Wednesday, March 25, 2020

विश्वमानव और श्रीमती प्रतिभा पाटिल (19 दिसम्बर, 1934 - )

श्रीमती प्रतिभा पाटिल (19 दिसम्बर, 1934 - )

परिचय -
महाराष्ट्र के जलगाँव जिले में 19 दिसम्बर, 1934 को जन्मी प्रतिभा देवी सिंह पाटिल (उपनाम - प्रतिभा ताई) के पिता का नाम श्री नारायण राव थ। साड़ी और बड़ी सी बिंदी लगाने वाली यह साधारण पहनावें वाली महिला राजनीति में आने से पहले सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में कार्य कर रही थी। उन्होंने जलगाँव के मूलजी जैठा कालेज से स्नातकोत्तर (एम.ए.) और मुम्बई के गवर्नमेन्ट लाॅ कालेज से कानून की पढ़ाई की। वे टेबल टेनिस की अच्छी खिलाड़ी थीं तथा उन्होंने कई अन्तर्विद्यालयी प्रतियोगिताओं में विजय प्राप्त की। 1962 में वे एम.जे.कालेज में कालेज क्वीन चुनी गयीं। उसी वर्ष उन्होंने एदलाबाद क्षेत्र से विधानसभा के चुनाव में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के टिकट पर विजय प्राप्त की। उनका विवाह शिक्षाविद् देवीसिंह रणसिंह शेखावत के साथ 7 जुलाई, 1965 को हुआ। उनकी एक पुत्री तथा एक पुत्र हैं। श्री शेखावत के पूर्वज राजस्थान के सीकर जिले के थे और बाद जलगाँव महाराष्ट्र जाकर बस गये थे। उन्होंने महिलाओं के कल्याण के लिए कार्य किया और मुम्बई-दिल्ली में कामकाजी महिलाओं के लिए छात्रावास, ग्रामीण युवाओं के लाभ हेतू जलगाँव में इंजिनियरिंग कालेज के अलावा श्रम साधना न्यास की स्थापना की। श्रीमती पाटिल ने महिला विकास महामण्डल, जलगाँव में दष्टिहीन व्यक्तियों के लिए औ़द्योगिक प्रशिक्षण विद्यालय और विमुक्त जातियों तथा बंजारा जनजातियों के निर्धन बच्चों के लिए एक स्कूल की स्थापना की। श्रीमती प्रतिभा पाटिल ने अनेक यात्राएँ की है- इन्टरनेशनल काउसिंल आॅफ सोशल वेलफेयर कान्फ्रेन्स, नैरोबी और पोर्ट रीको में भाग लिया। उन्होंने 1985 में इस सम्मेलन में शिष्टमण्डल के सदस्य के रूप में बुल्गारिया में, महिलाओं की स्थिति पर आॅस्ट्रिया सम्मेलन में शिष्टमण्डल की अध्यक्ष के रूप में, लंदन में 1988 के दौरान आयोजित राष्ट्रमण्डलीय अधिकारी सम्मेलन में, चीन के बीजिंग शहर में विश्व महिला सम्मेलन में भाग लिया। श्रीमती प्रतिभा पाटिल की विशेष रूचि ग्रामीण अर्थव्यवस्था के विकास और महिलाओं के कल्याण में है। श्रीमती प्रतिभा पाटिल ने जलगाँव जिले में महिला होमगार्ड का आयोजन किया और 1962 में उनकी कमाण्डेन्ट थी। वे राष्ट्रीय शहरी बैंक और ऋण संस्थाओं की उपाध्यक्ष रहीं तथा बीस सूत्रीय कार्यक्रम कार्यान्वयन समिति, महाराष्ट्र की अध्यक्षा थीं। श्रीमती प्रतिभा पाटिल ने अमरावती में दृष्टिहीनों के लिए एक औद्योगिक प्रशिक्षण विद्यालय, निर्धन और जरूरतमन्द महिलाओं के लिए सिलाई कक्षाओं, पिछड़े वर्गो और अन्य पिछड़े वर्गो के बच्चों के लिए नर्सरी स्कूल खोल कर उल्लेखनीय योगदान दिया तथा किसान विज्ञान केन्द्र, अमरावती में किसानों को फसल उगाने की नई एवं वैज्ञानिक तकनीकें सिखाने, संगीत और कम्प्यूटर की कक्षाएँ आयोजित की। श्रीमती प्रतिभा पाटिल ने 27 वर्ष की अवस्था में 1962 में राजनीतिक जीवन का प्रारम्भ कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और महाराष्ट्र के भूतपूर्व मुख्यमंत्री यंशवंत राव चैहान की देखरेख में प्रारम्भ किया। 1962 से 1985 तक वे पाँच बार विधानसभा की सदस्य रहीं। इस दौरान वर्ष 1967 से 1972 तक वह महाराष्ट्र सरकार में राज्यमंत्री और 1972 से 1978 तक कैबिनेट मंत्री रहीं। इस अवधि में वे सार्वजनिक स्वास्थ्य, निषेध, पर्यटन, आवास और संसदीय कार्य इत्यादि मंत्रालयी कार्य सम्भाला। 1985 में वे राज्यसभा पहुँची और 1986 में राज्यसभा की उप सभापति बनीं। 18 नवम्बर, 1986 से 5 नवम्बर, 1988 तक वे सभापति, राज्यसभा भी रहीं। 1989 से 1990 में वे महाराष्ट्र प्रदेश कांग्रेस की प्रमुख बनीं। उन्हें वर्ष 1991 में दसवीं लोकसभा के लिए निर्वाचित किया गया और उन्होंने 1991 में अध्यक्षा, सदन समिति, लोकसभा के रूप में भी कार्य किया। श्रीमती प्रतिभा पाटिल को 8 नवम्बर, 2004 को राजस्थान का राज्यपाल के रूप में नियुक्त किया गया। उन्होंने भारत के राष्ट्रपति पद के लिए 22 जून, 2007 को राज्यपाल के पद से इस्तीफा दे दिया। वे 13वीं राष्ट्रपति के रूप में स्वतन्त्र भारत के 60 वर्ष के इतिहास में पहली महिला राष्ट्रपति हैं। उन्होंने 25 जुलाई, 2007 को संसद के सेन्ट्रल हाल में राष्ट्रपति पद की शपथ ली। 

”विज्ञान व आध्यात्म में काफी समानताएं हैं और दोनों के लिए अनुशासन सबसे ज्यादा जरूरी है। इन दोनों का मानव के विकास में भारी योगदान है। जब तक ये एक साथ मिलकर काम नहीं करेंगें उनका पूरा लाभ हासिल नहीं किया जा सकता। विश्वविद्यालय समाज के लिए उपयोगी अनुसंधान पर जोर दें ताकि उनका लाभ जनता व देश को हो। ज्ञान के लिए शिक्षा अर्जित की जानी चाहिए और देश के युवाओं के विकास के लिए शिक्षा पद्धति में समग्र दृष्टिकोण अपनाया जाना जरूरी है। इसका मकसद युवाओं को बौद्धिक और तकनीकी दृष्टि से सक्षम बनाना होना चाहिए।“ (विज्ञान व आध्यात्मिक खोज पर राष्ट्रीय सम्मेलन, नई दिल्ली के उद्घाटन में बोलते हुए) - श्रीमती प्रतिभा पाटिल 
साभार - हिन्दुस्तान, वाराणसी, दि0 13 मार्च, 2011

”भारत पूरी दुनिया को शान्ति की राह दिखाने में संक्षम है। शस्त्र विध्वंशकारी होता है तो शास्त्र पशुता से मानवतावाद की ओर ले जाता है। आज आवश्यकता केवल शिक्षित होने की नहीं बल्कि सुशिक्षित हाने की है। केवल भौतिक विकास को सर्वांगिण विकास नहीं कहा जा सकता । भारत की प्रकृति व यहाँ के ज्ञान के खजाने को ढूढ़ने में पूरी दुनिया लगी है। हमसे दुनियाँ ने बहुत कंुछ सिखा है। आज भी उसे शान्ति का रास्ता भारत ही दिखा सकता है।“
- श्रीमती प्रतिभा पाटिल 
साभार - दैनिक जागरण, वाराणसी, दि0 2 मार्च, 2015

श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा स्पष्टीकरण 
स्वामी विवेकानन्द जी की वाणी है-
यदि हम अपने व्यक्तिगत एवं सामूहिक जीवन में वैज्ञानिक चेतना सम्पन्न एवं आध्यात्मिक एक साथ न हो पाए, तो मानवजाति का अर्थपूर्ण अस्तित्व ही संशय का विषय हो जाएगा।  - स्वामी विवेकानन्द
धर्म तात्त्विक (आध्यात्मिक) जगत के सत्यों से उसी प्रकार सम्बन्धित है, जिस प्रकार रसायन शास्त्र तथा दूसरे भौतिक विज्ञान भौतिक जगत के सत्यों से। रसायन शास्त्र पढ़ने के लिए प्रकृति की पुस्तक पढ़ने की आवश्यकता है। धर्म की शिक्षाप्राप्त करने के लिए तुम्हारी पुस्तक अपनी बुद्धि तथा हृदय है। सन्त लोग प्रायः भौतिक विज्ञान से अनभिज्ञ ही रहते हैं। क्योंकि वे एक भिन्न पुस्तक अर्थात् आन्तरिक पुस्तक पढ़ा करते हैं; और वैज्ञानिक लोग भी प्रायः धर्म के विषय में अनभिज्ञ ही रहते हैं क्योंकि वे भी भिन्न पुस्तक अर्थात् वाह्य पुस्तक पढ़ने वाले हैं।  - स्वामी विवेकानन्द
विज्ञान एकत्व की खोज के सिवा और कुछ नहीं है। ज्योंही कोई विज्ञान शास्त्र पूर्ण एकता तक पहुँच जायेगा, त्योंहीं उसका आगे बढ़ना रुक जायेगा क्योंकि तब तो वह अपने लक्ष्य को प्राप्त कर चुकेगा। उदाहरणार्थ रसायनशास्त्र यदि एक बार उस एक मूल द्रव्य का पता लगा ले, जिससे वह सब द्रव्य बन सकते हैं तो फिर वह और आगे नहीं बढ़ सकेगा। पदार्थ विज्ञान शास्त्र जब उस एक मूल शक्ति का पता लगा लेगा जिससे अन्य शक्तियां बाहर निकली हैं तब वह पूर्णता पर पहुँच जायेगा। वैसे ही धर्म शास्त्र भी उस समय पूर्णता को प्राप्त हो जायेगा जब वह उस मूल कारण को जान लेगा। जो इस मत्र्यलोक में एक मात्र अमृत स्वरुप है जो इस नित्य परिवर्तनशील जगत का एक मात्र अटल अचल आधार है जो एक मात्र परमात्मा है और अन्य सब आत्माएं जिसके प्रतिबिम्ब स्वरुप हैं। इस प्रकार अनेकेश्वरवाद, द्वैतवाद आदि में से होते हुए इस अद्वैतवाद की प्राप्ति होती है। धर्मशास्त्र इससे आगे नहीं जा सकता। यहीं सारे विज्ञानों का चरम लक्ष्य है।
  - स्वामी विवेकानन्द

किसी भाषा के शब्दों से अपने विचार को लिखित रूप से प्रस्तुत करने वाले चरित्र को लेखक कहते हैं। एक लेखक शब्दों को एक सही क्रम में रखकर कुछ अर्थ और समझ को व्यक्त करने वाला कलाकार होता है।
जिस प्रकार लोग आत्मा की महत्ता को न समझकर शरीर को ही महत्व देते हैं उसी प्रकार लोग भले ही पढ़कर ही विकास कर रहें हो परन्तु वे शास्त्राकार लेखक की महत्ता को स्वीकार नहीं करते। जबकि वर्तमान समय में चाहे जिस विषय में हो प्रत्येक विकास कर रहे व्यक्ति के पीछे शास्त्राकार, लेखक, आविष्कारक, दार्शनिक की ही शक्ति है जिस प्रकार शरीर के पीछे आत्मा की शक्ति है। सदैव मानव समाज को एकात्म करने के लिए शास्त्र-साहित्य की रचना करना लेखक का काम रहा है। वही सत्य अर्थो में सभी से अभिनय करवाता है क्योंकि मनुष्य का चरित्र वही है जो उसका विचार है। और सभी विचारों को समाज में फैलाने वाला शास्त्राकार, लेखक ही है।
एक लेखक, शास्त्राकार नहीं हो सकता लेकिन एक शास्त्राकार, लेखक हो सकता है क्योंकि एक लेखक, लेखन की कला को जानता है। यदि उसे शास्त्राकार बनना है तो उसे अपने मन को ऊँचाई को समग्रता, सार्वभौमिकता की ओर ले जाना पड़ेगा। सामान्य रूप में एक लेखक विशेषीकृत विषय का लेखक होता है तो शास्त्राकार समग्रता, सार्वभौमिकता को धारण किया हुआ एकात्मता को विकसित करने के लिए लिखता है। दोनों में अन्तर मात्र मन की ऊँचाई का होता है। एक लेखक नीचे का पायदान है तो शास्त्राकार उसका सर्वोच्च मानक है।
जो लेखक शब्दों का जितना व्यापक कलाकार होगा जिससे समझ विकसित हो वह उतना ही लम्बे समय तक याद किया जाने वाला लेखक बनता है। 
आपके विचार पूर्ण सत्य हैं और वो सब आविष्कृत किया जा चुका है।
 

विश्वमानव और श्री राम नाइक (16 अप्रैल 1934 - )

श्री राम नाइक (16 अप्रैल 1934 - )

