Action Plan of New Human, New India, New World based on Universal Unified Truth-Theory. According to new discovery World Standard of Human Resources series i.e. WS-0 Series like ISO-9000, ISO-14000 etc series
19वीं सदी (सन् 1801-1900) में विश्व के विभिन्न देशों में राजनीतिक प्रबन्ध में बदलाव व्यापक रूप से हुये थे। उस समय में विभिन्न देशों में राजशाही और पोपशाही के स्थान पर जनतांत्रिक शासन व्यवस्था का सिलसिला शुरू हुआ। इसी शदी में व्यापक प्रशासनिक सुधार, सामाजिक आर्थिक चिंतन और औद्योगिक क्रान्ति का भी जन्म हुआ था। 20वीं शदी (सन् 1901 से) के प्रारम्भ में सारे कुटनीतिक गलियारे साम्राज्यवाद की नशीली गंध से भरे हुये थे, जिसने विश्व की प्रमुख महाशक्तियों को मदांध कर रखा था। परिणामस्वरूप प्रथम विश्व युद्ध सन् 1914 में प्रारम्भ हुआ जिसमें ब्रिटेन, जर्मनी, रूस, फ्रांस शामिल थे और यह युद्ध सन् 1918 में समाप्त हुआ। सन् 1918 में प्रथम बार विश्व शान्ति के लिए अमेरिका के राष्ट्रपति वूडरो विल्सन द्वारा 14 सूत्रीय कार्यक्रम को प्रस्तुत किया गया। सन् 1919 ई0 में विश्व शान्ति के लिए 17 देशों द्वारा ”लीग आॅफ नेशन्स“ की स्थापना हुई। प्रथम विश्व युद्ध के समाप्त होते ही अगले विश्व युद्ध के भी बीज पड़ गये थे परिणामस्वरूप सन् 1939 में पुन-ब्रिटेन द्वारा द्वितीय विश्व युद्ध की घोषणा कर दी गई। जो अमेरिका द्वारा जापान पर परमाणु हमला करने के बाद सन् 1945 में समाप्त हो गया। 24 अक्टुबर सन् 1945 को 50 देशों द्वारा सैन फ्रांसिस्को में विश्व शान्ति के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना हुई। संयुक्त राष्ट्र के व्यक्त उद्देश्य हैं युद्ध रोकना, मानव अधिकारों की रक्षा करना, अंतर्राष्ट्रीय कानून को निभाने की प्रक्रिया जुटाना, सामाजिक और आर्थिक विकास उभारना, जीवन स्तर सुधारना और बीमारियों से लड़ना। सदस्य राष्ट्र को अंतर्राष्ट्रीय चिंताएं और राष्ट्रीय मामलों को सम्हालने का मौका मिलता है। इन उद्देश्य को निभाने के लिए 1948 में मानव अधिकारों की सार्वभौम घोषणा प्रमाणित की गई ।
संयुक्त राष्ट्र सदस्य
2006 तक संयुक्त राष्ट्र में 192 सदस्य देश है । विश्व के लगभग सारी मान्यता प्राप्त देश सदस्य है । कुछ विशेष अपवाद तइवान (जिसकी स्थिति चीन को 1971 में दे दी गई थी), वैटिकन, फिलिस्तीन (जिसको दर्शक की स्थिति का सदस्य माना जा सकता है), तथा और कुछ देश। सबसे नए सदस्य देश है मॉंटेनीग्रो, जिसको 28 जून, 2006 को सदस्य बनाया गया। भारत प्रथम 50 संस्थापक सदस्यों में से एक है। अमेरिका, रूस, ब्रिटेन, फ्रांस और चीन इसके स्थायी सदस्य हैं जो वीटो कहलाते है।
संयुक्त राष्ट्र र्चाटर या संविधान
संयुक्त राष्ट्र संघ सदस्य देशों का एक ऐसा संगठन है जो अन्तराष्ट्रीय शान्ति एवम् सुरक्षा और ऐसी ही राजनैतिक, आर्थिक एवम् सामाजिक परिस्थितियों को बनायें रखने के लिए वचनबद्व है। संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर में मुख्य रूप से निम्न उद्देश्य दिये गये है जो किसी भी देश के घरेलू मामले में दखल देने की अनुमति प्रदान नहीं करता।
01.अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर शान्ति व सुरक्षा बनाये रखना।
02.राष्ट्रों के बीच, उनके सम्मान, अधिकार और आत्मनिर्णय के आधार पर मैत्रीपूर्ण सम्बन्धों तथा सहयोग का विकास करना।
03.आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक समस्याओं को सुलझाने के लिए तथा मनवीय अधिकारों और उनके मौलिक स्वाधीनता के प्रति सम्मान भावना बढ़ाने के लिए अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर मिलकर कार्य करना और सहयोग प्राप्त करना।
04.इन समान उद्देश्यों की सिद्धि के लिए उन सभी राज्यों की सहायता का केन्द्र बनना।
