Thursday, March 26, 2020

विश्वमानव और रोमेश भण्डारी (29 मार्च, 1928 - 7 सितम्बर, 2013)

रोमेश भण्डारी (29 मार्च, 1928 - 7 सितम्बर, 2013)

परिचय -
श्री रोमेश भण्डारी का जन्म 29 मार्च, 1928 को लाहौर में हुआ था। उनके पिता स्व0 श्री अमर नाथ भण्डारी पंजाब उच्च नयायालय के मुख्य न्यायाधीश थे। उनका विवाह पटियाला के महाराजा भूपेन्द्र सिंह की पुत्री कुमुदेश भण्डारी से हुआ। जिनसे एक पुत्र और एक पुत्री हैं।
श्री रोमेश भण्डारी ने स्कूली शिक्षा एचिशन कालेज, लाहौर पूरी की जहाँ उन्हें कैम्ब्रिज हायर स्कूल प्रमाण पत्र परीक्षा में प्रथम आने के लिए चर्चिल हाउस पदक से सम्मानित किया गया। वे पंजाब विश्वविद्यालय के बी.ए. की परीक्षा 1947 में सर्वप्रथम आये थे। 1947 में अर्थशास्त्र के अध्ययन के लिए कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में प्रवेश लिये और पूर्ण किये। 1948-49 में वे कैम्ब्रिज भारतीय मजीलस के अध्यक्ष थे। भारत में वे विदेश सेवा में आ गये। उत्तर प्रदेश के राज्यपाल के रूप में उनका कार्यकाल 19 जुलाई 1996 से 17 मार्च, 1998 तक रहा।

‘शिक्षा प्रक्रिया मे व्यापक सुधारों की जरूरत है। ‘यह रास्ता दिल्ली की ओर जाता है’ लिखा साइन बोर्ड पढ़ लेना मात्र शिक्षा नहीं है। इसके बारे में चिन्तन करना पड़ेगा और कोई लक्ष्य निर्धारित करना पडे़गा। सामाजिक परिवर्तन किस तरह से, इसकी प्राथमिकताये क्या होगीं? यह तय करना पड़ेगा। इक्कीसवी शताब्दी के लिए हमें कार्यक्रम तय करने पडे़गे। मौजूदा लोकतन्त्र खराब नहीं है परन्तु इसको और बेहतर बनाने की आवश्यकता है।’’ - पूर्व राज्यपाल, उ0 प्र0, श्री रोमेश भण्डारी, 
साभार - दैनिक जागरण, वाराणसी, दि0 11-9-97 

लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा स्पष्टीकरण 
जब तक समष्टि तंत्रों (विश्वमन या संयुक्त मन या लोकतन्त्र मन या समाज मन का तन्त्र) को विवाद मुक्त कर उसे व्यष्टि (व्यक्ति) में शिक्षा के माध्यम से स्थापित नहीं किया जाता तब तक स्वस्थ समाज, स्वस्थ लोकतन्त्र, स्वस्थ उद्योग तो दूर, बेहतर भी नहीं बल्कि बदतर अवस्था को प्राप्त होता रहेगा। यह कार्य इक्कीसवीं शताब्दी और भविष्य का कार्यक्रम, लगातार विकास को विकास की ओर गति देने का लक्ष्य, शिक्षा को पूर्ण बनाने इत्यादि का ही कार्य है।’’ 

विश्वमानव और के. एस. सुदर्शन (18 जून, 1931 - 15 सितम्बर, 2012)

के. एस. सुदर्शन (18 जून, 1931 - 15 सितम्बर, 2012)

परिचय -
श्री के. एस. सुदर्शन (कुप्पाहाली सीतारमैया सुदर्शन) का जन्म 18 जून, 1931 को रायपुर, छत्तीसगढ़ प्रदेश के एक कन्नड़भाषी परिवार में हुआ था। वे जबलपुर के राजकीय इंजिनियरिंग महाविद्यालय (सागर विश्वविद्यालय) से दूरसंचार प्रौद्योगिकी में स्नातक की डिग्री प्राप्त किये। 16 जनवरी 2009 को मेरठ के शोभित विश्वविद्यालय ने उनको डाॅक्टर आॅफ आर्ट्स की मानद उपाधि से विभूषित किया।
वे 9 वर्ष के थे तब पहली बार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, जो एक हिन्दू राष्ट्रवादी एवं सामाजिक कल्याण का संगठन है, के सम्पर्क में आये। 1954 में उन्हें संघ के प्रचारक के रूप में रायगढ़ जिले में भेजा गया। 1964 में प्रान्त प्रचारक बनें। 1969 में वे अखिल भारतीय संगठनों के प्रमुखों के संयोजक नियुक्त हुए। 1979 में वे बौद्धिक प्रमुख के रूप में पदभार ग्रहण किये। 1990 के बाद वे संगठन के संयुक्त महासचिव बनें। वे विभिन्न अवसरों पर शारीरिक व बौद्धिक दोनो पदों पर एक साथ रहने का गौरव प्राप्त कर चुके हैं।
श्री सुदर्शन, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के 5वें सरसंघचालक थे। मार्च 2009 में श्री मोहन भागवत को 6वाँ सरसंघचालक नियुक्त कर स्वेच्छा से पदमुक्त हो गये। श्री सुदर्शन अपने पैतृक कन्नड़ के अलावा मराठी, हिन्दी, अंग्रेजी, छत्तीसगढ़ी और कुछ उत्तर-पूर्व और बंगाल की भाषाओं में भी बोलते हैं।

”हिन्दू चिन्तन पर आधारित नई आचार संहिता बने।“
-श्री के. एस. सुदर्शन, प्रमुख राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, 
साभार - अमर उजाला, इलाहाबाद दि0 16-03-2000

लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा स्पष्टीकरण 
”हिन्दू धर्म में जब भी कोई महापुरूष व्यक्त होता है और वर्तमान से भूतकाल में चला जाता है तब वह राष्ट्रीय स्वयं संघ के अधीन पेटेण्ट हो जाता है। सिर्फ जपने के लिए। संघ का बुद्धि 75 वर्षो के अपने कार्यकाल के बाद हिन्दू धर्म के लिए सिर्फ यह व्यक्त करता है, वह भी स्वामी विवेकानन्द के 100 वर्षो बाद और द्वारिकापीठाधीष्वर जगद्गुरू शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द जी के मई 1997 में वही व्यक्त करने के बाद कि हिन्दू चिन्तन पर आधारित नई आचार संहिता बने’ तो कोई नई बात नहीं और संघ को क्या कहा जाय। सिर्फ यही कहा जा सकता है कि भूतकाल को जपने वाले अन्ततः भूतकाल की ही बातें करते रहते हैं। फिर आप लोग कहते किससे है? भारतीय संस्कृति का ज्ञाता संघ को ही आचार संहिता बनाना चाहिए। नई आचार संहिता की बात पुरानी हो चुकी है वह भूतकाल बन आपके समक्ष है। अब आपको क्या करना है? यह सोचें। महोदय इसमें आपकी गलती नहीं है। एक ही स्थिति, एक ही विषय, एक ही चिन्तन इत्यादि में लम्बे अवधि तक पड़े रहने से बुद्धिबद्ध हो जाती है। सोचिये संघ ने देश में कितने बुद्धि बद्धों का निर्माण कर दिया है सर्वप्रथम संघ, हिन्दू को भारत की सीमारेखा से परे भी देखना प्रारम्भ करें। आप सभी तो अनेक मत-सम्प्रदायों के समन्वयक-समन्वयाचार्य श्रंृखला के श्रीकृष्ण, श्रीरामकृष्ण, परमहंस और स्वामी विवेकानन्द के भी चित्र लगाते है और जपते है। सोचिये ऐसा क्यों हुआ? और भारत के इस अन्तिम कार्य में कौन किसके समक्ष समर्पण करेगा या कोई किसी के समक्ष समर्पण न करते हुये ”एक तरफ में रहूँ और दूसरी तरफ मेरी सेना रहे“ द्वारा कार्य सम्पन्न किया जाय। क्योंकि श्रेय को संघ तो खो चुका है ध्येय वह निश्चित रूप से प्राप्त करेगा यह मेेरा आशीर्वाद है“