परिचय -
श्री नाईक का जन्म 16 अप्रैल 1934 को महाराष्ट्र के सांगली में हुआ. विद्यालयीन शिक्षा सांगली जिले के आटपाडी गांव में हुई। पुणे में बृहन् महाराष्ट्र वाणिज्य महाविद्यालय से 1954 में बी.काम. तथा मुंबई में किशनचंद चेलाराम महाविद्यालय से 1958 में एल.एल.बी. की स्नातकोत्तर शिक्षा प्राप्त की। श्री नाईक ने अपना व्यावसायिक जीवन ‘अकाउंटैंट जनरल’ के कार्यालय में अपर श्रेणी लिपिक के नाते शुरु किया। बाद में उनकी उच्च पदों पर उन्नति हुई और 1969 तक निजी क्षेत्र में कंपनी सचिव तथा प्रबंध सलाहकार के नाते उन्होंने कार्य किया। श्री राम नाईक बचपन से राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के स्वयंसेवक हैं।
आदरणीय राष्ट्रपति जी ने 14 जुलाई 2014 को श्री राम नाईक को उत्तर प्रदेश के राज्यपाल के तौर पर मनोनीत करने के बाद श्री नाईक ने 22 जुलाई 2014 को लखनऊ में पद ग्रहण किया और 05 अगस्त 2014 को राजस्थान के राज्यपाल के नाते भी मनोनीत करने के बाद श्री राम नाईक ने 08 अगस्त 2014 से 03 सितम्बर 2014 तक राजस्थान के राज्यपाल का अतिरिक्त कार्यभार संभाला। साऊथ इंडियन एज्युकेशन सोसायटी, मुंबई की ओर से ‘राष्ट्रीय श्रेष्ठता पुरस्कार’ कांची कामकोटी पीठ के जगद्गुरु शंकराचार्य पूज्य जयेन्द्र सरस्वती स्वामीगल के हाथों श्री राम नाईक को मुंबई में दिनांक 13 दिसम्बर 2014 को प्रदान किया गया। इसके पूर्व इस पुरस्कार से पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न श्री अटल बिहारी वाजपेयी, पूर्व राष्ट्रपति स्व. डॉ० शंकर दयाल शर्मा और पूर्व राष्ट्रपति डॉ० ए०पी०जे० अब्दुल कलाम जैसे महानुभावों को अलंकृत किया गया है।
इसके पूर्व श्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में गठित मंत्री परिषद में 13 अक्टूबर 1999 से 13 मई 2004 तक श्री राम नाईक पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री रहे। 1963 में पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय का गठन हुआ। तब से अब तक लगातार पांच वर्ष कार्यरत वे एकमेव पेट्रोलियम मंत्री हैं। इसके पूर्व 1998 की मंत्री परिषद में श्री नाईक ने रेल (स्वतंत्र प्रभार), गृह, योजना एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन और संसदीय कार्य मंत्रालयों में राज्यमंत्री (13 मार्च 1998 से 13 अक्टूबर 1999) के रुप में कामकाज संभाला था। एक साथ इतने महत्वपूर्ण मंत्रालयों की जिम्मेदारी संभालना विशेष माना जाता है। वे भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य थे तथा भाजपा शासित राज्य सरकारों के मंत्रियों की कार्यक्षमता बढ़े और गुणवत्ता का संवर्धन हो इसलिए गठित ‘सुशासन प्रकोष्ठ’ के राष्ट्रीय संयोजक भी थे। 2014 का लोकसभा चुनाव न लड़ने की तथा भविष्य में पार्टी को अपने राजनैतिक अनुभव देने के लिए राजनीति में सक्रिय रहने की घोषणा श्री राम नाईक ने भाजपा के आचार-विचार के प्रेरणाश्रोत तथा एकात्म मानववाद के जनक पंडित दीनदयाल उपाध्याय के जयंती के दिन यानी 25 सितंबर 2013 को पत्रकार सम्मेलन में की। 2014 के लोकसभा चुनाव में उनके उत्तर मुंबई निर्वाचन क्षेत्र से भाजपा उम्मीदवार श्री गोपाल शेट्टी महाराष्ट्र में सबसे अधिक मतों से 6,64,004 और सबसे अधिक मताधिक्य 4,46,582 से जीते। श्री नाईक श्री शेट्टी के चुनाव प्रमुख थे।
पेट्रोलियम मंत्री के रुप में श्री राम नाईक ने अक्टूबर 1999 में पदभार संभाला। उस समय 1 करोड़ 10 लाख ग्राहक घरेलू गैस की प्रतीक्षा-सूची में थे। यह घरेलू गैस की प्रतीक्षा-सूची समाप्त करने के साथ-साथ कुल 3 करोड़ 50 लाख नये गैस कनेक्शन श्री नाईक ने अपने कार्यकाल में जारी करवाए। उसके पूर्व 40 वर्षों में कुल 3.37 करोड़ गैस कनेक्शन दिए गए थे। माँगने पर नया सिलंडर मिलना प्रारंभ हुआ था। इस पृष्ठभूमि पर श्री नाईक की कार्यक्षमता उभर कर सामने आती है। साथ-साथ दुर्गम तथा पहाड़ी इलाकों की जरुरतों को व अल्प आय वाले लोगों को राहत देने के लिए 5 किलो के गैस सिलेंडर भी उनके कार्यकाल में ही जारी किए गये। उस समय 70 प्रतिशत कच्चा तेल (क्रूड ऑइल) आयात किया जाता था। कच्चे तेल के आयात की इस निर्भरता को कम करने के लिए उन्होंने विविध योजनाएं बनाकर उन्हें कार्यरूप देना शुरु किया। उन योजनाओं में से एक महत्वपूर्ण निर्णय अर्थात इथेनॉल का पेट्रोल में 10 प्रतिशत मिश्रण करना है। कारगिल युद्ध में शहीद वीरों की पत्नियों/निकटस्थ रिश्तेदारों को तेल कंपनियों के माध्यम से पेट्रोल पंप और गैस एजेंसी की डीलरशिप देने की विशेष योजना भी उनके द्वारा ही मंजूर की गई। संसद भवन पर हुए हमले में शहीद कर्मचारियों के परिवारजनों को भी पेट्रोल पंप आवंटित किए। पेट्रोल-डीजल के वाहनों से प्रदूषण कम हो इसलिए दिल्ली और मुंबई में सीएनजी गैस देना प्रारंभ किया। इस समय मुंबई में 1.40 लाख आटो रिक्शा, 53 हजार टैक्सी, 7,500 निजी मोटरकारें तथा 8,400 बस-ट्रक-टेम्पो सीएनजी पर चलते हैं, इसके अलावा रसोई के एलपीजी सिलंडर के बदले अधिक सुरक्षित, उपयोग के लिए आसान और तुलना में सस्ता पाइप गैस शुरु किया। इसका लाभ मुंबई में 7 लाख परिवारों को और 1,900 लघु-उद्योगों को मिल रहा है।
मुंबईवालों की नजर में ‘उपनगरीय रेल यात्रियों के मित्र’ यह श्री राम नाईक की असली पहचान है. श्री नाईक ने 1964 में ‘गोरेगांव प्रवासी संघ’ की स्थापना कर उपनगरीय यात्रियों की समस्याओं को सुलझाने का कार्य प्रारंभ किया। बाद में रेल राज्यमंत्री के नाते विश्व के व्यस्ततम मुंबई उपनगरीय रेल के 76 लाख यात्रियों को उन्नत सुविधाएं उपलब्ध करवाने के लिए ‘मुंबई रेल विकास निगम’ की स्थापना की। मुंबई के उपनगरी यात्रियों को राहत देने की दृष्टि से श्री राम नाईक ने अनेक विषयों की पहल की जैसे कि उपनगरी क्षेत्र का विरार से डहाणू तक विस्तार, 12 डिब्बों की गाड़ियां, संगणीकृत आरक्षण केन्द्र, बोरीवली-विरार चैहरीकरण, कुर्ला-कल्याण छः लाईनें, महिला विशेष गाड़ी आदि. संपूर्ण देश में रेल प्लेटफार्मों पर तथा यात्री गाड़ियों में सिगरेट तथा बीड़ी बेचने पर पाबंदी लगाने का ऐतिहासिक काम भी श्री नाईक द्वारा किया गया। यात्रियों से सुझाव लेकर नई गाड़ियों का नामकरण करने की अनोखी लोकप्रिय पद्धति का प्रारंभ भी श्री राम नाईक ने ही किया। 11 जुलाई 2006 को लोकल गाड़ियों में हुए बम विस्फोट से पीड़ित परिवारों को सहायता पहुंचाने के लिए विशेष प्रयास किए। 16 अप्रैल 2013 से डहाणू-चर्चगेट लोकल सेवा प्रारंभ हुई, जिसके पीछे श्री नाईक के सफल प्रयास रहे हैं। इस निर्णय से पश्चिम रेलवे का उपनगरीय सेवा का क्षेत्र 60 किलोमीटर से 124 किलोमीटर हुआ।
श्री राम नाईक ने महाराष्ट्र के उत्तर मुंबई लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र से लगातार पांच बार जीतने का कीर्तिमान बनाया है। इसके पूर्व तीन बार वे महाराष्ट्र विधानसभा में बोरीवली से विधायक भी रहे हैं। तेरहवीं लोकसभा चुनाव में उन्हें 5,17,941 मत प्राप्त हुए जो कि महाराष्ट्र के सभी जीतने वाले सांसदों में सर्वाधिक थे। मुंबई में सफलतापूर्वक लगातार आठ बार चुनाव जीतने का कीर्तिमान स्थापित करने वाले श्री नाईक पहले लोक प्रतिनिधि हैं। जनप्रतिनिधि की जवाबदेही की भूमिका में मतदाताओं को वे प्रतिवर्ष कार्यवृत्त प्रस्तुत करते रहे। राज्यपाल का दायित्व सम्भालने के बाद भी आपने पहले तीन महीनों का कार्यवृत्त ‘राजभवन में राम नाईक’ 20 अक्टूबर 2014 को प्रस्तुत किया.
श्री राम नाईक संसद की गरिमामय लोक लेखा समिति के 1995-96 में अध्यक्ष थे। लोकसभा में वे भाजपा के मुख्य सचेतक भी रहे। संसदीय रेलवे समन्वय समिति, प्रतिभूमि घोटाला के लिए संयुक्त जांच समिति, महिला सशक्तिकरण को बल प्रदान करने हेतु संसदीय समिति जैसी प्रमुख समितियों में भी उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है, लोकसभा की कार्यवाही को सुचारु चलाने के लिए लोकसभा की सभापति तालिका के भी वे सदस्य रहे हैं।
श्री राम नाईक ने संसद में ‘वंदे मातरम’ का गान प्रारंभ करवाया। उनके प्रयासों के फलस्वरुप ही अंग्रेजी में ‘बॉम्बे ’ और हिन्दी में ‘बंबई’ को उसके असली मराठी नाम ‘मुंबई’ में परिवर्तित करने में सफलता मिली। संसद सदस्यों को निर्वाचन क्षेत्र के विकास के लिए सांसद निधि की संकल्पना श्री नाईक की ही है। इस राशि को रुपए 1 करोड़ प्रति वर्ष से रुपए 2 करोड़ प्रतिवर्ष कराने का निर्णय भी योजना एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन राज्य मंत्री के नाते श्री नाईक ने लिया। अब यह राशि रुपए 5 करोड़ की गयी है। संसद सदस्य के नाते उन्होंने ‘स्तनपान को प्रोत्साहन और शिशु खाद्य के विज्ञपनों पर रोक’ का ‘निजी विधेयक’ प्रस्तुत किया। तद्नुसार इस विधेयक को सरकार द्वारा स्वीकृति मिली और बाद में यह अधिनियम बना।
राजनैतिक स्तर पर उन्होंने भारतीय जनसंघ के स्थानीय कार्यकर्ता के रुप में मुंबई का उपनगर गोरेगांव में कार्य शुरु किया। 1969 में भारतीय जनसंघ के मुंबई क्षेत्र के संगठन मंत्री के नाते कार्य करने के लिए उन्होंने नौकरी से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने लगातार आठ वर्षों तक संगठन का कार्य किया। वे भाजपा मुंबई विभाग के तीन बार अध्यक्ष भी रहे। वे पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के विशेष आमंत्रित सदस्य तथा भाजपा के ‘सुशासन प्रकोष्ठ’ के राष्ट्रीय संयोजक भी थे।
श्री राम नाईक को 1994 में कैंसर की बीमारी हुई परंतु श्री राम नाईक ने उस रोग को भी मात दी, तत्पश्चात् विगत 20 वर्षों में पहले जैसे वे उसी उत्साह और कार्यक्षमता से काम कर रहे हैं. श्री राम नाईक एक विशिष्ट छवि वाले व्यक्ति हैं जो प्रत्येक कार्य में सूक्ष्मता और पारदर्शिता एवं जागरुकता के लिए जाने जाते हैं.
आदरणीय राष्ट्रपति द्वारा उत्तर प्रदेश के राज्यपाल नियुक्त किए जाने की घोषणा के बाद 15 जुलाई 2014 को श्री राम नाईक ने भारतीय जनता पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से तथा सभी पदों से इस्तीफा दिया है

”देश विविधता से भरा है। इसमें आस्था ऐसा पहलू है जो एका बनाता है। भले ही बोली भाषा, पहनावा, संस्कृति में भिन्नता हो पर माँ गंगा के प्रति आस्था तो एक जैसी है। इसे विकास से जोड़ने का यह उपयुक्त वक्त है। काशी की इसी धरती पर आदि शंकराचार्य को अद्वैत ज्ञान मिला था। यहाँ के कण-कण में पाण्डित्य व्याप्त है जो हमें संस्कृति की ओर आकर्षित करता है। देश में भले ही विभिन्न राज्यों की अपनी संस्कृति और सम्प्रभुता है मगर काशी, देश के सभी राज्यों को अद्वैत भाव से एकता के साथ लेकर आगे बढ़ती है। देश को एकता के साथ विकास का भाव जगाने के लिए काशी की ओर देखना चाहिए।“ (महात्मा गाँधी काशी विद्यापीठ, वाराणसी में भारतीय समाजशास्त्रीय सोसायटी के 40वें अधिवेशन के उद्घाटन में)
- श्री राम नाइक, राज्यपाल, उत्तर प्रदेश, भारत
साभार -  दैनिक जागरण, 30 नवम्बर, 2014


