Sunday, March 15, 2020

राजाराम मोहन राय - ब्रह्म समाज

राजाराम मोहन राय - ब्रह्म समाज  
          
परिचय -
राम मोहन राय का जन्म पश्चिम बंगाल के राधानगर ग्राम में 22 मई, 1772 ई. को हुआ था। उनके पिता रमाकान्त राय सभ्रान्त ब्राह्मण थे। इस्लामी व हिन्दू धर्म के मूल रूप में अध्ययन के फलस्वरूप मोहन राय ने मूर्तिपूजा का परित्याग कर एकेश्वरवाद को स्वीकार किया। जन्मजात सत्यान्वेषक होने के नाते उन्होंने लगभग 3 वर्ष सुदूर तिब्बत में बौद्धधर्म के परिज्ञानार्थ व्यतीत किये। ईस्ट इण्डिया कम्पनी की सेवा में रहकर राम मोहन राय ने ईसाई धर्म का अध्ययन किया तथा आंग्ल मनीषीयों से उनका सम्पर्क हुआ। राममोहन राय की प्रथम पुस्तक ”तुहफतुल मुहाविद्दीन (एकेश्वरवादीयों के लिए एक उपहार)“ ने यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि एक ईश्वर में विश्वास सभी धर्म का सार है। उन्होंने हिन्दू एवं ईसाई दोनों के रूढ़िवादिता के विरूद्ध सफल संघर्ष किया। राममोहन राय का स्वर्गवास 27 सितम्बर, 1833 ई0 को ब्रिस्टल, इग्लैण्ड में हुआ जहाँ वे सामाजिक व रानैतिक उद्देश्य से गये थे।

ब्रह्म समाज का परिचय 
18 वीं शती के अंत में भारत पाश्चात्य प्रभावों एवं राष्ट्रीय रूढ़ीवादिता के चतुष्पथ पर खड़ा था। शक्तियों के इस संघर्ष के फलस्वरूप एक नवीन गतिशीलता का उदय हुआ जो सुधार के उस युग का प्रतीक थी। जिसका शुभारम्भ पथान्वेषक एवं भारतीय नवजागृति के प्रथम अग्रदूत राजा राममोहन राय के आगमन के साथ हुआ। 23 जनवरी, (माघ, 11), 1830 ई. को ब्रह्म समाज की स्थापना, सगुण ब्रह्म की उपासना का प्रथम सर्वोपरि मन्दिर से नवीन धार्मिक आन्दोलन का जन्म हुआ। राममोहन राय द्वारा प्रवर्तित एकमेवाद्वितीय ब्रह्म की जाति, धर्म तथा निरपेक्ष उपासना ने प्रिंस द्वारिकानाथ के आत्मज महर्षि देवेन्द्र नाथ ठाकुर (1917-1905) पर अति गम्भीर प्रभाव डाला। देवेन्द्रनाथ ने ही ब्रह्म समाज को प्रथम सिद्धान्त प्रदान किये तथा ध्यानगम्य उपनिषदीय पवित्रता के अभ्यास का सूत्रपात किया। प्रथमाचार्य देवेन्द्रनाथ की उपासनाविधि इस प्रकार प्रधानतः उपनिषदीय थी। प्रेममय ईश्वर के अनुग्रह से प्राप्त अनुभूतिगम्य आत्मसाक्षात्कार उनका महत्वपूर्ण योग था। उन्होंने आध्यत्कि साधना हेतू एक संस्था ”तत्वबोधिनी सभा“ का आरम्भ किया। तत्वबोधिनी पत्रिका, सभा की प्रमुख पत्रिका के रूप में बहुतों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी। देवेन्द्रनाथ के नेतृत्व में एक अपूर्व निर्णय लिया गया कि वेद अच्युत नहीं हैं तथा तर्क एवं अन्तःकरण को सर्वोपरि प्रमाण मानना है। ब्रह्म समाज ने तथा समाज सुधार का कार्य अपने हाथ में लिया। ब्रह्म समाज के अन्तर्गत केशव चन्द्र सेन के आगमन के साथ ब्रह्म समाज को गति मिली। महर्षि देवेन्द्रनाथ ने उन्हें ब्रह्मानन्द की संज्ञा देकर समाज का आचार्य बनाया। केशव चन्द्र के आकर्षक व्यक्तित्व ने ब्रह्म समाज के आन्दोलन को स्फूर्ति प्रदान की। उन्होंने भारत के शैक्षिक, समाजिक तथा आध्यात्मिक पुनर्जनन में चिरस्थायी योग दिया। केशव चन्द्र के सतत अग्रगामी दृष्टिकोण एवं क्रियाकलाप के साथ-साथ चलना देवेन्द्रनाथ के लिए कठिन था, यद्यपि दोनों महानुभावों की भावना में सदैव मतैक्य था। सन् 1886 ई. में केशव चन्द्र ने ”भारतीय ब्रह्म समाज“ की स्थापना की। इस पर देवेन्द्र नाथ ने अपने समाज का नाम ”आदि ब्रह्म समाज“ रख दिया। केशव चन्द्र के प्रेरक नेतृत्व में भारतीय ब्रह्म समाज देश की एक महती शक्ति बन गया। इसकी विस्तृताधारीय सर्वव्याप्ति की अभिव्यक्ति ”श्लोक संग्रह“ में हुई जो एक अपूर्व संग्रह है तथा सभी राष्ट्रों एवं सभी युगों के धर्म ग्रन्थों में अपने प्रकार की प्रथम कृति है। सन् 1878 ई. में केशव चन्द्र द्वारा अपनी 13 वर्षीय अल्पायु पुत्री का विवाह कूचबिहार के महाराजा के साथ करने पर इस समाज में एक और विभाजन हुआ और अधिकतम समर्थकों ने अलग होकर एक अलग संस्था ”साधारण ब्रह्म समाज“ की स्थापना कर ली। जबकि ब्रह्म समाज का उद्देश्य था- ”समाज में व्याप्त बुराईयों जैसे सती प्रथा, बहुविवाह, वेश्यागमन, जातिवाद, अस्पृश्यता आदि को समाप्त करना“



सत्यमित्रानन्द गिरि

सत्यमित्रानन्द गिरि
       
परिचय - 
सत्यमित्रानन्द गिरि जी का जन्म 19 सितम्बर, 1932 को आगरा (उ0प्र) के ब्राह्मण परिवार में हुआ है। आपके पिता का नाम श्री शिवशंकर पाण्डेय तथा माता श्री का नाम त्रिवेणी देवी है। आपका सन्यास पूर्व नाम अम्बिका प्रसाद था। आपकी संस्कृत शिक्षा, संस्कृत विद्यालय कानपुर से और स्नातकोत्तर शिक्षा, आगरा विश्वविद्यालय से पूर्ण हुआ है। आप वाराणसी से शास्त्री व हिन्दी भाषा व साहित्य में साहित्य रत्न भी है। वेद व आधुनिक शिक्षा का समन्वय आपकी शिक्षा रही है। बाल्यकाल से भारतीय संस्कृति, ईश्वर, समाजसेवा के प्रति रूचि ने आपको सन्यास का निर्णय लेने पर बाध्य कर दिया परिणामस्वरूप आप ऋृषिकेश में स्वामी वेदव्यासानन्द के शरणागत होकर अम्बिका प्रसाद से सत्यमित्रानन्द गिरि हो गये और भारतीय संस्कृति के समन्वय विचारधारा को मूल मानते हुये समाज के लिए अभूतपूर्व कार्य किये। 27 वर्ष की अवस्था में आप उपपीठ ज्योति मठ के जगत्गुरू शंकराचार्य के पद को भी शुशोभित कर चुके हैं। स्वामी विवेकानन्द द्वारा प्रारम्भ किये गये आध्यात्मिक जागरण, मानव सेवा व शान्ति के प्रयासो को आपने आगे बढ़ाया है इसके लिए आपने विश्व के कोने-कोने की यात्राएँ भी की। आपके द्वारा हरिद्वार में ”समन्वय कुटीर“ व ”समन्वय सेवा ट्रस्ट“ की भी स्थापना की गई है। सन् 1998 में ”स्वामी सत्यमित्रानन्द फाउण्डेशन“ अर्थात आपके नाम से फाउण्डेशन की भी स्थापना की गई है जिसकी शाखाएँ रेनुकूट (सोनभद्र, उ0प्र0), जबलपुर (म0प्र0), जोधपुर (राजस्थान), इन्दौर (म0प्र0) और अहमदाबाद (गुजरात) में है।
आपके समन्वयात्मक विचारों का साकार रूप व अनूठी कृति ”भारत माता मन्दिर“ है जो सप्त सरोवर, हरिद्वार में स्थित है। इस मन्दिर में रामायण काल से भारत के स्वतन्त्रता काल तक के धर्म-जाति से उपर उठकर महापुरूषों की मूर्तियाँ स्थापित की गई है। 15 मई 1983 को तत्कालिन भारतीय गणराज्य की प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गाँधी ने दीप प्रजल्वित कर इस 180 फीट (55 मीटर) ऊँचे 7 तलो के इस मन्दिर को समाज को समर्पित किया। इस मन्दिर का प्रत्येक तल एक विचार को समर्पित है।
आपके विचार आपके ”भारत माता मन्दिर“ पुस्तक से-
1. स्वस्ति पन्थामनु चरेम सूर्यचन्द्रमसाविव। पुनर्ददताध्नता जानता सं गमेमहि।। (ऋृग्वेद-5/51/15)
”जैसे सूर्य और चन्द्रमा निरालम्ब अन्तरिक्ष में निरापद एवं राक्षसादि से अबाधित निर्विध्न यात्रा करते हैं, विचरण करते हैं, वैसे ही हम अपने बन्धु-बान्धवों के साथ लोक-यात्रा में स्नेहपूर्वक, निर्विध्न चलतें रहें और हम सबका मार्ग मंगलमय हो।“ भगवान शंकर के स्मरण मात्र से ऐसा सम्भव है, क्योंकि वे कल्याण के देव हैं। वे देवाधिदेव महादेव तो हैं ही, किन्तु भारतमाता का स्वरूप-स्मरण करने पर तो यह भाव जीवन्त रूप से जाग्रत हो जाता है कि भारत का समग्र दर्शन भगवान शंकर में ही हो रहा है। विचारपूर्वक देखें, तो भगवान शंकर सम्पूर्ण राष्ट्र के प्रतीक हैं, भगवान श्रीराम राष्ट्र की आदर्श-मर्यादा के और गंगा राष्ट्र में प्रवाहित होने वाली संस्कृति की। उसके साथ उसमें ब्रह्मतत्व भी अन्तर्निहित होना चाहिए, क्योंकि ब्रह्मतत्व से विहिन संस्कृति दीर्घकाल तक नहीं रह सकती। इस ब्रह्मतत्व के साक्षात् स्वरूप श्रीकृष्ण हैं। इसलिए भारतीय संस्कृति का सर्वांग रूप राम, कृष्ण, शंकर और गंगा का समन्वित रूप है।
2.केवल वेश ग्रहण मात्र से किसी को साधु-संत नहीं कहा जा सकता। साधुता और सन्तत्व तो एक वृत्ति का नाम है। यह साधु-वृत्ति कदाचित् श्वेत वस्त्रधारी में भी हो सकती है और कदाचित् भगवा-धारी में नहीं। यह जटाजूटधारी या मुण्डित केशों में भी हो सकती है और नहीं भी। अनिवार्यता केवल इतनी ही है कि जहाँ जीवन में सुचिता है, वहीं साधुता है। जब तक साधुवृत्ति संसार में भ्रमण करती रहेगी, तब तक भारतीय संस्कृति का विनाश कोई नहीं कर सकता।
3.टहनियाँ और पत्तों को काट देने से वृक्ष नहीं सूखता। उसका बीज यदि उर्वरा भूमि में सुरक्षित है, तो अनुकूल अवसर - खाद, पानी, माली आदि पाकर वह पुनः लहलहा उठेगा, हरा-भरा हो जायेगा। यही स्थिति भारतीय संस्कृति के बीज - जीवन मूल्यों की है। भारतीय संस्कृति का बीज किसी एक व्यक्ति के अन्तःकरण में नहीं, अपितु करोड़ों व्यक्तियों की हृदय भूमि में जीवन्त रूप में स्थित है। इसी कारण साधु-संतों की वाणी रूपी खाद, भक्ति रूपी पवित्र जलधारा और प्रभु-कृपा की अनुकूलता प्राप्त होने पर वह पुनः पुनः अंकुरित होती रहेगी। इनकी छाया के नीचे बैठने वाले व्यक्तियों को जीवन में शान्ति का सन्देश सतत् देती रहेगी।
4. यद्यपि प्रत्येक स्थान की भूमि की अपनी निजी विशेषताएँ होती हैं। गुजरात की भूमि में रूई, किसी अन्य जगह हरी मिर्च, मालवा में गेहूँ आदि बहुतायत में तथा अच्छे किस्म के होते हैं, तो भी ये वस्तुएँ थोड़े बहुत अन्तर से अन्यत्र भी उगाई जा सकती हैं, किन्तु यदि केशर को कश्मीर के अतिरिक्त अन्यत्र कहीं पर उत्पन्न करने के प्रयास किये जायें, तो असफलता ही मिलेगी। इसके लिए तो कश्मीर की भूमि की ही शरण लेनी होगी। इसी भाँति भौतिकवाद के विकास के लिए यूरोप ओर अमेरिका की भूमि उपयुक्त है, परन्तु आध्यात्मवाद की केशर यदि प्राप्त करना है, तो सम्पूर्ण विश्व को भारतीय भूमि से ही प्रेम करना होगा। इसके अतिरिक्त कोई उपाय नहीं है। यदि इस धरती का यह वैशिष्ट्य न होता, तो भगवान श्रीराम और भगवान श्रीकृष्ण यहीं पर जन्म क्यों लेते? वे कहीं पर भी आविर्भूत हो सकते थे, परन्तु सरयू ओर यमुना तट उन्हें अच्छा लगा और इसलिए अपने बाल-मित्रों के साथ उन्होंने यहाँ सहज बाल-क्रिड़ायें कीं, जिससे सभी लोग जान लें कि इस धरती का महत्व कितना अधिक है।
5. उत्तर भारत में भगवान ने अनेक रूपों में अवतार ग्रहण किया। इसलिए उस विराट् एवं चरम चित्त तत्व ने दक्षिण भारत में भी अंशावतार ग्रहण किया। श्री शंकराचार्य, श्री रामानुजाचार्य, श्री वल्लभाचार्य, श्री मध्वाचार्य आदि महान आचार्यो ने भारतीय समाज के उन्नयन के लिए अवतार ग्रहण किया। यदि उत्तर भारत में प्रभु के अवतारो ंके माध्यम से भगवद् शक्ति द्वारा संसार को प्रभावित किया गया, तो दक्षिण के आचार्यो ने साधना, संयम, सदाचार के उपदेश द्वारा, पुरूषार्थ के द्वारा मानवों में ऐसी अनुभूति उत्पन्न की कि वे आचार्य अंशावतार न होकर पूरी शक्ति सहित अवतार ही दिखाई देते है।
6. संसारी मानव दो प्रकार की विभिन्न परिस्थितियों के हिंडोले में झूलता हुआ अपनी दुर्बलता प्रमाणित करता है कि यदि कोई अनुकूल वस्तु मिल जाए, तो उसके प्रति राग हो जाता है, और यदि प्रिय वस्तु का वियोग हो जाए तो रोष होता है। कोई-कोई विरले मनुष्य होते हैं, जो न राग में जीते हैं, न रोष में जीते हैं, वे तो केवल अनुराग में ही सदा आनन्दित होते हैं। भगवान श्रीराम भी इसी प्रकार के महापुरूष है, जिनको न राग है, न रोष, अपितु वे अन्यों को सभी प्रकार संतुष्ट करते हैं। उनका स्मरण कर, उस नित्य आनन्दमय परमात्मा के प्रति भक्ति प्रदर्शित कर, भारतीय व्यक्ति अपने जीवन को धन्य अनुभव करता है।
”भारत माता मन्दिर“ के सम्बन्ध में आपके विचार-
ऊँ। विश्वानि देव सवितर्दुरितानी परासुव। यद् भद्रं तन्न आ सुव।।
हमारे देश के गाँव-गाँव, नगर-नगर में मन्दिर मिलते हैं। बुद्धिवादी व्यक्ति नवीन मन्दिरों के निर्माण को निरर्थक मानते हैं। कई लोग इसे अर्थ का अपव्यय भी कहते हैं। इतिहास को जीवित रखना हमारा कत्र्तव्य है। इतिहास से हमें अपनी राष्ट्रीय-संस्कृति के गौरव का पता चलता है। पाठकों को इससे प्रेरणा मिलती है और भावी पीढ़ी के संस्कार जगाने में चेतना की शक्ति। इसी पावन दृष्टिकोण से, हरिद्वार में भारत माता मन्दिर का निर्माण किया गया है।
मुसलमान, ईसाई बन्धुओं को अपने पूर्वजों के सम्बन्ध में पर्याप्त जानकारी है, परन्तु किसी हिन्दू युवक से उसके पूर्वज ऋृषियों के नाम पूछे जायें तो बता पाने में असमर्थता प्रकट करेगा। यदि व्यक्ति अपने श्रेष्ठ पूर्वजों का ही विस्मरण कर बैठे, तो उनके श्रेष्ठ संस्कारों को अपने जीवन में कैसे उतार सकता है?
भारत माता मन्दिर- मन्दिर के रूप में अधिक जाना जाय, ऐसा विचार कम है। तीर्थ-यात्री जो प्रतिवर्ष लाखों की संख्या में हरिद्वार आते हैं, वे इस मन्दिर से देश के संत, आचार्य, बलिदानी महापुरूषों, साध्वी, सतियों (मातृ शक्ति) के जीवन से प्रेरणा लेकर, व्रत और संकल्प कर जा सके - यह इसका मुख्य लक्ष्य है। साम्प्रदायिक उपासना पद्धतियों में मानव पृथक-पृथक घेरों में बँधता जा रहा है। ऐसे समय में राष्ट्रीय एकता को ध्यान में रखकर, सब सम्प्रदायों के आचार्यो और संतों की एक ही स्थान पर प्रतिष्ठा की गई है, इससे - ”हम सब एक हैं“, ”हमारी माता भारत माता है“- का विचार परिपक्व कर सकें। यह विचार दृढ़ होना चाहिए, तभी व्यक्तिवाद से ऊपर उठकर राष्ट्रवाद की ओर जा सकते हैं।
धर्म और राष्ट्र एक-दूसरे के पूरक होने चाहिए। धर्म संस्कारों को बनाता है। संस्कारों का परिष्कार करता है और राष्ट्र-भाव स्वधर्म पर बलिदान होने की प्रेरणा देता है। बिना उत्सर्ग किये इस संसार में कुछ नहीं मिलता। स्वार्थ की बलि चढ़ाये बिना राष्ट्र का यज्ञ अधूरा रहता है। पशु-बलि की बातें आज निरर्थक हो गई हैं, किन्तु आत्म बलिदान के अभाव में कोई महान् लक्ष्य प्राप्त हो जाये, यह सम्भव नहीं है। भारत माता मन्दिर में विराजमान संत, शूर, सती- देश के लाखों यात्रियों में समन्वय, श्रद्धा, परस्पर प्रेम, त्याग, सद्भाव, स्वार्थ त्याग, समरसता और बलिदान की भावना जगाने में समर्थ हो सकेगें, ऐसा विश्वास किया जाना चाहिए।
हमारा यह विचार है कि मन्दिर में दान-पात्र न रखें जाएँ, परन्तु दर्शनार्थियों की उदार भावना के सम्मानार्थ, उनके द्वारा की जाने वाली चढ़ोतरी के सदुपयोग की दृष्टि से, दान-पात्र रखे जाना युक्तिसंगत भी लगता है। फिर भी भावना यह है कि, दर्शनार्थी इस मन्दिर की स्मृति संजोकर, अपने घरों को लौटकर जाने वाले लोग श्रद्धा से जो कुछ हो, वहीं से प्रेषित करें। इस धनराशि को आदिवासी, गिरिवासी, वनवासी, हरिजन, देश के उपेक्षित वर्ग और दरिद्र नारायण की सेवा में लगाया जा सके। साथ ही, आय का एक भाग ब्राह्मण बालकों को कर्मकाण्ड, वेद, हवन, यज्ञ आदि की शिक्षा देने के लिए उपयोग में लाया जाए। इस प्रकार यह मन्दिर समाज की सर्वागीण सेवा का प्रकल्प बन सके, यह अपेक्षा है।
इस मन्दिर में जैन, सिक्ख, ईसाई, मुसलमान, पारसी मजहबों के श्रेष्ठ संतों की मूर्तियाँ और उनके जीवन का अंकन किया गया है। सभी प्रमुख धर्मो के मूल मंत्र रजत पट्टीका पर अंकित किये गये हैं, जिससे उपासकों, साधको, नागरिकों में यह भाव जाग सके कि सभी धर्मो का मूल तत्व एक है। इस प्रकार, अपने देश की संस्कृतियों की समस्त धाराओं को हरिद्वार में बहने वाली गंगा की पावन धारा से जोड़ने का प्रयत्न किया है। गंगा पावनता और गतिशीलता का प्रतीक बन चुकी है। बिना पावन और गतिशील हुए, देश और राष्ट्र की वास्तविक सेवा नहीं की जा सकती।
परमात्मा की कृपा से, अपने राष्ट्र-रथ को अनैतिकता के पंक से उबार, जगद्गुरू के पूर्व आसन पर बैठा सकने में हम सब निमित्त और परमात्मा के हाथ का उपकरण बन सकें, ऐसी उनके चरणों में प्रार्थना है।