विश्वमानव और विश्वनाथ प्रताप सिंह (25 जून, 1931 - 27 नवम्बर, 2008)

विश्वनाथ प्रताप सिंह (25 जून, 1931 - 27 नवम्बर, 2008)

परिचय -
विश्वनाथ प्रताप सिंह, भारत गण्राज्य के 8वें प्रधानमन्त्री थे। उनका शासन काल 2 दिसम्बर, 1989 से 10 नवम्बर, 1990 तक ही चला। वे उत्तर प्रदेश के मुख्यमन्त्री भी रह चुके हैं और वे माण्डा, उत्तर प्रदेश के 41वें राजा बहादुर थे।
विश्वनाथ प्रताप सिंह का जन्म 25 जून, 1931 को गढवाली राजपूत (राठौड़) दैया के राजा भगवती प्रसाद सिंह के परिवार में हुआ था और 1936 में माण्डा के राजा बहादुर राम गोपाल सिंह द्वारा गोद लिए गये फिर 1941 में राजा बहादुर बनें। वे 5 वर्ष देहरादून के कर्नल ब्राउन कैम्ब्रिज स्कूल में शिक्षा प्राप्त किये। उन्होंने नेहरू युग के दौरान इलाहाबाद से राजनीति में प्रवेश लिया। देवगढ़, उदयपुर के रावत संग्राम सिंह की 1936 में जन्मी द्वितीय पुत्री रानी सीता कुमारी के साथ उनका विवाह 25 जून, 1955 को हुआ। जल्द ही वे राज्य कांग्रेस पार्टी मंे अपना एक स्थान बना लिए। वे इन्दिरा गाँधी द्वारा सन् 1980 में उत्तर प्रदेश के मुख्य मन्त्री नियुक्त किये गये। उन्होंने उत्तर प्रदेश के दक्षिण-पश्चिम क्षेत्र के ग्रामीण क्षेत्रों से डकैती उन्मूलन के लिए घोषणा की। 1983 में कुछ डकैतों के आत्म समर्पण के बावजूद वे खुद को लक्ष्य में सफल नहीं समझें और उन्होंने पद से इस्तीफा देने की पेशकश की जिससे उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक प्रचार मिला। 1984 में राजीव गाँधी के भारी बहुमत से जीतने के बाद उन्हें केन्द्र में बुलाकर वित मंत्री बनाया गया। अपने कार्यकाल के दौरान वे सोने की तस्करी को कम किये और भूरे लाल की अध्यक्षता में प्रवर्तन निदेशालय को शक्तिशाली बनाया। परिणामस्वरूप उच्चस्तरीय व्यक्तियों जिसमें धीरूभाई अम्बानी और अमिताभ बच्चन भी थें, के यहाँ कर के मामले में छापे पड़े। जिससे उनकी लोकप्रियता और बढ़ी फिर उन्हें रक्षा मंत्रालय का मन्त्री बनाया गया। बोफोर्स रक्षा सौदे में घोटाले से उत्पन्न स्थिति में उन्हें रक्षा मन्त्री से हटाया गया, जबाब में उन्होंने कांग्रेस पार्टी और लोकसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया।
अपने सहयोगियों अरूण नेहरू और आरिफ मोहम्मद खान के साथ मिलकर उन्होंने एक विपक्षी पार्टी- जन मोर्चा का गठन किया। वे इलाहाबाद से सुनील शास्त्री को हराकर फिर लोकसभा के लिए चुन लिये गये। वर्ष 1988 में मूल जनता दल के आध्यात्मिक नेता जय प्रकाश नारायण के जन्मदिन 11 अक्टुबर के दिन उनहोंने जनता पार्टी, लोकदल और कांग्रेस (एस) के विलय के साथ जनता दल जन मोर्चा का गठन किया। राजीव गाँधी सरकार के विरोधी दलों को एक साथ लाने के लिए उन्होंने नेशनल फ्रंट नाम से गठबन्धन बनाया जिसके संयोजक स्वयं और अध्यक्ष एन.टी.रामाराव थे। इस गठबन्धन में जनता दल, द्रमुक, तेदेपा और अगप सहित अनेक क्षेत्रीय राजनीतिक दल साथ थे। 1989 में नेशनल फ्रन्ट ने लोकसभा में साधारण बहुमत हासिल की और सरकार बनाने का निर्णय किया जिसमें वे थोड़े से कार्यकाल के लिए प्रधानमन्त्री बनें। इनके कार्यकाल में गृहमन्त्री मुफ्ती मोहम्मद सईद की पुत्री का अपहरण हुआ था जिसके बदले आतंकवादीयों को रिहा करने के लिए सहमत होना पड़ा था।
विश्वनाथ प्रताप सिंह, सामाजिक न्याय के लिए ऐतिहासिक रूप से अन्य पिछड़े वर्गो के लिए सार्वजनिक क्षेत्र के सभी नौकरियों में मण्डल आयोग के सिफारिशों को लागू कराने के लिए आन्दोलन किये, जो पूरे देश में काफी विरोध के बाद लागू हुआ। विश्वनाथ प्रताप सिंह का गुर्दे की विफलता से लम्बे संघर्ष के बाद 27 नवम्बर, 2008 को निधन हो गया। उनके बेटे अजय सिंह द्वारा इलाहाबाद में गंगा तट पर 29 नवम्बर को अन्तिम संस्कार किया गया। उसके बाद जनमोर्चा को जून, 2009 में राष्ट्रीय जन मोर्चा का नाम दिया गया जिसे राष्ट्रीय राजनीति में तीसरा विकल्प बनाने के लिए नाम दिया गया था परन्तु एक महीने बाद उसका भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में विलय की घोषणा कर दी गई।

लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा स्पष्टीकरण               
स्वस्थ समाज, स्वस्थ लोकतंत्र और स्वस्थ उद्योग सहित एकता, समता, शान्ति, स्थिरता युक्त सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त द्वारा भारत को इन कठिन चुनौतियों के दिनों में विश्व को नई दिशा देने का दायित्व और विश्व के नेतृत्व के लिए शक्तिशाली बना सके वह सब सर्वाभौम सत्य-सिद्धान्त यहाॅ है। और मैं न नेता हूॅ, न ही आन्दोलन कत्र्ता। मैं हूॅ एक, भारत सहित विश्व का आम नागरिक, जिसने अपना कर्तव्य समझकर देश की ओर से विश्व को कुछ देने के लिए थोड़ा प्रयत्न, स्वयं को कठिन परिस्थितियों में डालकर भी कर रहा हूॅ। परिणामस्वरूप स्थिर सरकार प्राप्त होकर भी व्यवस्था परिवर्तन, तन्त्र परिवर्तन, विचार परिवर्तन और कर्मज्ञान जैसा मूल आवश्यक विषय स्थापित नहीं हो पायेगी। जिससे भारत की स्थिति में कोई विशेष परिवर्तन की सम्भावना नहीं दिखाई पड़ती। वर्तमान संसद की हालत भी तो यह है कि ‘मृत्यु’ जैसा सत्य विषय जिसे व्यक्ति प्रतिदिन देखता है यदि यह मुद्दा कि ‘मृत्यु सत्य है’ मानने के लिए संसद में प्रस्ताव आये तो वह भी विवाद में पड़कर पारित नहीं हो पायेगा। इसलिए आवश्यक है कि या तो सभी दल मिलकर सार्वजनिक सत्य पर आधारित धर्मनिरपेक्ष एवम् सर्वधर्मसमभाव विश्वमानक-शून्य श्रंृखला: मन की गुणवत्ता का विश्वमानक की विश्वव्यापी स्थापना प्राथमिकता के आधार पर करें। या किसी एक दल को यह सर्वोच्च मुद्दा सौंपकर भयंकर राजनीतिक ज्वार भाटा ला दिया जाये।
जाति आधारित आरक्षण पर समाजिक समानता लाने का प्रयत्न सामयिक होना चाहिए या उसका लाभ प्राप्त हो जाने के उपरान्त जीवन स्तर उठ जाने के बाद उससे वंचित करने का भी प्राविधान होना चाहिए। देश के स्वतन्त्रता के समय जातिगत आरक्षण की आवश्यकता थी और वह सीमित समय के लिए ही लागू किया गया था परन्तु राजनीतिक लाभ के कारणों से वह वर्तमान तक लागू है। हम समाज से मनुवादी व्यवस्था को समाप्त करने की बात करते हैं परन्तु एक तरफ आज समाज इससे धीरे-धीरे मुक्त हो रहा है और दूसरी तरफ संविधान ही इसका समर्थक बनता जा रहा है। ऐसी स्थिति में आरक्षण व्यवस्था का मापदण्ड जाति आधारित से शारीरिक, आर्थिक और मानसिक आधारित कर देनी चाहिए जो धर्मनिरपेक्ष और सर्वधर्मसमभाव भी है और लोकतन्त्र का धर्म भी धर्मनिरपेक्ष और सर्वधर्मसमभाव है। 
किसी व्यक्ति के बौद्धिक विकास के लिए आवश्यक है कि उसे भोजन, स्वास्थ्य और निर्धारित आर्थिक आय को सुनिश्चित कर दिया जाय और यह यदि उसके शैक्षिक जीवन से ही कर दिया जाय तो शेष सपने को वह स्वयं पूरा कर लेगा। यदि वह नहीं कर पाता तो उसका जिम्मेदार भी वह स्वयं होगा, न कि अभिभावक या ईश्वर। और यही सबसे बड़ा आरक्षण होगा।


