Thursday, April 16, 2020

सबका सार 01. सरकारी प्राणी 02. गैर सरकारी प्राणी 03. जनता

सबका सार
01. सरकारी प्राणी  02. गैर सरकारी प्राणी    03. जनता

हमारी पूरी पृथ्वी पर केवल तीन किस्म के प्राणी हैं-
01. सरकारी प्राणी, 
02. गैर सरकारी प्राणी, 
03. जनता। 
यह तीनों एक-दूसरे के पूरक हैं और तीनों एक-दूसरे के लिए हैं। हमेशा से केवल दो किस्म के प्राणी रहे हैं क्योंकि मनुष्य की महत्वकांक्षाएँ असिमित हैं। जिनका ध्येय केवल बढ़ोत्तरी और आने वाली नस्ल अच्छी हो, सुख समृद्धि बरकरार रहे। इसलिए बड़ों ने मनुष्य में नारी, पुरूष को ध्यान में रखते हुए, हर कोशिश की कि ज्ञान और विज्ञान के प्रति सचेत रहें। नियम, धर्म, कानून बनायें। जाति और धर्म, उनके कर्म के मुताबिक निर्धारित की। (सो पण्डितु जो मनु परबोधे, रामु नामु आतम महि सोधै -गुरू ग्रंथ साहिब)। अपराधिक प्रवृत्ति के लोगों ने मनुष्य में भी मनुष्य को, हिन्दू, मुसलमान, सिख, इसाई में बाँटा। इससे भी सन्तुष्टि न होने पर या आचरण में अन्तर के कारण, हर जाति में दो किस्में बनाई जिसमें भी गलत अहंकार या अपराधिक प्रवृत्ति है, वह कभी शान्ति से नहीं बैठ सकते। जैसे मुसलमान में, शिया और सुन्नी, दोनों में छोटा कोई बनना ही नहीं चाहता और इस प्रकार अपराधिक तत्व या गलत नेता आये। दिन-रात, मार-काट, लड़ाई-झगडे़ करवाते हंै।
अब तक राजा-महाराजाओं का जमाना था और सन् 1947 से पहले केवल गैर सरकारी और सरकारी प्राणी ही थे। गैर सरकारी प्राणी में सरकारी नौकर (कर्मचारी) को छोड़ कर, सब प्राणी आते है और गैर सरकारी $ गैर सरकारी प्राणी = जनता या प्रजा कहलायी जाती थी। आजादी के बाद राजा-महाराजाओं को खत्म किया गया। पहले सरकारी प्राणी को पगार राजा के द्वारा राजकोष से दी जाती थी। राजाओं के खत्म होने पर सरकारी प्राणी सही काम को और ज्यादा सही व तेज करे, इसलिये नेता ग्रुप बनाया गया। इन नेताओं में कोई कोताही न हो, यह गद्दारी न कर सके, इसलिये इनकी कार्य अवधि ज्यादा से ज्यादा 5 साल रखी गई।
पहले छोटे-छोटे राजा और रजवाड़ों में देश बंटा था। लेकिन बडे़ राजा या छोटे राजा, राज और बढ़ाने के चक्कर में, एक-दूसरे पर चढ़ाई करते थे, जिसमें मार-काट होती थी। जिसमें जनता या प्रजा ज्यादा पिसती थी। अब नेता ग्रुप जनता के वोट से ही चलने वाला ग्रुप बनाया गया, जिसमें राष्ट्रपति, प्रधानामंत्री, मंत्री, चेयरमैन, सभासद, सेक्रेटरी, प्रधान आदि बनाये गये। जिससे हर प्राणी सुख से रहे, कानून के हाथ मजबूत हों।
उनकी सबकी बाग-डोर क्रमशः सभासद की चेयरमैन, प्रधान की सेकेट्ररी, सेकेट्ररी की नेता, नेता की मंत्री के हाथ, मंत्री की बागडोर, केन्द्रीय मंत्री, केन्द्रीय मंत्री की बागडोर प्रधानमंत्री, प्रधानमंत्री की बाग-डोर राष्ट्रपति और राष्ट्रपति की बाग-डोर सुप्रिम न्यायमूर्ती और इनकी यूनिटी के हाथों में रखी गयी। ध्येय केवल कर्मठ व वफादार बनाकर रखना और हर सरकारी महकमों की कमर्ठता वफादारी बढ़ाना ही था। सुधार रखना-करना, 
हर अनियमितता खत्म करना ही था।

करनी करे तो क्यों डरें, करके क्यों पछताये, 
बोया पेड़ बबूल का, तो आम कहांँ से खाये?
जो करनी करने वाला है, वह करता है, कहता कब है, 
ये तो मशहूर कहावत है, जो गरजा है बरसा कब है?
जो कल करे, सो आज कर, जो आज करे, सो अब, 
पल में परलय होयेगी, बहुरी करेगा कब?


01. सरकारी प्राणी
जनता का सेवक, सरकार का नौकर, देश का चालक व रक्षक
सृष्टि बनने के बाद इंसान के पैदा होते ही सेवक का वजूद भी बना होगा। यह पदवी बेहद बड़ी श्रद्धा से ओत-प्रोत और बड़ी इज्जत वाली है। पहले-पहल बाप, माँ, बहन, भाई या कोई भी पत्नी जैसा सम्बन्धी अपने बड़े की सेवा करता होगा। गुरू के पास धर्मस्थल पर, आश्रम या स्कूल में, सब जगह आज भी सेवक न हो, नामुमकिन है। यह सेवक मनुष्य में ही नहीं जीव-जन्तुआंे, पेड़-पोधों तक में निश्चित है।
सेवक वह कहलाता है जिसके काम की कोई उजरत, पगार नहीं दी जाती या नहीं होती। इसलिये यह पदवी और खुद सेवक शब्द बेहद इज्जत का शब्द है, महानता का प्रतीक है। जब से पृथ्वी बनी है और जब तक रहेगी यह पदवी, गुण, नाम निश्चित रहेगा। यह प्राणी अपने बड़े, अजीज या प्रेमी के काम करने पर या सेवा करने पर सेवक बनता है। भगवान, वाहेगुरू, अल्लाह, गाॅड तक के साथ में यह शब्द जुड़ा है। कहीं-कहीं धर्मग्रन्थों में नारी की सेवा करते हुए महान पुरूष पति को दर्शाया गया है। यह भक्ति का बेहद बड़ा रूप भी है, जो मनुष्य के पैदा होते ही बनाया गया, चलन में आया। इसके बाद किसी भी कारणवश, जब सेवक को उजरत या पगार देने का चलन चला तो वह नौकर कहलाने लगा।
सेवा का कोई मोल कभी कुछ नहीं हुआ। छोटी सी सेवा के बदले सेवा कराने वाला क्या दे दें, कुछ पता नहीं। अनेक सबूत हैं, लगभग सब जानते हैं, सब करते हंै और करते रहेंगे। लेकिन नौकर बनते ही उसकी उजरत निश्चित कर दी जाती है। पहले-पहल यह उजरत अनाज, कपड़ा या रोजमर्रा की जरूरत की चीजें जैसी चीज जो इस्तेमाल की चीजें है, दी जाती रही हैं और बाद में धन का चलन चला। कौड़ी, (धन की सबसे छोटी इकाई थी)। जैसे आजकल पैसा। पहले इस्तेमाल की चीज, फिर धन और इस समय केवल रुपये से पगार का चलन है। मुखिया घर के, पहले बने फिर यह पद बढ़कर राजा-महाराजा और चक्रवर्ती राजा पद पर पूरा हुआ और वहाँ नौकर की श्रेष्ठता बरकरार निश्चित रही।
गैर सरकारी हो या राजा हो, नौकर के बिना काम नहीं चलता। राजा या प्रधान जो जनता से सम्बन्धित बड़ा होता है उसके नौकर को हम सरकारी प्राणी मानते हैं, कहते हैं क्योंकि उसकी पगार, प्रधान, मुखिया या सरकार निश्चित करती है और देती है। इनके काम, नियम, कानून, समय भी उनके बड़े या उनके अनुयायी ही निश्चित करते हैं। राजा के नौकर को खूबसूरत नाम दिया गया ”सरकारी नौकर“। सरकारी नाम जुड़ते ही उसकी इज्जत और कीमत अपने आप बढ़ जाती है। राजा, महाराजा शुरू से जनता के लिये कुछ न कुछ करते रहे और आगे भी करते रहेंगे। टैक्स का प्रचलन चला, हर काम के लिये अलग-अलग नौकर रखे गये और उनके अधिकारी रखे गये। आगे चलकर वह विभाग में तब्दील कर दिये गये। नौकर को हैंडिल करने के लिये, जिससे सही समय में सही काम कर सके, साथ ही उनकी किसी गलती पर उन्हें सजा दी जा सके। क्योंकि हर कर्मचारी या पगार लेने वाले नेचुरल, आलसी, नमक हराम, सुस्त व गद्दार होते जाते हैं। इनको वफादार कर्मठ रखने की ड्यूटी अधिकारी की होती है, अधिकारी की जिम्मेदारी होती है। इसके अलावा भी बेहद जरूरी ड्यूटी होती है, गैर सरकारी को सुरक्षित रखना। अगर किसी को अकस्मात परेशानी आती है, तो आॅन द स्पाॅट उसको बचाना, उसकी सहायता करना। क्योंकि हमारा गैर सरकारी प्राणी हमेशा हर जगह टैक्स देता है, जिससे सारे कर्मचारी, अधिकारी व नेता की हर रिक्वायरमेंट पूरी होती हैं। सबकी पगार इन्हीं के कारण मिलती है। सरकारी प्राणी के लिये, गैर सरकारी, उपभोक्ता या भगवान का रूप होता है। इस पर कोई एक भी परेशानी हो, तो पूरी सरकार पर गलत असर पड़ता है। इसलिए अपने विभाग की ड्यूटी के साथ-साथ हर गैर सरकारी प्राणी का पूरा ध्यान रखना अतिआवश्यक है। हर कर्मचारी, अधिकारी को सोचना चाहिये कि यह गैर सरकारी प्राणी आपके विभाग का कभी भी 10 पैसे का फायदा कर सकता है। आज नहीं तो कल या आने वाले कल में फायदा करेगा निश्चित है। सच्चाई में सारे सरकारी प्राणी एक बिरादरी के हैं और कोई भी गैर सरकारी प्राणी किसी न किसी सरकारी विभाग का उपभोक्ता निश्चित ही है।
गरीब से गरीब गैर सरकारी भी आपके किसी सरकारी प्राणी के काम निश्चित रूप से आता है। इसलिये उसकी सुरक्षा बेहद जरूरी है। हर सरकारी प्राणी को सुविधा, अच्छी पगार, मकान, दवा, बच्चों की पढ़ाई, रिटायरमेन्ट पर पैसा, बीमा, नौकरी के बाद और मरने के बाद भी फेमली को नौकरी और फेमली पेंशन तक दी जाती है। यही नहीं यह सब भी केवल सरकारी प्राणी के द्वारा ही चुना गया है या उनकी इच्छा से ही निश्चित किया गया। केवल गैर सरकारी प्राणी जो जीवन भर पूरे देश के लिये करता रहता है, जीता है, मरता है। लेकिन उसके परेशान होने या मरने का कारण भी किसी न किसी सरकारी विभाग की अनियमितता ही होती है। आप ध्यान दंेगे, तो समझ जायेंगे।
हर सरकारी प्राणी बड़े से बड़े और सारे नेता मिल कर जनता के लिये, हर स्कीम बनाते हंै। जैसे सब गरीब को रोटी मिले। इसलिये इसके लिये डीपो खोले गये, राशन कार्ड बनाये गये। वह भी तीन किस्म के, गांँव में गरीबी रेखा के राशन कार्ड पर, हर गरीब से चेयरमैन-प्रधान ने मोटे पैसे खाये और अधिक नहीं तो 25 प्रतिशत कार्ड, प्रधान सैकेट्ररी वालो के बने, जिनके पास जमीन और हर सुख सुविधा है। उनके कार्ड बने और कार्ड पर राशन ले रहे हैं।
पैसे केवल उन लोगों ने खाये हंै, जो मोटी पगार ले रहे हैं। सरकार के खास हंै। गाँव या शहर का डीपो बनाने में भी गैर सरकारी प्राणी को मोटा पैसा सरकारी कर्मचारी और या अधिकारी को देना पड़ा। यही नहीं मंथली पैसा, चीनी, तेल, अनाज भी देना पड़ता है। यह गैर सरकारी डीपो वाला मजबूर है कि जिनके राशन कार्ड बने हंै, उनसे ही हेरा-फेरी करे। इसके बाद आता है बच्चों का स्कूल, जहाँ पर 12वीं तक की पढ़ाई फ्री है, लड़की 12वीं पास हो, तो 20 हजार रूपये है। प्राईमरी में बच्चों का खाना तक फ्री है, यहाँ पढ़ाने वाले अध्यापक और अध्यापिका, जिनकी पगार 17 से 40 हजार और हर सुविधा है। छठीं कक्षा तक की किताबें फ्री कही जाती हंै, लेकिन सब गड़बड़ है और यह गड़बड़ भी प्रधान, प्रिंसिपल, सरकारी प्राणी और नेता के कारण होती है।
पगार लेने वाले अध्यापक ड्यूटी समय में खेत और जानवरों तक काम कर लेते हंै, महिला टीचर्स स्वेटर बुनकर या आपस में हँस-बोल कर और जो 45 साल से उपर उम्र की हैं, वह पैरो में दर्द, कमर में दर्द कह कर आराम करके या थकान उतार कर पगार लेते रहते हैं। दोपहर का खाना 50 प्रतिशत प्रधान, चेयरमैन या खाना बनाने वाले या प्रिंसिपल में बँटता है। आये दिन खाने के कारण नयी समस्याओं से केवल प्रिंसिपल को ही दो चार होना पड़ता है।
20 हजार रुपये केवल मजबूत, वैल स्टेंन्ड, ज़मींदार की लड़की को ही मिलते हंै। खासतौर 25 प्रतिशत गरीब का नम्बर हो। यह था गाँंव जहाँ कम से कम हेरा-फेरी होती थी या होती है। लेकिन शहर में, तो हर जगह केवल सरकारी विभाग, कर्मचारी और अधिकारी के द्वारा रिश्वत का चलन है। सब्जी मण्डी से रेलवे स्टेशन तक, बस अड्डे से कचहरी तक हर सरकारी विभाग, सभासद, चेयरमैन, नेताओं में केवल रिश्वत ही रिश्वत चलती है।
यह सब सरकारी प्राणी, नेता पढ़े-लिखे समझदार, अच्छे खानदान से हैं। इसलिये रिश्वत को सुविधा शुल्क या डोनेशन का नाम देकर कानून की व पूरे विभाग की सब धाराँऐं, नियम ही निष्क्रिय कर दिये हंै। कानून का कहना है रिश्वत देना और लेना पाप है, गलत है। हम यह कहते हंै कि मशीन में तेल देना, ग्रीस करना भी गलत है। एक गैर सरकारी चाहता है, घंटों का काम मिनटों में हो, जिससे कर्मठता और समृद्धता बढे़। सरकारी विभाग ने गलत कर्मचारी रखे, उनके उपर गलत अधिकारी रखे। ठीक-ठाक चलती मशीन में कौन तेल, ग्रीस देता है, पन्चर लगाता हैै। शर्मशार उस विभाग, उसके अधिकारी को होना चाहिये, जहाँ रिश्वत या सुविधा शुल्क चलती है।
गैर सरकारी का काम रूका रहे, यह तो और भी गलत है। एक काम पूरा होे, जिससे दूसरा काम शुरू किया जाये सरकारी प्राणी नहीं चाहता और मजबूर होकर, गैर सरकारी प्राणी को रिश्वत देनी पड़ती है। गैर सरकारी को यह पैसा बड़ी मेहनत से या अपने भाईयांे को काटकर, पेट की रोटी काटकर बचाना या बनाना पड़ता है। लेकिन वह बेकार गाड़ी को धक्के लगाकर चला लेता है। यही गाड़ी जो सरकार से मोटी पगार, हर सुविधा मतलब महँगा तेल, ग्रीस खा रहे हैं और बेकार ही नहीं है बल्कि बेहद नुकसानदायक भी सबित हो रही है, यह भयानक, गन्दगी, सबको शर्मशार करने वाली कमी है।
यह कमी कभी एक-आध कर्मचारी में होगी। अब ऐसा सारे कर्मचारी अधिकारी में है। खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग पलटता है ना। अपने विभाग में, हर विभाग में अपने कर्मचारी वफादार रहंे, कर्मठ रहंे, तेज रहें, इसलिये कर्मचारी और अधिकारी को पालने के साथ-साथ सजा का भी प्राविधान या सख्त कानून, विभाग बनाने से पहले बनाया गया, लेकिन उस पर मुस्तैदी से अमल ही नहीं हुआ। अमल हुआ जरूर, लेकिन धीरे-धीरे कम होता जा रहा है और अब केवल आपसी झगड़े या द्वेष के कारण ही सजा दी जाती है। किसी कन्ज्यूमर (उपभोक्ता) के कारण नहीं। हम आगे आप सब का ध्यान कुछ सरकारी विभाग, उनकी अनियमितताएँ और उनका सुधार दर्शाने की कोशिश करेंगे। संसार के सारे सरकारी प्राणी आमंत्रित हैं, साबित करें कि आप सरकार के नौकर, जनता के सेवक और अपने-अपने देश के चालक व रक्षक हैं, जो नियम जनता के लिये हैं, उससे कठोर नियम, हर सरकारी प्राणी और नेता के लिये हैं, मानेंगे और अमल करेंगे।