”रिजर्व बैंक से दस गुना विचार धन दे गये विवेकानन्द” (स्वामी विवेकानन्द के शिकागो वकृतता के 122 वर्षगाॅठ पर सन् 2015 में अलीगढ़ में) - श्री राम नाइक, राज्यपाल, उत्तर प्रदेश, भारत

”सोचवीर नहीं, कृतिवीर बनें। जब रामसेतू बन रहा था तब एक गिलहरी भी श्रमदान कर रही थी। क्योंकि वह किनारे बैठकर सोचने की बजाए पूरी ताकत से कृति में जुट गई थी। देशवासीयों को भी इस कथा से प्रेरणा लेनी चाहिए।” (महमूरगंज, वाराणसी के एक अभिनन्दन समारोह में)
  - श्री राम नाइक, राज्यपाल, उत्तर प्रदेश, भारत

लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा स्पष्टीकरण
काशी, सत्य प्रकाशित करने वाला एक क्षेत्र है। मूलतः जिन महापुरूषों के कारण वाराणसी ने गौरव प्राप्त किया उनमें से अधिकतम, वहाँ के निवासी ही नहीं थे। 
रामनगर (वाराणसी की ओर से गंगा उस पार) का महात्म्य महर्षि वेदव्यास के तप स्थलों के रूप में विदित है। त्रिकोण की संरचना में वेदव्यास के स्थान से जितनी दूरी पर दुर्गा मन्दिर है, ठीक उतनी ही दूरी पर बाबा कीनाराम के द्वारा स्थापित वेदव्यास मंदिर है, जो रामनगर किले के अन्दर स्थित है। जिसे साधारण जनता छोटा वेदव्यास के नाम से जानती है। वास्तव में वेदव्यास की यह सबसे प्राचीन मूर्ति है। व्यासजी द्वारा काशी को शाप देने के कारण विश्वेश्वर ने व्यासजी को काशी से निष्कासित कर दिया था। तब व्यासजी लोलार्क मन्दिर के आग्नेय कोण में गंगाजी के पूर्वी तट पर स्थित हुए। इस घटना का उल्लेख काशी खण्ड में इस प्रकार है-
लोलार्कादं अग्निदिग्भागे, स्वर्घुनी पूर्वरोधसि। 
स्थितो ह्यद्यापि पश्चेत्सः काशीप्रासाद राजिकाम्।। - स्कन्दपुराण, काशी खण्ड 96/201
काशीखण्डोक्त लोलार्क कुण्ड से दक्षिण दिशा की ओर टीला-शिखर पर आदि वेदव्यास का स्थान है। काशी खण्ड के प्रमाण से ही यह सिद्ध होता है कि इस परिक्षेत्र में अतिप्राचीन मेला होता था जो अब समाप्तप्राय है (मघा नक्षत्र युक्ता पूर्णिमा)। माघ महीने में लगने वाला यह मेला वर्तमान में राजकीय व्यवस्था के अभाव से अब समाप्त है। कहा जाता है कि शिव द्वारा वेदव्यास को वरदान था कि काशीवास का पुण्य तभी प्राप्त होगा जब माघ महीने में वेदव्यास का दर्शन किया जाये। इस दर्शन द्वारा एक वर्ष काशीवास का पुण्य प्राप्त होता है। यह मेला मात्र मेला न होकर दूर-दराज के आये लोगों के बीच आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक आदान-प्रदान का एक मंच होता था। किले में स्थित वेदव्यास मंदिर के दर्शन के पश्चात हजारों लोग तालाब में स्नान कर बगीचों व तालाबों के किनारे भोजन कर पुनः वेदव्यास का दर्शन करते थे इस दौरान तालाबों के किनारो पर सैकड़ों दुकानें लगती थीं। जो लोगों की आजीविका तथा राजस्व का एक साधन थे। व्यास काशी क्षेत्र की कुल सीमा करीब 15 किलोमीटर के व्यास में है, जो छोटा मीरजापुर, पटनवाँ, हमीदपुर, जिवनाथपुर, रामनगर से साहुपुरी तक विस्तृत है।
महर्षि वेदव्यास की तपस्थली के रूप में प्रसिद्ध प्राचीन रामनगर घाट के किनारे की एक बस्ती के रूप में था, जहाँ पर शहर का एक धनाढ्य वर्ग जौहरी, सेठ के रूप में रहता था। 
ध्यान रहे कि गंगा पार क्षेत्र से ही अन्तिम जीवनदायिनी शास्त्र ”विश्वशास्त्र“ और ”सत्यकाशी क्षेत्र“ व्यक्त हुआ है। प्रभु नारायण राजकीय इण्टर कालेज से कक्षा-11 व 12 के अपने शिक्षा ग्रहण के दौरान 2 वर्ष रामनगर में गोलाघाट स्थित स्व.एस.एस.लाल के मकान सं0 1/782 में किराये पर मेरा (लव कुश सिंह ”विश्वमानव“) रहना हुआ। ध्यान का विषय है-शिव से काशीवासी और काशी है या काशीवासी और काशी से शिव हैं’’, काशी (वाराणसी) में एक काशी करवट मन्दिर भी है।
प्रधानमंत्री, श्री नरेन्द्र मोदी जी ने काशी का ध्यान केन्द्रित करते हुये अपने विचार को इस प्रकार व्यक्त किये थे - ”काशी के राष्ट्र गुरू बने बिना भारत जगत गुरू नहीं बन सकता। देश अतीत की तरह आध्यात्मिक ऊँचाई पर पहुँचेगा तो स्वतः आर्थिक वैभव प्राप्त हो जायेगा। इसी खासियत की वजह से इतिहास में कभी भारत सोने की चिड़िया थी।“ परन्तु काशी अभी तक उस जिम्मेदारी को नहीं पूण कर पा रहा। ”सत्यकाशी क्षेत्र-व्यास क्षेत्र” जो कभी काशी राज्य का ही अंग हुआ करता था, द्वारा ”काशी-सत्यकाशी“ के राष्ट्रगुरू बनने की योग्यता प्रस्तुत हो चुकी है।
स्वामी विवेकानन्द जी सत्य रूप में रिजर्व बैंक से दस गुना विचार धन दे गये। और वो 100 से अधिक वर्ष पूर्व ही दे गये। अभी भारत उसे कैश (नगद) में परिवर्तित ही नहीं करा पा रहा है तो भारत को उस विचार धन से क्या लाभ? जबकि स्वामी जी के विचार की अगली किस्त आ गई है और वह कैश (नगद) में परिवर्तित होगी। अगली किस्त अनन्त है और वह इतना है कि जैसे-जैसे खर्च होगा वैसे-वैसे बढ़ता ही जायेगा। क्योंकि वो किस्त इस रूप में है-
शब्द से सृष्टि की ओर...
सृष्टि से शास्त्र की ओर...
शास्त्र से काशी की ओर...
काशी से सत्यकाशी की ओर...
और सत्यकाशी से अनन्त की ओर...
                  एक अन्तहीन यात्रा...............................
वहीं पूर्व राष्ट्रपति ए.पी.जे, अब्दुल कलाम जी ने कहा था-”नवीनता के द्वारा ही ज्ञान को धन में बदला जा सकता है।“ ज्ञान को व्यक्ति के व्यावहारिक जीवन के लिए उपयोगी बनाने और उसके व्यापारीकरण से ही कल्याण होता है। सभी जानते हैं - ”जगत एक सपना है, यह जगत असत्य है, ब्रह्म ही सत्य“, तो क्या कोई काम न किया जाये?

स्वामी विवेकानन्द जी की वाणी है -
”बहुत सेे व्यक्तियों के समूह कांे समष्टि कहते हैं और प्रत्येक व्यक्ति, व्यष्टि कहलाता है आप और मैं दोनों व्यष्टि हैं, समाज समष्टि है आप और मैं- पशु, पक्षी, कीड़ा, कीड़े से भी तुक्ष प्राणी, वृक्ष, लता, पृथ्वी, नक्षत्र और तारे यह प्रत्येक व्यष्टि है और यह विश्व समष्टि है जो कि वेदान्त में विराट, हिरण गर्भ या ईश्वर कहलाता है। और पुराणों में ब्रह्मा, विष्णु, देवी इत्यादि। व्यष्टि को व्यक्तिशः स्वतन्त्रता होती है या नहीं, और यदि होती है तोे उसका नाम क्या होना चाहिए। व्यष्टि को समष्टि के लिए अपनी इच्छा और सुख का सम्पूर्ण त्याग करना चाहिए या नहीं, वे प्रत्येक समाज के लिए चिरन्तन समस्याएँ हैं सब स्थानों में समाज इन समस्याओं के समाधान में संलग्न रहता है ये बड़ी-बड़ी तरंगों के समान आधुनिक पश्चिमी समाज में हलचल मचा रही हैं जो समाज के अधिपत्य के लिए व्यक्तिगत स्वतन्त्रता का त्याग चाहता है वह सिद्धान्त समाजवाद कहलाता है और जो व्यक्ति के पक्ष का समर्थन करता है वह व्यक्तिवाद कहलाता है।”
  (पत्रावली भाग-2, पृष्ठ - 288)
जब रामसेतू बन रहा था तब एक गिलहरी भी श्रमदान कर रही थी क्योंकि गिलहरी को ये पता था कि कौन सा कार्य प्राथमिक है। भारत की स्थिति तो ये है कि पहले गिलहरी ही राम से अपना काम करवायेगी और उसके बाद फुर्र हो जायेगी। भारत, कार्य की स्तरीय प्राथमिकता का विवेक भी खो चुका है। उसे पता ही नहीं कि शारीरिक, आर्थिक और मानसिंक कार्य में कौन सा प्राथ्मिक है, कौन मध्यम और कौन निम्न। समष्टि कार्य के उत्थान के लिए व्यष्टि को अपनी शक्ति लगानी चाहिए। इस ओर कार्य करने को ही बलिदान-त्याग-शहीद होना कहते हैं।
जबकि महर्षि मनु का कहना था - ”इस कलयुग में मनुष्यों के लिए एक ही कर्म शेष है आजकल यज्ञ और कठोर तपस्याओं से कोई फल नहीं होता। इस समय दान ही अर्थात एक मात्र कर्म है और दानो में धर्म दान अर्थात आध्यात्मिक ज्ञान का दान ही सर्वश्रेष्ठ है। दूसरा दान है विद्यादान, तीसरा प्राणदान और चैथा अन्न दान। जो धर्म का ज्ञानदान करते हैं वे अनन्त जन्म और मृत्यु के प्रवाह से आत्मा की रक्षा करते है, जो विद्या दान करते हैं वे मनुष्य की आॅखे खोलते, उन्हें आध्यात्म ज्ञान का पथ दिखा देते है। दूसरे दान यहाॅ तक कि प्राण दान भी उनके निकट तुच्छ है। आध्यात्मिक ज्ञान के विस्तार से मनुष्य जाति की सबसे अधिक सहायता की जा सकती है।“ 

विश्वमानव और दलाई लामा (6 जुलाई, 1935 - )

दलाई लामा (6 जुलाई, 1935 - )