संयुक्त राष्ट्र संघ का चार्टर ही उसका संविधान कहलाता है जिसमें 10 हजार शब्द, 111 धारा तथा 19 अध्याय है। संविधान के अनुसार-”प्रत्येक राष्ट्र को अपनी सम्पदा और प्राकृतिक संसाधनों पर स्वतन्त्रता पूर्वक सम्पूर्ण प्रभुत्व जमाने का। अपने राष्ट्रीय अधिकार क्षेत्र के अन्तर्गत किसी भी विदेशी पूंजी निवेश को नियंत्रित करने और उस पर अधिकार चलाने का और विदेशी सम्पत्ति को राष्ट्रीयकृत करने, विसम्पत्तिकृत करने या उसके स्वामित्व का स्थानान्तरण करने का अधिकार प्राप्त है।“
संयुक्त राष्ट्र संघ का ध्वज
हल्का नीला के बीच श्वेत रंग से संयुक्त राष्ट्र संघ का प्रतीक (दो जैतून की वक्राकार शाखायें जो ऊपर से खुली हैं बीच में विश्व का मानचित्र)
संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषा
संयुक्त राष्ट्र ने 6 भाषाओं को राज भाषा स्वीकृत किया है (अरबी, चीनी, अंग्रेजी, फ्रेंच, रूसी और स्पेनीश), परंतु इन में से केवल दो भाषाओं को संचालन भाषा माना जाता है (अंग्रेजी और फ्रेंच)। स्थापना के समय, केवल चार राज भाषाएं स्वीकृत की गई थी (चीनी, अंग्रेजी, फ्रेंच, रूसी) और 1973 में अरबी और स्पेनी को भी संमिलित किया गया। इन भाषाओं के बारे में काफी विवाद उठता है। कुछ लोगों का मानना है कि राज भाषाओं को 6 से एक (अंग्रेजी) तक घटाना चाहिए, परंतु इनके विरोध है वे जो मानते है कि राज भाषाओं को बढ़ाना चाहिए। इन लोगों में से काफी का मानना है कि हिंदी को संमिलित करना आवश्यक है। संयुक्त राष्ट्र अमेरिकी अंग्रेजी की जगह ब्रिटिश अंग्रेजी का प्रयोग करता है
मुख्यालय
संयुक्त राष्ट्र का मुख्यालय अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर में पचासी लाख डॉलर के लिए खरीदी भूसंपत्ति पर स्थापित है। इस इमारत की स्थापना का प्रबंध एक अंतर्राष्ट्रीय शिल्पकारों के समूह द्वारा हुआ। इस मुख्यालय के अलावा और अहम संस्थाएं जेनेवा, कोपनहेगन आदि में भी है। यह संस्थाएं संयुक्त राष्ट्र के स्वतंत्र अधिकार क्षेत्र में तो नहीं हैं, परंतु उनको काफी स्वतंत्रताएं दी जाती है ।
भारत में कार्यालय-संयुक्त राष्ट्र संघ, 55 लोदी एस्टेट, नई दिल्ली-110003
संयुक्त राष्ट्र संघ का बजट
संयुक्त राष्ट्र संघ के संचालन का सम्पूर्ण व्यय 18.2 अरब डालर प्रतिवर्ष है। संयुक्त राष्ट्र संघ के सात सहयोगी राष्ट्रों का आर्थिक योगदान क्रमश-अमेरीका का 27 प्रतिशत, जापान का 15.7 प्रतिशत, जर्मनी का 9.1 प्रतिशत, फ्रांस का 6.4 प्रतिशत, ब्रिटेन का 5.3 प्रतिशत, इटली का 5.2 प्रतिशत, रूस का 4.3 प्रतिशत हिस्सा है। यह कुल मिलाकर संयुक्त राष्ट्र संघ बजट का 71 प्रतिशत होता है। अन्य सदस्य राष्ट्रों की अपेक्षा अमेरीका नागरिकों की संयुक्त राष्ट्र, सचिवालय तथा यूनिसेफ, विश्वबैंक, विश्व खाद्य कार्यक्रम आदि में रोजगार सम्बन्धी उच्च पदों पर भागीदारी सर्वाधिक है। संयुक्त राष्ट्र के 80 प्रतिशत कार्य विकासशील राष्ट्रों को अपनी स्वयं सहायता क्षमता विकसित करने के लिए ही होते है। इनके अन्तर्गत प्रजातन्त्र को बढ़ावा देना, उसकी रक्षा करना, मानवाधिकार, शिशुओं को बीमारियों एवम् भुखमरी से बचाना, शरणार्थियों की राहत के लिए सहायता प्रदान करना, विश्व को अपराधों, नशीली वस्तुओं के सेवन तथा विभिन्न बीमारियों के प्रति सजग करना है, साथ ही उन राष्ट्रों की सहायता करना है जो युद्ध इत्यादि में लम्बें समय से उत्पीड़ित रहा है। संयुक्त राष्ट्र संघ हमेंशा से विश्व शान्ति एवम् मानव सेवा में समर्पित रहा है। लेकिन वर्तमान समय में उसके कार्यो के सहज सम्पादन में आर्थिक समस्यायें बहुत अधिक अवरोध प्रस्तुत कर रही हैं। इस समस्या को लेकर विश्व में काफी कुछ कहा गया परन्तु अधिकांश सदस्य इस बात से अनभिज्ञ हैं कि वास्तव में संयुक्त राष्ट्र संघ क्या है? और उसके धन का व्यय कहाँ होता है?