”भारत माता मन्दिर (ऋृषिकेश)“: एक परिचय
लोगों के मन में यह विचार आ सकता है कि इस मन्दिर में भारतमाता की प्रतिमा क्यों स्थापित की गई? भारतमाता तो सम्पूर्ण राष्ट्र है। उसकी सम्पूर्ण शक्ति राष्ट्र के प्रत्येक नागरिक में उद्भूत है, उस शक्ति का अनुभव कराने के लिए सनातन धर्म में प्रतिमा अथवा मूर्ति प्रतिष्ठा का विशेष महत्व है। धनधान्य की समृद्धि के लिए जिस प्रकार बीज बोना परम आवश्यक है, उसी प्रकार देवी और मानवीय संस्कार जाग्रत करने के लिए प्रतिमा की प्रतिष्ठा-उपासना का महत्वपूर्ण अंग है। इसलिए मूर्ति प्रतिष्ठा के अनन्तर प्राण प्रतिष्ठा की जाति है, जिससे उपासक और दर्शनार्थी में तद्नुसार चेतना जाग्रत हो सके। वर्तमान में भारत की भावात्मक एकता और अखण्डता के लिए ”हम सब भारतवासी भारत माता की संतान हैं“- इस भावना के लिए भारतमाता की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा की गई है।
भारतमाता मन्दिर में प्रवेश करते ही, जैसे सीढ़ियों पर चढ़ते हैं- दाई ओर सम्पूर्ण मनोकामना सिद्ध करने वाले, संकट मोचन श्री हनुमन्तलाल जी के दर्शन होते हैं। मुख्य द्वार के ऊपर श्री विध्नेश्वर गजवदन विनायक श्री गणेश जी प्रतिष्ठित हैं। जिनके दर्शन के साथ ही दर्शनार्थी द्वार प्रवेश कर सीधे भारत माता के पास पहुँचते हैं। हम धन्य हैं कि हम भारत जननी की शस्य श्यामल, समृद्ध, वात्सल्यमयी अंक में पले हैं, बड़े हुए हैं और यशस्वी जीवन-पथ पर गतिशील हैं और सदा गतिशील बने रहेंगे। यह राष्ट्र किसी एक का नहीं, जाति वर्ण, सम्प्रदाय भेद के बिना सभी का है। हम सब एक ही भारत माँ की सन्तान होने के नाते भाई-बहन हैं, एक हैं। जैसे एक मीटर वस्त्र को तैयार करने में किसान, उसके खेती के उपकरण, ओटाई करने वाले, कातने वाले, उसको आकर्षक रूप देने वाले कुशल इंजिनियर, सुपरवाइजर इत्यादि का योगदान रहता है, वैसे ही एक राष्ट्र के निर्माण में किसी की बुद्धि, किसी का श्रम, किसी का बलिदान, किसी का तपस्या और किसी का चिन्तन लगता है।
आधार तल - सात तल वाले इस भव्य मन्दिर के आधार तल में भारतमाता की विशाल एवं भव्य प्रतिमा की प्रतिष्ठा है। माँ, जिसकी गोद में संस्कृति, संस्कार और सभ्यता जन्म लेकर पोषित होती है- उसकी उपमा संसार में कहीं नहीं है। भारत की धरती को ही यह सौभाग्य मिला है, जिसे ”भारतमाता“ के नाम से विभूषित किया गया है। संसार का कोई भी देश माता के नाम से नहीं जाना जाता। भगवान श्रीराम जी स्वयं कहते हैं- ”जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी“ - माँ और मातृभूमि स्वर्ग से भी श्रेष्ठ है।
भारतवासीयों की रग-रग में संस्कार प्रतिष्ठित करने वाली भारतमाता की मूर्ति की प्रतिष्ठा भारतमाता मन्दिर में की गई - जिनके एक हाथ में दुग्ध पात्र तथा दुसरे में धान की बाली है। सामयिक चेतना जगाने के लिए श्वेत क्रान्ति व हरित क्रान्ति के प्रतीक के रूप में इस कल्पना को ग्रहण किया गया है। प्रतिमा के पीछे कमलाकार चक्र है, जो कमल की पवित्रता और निर्लिप्त भाव का प्रतीक है। गीता में भगवान श्रीकृश्ण का सन्देश है- ”पद्मपत्रमिवाम्भसा“ - संसार-महासागर में, राष्ट्र की सेवा में व्यक्ति का जीवन, कमल के समान रहना चाीिए।
भारत माता की मूर्ति के सामने भूतल पर भारत का विशाल प्राकृतिक मानचित्र, भारत सरकार के सर्वेक्षण विभाग की प्रमाणिकता के आधार पर निर्मित है- जिसमें नागाधिराज हिमालय के उत्तुंग शिखर, उपत्यिकाएँ, प्रमुख नदियाँ आरेखित की गई हैं। साथ ही निम्नलिखित को भी दर्शाया गया है-
द्वादश ज्योतिर्लिंग-1. सौराष्ट्र में सोमनाथ, 2. श्रीशैल पर मल्लिकार्जुन (गुण्टुर से 217 मील), 3. उज्जैन में महाकाल, 4. ओंकारेश्वर में मम्लेश्वर (ओंकारेश्वर), 5. हिमाचल पर केदारनाथ, 6. डाकिनी में भीमशंकर (पूना से 43 मील उत्तर, मुम्बई से 70 मील पूर्व की ओर भीमा नदी के तट पर), 7. काशी में विश्वेश्वर विश्वनाथ, 8. गौतमी तट पर त्रयम्बकेश्वर (नासिक रोड स्टेशन से 25 कि.मी. दक्षिण में), 9. चिताभूमि में वैद्यनाथ (कलकत्ता-पटना रेल मार्ग पर किउल स्टेशन से दक्षिण पूर्व में 100 कि.मी.), 10. दारूका वन में नागेश्वर (द्वारिका के पास दारूका वन में गौतमी नदी के किनारे), 11. सेतूबन्ध में रामेश्वर और 12. शिवालय में स्थित घुश्मेश्वर (मनमाड-पूना लाइन पर मनमाड से 100 कि.मी. दौलताबाद स्टेशन से 20 कि.मी. वेरूल गाँव के पास)
सप्त मोक्षदायिनी पुरियाँ-1. अयोध्या, 2. मथुरा, 3. हरिद्वार, 4. काशी (वाराणसी), 5. काँची, 6. अवन्तिका (उज्जैन), 7. द्वारिका।
सप्त बदरी- उत्तराखण्ड राज्य के बदरी क्षेत्र में 1. आदि बदरी, 2. ध्यान बदरी (कुम्हार चट्टी से 6 मील दूर), 3. वृद्ध बदरी (उषी मठ के कुम्हार चट्टी से ढाई मील दूर), 4. भविष्य बदरी (जोशी मठ से 11 मील दूर), 5. योग बदरी (पाण्डुकेश्वर से दो मील), 6. नृसिंह बदरी (जोशी मठ से नरसिंह भगवान का मन्दिर), 7. प्रधान बदरी।
पंच केदार- भगवान शंकर महिष रूप धारण उपरान्त उनके पाँच अंग प्रतिष्ठित हुये और वे पंच केदार कहलाये। 1. श्री केदारनाथ (प्रमुख केदार पीठ), 2. श्री मध्यमेश्वर (यहाँ नाभि), 3. श्री तुंगनाथ (यहाँ बाहु), 4. श्री रूद्रनाथ (यहाँ मुख), 5. कल्पेश्वर (यहाँ जटायें)।
पंच सरोवर- 1. मानसरोवर (हिमालय क्षेत्र में), 2. बिन्दु सरोवर (गुजरात प्रदेश में), 3. नारायण सरोवर (नल सरोवर और हिमालय क्षेत्र में), 4. पम्पा सरोवर (तुंगभद्रा नदी के उत्तर और किष्किंधा के दक्षिण भाग में), 5. पुष्कर सरोवर (अजमेर के पास में)।
सप्त क्षेत्र- 1. कुरूक्षेत्र (हरियाणा प्रदेश में), 2. हरिहर क्षेत्र (गंगा, सरयू, सोन व गंडकी नदी के संगम का क्षेत्र बिहार प्रदेश में), 3. प्रभास क्षेत्र (द्वारिका, गुजरात प्रदेश में), 4. भृगु क्षेत्र (नर्मदा व समुद्र संगम क्षेत्र), 5. पुरूषोत्तम क्षेत्र  (जगन्नाथ धाम, उड़ीसा में), 6. नैमिष क्षेत्र  (सीतापुर, उत्तर प्रदेश में), 7. गया क्षेत्र  (बिहार प्रदेश में)
प्रथम तल: शूर मन्दिर -
मैकाले की शिक्षा पद्धति ने देश के नागरिकों के समक्ष ऐसा इतिहास प्रस्तुत किया कि हम अपने देश के लिए जीवन देने वालों को विस्मृत कर बैठे। आज सबसे बड़ी आवश्यकता है, राष्ट्र के प्रति समर्पित महापुरूषों, बलिदानियों के आदर्शो को उद्घाटित करने की, जिससे वर्तमान भारत के बालक-बालिकाएँ, युवक-युवतियाँ उनसे प्रेरणा ले सकें। यदि हमारे सामने कोई आदर्श ही नहीं होगा, तो हमारा न कोई सिद्धान्त रह जायेगा और न शाश्वत मूल्य रह जाएँगे। इसी दृष्टिकोण से भारत माता मन्दिर के द्वितीय तल पर राष्ट्र के वीरों, बलिदानियों की मूर्तियों की प्रतिष्ठा की गई है जो निम्नवत् हैं-
1. महामना पं. मदन मोहन मालवीय 2. वीर सावरकर 3. सुभाष चन्द्र बोस 4. महात्मा गाँधी 5. छत्रपति शिवाजी 6. गुरू गोविन्द सिंह 7. महारानी लक्ष्मीबाई 8. महराणा प्रताप 9. शहीद भगत सिंह 10. चन्द्रशेखर आजाद 11. डाॅ0 केशवराव बलिराम हेडगेवार 12. हेमू कालानी 13. अश्फाकउल्ला 14. महारानी अहिल्याबाई 15. महराजा अग्रसेन
द्वितीय तल: मातृ मन्दिर -
नारी के प्रति महान सम्मान प्रदर्शित करने की दृष्टि से भारतमाता मन्दिर में मातृ मन्दिर की प्रतिष्ठा की गई है। वैदिक काल से लेकर आज तक महान नारीयों की लम्बी श्रृंखला रही है परन्तु यहाँ उनकी शक्ति के प्रतीक के रूप में कुछ महान माताओं की मूर्तियों को प्रतिष्ठित किया गया है जो निम्नवत् हैं-
1. सती जयदेवी 2. कवयित्री आण्डाल 3. मैत्रेयी 4. मीराबाई 5. सती सावित्री 6. ब्रह्मवादिनी गार्गी 7. देवी उर्मिला 8. सती दमयन्ती 9. सती अनुसूया 10. सती मदसलसा 11. सती पद्मिनी 12. वीरांगना किरण देवी 13. श्रीमती एनी बेसेन्ट 14. भगिनी निवेदिता 15. श्री देव नदी गंगा जी 16. श्री यमुना जी
तृतीय तल: संत मन्दिर -
भारतीय संस्कृति एवं संस्कृति की समग्र परम्परा का सम्पूर्ण अधिष्ठान भारतीय संतो के अवदान पर ही प्रतिष्ठित है। महर्षि वेदव्यास से लेकर आद्य गुरू शंकराचार्य एवं स्वामी विवेकानन्द, महर्षि अरविन्द, स्वामी रामतीर्थ और उनके परवर्ती संतो की लम्बी श्रृंखला है, जिन्होंने अपनी दिव्य साधना से भारतीय संस्कृति और जनजीवन को आलोकित किया है। रत्नगर्भा भारत भूमि इतने महापुरूषों की जननी है कि उन सबको पर्याप्त स्थान नहीं दे सके। विशिष्ट आचार्यो, संतो को ही स्थान दे सके हैं इसका अर्थ यह नहीं है कि शेष महापुरूष सम्मानीय नहीं है। वे सभी समान कोटि में समादरणीय है। भारतमाता के स्वरूप को सँवारने और उसे समृद्ध बनाने में संतो की साधना, तपश्चर्या, वाणी और साहित्य का अनुपम योगदान रहा है। इसी दृष्टि से सभी सम्प्रदायों के आचार्यो, संतो की प्रतिष्ठा भारत माता मन्दिर में की गई है। जो निम्नवत् हैं-
1. गौतम बुद्ध 2. महावीर स्वामी 3. श्री नरसी मेहता 4. गोस्वामी तुलसीदास 5. श्री चैतन्य महाप्रभु 6. उदासीनाचार्य चन्द्रदेव 7. समर्थ गुरू रामदास 8. संत ज्ञानेश्वर 9. श्री गरीबदास जी 10. श्री रंग अवधूत जी 11. स्वामी वासुदेवानन्द सरस्वती 12. श्री निम्बार्काचार्य 13. जगद्गुरू रामानन्दाचार्य 14. जगद्गुरू आद्य शंकराचार्य 15. श्री वल्लभाचार्य 16. श्री रामानुजाचार्य 17. श्री मध्वाचार्य 18. श्री गुरू नानक 19. शिरडी वाले सांई बाबा 20. स्वामी विवेकानन्द 21. स्वामी दयानन्द 22. महर्षि अरविन्द 23. श्री पीपी जी 24. परमहंस राकृष्णदेव एवं माँ शारदामणि 25. संत कबीर 26. रसखान 27. जलाराम बापा 28. संत रविदास 29. संत नवल साहेब 30. भक्त श्री सेन जी 31. हरिजी बापा 32. गुरू गोरक्षनाथ जी 33. संत श्री झूलेलाल जी 34. महर्षि वाल्मीकि 35. आचार्य दादूदयाल जी 36. स्वामी प्राणनाथ जी 