विश्वमानव और ए.पी.जे. अब्दुल कलाम (15 अक्टुबर, 1931 - 27 जुलाई 2015)

ए.पी.जे. अब्दुल कलाम (15 अक्टुबर, 1931 - 27 जुलाई 2015)

परिचय -
अवुल पाकिर जैनुलाअबदीन अब्दुल कलाम, जिन्हें आमतौर पर डाॅ0 ए.पी.जे. अब्दुल कलाम के नाम से जाना जाता है, भारत के पूर्व राष्ट्रपति और जाने माने वैज्ञानिक और अभियंता हैं।
तमिलनाडु प्रदेश के धनुषकोडी गाँव के एक मध्यमवर्ग मुस्लिम परिवार में 15 अक्टुबर, 1931 को जन्में कलाम ने 1958 में मद्रास इंस्टीट्यूट आॅफ टेक्नालाॅजी से अंतरीक्ष विज्ञान में स्नातक उपाधि प्राप्त की। स्नातक होने के बाद उन्होंने हावरक्राफ्ट परियोजना पर काम करने के लिए भारतीय रक्षा अनुसंधान एवं विकास संस्थान में प्रवेश किया। 1962 में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान केन्द्र में आये जहाँ उन्होंने सफलतापूर्वक कई उपग्रह प्रक्षेपण परियोजनाओं में अपनी भूमिका निभाई। परियोजना निदेशक के रूप में भारत के पहले स्वदेशी उपग्रह प्रक्षेपण यान एस.एल.वी-3 के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई जिससे जुलाई 1980 में रोहिणी उपग्रह सफलतापूर्वक अंतरिक्ष में प्रक्षेपित किया गया था। 1982 में वे भारतीय रक्षा अनुसंधान एवं विकास संस्थान में वापस निदेशक के तौर पर आये और उन्होंने अपना सारा ध्यान ”गाइडेड मिसाइल“ के विकास पर केन्द्रित किया। अग्नि मिसाइल और पृथ्वी मिसाइल का सफल परीक्षण का श्रेय काफी कुछ उन्हीं को है। जुलाई 1992 में वे भारतीय रक्षा मंत्रालय में वैज्ञानिक सलाहकार नियुक्त हुये। उनकी देखरेख में भारत ने 1998 में पोखरण में अपना दूसरा सफल परमाणु परीक्षण किया और भारत परमाणु शक्ति सम्पन्न राष्ट्रों की सूची में शामिल हुआ।
अब्दुल कलाम को भारत सरकार द्वारा 1981 में प्रशासकीय सेवा के क्षेत्र में पद्य्म भूषण से, 1990 में पद्य्म विभूषण तथा 1997 में भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया था। 18 जुलाई, 2002 को डाॅ0 कलाम को 90 प्रतिशत बहुमत द्वारा भारत का राष्ट्रपति चुना गया और उन्होंने 25 जुलाई, 2002 को अपना पदभार ग्रहण किया। इस पद पर आने वाले वे पहले अविवाहित थे। इस पद के लिए उनका नामांकन उस समय सत्तासीन राष्ट्रीय प्रजातान्त्रिक गठबन्धन की सरकार ने किया था जिसे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का समर्थन हासिल हुआ था। वामपंथी दलों ने अपनी तरफ से 87 वर्षीया श्रीमती लक्ष्मी सहगल का नामांकन किया था जो सुभाषचन्द्र बोस के आजाद हिन्द फौज में और द्वितीय विश्व युद्ध में अपने योगदान के लिए जानी जाती हैं।
डाॅ0 कलाम अपने व्यक्तिगत जीवन में पूरी तरह अनुशासन, शाकाहार और ब्रह्मचर्य का पालन करने वालों में से हैं। ऐसा कहा जाता है कि वे कुरान और भगवद्गीता दोनों का अध्ययन करते हैं। कलाम ने कई स्थानों पर उल्लेख किया है कि वे तिरूक्कुराल का भी अनुसरण करते हैं। राजनैतिक स्तर पर कलाम की चाहत है कि अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत की भूमिका का विस्तार हो और भारत ज्यादा से ज्यादा महत्वपूर्ण भूमिका निभाये। भारत को महाशक्ति बनने की दिशा में कदम बढ़ाते देखना उनकी दिली चाहत है। उन्होंने कई प्रेरणास्पद पुस्तकों की भी रचना की है और वे तकनीकी को भारत के जनसाधारण तक पहुँचाने की हमेशा वकालत करते रहें हैं। बच्चों और युवाओं के बीच डाॅ0 कलाम अत्यधिक लोकप्रिय हैं। 

”अच्छी शिक्षा व्यवस्था ही प्रबुद्ध नागरिक पैदा करती है, बच्चों को नेतिक शिक्षा प्रदान की जाय और रोजगार के नये अवसर पैदा किये जायें, राष्ट्रीय शान्ति व सार्वभौमिक सद्भाव के लिए सभी धर्म आध्यात्मिक आन्दोलन में शामिल हो जायें“
-श्री ए.पी.जे, अब्दुल कलाम, पूर्व राष्ट्रपति, भारत 
साभार - दैनिक जागरण, सम्पादकीय, वाराणसी, दि0 8 दिसम्बर 2002

लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा स्पष्टीकरण 
अच्छी शिक्षा व्यवस्था नहीं बल्कि अच्छा ”शिक्षा पाठ्यक्रम“ प्रबुद्ध नागरिक पैदा करती है। जब शिक्षा पाठ्यक्रम ही ऐसा रहेगा कि शिक्षार्थी के जीवन से तालमेल ही न मिले तो प्रबुद्ध नहीं बल्कि बुद्धि-बद्ध प्रकार के नागरिक पैदा होगें। शिक्षा क्षेत्र का यह दुर्भाग्य है कि जीवन से जुड़ा इतना महत्वपूर्ण विषय ”व्यापार“, को हम एक अनिवार्य विषय के रूप में पाठ्यक्रम में शामिल नहीं कर सकें। इसकी कमी का अनुभव उस समय होता है जब कोई विद्यार्थी 10वीं या 12वीं तक की शिक्षा के उपरान्त किसी कारणवश जैसा कि अधिकतर होता है, आगे की शिक्षा ग्रहण नहीं कर पाता। फिर उस विद्यार्थी द्वारा पढ़े गये विज्ञान व गणित के वे कठिन सूत्र उसके जीवन में अनुपयोगी लगने लगते है। यदि वहीं वह व्यापार के ज्ञान से युक्त होता तो शायद वह जीवकोपार्जन का कोई मार्ग सुगमता से खोजने में सक्षम होता।
अच्छा ”शिक्षा पाठ्यक्रम“ नहीं बल्कि अब ”पूर्ण शिक्षा पाठ्यक्रम“ अर्थात ”सत्य मानक शिक्षा“ की आवश्यकता आ गई है। जिससे शिक्षक और शिक्षार्थी दोनों ही प्रबुद्ध हों जिससे अपने आप ही प्रबुद्ध नागरिक और नैतिक शिक्षा दोनों का ही कार्य सम्पन्न हो जाये। प्रबुद्ध नागरिक पैदा होने से स्वतः ही रोजगार के नये-नये क्षेत्र रचनात्मक-सकारात्मक दिशा से उत्पन्न होने लगेंगे। मनुष्य की व्यस्तता बढ़ती जा रही है। सभी को कम समय में बहुत कुछ चाहिए। तो ऐसी शिक्षा की भी जरूरत है जो कम समय में पूर्ण शिक्षित बना दे। एक व्यक्ति सामान्यतः यदि स्नातक (ग्रेजुएशन) तक पढ़ता है तो वह कितने पृष्ठ पढ़ता होगा और क्या पाता है? विचारणीय है। एक व्यक्ति इंजिनियर व डाॅक्टर बनने तक कितना पृष्ठ पढ़ता है? यह तो होती है कैरियर की पढ़ाई इसके अलावा कहानी, कविता, उपन्यास, फिल्म इत्यादि के पीछे भी मनुष्य अपना समय मनोरंजन के लिए व्यतीत करता है। और सभी एक चमत्कार के आगे नतमस्तक हो जाते हैं तो पूर्ण मानसिक स्वतन्त्रता और पूर्णता कहाँ है? विचारणीय विषय है। 
कुल मिलाकर जो व्यक्ति या देश केवल आर्थिक उन्नति को ही सर्वस्व मानता है वह व्यक्ति या देश एक पशुवत् जीवन निर्वाह के मार्ग पर है-जीना और पीढ़ी बढ़ाना। दूसरे रूप में इसे ऐसे समझा जा सकता है कि ऐसे व्यक्ति जिनका लक्ष्य धन रहा था वे अपने धन के बल पर अपनी मूर्ति अपने घर पर ही लगा सकते हैं परन्तु जिनका लक्ष्य धन नहीं था, उनका समाज ने उन्हें, उनके रहते या उनके जाने के बाद अनेकों प्रकार से सम्मान दिया है और ये सार्वजनिक रूप से सभी के सामने प्रमाणित है। पूर्णत्व की प्राप्ति का मार्ग शारीरिक-आर्थिक उत्थान के साथ-साथ मानसिक-बौद्धिक उत्थान होना चाहिए और यही है ही। इस प्रकार भारत यदि पूर्णता व विश्व गुरूता की ओर बढ़ना चाहता है तब उसे मात्र कौशल विकास ही नहीं बल्कि राष्ट्रीय बौद्धिक विकास की ओर भी बढ़ना होगा। बौद्धिक विकास, व्यक्ति व राष्ट्र का इस ब्रह्माण्ड के प्रति दायित्व है और उसका लक्ष्य है।
राष्ट्र के पूर्णत्व के लिए पूर्ण शिक्षा निम्नलिखित दो शिक्षा का संयुक्त रूप है-

अ - सामान्यीकरण (Generalisation) शिक्षा - यह शिक्षा व्यक्ति और राष्ट्र का बौद्धिक विकास कराती है जिससे व्यक्ति व राष्ट्रीय सुख में वृद्धि होती है।

ब - विशेषीकरण (Specialisation) शिक्षा - यह शिक्षा व्यक्ति और राष्ट्र का कौशल विकास कराती है जिससे व्यक्ति व राष्ट्रीय उत्पादकता में वृद्धि होती है।

वर्तमान समय में विशेषीकरण की शिक्षा, भारत में चल ही रहा है और वह कोई बहुत बड़ी समस्या भी नहीं है। समस्या है सामान्यीकरण शिक्षा की। व्यक्तियों के विचार से सदैव व्यक्त होता रहा है कि - मैकाले शिक्षा पद्धति बदलनी चाहिए, राष्ट्रीय शिक्षा नीति व पाठ्यक्रम बनना चाहिए। ये तो विचार हैं। पाठ्यक्रम बनेगा कैसे?, कौन बनायेगा? पाठ्यक्रम में पढ़ायेगें क्या? ये समस्या थी। और वह हल की जा चुकी है। जो भारत सरकार के सामने सरकारी-निजी योजनाओं जैसे ट्रांसपोर्ट, डाक, बैंक, बीमा की तरह निजी शिक्षा के रूप में पुनर्निर्माण - सत्य शिक्षा का राष्ट्रीय तीव्र मार्ग द्वारा पहली बार इसके आविष्कारक द्वारा प्रस्तुत है।
”राष्ट्रीय शान्ति व सार्वभौमिक सद्भाव के लिए सभी धर्म आध्यात्मिक आन्दोलन में शामिल हो“, आपका यह कथन सत्य आवश्यकता है परन्तु यह सबसे अधिक कठिन कार्य है। एक व्यक्ति का समर्थन वोट द्वारा पूरा विश्व कर सकता है परन्तु धार्मिक-राजनीतिक नेताओं का साथ आकर आध्यात्मिक आन्दोलन करना असम्भव है। क्योंकि आध्यात्मिक आन्दोलन का अर्थ है - आजादी या स्वतन्त्रता। वर्तमान की स्थिति यह है कि व्यक्ति के उपर व्यक्ति, समाज, मत, सम्प्रदाय, राजनीतिक दल इत्यादि अपने स्वयं के उद्देश्य के लिए व्यक्ति के मन का निर्माण कर रहे हैं। और उनका उपयोग/दुरूपयोग अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए कर रहे हैं। ऐसे में कौन समाज, मत, सम्प्रदाय, राजनीतिक दल चाहेगा कि उसके अनुयायी, समर्थक, भक्त मानसिक स्वतन्त्रता की ओर गति करें। यहाँ तो समाज, मत, सम्प्रदाय के नेतागण दूसरे के साहित्य को भी पढ़ने से मना कर रखे हैं। इसलिए ”पूर्ण शिक्षा पाठ्यक्रम“ अर्थात ”सत्य मानक शिक्षा“ ही आध्यात्मिक आन्दोलन एक मात्र उपाय है, जो राष्ट्र की विवशता भी है।


विश्वमानव और स्वामी शिवानन्द (माघ शुक्ल बसन्त पंचमी, सरस्वती जन्मोत्सव, 1932 ई0 में - )

स्वामी शिवानन्द 
(माघ शुक्ल बसन्त पंचमी, सरस्वती जन्मोत्सव, 1932 ई0 में - )

परिचय - 
दण्डी स्वामी शिवानन्द सरस्वती जी बीसवीं शताब्दी के सुविख्यात सन्त धर्म सम्राट स्वामी हरिहरानन्द सरस्वती स्वामी करपात्री जी महाराज (सन् 1902-1982) के कृपापात्र शिष्य हैं और आपने सनातन धर्म के प्रचार-प्रसार में युगान्तकारी योगदान किया है। दण्डी स्वामी शिवानन्द जी का जन्म सन् 1932 ई0 में माघ शुक्ल बसन्त पंचमी, सरस्वती जन्मोत्सव के दिन प्रातः 7 बजे काशी के मणिकर्णिका घाट पर हुआ। दण्डी स्वामी शिवानन्द सरस्वती जी के बचपन का नाम शिवनारायण उपाध्याय था। इनके पिता अयोध्या हनुमानगढ़ी के रहने वाले थे। पिता का नाम भोला नाथ व माता का नाम उमा देवी था। सन् 1948 में इन्होंने करपात्री जी से दीक्षा ग्रहण की। स्वामी शिवानन्द सरस्वती जी ने अपने अथक परिश्रम से काशी की वृहद चैरासी कोस यात्रा की खोज की है। रूद्र प्रताप गौतम जी ने अपनी पुस्तक ”काशी यात्रा“ में लिखा है कि मुगल शासन काल में लुप्त हुई अनेक यात्रा के समान यह यात्रा भी लुप्त हो गई थी। चैरासी कोस परिक्रमा दर्शन यात्रा स्वामी शिवानन्द जी प्रतिवर्ष फाल्गुन शुक्ल प्रतिपदा के दिन प्रातः 8 बजे अपने भक्तों के साथ करते हैं।