परिचय -
दलाई लामा एक मंगोलियाई पदवी है जिसका मतलब होता है-ज्ञान का महासागर। दलाई लामा के वंशज करूणा अवलोकेतेश्वर के बुद्ध के गुणों के साक्षत् रूप माने जाते हैं। बोधिसत्व ऐसे ज्ञानी लोग होते हैं जिन्होंने अपने निर्वाण को टाल दिया हो और मानवता की रक्षा के लिए पुनर्जन्म लेने का निर्णय लिया हो। उन्हें सम्मान से ”परमपावन“ कहा जाता है। अब तक कुल 14 दलाई लामा हो चुके हैं। जो ये हैं- 1-Gendun Drup (1391-1474) , 2- Gendun Gyatso (1475-1542), 3-Sonam Gyatso (1543-1588), 4-Yonten Gyatso (1589-1617), 5-Ngawang Lobsang Gyatso (1617-1682), 6-Tsangyang Gyatso (1683-1706), 7-Kelzang Gyatso (1708-1757), 8-Jamphel Gyatso (1758-1804), 9-Lungtok Gyatso (1805-1815), 10-Tsultrim Gyatso (1816-1837), 11-Khendrup Gyatso (1838-1856), 12-Trinley Gyatso (1857-1875), 13-Thubten Gyatso (1876-1933), 14-Tenzin Gyatso (born 1935)
14वें दलाई लामा तेनजिन ग्यात्सो तिब्बत के आध्यत्मिक गुरू हैं। इनका जन्म 6 जुलाई, 1935 को वर्तमान उत्तर-पूर्वी तिब्बत के ताकस्तेर क्षेत्र में रहने वाले येओमान परिवार में हुआ था। 2 वर्ष की अवस्था में बालक ल्हामो धोण्डुप की पहचान 13 वें दालाई लामा थुबटेन ग्यात्सो के अवतार के रूप में की गई। परमपावन ने अपनी मठवासीय शिक्षा 6 वर्ष की अवस्था में प्रारम्भ की। 23 वर्ष की अवस्था में वर्ष 1959 के वार्षिक मोनलम प्रार्थनाद्ध उत्सव के दौरान उन्होंने जोखांग मन्दिर ल्हासा में अपनी फाइनल परीक्षा दी। उन्होंने यह परीक्षा आॅनर्स के साथ पास की और उन्हें सर्वोच्च गेषे डिग्री ल्हारम्पा बौद्ध दर्शन में पीएच.डी प्रदान की गई। 
वर्ष 1949 में तिब्बत पर चीन के हमले के बाद परमपावन दलाई लामा से कहा गया कि वह पूर्ण राजनीतिक सत्ता अपने हाथ में ले लें। 1954 में वह कई चीनी नेताओं से बातचीत करने के लिए बीजिंग भी गये लेकिन आखिरकार वर्ष 1959 में ल्हासा में चीनी सेनाओं द्वारा तिब्बती राष्ट्रीय आन्दोलन को बेरहमी से कुचले जाने के बाद वह निर्वासन में जाने को मजबूर हो गये। इसके बाद से ही वह उत्तर भारत के शहर धर्मशाला में रह रहे हैं जो केन्द्रिय तिब्बती प्रशासन का मुख्यालय है। तिब्बत पर चीन के हमले के बाद परमपावन दलाई लामा ने संयुक्त राष्ट्र संघ से तिब्बत मुद्दे को सुलझाने की अपील की है। संयुकत राष्ट्र महासभा द्वारा इस सम्बन्ध में 1959, 1961 और 1965 में तीन प्रस्ताव किए जा चुके हैं।
हर तिब्बती परमपावन दलाई लामा के साथ गहरा व अकथनीय जुड़ाव रखता है। तिब्बतीयों के लिए परमपावन समूचे तिब्बत के भूमि के सौन्दर्य, उसकी नदियों व झीलों की पवित्रता, उसके आकाश की पुनीतता, उसके पर्वतों की दृढ़ता और उसके लोगों की ताकत के प्रतीक हैं। तिब्बत की मुक्ति के लिए अहिंसक संघर्ष जारी रखने हेतू परमपावन दलाई लामा को वर्ष 1989 में नोबेल का शान्ति पुरस्कार प्रदान किया गया। 20 अप्रैल, 1959 के टाइम पत्रिका के मुख पृष्ठ पर थे। उन्होंने लगातार अहिंसा की नीति का समर्थन करना जारी रखा है। यहाँ तक कि अत्यधिक दमन की परिस्थिति में भी। शान्ति, अहिंसा और सचेतन प्राणी की खुशी के लिए काम करना परमपावन दलाई लामा के जीवन का बुनियादी सिंद्धान्त है। वह वैश्विक पर्यावरणीय समस्याओं पर भी चिंता प्रकट करते रहते हैं। परमपावन दलाई लामा ने 52 से अधिक देशों का दौरा किया है और कई प्रमुख देशों के राष्ट्रपतियों, प्रधानमंत्रियों और शासकों से मिले हैं। उन्होंने कई धर्म के प्रमुखों और कई प्रमुख वैज्ञानिकों से मुलाकात की है।
परमपावन के शान्ति सन्देश, अहिंसा, अन्तर्धार्मिक मेलमिलाप, सार्वभौमिक उत्तरदायित्व और करूणा के विचारों को मान्यता के रूप में 1959 से अब तक उनको 60 मानद डाॅक्टरेट, पुरस्कार, सम्मान आदि प्राप्त हुए हैं। परमपावन ने 50 से अधिक पुस्तकें लिखीं हैं। परमपावन अपने आप को एक साधारण बौद्ध भिक्षु ही मानते हैं। दुनियाभर में अपनी यात्राओं और व्याख्यानों के दौरान उनका साधारण व करूणामय स्वभाव उनसे मिलने वाले हर व्यक्ति को गहराई तक प्रभावित करता है। उनका सन्देश है- प्यार, करूणा और क्षमाशीलता। 
दलाई लामा के सन्देश 
1.आज के समय की चुनौति का समाना करने के लिए मनुष्य को सार्वभौमिक उत्तरदायित्व की व्यापक भावना का विकास करना चाहिए। हम सबको यह सीखने की जरूरत है कि हम न केवल अपने लिए कार्य करें बल्कि पूरे मानवता के लाभ के लिए कार्य करें। मानव अस्तित्व की वास्तविक कुंजी सार्वभौमिक उत्तरदायित्व ही है। यह विश्व शान्ति, प्राकृतिक संसाधनों के समवितरण और भविष्य की पीढ़ी के हितों के लिए पर्यावरण की उचित देखभाल का सबसे अच्छा आधार है।
2.मेरा धर्म साधारण है, मेरा धर्म दयालुता है।
3.अपने पर्यावरण की रक्षा हमें उसी तरह से करना चाहिए जैसा कि हम अपने घोड़ों की करते हैं। हम मनुष्य, प्रकृति से ही जन्में हैं इसलिए हमारा प्रकृति के खिलाफ जाने का कोई कारण नहीं बनता। हम प्रकृति से विफर जाते हैं तो हम जिन्दा नहीं रह सकते।
4.एक शरणार्थी के रूप में हम तिब्बती लोग भारत के लोगों के प्रति हमेशा कृतज्ञता महसूस करते हैं, न केवल इसलिए कि भारत ने तिब्बतीयों की इस पीढ़ी को सहायता और शरण दिया है, बल्कि इसलिए भी कई पीढ़ीयों से तिब्बती लोगों ने इस देश से पथ प्रकाश और बुद्धिमता प्राप्त की है। इसलिए हम हमेशा भारत के प्रति आभारी रहते हैं। यदि सांस्कृतिक नजरिये से देखा जाये तो हम भारतीय संस्कृति के अनुयायी हैं।
5.हम चीनी लोगों या चीनी नेताओं के विरूद्ध नहीं हैं आखिर वे भी एक मनुष्य के रूप में हमारे भाई-बहन हैं। यदि उन्हें खुद निर्णय लेने की स्वतन्त्रता होती तो वे खुद को इस प्रकार की विनाशक गतिविधि में नहीं लगाते या ऐसा कोई काम नहीं करते जिससे उनकी बदनामी होती हो। मैं उनके लिए करूणा की भावना रखता हूँ।

”दार्शनिक आधार पर चर्चा करने से ही अलगाव बढ़ता है। जब तक व्यावहारिक रूप में धार्मिकता के आधार पर विचारों का सामंजस्य नहीं स्थापित होगा, तब तक हम ऊपर नहीं उठ सकते। दार्शनिक दृष्टि से धर्म में अन्तर होता है लेकिन धार्मिक दृष्टि से नहीं। नई सदी में कार्यो को संपादित करने वाले आप (नये पीढ़ी से) ही है, पुरानी पीढ़ी आपके पीछे है लेकिन सारा दायित्व आप के ऊपर ही है इसलिए पहले अच्छी तरह से शिक्षा ग्रहण करें।“(वाराणसी यात्रा में)
- दलाईलामा, तिब्बति धर्म गुरू 
साभार - अमर उजाला, इलाहाबाद दि0 18-12-1999

श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा स्पष्टीकरण 
”कर्मवेदः प्रथम, अन्तिम तथा पंचमवेदीय श्रृंखला अर्थात् विश्वमानक शून्यः मन की गुणवत्ता का विश्वमानक श्रंृखला व्यावहारिकता पर आधारित ज्ञान-कर्मज्ञान का शास्त्र-साहित्य है। कई जन्मों और लम्बे प्रक्रिया के फलस्वरूप अब धर्म तो विवादमुक्त स्वरूप को प्राप्त कर सांमजस्य स्थापित कर चुका है। अब उसकी स्थापना के लिए पुरानी पीढ़ी सहयोग करें। आपने आने वाली पीढ़ी को दायित्व सौपा है और दायित्व पूर्ण भी किया गया परन्तु पुरानी पीढ़ी पीछे नहीं आगे रहना चाहती है। यह जानते हुये, देखते हुये, समझते हुये कि सदा से भारत का कल्याण युवाओं ने ही किया है परन्तु प्रत्येक समय पुरानी पीढ़ी ही निष्क्रीयता और बाधा रूप में खड़ी रहती है। अगर ऐसा नहीं है तो पुरानी पीढ़ी इस नये सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त, वेद, व्यवस्था को अपने अहंकार को समाप्त कर स्वीकार करें, स्वागत करें, स्थापित करें, क्योंकि क्रियान्वयन पदों पर पुरानी पीढ़ी ही पीठासीन है। कर्मज्ञान का दान तो प्रारम्भ हो चुका है और यही संसाधन युक्त भारत के तीव्र विकास में बाधक था। नई पीढ़ी तो बहुत कुछ कर सकती है परन्तु वह कैसे करे? युवाओें को मत द्वारा विचार व्यक्त करने का अधिकार तो 18 वर्ष की उम्र में ही दे दिया परन्तु पैतृक सम्पत्ति का अधिकार किस उम्र में प्राप्त होगा? अब कर्मज्ञान प्राप्त होने से प्रत्येक ही संसाधन की आवश्यकता समझेगा। ध्यान रहे कर्मज्ञान से कृष्ण का निर्माण होता है तो परिणाम कौन भुगतेगा?“
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”पश्चिम जगत ने भौतिक जगत की सुख-सुविधाओं के लिए विश्व को बहुत कुछ दिया है। अब हमारी बारी है। उन्हें इसके एवज में कुछ चुकाने का समय है। हम उन्हें शान्ति व जीवन के लक्ष्य बारे में ज्ञान दें।“ (वाराणसी यात्रा में) - दलाईलामा, तिब्बति धर्म गुरू 
साभार - दैनिक जागरण, वाराणसी, दि0 15-01-2011

श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा स्पष्टीकरण
पश्चिम जगत बहिर्मुखी है, पूर्वी जगत अन्तर्मुखी है। पश्चिम ने पदार्थ विज्ञान दिया तो पूर्वी जगत ने आध्यात्म विज्ञान दिया। अब दोनों के समन्वय और एकीकरण का समय आ गया है जिससे एक नये विश्व का निर्माण हो। जिसके लिए विश्वधर्म के शास्त्र - विश्वशास्त्र का आविष्कार हो चुका है। जिसका लक्ष्य ही शान्ति, जीवन का लक्ष्य, कर्मज्ञान, मानक आधारित विश्व इत्यादि है।
विश्वशास्त्र की शिक्षा ही सत्य मानक शिक्षा है जो निम्ननिखित पाठ्यक्रम के रूप में छात्रवृत्ति के साथ संचालित है।
1. पूर्ण ज्ञान में प्रमाण पत्र (Certificate in Complete Knowledge-CCK)
2. ईश्वर शास्त्र व व्यापार ज्ञान में प्रमाण पत्र (Certificate in Godics & Business Knowledge-CGBK)
3. अवतार ज्ञान में प्रमाण पत्र (Certificate in Avatar Knowledge-CAK)
4. गुरू ज्ञान में प्रमाण पत्र (Certificate in Guru Knowledge-CGK)
5. संस्थागत धर्म में डिप्लोमा (Diploma in Institutional Religion-DIR)
6. पूर्ण शिक्षा में स्नातक (Bachelor in Complete Education-BCE)
7. पूर्ण शिक्षा में परास्नातक (Master in Complete Education-MCE)
हमेशा यूरोप से सामाजिक तथा एशिया से आध्यात्मिक शक्तियों का उद्भव होता रहा है एवं इन दोनों शक्तियों के विभिन्न प्रकार के सम्मिश्रण से ही जगत का इतिहास बना है। वर्तमान मानवेतिहास का एक और नवीन पृष्ठ धीरे-धीरे विकसित हो रहा है एवं चारो ओर उसी का चिन्ह दिखाई दे रहा है। कितनी ही नवीन योजनाओं का उद्भव तथा नाश होगा, किन्तु योग्यतम वस्तु की प्रतिष्ठा सुनिश्चित है- सत्य और शिव की अपेक्षा योग्यतम वस्तु और हो ही क्या सकती है? (1प 310) - स्वामी विवेकानन्द
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”शून्य आत्मसात् करने से बोधिसत्व की प्राप्ति सम्भव“ (वाराणसी यात्रा में)
- दलाईलामा, तिब्बति धर्म गुरू 
साभार - दैनिक जागरण, वाराणसी, दि0 17-01-2011