वीटो
सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यों को वीटो का अधिकार है। जिसका अर्थ है-निषेधात्मक वोट। किसी विषय पर निर्णय लेने के लिए 9 वोटों की आवश्यकता होती है। परन्तु उस पर स्थायी सदस्यों की सहमति आवश्यक है। यदि एक भी स्थायी सदस्य उससे सहमत नहीं है तो इसे निषेधात्मक मत माना जाता है।
संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रमुख अंग
संयुक्त राष्ट्र संघ के मुख्य कार्यकारी अंग निम्नलिखित हैं।
01.सामान्य महासभा (The General
Assembly)
संयुक्त राष्ट्र महासभा में सभी सदस्य देश शामिल होते है तथा प्रत्येक देश को एक मत देने का अधिकार होता है। इसकी बैठक वर्ष में एक बार होती है। परन्तु विशिष्ट एवम् आपात स्थिति में महासचिव द्वारा बैठक का आहवान किया जा सकता है। प्रत्येक बैठक में एक अध्यक्ष चुना जाता है। इसके कार्य 6 मुख्य समितियों में विभाजित होते हैं। जिनमें प्रत्येक सदस्य देश का प्रतिनिधित्व होता है।
मुख्य समितियां-
1.निरस्त्रीकरण एवम् अन्तर्राष्ट्रीय सुरक्षा समिति 2. आर्थिक एवम् वित्तीय समिति
3.सामाजिक, मानवीय एवम् सांस्कृतिक समिति 4. विशिष्ट राजनैतिक एवम् गैर उपनिवेशवाद समिति
5.प्रशासनिक एवम् आय-व्यय समिति 6. कानूनी समिति।
इसके अतिरिक्त 29 सदस्यों की एक सामान्य समिति होती है। जो सभा एवम् उनकी समितियों के कार्यो का संयोजन करती है तथा 9 सदस्यों की एक अधिकार पत्र समिति होती है।
सुरक्षा परिषद द्वारा विचारणीय विषयों के अतिरिक्त संयुक्त राष्ट्र घोषणा पत्र के परिक्षेत्र में आने वाले किसी भी विषय जैसे-वार्षिक बजट पर सामान्य सभा विचार कर अपनी संतुति दे सकती है। साधारण विषयों पर सामान्य बहुमत से एवम् महत्वपूर्ण विषयों पर दो तिहाई बहुमत से निर्णय लिया जाता है। यदि सुरक्षा परिषद किन्हीं कारणों से अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह करने में असफल होती है तो सामान्य सभा ऐसी परिस्थिति में तुरन्त विचार कर निर्णय ले सकती है और सदस्यों के सहयोग से अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति एवम् सुरक्षा हेतु सशस्त्र सेवाओं का प्रयोग भी कर सकती है।
02.सुरक्षा परिषद (The Security
Council)
सुरक्षा परिषद के अन्तर्गत कुल 15 सदस्य होते है तथा प्रत्येक को एक मत का अधिकार होता है। उनमें से 5 सदस्य स्थायी एवम् 10 सदस्य अस्थायी होते हैं। जो सामान्य समिति द्वारा दो तिहाई बहुमत द्वारा चुने जाते है। सुरक्षा परिषद का मुख्य दायित्व अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति एवम् सुरक्षा बनाये रखना है। विशिष्ट समझौतों का अनुगमन करते हुये सुरक्षा परिषद कार्य निर्वाह हेतु सदस्य देश की सशस्त्र सेना सहायता के रूप में कार्य करती है। चीन, फ्रांस, रूस, ब्रिटेन एवम् अमेरिका इसके स्थायी सदस्य है।
03.आर्थिक एवम् सामाजिक परिषद (The Economic & Social
Council)
यह परिषद अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षणिक, स्वास्थ्य एवम् सम्बन्धित विषयों में संयुक्त राष्ट्र किये जाने वाले कार्यो का उत्तरदायित्व वहन करती है। सामान्य सभा के दो तिहाई बहुमत से इसके 54 सदस्यों का चुनाव तीन वर्ष के लिए किया जाता है। प्रत्येक सदस्यों को एक मत का अधिकार होता है तथा उपस्थित सदस्यों के सामान्य बहुमत से निर्णय लिया जाता है। सामान्यत-परिषद की बैठक वर्ष में दो बार होती है परन्तु आवश्यकता पड़ने पर विशेष बैठक बुलाई जा सकती है। अध्यक्ष का चुनाव एक वर्ष के लिए होता है। परिषद के पाँच क्षेत्रीय आयोग जेनेवा, बैकांक, चिली, अबाबा और बगदाद में है। इन सबके अतिरिक्त अन्य कुछ ऐसे विषयों को चुना गया है। जिनके लिए 9 क्रियात्मक आयोग एवम् अनेक समितियां एवम् विशिष्ट निकायों का निर्माण किया गया है। वे विषय हैं-अपराध निरोधक एवम् अपराधिक न्याय, सामाजिक विकास, मानवाधिकार, मादक पदार्थ, विकास हेतु विज्ञान एवम् प्रौद्योगिक, महिलाओं की स्थिति, जनसंख्या, सांख्यिकी एवम् समर्थनीय विकास।