दण्डी स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा रचित पुस्तकें-
1. काशी की महिमा, 2. काशी मोक्ष निर्णय, 3. काशी का इतिहास, 4. वाराणसी प्रदक्षिणा यात्रा, 5. पंचकोशी यात्रा, 6. काशी दर्शन, 7. काश्यां मरणान्मुक्ति, 8. सिद्ध सन्तों का चमत्कार, 9. काशी में सिद्ध शिवलिंगो का चमत्कार, 10. काशी में सोमवार से रविवार तक के वार यात्रा, 11. काशी का लघु माहात्म्य, 12. काशी की वार्षिक यात्रा, 13. राम नाम की महिमा, 14. एक दिव्य जीवन दर्शन, 15. काशी की पंचकोशी यात्रा महात्म्य, 16. काशी में प्रत्येक तिथि के दिन के एक वर्ष तक नेम से दर्शन यात्रा महात्म्य, 17. धर्म सम्राट स्वामी करपात्री जी महाराज के यज्ञ चमत्कार और जीवन दर्शन, 18. सन्यास ग्रहण पद्धति, 19. काशी गौरव, 20. वाराणसी महात्म्य, 21. काशी दिव्य दर्शन, 22. काशी का महात्म्य, 23. कामधेनु कलि काशी पंचकोशी माहात्म्य, 24. लोलार्क कुण्ड दर्शन स्नान महिमा, 25. काशी खण्डोक्त काशी दर्शन, 26. काशी की चैरासी कोस परिक्रमा यात्रा, दर्शन-पूजन माहात्म्य, 27. काशी वैभव, 28. काशी दर्शन, 29. काशी रहस्य भाषा टीका हिन्दी, 30. शिव रहस्य हिन्दी भाषा टीका, 31. स्वामी शिवानन्द सरस्वती का जीवन दर्शन

पुस्तक प्राप्ति का स्थान -
1- करपात्री धाम मठ, केदारघाट, वाराणसी (उ0 प्र0)
2- काशी विश्वेश्वर (व्यक्तिगत) मन्दिर, मीरघाट, चैखम्बा संस्कृत भवन, वाराणसी (उ0 प्र0)
3- संकठा प्रसाद, कचैड़ी गली, चैक, वाराणसी (उ0 प्र0)


‘‘काशी की प्राचीन सीमा से बाहर ‘नयी काशी’ की स्थापना आध्यात्मिक व धार्मिक दानों दृष्टिकोण से अनुचित है क्योंकि सृष्टि की उत्पत्ति से लेकर प्रलयकाल तक काशी का स्थान भिन्न नहीं हो सकता ’’ - स्वामी शिवानन्द महाराज, 
साभार - राष्ट्रीय सहारा, वाराणसी, दि0 8-9-98

लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा स्पष्टीकरण 
‘‘स्वामी जी काशी क्या है ? काशी सत्य का प्रतीक है। इसके सत्य अर्थ को समझने के लिए सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त आधारित सृष्टि के उत्पत्ति से प्रलय को व्यक्त करने वाला शिव-शंकर अधिकृत कर्मवेद: प्रथम, अन्तिम तथा पंचम वेद को समझना पड़ेगा। कालभैरव जन्म कथा इसका प्रमाण है। सर्वोच्च मन सें व्यक्त यह पौराणिक कथा स्पष्ट रुप से व्यक्त करती है कि ब्रह्मा और विष्णु से सर्वोच्च शिव-शंकर हैं। चारो वेदों को प्रमाणित करने वाले शिव-शंकर हैं। चार सिर के चार मुखों से चार वेद व्यक्त करने वाले ब्राह्मण ब्रह्मा जब पाँचवे सिर के पाँचवे मुख से अन्तिम वेद पर अधिपत्य व्यक्त करने लगे तब शिव-शंकर के द्वारा व्यक्त उनके पूर्ण रुप कालभैरव ने उनका पाँचवा सिर काट डाला जिससे यह स्पष्ट होता है कि काल ही सर्वोच्च है, काल ही भीषण है, काल ही सम्पूर्ण पापों का नाशक और भक्षक है, काल से ही काल डरता है। अर्थात् पाँचवा वेद काल आधारित ही होगा। पुराणों में ही व्यक्त शिव-शंकर से विष्णु तथा विष्णु से ब्रह्मा को बहिर्गत होते अर्थात् ब्रह्मा को विष्णु के समक्ष तथा विष्णु को शिव-शंकर के समक्ष समर्पित और समाहित होते दिखाया गया है। जिससे यह स्पष्ट होता है कि शिव-शंकर ही आदि और अन्त हैं। अर्थात् जो पंचम वेद होगा वह अन्तिम वेद होगा, साथ ही प्रथम वेद भी होगा। शिव-शंकर ही प्रलय, स्थिति और सृष्टिकर्ता हैं। चूँकि वेद शब्दात्मक होते हैं इसलिए पंचम वेद शब्द से ही प्रलय, स्थिति और सृष्टिकर्ता होगा। पुराण-शास्त्र को रचने वाले व्यास हैं तो पुराण जिस कला से रची गयी है वह व्यास ही बता सकते हैं या जो शास्त्र रचने की योग्यता रखता हो। सृष्टि की उत्पत्ति और प्रलय या प्रलय और उत्पत्ति की क्रिया उसी भाँति है जैसे जन्म के बाद मृत्यु, पुनः मृत्यु के बाद जन्म अर्थात् उत्पत्ति और प्रलय या जन्म और मृत्यु एक ही विषय हैं इसलिए ही कहा जाता है कि जो प्रथम है वहीं अन्तिम है। कर्मवेद में सृष्टि की उत्पत्ति से प्रलय को व्यक्त किया गया है जिसके बीच सात चरण है और यही सात काशी है। यदि गिने तो प्रलय प्रथम तथा उत्पत्ति अन्तिम व सातवाँ चरण है। इस प्रकार उत्पत्ति व प्रलय अलग-अलग दिखाई पड़ते हुए भी एक हैं। सृष्टि के विकास क्रम में ही मनुष्य की सृष्टि है यह जैसे-जैसे प्राकृतिक नियम से दूर होता जाता है वह पतन की अवस्था को प्राप्त होता जाता है जिसकी निम्नतम अवस्था पशुमानव अर्थात् पूर्णतः इन्द्रिय के वश में संचालित होने वाली अवस्था है। अब यदि यह पशुमानव अवस्था चरम शिवत्व की स्थिति तक उठना चाहे तो उसे मानवीय व प्राकृतिक मूल पाँच चरणों को पार करना पड़ता है। यदि वह अन्तः जगत अर्थात् सार्वभौम सत्य ज्ञान से सृष्टि की उत्पत्ति की ओर जाता है तब वह योगेश्वर की अवस्था प्राप्त करता है। यदि वह वाह्य जगत् अर्थात् सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त ज्ञान से सृष्टि के प्रलय की ओर जाता है तब वह भोगेश्वर की अवस्था प्राप्त करता है। योगेश्वर व भोगेश्वर एक ही हैं बस एक अवस्था में दूसरा प्राथमिकता पर नहीं होता है। इस प्रकार सृष्टि के आदि में काशी और अन्त में सत्यकाशी व्यक्त होता है। इनके बीच पाँच अन्य काशी होती हैं। इस क्रमानुसार काशी: पंचम, प्रथम तथा सप्तम काशी तथा सत्यकाशी: पंचम, अन्तिम तथा सप्तमकाशी की स्थिति में होता है। योगेश्वर अवस्था ही अदृश्य विश्वेश्वर की अवस्था है तथा भोगेश्वर अवस्था ही दृश्य विश्वेश्वर की अवस्था है जबकि दोनों एक हैं और प्रत्येक वस्तु की भाँति एक-दूसरे के दृश्य और अदृश्य रुप हैं। इसलिए ही विष्णु और शिव-शंकर को एक दूसरे का रुप कहते हैं।
स्वामी जी, बिना गुण के अन्य काशीयों की स्थापना तो आध्यात्मिक एवं धार्मिक दोनों दृष्टिकोण से निश्चित ही अनुचित है परन्तु गुण-धर्म से युक्त स्थान व सीमा में काशी की स्थापना अनुचित नहीं उचित है। अब जबकि पाँच मुख वाले महादेव शिव-शंकर का वेद-कर्मवेद व्यक्त हो चुका है। सभी काशीयों का व्यक्त होना भी अतिआवश्यक है। क्योंकि अनेक तीर्थस्थलों को व्यक्त करने से मनुष्य की सृष्टि में कैसे-कैसे लाभ होते हैं यह तो आप सब भली-भाँति जानते हैं। आद्य शंकराचार्य जी ने भी भारत के चारों दिशाओं में चार पीठों की स्थापना उसी लाभ के लिए किये थे। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में सभी वस्तु का प्रसार हो रहा है इसलिए अब समय आ गया है कि काशी का भी प्रसार हो क्योंकि प्रसार ही जीवन है। संकुचन ही मृत्यु है। ‘नयी काशी’ योजना का उचित स्थान (रामनगर से पड़ाव) पर निर्माण किसी भी दृष्टि से अनुचित नहीं है। क्योंकि रामनगर में शिवभक्त और शिव के अवतार माने जाने वाले महाराजा काशी नरेश तथा पड़ाव में शिव की एक धारा- अघोर के अवधूत भगवान राम का आश्रम व समाधि स्थल है तथा काशी का सम्बन्ध सत्य-धर्म-ज्ञान से है। सृष्टि की उत्पत्ति से लेकर प्रलयकाल तक काशी का स्थान भिन्न नहीं हो सकता परन्तु काशी एक नहीं बल्कि सात काशियों का संयुक्त रूप है, जो पुराणों में वर्णित भी है और सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के उत्पत्ति और अन्त को प्रदर्शित करता शिव अधिकृत कर्मवेदः प्रथम, अन्तिम तथा पंचमवेद में सात सत्य चक्र भी है जो सात काशियों को व्यक्त करते हैै जिसके अनुसार काशी (वाराणसी) पंचम, प्रथम तथा सप्तम एवं (वाराणसी)-विन्ध्याचल-शिवद्वार-सोनभद्र के बीच का सत्यकाशी-पंचम, अन्तिम तथा सप्तम काशी है जो शिव-शक्ति क्षेत्र है और पौराणिक भूमि भी है। सम्पूर्ण विश्व को मार्गदर्शन देने की ज्ञान बुद्धि भी अब सत्यकाशी क्षेत्र से व्यक्त हो चुका है। काशी मोक्षदायिनी जरुर है परन्तु विश्व को जीवन देने वाली जीवनदायिनी तो सत्यकाशी ही है क्योंकि इसी क्षेत्र से जीवन शास्त्र ”विश्वशास्त्र“ व्यक्त हुआ है। मोक्ष तभी मिलता है जब जीवन मिलता है और जीवन तभी मिलता है जब मोक्ष मिलता है। इसलिए काशी और सत्यकाशी एक ही है अन्तर मात्र प्रसार का है। यह सत्य है कि अदृश्य शिव अकेले रह सकते हैं परन्तु दृश्य शिव-शंकर तो शक्ति के बिना रह नहीं सकते इसका ही परिणाम है शक्ति क्षेत्र-सत्यकाशी में दृश्य शिव-शंकर का व्यक्त होना।
स्वामी जी, आपने भविष्य पुराण का उदाहरण देते हुए कहा है कि- ‘‘ग्यारह टोपी (राष्ट्रपति) तक मतपत्रों का राज्य चलेगा इसके बाद किसी पार्टी को बहुमत प्राप्त नहीं होगा। माता-पिता, साधु-सन्त, ब्राह्मण-विद्वान अपमानित होंगे। तब भयानक युद्ध होगा। भारत पुनः अपने अस्तित्व में आकर विश्वगुरु पद पर स्थापित होगा।’’ वह समय तो वर्तमान में चल रहा है जो भी अपना गुण-धर्म त्यागता है वह अपमानित होने का रास्ता स्वयं निर्माण करता है। ऐसे ही अपमानित कोई भी नहीं करता बल्कि वे जिस पद जैसे- माता-पिता, साधु-सन्त, ब्राह्मण-विद्वान पर बैठे रहते हैं। उसका भी धर्म निर्वहन नहीं करते परिणामस्वरुप सत्य-धर्म-ज्ञानियों के लिए वे न तो सम्मान के योग्य होंगे न ही अपमान के। भारत पुनः अपने अस्तित्व में आकर विश्व गुरु पद पर स्थापित होगा। यह बात तो सत्य है परन्तु यह स्वतः नहीं हो जायेगा कोई न कोई तो इसका माध्यम अवश्य बनेगा और वह अन्तिम माध्यम ही शिव-शंकर के पूर्णावतार के रूप में होगा क्योंकि ब्रह्मा के पूर्णावतार श्रीराम तथा विष्णु के पूर्णावतार श्रीकृष्ण हो चुके हैं। इसलिए तीसरे नेत्र कीें दृष्टि से सत्यकाशी के निर्माण में काशी को ही अग्रसर होना चाहिए। यह काशी के लिए सम्मानजनक होगा। 
काशी का स्थान, निर्माण, रक्षा और प्रसार महादेव विश्वेश्वर भगवान भोले शंकर के अधीन है और उनकी पहचान है-अनासक्त एकात्म ज्ञान, एकात्म कर्म एवं एकात्म ध्यान के संगम की व्यक्त अवस्था अर्थात् ऐसा सर्वोच्च और अन्तिम ज्ञान तथा कर्म जो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड (तीनों लोंको) के काल्याणार्थ अन्तिम रास्ता हो, समस्त विश्व एक मात्र कर्म के लिए बद्ध हो और ज्ञान से मुक्त हो। दर्शन के मुख्य तीन स्तर-अद्वैत, विशिष्टाद्वैत तथा द्वैत की स्थिति अदृश्य काल में अदृश्य तथा दृश्य काल में दृश्य की स्थिति होती है। वर्तमान समय चक्र की स्थिति दृश्य काल के दृश्य विशिष्टाद्वैत की स्थिति की ओर है। ऐसी स्थिति में सम्पूर्ण दृश्य जगत को ही सत्य मानकर व्यक्ति कार्य करते हैं। यही भौतिकवाद की स्थिति भी है। ध्यान का विषय है-शिव से काशीवासी और काशी है या काशीवासी और काशी से शिव हैं। यह भी ध्यान रहे कि व्यासजी द्वारा काशी को शाप देने के कारण विश्वेश्वर ने व्यासजी को काशी से निष्कासित कर दिया था। तब व्यासजी लोलार्क मन्दिर के आग्नेय कोण में गंगाजी के पूर्वी तट पर स्थित हुए। इस घटना का उल्लेख काशी खण्ड में इस प्रकार है-
लोलार्कादं अग्निदिग्भागे, स्वर्घुनी पूर्वरोधसि। 
स्थितो ह्यद्यापि पश्चेत्सः काशीप्रासाद राजिकाम्।। 
- स्कन्दपुराण, काशी खण्ड 96/201
और गंगा पार क्षेत्र से ही जीवन शास्त्र ”विश्वशास्त्र“ व्यक्त हुआ है। ध्यान का विषय है-शिव से काशीवासी और काशी है या काशीवासी और काशी से शिव हैं’’