02. गैर सरकारी प्राणी
जनता या प्रजा की एक इकाई
जनता या प्रजा की एक इकाई ही, गैर सरकारी प्राणी है। सृष्टि बनने के बाद ही परिवार में तीन, चार, पाँच प्राणी होते ही, घर का बड़ा या मेन प्राणी, छोटे की रक्षा में जुटा। उन्हें खाना, उनकी जरूरतें पूरी करना व जानवरों से रक्षा करने जैसा काम किया। जो आगे चलकर छोटों को प्रजा और खुद को राजा माना गया। परिवार बढ़ते ही सबको अलग-अलग ड्यूटी, जिम्मेदारी सौंपी गई। जिन्हें पहले सेवक कहा जाता था फिर उनकी पगार का चलन बना और सेवक को नौकर का नाम दिया गया। पहले-पहल घर-परिवार का मुखिया, अपने कर्म, उनका लालन-पालन और रक्षा पूरे परिवार की, करने से मुखिया बना और परिवार के प्यार और इज्जत ने उसे मुख्यिा से, राजा का नाम दिया गया। इसके बाद परिवार में या राज्य में और बढ़ोत्तरी हुई और यह राजा से महाराजा, चक्रवर्ती राजा आदि बनें।
निश्चित ही पुरूष, नारी में से किसी भी कारण से या नेचुरल, किसी एक के दिमाग में अपराधिक प्रवृत्ति ने जन्म लिया और बाद में डण्डे के बल पर राजा या मुखिया का हक भी लिया गया। अब दो समाज या यूनिटी बनी और दोनों ने अलग-अलग धर्म बनाये। दोनों मुखिया या राजा ने अपने तरीके से बढ़ोत्तरी की। परिवार बढ़ते गये। सेवक अपने कर्म में लगे रहे। मुखिया अपने वाहुबल और दिमाग से व सेवक के सहयोग से राजा, महाराजा और चक्रवर्ती राजा तक बनें। मनुष्य ने होश सम्भालते ही दिमाग और बाहुबल से पेड़, पौधों, जानवरों और बेजान चीजों को इस्तेमाल करके व खुद की रक्षा और बढ़ोत्तरी की।
हर तरीके से सोचा या समझा जाये तो केवल एक प्राणी से ही सारे ब्रह्माण्ड की रचना का सूत्र नजर आता है या ब्रह्माण्ड मंे खास अहमियत एक प्राणी की ही है। भगवान, रब, अल्लाह, वाहेगुरू या गाॅड ने भी पहले-पहल एक प्राणी ही बनाया होगा। जब से संसार बना और जब तक रहेगा, इस एक प्राणी के कारण या एक प्राणी के लिये ही, सब कुछ होता रहा और आगे भी होता रहेगा। इसलिये इसकी सबसे ज्यादा कदर है। एक प्राणी को बचाने, रखने के लिये घर वालों से लेकर राजा तक हमेशा, हर कोशिश करते रहे हैं। इस एक प्राणी को, वो चाहे बड़े से बड़ा मुजरिम क्यों न हो, सबसे पहले उसे बचाने के बारे में ही सोचा जाता है। यह प्राणी अगर, गैर सरकारी है, जिसकी गिनती हमेशा से सबसे ज्यादा रही है और हमेशा रहेगी। केवल इसी के कारण सारा संसार चलता है। राजा, महाराजा, चक्रवर्ती राजा का पूरा राज्य इसी के कारण चलता था और आज भी चलता है, जबकि रजवाड़े खत्म हो गये हंै और सब आजाद बने व हंै। गणतंत्र का समय है। यह सब इसी प्राणी के कारण है और इसी के लिए है। इसी के कारण सब विभाग बने व चलते हंैं। यह एक प्राणी चाहे भीख माँगने वाला है या चोर डकैत है या शराबी है। पूरा देश इस एक प्राणी से पलता और चलता है। एक किसान है या फैक्ट्री का वर्कर, जूते गाँठने वाला चमार, रिक्शा चलाने वाला या हर एक जाने-अनजाने देश के लिये ही पूरी जिन्दगी, हर हाल में करता ही रहता है और इसलिए सच माना जाये तो यह देश का राजा है। बिना ताज का बादशाह है।
हम सब ने रेल से लेकर हवाई जहाज, टेलीविजन आदि तक बनाये। सारे विभाग बनाये लेकिन सब इसी के लिए बनाये और इसी के कारण चलते हैं। शराब फैक्ट्री, बीड़ी फैक्ट्री सब इसी के कारण चलते हंै। राजा-महाराजाओं के जमाने से राजा के द्वारा अनेक उपक्रम चलाये गये, जिससे प्रजा को हर सुविधा मिले और उसे सस्ते से सस्ता बनाया गया। गैर सरकारी प्राणी के द्वारा कोई उपक्रम खोला भी गया, तो उस पर जायज टैक्स लगाया गया। किसान पर लगान, चीजों के बेचने खरीदने पर टैक्स, यातायात पर टैक्स, मनोरंजन पर टैक्स, मतलब गैर सरकारी कुछ भी करे, इनके मरने तक पर टैक्स लगया गया। टैक्स लगाने का ध्येय केवल यह था कि पूरा राज्य समृद्धि व बढ़ोत्तरी पर रहे। सबको हर किस्म की सुविधा मिलती रहे।
इस टैक्स के पैसे से राजा-महाराजा अपनी जरूरतें भी पूरी करते थे। जैसे कर्मचारियों की पगार, खुद की लड़ाई या लड़ाई से बचाव के हथियार या साधन पर खर्च, सड़कंे, कुँए, धर्मशालाओं पर खर्च करते थे। इस गैर सरकारी प्राणी के लिए, हर विभाग बनाये गये। अस्पताल से लेकर अदालत तक बनाई गयी और राजा-महाराजा खुद एक कर्मचारी की तरह कर्मठता और समझदारी से कर्म करते थे। जैसे अदालत जहाँ कर्मचारी कोताही कर सकते थे। वहाँ जज की जगह या न्यायकर्ता की जगह खुद बैठते थे। यही नहीं खुफिया विभाग और अनेक गुप्तचर या सी. आई. डी. के होते हुए, खुद रातों को गुप्तचर का काम राजा करते थे।
जगविदित है कि गुप्तचर को हर भेष रखना पड़ता है और गन्दे से गन्दा काम करके सबूत इकट्ठे करने पड़ते हैं और सच्चाई की गहराई तक जाना पड़ता है। गलती पर कठोर सजा का कानून था। गलती करने वाला चाहे, राजा का पुत्र, बाप या पत्नी ही क्यों न हो। एक राजा अपनी प्रजा के प्राणी को भी, अपने पुत्र के समान समझता था। लेकिन ड्यूटी और नियम कानून के मामले में कोई भेद-भाव नहीं था। इसी प्राणी के लिये वह दिन, रात मेहनत करते थे। सुख देेने के लिये राज्य बढ़ाते थे और यहाँ तक की सिर पर कफन बाँधकर खुद लड़ते थे। इस लड़ाई में मौत भी होती थी और जीत और हार भी होती थी।
राजाओं के जमाने से ही हर विभाग बनाये गये। उनके कर्मचारी व अधिकारी रखे गये। कर्मचारी के अधिकारी रखने का ध्येय था, कर्मचारी से कर्मठता से काम लिया जाये उनको वफादार रखा जा सके और गलती या गद्दारी न कर सके। कठोर सजा का नियम या कानून बनाया गया और अगर गैर सरकारी पर कोई आपत्ति आती है, तो आॅन-द-स्पाॅट उसकी सहायता करके, उसे पहले बचाना या हर व्याधा से बचना उसका धर्म, नियम और कानून बनाया गया। इस अधिकारी के उपर भी अधिकारी रखे गये। यह चेन राजा पर ही जाकर खत्म होती थी।
ध्येय केवल यह था कि कोई अधिकारी या कर्मचारी कोई गलती न करे या किसी गैर सरकारी पर अत्याचार न हो। यही नहीं वह अधिकारी अपनी पावर या विभाग की सुविधा नाजायज तरीके से अपनो में न बाँट दे। राजा तक शिकायत पहुँचाने पर, 24 घटे में फैसले की हर कोशिश होती थी। अनेक सबूत मिल जायेंगे कि राजा-महाराजाओं ने एक प्राणी के लिये राजपाट तक दांव पर लगाये, बल्कि अपनी जान भी दांव पर लगाई। आज भी एक बच्चे या बीमार प्राणी पर करोड़ांे का नुकसान सरकार करती है, लेकिन बच्चे की जान बचाने की, हर कोशिश की जाती है। बीमार प्राणी के लिये घर वाले लाखों खर्च करते हैं, जबकि कभी-कभी जानते हुये भी कि यह बचेगा नहीं। इस समय लगभग हमारे आस-पास पढ़े-लिखे ज्यादा हंै, जो इतिहास जानते हैं। वह जानते है कि जब पहली मोटर कार बनी थी, जिसकी स्पीड 5-7 किमी/घंटा थी और भीड़ भी नहीं थी, फिर भी दो आदमी कार के आगे-आगे चलते थे, जिससे कोई प्राणी या जानवर कार की चपेट मंे ना आये। इस एक प्राणी की इतनी कदर थी कि 20 साल पहले तक रेल से कटे प्राणी के उपर से गाड़ी गुजरती थी, तो पहले कुछ सेकेण्ड के लिए डेडबाडी वाली जगह गाड़ी रोकी जाती थी। अंग्रेजों के समय के बाद तक यह आलम था कि अगर कोई मर्डर हो जाता था, तो हर गैर सरकारी प्राणी कई मील दूर से गुजरता था जिससे पुलिस के चंगुल में न फंसे। क्योंकि सरकार एक प्राणी के मारने वाले को भी नहीं बख्शती थी। क्योंकि मरने वाला प्राणी देश के लिये बहुत फायदेमंद था। उसकी कमी देश में सबका नुकसान माना जाता था।
मुखिया हो या बाप हो या गुरू हो, राजा हो, मालिक हो, वह केवल अपने छोटों को चाहे वह जिस हाल में हो, हर तरीके से पालता है। यही काम गैर सरकारी प्राणी करता है। एक किसान जिसके पास सैकड़ांे बीघे जमीन होती है। अनाज, सब्जी उगाता है। बेहद मेहनत करता है। सर्दी में, बरसात में, गर्मी में काम करता है। झोपड़ी में रहता है। हल्का पहनता है। उसके छोटे-बड़े सब उसका साथ देते हंै और यह अनाज पूरे देश में, हर कर्मचारी, अधिकारी, नेता, राष्ट्रपति व सेना तक पहुँचता है। वह लगान भी देता है। एक मजदूर, ताजमहल बनाता है। सबके, सब काम करता है। बीड़ी, सिगरेट, शराब भी पीता है, तो सरकार का फायदा ही होता है। एक फैक्टरी मालिक आज फैक्ट्री चला रहा है। पहले उसकी छोटी सी दुकान थी, तब भी वह नगरपालिका को टैक्स देता था। एक-एक पैसा बचाकर बच्चों के व अपने पेट की रोटी से बचाकर फैक्ट्री बनाई। आज भी हजारों कर्मचारी, उसके यहाँ मेहनत करके खाते हैं।
आज वह सरकार को मोटा टैक्स देता है, जबकि फैक्ट्री की लागत की ब्याज भी उसके जीवन भर के लिए ज्यादा होती है। गैर सरकारी बेइन्ताह मेहनत करता है और मरते दम तक मेहनत करता है। उसकी हर चीज केवल सरकार के काम आती है, पूरे देश के काम आती है। बच्चे भी पैदा करता है, तो भी यह बच्चा चाहे भीख माँगता है केवल सरकार को ही फायदा है। यही बच्चा सभी के लिए मेहनत करता है या पढ़ता है। पढ़कर कोई डाॅक्टर, इंजीनियर, जज बनते हैं या रेल, हवाई जहाज चलाते हैं या नेता बनते हैं। मतलब सब सरकार के लिये करता है। जहाँ भी जाता है खुद का मकान हो या झोपड़ी हो, इसकी अपनी होती है सरकार की नहीं यह अच्छे से अच्छा और बुरे से बुरा काम भी करता है, तो केवल सरकार को ही फायदा है, सरकार को ही पालता है।
पालने वाला राजा होता है। आज यही प्राणी पिस रहा है। अंग्रेजों के अत्याचार भारतीयांे पर मशहूर हैं। इसके बेहद सहनशील होने के कारण राजा-महाराजाओं के जमाने से इसने हर अत्याचार सहा है। सरकारी प्राणी, जमींदार को भी अनपढ़, गँवार कहकर उस पर अत्याचार की शुरूआत कर देते हंै। मजदूर की खाल और खून पसीना बहा देते हैं। ज्यादा से ज्यादा काम लेने की कोशिश करते हंै। रिक्शे वाला, रिक्शे का टैक्स, स्कूटर, मोटरसाईकल वाला उस जैसा टैक्स, बस वाला बस का मोटा टैक्स भरते हंै। हर सरकारी प्राणी, गैर सरकारी प्राणी को बाल बराबर समझते हैं। गैर सरकारी हर झटका, हर बेइज्जती बर्दास्त करते हैं। होटल मालिक हो या डीपो होल्डर, फैक्टरी मालिक हो या किसान यह केवल अत्याचार सहता रहता है और मजबूर होकर केवल अपने बच्चों पर, भाइयों पर, खानदान पर ही अत्याचार करने पर मजबूर हो जाता है।
आप अपने बेटे को, बाप को, भाई को या दूसरे किसी गैर सरकारी को कभी कुछ नहीं दंेगे। लेकिन सरकारी कर्मचारी, नेता, अधिकारी को सब कुछ दे देतेे हंै। डीपो होल्डर अपने भाईयों का चीनी, गेहूँ, तेल में हेरा-फेरी करता है लेकिन डी. एस. ओ. को देता है। सरकार को टैक्स देता है। गैर सरकारी में पण्डित और मौलवी, आश्रम, मदरसे, गुरूद्वारें तक सब आते हैं। इससे भी केवल सरकार को ही फायदा है। हर त्यौहार मनाता है, कभी छुट्टी नहीं करना चाहता। पूजा-पाठ और जुए के अड्डे तक चलाता है। लेकिन सरकार को ही फायदा होता है। सब बातों को देखते हुए, हर किस्म से साबित होता है कि गैर सरकारी प्राणी, देश का राजा है। यह बेहद सहनशील है, बेहद मेहनती है और सबका पालनहार है। संसार के, आप गैर सरकारी प्राणी हैं, सब आमंत्रित हैं, एक-दूसरे के सहायक बने, साबित करें, आप सबसे बड़ी पावर हैं।
मानस से संसार है, नारी, नौकर, नेता और सरदार, 
मानस बिन कुछ भी नहीं, नहीं सूरज, चाँद, आकाश। 