04.न्यायधारी परिषद (The Trusteeship
Council)
विश्व के वे क्षेत्र जो पूर्ण स्वशासन में अभी समर्थ नहीं है-उनके हितों की रक्षा के लिए भी संयुक्त राष्ट्र घोशणा पत्र में एक अन्तर्राष्ट्रीय न्यासधारी प्रणाली का प्रावधान है। व्यक्तिगत न्यासधारी समझौतों के अन्तर्गत ऐसे क्षेत्रों को न्यास धारी क्षेत्र कहा जाता है। ऐसा क्षेत्र अब संयुक्त राष्ट्र संघ के अधीन नहीं है।
05.अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय (The International
Court of Justice)
सदस्य राष्ट्रों के मध्य न्यायालय संविधि नामक समझौते के अन्तर्गत अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय की स्थापना की गई। सभी सदस्य स्वत-ही इसके हिस्सेदार हैं। न्यायालय में 15 न्यायाधीश होते हैं। जिनका चुनाव उनकी राष्ट्रीयता से प्रभावित होता है। इनका कार्यकाल 9 वर्ष का होता है। यह न्यायलय हेग में है परन्तु आवश्कतानुसार इसको कहीं भी लगाया जा सकता है। निर्णय बहुमत के आधार पर किया जाता है। न्यायालय का निर्णय अन्तिम होता है। परन्तु 10 वर्ष के अन्दर कोई अन्य प्रमाण मिल जाने पर यह मामले की पुन-सुनवाई कर सकता हैं।
06.सचिवालय (The Secretariate)
इसके मुख्य पदाधिकारी महासचिव है। शरणार्थियों हेतु उच्चायुक्त एवम् कोष प्रबन्ध निदेशक की नियुक्ति महासभा द्वारा की जाती है। महासभा द्वारा नियत प्रविधि के अनुसार सचिवालय के अन्तर्राष्ट्रीय कर्मचारियों की नियुक्ति महासचिव करता है। संयुक्त राष्ट्र अपने प्रमुख कार्यो में सचिवालयी कायों के लिए न्यूयार्क, जेनेवा, नैरोबी और विएना में कार्यालय रखे हैं।
07.संयुक्त राष्ट्र की शान्ति सेना
संयुक्त राष्ट्र के चार्टर में इस बात का उल्लेख है कि किसी अपातकालीन स्थिति या गम्भीर समस्या के समाधान के लिए संयुक्त राष्ट्र की सेना गठित की जायेगी। चूँकि संयुक्त राष्ट्र की कोई संयुक्त स्थायी सेना नही है। इसलिए सेना में विभिन्न राष्ट्रों के सैनिक शामिल किये जाते हैं। किसी भी राष्ट्र को शांति सेना में अपने सैनिकों को भेजने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता है।
08.संयुक्त राष्ट्र प्रणाली
विकासशील देशों में आर्थिक एवम् सामाजिक विकास के कार्य संयुक्त राष्ट्र अपने विभिन्न कार्यक्रमों एवम् कोषों के माध्यम से करती है। जैसे-
01.संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP)
02.संयुक्त राष्ट्र शिशु निधि (UNICER)
03.संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या सहायता कोष (UNDPA)
04.संयुक्त राष्ट्र मानविकीय कार्य विभाग (UNDHA)
05.संयुक्त राष्ट्र षरणार्थी उच्चायुक्त कार्यालय (UNHCR)
06.संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त कार्यालय (UNHCHR)
07.संयुक्त राष्ट्र सहायता एवम् कार्य अभिकरण (UNRWA)
09.संयुक्त राष्ट्र से सम्बन्धित अन्र्तशासकीय अभिकरण
संयुक्त राष्ट्र से विशिष्ट अनुबन्धों द्वारा सम्बद्व अन्र्तशासकीय अभिकरण, आर्थिक एवम् सामाजिक परिषद् के संयोजन में कार्यरत स्वतन्त्र संस्थायें है। ये हैं-
01.संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवम् सांस्कृतिक संगठन (UNESCO)