चतुर्थ तल: भारत दर्शन -
भारत माता मन्दिर के चतुर्थ खण्ड पर भारत की एकता और अखण्डता के प्रतीक के रूप में भारत-दर्शन की प्रादेशिक झाँकी भित्ति चित्रों और आरेखों द्वारा प्रदर्शित की गई है- जिन्हें देखकर लगता है कि हम भारत में हैं और भारत हम में है। हमारा कोई भी चिन्तन इससे पृथक नहीं हो सकता। हमने इसी भारत के लिए जन्म लिया है और जन्म-जन्मान्तर परमात्मा से प्रार्थना करते हैं कि चाहे जिस रूप में हो, चाहे जिस योनि में हो - हमारा जन्म भारत में ही हो।
दीवालों पर भारत के समस्त प्रदेशों के सांस्कृतिक मानचित्र आकर्षक ढंग से निर्मित किये गये हैं- जिनमें मध्य प्रदेश, गुजरात, महारष्ट्र, गोवा, राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, असम, मेघालय, अरूणाचल प्रदेश, मणिपुर, नागालैण्ड, त्रिपुरा, मिजोरम, पश्चिम बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, आन्ध्र प्रदेश, उड़ीसा, केरल, तमिलनाडु, आदि की झाँकियों में वहाँ के इतिहास-प्रसिद्ध सांस्कृतिक कला, स्थापत्य कला के नमूने, संत, वीर, बलिदानी, नृत्य कला आदि को प्रदर्शित किया गया है। इस मण्डपम् में विशाल मंच निर्मित है। मंच के पाश्र्व में, रजत पट्टीकाओं पर - विश्व के प्रमुख धर्मो - ईसाई धर्म, सिख धर्म, जैन धर्म, बौद्ध धर्म, सनातन धर्म, पारसी धर्म, इस्लाम धर्म के मूल मंत्र आलेखित हैं और वेद भगवान  की प्रतिष्ठा की गई है। समन्वय ओर भावनात्मक एकता की दृष्टि से स्थापित इन पट्टीकाओं का अनावरण - भारत गणराज्य के तत्कालिन महामहिम राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह जी ने 8 मार्च, 1986 को शिवरात्रि पर्व पर किया था। उन्होंने कहा - ”मेरा मन यहाँ से बाहर जाने को नहीं करता। यह मन्दिर आजादी के तुरन्त बाद ही बनना चाहिए था, परन्तु जो कार्य सरकार नहीं कर पाई, उसे स्वामी जी ने किया। भगवान जिससे जब जो कार्य कराता है, तभी होता है। मेरा विश्वास है कि जो कोई भी हरिद्वार आयेगा, इस मन्दिर के दर्शन जरूर करेगा।“
सभी धर्म एक हैं। विश्व का कोई भी धर्म हिंसा, असत्य, वैर, कटुता की बात नहीं कहता। धर्मान्धता आड़े आने पर धर्म को विकृत बना दिया जाता है। धर्मनिरपेक्षता का तात्पर्य धर्महीनता नहीं है, अपितु अपने धर्म पर अनन्य निष्ठा, समर्पण भाव रखते हुए - दूसरे धर्म के प्रति समान आदर भाव रखना है। संस्कृति ही राष्ट्र बनाती है। एक राष्ट्र की जनता एक जाति की है, उस जाति का जो स्वरूप है, उसे राष्ट्रीयता कहते हैं और राष्ट्रीयता ही किसी राष्ट्र का जीवन है। यदि राष्ट्रीयता या संस्कृति नष्ट कर दी जाए, तो वह राष्ट्र नष्ट हो जाता है। संस्कृति के जन्म, पोषण, रक्षण ओर अभिवृद्धि के लिए परमात्मा ने भारत-भूमि का चयन किया। उस संस्कृति का पालन करना, अपने जीवन में ढालना, आचरित करना प्रत्येक भारतवासी का प्रथम कत्र्तव्य है। संस्कृति और राष्ट्र एक-दूसरे के पर्याय हैं। राष्ट्र रहेगा, संस्कृति रहेगी, और संस्कृति की रक्षा से राष्ट्र की अस्मिता अक्षुण्ण रहेगी।
भारत-भूमि धन्य है, जिसकी प्रशंसा देवों के श्रीमुख से की गई है तथा इस भारत-भूमि पर जन्म लेने के लिए स्वयं देवता भी लालायित रहते हैं। जिसका जन्म इस धरती पर हुआ, वह भी धन्य हो गया। भारत-भूमि इस भूखण्ड पर सबसे पुण्यशाली है। यह भूमि भगवान के अवतारों की, संतो की, महर्षियों की, पुण्य सलिला सरिताओं की प्राकट्य-स्थली है। स्वयं परमात्मा ने विभिन्न रूपों में अवतरित होकर यहाँ लीलीयें कर, धर्म और संस्कृति की मर्यादा स्थापित की। भारत की धरती देवताओं की यज्ञ-भूमि होने से, परम पावन मानी गई है।
आज की भयावह परिस्थिति में सम्पूर्ण विश्व भारत की ओर आँखें लगाये लालायित है कि विश्व की समस्याओं का निदान भारत के पास है। समय आयेगा। विश्व को भारत ने रास्ता दिखाया था, पुनः दिखयेगा। महर्षि अरविन्द की वाणी सत्य सिंद्ध होगी कि ”भारत एक है, अखण्ड है, अखण्ड रहेगा।“ विभाजन की रेखाएँ, भौगोलिक सीमायें ध्वस्त होंगी। भारत की पहचान भौगोलिक सीमाओं से कभी नहीं रही। भौतिक सीमाएँ भारत को कभी बाँध नहीं सकी। भारत की पहचान उसके अध्यात्म से है, भारतीयता से है, भारतीय संस्कृति से है ओर यह पहचान यावत्चन्द्र दिवाकर बनी रहेगी।
पंचम तल: शक्ति मन्दिर -
भारत माता मन्दिर के इस तल पर 1. वेदमाता गायत्री 2. देवी मीनाक्षी 3. देवी सरस्वती की मूर्ति प्रतिष्ठित है।
भारतीय संस्कृति में शक्ति की उपासना को सर्वाधिक महत्व दिया गया है। चैत्र शुक्ल पक्ष और अश्विन शुक्ल पक्ष प्रतिपदा से नवमी तक पराम्बा भगवती की अराधना सम्पूर्ण भारत में की जाती है। समस्त आस्तिक जनता अशुभ के विनाश और शुभ की प्राप्ति के लिए दुर्गा का, जो दुर्गति का नाश करने वाली है - घट स्थापन, पूजन, अर्चन, हवन आदि करती है। दुर्गा के नौ रूप 1. शैल पुत्री 2. ब्रह्मचारिणी 3. चन्द्रघण्टा 4. कूष्माण्डा 5. स्कन्द माता 6. कात्यायनी 7. कालरात्रि 8. महागौरी 9. सिद्धीदात्री हैं।
शक्ति की महत्ता के बारे में महाशक्ति के उद्गार हैं-
अहं राष्ट्री संगमनी वसूनां चिकितुषी प्रथमा यज्ञयानाम्।
तां मा देवा व्यदधुः पुरूत्रा भूरिस्थात्रां भूर्यावेशयन्तीम।।
”मैं ही राष्ट्रीय अर्थात सम्पूर्ण जगत् की ईश्वरी हूँ। मैं उपासकों को उसका अभीष्ट वसु-धन प्राप्त कराने वाली हूँ। जिज्ञासुओं के साक्षात् कत्र्तव्य - परब्रह्म को अपनी आत्मा के रूप में मैंने अनुभव कर लिया है। जिनके लिए यज्ञ किये जाते हैं, उनमें सर्वश्रेष्ठ हूँ। सम्पूर्ण प्रपंच के रूप में मैं ही अनेक होकर विराजमान हूँ। सम्पूर्ण प्राणियों के शरीर में जीव-रूप में मैं अपने-आपको ही प्रविष्ट कर रहीं हूँ। भिन्न-भिन्न देश, काल, वस्तु और व्यक्तियों में जो कुछ हो रहा है- किया जा रहा है, वह सब मुझ में, मेरे लिए ही किया जा रहा है। सम्पूर्ण विश्व के रूप में अवस्थित होने के कारण, जो कोई जो कुछ भी करता है - वह सब मैं ही हूँ। (देवी सूक्त आत्म सूक्त ऋ मं, 10 सूक्त 125 अ.1)“
अराधना के लिए गुरू या संत से कोई मंत्र लेते है, निर्देशन प्राप्त करते हैं, परन्तु ”माँ“ अपने-आप में स्वतन्त्र मंत्र है। जन्म के प्रारम्भ से ही हमारी संस्कृति ”माँ“ मंत्र देती है। वात्सल्यमयी है। वह करूणा की मूर्ति है। इसलिए शास्त्र में ”माँ“ को ”सत्यं परम् सत्यम्“ कहा है। वह पराशक्ति, निर्गुण ओर सगुण दोनों रूपों में पूज्या है। निर्गुण शक्ति व्यापक शक्ति है, जो अन्तर चेतना जाग्रत करती है। वह प्रत्येक व्यक्ति के भीतर प्रसुप्त अवस्था में रहती है। साधना के द्वारा या महापुरूषों की कृपा से उसे जागृत किया जाता है। योगीजन उसे कुण्डलिनी शक्ति के रूप में जानते हैं। जब शक्ति अन्तर से चैतन्य हो जाती है, तो ऐसे महापुरूष कई चम्त्कार करने में समर्थ हो जाते हैं। कुछ दूसरें के मन की बात जान लेते हैं।
षष्ठम् तल: विष्णु मन्दिर -
सम्पूर्ण भारतवर्ष में विभिन्न धर्मो और सम्प्रदायों के लोग रहते है। अपनी-अपनी आस्था-श्रद्धा के अनुरूप भगवान विष्णु (नारायण) के प्रति विभिन्न रूपों में अपनी भावना व्यक्त कर, उनके विग्रह की पूजा-अर्चना कर जीवन धन्य समझते हैं। इस दृष्टि से भारत माता मन्दिर में विष्णु-मन्दिर का निर्माण कर, उसमें परमात्मा के विभिन्न विग्रहों 1. दत्तात्रेय 2. श्रीनाथ जी 3. रणछोड़राय 4. श्री सीताराम 5. श्री लक्ष्मी नारायण 6. श्री राधाकृष्ण 7. श्री व्यंक्टेश 8. स्वामीनारायण 9. श्री विट्ठल रूक्मिणी जी की प्रतिष्ठा की गई है।
सप्तम तल: शिव मन्दिर -
भारतमाता मन्दिर के सर्वोच्च शिखर पर (आखिरी मंजिल पर) शिव-मन्दिर निर्मित है। जिसमें हिमालय की तलहटी में भगवान शंकर चार स्वरूपों में दर्शन देते हैं। पद्मासन में ध्यानस्थ शिवजी की रजत मूर्ति है, उनके पीछे शिव परिवार, बायीं ओर अर्द्धनारीश्वर और दायीं ओर नटराज शिव। वस्तुतः आशुतोष भगवान शिव के अतिरिक्त ऐसा और कोई देव नहीं है, जो अपनी विस्मृति कर औघड़ आशीर्वाद देता हो। विग्रह के दोनांे ओर दो रजत कल्प वृक्षों पर 54-54 विविध रंगों के शिवलिंग प्रतिष्ठित किये गये हैं।
भारत माता मन्दिर के विभिन्न तलांे पर स्थापित विभूतियों से प्रेरणा ग्रहण करें तथा एक ही स्थान पर सम्पूर्ण देश के श्रद्धा के आधारों का दर्शन कर सकें, इस दृष्टि से भारत माता मन्दिर की आधारशिला पर ऊपर के विभिन्न मन्दिरों का निर्माण हुआ है। जो तथ्य और अनुभूति असंख्य प्रवचनों, बहुसंख्यक ग्रन्थों से प्रदान नहीं की जा सकती, वह भारत माता मन्दिर के आधार तल से ऊपर के उच्चतल तल पर प्रतिष्ठित मूर्तियों के दर्शन द्वारा सहज ही प्राप्त की जा सकती है। यद्यपि शूर, सती, मातृ शक्ति, संत, शक्ति और परमात्मा के असंख्य, अनन्त रूप हैं, फिर भी इन सभी मन्दिरों में स्थापित मूर्तियाँ उन वर्गो की प्रतिनिधि एवं प्रतीक स्वरूप हैं।