03. जनता
गैर सरकारी प्राणी की भीड़
यह गैर सरकारी प्राणी की भीड़ है। जनता बेहद भोली होती है लेकिन अथाह शक्तिशाली होती है। जनता या प्रजा के द्वारा या इसके लिये ही राजा-महाराजा तक सब कुछ करते थे और खुद भी असिमित सुख उठाते थे। इस समय तो खुले रूप में कहा जाता है कि जनता का राज है। पहले राजा-महाराजा और अब सरकार जो कुछ भी करती थी, जनता के लिये ही करती थी। जनता के लिये शुरू से, हर अधिकारी ग्रुप का हर आदमी प्रयत्न्शील रहा है। मंत्री और राजा तो सोते जागते भी जनता के बारे में ही सोचते रहतेे थे। बड़े व्यापारी जो गैर सरकारी होते हैं, जनता के बारे में सोच कर ही कदम उठाते हैं, क्योंकि जनता बेहद भोली परन्तु अथाह शक्तिशाली निश्चित है। गणतंत्र के जमाने में तो हर बड़ा, जनता के बारे में ही सोचता है क्योंकि जनता के द्वारा ही नेता को वोट मिलते है, नोट मिलते है। रेल, हवाई जहाज, फैक्ट्री, बैंक जनता के कारण ही चलते हंै। पुल और सड़क व सारे मनोरंजन जनता के कारण ही बनते हैं, जनता के लिये बनाये जाते है। प्रधान, सैक्रेटरी, सभासद, चेयरमैन, नेता, मंत्री, प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति तक जनता के द्वारा और जनता के लिये बनते है। मन्दिर, मस्जिद, गुरूद्वारा, गिरजाघर जनता के द्वारा और जनता के लिये बनते हैं। शुरू से जनता को एक डंडे से हांका जाता रहा। जैसे एक डंडे से भेड़, बकरी हांकी जाती है और अब जनता की पावर का अन्दाजा सबको हैं। हमेशा से जनता का नाम लेकर हर अधिकारी, राजा से फायदा उठाता रहा है। इस समय हर विभाग जनता के लिये बने हैं लेकिन गणतंत्र के समय में भी हर विभाग, हर नेता, ठेकेदार केवल जनता के नाम पर हर काम में नाजायज फायदा उठा रहे हंै। केन्द्र में तो हर मंत्री, हर अधिकारी बेहद सोचकर, इनकी पूरी यूनिटी बैठकर जनता के फायदे के लिये ही स्कीम बनाते रहते हैं, हर कदम उठाते हंै और हर हाल में जनता से फायदा उठाकर, जनता की आड़ में करोड़ांे, अरबों का नुकसान करके सरकार का व हर विभाग के अधिकारी अपने उस विभाग की जडे़ कमजोर कर रहे हैं।
आज के समय में इसी वजह से भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी चरम सीमा पर है। महँगाई लगातार बढ़ रही है। हर इंसान खासतौर से जनता का प्राणी (गैर सरकारी) अत्याचार भुगत रहा है और जनता पर ही अत्याचार करने के लिये मजबूर है। जनता सबसे बड़ी यूनिटी होने पर भी और बेहद मेहनती, बेहद सहनशील होने पर भी केवल भोली होने के कारण पेट की रोटी के लिये मेहनत में लगे रहने से, जनता का कोई प्राणी कुछ भी सोच ही नहीं पाता या सरकारी कर्मचारी अधिकारी के डर से कुछ करने से बचते देखे गये है।
जनता का हर प्राणी हर अनियमितता देख व सहकर कहता है। अपना काम देखंे, करें या इन बेकार के मामलों में न पड़े और देश में ही नहीं विदेशांे तक में, गधे पंजीरी खा रहे हैं। जनता पिस रही है। जनता के लिये सरकार, मंत्री, सरकारी अधिकारी हर अच्छी योजना बनाते हैं या बनाते रहते हैं। इनकी गरीबी पेंशन, स्कूल में बच्चों की सहायता, बड़े-बड़े अस्पताल। गरीबों के वेरीफिकेशन करके तीन किस्म के राशन कार्ड, बिजली, पानी, सीनियर सिटीजन जैसी छूट या हर उपक्रम करते हैं। लेकिन अपराधिक व गलत नेचर के अधिकारी या नेता के लोग हर सरकारी प्राणी, सरकारी प्राणी के ही सहयोग से नेता, नेता के सहयोग से सरकारी प्राणी, इन्हीं सरकारी प्राणी और नेता के सहयोग से गैर सरकारी प्राणी व सरकार के हर विभाग और सारी जनता को मोटा चूना लगा रहे हंै, जो लगातार बढ़ोत्तरी पर है।
आज हर इंसान चाहे सरकारी प्राणी हो, गैर सरकारी प्राणी हो, या नेता हो, सब परेशान हैं। जिसमंे खासतौर से गैर सरकारी प्राणी या जनता बेहद मेहनती और सहनशील होने के बाद भी बुरी तरह से पिस रही है। सरकार ने शिकायत पेटियां लगवाई, जिसमें आप अपनी शिकायत लिखकर डाल सकते हैं। शिकायत रजिस्टर रखवाये कि अनियमितता के बारे में लिख दें। सूचना विभाग बनाये जहाँ 30 दिन में जवाब मिलने की गारण्टी है, लेकिन जनता का विश्वास सब पर लगभग खत्म हो चुका है। यहाँ तक कि सूचना विभाग और अधिकारी ढूढ़ने से नहीं मिलते या अधिकतर जनता के पास, परेशान होने के लिये समय नहीं है या शिकायत करने से फायदा समझ नहीं पाये या शिकायत पर अमल नहीं होता या जवाब दोतरफा होने के कारण, जनता खुद बचना चाहती है। कहीं-कहीं देखा गया है कि शिकायती को पैसा देकर या गैर सरकारी को मुकदमें की धौंस देकर दूसरे कर्मचारी अधिकारी के द्वारा शिकायत करने वाले को शिकायत लौटाने तक के लिये मजबूर किया जाता है। एक गैर सरकारी अपने स्थान से दूर कैसे बार-बार काम छोड़ कर, पैसा लगाकर कितनी बार शिकायत करेगा। जबकि 99 प्रतिशत वह सोचे बैठा है कि शिकायत करने से भी, इन भ्रष्ट लोगों का कुछ नहीं होता। हर प्राणी, नेता या सरकारी प्राणी और जनता यहाँ तक कि विद्यार्थीगण तक यह कहते हैं, कि नीचे से उपर तक सब भ्रष्ट हो चुके हैं। वहाँ पर शिकायत करने वाले की इच्छा होने पर भी, उसी के परिवार वाले तक व सगे-सम्बन्धी तक रोकने की हर कोशिश करते हैं और सबूत के आधार पर शिकायत करने वाला, शिकायत भूल जाने के लिये मजबूर हो जाता है। सरकार ने लोक अदालत और ”जागो उपभोक्ता जागो“ तक का पूरा प्रचार किया। लेकिन भोली जनता समझ नहीं पा रही है कि हर गैर सरकारी प्राणी और नेता तक खुद उपभोक्ता हैं। हर गैर सरकारी प्राणी, खासतौर से हर सरकारी विभाग, कर्मचारी व अधिकारी और नेता, मंत्री, प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति तक उपभोक्ता हैं। दुकानदार भी उपभोक्ता हैं। इसीलिये लेखक पूरी कोशिश कर रहा है कि हर प्राणी जागे। गैर सरकारी प्राणी, सरकारी प्राणी और हर नेता पूरी तरह जागे।
पुराने समय से जनता किसी ना किसी कारण से बाधित तो जरूर रही है। अत्याचार भी सहे हंै क्योंकि प्रकृति के कष्ट भी जनता भुगतती आयी है। पहले खेती भी मौसम खराब होने से गडबड़ाती थी। राजाओं के झगड़े, चोर-डकैतांे की ज्यादती व बीमारी आदि फैलने से जनता परेशान रही है। नेतागिरी का चलन नहीं था, पढ़े-लिखे कम थे। लेकिन अब इस विज्ञान के युग में लगभग सब कुछ होते हुए कानून को गलत तरीके से इस्तेमाल करके, सरकारी प्राणी और नेता की ज्यादतियाँ या दोनों की ज्यादतियाँ साथ ही, गैर सरकारी मजबूर लोगों की ज्यादतियाँ गैर सरकारी को बेहद भुगतनी पड़ रही हैं, जो खासतौर चर्म सीमा के नजदीक हैं, जो केवल ज्ञानवान व जागरूक होने से ही बचत सम्भव है।
जनता के जागरूक होते ही, हर सरकारी प्राणी जो जनता में से किसी की सन्तान है। देश का चालक और रक्षक बना है, सही तरीके से चलायेगा और रक्षा करेगा। एक नेता हर किस्म की चोरी, भ्रष्टाचारी, गद्दारी लगातार फैला रहा है। वह भी कानूनी तरीके से। जनता की औलाद सरकारी प्राणी, देश के चालक व रक्षक के सहयोग से सरकारी प्राणी के द्वारा जनता को खराब व उन पर अत्याचार कर रहा है और करा रहा है। जबकि यह नेता भी, गैर सरकारी प्राणी का पुत्र है, भाई है, चाचा, ताऊ, बाबा, पति है। देश का एक खास अंग है। यह ज्ञानवान व जागरूक हो जायेगा, तो सबके लिये फायदेमंद जरूर होगा। आप सब से अपील है, साथ दंे-सहयोग दंे, और संसार को स्वच्छ व सुनहरा बनाये। संसार के सब आमंत्रित हैं, साबित करें, आप से ही सब कुछ हैं, आप सबको पाल सकते हैं, तो गलती पर माकूल सजा भी दिला सकते हैं या सजा दे सकते हैं। इन्टरनेट का इस्तेमाल करके खतरनाक, सक्षम, गद्दार को भी सुधारकर देश, समाज और खुद उसके लिए, उसका नवीनीकरण करके, बेहद बड़ा धर्म का लाभ उठा सकते हैं।