02.संयुक्त राष्ट्र औद्योगिक विकास संगठन (UNIDO)
03.अन्तर्राष्ट्रीय आणविक ऊर्जा अभिकरण (IAEA)
04.अन्तर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO)
05.अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF)
06.पुननिर्माण एवम् विकास का अन्तर्राष्ट्रीय बैंक-विश्व बैंक (IBRD)
07.अन्तर्राष्ट्रीय विकास संघ (IDA)
08.अन्र्तराष्ट्रीय वित्त निगम (IFC)
09.अन्र्तराष्ट्रीय नागरिक विमानन संगठन (ICAO)
10.अन्तर्राष्ट्रीय दूर संचार संघ (ITU)
11.अन्तर्राष्ट्रीय कृषि विकास कोष (IFAD)
12.अन्तर्राष्ट्रीय समुद्री संगठन (IMO)
13.सार्वदेशीय डाक संघ (UPU)
14.खाद्य एवम् कृषि संगठन (FAO)
15.विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO)
16.विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO)
17.विश्व बौद्धिक सम्पदा संगठन (WIPO)
18.विश्व व्यापार संगठन (WTO)
10. मानव अधिकार
द्वितीय विश्वयुद्ध के जातिसंहार के बाद, संयुक्त राष्ट्र ने मानव अधिकारों को बहुत आवश्यक समझा था। ऐसी घटनाओं को भविष्य में रोकना अहम समझकर, 1948 में सामान्य सभा ने मानव अधिकारों की सार्वभौम घोषणा को स्वीकृत किया। यह अबंधनकारी घोषणा पूरे विश्व के लिए एक समान दर्जा स्थापित करती है, जो कि संयुक्त राष्ट्र समर्थन करने की कोशिश करेगी। 15 मार्च 2006 को, सामान्य सभा ने संयुक्त राष्ट्र मानव अधिकारों के आयोग को त्यागकर संयुक्त राष्ट्र मानव अधिकार परिषद की स्थापना की ।
आज मानव अधिकारों के संबंध में सात संघ निकाय स्थापित है। यह सात निकाय हैं-
02.पश्चिमी यूरोपीय संघ (WEU)-सदस्य-28, मुख्यालय-बेल्जियम
03.यूरोपीय परिषद (COU)-सदस्य-284, मुख्यालय-फ्रांस
04.युरोपीय संघ (EU)-सदस्य-11
05.युरोपीय मुक्त व्यापार संघ (EFTA)-सदस्य-7, मुख्यालय-स्वीटजरलैण्ड
06.युरोप में सुरक्षा एवम् सहकारिकता संगठन (OSCE)-सदस्य-54, मुख्यालय-हेग
07.पुनर्निर्माण एवम् विकास का यूरोपीय बैंक (EBRD)-सदस्य-41, मुख्यालय-लन्दन
08.कोलम्बो योजना-सदस्य-26, मुख्यालय-श्रीलंका
09.एशिया आर्थिक सहयोग समूह (APEC)-सदस्य-19, मुख्यालय-सिंगापुर
10.दक्षिण-पूर्वी राष्ट्र संघ (ASEAN)-सदस्य-5, मुख्यालय-इण्डोनेशिया
11.अमेरिका राज्य संगठन (ASO)-मुख्यालय-वाशिंगटन
12.पेट्रोलियम निर्यातक देश संगठन (OPEC)-सदस्य-11
13.दक्षिण ऐशिया क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क)-सदस्य-7, मुख्यालय-नेपाल
14.उत्तर एटलांटिक संधि संगठन (नाटो)-सदस्य-19, मुख्यालय-बेल्जियम
15.इन्टरपोल-सदस्य-176
16.अरब लीग-सदस्य-22
17.समूह-7 (G-7)-विश्व के सात प्रमुख देश
18.समूह-77 (G-77)-विकासशील देशों का संगठन-सदस्य-135
19.समूह-24 (G-24)-विकासशील देशों का संगठन-सदस्य-24
20.समूह-15 (G-15)
21.डी-8 (D-8)-आठ विकासशील मुस्लिम राष्ट्रों का समूह
22.पी-5 (P-5)-विकसित देश-चीन, फ्रांस, ब्रिटेन, अमेरिका का समूह
23.समूह-22 (G-22)-सदस्य-22
24.समूह-10-सदस्य-10
25.रेडक्रास-युद्ध या विपदा के समय पीड़ित लोगों के सहायतार्थ-मुख्यालय-जेनेवा
26.साउथ पैसेफिक फोरम-सदस्य-15, मुख्यालय-फिजी
01.वीटो पावर-संयुक्त राज्य अमेरिका (US)
परिचय
(सं.रा.अ.) स्ंायुक्त राज्य अमेरिका (United States of
America) उत्तर अमेरिकी महाद्वीप में स्थित एक देश है। इसकी राजधानी वाशिंगटन है। संयुक्त राज्य अमेरिका उत्तर अमेरिकी महाद्वीप पर स्थित एक संघीय गणतन्त्र है। सं.रा.अ.50 राज्यों और एक संघीय जिले से बना है। इसके अतिरिक्त इसके अन्य भी बहुत से अधिनस्त क्षेत्र हैं जो ओशिनीया और अन्य स्थानों पर भी फैले हैं। यह एक राष्ट्रपति प्रणाली वाला गणतन्त्र है। जनसंख्या की दृष्टि से चीन और भारत के बाद विश्व के सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश है। यद्यपि तीसरे स्थान पर होने के पश्चात् भी इसकी जनसंख्या प्रथम दो की तुलना में बहुत कम है।