बाबा रामदेव - ”पंतजलि योग पीठ“

बाबा रामदेव - ”पंतजलि योग पीठ“

परिचय -
योग को घर-घर पहुँचाने वाले बाबा रामदेव आज देश ही नहीं, वरन् पूरे विश्व का चर्चित चेहरा है। वे विकलांगता को लाचारी मानने वालों के लिए प्रेरणास्रोत भी हैं। बहुत कम लोग जानते हैं कि पूरे विश्व को योग और आरोग्य की शिक्षा देने वाले बाबा रामदेव बचपन में लकवा से पीड़ित थे, लेकिन उन्होंने जिजीविषा और संकल्प शक्ति के बल पर इसको मात दे दी।
बाबा रामदेव का जन्म भारत में हरियाणा राज्य के महेन्द्रगढ़ जनपद स्थित अली सैयदपुर नामक एक साधारण से गाँव में 25 दिसम्बर, 1965 को हुआ था। उनकी माँ श्रीमती गुलाब देवी एक धर्मपरायण महिला व उनके पिताश्री रामनिवास यादव एक कत्र्तव्यनिष्ठ गृहस्थ हैं। बाबा के बचपन का नाम रामकृष्ण यादव था। समीपवर्ती गाँव शहजादपुर के सरकारी स्कूल से आठवीं कक्षा तक पढ़ाई पूरी करने के बाद रामकृष्ण ने खानपुर गाँव के एक गुरूकुल में आचार्य प्रद्युम्न व योगाचार्य बलदेवजी से संस्कृत व योग की शिक्षा ली। मन में कुछ कर गुजरने की तमन्ना लेकर इस नवयुवक ने स्वामी रामतीर्थ की भाँति अपने माता-पिता व बन्धु-बान्धवों को सदा-सर्वदा के लिए छोड़ दिया। युवावस्था में ही संन्यास लेने का संकल्प किया और पहले वाला रामकृष्ण, स्वामी रामदेव के नये रूप में अवतरित हुआ।
स्वामी रामदेव ने सन् 1995 से योग को लोकप्रिय और सुलभ बनाने के लिए अथक परिश्रम करना प्रारम्भ किया। कुछ समय तक कालवा गुरूकुल, जीन्द जाकर निःशुल्क योग सिखाया तत्पश्चात् हिमालय की कन्दराओं में ध्यान और धारणा का अभ्यास करने निकल गये। वहाँ से सिद्धि प्राप्त कर प्राचीन पुस्तकों व पाण्डुलिपियों का अध्ययन करने हरिद्वार आकर कनखल के कृपालु बाग आश्रम में रहने लगे। आस्था चैनल पर योग का कार्यक्रम प्रस्तुत करने के लिए माध्वकान्त मिश्र को किसी योगाचार्य की आवश्यकता थी। वे हरिद्वार जा पहुँचे जहाँ स्वामी रामदेव, आचार्य कर्मवीर के साथ गंगा तट पर योग सिखाते थे। माधवकान्त मिश्र इनसे जाकर मिले और अपना प्रस्ताव रखा। आस्था चैनल पर आते ही स्वामी रामदेव की लोकप्रियता बढ़ने लगी। इसके बाद इस युवा सन्यासी ने कृपालु बाग आश्रम में रहते हुए स्वामी शंकरदेव के आशीर्वाद, आचार्य बालकृष्ण के सहयोग तथा स्वामी मुक्तानन्द जैसे प्रभावशाली महानुभावों के संरक्षण में ”दिव्य योग मन्दिर ट्रस्ट“ की स्थापना भी कर डाली। आचार्य बालकृष्ण के साथ उन्होंने अगले ही वर्ष सन् 1996 में दिव्य फार्मेसी के नाम से आयुर्वेदिक औषधियों का निर्माण कार्य प्रारम्भ किया। स्वामी रामदेव ने सन् 2003 से ”योग सन्देश“ पत्रिका का प्रकाशन भी प्रारम्भ किया जो आज 11 भाषाओं में प्रकाशित होकर एक कीर्तिमान स्थापित कर चुकी है। विगत 20 वर्षो से स्वदेशी जागरण के अभियान में जुटे राजीव दीक्षित को स्वामी रामदेव ने 9 जनवरी, 2009 को एक नये राष्ट्रीय प्रकल्प ”भारत स्वाभिमान ट्रस्ट“ का उत्तरदायित्व सौंपा जिसके माध्यम से देश की जनता को आजादी के नाम पर अपने देश के ही लुटेरों द्वारा विगत 64 वर्षों से की जा रही सार्वजनिक लूट का खुलासा बाबा रामदेव और राजीव भाई मिलकर कर रहे थे किन्तु देश के दुर्भाग्य से आम जनता में अपनी सादगी, विनम्रता व तथ्यपूर्ण वाक्पटुता से दैनन्दिन लोकप्रियता प्राप्त करते जा रहे एवं अपने अहर्निश कार्य से बाबा की बायीं बाजू बन चुके राजीव भाई भारत की भलाई करते हुए 30 नवम्बर 2010 को भिलाई (दुर्ग) में हृदय गति के अचानक रूक जाने से परमात्मा को प्यारे हो गये।
स्वामी रामदेव ने किशनगढ़, घासेड़ा तथा महेन्द्रगढ़ में वैदिक गुरूकुलों की स्थापना की। सन् 2006 में महर्षि दयानन्द ग्राम, हरिद्वार में ”पतंजलि योगपीठ ट्रस्ट“ के अतिरिक्त अत्याधुनिक औषधि निर्माण इकाई ”पतंजलि आयुर्वेद लिमिटेड“ नाम से दो सेवा प्रकल्प स्थापित किये। इन सेवा प्रकल्पों के माध्यम से बाबा रामदेव योग, प्राणायाम, आध्यात्म आदि के साथ-साथ वैदिक शिक्षा व आयुर्वेद का भी प्रचार-प्रसार कर रहें हैं। उनके प्रवचन विभिन्न टी0 वी0 चैनलों जैसे- आस्था, आस्था इण्टरनेशनल, जी नेटवर्क, सहारा वन तथा इण्डिया टी0वी0 पर प्रसारित होते हैं। इतना ही नहीं बाबा रामदेव को योग सिखाने के लिए कई देशों से बुलावा भी आता रहता है। अमेरिका, इंग्लैण्ड व चीन सहित विश्व के 120 देशों की लगभग 100 करोड़ से अधिक जनता टी0 वी0 चैनलों के माध्यम से बाबा के क्रान्तिकारी कार्यक्रमों की प्रशंसक बन चुकी है और स्वास्थ्य लाभ प्राप्त कर रही है। बाबा प्रत्येक समस्या का समाधान योग व प्रणायाम ही बतलाते हैं।
सम्पूर्ण भारत में व्याप्त भ्रष्टाचार को समाप्त करने के साथ-साथ एवं यहाँ के मेहनतकशों के खून-पसीने की गाढ़ी कमाई को देश के राजनीतिक लुटेरों द्वारा विदेशी बैंकों में जमा करने के खिलाफ उन्होंने व्यापक जनआन्दोलन छेड़ रखा है। विदेशी बैंकों में जमा लाखो करोड़ रूपये के काले धन को स्वदेश वापस लाने की माँग करते हुए बाबा आजकल जनता में जागृति लाने में प्रयत्नशील हैं। बाबा ने अमर शहीद चन्द्रशेखर आजाद की पुण्य तिथि 27 फरवरी, 2011 को दिल्ली में भ्रष्टाचार के विरूद्ध विशाल रैली का आयोजन किया था जिसमें भारी संख्या में देश की जागरूक जनता ने पहुँचकर न सिर्फ उन्हें नैतिक समर्थन दिया अपितु कई करोड़ लोगों के हस्ताक्षरयुक्त ज्ञापन भी सौंपा। बाबा रामदेव ने उस ज्ञापन को उसी दिन राष्ट्रपति सचिवालय तक पहुँचाने का क्रान्तिकारी कार्य भी किया।
बाबा रामदेव अपने योग शिविरों में निम्नलिखित आठ प्रणायाम सिखाते हैं-
1.आभ्यन्तर - इस प्रणायाम से प्राणवायु अर्थात आॅक्सीजन को फेफड़ों में रोककर रक्त को शुद्ध करने का महत्वपूर्ण कार्य सम्पन्न होता है।
2.भस्त्रिका - इस प्रणायाम से साँस लेने की गति नियमित होती है। एक मिनट में 12 बार साँस लेने का अभ्यास सिद्ध कर लेने से कोई भी व्यक्ति 100 वर्ष तक जीवित रह सकता है।
3.कपाल-भाति - इस प्रणायाम से फेफड़ों से प्राणवायु को बाहर धकेलने का अभ्यास करवाया जाता है ऐसा करने से मानव शरीर के सभी आन्तरिक अंग रोगमुक्त हो जाते हैं तथा प्राणायामक करने वाले के मस्तक (कपाल) पर चमक (भाति) आ जाती है।
4.अनुलोम विलोम - इस प्रणायाम से नाक के दोनों छिद्रों में अदल-बदल कर साँस लेने का अभ्यास कराया जाता है। इससे व्यक्ति के शरीर का तापमान नियन्त्रित रहता है।
5.बाह्य - इस प्रणायाम से फेफड़ों से साँस को पूरी तरह बाहर निकालकर 7 सेकेण्ड से 21 सेकेण्ड तक अन्दर न आने का अभ्यास कराया जाता है।
6.उज्जायी - इस प्रणायाम से कण्ठ की नली से साँस को अन्दर खींचने का अभ्यास कराया जाता है।
7.भ्रामरी - इस प्रणायाम से दोनों कानों को दोनों हथेलियों के अँगूठों से पूरी तरह बन्द रखते हुए मध्यमा व अनामिका से नाक के दोनों ओर हल्का दबाव डाला जाता है और अन्दर से ओंकार की ध्वनि ओ-ओ-ओ-म् ऐसे निकाली जाती है जैसे कोई भ्रमर आवाज करता है।
8.उद्गीथ - इस प्रणायाम से आँखें बन्द करके ओ-म् कार की ध्वनि को इस प्रकार निकालते हैं कि ओम् के पहले अक्षर ओ तथा दूसरे अक्षर म् में तीन व एक का अनुपात रहे, अर्थात यदि ओ को 28 सेकेण्ड तक खींचना है तो म् को 7 सेकेण्ड लगने ही चाहिए। ओ का उच्चारण करते समय होंठ खुले व म के उच्चारण में बन्द रहने चाहिए।