विश्वमानव और राजीव गाँधी (20, अगस्त, 1944 - 21 मई, 1991)

राजीव गाँधी (20, अगस्त, 1944 - 21 मई, 1991)

परिचय -
राजीव गाँधी का जन्म 20, अगस्त, 1944 को हुआ था। वे श्रीमती इन्दिरा गाँधी के पुत्र और जवाहरलाल नेहरू के पौत्र थे। राजीव का विवाह एन्टोनिया मैनो से हुआ जो उस समय इटली की नागरिक थीं। विवाहोपरान्त उनकी पत्नी ने नाम बदलकर सोनिया गाँधी कर लिया। कहा जाता है कि राजीव गाँधी से मुलाकात तब हुई जब राजीव कैम्ब्रिज में पढ़ने गये थे। उनकी शादी 1968 ई. में हुई जिसके बाद वे भारत में रहने लगी। राजीव व सोनिया के दो बच्चे हैं- पुत्र राहुल गाँधी (जन्म 19 जून, 1970) और पुत्री प्रियंका गाँधी (जन्म 12 जनवरी, 1972) जिनका विवाह राबर्ट वड्रा से हुआ है। राजीव गाँधी की राजनीति में कोई रूचि नहीं थी और वो एक एयरलाइन पायलट की नौकरी करते थे। आपातकाल के उपरान्त जब इन्दिरा गाँधी को सत्ता छोड़नी पड़ी थी, तब कुछ समय के लिए राजीव परिवार के साथ विदेश में रहने चले गये थे। परन्तु 1980 ई. में अपने छोटे भाई संजय गाँधी की एक हवाई जहाज दुर्घटना में असामयिक मृत्यु के बाद माता इन्दिरा को सहयोग देने के लिए सन् 1982 में राजीव गाँधी ने राजनीति में प्रवेश लिया, वो अमेठी उ0प्र0 से लोकसभा का चुनाव जीत कर सांसद बने। 31 अक्टुबर, 1984 ई. को सिख आतंकवादीयों द्वारा प्रधानमंत्रीं इन्दिरा गाँधी का हत्या किये जाने के बाद उनके पुत्र राजीव गाँधी प्रधानमंत्री बनें। और अगले चुनावों में भारी बहुमत के साथ भारत के 9वें प्रधानमंत्री बने थे। उनके प्रधानमंत्रीत्व काल में भारतीय सेना द्वारा बोफोर्स तोप की खरीददारी में लिये गये किकबैक (कमीशन या घूस) का मुद्दा उछला, जिसका मुख्य पात्र इटली का एक नागरिक ओटावियो क्वात्रोची था, जो कि सोनिया गाँधी का मित्र था। उसके बाद 1989 ई. के आम चुनावों में कांग्रेस की हार हुई और पार्टी 2 वर्ष तक विपक्ष में रही। अगले चुनावों में कांग्रेस के जीतने और राजीव गाँधी के पुनः प्रधानमंत्री बनने की पूरी सम्भावना थी, परन्तु 21 मई, 1991 ई. को तमिल आतंकवादीयों ने राजीव गाँधी की एक बम विस्फोट में हत्या कर दी।


”यह समय की माँग है कि जीवन के सभी क्षेत्रों में गुणता के प्रति राष्ट्रीय प्रतिबद्धता हो। हमारी संतुष्टि किसी भी प्रकार के उत्पादन से नहीं अपितु हमारे द्वारा उत्पादित उत्कृष्ट वस्तुओं और दी जाने वाली उत्कृष्ट सेवाओं से हो।“
- श्री राजीव गाँधी
(भारतीय मानक ब्यूरो त्रैमासिकी- ”मानक दूत“, वर्ष-20, अंक- 1-2, 2000 से साभार)

श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा स्पष्टीकरण
दो या दो से अधिक माध्यमों से उत्पादित एक ही उत्पाद के गुणता के मापांकन के लिए मानक ही एक मात्र उपाय है। सतत् विकास के क्रम में मानकों का निर्धारण अति आवश्यक कार्य है। उत्पादों के मानक के अलावा सबसे जरुरी यह है कि मानव संसाधन की गुणता का मानक निर्धारित हो क्योंकि राष्ट्र के आधुनिकीकरण के लिए प्रत्येक व्यक्ति के मन को भी आधुनिक अर्थात् वैश्विक-ब्रह्माण्डीय करना पड़ेगा। तभी मनुष्यता के पूर्ण उपयोग के साथ मनुष्य द्वारा मनुष्य के सही उपयोग का मार्ग प्रशस्त होगा। उत्कृष्ट उत्पादों के लक्ष्य के साथ हमारा लक्ष्य उत्कृष्ट मनुष्य के उत्पादन से भी होना चाहिए जिससे हम लगातार विकास के विरुद्ध नकारात्मक मनुष्योें की संख्या कम कर सकें। भूमण्डलीकरण सिर्फ आर्थिक क्षेत्र में कर देने से समस्या हल नहीं होती क्योंकि यदि मनुष्य के मन का भूमण्डलीकरण हम नहीं करते तो इसके लाभों को हम नहीं समझ सकते। आर्थिक संसाधनों में सबसे बड़ा संसाधन मनुष्य ही है। मनुष्य का भूमण्डलीकरण तभी हो सकता है जब मन के विश्व मानक का निर्धारण हो। ऐसा होने पर हम सभी को मनुष्यों की गुणता के मापांकन का पैमाना प्राप्त कर लेगें, साथ ही स्वयं व्यक्ति भी अपना मापांकन भी कर सकेगा। जो विश्व मानव समाज के लिए सर्वाधिक महत्व का विषय होगा। विश्व मानक शून्य श्रृंखला मन का विश्व मानक है जिसका निर्धारण व प्रकाशन हो चुका है जो यह निश्चित करता है कि समाज इस स्तर का हो चुका है या इस स्तर का होना चाहिए। यदि यह सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त आधारित होगा तो निश्चित ही अन्तिम मानक होगा।
मानव एवम् संयुक्त मानव (संगठन, संस्था, ससंद, सरकार इत्यादि) द्वारा उत्पादित उत्पादों का धीरे-धीरे वैश्विक स्तर पर मानकीकरण हो रहा है। ऐसे में संयुक्त राष्ट्र संघ को प्रबन्ध और क्रियाकलाप का वैश्विक स्तर पर मानकीकरण करना चाहिए। जिस प्रकार औद्योगिक क्षेत्र अन्तर्राष्ट्रीय मानकीकरण संगठन (International Standardisation Organisation-ISO) द्वारा संयुक्त मन (उद्योग, संस्थान, उत्पाद इत्यादि) को उत्पाद, संस्था, पर्यावरण की गुणवत्ता के लिए ISO प्रमाणपत्र जैसे- ISO-9000 श्रंृखला इत्यादि प्रदान किये जाते है उसी प्रकार संयुक्त राष्ट्र संघ को नये अभिकरण विश्व मानकीकरण संगठन (World Standardisation Organisation-WSO) बनाकर या अन्र्तराष्ट्रीय मानकीकरण संगठन को अपने अधीन लेकर ISO/WSO-0 का प्रमाण पत्र योग्य व्यक्ति और संस्था को देना चाहिए जो गुणवत्ता मानक के अनुरूप हों। भारत को यही कार्य भारतीय मानक व्यूरो (Bureau of Indiand Standard-BIS) के द्वारा IS-0 श्रंृखला द्वारा करना चाहिए। भारत को यह कार्य राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली (National Education System-NES) व विश्व को यह कार्य विश्व शिक्षा प्रणाली (World Education System-WES) द्वारा करना चाहिए। जब तक यह शिक्षा प्रणाली भारत तथा संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा जनसाधारण को उपलब्ध नहीं हो जाती तब तक यह ”पुनर्निर्माण“ द्वारा उपलब्ध करायी जा रही है। 


विश्वमानव और राजीव दीक्षित (30 नवम्बर 1967 - 30 नवम्बर 2010)