संयुक्त राज्य अमेरिका, यह नाम थाॅमस पैन द्वारा सुझाया गया था। लघु रूप में इसके लिए बहुधा संयुक्त राज्य का भी उपयोग किया जाता है। हिन्दी भाषा में ”संयुक्त राज्य“ या ”संयुक्त राज्य अमेरिका“ के स्थान पर केवल ”अमेरिका“ कहने का प्रचलन है। अमेरिका की स्थापना की आधिकारिक तिथि 4 जुलाई, 1776 है। जब द्वितीय महाद्विपीय कांग्रेस ने 13 अलगाववादी उपनिवेशिक राज्यों के प्रतिनिधि स्वरूप स्वतन्त्रता के घोषणा पत्र पर हस्ताक्षर किये, परन्तु सरकार के मूलभूत ढँाचें में सन् 1788 में बहुत परिवर्तन किये गए। जब आर्टिकल्स आॅफ काॅन्फेडरेशन के स्थान पर अमेरिकी संविधान को लाया गया। सरकारी राजधानी के फिलाडेल्फिया स्थानान्तरित होने से पूर्व, न्यूयार्क नगर एक वर्ष तक संघीय राजधानी था। 1711 में, राज्यों ने अधिकार विधेयक को पारित किया। संविधान में वे 10 संशोधन करने के लिए जो व्यक्तिगत स्वतन्त्रता और कानूनी सुरक्षा की सीमा के संघीय प्रतिबन्धों को निषिद्ध कर दे, उत्तरी राज्यों ने 1780 से 1804 के बीच दास प्रथा को प्रतिबन्धित कर दिया। लेकिन दक्षिण राज्यों में यह प्रथा जारी रही। सन् 1800 में नया बसा वाशिंगटन डी.सी.संघीय सरकार और राष्ट्र की नई राजधानी बना। नए नवेले देश ने अपनी सीमाओं का पश्चिम की ओर विस्तार करने के लिए स्थानीय इण्डियन लोगों पर युद्ध चक्र आरम्भ किया जो 19वीं सदी के अंत तक चला और स्थानीय अमेरिकायों को अपनी भूमियों से हाथ धोना पड़ा। 1812 में ब्रिटेन के साथ हुए युद्ध के कारण, जो बराबरी का रहा, अमेरिकी राष्ट्रवाद को प्रबलता मिली। 1846 में ब्रिटेन के साथ हुई ओरेगाॅन संधि के कारण अमेरिका को वर्तमान अमेरिकी उत्तर-पश्चिम पर नियंत्रण मिला। 1848 में मेक्सिको में अमेरिकी हस्तक्षेप के कारण कैलिफोर्निया और वर्तमान अमेरिकी दक्षिण-पश्चिम का अमेरिका में विलय हो गया। 1848-1849 के कैलिफोर्निया गोल्ड रश के कारण यह विस्तार पश्चिम की ओर जारी रहा। लगभग आधी सदी के दौरान ही 4 करोड़ भैंसों को उनकी चमड़ी और माँस, और रेलमार्ग के विस्तार के लिए मार डाला गया। ये पशु, जो स्थानीय इण्डियन लोगों के लिए आर्थिक संसाधन और संस्कृति का महत्वपूर्ण भाग थे, इनका मारा जाना इन इण्डियन लोगों के लिए बहुत आघातकारी सिद्ध हुआ।
इसके राज्य है-अलास्का, अलाबामा, आर्कन्सा, आयडाहो, आयोवा, इण्डियाना, इलिनाय, एरिजोना, ओहायो, ओरेगान, ओक्लाहोमा, केन्सास, केन्टकी, कैलिफोर्निया, कालरेडो, कनेक्टिकट, जार्लिया, टेनेसी, टेक्सस, डेलावेयर, न्यू जर्सी, न्यू यार्क, नेब्रास्का, न्यू मेक्सिको, नेवाडा, नार्थ डेकोटा, न्यू हेम्पशायर, नार्थ केरोलाइना, पेन्सिलवेनिया, फ्लोरिडा, मेन, मेरिलैंड, मिशिगन, मिनेसोटा, मिसिसिपी, मासेचुसेट्स, मोन्टाना, मिजूरी, रोड आइलैंड, विस्कान्सिन, वर्जिनिया, वर्मांट, वायोमिंग, साउथ केरोलाइना, साउथ डेकोटा, वेस्ट वर्जिनिया, यूटा, लुईजियाना, वाशिंगटन, हवाई।
राष्ट्रीय ध्वज-सं.रा.अमेरिका के राष्ट्रीय ध्वज को ”स्टार्स एण्ड स्ट्राप्स“ के नाम से भी जाना जाता है। इस ध्वज के बाईं ओर उपर एक चैथाई हिस्सें में नीले रंग की पृष्ठभूमि में 50 श्वेत रंग के सितारे अंकित हैं। शेष भाग पर लाल श्वेत रंग की 13 बराबर पट्टीयाँ हैं।
02.वीटो पावर-फ्रांस
परिचय