भारत स्वाभिमान ट्रस्ट
भारत स्वाभिमान ट्रस्ट विश्वविख्यात योगगुरू बाबा रामदेव की योग क्रान्ति को देश के सभी 638365 गांवों तक पहुँचाने तथा स्वस्थ, समर्थ एवं संस्कारवान भारत के निर्माण के लक्ष्यों को लेकर स्थापित एक ट्रस्ट है। यह ट्रस्ट 5 जनवरी, 2009 को दिल्ली में पंजीकृत कराया गया है। जिसका उद्देश्य भ्रष्टाचार, गरीबी, भूख, अपराध, शोषण मुक्त भारत का निर्माण कराना होगा। ट्रस्ट गैर राजनीतिक होगा और राष्ट्रीय आन्दोलन चलायेगा जिसका यह प्रयास होगा कि भ्रष्ट, बेईमान और अपराधी किस्म के लोग सत्ता के सिंहासन पर न बैठ सकें। बाबा रामदेव ने स्वाभिमान ट्रस्ट के माध्यम से उन लोगों को सामने लाना शुरू कर दिया है जो रात दिन देश के लिए सोचते हैं, जीते हैं और देश के लिए कुछ भी करने को तैयार हैं। इस ट्रस्ट के पाँच प्रमुख लक्ष्य निम्न प्रकार हैं-
1.हम राष्ट्रभक्त, ईमानदार, पराक्रमी, दूरदर्शी एवं पारदर्शी लोगों को ही वोट करेंगे। हम स्वयं 100 प्रतिशत मतदान करेगें एवं दूसरों से करवायेगें।
2.हम राष्ट्रभक्त, कत्र्तव्यनिष्ठ, जागरूक, संवेदनशील, विवेकशील एवं ईमानदार लोगों को ही वोट करेंगे। 
3.हम राष्ट्रभक्त, कत्र्तव्यनिष्ठ, जागरूक, संवेदनशील, विवेकशील एवं ईमानदार लोगों 100 प्रतिशत संगठित करेंगे एवं सम्पूर्ण राष्ट्रवादी शक्तियों को संगठित कर देश में एक नई आजादी, नई व्यवस्था एवं नया परिवर्तन लायेंगे और भारत को विश्व की सर्वोच्च महाशक्ति बनायेंगे।
4.हम शून्य तकनीकी से बनी विदेशी वस्तुओं का 100 प्रतिशत बहिष्कार तथा स्वदेशी वस्तुओं का प्रयोग करेंगे।
5.हम सम्पूर्ण भारत को 100 प्रतिशत योगमय एवं स्वस्थ बनाकर राष्ट्रवासियों को आत्मकेन्द्रित करेंगे और आत्मविमुखता से पैदा हुई बेईमानी, भ्रष्टाचार, निराशा, अविश्वास व आत्मग्लानि को मिटा जन-जन में आत्म गौरव का भाव जगायेंगे एवं वैयक्तिक व राष्ट्रीय चरित्र का निर्माण कर भारत का सोया हुआ स्वाभिमान जगायेंगे।



महर्षि महेश योगी

महर्षि महेश योगी 

परिचय -
महर्षि महेश योगी का जन्म 12 जनवरी, 1918 को छत्तीसगढ़ के राजिम शहर के पास पांडुका गाँव में हुआ था। उनका मूल नाम महेश प्रसाद वर्मा था। उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से भौतिकी में स्नातक की उपाधि अर्जित की। उन्होंने 13 वर्ष तक ज्योतिर्मठ के शकराचार्य स्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वती के सान्निध्य में शिक्षा ग्रहण की। महर्षि महेश योगी ने शंकराचार्य की मौजूदगी में रामेश्वरम् में 10 हजार बाल ब्रह्मचारियों को आध्यात्मिक योग और साधना की दीक्षा दी। हिमालय क्षेत्र में 2 वर्ष का मौन व्रत करने के बाद सन् 1955 ई. में उन्होंने ”टी.एम. तकनीक (ट्रांसडेन्सल मेडिटेशन-भावातीत तकनीक)“ की शिक्षा देना आरम्भ की। सन् 1957 में उनने टी.एम. आन्दोलन आरम्भ किया और इसके लिए विश्व के विभिन्न भागों का भ्रमण किया। महर्षि महेश योगी द्वारा चलाये गये आन्दोलन ने उस समय जोर पकड़ा जब राॅक ग्रुप ”बीटल्स“ ने 1968 में उनके आश्रम का दौरा किया। इसके बाद गुरूजी का टी.एम. पूरी पश्चिमी दुनिया में लोकप्रिय हुआ। उनके शिष्यों में पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गाँधी से लेकर आध्यात्मिक गुरू दीपक चोपड़ा तक शामिल रहे। महर्षि महेश योगी ने वेदों में निहीत ज्ञान पर अनेक पुस्तकों की रचना की। महर्षि महेश योगी अपनी शिक्षाओं एवं अपने उपदेश के प्रसार के लिए आधुनिक तकनीकों का सहारा लेते हैं। उनहोंने महर्षि मुक्त विश्वविद्यालय स्थापित किया जिसके माध्यम से आॅनलाइन शिक्षा दी जाती है। वे साप्ताहिक विडियो पत्रकार वार्ता आयोजित करते हैं। वे महर्षि प्रसारण के लिए उपग्रह व अन्तरजाल का सहारा लेते हैं। अपनी विश्व यात्रा की शुरूआत 1959 में अमेरिका से करने वाले महर्षि महेश योगी के दर्शन का मूल आधार था- ”जीवन परमानन्द से भरपूर है और मनुष्य का जन्म इसका आनन्द उठाने के लिए हुआ है। प्रत्त्येक व्यक्ति में ऊर्जा, ज्ञान और सामथ्र्य का अपार भण्डार है तथा इसके सदुपयोग से वह जीवन को सुखद बना सकता है।“ वर्ष 1990 में हालैण्ड के व्लोड्राप गाँव में ही अपनी सभी संस्थाओं का मुख्यालय बनाकर वह यहीं स्थायी रूप से बस गए और संगठन से जुड़ी गतिविधियों का संचालन किया। दुनिया भर में फैले लगभग 60 लाख अनुयाईयों के माध्यम से उनकी संस्थाओं ने आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति और प्राकृतिक तरीके से बनाई गई कास्मेटिक हर्बल दवाओं के प्रयोग को बढ़ावा दिया। व्लोड्राप स्थित अपने आवास में डच के स्थानीय समयानुसार मंगलवार देर रात उन्होंने अपना शरीर त्याग दिया। शरीर त्याग से पूर्व महर्षि ने ये कहते हुए अपने को सेवानिवृत घोषित कर दिया कि उनका काम पूरा हो गया है और अपने गुरू के प्रति जो कत्र्तव्य था वो पूरा कर दिया है। महर्षि योगी ने एक मुद्रा की स्थापना भी की थी। महर्षि योगी की मुद्रा ”राम“ को नीदरलैण्ड में कानूनी मान्यता प्राप्त है। राम नाम की यह मुद्रा में चमकदार रंगों वाले एक, पाँच और दस के नोट हैं। इस मुद्रा को महर्षि की संस्था ”ग्लोबल कन्ट्री आॅफ वल्र्ड पीस“ ने अक्टुबर 2002 में जारी किया था। डच सेन्ट्रल बैंक के अनुसार राम का उपयोग कानून का उल्लंघन नहीं है। बैंक के प्रवक्ता ने स्पष्ट किया कि इसके सीमित उपयोग की अनुमति दी गई है। अमरीकी राज्य आइवा के महर्षि वैदिक सिटी में भी राम का प्रचलन है। वैसे 35 अमरीकी राज्यों में राम पर आधारित बाॅन्ड्स चलते हैं। नीदरलैण्ड की डच दुकानों में एक राम के बदले दस यूरो मिल सकते हैं। डच सेन्ट्रल बैंक के प्रवक्ता का कहना है कि इस वक्त कोई एक लाख राम नोट चल रहें हैं।

महर्षि यूनिवर्सिटी आॅफ मैनेजमेन्ट
महर्षि यूनिवर्सिटी आॅफ मैनेजमेन्ट (महर्षि प्रबन्धन विश्वविद्यालय) जो पूर्व में महर्षि अन्तर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय के रूप में जाना जाता था, 1973 में महर्षि महेश योगी द्वारा स्थापित किया गया है। परिसर फेयरफील्ड, आयोवा, संयुक्त राज्य अमेरिका के पूर्व पार्सन्स कालेज के परिसर में स्थित है। विश्वविद्यालय अलाभकारी है और मान्यता प्राप्त काॅलेजों और स्कूलों के उत्तर-मध्य एसोसिएशन के उच्च शिक्षा आयोग द्वारा पीएच.डी. स्तर तक मान्य है। विश्वविद्यालय चेतना के विकास पर आधारित शिक्षा देता है जो टी.एम. (ट्रान्सडेन्सियल मेडिटेशन) द्वारा कराया जाता है। डिग्री कार्यक्रम में कला, विज्ञान, व्यापार और मानविकी उपलब्ध हैं।
विश्वविद्यालय कैम्पस 272 एकड़ में जंगली क्षेत्रों व दो छोटे झीलों से घिरा हुआ है जो 80 किमी मिसिसिपी नदी के पश्चिम में स्थित है। मूल पार्सन्स कालेज परिसर में 80 भवनों में से कई ऐतिहासिक स्थानों में सूचीबद्ध होने के कारण उन्हें महर्षि स्थापत्य वेद वास्तु कला उनका नवनिर्माण नहीं हुआ। विश्वविद्यालय परिसर में 17 मुख्य कक्षा सहित 45 से अधिक भवन हैं। सभी भवन पर्यावरण संरक्षण को ध्यान में रखकर बनाया गया है।
छात्र और शिक्षक दोनों के लिए दिन में दो बार प्रत्येक दिन टी.एम का अभ्यास आवश्यक रहता है। यह चेतना के आधार पर शिक्षा के लिए अनिवार्य विषय होता है। विश्वविद्यालय की कक्षा में उपस्थिति अनिवार्य होती है। महर्षि महेश योगी द्वारा बनाये गये 33 शिक्षा विडियों कक्षा के आधार पर प्रथमतया रचनात्मक बुद्धि का विकास किया जाता है इसे वे क्रिएटिव इंटेलिजेंस साइंस कहते हैं। यह विज्ञान एक व्यवस्थित समझ है जो कि छात्रों को किसी भी विषय को समझने के लिए सक्षम बनाता है। इसके द्वारा मानव चेतना के सैद्धान्तिक पहलुओं को समझा जाता है।
विश्वविद्यालय अपने छात्रों के मस्तिष्क के विकास का मूल्यांकन करने के लिए, शिक्षा की प्रक्रिया की प्रगति को मापने के लिए  एक मस्तिष्क एकीकरण रिपोर्ट कार्ड रखता है। विश्वविद्यालय के संस्थापक सिद्धान्त निम्नवत् हैं-
1. व्यक्ति का पूर्ण क्षमता का विकास
2. शिक्षा के उच्चतम आदर्श का अनुभव
3. सरकारी उपलब्धियों में सुधार
4. विश्व परिवार में लाने वाले पुराने समय के अपराध और अन्य व्यवहार को हल करना
5. व्यक्ति और समाज के आर्थिक आकंक्षाओं की पूर्ति
6. अधिकतम बुद्धि से पर्यावरण के साथ चलना
7. वर्तमान समय के मानवता में अधिकतम आध्यात्मिक लक्ष्यों को प्राप्त करना।