राजीव दीक्षित (30 नवम्बर 1967 - 30 नवम्बर 2010)


परिचय - 
राजीव दीक्षित (30 नवम्बर 1967 - 30 नवम्बर 2010) एक भारतीय वैज्ञानिक, प्रखर वक्ता और आजादी बचाओ आन्दोलन के संस्थापक थे। बाबा रामदेव ने उन्हें भारत स्वाभिमान (ट्रस्ट) के राष्ट्रीय महासचिव का दायित्व सौंपा था, जिस पद पर वे अपनी मृत्यु तक रहे। वे राजीव भाई के नाम से अधिक प्रसिद्ध थे।
राजीव दीक्षित का जन्म उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जनपद की अतरौली तहसील के नाह गाँव में राधेश्याम दीक्षित एवं मिथिलेश कुमारी के यहाँ 30 नवम्बर 1967 को हुआ था। वे अविवाहित थे। फिरोजाबाद से इण्टरमीडिएट तक की शिक्षा प्राप्त करने के उपरान्त उन्होंने इलाहाबाद से बी० टेक० तथा भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान कानपुर से एम० टेक० की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने कुछ समय भारत के सी.एस.आई.आर तथा फ्रांस के टेलीकम्यूनीकेशन सेण्टर में काम भी किया। तत्पश्चात् वे भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ॰ ए. पी. जे. अब्दुल कलाम के साथ जुड़ गये। इसी बीच उनकी प्रतिभा के कारण सी.एस.आई.आर में कुछ परियोजनाओ पर काम करने और विदेशो में शोध पत्र पढने का मौका भी मिला। वे भगतसिंह, उधमसिंह, और चंद्रशेखर आजाद जैसे महान क्रांतिकारियों से प्रभावित रहे। बाद में जब उन्होंने गांधीजी को पढ़ा तो उनसे भी प्रभावित हुए।
राजीव दीक्षित ने 20 वर्षों में लगभग 12000 से अधिक व्याख्यान दिये। भारत में 5000 से अधिक विदेशी कम्पनियों के खिलाफ उन्होंने स्वदेशी आन्दोलन की शुरुआत की। उन्होंने 9 जनवरी 2009 को भारत स्वाभिमान ट्रस्ट का दायित्व सँभाला।
राजीव दीक्षित ने स्वदेशी आन्दोलन तथा आजादी बचाओ आन्दोलन की शुरुआत की तथा इनके प्रवक्ता बने। उन्होंने जनवरी 2009 में भारत स्वाभिमान न्यास की स्थापना की तथा इसके राष्ट्रीय प्रवक्ता एवं सचिव बने।
30 नवम्बर 2010 को दीक्षित को अचानक दिल का दौरा पड़ने के बाद पहले भिलाई के सरकारी अस्पताल ले जाया गया उसके बाद अपोलो बी०एस०आर० अस्पताल में दाखिल कराया गया। उन्हें दिल्ली ले जाने की तैयारी की जा रही थी लेकिन इसी दौरान स्थानीय डाक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। डाक्टरों का कहना था कि उन्होंने एलोपैथिक इलाज से लगातार परहेज किया। चिकित्सकों का यह भी कहना था कि दीक्षित होम्योपैथिक दवाओं के लिये अड़े हुए थे। अस्पताल में कुछ दवाएँ और इलाज से वे कुछ समय के लिये बेहतर भी हो गये थे मगर रात में एक बार फिर उनको गम्भीर दौरा पड़ा जो उनके लिये घातक सिद्ध हुआ।

लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ द्वारा स्पष्टीकरण 
एक आकर्षक, निर्भिक, सत्य स्वरूप, ज्ञानी, बालमन व्यक्तित्व। जिन्होंने अपने जीवन के कम समय में ही बहुत सारे अलग-अलग विषयों से सम्बन्धित सत्य विचार व्यक्त कर दिये। स्वदेश व स्वाभिमान के लिए उनका जीवन समर्पित था। आयें और अपना कर्तव्य पूरा किये। 
शायद वो जन्म का ग्रह-नक्षत्र, काल अवधि ही ऐसी रही होगी जिसने बाबा रामदेव (25 दिसम्बर, 1965), मैं लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ (16 अक्टुबर 1967) और राजीव दीक्षित (30 नवम्बर 1967) का जन्म भारत में हुआ। जो अपने-अपने क्षेत्र में राष्ट्र के लिए विशेष योगदान दिये।
राजीव भाई से सीधा मेरा कोई परिचय नहीं था लेकिन आजादी बचाओ आन्दोलन के बारे में मैं जानता था। मैं उस समय की एक घटना को बताना चाहूँगा, जब भारत देश में वैट (वैल्यू एडेड टैक्स) लागू किया जाना था और हथुआ मार्केट, लहुराबीर (वाराणसी) के सामने उनका व्याख्यान चल रहा था। हल्की बारिश हो रही थी और मैं उधर से चेतगंज पैदल जा रहा था। मैं रूका और उनके व्याख्यान को सुनने लगा। वहाँ मैं उनके निम्नलिखित 3 बिन्दुओं पर गौर किया जिस पर साधारणतया आम जनता खुद को सम्बन्धित नहीं समझती परन्तु विचारणीय है-
1. उनका कहना था कि बहुत कम लोग जानते हैं कि प्रधानमंत्री बनने गईं श्रीमती सोनिया गाँधी, राष्ट्रपति भवन से निकलते ही त्यागमूर्ति कैसे बन गईं। भारत के संविधान के अनुसार भारत देश में जन्म न लेने वाले किसी व्यक्ति के प्रधानमंत्री बनने पर सेना उसके आदेश को मानने के लिए बाध्य नहीं हैं। ऐसा तत्कालीन राष्ट्रपति श्री ए.पी.जे.अब्दुल कलाम जी ने उन्हें बताया था। और प्रधानमंत्री बनने गईं श्रीमती सोनिया गाँधी, राष्ट्रपति भवन से निकलते ही त्यामूर्ति बन गईं। और श्री मनमोहन सिंह जी को वो प्रधानमंत्री बना दीं। त्यागमूर्ति भी बन गईं और श्रीमती इन्दिरा गाँधी हत्या काण्ड के समय से कांग्रेस से नाराज सिख समुदाय भी खुश हो गया।
2. उनका कहना था कि एक प्रधानमंत्री (नाम नहीं लिये थे) जी से मैंने यह कहा कि अनेक प्रकार के टैक्स लगाने से अच्छा है कि देश के नाम पर जनता से दान माँग लिया जाय। भारत की जनता इस प्रवृत्ति की है कि आपके टैक्स वसूली से ज्यादा आपको दान दे देगी। वैसे भी देश पर आये विपत्ति के समय सरकार से पहले और सरकार से ज्यादा तो जनता और व्यावसायिक संगठन पहुँचती भी है और देती भी हैै। तो उन प्रधानमंत्री जी का सीधा जबाब था कि तब हम उन पर डण्डा कैसे चलायेगें? डण्डा चलाने के लिए ये सब टैक्स आवश्यक है।
3. उनका कहना था कि मेरे एक मित्र मुम्बई के हैं जिनका व्यवसाय बहुत बड़ा है और वे 30 सी.ए. (चार्टड एकाउण्टेन्ट) टैक्स बचाने के लिए लगा रखे थे। मैंने उनसे कहा कि ये 30 सी.ए. पर जितना खर्च आ रहा है उससे तो अच्छा ये है कि टैक्स ही दे दिया जाये। तो मेरे व्यवसायी मित्र ने कहा कि ये 30 सी.ए. को जो मैं दे रहा हूँ वो उनके मेहनत का है पर जो टैक्स चला जायेगा वो उनके पास जायेगा जो हमारे ही दिये पैसे पर एैश करते हैं।
वाह, राजीव भाई वाह। अमर रहें आप। विचारों का बीज आपने बो दिया है। वह वृक्ष अवश्य बनेगा। समय अपनी कढ़ाही में उसे पकायेगा अवश्य।