सम्बन्धों को सच्चाई से निभाओ

सम्बन्धों को सच्चाई से निभाओ 


सृष्टि में सारे जीव-निर्जीव का आपस में, सम्बन्ध निश्चित है और मनुष्य के अलावा सब जीव-निर्जीव, आपस में सम्बन्धों को सच्चाई से निभा रहे हैं। पृथ्वी, सूरज, चाँद, सितारे आदि सब। पृथ्वी पर जितने जीव-निर्जीव है, सब आपस में सही सम्बन्ध निभा रहे हैं। हिन्दू संस्कृति सबसे पुरानी है और सबसे लास्ट (अन्त) तक चलेगी क्योंकि इसनें बारिकी से हर बात, हर चीज को समझा है।
विज्ञान का कहना है, कुछ तत्वों के द्वारा मौसम, वायु दाब व तापमान और समय माकूल होने पर, हर जीव की उत्पत्ति होती है और जब विज्ञान से बाहर कोई काम हो जाता है या जहाँ रूकावट आती है, तो वही वैज्ञानिक कहता है, अब भगवान के उपर है। संसार में इस समय भी अधिकतर मनुष्य, खासतौर सारी मनुष्य जाति, इतनी रिसर्च के बाद भी भगवान, रब, अल्लाह, खुदा और गाॅड को मानते हंै। यह मानते हैं कि, कोई एक ऐसा है जिसके हाथ में सबकी बागडोर है।
हिन्दू संस्कृति के मुताबिक, पृथ्वी पर 84 लाख योनि है और सबके शरीर की रचना 5 तत्वांे के मिलने से हुई हैै। सबका सम्बन्ध, एक उपर वाले से निश्चित है। बहुत सी बातें केवल महसूस होती है, लेकिन समझ में नहीं आती और गहरे शोध के बाद भी नजर नहीं आती। लेकिन उपर वाले से सम्बन्ध है और हर जीव, सच्चाई से यह सम्बन्ध निभाता आ रहा है। पूरी कायनात चल रही है, यह एक सम्बन्ध निभाने का अकाट्य सबूत है।
विज्ञान, मनुष्य को, बन्दर का बदला हुआ रूप मानता है। बन्दर की बुद्धि को विकसित होने में समय लगा होगा और कम बुद्धि वाले मनुष्य को, बन्दर माना और कहा जा सकता है, लेकिन बन्दर और वनमानुष योनि आज भी है। इसका मतलब है कि मनुष्य उस समय भी था, बन्दर का बदला हुआ रूप नहीं। गीता, रामायण एवं हिन्दू संस्कृति के द्वारा सतयुग, त्रेतायुग, द्वापर और कलियुग में बाँटकर, सबका समय निर्धारित किया गया। विज्ञान ने या मनुष्य ने गधा, घोड़ा मिलाकर खच्चर की नसल बनाई, लेकिन आज भी गधा है, घोड़ा भी है।
विज्ञान टैक्नोलाॅजी में उन्नत जापान, अमेरिका जैसे राष्ट्र रामायण, महाभारत ग्रंथ और चार वेदों में असम्भव बातों पर ही रिसर्च करके, विश्व में प्रथम स्थान पर है। मतलब यह है कि रामायण और महाभारत भी इतिहास ही है। बात सम्बन्धों की चल रही थी। आज भी लम्बे समय से चाँद, सूरज, पृथ्वी, नवग्रह जो निर्जीव हैं, सबका सम्बन्ध चल रहा है और सच्चाई से सब निभा रहे है। हर जीव उपर वाले से सम्बन्ध रखता है और सच्चाई से निभा रहा है। मनुष्य भी निभा रहा है, लेकिन बुद्धिजीवि होने के कारण, मनुष्य ने उसके अलावा अपने-अपनों के बीच में भी सम्बन्धों को वरीयता दी और आदि काल से सच्चाई से निभाते आ रहे हैं। सम्बन्धों को भी दो भागो में बाॅंटा गया। खून का रिश्ता माना या बनाया गया, क्योंकि मनुष्य ने बुद्धिजीवि होने के कारण, अपनी नस्ल को, पहली नस्ल से अच्छी बने, इसलिये सम्बन्धों व आचरणों पर विशेष ध्यान दिया और चलन में लाये गये। एक लम्बा समय निश्चित लगा होगा। गधे को गधा कहा, कुत्ते को कुत्ता बताया, बन्दर को बन्दर बताया, देखिये उनके नाम के अनुरूप उनमें गुण भी है। यह सम्बन्ध रखने के लिये, नाम देने की योजना, आगे सम्बन्ध बनाने में कामयाब हुई। केवल मनुष्य में, सम्बन्धों को मनुष्य नेे ही नाम दिया।
बच्चा पैदा हुआ, लड़के को बेटा कहा गया, लड़की को बेटी कहा गया। उनका पालन पोषण शुरू किया। सात दिन बाद ही, वैसे तो उसके पैदा होते ही, पूरे परिवार में बच्चे के मुताबिक चाल-चलन रखे गये। लड़केे को लड़के की तरह, लड़की को लड़की की तरह, इसके आने पर स्वागत किया गया। भगवान, रब को धन्यवाद किया गया। सबमें एक-दूसरे से सम्बन्ध निभाने का प्रचलन है ना। अब बच्चों से सम्बन्ध निभाने की प्रक्रिया शुरू होती है। यह बच्चा किसी का भतिजी-भतिजा है, बेटा-बेटी है, नाती-नातनी, धेवता-धेवती है, भांजा-भांजी है, आदि। इन्हीं को खून का रिश्ता कहा जाता है। लेकिन खून के रिश्ते के अलावा, धर्म का रिश्ता भी सब जीव-निर्जीव का है।
खून का रिश्ता एक परिवार, खानदान का होता है। धर्म का रिश्ता गाँव, शहर, जिला, देश और पूरे संसार का होता है। केवल मुँह से कहना और दिल से मानने का होता है और सम्बन्धों को जो सच्चाई से निभाता है वह महान होता है या महान बनता है।
हम सबका, सबसे रिश्ता है। खून का रिश्ता, जिनकी गिनती सीमित है, धर्म का रिश्ता, जो खून के रिश्ते से बेहद बड़ा है, असीमित है। ब्रह्माण्ड में हर जीव-निर्जीव का रिश्ता है। जीव का जीव से, निर्जीव का निर्जीव से और यह कहलाता है ”मोह’। मोह जिसमें है उसका दिल बड़ा है। यह मोह नारी में देखने को ज्यादा मिलता है, लेकिन नारी रूप विचलित रहती है। यह उसका गुण है, जो बदलता रहता है। पहले पिता से, माता से, भाई से, बहन से, यह मोह पति, बच्चा, नाती, पोते और सब में एक सा नहीं रहता, लेकिन पुरूष का मोह हमेशा एक जैसा होता है। यह पुरूष का गुण है।
नारी और पुरूष में शरीर के अनुरूप गुण है, जो दोनों में विपरित हैं। अगर नारी में मोह न पनपे तो, वंश चलाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन होता है। अगर पुरूष में मोह बदलने लगता तो, संसार चलना नामुमकिन होता। बात सम्बन्धों की हो रही थी। नारी के सामने, एक बच्चा या कोई भी, एक कुत्ते का बच्चा भी पसन्द आ जाता है, उससे मोहवश सम्बन्ध बन जाता है और यह सम्बन्ध कोई भी, मरने तक निभाता है। उसके मरने पर बड़ा तो, अपने हाथ से दफन तक करता है। आप देखें नारी तो अपने भगवान जैसे बच्चे को पति, आया या नौकर तक को सौंप देती है और कुत्ते को गोद में लेकर चलती है। यह सम्बन्ध बड़े अजीब है। कुत्ता-बिल्ली, एक-दूसरे के दुश्मन है। लेकिन एक कुतिया, बिल्ली के बच्चे को दूध पिलाकर, अपने बच्चों में पाल देती है। मनुष्य तो साँप को पाल लेता है। घोड़े, कुत्ते, शेर पालने की अनेकों मिसाल हैं। हम सबके, पूरेे ब्रह्माण्ड में, एक-दूसरे के साथ सम्बन्ध हैं। इसका सबूत सबसे बड़ा यह है कि मनुष्य ने उन सबको नाम दिया है चाहे, वह नुकसानदायक या दुश्मनी तक है।
दुश्मनी भी तो सम्बन्धों में एक सम्बन्ध है। हमें सबसे सच्चाई से सम्बन्ध निभाने चाहिये अगर हम समझदार हंै, वफादार हंै, कर्मठ हंै, सच्चाई में बड़े हैं, तो निश्चित ही सच्चाई से सम्बन्ध निभायेंगे, निभातेे हैं।
सच्चे सम्बन्धों का सबसे बड़ा सबूत, भगवान, रब, अल्लाह, वाहेगुरू, गाॅड है। उससे हमारे सच्चे, अटूट सम्बन्ध है। वह हमारा है, इसलिये वह हमारा नुकसान भी कर दे, तो हम उसे अपने कर्मों का फल मान कर पूरी तरह (ध्यान दे), सन्तुष्ट हो जाते हैं क्योंकि हमारे उससे पक्के, सच्चे सम्बन्ध हैं। कोई गिला नहीं, कोई शिकवा नहीं। नुकसान होने पर भी खुश होते हैं, उसकी पूजा-पाठ में लीन हो जाते हंै। यही गलती अगर अपने खून, बेटे से हो जाये तो बेटे की छोटी सी गलती से हम खफा हो जाते हैं, उसे दुश्मन मान बैठते हैं।
अधिकतर धर्म प्रचारक, मनुष्य में 5 दोष मानते हंै। काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार। जबकि यह पाँच दोष बेहद खास है। अनमोल है, फायदेमंद है। काम या सेक्स नहीं होगा तो सृष्टि कैसे चलेगी? दो प्राणी है नर और मादा। क्या हम अपनी गाय को हरी (गर्भवती) कराने के लिये, उसे सांड़ के पास नहीं ले जाते? लेकिन यह काम या सेक्स अपना वंश चलाने के लिये ही है। पत्नी को देखकर सैक्स उभरना अच्छा है, हर नारी को देखकर नहीं। सैक्स या काम होना शरीर जवान होने की पहचान भी है। यह खत्म हुआ तो बुढ़ापा और मौत आने वाली है, निशानी है। लेकिन आप समझदार हैं, बड़े हंै, जवानी या सैक्स या काम वंश चलाने के लिये इस्तेमाल करते हैं, तो ज्यादा लम्बी आयु, ज्यादा कर्मठ, ज्यादा वफादार, जिन्दगी मजेदार, निरोग शरीर का मजा लूटते हंै।
सन्तान अनमोल होती है। लड़की या मादा में अच्छे गुण, देवी के गुण व लड़के या नर में देवताओं के गुण आते हैं। पशुु, पक्षी अब भी सब अपने समय पर काम का प्रयोग करते है और आज भी उनकी उम्र हजारों साल पहले जितनी ही है। मनुष्य काम या सेक्स का इस्तेमाल गलत करते हैं। इसीलिये सतयुग में उम्र 400 साल थी और आज 60 से 65 साल उम्र रह गई है। यही नहीं पशुु-पक्षी के दाँत, आंत, आँख तक पूरी उम्र ठीक रहते है। जबकि मनुष्य में छोटी उम्र में ही खराब हो जाते है। जबकि मनुष्य फल, मेवे, दूध, घी सब अच्छी चीजें इस्तेमाल करते हंै। काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार अनमोल है। इनका सही इस्तेमाल छोटे को बेहद बड़ा बना देता है। केवल सम्बन्धों के सच्चाई से निभाने वाला ही, इनका सही प्रयोग कर पाता है या कर सकता है।
सम्बन्ध निभाना बेहद आसान है। लेकिन अज्ञानतावश हम इसे, बेहद कठिन बना देते है। पहल शुरू होती है, माँ, बाप, भाई, बहन, चाचा, ताऊ, यार, दोस्त फिर पति-पत्नी, बच्चे, नाती, पोते आदि से, फिर इसी प्रकार संसार पढ़े-लिखे अच्छे खानदानी रब की पूजा करते हुए भी, खुद को समझदार मानकर लगातार सम्बन्धों को निभाने में गलती करते रहते हैं और झूठा गर्व करते है। किसी का भी, सही इस्तेमाल न खुद करते हैं न दूसरांे को करने देते हैं। पहली गलती अपने पिता के साथ करते हैं, जिसके कारण हमारा सारा संसार चलता है। हमारी जन्मदात्री भी, उसकी पूजा करती थी या करती है। वह पिता खुद, अपने बाप का वारिस भी है, जैसे-जैसे हम बड़े होते है वैसे-वैसे ही उससे दूर और ज्यादा दूर होते चले जाते हंै और लगातार हर किस्म से कमजोर होते जाते हैं। नुकसानदायक चीज बढ़ती जाती है और फायदेमंद चीजें कम होती चली जाती हैं।
माँ भी दूर होती जाती है। माँ की, बहन की, बुआ, दादी, पत्नी आदि और सब भी, जो बाप को बाप मानने के बाद फायदेमंद थे, बाप से दूर होते ही सब नुकसानदायक बनते चले जाते है। काम, क्रोध, लोभ, मोह, अंहकार का लगातार गलत इस्तेमाल समय के अनुसार बढ़ता जाता है। बाप की तरह सूरज भी बड़ा है। हम सूरज को जल नहीं दे पाते और पृथ्वी को हर दिन चूमते है। सूरज की कद्र नहीं की, निश्चित ही पृथ्वी की कद्र या इज्जत कर ही नहीं पायेंगे।
ज्ञान, विज्ञान बताता है कि पृथ्वी पर हर जीव, जमीन के नीचे और पानी के अंदर तक या आकाश में सब जीव, सूर्य या बाप के कारण ही पलते है। उसे हम भूल जाते हंै। इसी कारण पृथ्वी की या माँ की पूजा भी गलत होने लगती है। आपने देखा होगा पृथ्वी की कद्र हर इंसान करता है। हम चाय पीते हैं तो, चाय की छींट पृथ्वी को देते है, जल की भी देते है, शराबी तो शराब का छींटा ही दे देते हैं। पृथ्वी हमंे सब कुछ देती है, माना। लेकिन बाप की या सूर्य की बेकदरी से पृथ्वी से मिलने वाली हर नयामत, हमारा पूरा कर ही नहीं पाती और हर किसान व हर मनुष्य परेशान रहता है। उनकी हर कोशिश उनको रिजल्ट माइनस (नकारात्मक) में देती है। बाप की कद्र कम होते ही, हम अपनी पत्नी पर सही कन्ट्रोल नहीं रख पाते। पहले बाप की कद्र करते थे तो सारी पुरूष जाति जैसे, सब भाई, चाचा, ताऊ, दोस्त, नौकर, मालिक आदि सब हमारी फेवर (पक्ष) के थे। हमंे चिन्ता कम थी। हर चीज व हर इंसान कन्ट्रोल में रहे। बाप की कद्र कम होने के बाद, पत्नी पर कन्ट्रोल (नियंत्रण) नहीं रहा और इसीलिए पैदा होेने वाले बच्चे भी हमारे लिये, अपने सब के होते हुए भी, हमारे नहीं रहते और यह बात भी, हमंे बहुत देर बाद पता लगती है, जब उसका कोई विकल्प भी नहीं निकल पाता।
हमारे बड़ों नेे या रब की कृपा से, हर चीज पर कन्ट्रोल करने के, हमें सही तरीके सिखाये या हमारे दिमाग में उपजे, वह केवल सही सम्बन्ध निभाने से ही मुमकिन हुए। नारी को नारी के रूप में रखना, उसको बाँध कर रखना, बाँधना भी इस तरीके से कि उसकी इज्जत भी बढ़े और खुश भी रहे, हर युक्ति बताई। बाप की ही तरह हमारे जीवन में, हर स्टेप पर कोई न कोई बड़ा आता रहता है जैसे सूरज, बड़ा भाई, चाचा, ताऊ, बाबा, ससुर। नौकरी में अधिकारी, फैक्टरी में मालिक और अधिकारी या हमारे से आयु में जो भी बड़ा है खासतौर से पुरूष वर्ग में।
दुश्मनी भी एक सम्बन्ध है, सच्चाई से निभाने ही चाहिये, लेकिन ध्येय है उससे जीतना। जीतने के दो रूप हंै लड़कर हराना या प्रेम नीति से, अच्छाई, धर्म दिखा कर, अपनी फेवर में लेना और दुश्मनी को हराकर दोस्ती में बदलना, मारना तो बिल्कुल नहीं।
सम्बंध की बात लास्ट तक चलती है, जैसे हम गैर सरकारी हैं या सरकारी प्राणी, नेता या देश का भविष्य विद्यार्थी हैं। एक-दूसरे से सबके सम्बन्ध हंै, एक-दूसरे के पूरक हैं। सम्बन्ध सच्चाई से निभाने के लिऐ, अगर गैर सरकारी प्राणी हैं, तो हमें सोचना चाहिये, सरकारी प्राणी और नेता व विद्यार्थी की इज्जत बढ़ायें और परेशानी में उनका साथ दे व उनका सुधार-ध्यान रखंे। उन्हें पाले तो जरूर लेकिन उनका भविष्य खराब न हो। वह सब खुद के लिये, देश के लिये, समाज के लिये, अपने विभाग के लिये, साफ सुथरे रहे। हर प्राणी या हर मशीन की प्रवृत्ति है, वह धीरे-धीरे सुस्त, कमजोर, आलसी या बेकार होती जाती है।
अगर हम सरकारी नौकर हैं, तो हमें सबसे पहले खुद को अच्छा सेवक साबित करना है, जनता का, हम सरकार के नौकर हैं। हमें हर कानून को, गैर सरकारी प्राणी से ज्यादा मानना है, हर उस व्यक्ति की रक्षा करनी है, जो देश व जनता के हित में है। जनता के लिये हम हंै। उनको कानून में बांधना है। जनता को देश का नमक हलाल बनाना है। अधिकारी और नेता की आज्ञा में रहना है, लेकिन अत्याचार या गलत करने के लिए बिल्कुल नहीं, कानून के खिलाफ कुछ न हो, यह करने के लिए।
हम नेता हैं, तो हमें नहीं भूलना चाहिये कि हम जनता के वोट से बने हैं और सरकारी प्राणी से सही काम लेने के लिये बने हैं। हमने वोट चाहे नोट बाँटकर लिये या डण्डे के बल पर लिये लेकिन है तो, जनता के कारण ही, जनता से हम नेता बने हैं। हमारे सम्बन्धी, सारे नेता है। सारे नेता ग्रुप, नेता बिरादरी है। सब की गलती का, खुद में, नेता में, सरकारी प्राणी में व देश के भविष्य विद्यार्थी मंे सुधार करना है। हमारे पास आजादी है, हर फैसेल्टी (सुविधा) है, घर या देश के वफादार रहना है। यही वफादार रह कर माँ, बाप, परिवार की इज्जत बढ़ानी है, दूध का कर्ज अदा करना है। यूनिटी, जलूस, हड़ताल, रैली करने से सब बाधित होते हैं, देश का नुकसान होता है, नकारापन फैलता है। चुनाव से भी मँहगाई और दुनिया भर की परेशानी व हर अनियमितता बढ़ती है। यह ध्यान रखना है।
अगर हम सबके भविष्य विद्यार्थीगण है। तो निश्चित ही 10वीं के बाद हमारी वेल्यू खास हुई है। हमें अब तक समझ जाना चाहिये कि हमारे बाप का वफादार कौन है। बाप की प्रवृत्ति चाहे, वह गैर सरकारी हो, सरकारी हो या नेता हो, अच्छा है या बुरा है समाज और देश के प्रति और उसकी मेहनत का पैसा ही हम पर लग रहा है या नहीं। इन्टर, बी. ए. तक हम वोट देने लायक हो जाते हैं। हमें अब और समझदारी से रहना है। हमारा सम्बन्ध पढ़ाई से जरूर है, लेकिन शरीर की सफाई-सुधार भी तो रखते है। इसी प्रकार समाज, देश में भी सफाई-सुधार का ध्यान रखना है। यूनिटी बनाने के लिये तैयार है। लेकिन पढ़ाई को प्रोत्साहन देने के लिये, अच्छों की इज्जत करनी चाहिये लेकिन गलत की बेइज्जती कभी नहीं, हाँ उनसे दूर रहने की कोशिश करना धर्म है। हम नेताओं के बारे में जानते हैं। सरकारी प्राणी की मेहनत, वफादारी भी जानते हैं। माँ, बाप की मेहनत भी जानते हैं। अध्यापक की कर्मठता भी देख रहे हैं। आज आप राजकुमार है कल राजा निश्चित ही बनना है। अभी से पढ़ाई के साथ-साथ सबका ध्यान रखना, सबसे सम्बन्ध सच्चाई से निभाना है। सीखना है।
हम सब गैर सरकारी हंै, सरकारी प्राणी हैं या नेता हंै और या विद्यार्थीगण हैं। हम सबके उपर असीमित बोझ महसूस होता है, बेहद मेहनत महसूस होती है। हर किस्म की परेशनी से सामना करना पड़ता है। ऐसा लगता है जैसे जीवन बेकार है। मेहनत ही मेहनत, परेशानी ही परेशानी है। यह सच तो हैं लेकिन अगर हमारे साथ कोई छोटा या बड़ा, थोड़ा सा भी समझदार, कर्मठ और वफादार है या इनमें से एक भी गुण, जिसमें हो, बाकी के दो गुण और हर एक गुण इसमें निश्चित आ जाते हैं। तो वह खुद की व ऐसे-वेसे किसी प्राणी की कोई टेन्शन होती ही नहीं। और अगर बड़ा हमारे साथ है, तो हमारे अन्दर सारे गुण आने लगते हंै और जिस प्रकार एक पेड़ बड़ा होता जाता है, जिस प्रकार एक मरीज धीरे-धीरे ठीक होता जाता है। आपकी भी सारी समस्याएँ सुलझती चली जाती हंै। यह समस्याएँ या तो आयेगी ही नहीं या आसानी से आपको पता भी नहीं चलेगा कब खत्म हो गई और सबका विकल्प है, समझदारी से कर्मठ होना।
हमारी और हमारी समस्याओं का भी एक सम्बन्ध ही तो है, इसे सच्चाई से निभाओ, कोई भी काम पैन्डिंग छोड़ो मत, लेकिन समस्या को सुलझाने का पूरा ध्यान रखो। पूजा, इबादत, खाना, डेली वर्क, हर काम लगभग पूरा करो। कभी-कभी कुछ छोड़ना भी पड़े तो टेन्शन नहीं, लेकिन समस्या का ध्यान पूरा रखो, सुलझानें के लिए। सच्चाई यह है कि हर जीव जीतता है लेकिन आसानी से जीतने के लिये, किसी दूसरे की टेन्शन मत बढ़ाआंे, हमें सबसे सम्बन्ध सच्चाई से निभाने है।
इसके लिये हर अनियमितता को समझकर, सबकी या उसको लाने वालेे की मजबूरी समझकर, अपनों की सहायता से व सबकी सहायता से हल करो। उसके लिये समस्या से सम्बन्धित व्यक्ति, विभाग और उपर तक सही तरीके से लिखकर, तीन प्राणी के हस्ताक्षर कराकर, वोटर/आधार नं0 डाल कर शिकायत करो। घर में भाई, माँ, बाप, बाबा, दादी, चाचा, चाची सब हैं, जहाँ आप बिना लिखे भी शिकायत कर सकते है। हर समस्या सुलझा सकते हैं, बाहर हर विभाग और राष्ट्रपति तक हंै, जो आपकी समस्या सुलझाने के लिये ही बैठे हैं मोटी पगार ले रहे हंै। सूचना विभाग तक है, जो 30 दिन में जवाब देने के लिए बाध्य है। सब घर या परिवार हो या बाहर विभाग हो तथा हर जगह कोई न कोई, आपकी समस्या सुनने, सुलझाने वाला निश्चित है। बस समझदारी से दूरदृष्टी से समस्या का समाधान ढूढ़ना है और समस्या सुलझानी है।
इसके अलावा हम हैं ही। हमें समस्या लिख कर भेजांे विकल्प जरूर मिलेगा। लेकिन टेन्शन न खुद की, न दूसरे की बढ़ानी है, केवल समस्या सुलझानी है। गहराई से सम्बन्ध निभाने हैं। करत करत अभ्यास के जड़मत होत सुजान। ऐसा हो सकता है कि समस्या सुलझाने या सुलझने में देर लगे। ताजमहल बनने में 25, 30 साल लगे। ईद, दिवाली एक साल बाद आती है, बी. एससी. होने में 15 साल लगते हैं, हो सकता है आप समस्या सुलझाने में देर बर्दाश्त न कर सकंे, तब भी कोई बात नहीं, जैसे भारत देश को आजाद कराने में किसी न किसी ने तो बीड़ा उठाया था, बाद में किसी के द्वारा पूरा हुआ और देश आजाद हुआ। आप बीज बोते हैं, पानी आप देते हंै, फल आपको नहीं, तो आपके अपने ही तो खायेंगे या खाते हैं। याद रखो हम सब एक ही बाप की औलाद हैं। (एक पिता एकस के हम बारिस -गुरू ग्रंथ साहिब) और सब हमारे है, भाई-बन्धु, नाती-पोते, परपोते, नौकर, नेता।
सच्चाई से सम्बन्धों को निभाते रहने के बाद आप देखेंगे, आने वाली नस्ल के आगे कोई समस्या ही नहीं होगी। वह सच्चाई से संबन्ध निभाने वाले कर्मठ व समझदार हांेगे। सारी पृथ्वी स्वर्ग या जन्नत होगी। मछली के बच्चे को तैरना नहीं सिखाया जाता। हर जीव की बढ़ोत्तरी की कोई सीमा नहीं होती, बशर्ते वह बड़ों की या समझदारों की छत्र-छाया में हो और सच्चाई से रहना, जीना सीखे और जिये।
अपने धर्म, ग्रन्थों में लिखे का भावार्थ समझें और अमल करें। हर चीज मनुष्य के लिये है लेकिन मनुष्य भी सबके लिये है। इतिहास गवाह है, धर्मग्रन्थ गवाह हैं अब भी सबूत है। लम्बी आयु वाले अथाह शक्तिशाली अथाह तेजस्वी, अथाह गुण वाले अब भी हैं, लेकिन हर शक्ति सच्चाई से सम्बन्ध निभाने के बाद ही मुमकिन है। अब सारे संसार के, हर प्राणी को साबित करना है कि हम सब, सबसे सच्चाई से सम्बन्ध निभाते हैं। जैसेे जितना गुड़ डालोगे उतना मीठा होगा या जितना मनन करोगे उतना ज्ञान होगा।

बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर, 
पक्षी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर।
छोटा भया तो क्या भया, जो ना सीखे सीख, 
बड़े का सिरदर्द बने और खुद भी माँगे भीख।





महान

महान

छोटन को, लज्जा चाहिए या आज्ञाकारी होय, 
वरना बचके ही रहो, निश्चित ख्वारी होय।
छोटे = बच्चा, नौकर, पशु, मशीन, नेता और नारी
भावार्थ -बच्चा, नौकर, पशुु, मशीन, नेता और नारी में शर्म, आज्ञाकारिता, समझदारी, वफादारी होना जरूरी है या इनमें यह गुण, सिखाने व बनाने चाहिए। वरना इनसे बचकर ही रहना चाहिए। इनके साथ रहने पर निश्चित ही सबका नुकसान होगा।

कर्मठ की, बात ही क्या है, जहाँ जाये, फूल खिल जाये, 
वफादार, कर्मठ रहे नीअरे, हर अनियमितता उड़ जाये।
भावार्थ -कर्मठ इंसान की बात ही क्या है। वह जहाँ भी पहुँचेेगा, इसकी कर्मठता व मेहनत से सब जगह, बेहद बढ़ोत्तरी होती है। लेकिन समझदार और कर्मठ इंसान, नारी, पुरूष, सारे गैर सरकारी प्राणी, सारे सरकारी प्राणी, सारे नेता और सारे विद्यार्थीगण, जहाँ से भी गुजर जाये, तो अपनी समझदारी और मेहनत से, हर अनियमितता की शिकायत से निश्चित, सबका सुधार कर देता है।

मर्द की चाह करती, तो मर्द ही, बना पाती तू, 
गुलाम की चाह करके, गुलाम बना दिया, घर को।
घर = देश या रिहायश
भावार्थ -हमेशा से लड़की और नारी, मर्द की इच्छा करती थी, उनको ज्ञान भी ऐसा ही दिया जाता था और उनकी शादी, अच्छे इंसान या मर्द से होती थी, फिर वह जिस बच्चे को जन्म देती थी, तो उसमें सच्चे मर्द के गुण भरती थी और वह राणा, सुभाष, गांधी, नेहरू, अकबर, इब्राहिम, गुरू नानक जैसे मर्द बनते थे। आज की लड़की, उसके माँ-बाप, पहले ही नौकर पसंद करते हैं। हर नारी, शादी के आस-पास इच्छा करती है कि मेरा पति, मेरी ही बात माने। यह इच्छा आते ही, वह ऐसे ही आचरण करती है। पैदा होने वाले बच्चे को गलत ध्येय से पालती है और यह बच्चा बड़ा होकर, गलत नौकर, गलत नेता या गलत नागरिक बनता है और घर में अनियमितता बढ़ती जाती है, इससे बाद में बेहद नुकसान होते हैं और हर व्याधा, हर बीमारी और हर अनियमितता, घर में व देश के हर विभाग नुकसानदायक हो जाते हैं। गुलाम जैसे ही हो जाते हैं, प्रत्यक्ष है।

साथ बढ़ेन का, चाहिए या बड़कपन आये, 
छोटों का क्या, साथ भला, कब नंगा कर जाये?
छोटे = बच्चा, नौकर, पशुु, मशीन, नेता और नारी
भावार्थ -हमेशा बड़े का साथ लेना चाहिए या जो बड़ा, बन रहा हो, उसके साथ रहें। समझदार का (बड़े) का साथ या बच्चा (लड़का) जो बड़ा जरूर बनेगा। नहीं तो नादान छोटा या नासमझ इंसान और बच्चा तो, भरे बाजार में दूध माँॅग कर, एक इज्जतदार नारी को दूध पिलाने के लिए मजबूर कर देता है। जैसा बच्चे के पास, बाप या माँ होती है। नौकर के पास, मालिक, पशुु, मशीन, नारी के पास मालिक और या पति और नेता के पास जनता होती है।
गर छोटे चाहें, बढ़ेन को, नर्क, स्वर्ग बन जाये, 
छोटा बिचलित, छोटेन में, कुछ भी, बच न पाये।
छोटे = बच्चा, नौकर, पशुु, मशीन, नेता और नारी
भावार्थ -बच्चा, बाप या गुरू की। पशुु, नौकर, मशीन मालिक की। नारी अपने पति की अैार नेता अगर जनता को चाहता है। उसकी सेवा करते हैं, कदर करते हैं, तो नर्क भी स्वर्ग बन जाता है। वरना सब कुछ उजड़ जाता है। बच्चा, बच्चों में या गैरों में, नौकर व पशुु, अपने मालिक के अलावा, सब गैरों की मानते हैं। नेता अपने दूसरे नेता में उलझा रहे और जनता की बेकदरी कर दे, नारी अपने पति की, पति के बाद बड़े लड़के के अलावा, किसी के कहने में चलेगी, तो बच्चे के बाप के खानदान का। नौकर, पशुु, मशीन फैक्टरी के मालिक का। नेता के देश का, नारी के घर का नाश हो जाता है, प्रत्यक्ष है। 

मालिक संग, सब महान है, गर, उसकी आज्ञा धाँय, 
पावे सुख, संसार सारा, वरना नर्क बन जाये।
नर बिन नारी, नारंगी है, कभी भी, रूक न पाये, 
नारी बैरी, नारी है, खुद भी पर्दा, न करे और सब गर्क कर जाये।
आजादी, सब को बुरी, ज्ञान न, जब तक पाये, 
खुद भी भुगते, नर्क को, पालन हार, बुरा बन जाये।
समझदार, वह जानीये, जो बड़े की, आज्ञा धाँय, 
समझदार बन, जायेगा जो सबकी, इज्जत, कर पाये।
मालिक का, दुःख एक है, सब का कल, नजर आये, 
साथी, कोई न मिलें, मालिक, कर, क्या पाये।
सब = बच्चा, नौकर, पशुु, मशीन, नेता और नारी