श्री नानाजी देशमुख

श्री नानाजी देशमुख 

परिचय -
नानाजी देशमुख का जन्म महाराष्ट्र के परभनी जिले के कदाली नामक छोटे से कस्बे में 11 अक्टूबर, 1911 में हुआ था। नानाजी का लम्बा और घटनापूर्ण जीवन अभाव और संघर्षों में बीता। उन्होंने छोटी उम्र में ही अपने माता-पिता को खो दिया। मामा ने उनका लालन-पालन किया। उनके पास शुल्क देने के लिए और पुस्तकें खरीदने के लिए पैसे नहीं थे किन्तु उनके अन्दर शिक्षा और ज्ञान प्राप्ति की उत्कट अभिलाषा थी। अतः इस कार्य के लिये उन्होंने सब्जी बेचकर पढ़ाई के लिए पैसे जुटाते थे। वे मंदिरों में रहे और पिलानी में बिरला इंस्टीट्यूट में उन्होंने उच्च शिक्षा प्राप्त की। बाद में तीस के दशक में वे आर0एस0एस0 में शामिल हो गये। भले ही उनका जन्म महाराष्ट्र में हुआ, लेकिन उनका कार्यक्षेत्र राजस्थान और उत्तर प्रदेश में रहा। उनकी श्रद्धा देखकर सरसंघचालक श्री गुरु जी ने उन्हें प्रचारक के रुप में गोरखपुर भेजा बाद में वे उत्तर प्रदेश के प्रांत संचालक बने। 
नानाजी देशमुख लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के राष्ट्रवादी विचारधारा से प्रेरित हुए। तिलक से प्रेरित होकर उन्होंने समाज सेवा और सामाजिक अतिविधियों में रुचि ली। आरएसएस केे अदि सरसंघचालक डाॅ0 केशव बलिराम हेडगेवार से उनके पारिवारिक संबंध थे। हेडगेवार ने नानाजी में छिपी प्रतिभा को पहचान लिया और आरएसएस की शाखा में आने के लिए प्रेरित किया।
1940 में, डाॅ केशव बलिराम हेडगेवार के निधन के बाद उन्हें कई युवकों को महाराष्ट्र की आरएसएस की शाखा में शामिल होने के लिए प्रेरित किया। नानाजी ऐसे लोगों में से थे जिन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन राष्ट्र की सेवा में अर्पित करने के लिए आरएसएस से जुड़े। वे प्रचारक के रुप में उत्तर प्रदेश भेजे गये। आगरा में वे पहली बार डाॅ दीनदयाल उपाध्याय से मिले। बाद में नानाजी गोरखपुर गये जहाँ उन्होंने लोगों को संघ की विचारधारा के बारे में बताया। ये कार्य बिल्कुल भी आसान नहीं था, संघ के पास दैनिक खर्च के लिए भी धन नहीं थे। उन्हें धर्मशालाओं में ठहरना पड़ता था, उन्हें लगातार धर्मशाला बदलना पड़ता था, क्योंकि एक धर्मशाला में लगातार तीन दिनों से ज्यादा समय तक ठहरने नहीं दिया जाता था। अंत में बाबा राघवदास नें उन्हें इस शर्त पर ठहरने दिया कि वे उनके लिए खाना बनायेंगे। तीन साल के अंदर उनकी मेहनत ने रंग लाई और गोरखपुर के आस-पास करीब 250 संघ की शाखाएँ खुल गई। नानाजी ने हमेशा शिक्षा पर बहुत जोर दिया। उन्होंने 1950 में गोरखपुर में पहले सरस्वती शिशु मन्दिर की स्थापना की। 
1947 में आरएसएस ने राष्ट्रधर्म और पांचजन्य नामक दो पत्रिकाओं और स्वदेश नामक पत्र की शुरुवात करने का फैसला किया। श्री अटल बिहारी बाजपेयी को संपादन और दीनदयाल उपाध्याय को मार्गदर्शन, जबकि नानाजी को प्रबन्ध निदेशक की जिम्मेदारी सांैपी गई। पैसे के अभाव में पत्र और पत्रिकाओं का प्रकाशन संगठन के लिए मुश्किल कार्य था, लेकिन इससे उनके उत्साह में कमी नहीं आई और सुदृढ़ राष्ट्रवादी सामग्री के कारण इन प्रकाशनों को लोकप्रियता और पहचान मिली। 1948 में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की हत्या के बाद आरएसएस पर प्रतिबंध लगा दिया गया, जिससे इन प्रकाशन कार्यों पर असर पड़ा। उन दिनों भूमिगत होकर इनका प्रकाशन कार्य लारी रहा। 
जब आरएसएस पर से प्रतिबंध हटा तो फैसला राजनीतिक संगठन भारतीय जनसंघ की स्थापना का फैसला हुआ। श्री गुरुजी ने नानाजी को उत्तर प्रदेश में भारतीय जनसंघ के महासचिव का प्रभार लेने को कहा। नानाजी का जमीनी कार्य उत्तर प्रदेश में पार्टी को स्थापित करने में अहम भूमिका निभाई। 1957 तक भाजपा ने उत्तर प्रदेश के सभी जिलों में अपनी ईकाई बनाई, इस दौरान नानाजी नें पूरे उत्तर प्रदेश का दौरा किया और चैधरी चरण सिंह के नेतृत्व में सरकार में शामिल हो गई। नानाजी ने चैधरी चरण सिंह और डाॅ राम मनोहर लोहिया से अच्छे संबंध थे, इसलिए गठबंधन में उन्होंने अहम भूमिका निभायी। उत्तर प्रदेश की पहली गैर-कांग्रेसी सरकार के गठन में विभिन्न राजनितिक दलों को एकजुट करने में नानाजी ने अहम भूमिका निभाई।
उत्तर प्रदेश में भाजपा ने पंडित दीनदयाल उपाध्याय की दृष्टि, अटल बिहारी वाजपेयी के वक्तृत्व और नानाजी के संगठनात्मक कार्यों के कारण भारतीय जनसंघ महत्वपूर्ण रातनितिक शक्ति बन गया, न सिर्फ पार्टी कार्यकर्ताओं से बल्कि विपक्षी दलों के साथ भी नानाजी के संबंध अच्छे थे। नानाजी विनोबा भावे के भुदान आंदोलन में सक्रिय रुप से शामिल हुए, दो महीनों तक विनोबा के साथ रहे, वे आंदोलन से प्रभावित हुए। जेपी आंदोजन में जब जयप्रकाश पर पुलिस नें लाठियाँ बरसाई, उस समय नानाजी ने जयप्रकाश को सुरक्षित निकाल लिया, जिसमें नानाजी को चोटें आई और इनका एक हाथ टूट गया। बाद में जयप्रकाश नारायण और पूर्व प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने नानाजी के साहस की भूरि-भूरि प्रशंसा की, उन्हें पुरस्कार के तौर पर बतौर उद्योग मंत्री शामिल होने का न्यौता भी दिया, लेकिन नानाजी ने इनकार कर दिया। आपातकाल हटने के बाद चुनाव हुए, जिसमें बलरामपुर लोकसभा सीट से नानाजी सांसद चुने गए। 1980 में साठ साल की उम्र में उन्होंने सक्रिय राजनिति से सन्यास लेकर आदर्श की स्थापना की,। बाद में उन्होंने अपना पूरा जीवन सामाजिक और रचनात्मक कार्यो में लगा दिया। वे आश्रमों में रहे और कभी अपना प्रचार नहीं किया। जय प्रकाश नारायण के आह्वान पर उन्होंने सम्पूर्ण क्रान्ति को पूरा समर्थन दिया। जनता पार्टी के संस्थपकों में नानाजी प्रमुख थे। नानाजी ने दीनदयाल शोध संस्थान की स्थापना की और उसमें सेवा दी। उन्होंने चित्रकूट में चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय की स्थापना की। यह भारत का पहला ग्रामीण विश्वविद्यालय है और वे इसके पहले कुलाधिपति थे। 1999 में एन.डी.ए. सरकार ने उन्हें राज्यसभा से सांसद बनाया।
1969 में वे पहली बार चित्रकूट आए और अन्तिम रूप से वे चित्रकूट में बस गए। उन्होंने भगवान श्रीराम की कर्मभूमि चित्रकूट की दुर्दशा देखी। वे मंदाकिनी के तट पर बैठ गये ओर अपने जीवन काल में चित्रकूट को बदलने का फैसला किया। अपने वनवास के काल में राम ने दलित जनों के उत्थान का कार्य किया। इससे प्रेरणा लेकर नानाजी ने चित्रकूट को अपने सामाजिक कार्यो का केन्द्र बनाया। उन्होंने सबसे गरीब व्यक्ति की सेवा शुरू की। वे अक्सर कहा करते थे कि वे राजा राम से वनवासी राम की अधिक प्रशंसा करते हैं इसलिए वे अपना बचा हुआ जीवन चित्रकूट में बिताएंगें। उन्होंने अपने अन्तिम क्षण तक इस प्रण का पालन किया। उनका निधन चित्रकूट में 27 फरवरी 2010 को हो गया। नानाजी ने 95 वर्ष की उम्र में देश के पहले ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने अपना शरीर मेडिकल शोध के लिए दान करने की इच्छा जताई।

दीनदयाल शोध संस्थान
पं0 दीनदयाल उपाध्याय प्रणीत एकात्म मानववाद को मूर्त रूप दने के लिए नानाजी ने 1972 में नई दिल्ली में दीनदयाल शोध संस्थान की स्थापना की। यह दर्शन समाज के प्रति मानव की समग्र दृष्टि पर आधारित है जो भारत को आत्मनिर्भर बना सकता है। नानाजी देशमुख ने एकात्म मानववाद के आधार पर ग्रामीण भारत के विकास की रूपरेखा रखी। शुरूआती प्रयोगों के बाद उत्तर प्रदेश के गोंण्डा ओर महाराष्ट्र के बीड में नानाजी ने गांवों में स्वास्थ्य, सुरक्षा, शिक्षा, कृषि, आय अर्जन, संसाधनों के संरक्षण, सामाजिक विवेक के विकास के लिए एकात्म कार्यक्रम की शुरूआत की, पूर्ण परिवर्तन का आधार लोक सहयोग और सरकार है।
चित्रकूट परियोजना या आत्म निर्भरता के लिए अभियान की शुरूआत 26 जनवरी 2005 में चित्रकूट के आस-पास हुई, जो उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की सीमा पर स्थित है। इस परियोजना का उद्देश्य 2005 तक इन गांवों में आत्म निर्भरता हासिल करना था। परियोजना 2010 में पूरी हुई। परियोजना से उम्मीद जगी कि इसके आस-पास के 500 गांवों को आत्म निर्भर बनाया जाय जो भारत और दुनिया के लिए आदर्श बन सकता है। इस संस्थान की मदद से सैकड़ों गांवों को मुकदमा मुक्त और विवाद सुलझाने का आदर्श बनाया गया।
प्रशंसा और सम्मान
1999 में नानाजी देशमुख को पद्य्म विभूषण से सम्मानित किया गया। पूर्व राष्ट्रपति ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने नानाजी देशमुख और उनके संगठन दीनदयाल शोध संस्थान की प्रशंसा की। अब्दुल कलाम ने कहा कि - चित्रकूट में मैंने नानाजी देशमुख और दीनदयाल उपाध्याय के उनके साथियों से मुलाकात की। संस्थान ग्रामीण विकास के प्रारूप को लागू करने वाला अनुपम संस्थान है। यह प्रारूप भारत के लिए उपयुक्त है। विकास कार्यो से अलग संस्थान विवादमुक्त समाज की स्थापना में मदद करता हे। मैं समझता हूँ कि चित्रकूट के आस-पास 80 गांव मुकदमा मुक्त हैं। गांव के लोंगों ने सर्वसम्मति से फैसला किया है कि किसी विवाद का हल करने के लिए वे अदालत नहीं जायेंगे। तय हुआ है कि विवाद आपसी सहमति से सुलझा लिए जायेंगे। विकास के इस अनुपम प्रारूप को समाजिक संगठनों, न्यायायिक संगठनों और सरकार के माध्यम से देश के विभिन्न भागों में फैलाया जा सकता है। नानाजी चित्रकूट में जो कर रहें हैं वह अन्य लोगों के लिए आँखें खोलने वाला होना चाहिए।


पं0 श्रीराम शर्मा आचार्य

पं0 श्रीराम शर्मा आचार्य
   

परिचय - 
पं. श्री राम शर्मा आचार्य का जन्म बुधवार, 2 सितम्बर, 1911 (सं. 1968, आश्विन, कृष्ण पक्ष, त्रयोदशी) को आगरा (उ0प्र0) से जलेसर रोड 24 कि.मी. पर स्थित आँवलखेड़ा में हुआ था।ं आँवलखेड़ा का यह स्थान वर्तमान में एक युगतीर्थ बन चुका है। यहीं से उनकी सेवा-साधना प्रारम्भ हुई। शिक्षा एवं ग्रामीण स्वालम्बन की कई गतिविधियाँ यहाँ से उन्होंने चलाईं। विरासत में मिली प्रचुर भू-सम्पदा का उपयोग अपने और अपने परिवार के लिए न करके उन्होंने समाजिक गतिविधियों के लिए किया। एक भाग से अपनी माता जी की स्मृति में दान कुँवरि इण्टर कालेज की स्थापना करायी, शेष राशि बाद में गायत्री तपोभूमि हेतू समर्पित कर दी। आप गायत्री के सिद्ध साधक, 3000 से अधिक पुस्तक-पुस्तिकाओं के लेखक, वेद, पुराण, उपनिषद् के भाष्यकार, वैज्ञानिक आध्यात्मवाद के जनक, स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी, युग निर्माण योजना के सूत्रधार, विचार क्रान्ति अभियान के प्रणेता और ऋषि परम्परा के उन्नायक के रूप में स्थापित हैं और अखिल विश्व गायत्री परिवार की स्थापना की। आप व्यापक कार्य को स्थापित व संचालित करते हुए 2 जून, 1990 में ब्रह्मलीन हो गये। 
समस्त विद्याओं का भण्डार - गायत्री मंत्र का तत्वज्ञान
”ऊँ र्भूभुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियों यो नः प्रचोदयात्“
गायत्री संसार के समस्त ज्ञान-विज्ञान की आदि जननी है। वेदों को समस्त प्रकार की विद्याओं का भण्डार माना जाता है। वे वेद गायत्री की व्याख्या मात्र हैं। गायत्री को वेदमाता कहा गया है। चारों वेद गायत्री के पुत्र हैं। ब्रह्माजी ने अपने एक-एक मुख से गायत्री के एक-एक चरण की व्याख्या करके चारो वोदों को प्रकट किया। ”ऊँ र्भूभुवः स्वः“ से ऋग्वेदए ”तत्सवितुर्वरेण्यं “ से यर्जुवेद, ”भर्गो देवस्य धीमहि“ से सामवेद और ”धियों यो नः प्रचोदयात्“ से अथर्ववेद की रचना हुई।
इन वेदों से शास्त्र, दर्शन, ब्राह्मण ग्रन्थ, आरण्यक, सूत्र, उपनिषद्, पुराण, स्मृति आदि का निर्माण हुआ। इन्हीं ग्रन्थों से शिल्प, वाणिज्य, शिक्षा, रसायन, वास्तु, संगीत, आदि 84 कलाओं का आविष्कार हुआ। इस प्रकार गायत्री संसार के समस्त ज्ञान-विज्ञान की जननी ठहरती है। जिस प्रकार बीज के भीतर वृक्ष तथा वीर्य के एक बूंद के भीतर पूरा मनुष्य सन्निहित होता है उसी प्रकार गायत्री के 24 अक्षरों में संसार का समस्त ज्ञान-विज्ञान भरा हुआ है। यह सब गायत्री का ही अर्थ विस्तार है।
मंत्रो में शक्ति होती है। मंत्रों के अक्षर शक्ति बीज कहलाते हैं। उनका शब्द गुथन ऐसा होता है कि उनके विधिवत् उच्चारण एवं प्रयोग से अदृश्य आकाश मण्डल में शक्तिशाली विद्युत तरंगे उत्पन्न होती है और मनःशक्ति तरंगों द्वारा नाना प्रकार के आध्यात्मिक एवं सांसारिक प्रयोजन पूरे होते हैं। साधारणतः सभी विशिष्ट मंत्रों में यही बात होती है। उनके शब्दों में शक्ति होती है, परन्तु उन शब्दों का कोई विशेष महत्वपूर्ण अर्थ नहीं होता। लेकिन गायत्री मंत्र में यह बात नहीं है। इसके एक-एक अक्षर में अनेक प्रकार के ज्ञान-विज्ञानों के रहस्यमय तत्व छिपे हुए हैं- ”तत्सवितुर्वरेण्यं “ आदि के स्थूल अर्थ तो सभी को मालूम हैं एवं पुस्तकों में छपे हुए हैं। यह अर्थ भी शिक्षाप्रद हैं। परन्तु इनके अतिरिक्त 64 कलाओं, 6 शास्त्रों, 6 दर्शनों एवं 84 विद्याओं के रहस्य प्रकाशित करने वाले अर्थ भी गायत्री के हैं। उन अर्थो का भेद कोई-कोई अधिकारी पुरूष ही जानते हैं। वे न तो छपे हुए हैं और न सबके लिए प्रकट हैं।
इन 24 अक्षरों में आर्युवेद शास्त्र भरा हुआ है। ऐसी-ऐसी दिव्य औषधियों और रसायनों के बनाने की विधियाँ इन अक्षरों में संकेत रूप से मौजूद हैं जिनके द्वारा मनुष्य असाध्य रोगों से निवृत्त हो सकता है। इन 24 अक्षरों में सोना बनाने की विधा का संकेत है। इन अक्षरों में अनेकों प्रकार के आग्नेयास्त्र, वरूणास्त्र, नारायणास्त्र, पाशुपास्त्र, ब्रह्मास्त्र आदि हथियार बनाने के विधान मौजूद हैं। अनेक दिव्य शक्तियों पर अधिकार करने की विधियों के विज्ञान भरे हुए हैं। ऋद्धि-सिद्धियों को प्राप्त करने, लोक-लोकान्तरों के प्राणियों से सम्बन्ध स्थापित करने, ग्रहों की गतिविधि तथा प्रभाव को जानने, अतीत तथा भविष्य से परिचित होने, अदृश्य एवं अविज्ञात तत्वों को हस्तामलकवत् देखने आदि अनेकों प्रकार के विज्ञान मौजूद हैं। जिसकी थोड़ी भी जानकारी मनुष्य प्राप्त करले तो वह भूलोक में रहते हुए भी देवताओं के समान दिव्य शक्तियों से सुसम्पन्न बन सकता है। प्राचीन काल में ऐसी अनेक विद्याएँ हमारे पूर्वजों को मालूम थीं जो आज लुप्तप्राय हो गई हैं। उन विद्याओं के कारण हम एक समय जगद्गुरू, चक्रवर्ती शासक एवं स्वर्ग-सम्पदाओं के स्वामी बने हुए थे। आज हम उनसे वंचित होकर दीन-हीन बने हुए हैं।
गायत्री के दोनों ही प्रयोग हैं। वह योग भी है और तन्त्र भी। उससे आत्म दर्शन और ब्रह्म प्राप्ति भी होती है तथा संासांरिक उपार्जन-संहार भी। गायत्री योग दक्षिण मार्ग है, उस मार्ग से हमारे आत्म कल्याण का उद्देश्य पूरा होता है।
दक्षिण मार्ग का आधार यह है कि- विश्वव्यापी ईश्वरीय शक्तियों को आध्यात्मिक चुम्बकत्व से खींच कर अपने में धारण किया जाय। सतोगुण को बढ़ाया जाय और अन्तर्जगत में अवस्थित पंचकोश, सप्त प्राण, चेतना चतुष्टय, षटचक्र एवं अनेक उपचक्रों, मातृकाओं, ग्रन्थियों, भ्रमरों, कमलों, उपत्यिकाओं को जागृत करके आनन्ददायिनी-अलौकिक शक्तियों का आविर्भाव किया जाय।
गायत्री तन्त्र वाम मार्ग है। उससे सांसारिक वस्तुएँ प्राप्त की जा सकती हैं। और किसी का नाश भी किया जा सकता है। वाम मार्ग का का आधार यह है कि- दूसरे प्राणियों के शरीरों में निवास करने वाली शक्ति को इधर से उधर हस्तान्तरित करके एक जगह विशेष मात्रा में शक्ति संचित कर ली जाय और उस शक्ति का मनमाना उपयोग किया जाय।
तन्त्र का विषय गोपनीय है, इसलिए गायत्री तन्त्र के ग्रन्थों में ऐसी अनेकों साधनाएँ प्राप्त होती हैं जिनमें धन, सन्तान, स्त्री, यश, आरोग्य, पदप्राप्ति, रोगनिवारण, शत्रु नाश, पाप नाश, वशीकरण आदि लाभों का वर्णन है और संकेत रूप में उन साधनाओं का एक अंश बताया गया है। परन्तु यह भली प्रकार स्मरण रखना चाहिए कि इन संक्षिप्त संकेतों के पीछे एक भारी कर्मकाण्ड एवं विधान है। वह पुस्तकों में नहीं वरन् अनुभवी साधना सम्पन्न व्यक्तियों से प्राप्त होता है। जिन्हें सद्गुरू कहते हैंे।