श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा स्पष्टीकरण
शून्य, आत्मसात् करने से ही बोधिसत्व की प्राप्ति होती है। सत्य है। हमें उस शून्य का अनुभव करना पड़ेगा जहाँ से समस्त ब्रह्माण्ड बहिर्गत है। उस शून्य को आत्मसात् व बोधिसत्व के प्राप्ति से ही निम्न आविष्कार सम्भव हो सका है-
सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में व्याप्त एक ही सत्य-सिद्धान्त द्वारा व्यक्तिगत व संयुक्त मन को एकमुखी कर सर्वोच्च, मूल और अन्तिम स्तर पर स्थापित करने के लिए शून्य पर अन्तिम आविष्कार WS-0 श्रृंखला की निम्नलिखित पाँच शाखाएँ है। 
1. डब्ल्यू.एस. (WS)-0 : विचार एवम् साहित्य का विश्वमानक
2. डब्ल्यू.एस. (WS)-00 : विषय एवम् विशेषज्ञों की परिभाषा का विश्वमानक
3. डब्ल्यू.एस. (WS)-000 : ब्रह्माण्ड (सूक्ष्म एवम् स्थूल) के प्रबन्ध और क्रियाकलाप का विश्वमानक
4. डब्ल्यू.एस. (WS)-0000 : मानव (सूक्ष्म तथा स्थूल) के प्रबन्ध और क्रियाकलाप का विश्वमानक
5. डब्ल्यू.एस. (WS)-00000 : उपासना और उपासना स्थल का विश्वमानक
और पूर्णमानव निर्माण की तकनीकी WCM-TLM-SHYAM.C है। 
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”भारत में आध्यात्मिकता का बोलबाला हजारों सालों से है इसके बावजूद भी यहाँ किसी भी धर्म को छुये बिना नैतिक मूल्यों की शिक्षा धर्म निरपेक्ष रूप से विकसित हुई है। यह आधुनिक युग में विश्व को भारत की सबसे बड़ी देन है। आज विश्व को ऐसे ही धर्मनिरपेक्ष नैतिक मूल्यों की शिक्षा की सख्त जरूरत है। बीसवीं सदी रक्तपात की सदी थी। 21वीं सदी संवाद की सदी होनी चाहिए। इससे कई समस्यायें अपने आप समाप्त हो जाती है। दुनिया में ऐसे लोगों की संख्या बहुत अधिक है जो किसी धर्म में विश्वास नहीं करते हैं इसलिए यह जरूरी है कि सेक्यूलर इथिक्स (धर्मनिरपेक्ष नैतिकता) को प्रमोट (बढ़ाना) करें जो वास्तविक और प्रैक्टिकल एप्रोच (व्यावहारिक) पर आधारित हो। धार्मिक कर्मकाण्डों के प्रति दिखावे का कोई मतलब नहीं है। आधुनिक शिक्षा व्यवस्था में मानव मूल्यों का अभाव है। यह सिर्फ मस्तिष्क के विकास पर जोर देती है। हृदय की विशालता पर नहीं। करूणा तभी आयेगी जब दिल बड़ा होगा। दुनिया के कई देशों ने इस पर ध्यान दिया है। कई विश्वविद्यालयों में इस पर प्रोजेक्ट चल रहा है।“ (सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी में ”21वीं सदी में शिक्षा“ विषय पर बोलते हुये। इस कार्यक्रम में केंन्द्रीय तिब्बती अघ्ययन विश्वविद्यालय, सारनाथ, वाराणसी के कुलपति पद्मश्री गेशे नवांग समतेन, पद्मश्री प्रो.रामशंकर त्रिपाठी, महात्मा गाँधी काशी विद्यापीठ, वाराणसी के कुलपति प्रो. अवधराम, दीन दयाल उपाध्याय विश्वविद्यालय, गोरखपुर के पूर्व कुलपति प्रो. वेणी माधव शुक्ल, सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी के पूर्व कुलपति प्रो. अभिराज राजेन्द्र मिश्र और वर्तमान कुलपति प्रो. वी.कुटुम्ब शास्त्री, प्रति कुलपति प्रो.नरेन्द्र देव पाण्डेय, प्रो. रमेश कुमार द्विवेदी, प्रो. यदुनाथ दूबे इत्यादि उपस्थित थे।)
- दलाईलामा, तिब्बति धर्म गुरू
साभार - दैनिक जागरण व हिन्दुस्तान, वाराणसी, दि0 18-01-2011

श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा स्पष्टीकरण 
जब सभी सम्प्रदायों को धर्म मानकर हम एकत्व की खोज करते हैं तब दो भाव उत्पन्न होते हैं। पहला-यह कि सभी धर्मों को समान दृष्टि से देखें तब उस एकत्व का नाम सर्वधर्मसमभाव होता है। दूसरा-यह कि सभी धर्मों को छोड़कर उस एकत्व को देखें तब उसका नाम धर्म निरपेक्ष होता है। जब सभी सम्प्रदायों को सम्प्रदाय की दृष्टि से देखते हैं तब एक ही भाव उत्पन्न होता है और उस एकत्व का नाम धर्म होता है। इन सभी भावों में हम सभी उस एकत्व के ही विभिन्न नामों के कारण विवाद करते हैं अर्थात् सर्वधर्मसमभाव, धर्मनिरपेक्ष एवं धर्म विभिन्न मार्गों से भिन्न-भिन्न नाम के द्वारा उसी एकत्व की अभिव्यक्ति है। दूसरे रुप में हम सभी सामान्य अवस्था में दो विषयों पर नहीं सोचते, पहला- वह जिसे हम जानते नहीं, दूसरा- वह जिसे हम पूर्ण रुप से जान जाते हैं। यदि हम नहीं जानते तो उसे धर्मनिरपेक्ष या सर्वधर्मसमभाव कहते हैं जब जान जाते हैं तो धर्म कहते हैं। इस प्रकार आई0 एस0 ओ0/डब्ल्यू0 एस0- शून्य श्रृंखला उसी एकत्व का धर्मनिरपेक्ष एवं सर्वधर्मसमभाव नाम तथा कर्मवेद: प्रथम, अन्तिम तथा पंचमवेदीय श्रृंखला उसी एकत्व का धर्मयुक्त नाम है तथा इन समस्त कार्यों को सम्पादित करने के लिए जिस शरीर का प्रयोग किया जा रहा है उसका धर्मयुक्त नाम-लव कुश सिंह है तथा धर्मनिरपेक्ष एवं सर्वधर्मसमभाव सहित मन स्तर का नाम विश्वमानव है जब कि मैं (आत्मा) इन सभी नामों से मुक्त है।
आविष्कारक के आविष्कार के उपरान्त आविष्कार विषय का उपयोग ही मानव का कत्र्तव्य है। विश्वधर्म के अनुसार यह आविष्कार विषय ही सेक्यूलर इथिक्स (धर्मनिरपेक्ष नैतिकता), वास्तविक और प्रैक्टिकल एप्रोच (व्यावहारिक) है। जिस पर ही आधारित है मेरा निम्नलिखित आविष्कार-
सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में व्याप्त एक ही सत्य-सिद्धान्त द्वारा व्यक्तिगत व संयुक्त मन को एकमुखी कर सर्वोच्च, मूल और अन्तिम स्तर पर स्थापित करने के लिए शून्य पर अन्तिम आविष्कार WS-0 श्रृंखला की निम्नलिखित पाँच शाखाएँ है। 
1. डब्ल्यू.एस. (WS)-0 : विचार एवम् साहित्य का विश्वमानक
2. डब्ल्यू.एस. (WS)-00 : विषय एवम् विशेषज्ञों की परिभाषा का विश्वमानक
3. डब्ल्यू.एस. (WS)-000 : ब्रह्माण्ड (सूक्ष्म एवम् स्थूल) के प्रबन्ध और क्रियाकलाप का विश्वमानक
4. डब्ल्यू.एस. (WS)-0000 : मानव (सूक्ष्म तथा स्थूल) के प्रबन्ध और क्रियाकलाप का विश्वमानक
5. डब्ल्यू.एस. (WS)-00000 : उपासना और उपासना स्थल का विश्वमानक
और पूर्णमानव निर्माण की तकनीकी WCM-TLM-SHYAM.C है। 

काल प्रवाह में सुसंगत परिवर्तन लाने के लक्ष्य को प्राप्त करना ऐसा आसान कार्य नहीं है जो इने गिने मुट्ठी भर उत्साही लोगों द्वारा चन्द दिनों में किया जा सके। यह कार्य लाखों लोगों के युग-युगान्तर तक किये गये साग्रह एवं निष्ठापूर्ण प्रयास द्वारा ही सम्भव है। इसके लिए हमारी शिक्षा पद्धति को पुनर्गठित करना होगा जिससे मानव के विचारों, आदर्शों एवं कार्यों को नई दिशा प्रदान की जा सके।
  - स्वामी विवेकानन्द


Tuesday, March 24, 2020

विश्वमानव और श्री प्रणव मुखर्जी (11 दिसम्बर 1935 - )

श्री प्रणव मुखर्जी (11 दिसम्बर 1935 - )

परिचय - 
प्रणव कुमार मुखर्जी ( जन्म 11 दिसम्बर 1935, पश्चिम बंगाल) वर्तमान में भारत के राष्ट्रपति हैं। वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हैं। नेहरू-गान्धी परिवार से उनके करीबी सम्बन्ध रहे हैं। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेतृत्व वाले संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन ने उन्हें अपना उम्मीदवार घोषित किया। सीधे मुकाबले में उन्होंने अपने प्रतिपक्षी प्रत्याशी पी.ए. संगमा को हराया। उन्होंने 25 जुलाई 2012 को भारत के तेरहवें राष्ट्रपति के रूप में पद और गोपनीयता की शपथ ली।
प्रणव मुखर्जी का जन्म पश्चिम बंगाल के वीरभूम जिले में किरनाहर शहर के निकट स्थित मिराती गाँव के एक ब्राह्मण परिवार में कामदा किंकर मुखर्जी और राजलक्ष्मी मुखर्जी के यहाँ हुआ था। उनके पिता 1920 से कांग्रेस पार्टी में सक्रिय होने के साथ पश्चिम बंगाल विधान परिषद में 1952 से 64 तक सदस्य और वीरभूम (पश्चिम बंगाल) जिला कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष रह चुके थे। उनके पिता एक सम्मानित स्वतन्त्रता सेनानी थे, जिन्होंने ब्रिटिश शासन की खिलाफत के परिणामस्वरूप 10 वर्षो से अधिक जेल की सजा भी काटी थी। प्रणव मुखर्जी ने सूरी (वीरभूम) के सूरी विद्यासागर कॉलेज में शिक्षा पाई, जो उस समय कलकत्ता विश्वविद्यालयसे सम्बद्ध था। प्रणव का विवाह बाइस वर्ष की आयु में 13 जुलाई 1957 को शुभ्रा मुखर्जी के साथ हुआ था। उनके दो बेटे और एक बेटी - कुल तीन बच्चे हैं। पढ़ना, बागवानी करना और संगीत सुनना- तीन ही उनके व्यक्तिगत शौक भी हैं। कलकत्ता विश्वविद्यालय से उन्होंने इतिहास और राजनीति विज्ञान में स्नातकोत्तर के साथ साथ कानून की डिग्री हासिल की है। वे एक वकील और कॉलेज प्राध्यापक भी रह चुके हैं। उन्हें मानद डी.लिट उपाधि भी प्राप्त है। उन्होंने पहले एक कॉलेज प्राध्यापक के रूप में और बाद में एक पत्रकार के रूप में अपना कैरियर शुरू किया। वे बाँग्ला प्रकाशन संस्थान देशेर डाक (मातृभूमि की पुकार) में भी काम कर चुके हैं। प्रणव मुखर्जी बंगीय साहित्य परिषद के ट्रस्टी एवं अखिल भारत बंग साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष भी रहे।
उनका संसदीय कैरियर करीब पाँच दशक पुराना है, जो 1969 में कांग्रेस पार्टी के राज्यसभा सदस्य के रूप में (उच्च सदन) से शुरू हुआ था। वे 1975, 1981, 1993 और 1999 में फिर से चुने गये। 1973 में वे औद्योगिक विकास विभाग के केंद्रीय उप मन्त्री के रूप में मन्त्रिमण्डल में शामिल हुए। वे सन 1982 से 1984 तक कई कैबिनेट पदों के लिए चुने जाते रहे और और सन् 1984 में भारत के वित्त मंत्री बने। सन 1984 में, यूरोमनी पत्रिका के एक सर्वेक्षण में उनका विश्व के सबसे अच्छे वित्त मंत्री के रूप में मूल्यांकन किया गया। उनका कार्यकाल भारत के अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के ऋण की 1.1 अरब अमरीकी डॉलर की आखिरी किस्त नहीं अदा कर पाने के लिए उल्लेखनीय रहा। वित्त मंत्री के रूप में प्रणव के कार्यकाल के दौरान डॉ. मनमोहन सिंह भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर थे। वे इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए लोकसभा चुनाव के बाद राजीव गांधी की समर्थक मण्डली के षड्यन्त्र के शिकार हुए जिसने इन्हें मन्त्रिमण्डल में शामिल नहीं होने दिया। कुछ समय के लिए उन्हें कांग्रेस पार्टी से निकाल दिया गया। उस दौरान उन्होंने अपने राजनीतिक दल राष्ट्रीय समाजवादी कांग्रेस का गठन किया, लेकिन सन 1989 में राजीव गान्धी के साथ समझौता होने के बाद उन्होंने अपने दल का कांग्रेस पार्टी में विलय कर दिया। उनका राजनीतिक कैरियर उस समय पुनर्जीवित हो उठा, जब पी.वी. नरसिंह राव ने पहले उन्हें योजना आयोग के उपाध्यक्ष के रूप में और बाद में एक केन्द्रीय कैबिनेट मन्त्री के तौर पर नियुक्त करने का फैसला किया। उन्होंने राव के मंत्रिमंडल में 1995 से 1996 तक पहली बार विदेश मन्त्री के रूप में कार्य किया। 1997 में उन्हें उत्कृष्ट सांसद चुना गया। सन 1985 के बाद से वह कांग्रेस की पश्चिम बंगाल राज्य इकाई के भी अध्यक्ष हैं। सन 2004 में, जब कांग्रेस ने गठबन्धन सरकार के अगुआ के रूप में सरकार बनायी, तो कांग्रेस के प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह सिर्फ एक राज्यसभा सांसद थे। इसलिए जंगीपुर (लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र) से पहली बार लोकसभा चुनाव जीतने वाले प्रणव मुखर्जी को लोकसभा में सदन का नेता बनाया गया। उन्हें रक्षा, वित्त, विदेश विषयक मन्त्रालय, राजस्व, नौवहन, परिवहन, संचार, आर्थिक मामले, वाणिज्य और उद्योग, समेत विभिन्न महत्वपूर्ण मन्त्रालयों के मन्त्री होने का गौरव भी हासिल है। वह कांग्रेस संसदीय दल और कांग्रेस विधायक दल के नेता रह चुके हैं, जिसमें देश के सभी कांग्रेस सांसद और विधायक शामिल होते हैं। इसके अतिरिक्त वे लोकसभा में सदन के नेता, बंगाल प्रदेश कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष, कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की मंत्रिपरिषद में केन्द्रीय वित्त मन्त्री भी रहे। लोकसभा चुनावों से पहले जब प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह ने अपनी बाई-पास सर्जरी कराई, प्रणव दा विदेश मन्त्रालय में केन्द्रीय मंत्री होने के बावजूद राजनैतिक मामलों की कैबिनेट समिति के अध्यक्ष और वित्त मन्त्रालय में केन्द्रीय मन्त्री का अतिरिक्त प्रभार लेकर मन्त्रिमण्डल के संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे।
प्रणव मुखर्जी के नाम पर एक बार भारतीय राष्ट्रपति जैसे सम्मानजनक पद के लिए भी विचार किया गया था. लेकिन केंद्रीय मंत्रिमण्डल में व्यावहारिक रूप से उनके अपरिहार्य योगदान को देखते हुए उनका नाम हटा लिया गया। मुखर्जी की वर्तमान विरासत में अमेरिकी सरकार के साथ असैनिक परमाणु समझौते पर भारत-अमेरिका के सफलतापूर्वक हस्ताक्षर और परमाणु अप्रसार सन्धि पर दस्तखत नहीं होने के बावजूद असैन्य परमाणु व्यापार में भाग लेने के लिए परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह के साथ हुए हस्ताक्षर भी शामिल हैं। सन 2007 में उन्हें भारत के दूसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से नवाजा गया। मनमोहन सिंह की दूसरी सरकार में मुखर्जी भारत के वित्त मन्त्री बने। इस पद पर वे पहले 1980 के दशक में भी काम कर चुके थे। 
सम्मान और विशिष्टता
1.न्यूयॉर्क से प्रकाशित पत्रिका, यूरोमनी के एक सर्वेक्षण के अनुसार, वर्ष 1984 में दुनिया के पाँच सर्वोत्तम वित्त मन्त्रियों में से एक प्रणव मुखर्जी भी थे।
2.उन्हें सन् 1997 में सर्वश्रेष्ठ सांसद का अवार्ड मिला।
3.वित्त मन्त्रालय और अन्य आर्थिक मन्त्रालयों में राष्ट्रीय और आन्तरिक रूप से उनके नेतृत्व का लोहा माना गया। वह लम्बे समय के लिए देश की आर्थिक नीतियों को बनाने में महत्वपूर्ण व्यक्ति के रूप में जाने जाते हैं। उनके नेतघ्त्व में ही भारत ने अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के ऋण की 1.1 अरब अमेरिकी डॉलर की अन्तिम किस्त नहीं लेने का गौरव अर्जित किया। उन्हें प्रथम दर्जे का मन्त्री माना जाता है और सन 1980-1985 के दौरान प्रधानमन्त्री की अनुपस्थिति में उन्होंने केन्द्रीय मन्त्रिमण्डल की बैठकों की अध्यक्षता की।
4.उन्हें सन् 2008 के दौरान सार्वजनिक मामलों में उनके योगदान के लिए भारत के दूसरे सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार पद्म विभूषण से नवाजा गया।

