँ“। और चूँकि हम किसी भी उपाय से शब्द को भाव से अलग नहीं कर सकते, इसलिए यह “ऊँ“ भी इस नित्य स्फोट से नित्य संयुक्त है। (भक्ति योग, पृष्ठ-45)
21. एकमेंव यह “ऊँ“ ही इस प्रकार सर्वभावाव्यापी वाचक शब्द है, अन्य कोई भी इसके समान नहीं। स्फोट ही सारे भावों का उपादान है, फिर भी वह स्वयं पूर्ण रुप से विकसित कोई विशिष्ट भाव नहीं है। अर्थात् यदि उन सब भेदों को, जो एक भाव को दूसरे से अलग करते हैं, निकाल दिया जाय, तो जो कुछ बचा रहता है, वहीं स्फोट है। इसलिए इस स्फोट को “नादब्रह्म“ कहते हैं। (भक्ति योग, पृष्ठ-45)
22. जो वाचक शब्द उसे सब से कम विशेषभावापन्न करेगा, पर साथ ही उसके स्वरुप को यथासम्भव पूरी तरह प्रकाशित करेगा, वहीं उसका सबसे सच्चा वाचक होगा। और यह वाचक शब्द है-एकमात्र “ऊँ“ क्योंकि ये तीनों अक्षर अ, उ और म्, जिनका एक साथ उच्चारण करने से “ऊँ“ होता है, समान शब्दों के सधारण वाचक के तौर पर लिये जा सकते हैं। (भक्ति योग पृष्ठ, पृष्ठ-46)
23. अक्षर “अ“ सारे अक्षरों में सबसे कम विशेषभावापन्न है। इसीलिए भगवान श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं-“अक्षरों में मैं “अ“ कार हूँ।“ (गीता,10/33) स्पष्ट रुप से उच्चारित जितने भी शब्द हैं, उनकी उच्चारण क्रिया मुख में जिह्वा के मूल से आरम्भ होती है और ओठों में आकर समाप्त हो जाती है। “अ“ जिह्वा मूल अर्थात् कण्ठ से उच्चारित होता है, और “म“ ओठों से होने वाला अन्तिम शब्द है। और “उ“ उस शक्ति का सूचक है, जो जिह्वा मूल से आरम्भ होकर मुँह भर में लुढ़कती हुई ओठों में आकर समाप्त हो जाजी है। यदि “ऊँ“ का उच्चारण ठीक ढंग से किया जाय, तो इसके शब्दोच्चारण की सम्पूर्ण क्रिया सम्पन्न हो जाती है-दूसरे किसी भी शब्द में यह शक्ति नहीं। (भक्ति योग, पृष्ठ-46)
24. जिस प्रकार अल्पतम् विशेष भावात्मक तथा सार्वभौमिक वाचक शब्द “ऊँ“ के सम्बन्ध में वाच्य और वाचक आपस में अभेद्य रुप से सम्बद्ध हैें उसी प्रकार वाच्य और वाचक का यह अविच्छिन्न सम्बन्ध भगवान और विश्व के विभिन्न खण्ड भावों पर भी लागू है, अतएव उनमें से प्रत्येक का एक विशिष्ट वाचक शब्द होना आवश्यक है। (भक्ति योग, पृष्ठ-47)
25. ये वाचक शब्द ऋषियों की गम्भीरतम आध्यात्मिक अनुभूति से उत्पन्न हुए हैं और वे भगवान तथा विश्व के जिन विशेष-विशेष खण्ड भाव के वाचक हैं, उन विशेष भावों को यथासम्भव प्रकाशित करते हैं। जिस प्रकार “ऊँ“ अखण्ड ब्रह्म का वाचक है, उसी प्रकार अन्यान्य मंत्र भी उसी परम पुरुष के खण्ड-खण्ड भावों के वाचक हैं। ये सभी ईश्वर के ध्यान और प्रकृत ज्ञान की प्राप्ति में सहायक हैं। (भक्ति योग, पृष्ठ-47)

05. मरणोत्तर जीवन
01. यदि प्रवृत्ति बारम्बार किये हुये कर्म का परिणाम है, तो जिन प्रवृत्तियों को साथ लेकर हम जन्म धारण करते है, उनको समझने के लिए उस कारण का भी उपयोग करना चाहिए। यह तो स्पष्ट है कि वे प्रवृत्तियाँ हमें इस जन्म में प्राप्त हुई नहीं हो सकती; अतः हमें उनका मूल पिछले जन्म में ढूंढना चाहिए। अब यह भी स्पष्ट है कि हमारी प्रवृत्तियों में से कुछ तो मनुष्य के ही जान-बूझकर किये हुए प्रयत्नों के परिणाम है, और यदि यह सच है कि हम उन प्रवृत्तियों को अपने साथ लेकर जन्म लेते हैं, तब तो बिल्कुल यही सिद्ध होता है कि उनके कारण गतजन्म में जान-बूझकर किये हुये प्रयत्न ही है-अर्थात् इस वर्तमान जन्म के पूर्व हम उसी मानसिक भूमिका में रहे होंगे, जिसे हम मानव भूमिका कहते हैं। (मरणोत्तर जीवन, पृष्ठ-25)
02. पुनर्जन्मवादी लोग यह मानते हैं कि सभी अनुभव प्रवृत्तियों के रूप में अनुभव करने वाली जीवात्मा में संगृहीत रहते हैं और उसे अविनाशी जीवात्मा के पुनर्जनम द्वारा संक्रमित किये जाते हैं; भौतिकवाद वाले मस्तिष्क को सभी कर्मों के आधार होने के और बीजाणुओं के द्वारा उनके संक्रमण का सिद्धान्त मानते हैं। यदि बीजाणुओं द्वारा आनुवंशिक संक्रमण समस्या को हल करने के लिए पूर्णतः पर्याप्त है, तब तो भैतिकता ही अपरिहार्य है और आत्मा के सिद्धान्त की कोई आवश्यकता नहीं है। यदि वह पर्याप्त नहीं है, तो प्रत्येक आत्मा अपने साथ इस जन्म में अपने भूतकालिक अनुभवों को लेकर आती है, यह सिद्धान्त पूर्णतः सत्य है। पुनर्जन्म या भौतिकता-इन दो में से किसी एक को मानने के सिवा और कोई गति नहीं है। प्रश्न यह है कि हम किसे मानें? (मरणोत्तर जीवन, पृष्ठ-26)