अखिल विश्व गायत्री परिवार, हरिद्वार (उत्तराखण्ड)
1950 ई0 के दशक में स्थापित अखिल विश्व गायत्री परिवार एक हिन्दुत्व समाज सुधार आन्दोलन है। इसकी कार्य प्रणाली और उद्देश्य स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा स्थापित आर्य समाज से मिलते-जुलते हैं। इस संस्था ने विचार क्रान्ति अभियान, प्रज्ञा अभियान आदि चलायें जिसका उद्देश्य जनमानस में वैचारिक परिवर्तन लाकर समाज का उत्थान करना है। हम बदलेंगें, युग बदलेगा, मनुष्य भटका हुआ देवता है, आदि इसके प्रमुख उद्घोष हैं। इस संगठन का कार्य गायत्री मंत्र की मूल भावना (प्रज्ञा का परिष्कार) के अनुसार है।
पं0 श्री राम शर्मा आचार्य जी का सम्पूर्ण कार्य अखण्ड ज्योति संस्थान, गायत्री तपोभूमि मथुरा, गायत्री तीर्थ शान्ति कुंज हरिद्वार, ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान और देव संस्कृति विश्वविद्यालय के माध्यम से संचालित हो रहे हैं।
लक्ष्य एवं उद्देश्य
व्यक्ति एक तन्त्र है जो मान्यताओं व आस्था के ईंधन से गतिशील होता है। पिछले दिनों हमें अनास्था की प्रेरणा मिली, उसे अपनाया गया और दुष्परिणाम देखा। अब मार्ग एक ही है कि विचार पद्धति को बदले, आस्थाओं को पुनः परिष्कृत करें और लोगों को ऐसी गतिविधियाँ अपनाने के लिए समझाएँ, जो वैयक्तिक एवं सामूहिक सुख-शान्ति की स्थिरता में अनादिकाल से सहायक रही हैं और अंत तक रहंेगी। जनमानस की इसी परिवर्तन प्रक्रिया का नाम युग निर्माण योजना है।
युग निर्माण योजना का प्रधान उद्देश्य है- विचार क्रान्ति। मूढ़ता और रूढ़ियों से ग्रस्त अनुपयोगी विचारों का ही आज सर्वत्र प्राधान्य है। आवश्यकता इस बात की है कि सत्य, प्रेम और न्याय पर आधारित विवेक और तर्क से प्रभावित हमारी विचार पद्धति हो। इस संसार में एक राष्ट्र, एक धर्म, एक भाषा, एक आचार रहे। जाति और लिंग के आधार पर मनुष्य-मनुष्य के बीच कोई भेद-भाव न रहे। हर व्यक्ति को योग्यता के अनुसार काम करना पड़ेे। आवश्यकतानुसार गुजारा मिले। धनी और निर्धन के बीच खाई पूरी तरह पट जाए। न केवल मनुष्य मात्र को वरन् प्राणियों तक को भी न्याय का संरक्षण मिले। दूसरे के अधिकारों को तथा अपने कत्र्तव्यों को प्राथमिकता देने की प्रवृत्ति हर किसी में उगती रहे। सज्जनता और सहृदयता का वातावरण विकसित होता चला जाए, ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न करने में युग निर्माण योजना प्राणपण से प्रयत्नशील है।
युग निर्माण योजना एक दिव्य योजना है। मोटी बुद्धि से इस प्रयास को मानुषी समझा जा सकता है, पर वस्तुतः उसके पीछे अतिमानवी शक्तियाँ ही काम कर रही हैं। सृष्टा निराकार होने के कारण प्रत्यक्षतः कुम्हार के तरह संरचना करते नहीं देखा जाता। महान कार्य महान व्यक्तियों द्वारा सम्पन्न होते रहे हैं। जो सृजन, परिपोषण और परिपालन के लिए पूरी तरह उत्तरदायी हैं, वो समय-समय पर धर्म की हानि और अधर्म की बाढ़ को को रोकने के लिए अपनी ऊर्जा के अनोखे प्रयोग करता है। महत्वपूर्ण कार्य भगवान करते हैं और उसके श्रेय को शरीरधारी मुफ्त में ही प्राप्त कर लेते हैं। चेतना काम करती है और शरीर को श्रेय मिलता है। ईश्वर इच्छा तथा मानवीय पुरूषार्थ का समन्वय ही चमत्कार उत्पन्न करता है। युग निर्माण अभियान में मानवीय पुरूषार्थ को जाग्रत करने, प्रखर बनाने तथा उसे सही दिशा में सही ढंग से प्रयुक्त करने की प्रक्रिया सतत चल रही है। ईश्वरीय मार्गदर्शन, अनुग्रह, अनुकम्पा एवं सहायता की स्पष्ट झलक युग निर्माण योजना द्वारा सम्पन्न हुए अगणित लोकोपयोगी कार्यो, उपलब्धियों मथा वर्तमान हलचलों में मिलती है। इतने बड़े कार्य व्यक्ति विशेष के पुरूषार्थ से नहीं, वरन् दैवी प्रेरणा और अनुकम्पा के आधार पर ही आश्चर्यजनक रूप से ही विकसित, विस्तृत एवं सफल होते रहें हैं।
युगऋषि पं0 श्री राम शर्मा आचार्य, युग निर्माण योजना के प्रवर्तक के शब्दों में- अगले दिनों विश्व का समता एवं एकता की आकर जानना होगा। वसुधैव कुटुम्बकम् की मान्यताओं पर नया विश्व, नया समाज बनेगा। सारी दुनिया का एक राष्ट्र बनेगा, सुविधा की दृष्टि से प्रान्तों जैसे देश बने रहेंगे। मनुष्य की एक जाति होगी। ऊँच-नीच, जाति-पाँति के भेद-भाव समाप्त हो जायेँगे। उपजातियों का वर्गीकरण उपहासास्पद बन जायेगा। सारी दुनिया एक भाषा बोलेगी और सबके लिए एक धर्म, एक आचरण एवं एक कानून होगा। भोजन वस्त्र को सभ्यता माना जाता हो, तो सुविधा और साधनों की दृष्टि से वह अलग भी रह सकता है। परन्तु संस्कृति समस्त मानव जाति की एक होगी। धन व्यक्तिगत न रहेगा, उस पर समाज का स्वामित्व होगा, न कोई धनी रहेगा, न गरीब। सब भरपूर परिश्रम करेंगे और उपलब्ध साधनों का सभी समान रूप से हँसी-खुशी के साथ उपयोग करेंगे। आस्तिकता की व्याख्या में ईश्वर समदर्शी, सर्वव्यापक और न्यायकारी होने की मान्यता को प्रमुखता मिलेगी। भक्त की मनोकामनाएँ पूर्ण करते फिरने वाला बहुदेववाद मर जायेगा। कुकर्मो से रूष्ट और सद्भावना से प्रसन्न होने वाले ईश्वर को सब अपनी भावनाओं के द्वारा सम्पूजित किया करेंगे। उपासना के कर्मकाण्ड संक्षिप्त रह जाएँगे और वे समस्त विश्व के लिए एक जैसे होंगे। देशभक्ति, जातिभक्ति, भाषाभ्क्ति का विश्वभक्ति में विकास हो जाएगा। मानवों की तरह तब पशु-पक्षी भी समाज क्षेत्र में आ जाएँगे और उनका उत्पीड़न भी अपराध बन जायेगा। आशा करनी चाहिए कि ऐसा युग जल्दी आ रहा है। उसी की पूर्व भूमिका युग निर्माण योजना सम्पादित कर रही है। अभी कुछ दिनों तो अनेक स्वार्थ-संघर्ष और तीव्र होंगे तथा संकीर्णता और अनाचार के दुःख परिणामों को भली-भाँति अनुभव करके लोग उनसे विरत होने के लिए स्वयं आतुर होंगे। अगली आचार संहिता उन तथ्यों पर आधारित होगी जिनका हम लोग अभी युग निर्माण सत्संकल्पों के रूप में नित्य पाठ करते हैं। एक दिन इस जीवन पद्धति पर विश्व के सभी धर्म और देश चलने लगेंगे। नवयुग के अभिनव निर्माण के लिए हमें व्यक्तिगत और सामूहिक प्रयत्नों में तत्काल जुट जाना चाहिए और महाकाल के प्रयोजन में अपना हार्दिक योगदान अर्पित करना चाहिए।
इस सृष्टि का निर्माण, विकास और विलय परमात्मा के संकल्प से ही होता रहा है। परमात्मा की श्रेष्ठ कृति मनुष्य भी अपने समाज एवं संसार को संकल्पों के आधार पर ही बनाता-बदलता रहता है। युग निर्माण के ईश्वरीय संकल्प में हर नैष्ठिक की भागीदारी के लिए इस सत्संकल्प की रचना की है। इसके 18 सूत्र गीता के 18 अध्यायों की तरह सारगर्भित हैं। सूत्रों का गठन इस कुशलता से किया है कि यह क्षेत्र, भौगोलिक भेद और मानवीय वर्ग भेद से परे सभी साधक ईश्वरीय भागीदारी निभाते हुए अनुपम एवं अलौकिक लाभ प्राप्त कर सकते हैं।
1. हम ईश्वर को सर्वव्यापी, न्यायकारी मानकर उसके अनुशासन को अपने जीवन में उतारेंगे।
2. शरीर को भगवान का मन्दिर समझकर आत्म-संयम और नियमितता द्वारा आरोग्य की रक्षा करेंगे।
3. मन को कुविचारों और दुर्भावानाओं से बचाये रखने के लिए स्वाध्याय एवं सत्संग की व्यवस्था रखे रहेंगे।
4. इन्द्रिय-संयम, अर्थ-संयम, समय-संयम और विचार-संयम का सतत् अभ्यास करेंगे।
5. अपने आपको समाज का एक अभिन्न अंग मानेंगे और सबके हित में अपना हित समझेंगे।
6. मर्यादाओं को पालेंगे, वर्जनाओं से बचेंगे, नागरिक कत्र्तव्यों का पालन करेंगे और समाजनिष्ठ बने रहेंगे।
7. समझदारी, ईमानदारी, जिम्मेदारी और बहादुरी को जीवन का एक अविच्छिन्न अंग मानेंगे।
8. चारों ओर मधुरता, स्वच्छता, सादगी एवं सज्जनता का वातावरण उत्पन्न करेंगे।
9. अनीति से प्राप्त सफलता की अपेक्षा नीति पर चलते हुए असफलता को शिरोधार्य करेंगे।
10. मनुष्य के मूल्यांकन की कसौटी उसकी सफलताओं, योग्यताओं एवं विभूतियों को नहीं, उसके सद्विचारों और सत्कर्मो को मानेगें।
11. दूसरों के साथ वह व्यवहार न करेंगे, जो हमें अपने लिए पसंद नहीं।
12. नर-नारी परस्पर पवित्र दृष्टि रखेंगे।
13. संसार में सत्प्रवृत्तियों के पुण्य प्रसार के लिए अपने समय, प्रभव, ज्ञान, पुरूषार्थ एवं धन का एक अंश नियमित रूप से लगाते रहेंगे।
14. परम्पराओं की तुलना में विवेक को महत्व देंगे।
15. सज्जनों को संगठित करने, अनीति से लोहा लेने ओर नवसृजन की गतिविधियों में पूरी रूचि लेंगे।
16. राष्ट्रीय एकता एवं समता के प्रति निष्ठावान रहेंगे। जाति, लिंग, भाषा, प्रान्त, समुदाय आदि के कारण परस्पर कोई भेद-भाव न बरतेंगे।
17. मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है, इस विश्वास के आधार पर हमारी मान्यता है कि हम उत्कृष्ट बनेंगे और दूसरों को श्रेष्ठ बनायेंगे, तो युग अवश्य बदलेगा।
18. हम बदलेंगे-युग बदलेगा, हम सुधरेंगे-युग सुधरेगा। इस तथ्य पर हमारा परिपूर्ण विश्वास है।
महाकाल का कार्यक्षेत्र क्षेत्र विशेष, वर्ग विशेष अथवा सम्प्रदाय विशेष नहीं है बल्कि पूरी दुनिया है। उनकी चेतना एक साथ हर जीवंत, जाग्रत आत्मा पर कार्य कर रही है। भारत की सर्वाधिक जनता देहातों में रहती है। यहाँ अशिक्षितों की संख्या एक तिहाई है। यही है भारत का असला स्वरूप, असली बहुमत। शिक्षा का अभाव, छोटे देहातों में यातायात साधनों से रहित आबादी, पिछड़ेपन का वातावरण। इस स्थिति में राजनीति, अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र आदि के आधार पर यदि कुछ कहा समझा जाए, तो जनता इसे हृदयंगम नहीं कर सकेगी। हमें जो कुछ भी इस बहुमत जनता से कहना है, वह उसके बौद्धिक स्तर से तालमेल मिलाते हुए कहना चाहिए। तभी उसे ठीक तरह समझा और हृदयंगम किया जा सकेगा। इस देश का बौद्धिक आधार धार्मिकता से जुड़ा हुआ है। इस स्तर की जनता को उसकी परम्परागत मनोभूमि धर्मरूचि के सहारे ही प्रभावित किया जा सकता है। इस आधार पर कुशल मार्गदर्शक कुछ भी तथ्य इस पिछड़ें वर्ग के मनों पर उतार सकते हैं। रामायण, भगवत, गीता, पुराण आदि का सहारा लेकर इस देश की अधिकांश जनता के मन में महत्वपूर्ण तथ्यों को खूबी के साथ बिठाया जा सकता है। उतना और किसी प्रकार सम्भव नहीं हो सकता। यही सब तथ्य हैं जिनके आधार पर व्यक्ति निर्माण, परिवार निर्माण और समाज निर्माण की गतिविधियों को अग्रगामी बनाने के लिए ऐसे भावनाशील लोग ढँूढ़कर निकाले गये हैं, सम्बद्ध किये गये हैं, जो विश्व मानव की सेवा को ईश्वर की उपासना मानते हैं। लोकमंगल के प्रयास में धर्मनिष्ठा की सार्थकता जोड़ते हैं। यही है युग निर्माण योजना, उसकी कार्य पद्धति और साधन-सामग्री जिसके आधार पर नवयुग के आगमन का, मनुष्य में देवत्व के उदय का, धरती पर स्वर्ग के अवतरण का कार्य चल रहा है। युग निर्माण योजना की कार्य पद्धति को अज्ञान असुर से लड़ने के लिए - प्रचारात्मक मोर्चा, अभाव के दैत्य से जूझने के लिए-रचनात्मक मोर्चा और अनाचार-अनीति से लड़ने के लिए-संघर्षात्मक मोर्चा, के तीन भागों में विभक्त किया गया है।