”भारतवासियों के रूप में हमें भूतकाल से सीखना होगा, परन्तु हमारा ध्यान भविष्य पर केन्द्रित होना चाहिए। मेरी राय में शिक्षा वह मंत्र है जो कि भारत में अगला स्वर्ग युग ला सकता है। हमारे प्राचीनतम ग्रन्थों ने समाज के ढांचे को ज्ञान के स्तम्भों पर खड़ा किया गया है। हमारी चुनौती है, ज्ञान को देश के हर एक कोने में पहुँचाकर, इसे एक लोकतांत्रिक ताकत में बदलना। हमारा ध्येय वाक्य स्पष्ट है- ज्ञान के लिए सब और ज्ञान सबके लिए।
मैं एक ऐसे भारत की कल्पना करता हूँ जहाँ उद्देश्य की समानता से सबका कल्याण संचालित हो, जहाँ केन्द्र और राज्य केवल सुशासन की परिकल्पना से संचालित हों, जहाँ लोकतन्त्र का अर्थ केवल पाँच वर्ष में एक बार मत देने का अधिकार न हो, बल्कि जहाँ सदैव नागरिकों के हित में बोलने का अधिकार हो, जहाँ ज्ञान विवेक में बदल जाये, जहाँ युवा अपनी असाधारण ऊर्जा तथा प्रतिभा को सामूहिक लक्ष्य के लिए प्रयोग करे। अब पूरे विश्व में निरंकुशता समाप्ति पर है, अब उन क्षेत्रों में लोकतन्त्र फिर से पनप रहा है जिन क्षेत्रों को पहले इसके लिए अनुपयुक्त माना जाता था, ऐसे समय में भारत आधुनिकता का माॅडल बनकर उभरा है।
जैसा कि स्वामी विवेकानन्द ने अपने सुप्रसिद्ध रूपक में कहा था कि- भारत का उदय होगा, शरीर की ताकत से नहीं, बल्कि मन की ताकत से, विध्वंस के ध्वज से नहीं, बल्कि शांति और प्रेम के ध्वज से। अच्छाई की सारी शक्तियों को इकट्ठा करें। यह न सोचें कि मेरा रंग क्या है- हरा, नीला अथवा लाल, बल्कि सभी रंगों को मिला लें और सफेद रंग की उस प्रखर चमक को पैदा करें, जो प्यार का रंग है।“ (प्रथम भाषण का संक्षिप्त अंश)
- श्री प्रणव मुखर्जी, राष्ट्रपति, भारत
साभार -  दैनिक जागरण, 26 जुलाई, 2012

श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा स्पष्टीकरण
भारत के स्वतन्त्रता के अनेक दशकों बाद प्रथम नागरिक के ये शब्द, मात्र केवल शब्द नहीं बल्कि भारत के उस अन्तिम और सर्वोच्च ऊँचाई के मार्ग का मूल सिद्धान्त, बीज, मन्त्र और नींव है। आपके इन शब्दों को अक्षरशः एक आम नागरिक अपने देश के प्रति कत्र्तव्य को समझते हुये पूर्ण कर चुका है और वह अनेक दिशाओं से प्रमाण प्राप्त करते हुये ”विश्वशास्त्र“ के रूप में व्यक्त है। अपने देश को मानक लोकतन्त्र के रूप में स्थापित करने के जो सिद्धान्त हैं वे कुछ ही पृष्ठों के हैं परन्तु अपने उद्देश्य से बहुत दूर निकल गये तथाकथित बौद्धिक भारतीय नागरिक और उनके नेतृत्वकर्ताओं के विभिन्न प्रकार के रंग से रंगे मन को एक सफेद रंग में लाने के प्रमाणों से ”विश्वशास्त्र“ लगभग 1700 पृष्ठों का बन गया। इन 1700 पृष्ठों में मनुष्य जाति के इस सृष्टि पर अन्तिम समय तक रहने तक के लिए ज्ञान संकलित कर दिया गया है जिसे भारत के महा-विभूषित, महा-मण्डित संत, महात्मा इत्यादि असम्भव ही समझते रहे हैं। इसलिए ही ”विश्वशास्त्र“ के साथ उसके गुण की पंक्ति (Tag Line) ”द नाॅलेज आॅफ फाइनल नॅालेज“ लगा हुआ है साथ ही शास्त्र के अन्त में ये भी लिखा है-”सभी सार्वेच्च विचार और सर्वोच्च कर्म मेरी ओर ही आते हैं“ और ये चुनौति भी है उन महा-विभूषित, महा-मण्डित संत, महात्मा इत्यादि के लिए जो भीड़ इकट्ठा कर भारत को विश्वगुरू बनाने का सपना दिखाते हैं, कि इससे कम पृष्ठों में अपनी प्रमाणिकता प्रस्तुत करें। आज वो हैं भीड़ है, कल जब वो नहीं रहेंगे तब ये भीड़ अनाथ हो जायेंगी और सपना तोड़ा जा चुका होगा। वे एक बार फिर ठगे जा चुके होंगे। उनका विश्वास उठ चुका होगा। फिर जब वो सत्य रूप में आयेगा तो उस पर कौन विश्वास करेगा क्योंकि भीड़ में बौद्धिकता नहीं होती। केवल अपने लोंगो को बताने की बात होती है कि मैं भी गया था। क्या देखा, क्या सुना, कुछ पता नहीं।
भारत में अनेक अपराधिक और घोटाले की फाइल में ”विश्वशास्त्र“ से अधिक पृष्ठ होते हैं या यूँ कहे कि ”विश्वशास्त्र“ में निम्नलिखित के अनुसार ही पृष्ठ हैं-
01. कक्षा 8 तक की शिक्षा प्राप्त करने तक सभी विषयों को मिलाकर जिनते पृष्ठ पढ़ा जाता है, विश्वशास्त्र उससे छोटा है।
02. उच्च शिक्षा के किसी भी एक विषय के पाठ्य पुस्तक से विश्वशास्त्र छोटा है।
03. विश्वविद्य़ालय में किसी विषय पर किये गये 5 शोध-पत्रों से विश्वशास्त्र छोटा है।
04. किसी भी प्रतियोगी परीक्षा के लिए पढ़े गये पुस्तकों से विश्वशास्त्र छोटा है।
05. 5 उपन्यासों के कुल पृष्ठ से विश्वशास्त्र छोटा है।
06. किसी सबसे अधिक पढ़े जाने वाले हिन्दी समाचार पत्र के मात्र 15 दिनों के समाचार पत्र से विश्वशास्त्र छोटा है।
07. एक क्रिकेट टेस्ट मैच के दौरान क्रिकेट के सम्बन्ध में दूरदर्शन के चैनल पर किये गये कमेन्ट्री व वार्ता से निकले वाक्यों से विश्वशास्त्र छोटा है।
08. 10 फिल्मों के पटकथा से विश्वशास्त्र छोटा है।
09. किसी एक घोटाले के जाँच पर तैयार किये गये रिपोर्ट से विश्वशास्त्र छोटा है।
10. 4 औरतों को बिना किसी मुद्दे पर चर्चा के बात करने के लिए 1 सप्ताह एक साथ रखने पर निकले वार्ता से विश्वशास्त्र छोटा है।
11. एक सास-बहू या किसी दूरदर्शन धारावाहिक को देखने में जितना समय लगेगा, उससे कम समय में विश्वशास्त्र पढ़ा जा सकता है।
12. एक लड़की जिसका एक लड़का मित्र (ब्वाॅय फ्रेण्ड) हो, मोबाइल पर बात करने के लिए स्वतन्त्र कर दिया जाय तो वह 5 दिन में जितना बात करेगी, उसके मूल्य और निकले साहित्य से विश्वशास्त्र छोटा है।
और ”विश्वशास्त्र“ की सारांश में उपयोग
01. निरक्षर के लिए इस शास्त्र का मूल्य शून्य है, साक्षर के लिए यह उपयोगी है, पशु-प्रवृत्तियों के लिए यह विश्वशास्त्र गोवर्धन पर्वत है, योगियों के लिए यह अँगुली पर उठाने योग्य है, धनिकों के लिए यह व्यर्थ है, नई पीढ़ीयों के लिए यह भविष्य निर्माता है, नेतृत्वकर्ताओं के लिए यह नेतृत्व की कला है, ज्ञान पिपासुओं के लिए यह मार्गदर्शक और उपलब्धि है।
02. काशी क्षेत्र का विश्वशास्त्र सत्य रूप है, उसकी संस्कृति है, उसका प्रतिनिधि शास्त्र है और उसका गौरव है।
03. भारत के लिए विश्वशास्त्र भारतीयता है तथा मानवता का चरम विकसित बिन्दु है। राष्ट्र के लिए राष्ट्रीयता है। 
04. युग के लिए यह युग-परिवर्तक है, व्यवस्था के लिए यह व्यवस्था-सत्यीकरण है।
05. लोकतन्त्र के लिए यह पुष्टिकारक है, संविधान के लिए यह मार्गदर्शक है, विभिन्न शास्त्रों के बीच विश्वशास्त्र ही गुरू है और आत्मतत्व का दृश्य रूप है।
और हमारे इस ग्रह पृथ्वी के देश भारत में हजारों विश्वविद्यालय, लाखों विद्यालय-महाविद्यालय, लाखों प्रोफेसर-लेक्चरर इत्यादि शिक्षा क्षेत्र से हैं। भारत के ”पुनर्निर्माण व आध्यात्मिक एवं दार्शनिक विरासत के आधार एक भारत-श्रेष्ठ भारत का निर्माण” के लिए प्रस्तुत प्रथम और अन्तिम प्रारूप ”विश्वशास्त्र“ के 1700 पृष्ठों पर निर्णय कितने दिनों में आयेगा, इससे ही निर्धारित होगा भारत की बौद्धिकता का कालानुसार योग्यता कि वो भूतकाल में हैं या वर्तमान में या भविष्य के लिए तुरन्त कार्यवाही करने को तैयार है।
स्वामी विवेकानन्द जी ने कहा था कि - ”जीवन में मेरी सर्वोच्च अभिलाषा यह है कि ऐसा चक्र प्रर्वतन कर दूँ जो कि उच्च एवम् श्रेष्ठ विचारों को सब के द्वार-द्वार पर पहुँचा दे। फिर स्त्री-पुरूष को अपने भाग्य का निर्माण स्वंय करने दो। हमारे पूर्वजों ने तथा अन्य देशों ने जीवन के महत्वपूर्ण प्रश्नों पर क्या विचार किया है यह सर्वसाधारण को जानने दो। विशेषकर उन्हें देखने दो कि और लोग क्या कर रहे हैं। फिर उन्हंे अपना निर्णय करने दो। रासायनिक द्रव्य इकट्ठे कर दो और प्रकृति के नियमानुसार वे किसी विशेष आकार धारण कर लेगें-परिश्रम करो, अटल रहो। ‘धर्म को बिना हानि पहुँचाये जनता की उन्नति’-इसे अपना आदर्श वाक्य बना लो।“
और इस कार्य को सम्पन्न करने के लिए पुनर्निर्माण  - सत्य शिक्षा का राष्ट्रीय तीव्र मार्ग (RENEW - Real Education National Express Way) की योजना ”सत्य मानक शिक्षा“ को सबके द्वारा पर पहुँचाने के लिए बनाईं गई है। जो भारतीय आध्यात्म एवं दर्शन आधारित स्वदेशी विपणन प्रणाली 3-एफ (3-F : Fuel-Fire-Fuel) से युक्त है अर्थात इसमें शामिल होने वाले व्यक्ति/संस्था को शिक्षा के साथ-साथ, छात्रवृत्ति और रायल्टी या सहायता निश्चित रूप से प्राप्त होती है।
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1. आध्यात्मिक एवं दार्शनिक विरासत के आधार पर साकार होगा एक भारत-श्रेष्ठ भारत का सपना।
2. सोशल मीडिया का प्रयोग कर सरकार को बेहतर बनाने की कोशिश।
3. सबका साथ, सबका विकास।
4. 100 नये माॅडल शहर बसाना।
5. 5T - ट्रेडिशन (Tradition), ट्रेड (Trade), टूरिज्म (Tourism), टेक्नालाॅजी (Technology), और टैलेन्ट (Talent) का मंत्र। (भारत के 16वीं लोकसभा के संसद के संयुक्त सत्र को सम्बोधित करते हुये, सोमवार, 9 जून 2014 ई0)
- श्री प्रणव मुखर्जी, राष्ट्रपति, भारत