सम्बन्धी

सम्बन्धी 
हम सब एक-दूसरे से हैं और एक-दूसरे केे लिये हैं।


सृष्टि में पृथ्वी पर, हर इंसान एक-दूसरे का कुछ न कुछ है। मतलब सम्बन्धी है। वैज्ञानिकों के अनुसार या धर्मग्रंथों के अनुसार भी यही बात सही है कि हम सब एक ही माँ-बाप की संतान हैं। पहले बड़ों की आज्ञा से कर्मवश, मजबूरी या अपनी सहूलियत के कारण जाति बनी। जैसे बाप ने कहा, बेटा कपड़े सीने है, वह दर्जी बना, जूते बनाने है या चमड़ा सही इस्तेमाल करना है, चमार या हरिजन बना, खेती करनी है किसान, हल-चारपाई बननी है, बाड़ी बनाया या बने, और गिनी चुनी जाति बनाई या बनी। किसी भी कारण से, किसी गलत आचरण के प्राणी ने या बड़ों की किसी गलती से चारों पुत्रों में अलगाव हुआ और हिन्दू, मुसलमान, सिख, इसाई बनें और अपने गलत अहंकार से या गलत शिक्षक या गलत साथी के कारण, अलगाव को गहन बनाने के लिए या समय और जगह के कारण, अपने रोजमर्रा के काम में लगातार बदलाव आता गया।
कहा जाता है ”नासमझ दोस्त से समझदार दुश्मन बेहतर है“, लेकिन जब अज्ञानता या अधूरा ज्ञान हो, तो प्राणी बेहद तेजी से अपने समाज (ध्यान दें), अपने समाज को साम, दाम, दण्ड, भेद से बढ़ाने की कोशिश करता है और हर अनियमितता खुद-ब-खुद बढ़ती चली जाती है और हर व्याधा बीमारी तक घेरने लगती है। आज हमारी अनेक जाति बन गई हैं, अनेक धर्म बन गये हैं। गलत नेताओं के कारण बंटने में असीमित वृद्धि हुई है। अनियमितता हर किस्म से बढ़ी है। हमारे बड़े थे, और पीछे जाये या सबसे पीछे जाये, तो भगवान है, अल्लाह है, वाहेगुरू है, यीशु है, हम इन्हीं की संतान हैं।
आपके दो बच्चे हैं, आप कब चाहते हंै कि भाई-भाई अलग हो। रब के सब, बच्चे है, वो कैसे चाहेगा कि अलग हो या द्वेष-भाव रखे। रब ने, सब कुछ आपके लिए छोड़ा है या दिया है। भगवान, अल्लाह, वाहेगुरू यीशु ने आपको, हमें सब कुछ दिया, पूरी कायनात दी। यही नहीं, बुद्धि दी, जिसकी कोई सीमा नहीं और सबसे कीमती है। सब अच्छी चीजें हमें दी। बस सुधारना, इस्तेमाल करना या सीखना, हमें आना चाहिए। यह सब, हम अपने बड़ों से, सम्बन्धीयों से सीखते आये हैं।
थोड़ा सा और गहराई, से सोचें, हमारा शरीर है। शरीर के बहुत सारे, अंग हंै या हिस्से हंै। सिर, आँख, नाक, मुँह, हाथ, पैर, अंगुलियाँँ। छोटी-बड़ी, यहाँ तक कि, नाखून, बाल तक सब हैं। सबको मिलाकर शरीर बना है। हम कहते हैं, पैर की, छोटी उंगली है, क्या उसकी अहमियत कम है? क्या हम बेकार, छोटी उंगली को, काट सकते है? उसे काटकर, क्या हमारा शरीर पूरा है? कभी नहीं। उसकी गलती पर भी, हम उसे, हर हाल में बचाने की कोशिश करते हैं, या सुधारने की कोशिश करते हैं। हमारा सिर, मेन पाॅवर है। जैसे परिवार में, बाप, बाबा या जिसके सिर पर पगड़ी बंधी है। नारी के लिए भी, लेकिन शादीशुदा नारी का सिर, उसका पति है, बड़ा लड़का है। आश्रम में, गुरू है। विद्यार्थी के लिए, स्कूल-काॅलेज मंे, अध्यापक हैं। समाज में पण्डित-मौलवी, ग्रन्थी-पादरी है। इस सिर में, थोड़ी सी कमी आ जाये, तो पूरे शरीर के, किसी भी अंग में, कोई भी कमी आ सकती है। हाथोें में, लेफ्ट व राईट हाथ हैं। हर इंसान या हर जीव, शरीर के अगों का ध्यान रखता है और पूरा जीवन-चक्र चलता है। जब हम, इन्हें अलग नहीं करते, द्वेष-भावना, इन अंगों के प्रति नहीं रखते, तो यह, जाति, धर्म, देश को बांटने या तोड़ने की या किसी की इज्जत कम करने की कोशिश क्यों करते है?
अज्ञानतावश, हम अपने परिवार (केवल परिवार) को ही बढ़ाना चाहते हैं। ज्यादा से ज्यादा कोशिश की, तो बिरारदी को बढ़ाना चाहते हैं। थोड़ा और समझदार हुए तो अपने धर्म को बढ़ाना चाहते हैं। लेकिन और बढ़ोत्तरी व समझदारी करें तो, हर धर्म, हर जाति को बढ़ा सकते हैं तथा सबको सुखी बना सकते हैं। आप, बाप बनिये तो, सबको बराबर समझेंगे और सबसे बड़े बन गये तो, पूरी सृष्टि को ही बराबर समझेंगे व चाहेंगे। वह रब है, उसके यहाँ, हर जीव-जन्तु या सब पलते हैं और वह किसी को मारता नहीं। एक गलत नेता चाहता है, उसकी पार्टी के ही सब हों, एक आश्रम वाला चाहता है, सब इस आश्रम के हो। हिन्दू अज्ञानी, हिन्दू को चाहता है, मुसलमान केवल मुसलमान को चाहता है। गलत सिख या गलत इसाई, केवल सिख धर्म या इसाई धर्म की बढ़ोत्तरी चाहते हैं।
क्या हमारा सिर या दिमाग, शरीर में केवल एक अंग की ही बढ़ोत्तरी चाहता है? कभी नहीं, वह सब अंगों की बराबर बढ़ोत्तरी चाहता है। यह नियम है, इसको हम और आप क्यों तोड़ना चाहते हैं? आज से पहले भी और अब भी, नासमझ रहे तो, आगे भी हर गलत कोशिश और हर प्रपंच करते रहे हैं, करते रहेंगे। कहीं मन्दिर में घंटे बजाकर, लाउडस्पीकर में नमाज पढ़कर, वाहेगुरू का शब्द लाउडस्पीकर से गाकर, जगराते, सड़कंे जाम करके, एक-दूसरे की परेशानी बढ़ाकर, खुद को बढ़ाने की, गलत कोशिश करते रहेंगे।
यही नहीं, हर राजनीतिज्ञ पार्टी, बैनर झण्डे लगाकर, रैली, जलूस निकाल कर, हर गैर सरकारी प्राणी, सरकारी प्राणी और देश के भविष्य विद्यार्थीगण को बाधित, नकारा व परेशान करते रहे हैं। पहले राजा-महाराजा अपना राज बढ़ाने के चक्कर में करते थे, आज पार्टी बढ़ाने के चक्कर में करते हैं और संत महात्मा कहलाने वालों ने तो, अलग-अलग तरीके से विज्ञापन व दूरदर्शन पर प्रवचन करके, गलत बढ़ोत्तरी करके, सबको बाधित किया है।
राम-राम, जितना कहो, कुछ भी, राम न होय, 
राम जैसा, कुछ भी करो, जय-जय राम की होय।
हम सब शरीर के अंगों के समान हैं, सब एक-दूसरे के सम्बन्धी हैं, गैर सरकारी प्राणी, सरकारी प्राणी, नेता या हर जाति, हर धर्म व हर विभाग का, हर कर्मचारी और देश का भविष्य विद्यार्थीगण तक भी सम्बन्धी ही तो है, और जिस प्रकार हम शरीर के हर अंग की सफाई-सुधार का ध्यान रखते हैं। हर दिन स्नान तेल, खुशबू से सबकी ही व अपनी पसंद हो, हर अंग को रखते हैं। सुधार के लिए दवा, इन्जेक्शन, कड़वी दवा, यहाँ तक कि आॅपरेशन, काट-छाँट करके, मोटा पैसा व समय लगाकर, सारे सम्बन्धीयों के सहयोग से, एक अंग को भी अपने लायक व सबके लायक बनाते हैं और बाद में सुख उठाते हंै, इसी प्रकार परिवार में, हर कोशिश से बच्चों का सुधार करते हैं। समाज में, जाति में, सुधार करने की, हर कोशिश करते हैं, इसी प्रकार अपने सम्बन्धियंांे का ध्यान रखना ही चाहिये। थोड़ा सा और कर्मठ, वफादार, समझदार बनिये। हर विभाग, हर नेता, हर कर्मचारी का ध्यान रखिए, हर अनियमितता को, आप खुद, सुधार सकते हैं। सुधारने की कोशिश तो, कर ही सकते हैं।
अगर कुछ नहीं कर सकते हो तो, अविलम्ब, परिवार को, विभाग को, अधिकारी को और या उपर तक शिकायत, तो कर ही सकते हैं। यह भी मुमकिन नहीं तो हमें, लिखिए और तीन आदमियों के साईन, उनके वोटर/आधार नंबर के साथ लिखिए, सुधार होगा। घर है तो, आपका ही, आप छोटे हैं या मुखिया हैं, समाज, देश, संसार सब आपका है। अगर आप, सरकारी प्राणी हैं, तो आॅफिस व पूरा विभाग आपका है। आप, छोटे कर्मचारी हैं या अधिकारी हैं, तो सब आपके अंगों के समान हंै। सारे सम्बन्धी हैं। आप, जिस परिवार, खानदान या जिस विभाग में हैं, ध्यान दे, कोई गंदा न हो। इन्टरनेट पर शिकायत-सुधार करना बेहद आसान है, आप हिम्मत तो करें।
थोड़े और बढ़िये, स्वाभिमान बढ़ाईये और सब विभाग या कर्मचारी व अधिकारी, आपके सम्बन्धी के समान है और थोड़ा सा विश्वास जगाइये, सारे नेता, सारा मीडिया, आपके सम्बन्धी हंै और, सब शरीर के अंगों के समान हैं। एक उंगली गन्दी या गलत हो, तो आप किसी लायक नहीं रहते, जब तक यह उगंली ठीक न हो, आप चैन से नहीं बैठते, इसी प्रकार, आप सबका ध्यान रखिए और सुधारने की खुद भी, कोई सही युक्ति सोचें और सबका, सहयोग भी लें। लेकिन सुधार की सोचे, युक्ति मिलेगी। हमारा सहयोग लें, जो जितना बड़ा है, उसी के मुताबिक सुधार-सफाई करता है, रखता है। सब बड़ों का व रब का भी यही नियम है। अनेक सबूत मिलेंगे, इतिहास गवाह है। अनेक राजा-महाराजा हुए हैं, चक्रवर्ती राजा हुए हैं। अकबर बादशाह, छोटी सी आयु में गद्दी पर बैठा और इस नियम पर, ”घर का सुधार = गलती पर अविलम्ब सजा और मेहनती को प्रोत्साहन“, पर हर कर्मचारी, वफादार, कर्मठ व नमक हलाल रहा। हर धर्म की इज्जत हुई, बादशाह अकबर ने, लम्बे समय तक व लम्बी दूरी तक सफलता से राज किया। मिसाल दी जाती है। शेर और बकरी, एक घाट पर, पानी पीते थे। हिन्दू, बीरबल तक मंत्री पद पर रहे। अंग्रेजों ने, लंबे समय तक राज किया। उनके नियम-कानून, हमेशा याद रहेंगे। घोर अत्याचारी साबित होने पर भी, भारतवासी ही कहते मिल जायेंगे कि इस राज से तो, अंग्रेजों का राज ही अच्छा था। सबसे नजदीकी और खास, सम्बन्ध होता है, छोटे-बड़े का। किसी भी जीव में या सब में, निश्चित ही छोटा या बड़ा होता है। जो भी, यह सम्बन्ध निभाता है। वह सुरक्षित और सुखी व समृद्ध रहता है। 
एकांत में रहो, शान्त रहो, सोचते रहो लेकिन, करते भी रहो, हर समस्या का, समाधान निश्चित, मिल जायेगा। बड़ा वह है, जो अपने या किसी, बड़े की आज्ञा पर अमल करे, और अपने छोटों को अच्छी तरह पाले। जो समझदार है, वह बड़ों की आज्ञा में रहता है। जो बड़ों की आज्ञा में रहता है, वह आने वाले समय में, निश्चित बेहद बड़ा बनेगा, बेहद समझदार बनेगा।
गीता के अनुसार, कर्म प्रधान होता है और जितने ज्यादा को, हम अपना बना सकें, उतने ज्यादा हम बड़े, बनते जाते हैं। हम सब, अपना पहला कर्म, भूल रहे हैं या जानकर, भूला रहे हैं। बचपन से बोलना आते ही, सिखाया गया कि, सच बोलो, बड़ों की बात पर अमल करो, सफाई रखो, इसके बाद नमकहरामी, कभी नहीं, सबसे प्यार रखो, सब धर्म-स्थलों पर, आश्रमों पर, हर धर्म-ग्रंथ में सीखते व सिखाते हैं, लेकिन बड़े होते-होते, सब भूलते जाते हैं। हम, अपने इष्ट की पूजा करते हैं लेकिन पहला, सही कर्म व धर्म भूलते जाते हैं।
बड़े अज्ञानतावश, अपने छोटों की अच्छाई में, उनका साथ तक, नहीं दे पाते। इसी का फल, यह होता है कि, सबसे पहले पत्नी-अर्धांगनी ही आज्ञाकारी नहीं रहती और हम, नौकरी, बिजनेस या पूजा-पाठ में व्यस्त रहने से और, झूठे या अधूरे प्यार में, पत्नी का सुधार नहीं रख पाते। आने वाले समय में, बच्चे जो, पत्नी की छत्र-छाया में रहते हैं, उनका सही पालन नहीं हो पाता। लड़का-लड़के के तरीके से, लड़की-लड़की के तरीके से, पलनी चाहिए, पल नहीं पाते और यह छोटी सी कमी, सारी सृष्टि को गड़बड़ाने के लिए, काफी साबित होती है। हमें याद रहना चाहिए कि हम सब, सम्बन्धी हैं। एक-दूसरे से हैं, एक-दूसरे के लिए है। हम अलग जाति और अलग धर्म के हैं, लेकिन एक शरीर के अंगों के समान है। हम सब को, एक-दूसरे की सफाई-सुधार का ध्यान रखना है। अगर हम, अपने बड़े के गले लिपटते रहें, बार-बार उन्हें पुकारते रहें, तो वह भी हमें, थप्पड़ मार कर अलग कर देता है, और डांट पड़ती है कि जो काम सौंपा है, वह पूरा करो। सबसे ज्यादा, उपर वाला ही कठोर है, क्योंकि वह कठोर नियम में बंधा है, उसका नाम जपो या न जपो, केवल उसकी इच्छा के काम करते रहो, वह खुश होगा। मनुष्य के अलावा, हर जीव ऐसा ही कर रहा है और वह पहले भी खुश था, अब भी बेहद खुश है, पूरी उम्र, आजाद रहता है और हर व्याधा व हर बीमारी से बच रहा है।
सम्बन्धों में ही, एक शब्द आता है, ”दुश्मन“। यह भगवान ने नहीं बनाया। यह दुश्मन या दुश्मनी, हर जीव ने खुद बनायी। भगवान, अल्लाह, वाहेगुरू, गाॅड ने, सब अच्छी और सच्ची चीज ही बनाई हंै। दुश्मन शब्द, बेहद खास अहमियत रखता है। आपका आचरण गलत होते ही सामने वाला, आपका दुश्मन बन जाता है।
बैरी न बनाया राम ने, बैरी, खुद बन जाये, 
स्यानी बुद्धि, पाय के, बैरी ही बैरी, नजर आये।
स्यानी = चालाक
मतलब, हमारा बड़ा चाहता है, आप अच्छे बनंे। भगवान, अल्लाह, वाहेगुरू, गाॅड ने सारी कायनात बनायी। जो आपके दोस्त है या दुश्मन। दोस्त है, तो ठीक है, दुश्मन है, तो उन्हें दोस्त बनाईये। चारों तरफ नजर डालिये। हर एक के चारों तरफ, दुश्मन हैं और इसी के कारण आप मजबूत हंै। एक पेड़ की दुश्मन, हवा है, वह पेड़ को हिलाती डुलाती है। यह हवा, पेड़ के लिए मौत जैसी है। लेकिन, अगले एक साल में, वह पेड़ मजबूत तने वाला बन जाता है। मनुष्य के लिए, सर्दी बर्दाश्त करने की आदत पड़ते ही, गर्मी आ जाती है। इसका मतलब, यह बिल्कुल नहीं है कि यह दुश्मन, आपको या इनको, मारना चाहते हैं। दुश्मनी, हमें मजबूत बना रही है। बाप, बड़ा भाई, गुरू आपको पीट-पीट कर, हमेशा, दुश्मनी जैसी निश्चित निभाते हैं, लेकिन आप बुद्धिजीवि हैं, इसलिए सही सोचते हंै और हमेशा उन्हें भगवान, अल्लाह, वाहेगुरू, गाॅड मानते हैं।
सारी सृष्टि, आप की, दुश्मन जैसी लगती है केवल, आपको मजबूत बनाने के लिये। रावण, राम का घोर बैरी था। इस पर भी, राम ने रावण के चरण छूये, राजनीति सीखी और अपनी प्राण प्रिय पत्नी को पा सका।
बैरी, आँगन राखियों, नींद, कभी न आये, 
तू जागत, ही रहे, जो जागा, सब पाये।
आप अपने दुश्मन के प्रति, धर्म-नियम (सच्चे) निभाईये, मानव धर्म, अपनाईये वह आपका, सबसे वफादार दोस्त से ज्यादा, विश्वास के लायक, दोस्त बन जायेगा। हमें, दुश्मनी जैसा, गलत शब्द, खत्म करना है। वह बेहद, आसान है, खुद सोचंे, अनगिनत मौके हंै, आपका आचरण है व हर त्यौहार आना, आपकी दुश्मनी, खत्म करने का मौका, आना ही है। दुश्मनी, गलत लालचवश ही, होती है। हर छोटा, गलत लालचवश ही, हर बड़े के साथ, गद्दारी कर रहा है, घटिया दुश्मनी, करता है, यहाँ बड़ा अगर, कम ज्ञानी है, तो हमेशा, हारता है।
बड़े के बैरी, सब रहे, कभी, बाज न आये, 
मौका कोई, चूकंे नहीं, खुद भी, नर्क में जाये
आब का सम्बन्ध, सबका नहीं, जर है, सबकी चाह, 
जर की चाह, जिसकी रही, आब क्या, वंश खत्म हो जाये
सब = बच्चे, नौकर, पशुु, मशीन, नेता और नारी।
आब = इज्जत या नाम
जर = जमीन या कैसा भी धन।
दुश्मनी, कैसी भी हो, हमेशा बडे़ का ही, नुकसान है। दुश्मनी घर, परिवार, सम्बन्धी, समाज, देश की, दूसरे देश से हो, सब गलत है। हर जगह, जनता (राजा) का ही नुकसान है। घर, परिवार में बच्चे, बड़े, मुखिया या जिसके भी सिर पगड़ी बँधी हो, को छोड़कर, सब जनता है। समाज में, प्रधान को छोड़कर, सब जनता है। फैक्ट्री व मालिक के लिए नौकर व प्राणी, जनता है। समझदार प्राणी हमेशा, दुश्मनी भी समझदार से ही करता है। कुछ की, दोस्ती भी बुरी और दुश्मनी भी बुरी। जैसे पुलिस की दोस्ती और दुश्मनी भी ठीक नहीं, इसका सही मतलब यह है कि पुलिस, सरकार की वफादार है, आपकी कोई भी गलती, कभी भी पुलिस की नजर में नहीं आती, लेकिन दोेस्त बनाते ही, आपने अपने उपर, अपना पहरेदार जैसा, बिठा लिया। चाहे आप, बेहद अच्छे हैं, साफ-सुथरे हैं, कोई गलती नहीं करते, लेकिन आपका दोस्त, सरकारी नौकर है, दोस्त बनते ही, आपसे नाजायज फायदा जरूर उठायेगा। दुश्मनी तो, हर हाल में पुलिस से बुरी है। बेहद बुरी है, सब जानते हंै। सबमें, दोस्ती-दुश्मनी का, एक खास स्तर होता है, जिसको रखने पर, हमेशा फायदा होता है। इससे, आपको और औरों को भी, फायदा होता है। यह स्तर, खुद सोचना-समझना पड़ता है, जो केवल, अच्छे समझदार सलाहकार की या बेहद प्रखर बुद्धि, खर्च करने पर ही मिलता है। लेकिन, नेता जो लगभग, सब जगह देश-विदेश तक में हंै, इनकी दोस्ती भी, बेहद खतरनाक है। आपका, इनके आसपास रहने पर भी, आपके वंश तक में, हर गलत बीज तक बोने में यह, निश्चित कामयाब होते हैं, जिसमें दोष इनका है ही नहीं, वोट की चाह, सीट की इच्छा इन्हें, हर गलत काम की इजाजत दे देती है। आप अगर, मानव-धर्म निभाकर, रैली में चले भी जाते हंै, तो गलत कर देते हैं और सारा समाज व पूरा देश भुगतता है। नेतागिरी में, चुनाव लड़ने से ही, लड़ाई और दुश्मनी शुरू हो जाती है और पूरी आयु चलती है, कोई खत्म करके दिखाये?
दुश्मन बनाना, बेहद आसान है। इस समय, हर सरकारी प्राणी, हर एक को, हर एक से, केवल रिश्वत लेकर अपना, दुश्मन बना रहे हैं या काम में देर करके, जनता को, सरकार की दुश्मन बना रहे है और नेता का, फायदा कर रहे हैं। लेकिन, सच्चाई इससे भी गहरी है। यह सरकारी प्राणी अपने ही नहीं, पूरे देश के पालनहार से, रिश्वत लेकर, अपने विभाग और अपने वंश से, दुश्मनी निभा रहा है और देश के पालनहार से, दुश्मनी मोल ले रहा है। ऐसा आगे निश्चित होगा कि, यह मात्र प्राणी 10/-की जगह 50/-रिश्वत में देगा और आने वाले, किसी भी दिन, रिश्वत लेने वाले से या, उसके अधिकारी से या, पूरे विभाग से, हर हाल में ब्याज व हर्जे, खर्चे सहित, जरूर वसूल करेगा, चाहे उसका ट्रांसफर कही भी हो। रिटायरमेन्ट हो या उसकी मृत्यु ही हो जाये, लेकिन चाहे रिश्वत लेने वाले के परिवार से ही वसूल करनी पड़े और कानून, खुद कहेगा कि अदालत में जाने के लिये, यह विभाग शुरू में ही खर्चा और दिहाड़ी केवल शिकायती प्राणी की पगार, पेंशन, फंड से या विभाग से ही लिया जाये जजमेन्ट के बाद, दोषी न पाये जाने पर चाहे, उपभोक्ता से जुर्माने के साथ वसूल किया जाये।
उपभोक्ता जरूर जागेगा, उपभोक्ता के जगते ही, गलत को सजा से, कोई नहीं बचा सकता। गलत को बचाने वाला, भयंकर सजा का हकदार हेागा। उपभोक्ता, अकेला भी पालनहार है, तो दुश्मनी का सम्बंध, अकेला भी निभायेगा। हर तरीके से निभायेगा और, सब उसका साथ देंगे। खासतौर से ”सूर्योदय’ तो जरूर देगा। सच्चाई का साथ, हर इंसान देना ही चाहता है। सरकार कानून तक साथ देना चाहता है, साथ देता है।
इस समय हर घर में, बाप-बेटे में निश्चित, दुश्मनी या मनमुटाव है, जिसका दोषी, बेटा तो है ही नहीं। हम पहले केवल, पति-पत्नी थे। बेटा बहुत बाद में, आया और उसको पालने का श्रेय, हमारी पत्नी का ही था। एक पुरूष, पत्नी के लिए, परिवार के लिये, राजा, भगवान, अल्लाह, वाहेगुरू, गाॅड होता है। राजा की पत्नी, मंत्री रूप है, जिसकी अकर्मठता, गद्दारी, नासमझी, बेवफाई, बाप को बाप ही नहीं, राजा, भगवान, अल्लाह, वाहेगुरू या गाॅड तक, रहने ही नहीं देती और अज्ञानतावश, परिवार, समाज, कानून तक, राजा का साथ नहीं दें पातें। राजा भी, नासमझी में सही इलाज, सोच ही नहीं पाता और खुद का बेटा भी, पूरी जिन्दगी पूरा न होने वाला नुकसान, सहता है। बाप का तो, नुकसान हो ही गया, अगर कहीं बेटा समझदार बन के माँ को, बाप की पत्नी मान ले तो, फौरन दुश्मनी, गहरी दोस्ती में बदल जाती है और यह बेटा, असीम उँचाई पर निश्चित पहँुचता है। यह सच्चा ज्ञान है।
बाप अगर समझदार बन के, पत्नी का दोष जानकर, बेटे को गैर समझकर, सही बर्ताव करे तो, कुछ दिन में दुश्मनी, दोस्ती में बदल जायेगी। पति को, पत्नी दोषी नजर आते ही, पत्नी के साथ जितने रिश्ते-नाते, जुड़ते हंै, सब से नजदीक रहकर, बेहद दूर, रहना चाहिये चाहे वह, पति का दिया हुआ ही है। यहाँ भी सब, (कुछ कम ज्ञानी) सब कुछ छोड़कर, सन्यास ले लेते हैं, जो कि गलत हैं और पूरा ज्ञानी, पत्नी के पास रहकर, सन्यास लेता है। धीरे-धीरे सब कुछ सही हो जाता है, यह ईलाज ही, सही ईलाज होता है। लड़का-लड़की, धन, मकान, सब कुछ, बड़े लड़के का मानकर लड़के का सुख, अपना सुख, समझकर छोडे़, तब ही आगे स्वर्ग है।
कहते हंै-पूत-कपूत तो, क्यों धन संचय? पूत सपूत तो, क्यों धन संचय? जब तक पत्नी समझदार और वफादार नहीं, तब तक भी, हर चीज बड़े की है। बड़े है, राजा है, राज केवल मंत्री की, सही सलाह पर चलता है। मंत्री, बदला जा सकता है लेकिन पत्नी, बदली भी नहीं जा सकती और इलाज बेहद, मुश्किल होता है। साम, दाम, दण्ड, भेद के, सही मिलान से, बड़ी समझदारी से ही, कुछ मुमकिन है। यहाँ नारी का, समझदार होना बेहद जरूरी है। कोई आजमा ले। घर में, पति की इच्छा से, जो भी आयेगा, सब का वफादार होगा या आयेगा ही नहीं। पत्नी या नारी की इच्छा से या बिना पति की इजाजत के, देवी, देवता, भगवान, अल्लाह, वाहेगुरू, गाॅड भी आयेगा, तो, परिवार के लिये या मुखिया के लिए, आज नहीं तो कल निश्चित, नुकसानदायक होगा। पति की बिना इजाजत के, कोई धर्म करना, धर्म रहता ही नहीं। बेटे को पालने में, पति से छुपाव, झूठ रखा, तो बच्चा, बाप का वफादार नहीं रहता। जैसे धरती, सबको पालती है। लेकिन सूर्य की इजाजत लेती है। सूर्य की एक मिनट की इजाजत, न लेना, पूरे ब्रह्माण्ड में, तहलका मचा देता है।
लोग बाग, बँटवारा करते हंै। एक घर में, तीन-तीन चूल्हे, गलत हंै। बँटवारा करना है, तो प्यार से कम से कम शहर से दूर रखना ही, सही बॅंटवारा है। यह सही बँटवारा, आने वाले समय में, सबको मिला सकता है। लेकिन एक घर में, तीन चूल्हे करना, सब की तौहीन करना और दुश्मनी, गहरी करना है। अधिकतर लोग अपने खून के प्रति दुश्मनी को, मामूली समझकर निगलेक्ट करते है, जो गलत है, इसी कारण यह दुश्मनी आज, हर घर में है। हर दुश्मनी को गहराई से लेनी ही चाहिए क्योंकि, हमें दुश्मनी, दोस्ती में बदलनी है। आज, हर देश का कानून है, सुधार की हर, कोशिश कर रहे हंै, इसलिये विश्व अदालत तक बनाई गई है।
यह तो निश्चित है कि, हम सबका बाप, भगवान एक है। हम सब, सम्बन्धी हैं। एक-दूसरे के यहाँं, आना-जाना, रहना, काम करना, किसी भी कारणवश होता है, जब तक हम समझदार हैंै। तब तक हम, जिसके यहाँ जाते हैं, उसी के मुताबिक खाना, सोना, रहना करते हैं। मेहमान, सब जगह, भगवान रूप माना जाता रहा है। मेहमाननवाजी में, कोई कसर नहीं छोड़ता, लेकिन मेहमान का, सहयोग भी होता है, जैसा खिलाया, खाया जहाँ सुलाया, वहीं सोये, उनकी परेशानी में साथ देना, उनका सहयोग करना हैं, उन्हें कोई सिरदर्दी नहीं देते, यही धर्म है। यह धर्म हम, भूलने लगे हैंे।
हम भारत में रहते हैं, तो यहाँ के कानून-नियम पर अमल करना ही चाहिए। अमेरिका, जापान में रहें, तो वहाँ के कानून-नियम का पालन करना चाहिए, लेकिन हम विपरीत करते हैं। यूनिटी बनाकर, विद्रोह करते हैं। अपने देश को, भूलना नहीं चाहिए। लेकिन, जहाँ का अन्न खाते हैं, पानी पीते हैं, वहाँ की अहमियत, कम हो ही नहीं सकती। यही धर्म है। वहाँ के कानून से भिड़ना, धर्म है ही नहीं। समाज के नियम को मानने वाला, समाज में बड़ा हो जाता है। देश के नियम या कानून को मानने वाला, सब में बड़ा निश्चित ही बनता है।
हम धर्म-स्थल पर जाते हैं, तो वहाँ के नियम, पूरी मुस्तैदी से अमल करते हैं। आश्रम पर भी करते हैं। होेटल या मनोरंजन पर मोटा खर्च करके, उनके हर नियम निभाते हैं, लेकिन देश के प्रति, यह लगाव नहीं, घर परिवार या जहाँ, हम काम करते हैं, वहाँ हम हमेशा नियम-कानून तोड़ने की, हर चेष्टा करते हैं। मालिक के प्रति, हमें सब कबूल है, वह हमें हर कष्ट देता है, तो हम अपनी ही गलती मानकर, सिर झुकाकर कबूल करते हैं। लेकिन नारी के लिए, उसका पति, बच्चे के लिए, उसका बाप, नौकर के लिए उसका एम्पलाॅयर, मालिक है, भगवान है, लेकिन वहाँ हम गद्दारी करते हैं। हमारे छोटे-बड़े, घर में, नौकरी पर, संगी-साथी है और छोटे-बड़े सब हैं। देश में सब, जनता, साथी, नेता, किसी अनियमितता को रोकते नहीं और इसी कारण, हर घर में, हर फैक्ट्री में, हर देश में, सारे परेशान हैं।
समझौता, सम्बन्धों में, आरी है, आगे बस, ख्वारी की तैयारी है, 
समाज भी, निश्चित गंदा हो, घर की बरबादी की, तैयारी है।
ख्वारी = दुर्गति
घर = देश, संसार
आप देख रहे हैं, आश्रम, मन्दिर, मस्जिद, गुरूद्वारे में जो बनता है। हल्के से हल्का, खुशी से खाते हैं और रब का और गुरू, पीर-पैगम्बर, देवी-देवता का एहसान मानते हैं। कम हो तो कहते भी नहीं, किसी भी गंदगी को सुधारते या छुपाते हैं और इसी कारण, हर धर्मस्थल, आश्रम, सदाबहार हैं। ऐसा अपने घर में, बाप का, बड़े भाई का, साथ क्यों नहीं देते? जहाँ पैदा हुए, परवरिश पाकर बड़े हुए, या नारी जो केवल सात फेरे (चार फेरे) या निकाह करके, वहाँ बिना कुछ भी किये, मालकिन बनी, माँ बनी, सारे सम्बन्धी मिले, वहाँ थोड़ी सी कोताही पर, मालिक की व पूरे खानदान की, शान्ति और इज्जत, भंग कर देती है।
हर प्राणी को सोचना ही चाहिए, कि जिस पार्टी में जायेंगे या जिस फैक्टरी या मिल में जायेंगे, जिस घर में जायेंगे, वहाँ के नियम पर अमल करके, वहाँ के बड़ों की इज्जत, बढ़ाने में ही समझदारी है। कुछ त्याग करना पड़े या कमी में, गुजारा करना पड़े तब भी, चुपचाप भुगतने में ही, सबका भविष्य संुनहरा होने की गारण्टी है। ऐसा कर्मचारी या घर की नारी या ऐसे बच्चे, निश्चित यश पाते हैं, और उनकी बढ़ोत्तरी व समृद्धि निश्चित है।
सम्बन्धी या सम्बन्धों में सबसे बड़ा है, प्रेम सम्बन्ध और उससे भी बड़ा है, देश प्रेम सम्बन्ध। प्रेम का मतलब उसका सफाई-सुधार रखना है।
जहाँ से जहाँ तक नजर मारेंगे, केवल प्रेम ही मिलेगा। चांँद, सूरज से लेकर पृथ्वी, आकाश का प्रेम, नारी, पुरूष, जानवर, पक्षी, भगवान, देवी-देवता, पीर-पैगम्बर आदि का प्रेम। प्रेम में, जाति-धर्म या योनि या छोटा-बड़ा, कुछ नहीं होता। समय, उम्र तक का कोई, बंधन नहीं होता। ध्यान देंगे, तो सारा संसार प्रेम-संम्बध में बँधा हुआ है और बँधा रहेगा। इस प्रेम सम्बन्ध होने के बाद, खास उपलब्धि निश्चित होती है। दोनों प्रेमी, एक-दूसरे में, भगवान, अल्लाह, वाहेगुरू, गाॅड देखते और समझते हैं। खास बात यह है, कि ये प्रेम, दुश्मन को भी दोस्त बना देता है। संसार का हर जीव, इस प्रेम-सम्बन्ध के लिए ही, जीता है। हर कर्म करता है और मर जाता है।
माना मुहब्बत जिन्दगी, बर्बाद करती है, 
ये क्या कम है, कि मर जाने पे, दुनियाँ याद करती है।
देश प्रेम में तो 30 प्रतिशत लोग हमेशा, हर दिन जीते हैं और हर दिन मरते हैं। यह कर्म मनुष्य के होश संभालते ही शुरू हुआ और निश्चित ही, पृथ्वी के खत्म होने से पहले तक, हर जीव-निर्जीव देश प्रेम की बली चढ़ेगा। आप सब आमंत्रित हैं, सारे संसार में, हर प्राणी के, एक-दूसरे से सच्चे संम्बन्ध हैं, आप साबित करे।
समझौते से, नुकसान अच्छा, थोड़ा नुकसान, सब कुछ बचाना है, 
अपना, समाज का, घर का, कुछ बचा कर, बड़ा धर्म निभाना है।
समझौता कर, गलती पर सजा देना, निश्चित कर, 
कानून-नियम मान, खुद को सुन्दर बना, सुनहरा सबका संसार कर।