फ्रान्स, आधिकारिक तौर पर फ्रान्स गणराज्य पश्चिम यूरोप में स्थित एक देश है। पेरिस इसकी राजधानी है। यह यूरोपीय संघ का सदस्य है। फ्रास कई क्षेत्रों और विभागों में विभाजित है। इनमें से 22 क्षेत्र महानगर फ्रांस के अन्तर्गत आते हैं। फ्रांस के चार विदेश क्षेत्र भी हैं। फ्रांस कई शताब्दियों के लिए एक प्रमुख शक्ति, मजबूत आर्थिक, सांस्कृतिक, सैनिक और राजनीतिक प्रभाव के साथ रहा है। फ्रान्स 17वीं सदी के अन्त से दुनिया के सबसे शक्तिशाली देशों में से एक है। 18वीं और 19वीं शताब्दि के दौरान फ्रास ने पश्चिमी अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया में एक बहुत बड़ा औपनिवेशिक साम्राज्य स्थापित किया था। फ्रान्स यूरोपीय संघ का एक संस्थापक सदस्य है। इसका क्षेत्रफल किसी भी अन्य सदस्य देश से सबसे ज्यादा है। फ्रान्स संयुक्त राष्ट्र संघ का भी सदस्य होने के साथ-साथ संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् के पाँच स्थाई सदस्यों में से एक है। इसके अलावा यह समूह-8 और नाटों का सदस्य है। परमाणु शक्ति सम्पन्न इस देश के पास सक्रिय परमाणु युद्ध हथियार और परमाणु ऊर्जा संयंत्र हैं।
फ्रान्स शब्द लातीनी भाषा के फ्रैन्किया से आया है जिसका अर्थ फ्रांक्स की भूमि या फ्रांकलैंड है। आधुनिक फ्रान्स की सीमा प्राचीन गौल की सीमा के समान ही है। प्राचीन गौल में सेल्टिक गाॅल निवास करते थे। गौल पर पहली शताब्दी में रोम के जुलियस सीजर ने जीत हासिल की थी। तदोपरान्त गौल ने रोमन भाषा (लातिनी, जिससे फ्रान्सीसी भाषा विकसित हुई) और रोमन संस्कृति को अपनाया। ईसाइयत दूसरी शताब्दी और तीसरी शताब्दी में पहँुची और चैथी शताब्दी तक स्थापित हो गई। चैथी सदी में जर्मनिक जनजाति, मुख्यत-फ्रैंक्स ने गौल पर कब्जा जमाया। इस से फ्रान्सिस नाम दिखाई दिया। आधुनिक नाम ”फ्रान्स“ पेरिस के आसपास के फ्रान्स के कापेतियन राजाओं के नाम से आता है। फ्रैंक्स यूरोप की पहली जनजाति थी जिसने रोमन साम्राज्य के पतन के बाद आरियानिज्म को अपनाने के बजाय कैथोलिक ईसाई धर्म को स्वीकार किया। वर्दन संधि (सन् 843) के बाद शारलेमेग्ने का साम्राज्य तीन भागों में विभाजित हो गया। इनमें सबसे बड़ा क्षेत्र पश्चिमी फ्रांसिया था जो आज के फ्रांस के बराबर था। ह्यूग कापेट के फ्रांस के राजा बनने तक कारोलिंगियन राजवंश ने सन् 987 तक फा्रन्स पर राज किया। उनके वंशजों ने अनेक युद्धों और पूर्वजों की विरासत के साथ देश को एकीकृत किया। 17वीं सदी और लुई चैदहवें के शासनकाल के दौरान फ्रान्स सबसे अधिक शक्तिशाली था। उस समय फ्रान्स की यूरोप में सबसे बड़ी आबादी थी। देश का यूरोपीय राजनीति, अर्थव्यवस्था और संस्कृति पर एक बड़ा प्रभाव था। फ्रांसीसी भाषा अन्तर्राष्ट्रीय मामलों में कूटनीति की आम भाषा बन गई। फ्रांसीसी वैज्ञानिकों ने 18वीं सदी में बड़ी वैज्ञानिक खोज की। फ्रांस ने अमेरिका, अफ्रीका और एशिया में अनेक स्थानों पर विजय अधिपत्य जमाया। फ्रान्स में फ्रांसीसी क्रान्ति से पहले 1789 तक राजशाही मौजूद थी। 1793 में राजा लुई चैदहवें और उनकी पत्नी मेरी अन्तोइनेत्ते मार डाले गये साथ में हजारों की संख्या में अन्य फ्रांसीसी नागरिक भी मारे गये थे। नेपोलियन बोनापार्ट ने 1799 में गणतन्त्र पर नियंत्रण ले लिया। बाद में उन्होंने खुद को पहले साम्राज्य (1804-1814) का महाराज बनाया। उसकी सेनाओं ने महाद्वीपीय यूरोप के अधिकांश भाग पर विजय प्राप्त की। 1815 में वाटरलू की लड़ाई में नेपोलियन के अन्तिम हार के बाद दूसरी राजशाही आई। बाद में लुई-नेपोलियन ने 1852 में द्वितीय साम्राज्य बनाया। लुई-नेपोलियन को 1870 के फ्रंेको-पर्शियन युद्ध में हार के बाद हटा दिया गया था। उसके शासन का स्थान तीसरे गणराज्य ने लिया। फ्रांस के 18वीं और 19वीं सदी में एक बड़ा औपनिवेशिक साम्राज्य में पश्चिम अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया के कुछ हिस्से भी शामिल थे। इन क्षेत्रों की संस्कृति और राजनीति फ्रांस के प्रभाव में रही। कई भूतपूर्व उपनिवेशों में फं्रासीसी भाषा आधिकारिक भाषा है।