श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा स्पष्टीकरण
इस ब्रह्माण्ड में प्रत्येक वस्तु एक निश्चित उद्देश्य के लिए अपनी प्रकृति के साथ व्यक्त हैं। इस प्रकार ईश्वर, अवतार और मनुष्यों के लिए उनकी अपनी शक्ति सीमा निर्धारित है। स्वयं से अलग दूसरे की शक्ति सीमा के लिए वह इच्छा-विचार तो व्यक्त कर सकता है परन्तु उसे कर पाना असम्भव होता है। 
आपके द्वारा भारत के 16वीं लोकसभा के संसद के संयुक्त सत्र को सम्बोधन में बोले गये 1. आध्यात्मिक एवं दार्शनिक विरासत के आधार पर साकार होगा एक भारत-श्रेष्ठ भारत का सपना, अवतारों के शक्ति सीमा का कार्य है। यह किसी भी मनुष्य द्वारा पूर्ण नहीं किया जा सकता। चाहे हजारों देश के सर्वोच्च अधिकार युक्त नेतृत्वकर्ता क्यों न आयें-जायें परन्तु बिना अवतार के अवतरण के यह कार्य पूर्ण करना असम्भव है।
2. सोशल मीडिया का प्रयोग कर सरकार को बेहतर बनाने की कोशिश, ये सरकार के ही इच्छा शक्ति पर ही निर्भर है।
3. सबका साथ, सबका विकास, आशिंक रूप से सरकार कर सकती है लेकिन पूर्ण रूप से अवतार के द्वारा व्यक्त तन्त्र-प्रणाली ही कर सकता है।
4. 100 नये माॅडल शहर बसाना, ये सरकार के ही इच्छा शक्ति पर निर्भर है। आध्यात्म जगत में जैसे ही कोई आविष्कार होता है वह व्यापार बन जाता है जो आविष्कारक के जीवन, ज्ञान और कर्म से जुड़ा होता है। पुनः आविष्कारक के जीवन, ज्ञान और कर्म पर आधारित अन्य आविष्कार भी होने लगते हैं। जैसे - श्रीराम, श्रीकृष्ण, शिव-शंकर, बुद्ध, माँ वैष्णों देवी, सांई बाबा, विश्व के तमाम धर्म संस्थापकों के जीवन, ज्ञान व कर्म पर अनेकों व्यापार विकसित हो गये हैं। भारतीय आध्यात्म और दर्शन जगत ऐसे उदाहरणों से भरा हुआ है। उसी प्रकार मेरे जीवन से जुड़ा वाराणसी-विन्ध्याचल-शिवद्वार-सोनभद्र के बीच का क्षेत्र हैं जो सत्यकाशी: पंचम, अन्तिम और सप्तम काशी के रूप में व्यक्त हुआ है। इस क्षेत्र के बीच नया माॅडल शहर सत्यकाशी के नाम से बसाना है। यह 5T का सर्वोच्च उदाहरण है।
5. 5T - ट्रेडिशन (Tradition), ट्रेड (Trade), टूरिज्म (Tourism), टेक्नालाॅजी (Technology) और टैलेन्ट (Talent) का मंत्र, ये विकास व लक्ष्य प्राप्ति के कार्य के लिए मार्गदर्शक बिन्दु है जिस पर आधारित होकर सरकार भी काम कर सकती है और अन्य नीजी संगठन भी। नीजी क्षेत्र में प्रयोग का मेरा यह कार्य सर्वोच्च उदाहरण है। 
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”क्या आर्थिक विकास ही विकास है? आज विकास का जो स्वरूप दिख रहा है, इसका वीभत्स परिणाम भी ग्लोबल वार्मिंग, ग्लेशियर का पिघलना, मौसम मे बदलाव आदि के रूप में सामने दिख रहा है। हमें यह देखना होगा कि विकास की इस राह में हमने क्या खोया और क्या पाया। समाज शास्त्री विमर्श कर यह राह सुझायें जिससे विकास, विविधता व लोकतंन्त्र और मजबूत बनें। विकास वह है जो समाज के अन्तिम व्यक्ति को भी लाभान्वित करे। भारत में एकता का भाव, व्यक्ति का मान होना चाहिए क्योंकि इसमें ही देश का सम्मान निहित है। समाज के लोग आगे आयें और सरकारों पर दबाव बनायें। विविधता भारत की संस्कृति की थाती है। भारत की यह संस्कृति 5000 वर्ष से अधिक पुरानी व जीवन्त है। काशी ज्योति का शहर है क्योंकि यहाँ बाबा का ज्योतिर्लिंग है। यह ज्ञान व एकता की ज्योति है। इसके प्रकाश से यह शहर ही नहीं, बल्कि पूरा देश आलोकित हो रहा है। यह शहर ज्ञान की असीम पूँजी लिए देश को अपनी ओर बुला रहा है।“ (महात्मा गाँधी काशी विद्यापीठ, वाराणसी में भारतीय समाजशास्त्रीय सोसायटी के 40वें अधिवेशन के उद्घाटन में)
- श्री प्रणव मुखर्जी, राष्ट्रपति, भारत
साभार -  दैनिक जागरण, 30 नवम्बर, 2014

श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा स्पष्टीकरण
स्वामी विवेकानन्द जी ने कहा था -”जितने दिनों से जगत है उतने दिनों से मन का अभाव- उस एक विश्वमन का अभाव कभी नहीं हुआ। प्रत्येक मानव, प्रत्येक प्राणी उस विश्वमन से ही निर्मित हो रहा है क्योंकि वह सदा ही वर्तमान है। और उन सब के निर्माण के लिए आदान-प्रदान कर रहा है।“ (धर्म विज्ञान, रामकृष्ण मिशन, पृष्ठ-27)
जिस प्रकार विश्वमन, सभी मनों को निर्मित और प्रभावित कर रहा है उसी प्रकार सभी मन भी विश्वमन को प्रभावित कर रहे हैं। इसलिए पहले सभी मनों का शान्ति, एकता, स्थिरता प्रदान करने की जरूरत है। फिर अपने आप विश्वमन भी शान्ति, एकता, स्थिरता को प्राप्त हो जायेगा परिणामस्वरूप प्रकृति द्वारा की जा रही उठा-पटक भी सामान्य में परिवर्तित हो जायेगी। 
ज्ञान, समान्यीकरण को कहते हैं जो ग्लोबल (वैश्विक) दृष्टि से आती है। आजकल शोध किसी विशेष बिन्दु-शीर्षक पर विशेषीकृत होकर होते हैं जो शोध की कला सीखा देते हैं और शोध परिणाम निरर्थक देते है। शोध से डिग्री और सेमिनार में शोध-पत्र पढ़ने से अतिरिक्त योग्यता प्राप्त होती है जो नौकरी पाने में सहायक होती है। नौकरी मिला काम समाप्त। काम समाप्त फिर मनुष्य धन बनाना और पीढ़ी बढ़ाने में व्यस्त। इसलिए समाजशास्त्रीयों से कोई हल नहीं मिल सकता और ना मिला। जब लक्ष्य ही नहीं पता तो अधिक विचार-विमर्श का परिणाम शून्य ही होता है। उनका काम अकेले पूर्ण कर दिया हूँ और उनके लिए सरकार पर दबाब बनाने का काम छोड़ दिया हूँ।
वाराणसी जिसे काशी कहा जाता है वह मोक्षदायिनी काशी है। यहाँ 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक विश्वेश्वर ज्योतिर्लिंग है जो सार्वभौम एकत्व और आदि योगी शिव-शंकर का प्रतीक है। यहाँ जन्म लेने वाला प्रत्येक मनुष्य जन्म-जात ज्ञानी होता है। उसे जन्म से ही ज्ञात होता है कि यह जगत् एक सपना और झूठा है। यह जगत् सत्य नहीं है इसलिए यहाँ के लोग काम नहीं करना चाहते। सीधी बात है जब सब छोड़कर जाना ही है तो बहुत काम करने से कोई अर्थ नहीं निकलता। जिस असीम ज्ञान को लेकर काशी अपनी ओर देश को बुला रहा है वह जीवनदायिनी सत्यकाशी से व्यक्त हुआ है। वाराणसी से ज्ञान निकलना बन्द हो गया है क्योंकि विश्वेश्वर ने व्यास को काशी से निष्काशित कर दिया था (देखे-स्कन्द पुराण, काशी खण्ड)। व्यास जी काशी के गंगा उस पार आ गये। जो अब जीवनदायिनी सत्यकाशी है और ”विश्वशास्त्र“ को व्यक्त करने वाला क्षेत्र है, इस योग्यता के कारण वह तेरहवाँ और अन्तिम भोगेश्वर ज्योतिर्लिंग की स्थापना का अधिकार रखता है।
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”तैयार करें मूल्यों और उम्मीदों पर आधारित ब्लूप्रिन्ट“ (विडिओ कान्फ्रेसिंग से छात्रों और शिक्षकों को सन्देश - राष्ट्र निर्माण का आह्वानं) - श्री प्रणव मुखर्जी, राष्ट्रपति, भारत
साभार -  दैनिक जागरण, 20 जनवरी, 2016

”शिक्षा पद्धति में बदलाव की जरूरत। ऐसी शिक्षा की जरूरत है जो समर्पित, विश्वसनीय और आत्म विश्वास से लवरेज युवा तैयार करे। शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो न केवल काबिल पेशेवर दे बल्कि वो समाज व देश के प्रति जुड़ाव भी महसूस करे।“ (स्वामी राम हिमालयन विश्वविद्यालय के पहले दिक्षांत समारोह में बोलते हुएं) - श्री प्रणव मुखर्जी, राष्ट्रपति, भारत

श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा स्पष्टीकरण
स्कूल-कालेजों के जाल से शिक्षा के व्यापार का विकास होता है न कि शिक्षा का। शिक्षा का विकास तो शिक्षा पाठ्यक्रम पर निर्भर होता है जिससे शिक्षक और शिक्षार्थी दोनों निर्मित होते हैं। जब तक पूर्ण शिक्षा पाठ्यक्रम का निर्माण नहीं होता, शिक्षा का विकास नहीं हो सकता लेकिन शिक्षा के व्यापार का विकास होता रहेगा।
आपने विडिओ कान्फ्रेसिंग से छात्रों और शिक्षकों को सन्देश से राष्ट्र निर्माण का आह्वान कर उन्हें एक लक्ष्य - मूल्यों और उम्मीदों पर आधारित ब्लूप्रिन्ट तैयार करने का दिया। जो राष्ट्र को मुख्य धारा में लाने के लिए मार्ग है। परन्तु आप-हम और सभी उसी छात्र जीवन से यहाँ तक पहुँचे हैं। उस छात्र जीवन की सोच में जिन्हें कुछ कर दिखाना होता है उनके मन-हृदय में सिर्फ एक हल्की सी ज्योति जलती रहती है - ”मुझे कुछ कर दिखाना है“। इस ज्योति का ध्यान, इस ज्योति से योग, इस ज्योति की रक्षा, इस ज्योति के प्रकाश को विकसित करने का प्रयास जो अपने जीवन से बढ़कर करता है, वही कुछ कर पाता है। और प्रकट होता है आप और हम जैसा बनकर। जिसे अन्य लोग सिर्फ एक वाक्य में कहकर समाप्त कर देते हैं - ”सब किस्मत की बात है“।
जिनके छात्र जीवन में सिर्फ यही सोच हो कि एक नौकरी मिल जाये, माता-पिता से दूर एक घर हो और हम और हमारे दो बस,  उनसे राष्ट्र निर्माण के लिए ब्लू प्रिण्ट की उम्मीद ही व्यर्थ है। और यदि नौकरी शिक्षा क्षेत्र में मिल गई तो एक ही विषय को अपने सेवा निवृत्ति के उम्र तक दोहराते हुए बुद्धि बद्ध हो गये। और नौकरी मिल ही गई है तो और जानने की जरूरत ही क्या है। आखिर वर्तमान सामय के अर्थ में ज्ञान का चरम लक्ष्य और उसकी प्रमाणिकता धन ही तो है।
इतिहास गवाह है इस संसार का विकास और मनुष्यता को पूर्णता की ओर ले जाने का काम डिग्रीधारीयों के द्वारा कभी भी सम्पन्न नहीं हुआ है। ये कार्य वही करते हैं जो समय-समय पर सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त का अनुभव कर समाज में प्रसारित करते रहे हैं। और फिर वही घटना घटित हुई है। उस पर आधारित राष्ट्र निर्माण का प्रथम और अन्तिम ब्लू प्रिन्ट ”विश्वशास्त्र“ के रूप में प्रकाशित है।
प्रस्तुत विश्वशास्त्र का मूल उद्देश्य एक पुस्तक के माध्यम से पूर्ण ज्ञान उपलब्ध कराना है जिससे उस पूर्ण ज्ञान के लिए वर्तमान और हमारे आने वाली पीढ़ी को एक आदर्श नागरिक के लिए बिखरे हुए न्यूनतम ज्ञान के संकलन करने के लिए समय-शक्ति खर्च न करना पड़े। समय के साथ बढ़ते हुए क्रमिक ज्ञान का संगठित रूप और कम में ही उन्हें अधिकतम प्राप्त हो, यही मेरे जीवन का उन्हें उपहार है। मुझे जिसके लिए कष्ट हुआ, वो किसी को ना हो इसलिए उसे हल करना मेरे जीवन का उद्देश्य बन गया।