गुलाम

गुलाम


पहले गुलाम थे हम, अब जलील भी हो गये हैं, 
कभी गुलाम गैरों के थे, अब अपनो के हो गये हैं।
करते थे अत्याचार जो, मालिक थे, वो हमारे, 
करते हैं अत्याचार अब, नौकर हैं, वो हमारे।
(रोजी रोटी देने वाला मालिक होता है)

सुभाष, लक्ष्मी, भक्त सिंह, पले थे, कभी यहाँ पर, 
देशद्रोही, गद्दारों की खेती की जाती है, अब यहाँ पर।
शेर एक होता है, राजा एक होता है, अरे कुछ कर ऐसा, 
मिटने लगे गद्दार, साबित हो, तू ही है, मर्द बच्चा।
खुद बीड़ा उठायें, जलवे दिखायें



अपील
आप बुद्धिजीवि है, स्वाभिमानी हैं, आप अपने बच्चो की उँगली गंदी देख नहीं सकते, कुत्ते की गन्दगी देख नहीं सकते, सबसे प्रेम करते हैं तो अपने अनमोल सरकारी प्राणी और नेता की गन्दगी (गलती) कैसे-क्यों बर्दाश्त करते हैं? इनके वंश को गंदा होते देख कर बर्दाश्त क्यो करते हैं? इन्हें सुधार कर देश पर हर प्राणी पर एहसान क्यों नहीं करते? सबको एक-दूसरे का ध्यान रखना ही पड़ेगा। सबसे सच्चा प्रेम करो, हर धर्म-ग्रन्थ का कहना है-