पं0 मदन मोहन मालवीय

पं0 मदन मोहन मालवीय
  
परिचय - 
हिन्दूत्व के गौरव, विशाल, गम्भीर हृदय वाले मनस्वी पं. मदन मोहन मालवीय जी ने 25 दिसम्बर, 1861 में तीर्थराज प्रयाग में जन्म लेकर पं. ब्रजनाथ जी के कुल को ही नहीं, इस वसुन्धरा को कृतार्थ किया। पिता सच्चे सनातनी और दृढ़ भगवत् विश्वासी थे। पूर्वज मालवा से आने के कारण मालवीय कहलाये। माता बड़ी उदार और पति अनुगामिनी थीं। ऐसे विशुद्ध आस्तिक माता-पिता का प्रभाव मदन मोहन पर पड़ना स्वाभाविक था। मीरजापुर के प्रख्यात सनातनी पण्डित नन्दराम जी की कन्या कुन्दन देवी से मालवीय जी का पाणिग्रहण संस्कार सम्पन्न हुआ। मालवीय जी कट्टर हिन्दू थे। आचार में अत्यन्त संयमी और विचार में परम उदार हिन्दू धर्म की विशेषता उनमें स्पष्ट थी। उनका स्पर्शास्पर्श का इतना विचार था कि बड़े-बड़े जक्शनों के प्लेटफार्म पर चैका लगाकर खिचड़ी बनाना सामान्य बात थी। वे किसी के हाथ का कच्चा भोजन नहीं करते थे।
जब वे गाँधी जी के साथ गोलमेज परिषद् में भाग लेने लन्दन गये, तो उनके साथ गंगाजल, मिट्टी और गौ भारत से गई थी, और लन्दन यात्रा के बाद सविधि प्रायश्चित किया था। महामना मालवीय जी का घर अतिथि सत्कार के लिए विख्यात था। सूर्योदय के साथ ही रसोंई का चूल्हा जल जाता ओर रात्रि के एक बजे तक चैका चलता। जो आया है, चाहे किसी समय प्रस्थान करना हो, भोजन करके ही जाता था। प्राणपण से ब्राह्मणों की सेवा करते। प्रत्येक हिन्दू के घर में कम से कम एक गाय की सेवा के वे हिमायती थे।
पुराणों के प्रति उन्हें अगाध श्रद्धा थी। श्रीमद्भागवत पुराण का पाठ नियमित चलता। भागवत् के श्लोक पढ़ते ही नेत्रों से अश्रुधारा फूट पड़ती। उनकी महत्वाकांक्षा थी कि एक साथ एक स्थान पर सस्वर सामगान करें। इसी प्रेरणा से काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, उनकी भारत को अमर भेंट है। जीवन पर्यन्त विश्वविद्यालय के लिए कुछ न कुछ सहायता जुटाते रहे। इसके लिए अपने आपको दुनियाँ का सबसे बड़ा भिखारी मानते थे।
काला कांकर नरेश राजा रामपाल सिंह जी से आपको राजनैतिक जीवन की प्रेरणा मिली। काला कांकर से आपने पत्रकार जीवन में प्रवेश किया। प्रयाग आने पर ”अभ्युदय“ और ”इंडियन ओपीनियन“ का सम्पादन हाथ में लिया। लन्दन जाने से पूर्व सत्याग्रह के प्रमुख कर्णधार थे। उनके व्यापक प्रभाव के कारण कुछ दिनों के लिए बन्दी बनाने के लिए अंग्रेज सरकार को बहुत सोचना पड़ा। महात्मा गाँधी उन्हें बड़ा भाई कहते थे। गाँधी जी का कहना था - ”मैं तो मालवीय जी का पुजारी हूँ। यौवन काल से आज तक उनकी देशभक्ति अविच्छिन्न है। मैं उन्हें सर्वश्रेष्ठ हिन्दू मानता हूँ। उनके विशाल हृदय में शत्रु भी समा सकते थे।“ 
हिन्दू महासभा के मालवीय जी जन्मदाता थे। हिन्दू संगठन और हिन्दू धर्म उनका प्राण था। वे किसी से द्वेष नहीं करते थे। नोआखाली हत्याकाण्ड से उनका हृदय आहत हो गया, और उसी चोट के कारण 12 नवम्बर, 1946 को पार्थिव शरीर छोड़कर चले गये। उनके अन्तिम शब्दों में हिन्दू संगठन की पुकार थी। उन्हांेने कहा था-”जो हिन्दूओं को शान्ति के साथ रहने नहीं देना चाहते, उनके साथ किसी प्रकार की सहिष्णुता नहीं हो सकती। हिन्दू संस्कृति और हिन्दू धर्म खतरे में है। ऐसा समय आ गया है कि हिन्दू एक होकर सेवा तथा सहायता के साधनों को पुष्ट करें।“ महामना मालवीय जी के बारे में एनी बेसेन्ट का कहना था - ”मैं दावे के साथ कह सकती हूँ कि विभिन्न मतों के मध्य, केवल मालवीय महाराज ही भारतीय एकता की मूर्ति बने खड़े हैं।“
एक सच्चा मानव, आदर्श हिन्दू, एक महापुरूष इस धरती पर अवतीर्ण हुआ और अपना कत्र्तव्य-निर्वाह कर इस धरती से उठ गया। यदि राष्ट्र के कर्णधार ओर हिन्दू एक होकर महामना के आदर्शो को स्वीकार कर लेते, तो भारत सचमुच ऋषियों का भारत हो जाता। वे सादगी, सदाचार और आदर्श की जीवंत प्रतिमा थे।


काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (बी.एच.यू)
पं.मदनमोहन मालवीय ने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना का श्रीगणेश 1904 ई. में किया, जब काशीनरेश महाराज प्रभुनारायण सिंह की अध्यक्षता में संस्थापकों की प्रथम बैठक हुई। 1905 ई. में विश्वविद्यालय का प्रथम पाठ्यक्रम प्रकाशित हुआ। जनवरी, 1906 ई. में कुंभ मेले में मालवीय जी ने त्रिवेणी संगम पर भारत भर से आयी जनता के बीच अपने संकल्प का दोहराया। कहा जाता है, वहीं एक वृद्धा ने मालवीय जो को इस कार्य के लिए सर्वप्रथम एक पैसा चंदे के रूप में दिया। डाॅ. ऐनी बेसेन्ट काशी में विश्वविद्यालय की स्थापना में आगे बढ़ रही थी। इस विश्वविद्यालय के मूल में डाॅ. ऐनी बेसेन्ट द्वारा स्थापित और संचालित सेन्ट्रल हिन्दू कालेज प्रमुख था। इन्हीं दिनों दरभंगा के राजा महाराज रामेश्वर सिंह भी काशी में ”शारदा विद्यापीठ“ की स्थापना करना चाहते थे। इन तीन विश्वविद्यालय की योजना परस्पर विरोधी थी, अतः मालवीय जी ने डाॅ. ऐनी बेसेन्ट और महाराज रामेश्वर सिंह से परामर्श कर अपनी योजना में सहयोग देने के लिए उन दोनों को राजी कर लिया। फलस्वरूप बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी सोसाइटी की 15 दिसम्बर, 1911 को स्थापना हुई, जिसके महाराज दरभंगा अध्यक्ष, इलाहाबाद उच्च न्यायालय के प्रमुख बैरिस्टर सुन्दरलाल सचिव, महाराज प्रभुनारायण सिंह, पं. मदनमोहन मालवीय एवं डाॅ. ऐनी बेसेन्ट सम्मानित सदस्य थी। तत्कालीन शिक्षामंत्री सर हारकोर्ट बटलर के प्रयास से 1915 ई. में केन्द्रीय विधानसभा से हिन्दू यूनिवर्सिटी एक्ट पारित हुआ, जिसे तत्कालीन गवर्नर जनरल लार्ड हाडिंज ने तुरन्त स्वीकृति प्रदान कर दी। वसंत पंचमी, 6 फरवरी, 1916 ई. के दिन ससमारोह वाराणसी में गंगातट के पश्चिम, रामनगर के समानान्तर महाराज प्रभुनारायण सिंह द्वारा प्रदत्त भूमि में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय का शिलान्यास हुआ। उक्त समारोह में देश के अनेक गवर्नरों, राजे-रजवाड़ों तथा सामंतों ने गवर्नर जनरल एवं वाइसराय का स्वागत और मालवीय जी को सहयोग करने के लिए हिस्सा लिया। अनेक शिक्षाविद् वैज्ञानिक एवं समाजसेवी भी इस अवसर पर उपस्थित थे। गाँधी जी भी विशेष निमंत्रण पर पधारे थे। अपने वाराणसी आगमन पर गाँधी जी ने डाॅ. बेसेन्ट की अध्यक्षता में आयोजित सभा में राजा-राजवाड़ों, सामंतो तथा देश के अनेक गणमान्य लोगों के बीच, अपना वह ऐतिहासिक भाषण दिया, जिसमें एक ओर ब्रिटीश सरकार की और दूसरी ओर हीरे-जवाहरात तथा सरकारी उपाधियों से लदे, देशी रियासतों के शासको की घोर भत्र्सना की गई थी।
संप्रति इस विश्वविद्यालय के दो परिसर हैं। मुख्य परिसर 1300 एकड़ वाराणसी में स्थित है। मुख्य परिसर में 3 संस्थान, 14 संकाय और 124 विभाग हैं। विश्वविद्यालय का दूसरा परिसर 2700 एकड़ मीरजापुर जनपद के बरकछा नामक जगह पर स्थित है। मुख्य परिसर के प्रांगण में विश्वनाथ का एक विशाल मन्दिर भी है। विशाल संर सुन्दर लाल चिकित्सालय, गोशाला, प्रेस, बुकडिपो एवं प्रकाशन, टाउन कमेटी (स्वास्थ्य), पी.डब्ल्यू.डी., स्टेट बैंक शाखा, पर्वतारोहण केन्द्र, एन.सी.सी. प्रशिक्षण केन्द्र, हिन्दू यूनिवर्सिटी नाम से डाकखाना, छात्रावास, जनसामान्य की सुविधा एवं सेवायोजन कार्यालय भी विश्वविद्यालय परिसर में संचालित है। श्री सुन्दरलाल, पं.मदनमोहन मालवीय, डाॅ. एस.राधाकृष्णन् (भूतपूर्व राष्ट्रपति), डाॅ. अमरनाथ झा, आचार्य नरेन्द्रदेव, डाॅ. रामस्वामी अय्यर, डाॅ. त्रिगुण सेन (भूतपूर्व केन्द्रीय शिक्षामंत्री) जैसे मूर्धन्य व्यक्ति यहाँ के कुलपति रह चुके हैं। केन्द्रीय हिन्दू विद्यालय, केन्द्रीय हिन्दू कन्या विद्यालय, रणवीर संस्कृत विद्यालय, पिदी ग्यान पिठ हाई विद्यालय सम्बद्ध विद्यालय हैं। विश्वविद्यालय में करीब 250 प्रोफसर, 500 रीडर एवं 1000 से अधिक लेक्चरर हैं। कार्यालयों, अधिकारीयों सहित लिपिक एवं चतुर्थ वर्ग के कर्मचारियों की संख्या करीब 6000 हजार है। वर्तमान में इस विश्वविद्यालय को केन्द्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा प्राप्त है। इस विश्वविद्यालय सरीखा दूसरा कोई उत्कृष्ट संस्थान ही नहीं जहाँ संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा यूनेस्को चेयर फार पीस एंड इंटरकल्चर अंडरस्टैण्डिंग की स्थापना हुई।
इस विश्वविद्यालय से शान्ति स्वरूप भटनागर, टी.आर.अनन्तरामन्, अहमद हसन दानी (पुरातत्व विद्वान एवं इतिहासकार), भूपेन हजारिका (गायक एवं संगीतकार), लालमणि मिश्र (संगीतकार), बीरबल साहनी (पक्षी विज्ञान के विद्वान), प्रकाश वीर शास्त्री (भूतपूर्व सांसद, आर्य समाज आन्दोलन के प्रणेताओं में से एक), आचार्य रामचन्द्र शुक्ल (हिन्दी साहित्य के प्रमुख स्तम्भों मे से एक एवं इतिहासकार), रामचन्द्र शुक्ल (चित्रकार), जयन्त विष्णु नार्लिकर, एम.एन.दस्तुरी (धातुकर्म के विद्वान), नरला टाटा राव, सुजीत कुमार (अभिनेता), समीर (गीतकार), मनोज तिवारी (भोजपुरी अभिनेता एवं सांसद) इत्यादि ज्ञान प्राप्त कर चुके हैं।