विश्वशास्त्र द्वारा अनेक नये विषय की दिशा प्राप्त हुई है जो भारत खोज रहा था। इन दिशाओं से ही ”आध्यात्मिक एवं दार्शनिक विरासत के आधार पर एक भारत-श्रेष्ठ भारत निर्माण“, मन (मानव संसाधन) का विश्वमानक, पूर्ण मानव निर्माण की तकनीकी, हिन्दू देवी-देवता मनुष्यों के लिए मानक चरित्र, सम्पूर्ण विश्व के मानवों व संस्था के कर्म शक्ति की एकमुखी करने के लिए सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त आधारित एक प्रबन्ध और क्रियाकलाप, एक जीवन शैली इत्यादि प्राप्त होगा। भारत सरकार को वर्तमान करने के लिए इन आविष्कारों की योग्यता के आधार पर मैं (लव कुश सिंह ”विश्वमानव“), स्वयं को भारत सरकार के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ”भारत रत्न“ के योग्य पाता हूँ क्योंकि ऐसे ही कार्यो के लिए ही ये सम्मान बना है। और इसे मेरे जीते-जी पहचानने की आवश्यकता है। शरीर त्याग के उपरान्त ऐसे सम्मान की कोई उपयोगिता नहीं है। भारत में इतने विद्वान हैं कि इस पर निर्णय लेने और आविष्कार की पुष्टि में अधिक समय नहीं लगेगा क्योंकि आविष्कारों की पुष्टि के लिए व्यापक आधार पहले से ही इसमें विद्यमान है। “रत्न” उसे कहते हैं जिसका अपना व्यक्तिगत विलक्षण गुण-धर्म हो और वह गुण-धर्म उसके न रहने पर भी प्रेरक हो। पद पर पीठासीन व्यक्तित्व का गुण-धर्म मिश्रित होता है, वह उसके स्वयं की उपलब्धि नहीं रह जाती। भारत के रत्न वही हो सकते हैं जो स्वतन्त्र भारत में संवैधानिक पद पर न रहते हुये अपने विलक्षण गुण-धर्म द्वारा भारत को कुछ दिये हों और उनके न रहने पर भी भारतीय नागरिक प्रेरणा प्राप्त करता हो। इस क्रम में ”भारत रत्न“ का अगला दावेदार मैं हूँ और नहीं तो क्यों? इतना ही नहीं नोबेल पुरस्कार के साहित्य और शान्ति के संयुक्त पुरस्कार के लिए भी योग्य है जो भारत के लिए गर्व का विषय है।


विश्वमानव और श्री बी.एल.जोशी (27 मार्च, 1936 - )

श्री बी.एल.जोशी (27 मार्च, 1936 - )

परिचय -
बनवारीलाल जोशी का जन्म 27 मार्च, 1936 को राजस्थान नागौर में छोटी खाटू नामक गा्रम में हुआ था। इन्होंने अपना स्नातक कोलकाता के स्काॅटिश चर्च कालेज से किया। उसके उपरान्त विश्वविद्यालय विधि महाविद्यालय, कोलकाता से विधि में स्नातक हुए। बनवारी लाल जोशी जी भारत के कई राज्यों- दिल्ली, उत्तराखण्ड, मेघालय, उत्तर प्रदेश के उपराज्यपाल एवं राज्यपाल के पद को सुशोभित करते रहें है। आप एक दूरदर्शी व चितंक के रूप में जाने जाते हैं।
वे 1957 में आई.पी.एस. के साथ अपने कैरियर को शुरू किये। वह इन्टरपोल, जालसाजी, नारकोटिक्स, औद्योगिक सुरक्षा, संयुक्त राष्ट्र सुधारात्मक कार्य, अपराध जैसे विभिन्न क्षेत्रों में खुफिया ब्यूरो के लिए काम किये। वह लाल बहादुर शास्त्री और इन्दिरा गाँधी के साथ, बाद में पी.एम.ओ. में 4 वर्ष काम किये। इस्लामाबाद और लन्दन में भारत के उच्चायोगों में प्रथम सचिव और वाशिंगटन डी.सी. में भारत के दूतावास में प्रमुख के रूप में विदेश मंत्रालय के लिए कार्य किये।

”विश्वविद्यालयों में सिर्फ परीक्षाओं में ही नहीं, शोध कार्यों में भी नकल का बोलबाला है, कोई भी विश्वविद्यालय ऐसा नहीं जिसके किसी शोध को अन्तर्राष्ट्रीय तो क्या, राष्ट्रीय स्तर पर भी मान्यता मिली हो।“ (लखनऊ में आयोजित 21 राज्य विश्वविद्यालयों व अन्य के कुलपतियों के सम्मेलन में)
-श्री बी.एल. जोशी
साभार - दैनिक जागरण, वाराणसी, दि0 10 नवम्बर 2010
”विश्वविद्यालय को कुलपतियों और शिक्षकों को शिक्षा का स्तर और उन्नत करना चाहिए। एक बार अपना दिल टटोलना चाहिए कि क्या वाकई उनकी शिक्षा स्तरीय है। हर साल सैकड़ों शोधार्थियों को पीएच.डी की उपाधि दी जा रही है, लेकिन उनमें से कितने नोबेल स्तर के हैं। साल में एक-दो शोध तो नोबेल स्तर के हों।“(रूहेलखण्ड विश्वविद्यालय, बरेली, उ0प्र0, के दीक्षांत समारोह में) -श्री बी.एल. जोशी, राज्यपाल, उ0प्र0, भारत 
साभार -  अमर उजाला, लखनऊ, दि0 21 नवम्बर 2012

श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा स्पष्टीकरण 
जैसी प्रजा वैसा राजा। जैसा शिक्षक वैसा शिक्षार्थी। जैसा पाठ्यक्रम वैसा शिक्षक और शिक्षार्थी। विश्वविद्यालय अब शोध नहीं कराते बल्कि शोध की विधि बताते हैं क्योंकि मानसिक विस्तार न होने से शोध के विषय भी समाप्त हो चुके हैं। विश्वविद्यालय में हो रहे शोध मात्र शोध की कला सीखाने की संस्था है न कि ऐसे विषय पर शोध सिखाने की कला जिससे सामाजिक, राष्ट्रीय व वैश्विक विकास को नई दिशा प्राप्त हो जाये। ”विश्वशास्त्र“ अनेक ऐसे शोध विषयों की ओर दिशाबोध भी कराता है जो मनुष्यता के विकास में आने वाले समय के लिए अति आवश्यक है। पीएच.डी. की डिग्रीयां अवश्य गर्व करने योग्य हैं। परन्तु यह केवल स्वयं के लिए रोजगार पाने के साधन के सिवाय कुछ नहीं है और वह भी संघर्ष से। जबकि डिग्रीधारीयों का समाज को नई दिशा देने का भी कत्र्तव्य होना चाहिए। आखिरकार डिग्रीधारी और सामज व देश के नेतृत्वकर्ता यह कार्य नहीं करेगें तो क्या उनसे उम्मीद की जाय जो दो वक्त की रोटी के संघर्ष के लिए चिंतित रहते है? आखिरकार सार्वजनिक मंचो से डिग्रीधारी किसको यह बताना चाहते हैं कि ऐसा होना चाहिए या वैसा होना चाहिए?
निम्नलिखित विषय स्वतः स्फूर्त प्रेरणा द्वारा एक नोबेल स्तर का शोध ही है क्योंकि मानव समाज का बौद्धिक विकास रूक सा गया था-
सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में व्याप्त एक ही सत्य-सिद्धान्त द्वारा व्यक्तिगत व संयुक्त मन को एकमुखी कर सर्वोच्च, मूल और अन्तिम स्तर पर स्थापित करने के लिए शून्य पर अन्तिम आविष्कार WS-0 श्रृंखला की निम्नलिखित पाँच शाखाएँ है। 
1. डब्ल्यू.एस. (WS)-0 : विचार एवम् साहित्य का विश्वमानक
2. डब्ल्यू.एस. (WS)-00 : विषय एवम् विशेषज्ञों की परिभाषा का विश्वमानक
3. डब्ल्यू.एस. (WS)-000 : ब्रह्माण्ड (सूक्ष्म एवम् स्थूल) के प्रबन्ध और क्रियाकलाप का विश्वमानक
4. डब्ल्यू.एस. (WS)-0000 : मानव (सूक्ष्म तथा स्थूल) के प्रबन्ध और क्रियाकलाप का विश्वमानक
5. डब्ल्यू.एस. (WS)-00000 : उपासना और उपासना स्थल का विश्वमानक
और पूर्णमानव निर्माण की तकनीकी WCM-TLM-SHYAM.C है। 

Monday, March 23, 2020

विश्वमानव और श्री गिरधर मालवीय (14 नवम्बर 1936 - )

श्री गिरधर मालवीय (14 नवम्बर 1936 - )

परिचय -
श्री गिरिधर मालवीय का जन्म इलाहाबाद में 14 नवम्बर 1936 को हुआ था। आप काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के संस्थापक महामना पं. मदन मोहन मालवीय के पौत्र है। आपकी प्राथमिक शिक्षा केन्द्रीय विद्यालय, बी.एच.यू. एवं बेसेंन्ट थियोसोफिकल स्कूल से तथा उच्च शिक्षा एम.ए. (राजनीतिक विज्ञान) और एल.एल.बी काशी हिन्दू विश्व विद्याालय से पूर्ण हुई। आपका शौक यात्रा, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक गतिविधियों में रहा है। आप इलाहाबाद उच्च न्यायालय से सेवानिवृत्त न्यायाधीश हैं।

”वैदिक काल से भारत के ज्ञान-विज्ञान एवं सत्य-अहिंसा के सिद्धान्तों का पूरा विश्व लोहा मानता आ रहा है। वर्तमान में उच्च कोटि के डाॅक्टर, इंजिनियर और सूचना विज्ञान के विशेषज्ञ पूरे विश्व में अपनी प्रतिभा के दम पर छाये हुये हैं। आर्थिक महाशक्ति के रूप में भारत की पहचान बन रही है। इन्हीं खूबियों के बूते भारत और सनातन धर्म फिर से विश्व गुरू की पदवी हासिल करेगा।“ (गाँधी विद्या संस्थान, वाराणसी में)
-गिरधर मालवीय 
साभार - दैनिक जागरण, वाराणसी, दि0 26 दिसम्बर, 2010

श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा स्पष्टीकरण 
निश्चित रूप से वर्तमान में उच्च कोटि के डाॅक्टर, इंजिनियर और सूचना विज्ञान के विशेषज्ञ पूरे विश्व में अपनी प्रतिभा के दम पर छाये हुये हैं। आर्थिक महाशक्ति के रूप में भारत की पहचान बन रही है। अब इन खूबियों को वैश्विक मानव के रूप में स्थापित करने का वक्त आ गया है जिससे भारत और सनातन धर्म फिर से विश्व गुरू की पदवी हासिल कर सके। 
कर्म के शारीरिक, आर्थिक व मानसिक क्षेत्र में ”विश्वशास्त्र“ मानसिक कर्म का यह सर्वोच्च और अन्तिम कृति है। भविष्य में यह विश्व-राष्ट्र शास्त्र साहित्य और एक विश्व-राष्ट्र-ईश्वर का स्थान ग्रहण कर ले तो कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी। इस ”विश्वशास्त्र“ की भाषा शैली मस्तिष्क को व्यापक करते हुये क्रियात्मक और व्यक्ति सहित विश्व के धारण करने योग्य ही नहीं बल्कि हम उसमें ही जीवन जी रहें हैं ऐसा अनुभव कराने वाली है। न कि मात्र भूतकाल व वर्तमान का स्पष्टीकरण व व्याख्या कर केवल पुस्तक लिख देने की खुजलाहट दूर करने वाली है। वर्तमान और भविष्य के एकीकृत विश्व के स्थापना स्तर तक के लिए कार्य योजना का इसमें स्पष्ट झलक है। ”विश्वशास्त्र“ मानने वाली बात पर कम बल्कि जानने और ऐसी सम्भावनाओं पर अधिक केन्द्रित है जो सम्भव है और बोधगम्य है। शास्त्र द्वारा शब्दों की रक्षा और उसका बखूबी से प्रयोग बेमिसाल है। ज्ञान को विज्ञान की शैली में प्रस्तुत करने की विशेष शैली प्रयुक्त है। मन पर कार्य करते हुये, इतने अधिक मनस्तरों को यह स्पर्श करता है जिसको निर्धारित कर पाना असम्भव है। और जीवनदायिनी शास्त्र के रूप में योग्य है।
”विश्वशास्त्र“ इस स्थिति तक योग्यता रखता है कि वैश्विक सामाजिक-सांस्कृतिक-साहित्यिक एकीकरण सहित विश्व एकता-शान्ति-स्थिरता-विकास के लिए जो भी कार्य योजना हो उसे देश व संयुक्त राष्ट्र संघ अपने शासकीय कानून के अनुसार आसानी से प्राप्त कर सकता है। और ऐसे आविष्कारकर्ता को इन सबसे सम्बन्धित विभिन्न पुरस्कारों, सम्मानों व उपाधियों से बिना विलम्ब किये सुशोभित किया जाना चाहिए। यदि यथार्थ रूप से देखा जाये तो विश्व का सर्वोच्च पुरस्कार-नोबेल पुरस्कार के शान्ति व साहित्य क्षेत्र के पूर्ण रूप से यह योग्य है। साथ ही भारत देश के भारत रत्न से किसी भी मायने में कम नहीं है।