पोथी पढ़-पढ़ जग मुआ, पण्डित भया न कोई।
ढाई आखर प्रेम का, पढ़ा सो पण्डित होई।।



पुस्तक - विशाल ज्ञान-विज्ञान सबका समाधान - भूमिका

पुस्तक - 
विशाल ज्ञान-विज्ञान सबका समाधान

भूमिका

कहा जाता है कि जब-जब अत्याचार या अनियमितताएं बढ़ी हैं, तब-तब कोई न कोई महापुरूष आया और उसने प्रजा या जनता को जागरूक किया या अत्याचार के खिलाफ खड़ा हुआ। संसार में हर देश में, हर प्रदेश में, हर धर्म में, हर जाति में, निश्चित महापुरूष आये, इतिहास गवाह है, राम, कृष्ण, इब्राहिम, ईशु, मरियम, जैसे अनेकों आये या पैदा हुये। रामायण, गीता, कुरान, बाइबिल, गुरूग्रन्थ साहब जैसे अनगिनत धर्म ग्रन्थ सदीयों से समाज को लगातार जाग्रत करते आ रहे हैं। भारत में, तुलसीदासजी ने जब देखा कि हिन्दू समाज बिखरने लगा है, हिन्दू जाति मौत के कगार पर है, तब तुलसीदासजी ने बाल्मिकीकृत रामायण को वीर रस में ढाल कर, समाज को सौंपा और समाज में हर साल, रामलीला जैसे प्रोग्राम बना कर सारे संसार को लगातार जाग्रत करती आ रही हैं। इस ग्रन्थ को पढकर प्रेम, जोश, सहनशीलता, राजनीति ही नहीं, घर-संसार चलाना, सेवा भाव, दुश्मन को सही रूप में धराशायी करने जैसा सारा ज्ञान निश्चित मिलता है। ”विशाल ज्ञान विज्ञान सबका समाधान“ पवित्र पुस्तक की रचना भी शायद ऐसी ही सफल कोशिश है।
पूरे संसार में हर जगह महापुरुष, पण्डित, मौलवी, ग्रन्थी, पादरी, साधु-सन्यासी और हर धर्म ग्रन्थ होने के बाद भी, यही नहीं, हर इंसान पढ़ा लिखा होने के बाद भी ”जिसकी लाठी उसकी भैंस“ जैसा नियम बरकरार हैं। इस समय, गैर सरकारी प्राणी, सरकारी प्राणी और नेता के अधूरे ज्ञान के कारण, हर अनियमितता में, बेहद तेजी आई हैं और हर इंसान बेहद परेशान हैं या अपनी शर्म खो चुका हैं।
सब गैर सरकारी प्राणी, सारे सरकारी प्राणी, सारे नेतागण या 5 साल के कार्यकाल वाले, खासतौर से सबका भविष्य विद्यार्थीगण में, जागृति लाने व सबको सही हक देने और हक लेने की कोशिश, ये पवित्र पुस्तक हैं। खास-तौर से सही ज्ञान कराना ही हमारा ध्येय हैं, कोई लिखी हुई पंक्ति, जब समाज सीखता हैं और लगातार उस पर अमल करता है या उससे फायदा उठाता है, ऐसी पुस्तक, धर्म ग्रन्थ बन जाती हैं। लम्बे समय तक गुजरे हुए समय को देखकर, इतिहास पढ़कर, लोगों केे व खुद के तजुर्बे, सब की मजबूरी और कमजोरी जानकर, बेहद गहराई से सोचकर कि इंसान कैसे बर्ताव करता हैं और इस बर्ताव के कारण उसका व सबका भविष्य कैसा होगा? उसमें सुधार-सफाई कैसे लाई जाये, जिससे उसका और सबका भविष्य सुनहरा हो, जैसे नशा करने वाला भी हर युक्ति से, नशा कर ही लेता हैं। नशा छूट जाए, नशा करने वाला खुद, खुश होकर नशा छोड़े, ऐसी युक्ति सोची व वर्णित की गयी हैं। नशा ही नहीं, हर गलत काम, गलती करने वाला खुद, हर गलती छोड़ने की सोचे, सब एक-दूसरे को समझायें और अपनायें, इस पवित्र पुस्तक में वर्णित हैं। खासतौर से हर समाज के, हर धर्मग्रंथ के अच्छे व सच्चे गुणों के सार को ध्यान में रखकर, किसी को तड़पाया न जाए, मारा न जाए, सही सुधार कैसे हो वर्णित हैं।
हर जुर्म, चोरी, रिश्वत खोरी, भ्रष्टाचारी से लेकर उग्रवादीता तक बिना कोशिश किये, अपने आप, खुद में सिकुड़कर, खुद खत्म हो, ऐसी युक्ति इस पवित्र पुस्तक में वर्णित हैं। गलत और सही शब्द का निर्णय बेहद कठिन है, जिसे हम गलत कहते हैं, वह दूसरों के शब्दों में ही गलत होता हैं या हो सकता हैं। लेकिन सही या अच्छा वह है, जो सारे ब्रह्माण्ड में, हर जीव पर लागू हो और भविष्य में सबके लिये अच्छा फलदायी हों। ”अन्त भला तो सब भला“, सही ज्ञान होने पर यह आसानी से समझ में आ जायेगा। जिस प्रकार उलझी हुई गुत्थी का सही सिरा पकड़ में आ जाने के बाद, पूरी गुत्थी आसानी से सुलझ जाती हैं। बेहद गहराई से लंबे समय तक हर तरीके से नाप-तौल कर, परख और समझ कर बनायी गयी युक्ति, सूत्र या फार्मुला वर्णित किया गया है जिसको हर प्राणी अपनाने में व इस्तेमाल करने में गर्व महसूस करेगा, पवित्र पुस्तक पढ़ने के पश्चात् युक्ति अपनाने को खुद मजबूर होगा, व युक्ति अपनायेगा और अपना, अपनों का और सबका, यहाँ तक कि हर जीव का जीवन सुखमय और बाधा रहित होगा।
खासतौर से भारत मंे आजादी पाने के कुछ समय पहले से ही, छोटी सी अनियमितता भी रोकने और न बढ़ाने पर भी, आज इस समय किस प्रकार तेजी से क्यों बढ़ी है? उस कारण को खोज कर, हर अनियमितता खुद सिकुड़ कर खत्म हो, ऐसी युक्ति वर्णित है। यह अनियमितता हर देश, हर प्रदेश, हर जगह, हर घर, हर परिवार, हर समाज, हर धर्म, हर विभाग में, हर प्राणी में गहराई तक समा चुकी हैं। साक्षात्कार करने के बाद एक भी प्राणी नहीं मिला, जिसे सुधार की कोई उम्मीद भी हो। सबका खुले रूप में कहना हैं, भ्रष्टता नीचे से ऊपर तक हैं, भ्रष्टता खत्म हो ही नहीं सकती। विडम्बना तो यह हैं कि हर धर्म, हर समाज, हर प्राणी, हर विभाग सफाई-सुधार करना चाहते हैं, सोचते हैं, कोशिश करते हैं और पूरी तरह फेल हैं। यह सफाई-सुधार आसानी से हो और हमेशा, अपने आप होता रहे वर्णित हैं।
इस पवित्र पुस्तक की रचना यह सोचकर की गई हैं कि संसार में, हर जगह का हर प्राणी, देवी-देवता, पीर-पैगम्बर हैं, समझदार है और सफाई-सुधार के लिए प्रयत्नशील है। यह पवित्र पुस्तक सबूत हैं, कि हर प्राणी जो अच्छे हैं, धर्म और नियम में चलने वालों के साथ हैं या धर्म या नियम में चलने वालों की सहायता कर रहें हैं, हम हमेशा उनके साथ हैं।
अनजान लोग कहते है कि ”अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता“ सही नहीं है, प्रत्यक्ष हैं, इतिहास गवाह है, धर्म-ग्रंथ गवाह हैं कि हमेशा एक ही प्राणी, कोई देवी-देवता, पीर-पैगम्बर या किसी महापुरूष (यह महापुरूष बाद में कहलायें) ने अकेले ही कदम उठाया हैं, वह पहले अकेला ही रहा है। यह भी सच हैं, कि बड़े काम के लिए बड़ा ही समय चाहिए, यहाँ पर यह भी कहना हैं कि भाड़ फोडना नहीं है, केवल सफाई-सुधार करना है। ऐसा धर्म, कर्म करने वाला, पहले अकेला ही होता हैं, आम आदमी ही होता हैं, बाद में वह महापुरूष कहलाया जाता हैं, या धर्म करते रहने पर, वह महापुरूष बनता चला जाता हंै। वह आप भी हो सकते हैं, बल्कि आप ही हैं। आज आप, एक मामूली चिंगारी हो सकते हैं, जो अपने अंदर भयंकर दावानल छुपाये बैठे है। केवल शुरूआत की, कोशिश भर करनी है। बाकी काम अपने आप होगा, यह पूर्ण विश्वास है और ऐसा होना निश्चित है।
”घर का सुधार=गलती पर अविलम्ब सजा और मेहनती को प्रोत्साहन“ नियम अपना कर, अमल में लाना है, फायदा उठाना है और अच्छे व कर्मठ को, खत्म न होने वाला फायदा देना है। गलती पर अविलम्ब सजा में, किसी का रिवर्सन, सस्पेन्शन, ट्रांसफर, जेल या सजा-ए-मौत नहीं हैं। केवल नगद जुर्माना हैं, जो अविलम्ब राजकोष में जमा कराना हैं। हमें राजकोष भी बढ़ाना हैं, जो समृद्धि की जड़ हैं, जो हर एक के लिये व अच्छांे के लिए सबसे बड़ी शक्ति हैं, जो हर व्याधा को रोकेगी और सबका भविष्य सुनहरा होगा।
हर अनियमितता देखकर, सुधार करना है, या अविलम्ब शिकायत करनी हैं। शिकायत पत्र पर कम से कम, तीन प्राणी के वोटर/आधार नंबर सहित हस्ताक्षर कराने हैं। उसकी रिसिविंग अपने पास रखनी है, तीस दिन बाद रिमाइंडर देना है और उनके उच्च अधिकारी को लिखना है। बस रिजल्ट अपने आप आयेगा। वैसे हर जगह, हर विभाग में, सूचना विभाग भी हैं। आज आप, अकेले हो सकते हैं, दूसरी बार भी अकेले हो सकते हैं, आपके साथ कोई न हो, तीसरी बार ऐसा हो ही नहीं सकता। आपके साथ आपकी बीवी, बच्चा, भाई, दोस्त कोई तो, हो ही सकता हैं या आने वाले समय में आपके साथ अनेक होंगे और आप कामयाब होंगे। याद रहे, बड़े काम में बड़ा ही समय लगता है।
इसके बावजूद हम तो आपके साथ हैं ही, आप केवल लेखक तक या इससे सम्बंधित प्राणी या यूनिटी तक 5/-रु.के लिफाफे या 5/-रु.के डाक टिकट के साथ शिकायत पहंुचायें, निश्चित समय में शिकायतकर्ता को सूचित किया जायेगा। आपकी शिकायत सुधार की हर कोशिश की जायेगी, सुधार निश्चित होगा। गलती करने वाला गलती मानेगा या आपकी मिनिमम दिहाड़ी देगा या अपनी पूरी दिहाड़ी, राजकोष में अविलम्ब जमा करायेगा, मतलब जुर्माना जमा करेगा। आपके सहयोग और साथ के तलबगार, सब हैं, हम भी हैं, सफाई-सुधार जल्द हो, बेताब हैं और रहेंगे। आप भी, हम भी सफाई-सुधार के लिए सब कुछ करेंगे। सब काम से पहले सफाई-सुधार करंेगे, बाकी काम, सफाई-सुधार के बाद करेंगे। यह मेहनत संसार के, हर देश के, हर धर्म, हर समाज, हर प्राणी के लिए निश्चित है। अब तो इन्टरनेट भी आप जरूर इस्तेमाल करेंगे।
लेखक भारत का मूल निवासी हैं, जहां अनेक धर्म, अनेक जाति पल रही हैं, यह सब हमारे भाई-बच्चे, बडे़-छोटे या सम्बन्धी जैसे हैं, तो पूरे संसार के प्राणी भी इसी रूप में कुछ न कुछ निश्चित हैं, भारत के प्राणी जागरूक हो, तो हर देश के प्राणी भी जागरूक होने ही चाहिए, समृद्ध होने ही चाहिए। हर धर्म में, हर विभाग में खास नियम हैं, सब अपने हैं, अपनों के काम आओं। ये पवित्र पुस्तक ”विशाल ज्ञान विज्ञान सबका समाधान“ आप सब के सहयोग से, आप सब के लिए, आपके पास और हर जगह पहंुँचेगी और सच्चाई, कर्मठता, वफादारी बढ़ेगी, ज्ञान बढ़ने पर हर अनियमितता खुद खत्म होंगी और सारा संसार सुनहरा होगा।
कड़वी सच्चाई हैं कि संसार का, हर प्राणी या हर जीव, इतने अपनो के होते हुए किसी भी हालत में अत्याचारों से कभी नहीं बचा, अपनों में, सारे सगे-सम्बन्धी, सारे सरकारी प्राणी, सारे नेतागण, सारे गैर सरकारी प्राणी व सबका भविष्य विद्यार्थीगण तक शामिल हैं और सेन्ट-परसेन्ट, हर अत्याचार के या हर अनियमितता के जिम्मेदार, सारे सरकारी प्राणी और सारे नेतागण हैं, जो देखभाल करने की, हर माह मोटी पगार और हर फैसलेटी ही नहीं, कार्यकाल के बाद पेन्शन ही नहीं, मरने के बाद भी फेमली की नौकरी और फेमली पेन्शन तक लेते हैं, यह सब 58-60 साल या 5 साल के लिए वफादारी के लिये बुक हैं, वचनबद्ध हैं। विडम्बना यह भी हैं कि कानून होते हुए, यह मनुष्य बुद्धिजीवि होते हुए, यही नहीं पूरी तरह सक्षम होते हुए, अत्याचार करने और अत्याचार सहने के लिये मजबूर है। अकाट्य सच यह भी है कि अत्याचार या कोई अनीयमितता करने वाला सरकारी प्राणी हो, नेता हो या कोई और हो और चाहे जितने सक्षम हो, गलती करने वाला, उसके बच्चें, सगें-सम्बन्धी भी, यहाँ तक कि उसका पूरा विभाग तक सजा से बच ही नहीं सकते, हर व्याधा, हर बीमारी इन्हें घेरती चली जाती हैं। यह गलती करने वाले भी, हमारे अपने कुछ न कुछ निश्चित हैं, हमें इन सबको बचाना है, इन्हें इनके लायक, समाज के लायक, उसके विभाग के लायक बनाना है। यह धर्म है, मानव धर्म है, सबसे बड़ा धर्म है। हर अत्याचार, हर अनियमितता खत्म करना, मानव धर्म सिखाना, सूत्र वर्णित है।
विशेष: हमारे लिए सृष्टि के सारे जीव 84 लाख योनि के छोटे, बड़े सारे जीव, छोटे-बडे़ जरूर हैं लेकिन इज्जत सबकी बराबर है, सबकी इज्जत कम तो हो ही नहीं सकती, इज्जत सबकी बड़ी हैं, बल्कि निर्जीव तक की बेकदरी या अवहेलना की ही नहीं जा सकती, कम से कम ज्ञानी और समझदार इन्सान, किसी की बेइज्जती तो कर ही नहीं सकता। सच्चाई यह भी हैं कि गलती करने वाला या अनियमितता बढ़ाने वाला इन्सान, किसी का कुछ नहीं होता। जब तक की वो माँफी न माँगे या गलती की सजा न भुगते। इस सब के बावजूद लिखी हुई किसी कटु सच्चाई को अन्यथा बिल्कुल न ले। कोई शब्द जिससे किसी की इज्जत कम होती नजर आये, ऐसा बिल्कुल न समझे। हमारा ध्येय किसी की इज्जत कम करना है ही नहीं, सच्चाई लिखने का ध्येय यह है कि सफाई-सुधार जल्द और आसानी से हो, गलती करने वाले का जीवन साफ-सुथरा हो। जैसे कहा जाए सूरज में गर्मी है, यह उसकी इज्जत कम करना या बुराई करना नहीं। उसके बारे में बताना भर है। घर का मुखिया या प्रधान, राजा या राष्ट्रपति, जिसके सिर पर पगड़ी बंधी हो, उनके बारे में गलत लिखना, अपराध ही नहीं, भयंकर अपराध है लेकिन यह हमारी पगड़ी भी हैं, अगर हमारी पगड़ी, दागदार या गन्दी हों, तो सर्फ, सोडा, साबुन लगाकर, भट्टी पर चढ़ाकर, थपकी-डण्डे से पीट-पीट कर धोनी और साफ करनी ही चाहिए, फिर गर्म प्रेस से, हर सलवट निकालकर, चमका कर पहनना, पगड़ी व सबकी इज्जत बढ़ाना व बचाना हैं, यह अपराध हो ही नहीं सकता। यह समझदारी हैं। हर पाठक से प्रार्थना, इल्तजा या अपील है कि पढ़कर, किसी की इज्जत कम करने की या बुरा कहने की कोशिश भी न करें, वरना वह खुद जिम्मेदार होगा। हमारी ऐसी किसी, अंजान गलती के लिए, हम क्षमा प्रार्थी हैं। लेकिन किसी की भी गलती का सुधार निश्चित करना हैं, यह कभी न भूलें। बिल्कुल ऐसी स्थिति पैदा करनी हैं, जैसे आपको कोई उंगली भी लगाये, तो आप बेहद बुरा मान जाते हैं, गुस्सा हो जाते हैं, मरने-मारने को तैयार हो जाते हैं। वहीं आप एक डाॅक्टर के द्वारा, खुद कड़वी दवा पीते हैं, इन्जेक्शन, आप खुद लगवाते हैं, यही नहीं आपके परिवार वाले, सम्बन्धी तक, पहले पैसा जमा करते हैं और आप खुद कहते हैं आॅपरेशन करो। माँ-बाप, बीवी-बच्चे तक लिख कर दे देते हैं कि मर जाए तो कोई शिकायत नहीं। डाक्टर के कहने से खाना-पीना तक छोड़ देते हैं और उस डाॅक्टर का एहसान भी मानते हैं। इसी प्रकार आप भी कुछ ऐसी युक्ति सोचकर अमल कर सकते हैं मकसद सफाई-सुधार का ही होना चाहिए। आज खास-तौर से प्रशासन सम्बन्धी सरकारी प्राणी पगार के अलावा, ऊपर के पैसे के लालच में अपने विभाग के अन्य र्कमचारी आदि को छोड़कर, केवल हर गैर सरकारी प्राणी को सुधारता हैं।
नेता, नोट, वोट और सीट के लालच में कही भी सही सफाई-सुधार सोच ही नहीं पाता। गैर सरकारी प्राणी, पेट की आग, अथाह मेहनत, हर मजबूरी के कारण या डर के कारण सफाई-सुधार के लिए कोई कदम उठा ही नहीं पाता। सबका भविष्य विद्यार्थीगण, पढ़ाई की कठोर मेहनत, नौकरी की इच्छा और बड़ी-बड़ी महत्वकाक्षांओं के कारण, साथ ही बड़ों के अंकुश, सफाई-सुधार में हर अड़चन डालते हैं। अब इनमें गैर सरकारी प्राणी जरूर ऐसा है, जिसे हनुमान की तरह अपनी शक्ति का ज्ञान नहीं है। यह ज्ञान होते ही हर अनियमितता अपने आप खत्म होगी। वैसे भी दुष्ट चाहे जितना मजबूत हो, धर्मात्मा चाहे जितना कमजोर या मजबूर हो, जीत हमेशा सच्चाई की होती है। हिम्मत और दिमाग आपका होता है। हिम्मते मर्दा, मद्दे खुदा।

आखिर में इस पवित्र पुस्तक को पढ़कर और अमल में लाकर इसकी पवित्रता को और बढ़ायेंगे, साथ ही सारा संसार सुनहरा बनायेंगे या सुनहरा बनाने में हमारा सहयोग करेंगे। इन्टरनेट का इस्तेमाल जरूर करें।
मैं और तू से, हम बने, हम से, सब संसार, 
मैं या तू नहीं, तो हम नहीं, हम नहीं, नहीं संसार।
करत-करत अभ्यास के, जड़मत, होत सुजान, 
रसरी, आवत-जात ते, पाथर पड़े निशान।

इति...........
धन्यवाद.
सम्पादक
- लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ 
आविष्कारकर्ता-मन (मानव संसाधन) का विश्व मानक एवं पूर्ण मानव निर्माण की तकनीकी
अगला दावेदार-भारत सरकार का सर्वोच्च नागरिक सम्मान -”भारत रत्न“


हमारा सम्मान

हमारा सम्मान
क्या आप सच में ”भगवान“ के पुजारी हैं 
और 
”भगवान“ के अनन्य भक्त हैं?
क्या आप के दिल में ”अल्लाह“ हैं 
और 
आप दिल से ”नमाज“ अदा करते हैं?
क्या आप कभी भी असीम श्रद्धा से ”गुरूद्वारे“ में मत्था टेकते हैं 
और 
”वाहेगुरू“ को चाहते हैं?
तो 
अच्छी मानव जाति को बचाने के लिए 
देश को साफ व स्वच्छ बनाने के लिए हर कोशिश करें।

हमारे घर के राष्ट्रीय ध्वज

हम अगर अपने घर-देश के राष्ट्रीय ध्वज का सम्मान सच्चाई से करना चाहते है, तो सबसे पहले सारे सरकारी प्राणी और नेताओं का जो कि हमारे शरीर के सारे अंगो के समान है, उनकेा कर्मठ बनाना और उनका सफाई-सुधार रखना ही पडे़गा। गैर सरकारी प्राणी तो राजा भी है और उसकी गलती की सजा, हमारे सरकारी प्राणी निश्चित करते है, देते है। वैसे हर एक की गलती की सजा इतनी प्रिय करनी है कि गलती करने वाला खुद सजा कबूल करके, साफ-सुथरा बनें, खुद के और सबके लायक बनें, कर्मठता बढ़ायें क्योंकि सब हमारे सम्बन्धी हैं। आप सबका ही कहना सही है राष्ट्रीय ध्वज के आगे, पाक-साफ व कर्मठ इन्सान ही सैल्यूट करें।
जब ज्ञान बढे़गा तब अक्षर ज्ञान का फायदा होगा।

सबको जीते जी स्वर्ग  देने के लिये, सबसे पहले सुधार कर्म करें या करेंगे!

संसार के पूजनीय भगवान, बुजूर्ग व देवी देवता गण

हमारे जिन्दा और जो हमे छोड़ गये हैं, वह बुर्जुग ही हमारे भगवान हैं। भगवान का कोई रुप नहीं होता, मतलब वह हरेक के रुप में है। क्योकि सब बुजुर्गाे को हमने देखा ही नहीं है, हर जीव का भगवान (बुजुर्ग) सबके लिये भगवान ही है। हर बड़ा चाहता है, मेरा छोटा, मेरी हर जिम्मेदारी सम्भालें। यह जिम्मेदारी हर पालने वाले को उसके भगवान (बुजुर्ग) विरासत मे देकर गये हैं। भगवान इतना छोटा है कि वह हर जर्रे में हैं, और इतना बडा है कि उससे बड़ा कुछ नहीं, कोई नहीं, आप देखने की कोशिश करें, कोशिश करते रहने वाले ही कामयाब होते हैं। सबसे आसान है, अपने छोटे व छोटी को भगवान व देवी बनायें और उनका इस्तेमाल करें। सच्चाई में पूजा-इबादत करने का हक उसे ही है, और पूजा-इबादत का अच्छा फल उसे ही मिलता है, जो खुद की व सबकी सफाई-सुधार करता रहता है।ं 
हर अनियमितता की आग हर घर (देश) में तेजी से फैल रही है, बढ़़ रही है। दूसरा पड़ोसी या देशवासी भी हमारे कुछ हैं, सब अपने हैं, वह हमे याद करें या ना करें, हमे पता लगते ही सफाई-सुधार में तन, मन व धन से सहयोग करना चाहिए, क्योंकि अपने को व अपने घर को पोल्यूशन से बचाने के लिये दूर तक सफाई-सुधार रखना ही समझदारी है। और पूरा संसार हमारा है, साबित करना है। 

राम-राम जितना कहो, कुछ भी राम न होये।
राम जैसा जो भी करें, जय जय राम की होये।ं

पूजा-इबादत का शुभ फल लेने के लिये, पहले सफाई-सुधार जरुरी है।ं