राष्ट्रीय ध्वज-ध्वज में नीले, श्वेत एवं लाल रंग की तीन बराबर पट्टीयाँ उध्र्व दिशा में हैं।
03.वीटो पावर-रूस
परिचय
रूस यूरोपीय महाद्वीप में स्थित एक देश है। इसकी राजधानी मास्को है। इसकी मुख्य और राजभाषा रूसी है। क्षेत्रफल की दृष्टि से ये दुनिया का सबसे विशाल देश है। पहले ये सोवियत संघ का सबसे बड़ा घटक था। रूस के साथ जिन देशों की सीमाएं मिलती है उनके नाम हैं-नार्वे, फिनलैंड, एस्टोनिया, लातविया, लिथुआनिया, पोलैंड, बेलारूस, यूक्रेन, जाॅर्जिया, अजरबैजान, कजाकिस्तान, चीन, मंगोलिया और उत्तरी कोरिया। रूसी साम्राज्य के दिनों से रूस ने विश्व में अपना स्थान एक प्रमुख शक्ति के रूप में किया था। प्रथम विश्वयुद्ध के बाद सोवियत संघ विश्व का सबसे बड़ा साम्यवादी देश बना। यहाँ के लेखकों ने साम्यवादी विचारधारा को विश्वभर में फैलाया। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद सोवियत संघ एक प्रमुख सामरिक और राजनीतिक शक्ति बनकर उभरा। संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ इसकी वर्षो तक प्रतिस्पर्धा चली जिसमें सामरिक, आर्थिक, राजनैतिक और तकनीकी क्षेत्रों में एक दूसरे से आगे निकलने की होड़ थी। 1980 के दशक से यह आर्थिक रूप से कमजोर होता चला गया और 1991 में इसका विघटन हो गया जिसके फलस्वरूप रूस सोवियत संघ का सबसे बड़ा राज्य बना।
रूस का इतिहास पूर्वी स्लावों के समय से शुरू होता है। तीसरी से आठवीं सदी तक स्लाव साम्राज्य अपने चरम पर था। कीवन रूसों ने 10वीं सदी में ईसाई धर्म को स्वीकार कर लिया। 13वीं सदी में मंगोलों के आक्रमण के कारण किवि रूसों का साम्राज्य छिन्न-भिन्न हो गया। फिर जारों का शासन आया। उसके बाद रूसी साम्राज्य का विकास हुआ। सन् 1917 में यहाँ बोल्शेविक क्रान्ति हुई जिसके कारण साम्यवादी शासन स्थापित हुआ।
राष्ट्रीय ध्वज-ध्वज में क्षैतिज दिशा में उपर एवं नीचे नीले रंग व बीच में श्वेत रंग की तीन बराबर पट्टीयाँ।
04.वीटो पावर-चीन
परिचय
चीन विश्व की प्राचीन सभ्यताओं में से एक है जो एशियाई महाद्वीप के पूर्व में स्थित है। चीन की सभ्यता एवं संस्कृति छठी शताब्दी से भी पुरानी है। चीन की लिखित भाषा प्रणाली विश्व की सबसे पुरानी है जो आज तक उपयोग में लायी जा रही है और जो कई आविष्कारों का स्रोत भी है। ब्रिटीश विद्वान और जीव-रसायन शास्त्री जोसफ नीधम ने प्राचीन चीन के चार-कागज, कम्पास, बारूद और मुद्रण महान आविष्कार बताये हैं। ऐतिहासिक रूप से चीनी संस्कृति का प्रभाव पूर्वी और दक्षिणी पूर्वी ऐशियाई देशों पर रहा है और चीनी धर्म, रिवाज और लेखन प्रणाली को इन देशों में अलग-अलग स्तर तक अपनाया है। चीन में प्रथम मानवीय उपस्थिति के प्रमाण झोऊ कोऊ दियन गुफा के समीप मिलते हैं और जो होमो इरेक्टस के प्रथम नमूने भी है जिसे हम पेंिकग मानव के नाम से जानते हैं। अनुमान है कि ये इस क्षेत्र में 3,00,000 से 5,00,000 वर्ष पूर्व यहाँ रहते थे और कुछ शोधों से ये महत्वपूर्ण जानकारी भी मिली है कि पेकिंग मानव आग जलाने और उसे नियंत्रित करने की कला जानते थे। चीन की आबादी दुनिया में सर्वाधिक है। प्राचीन चीन मानव सभ्यता के सबसे पुरानी शरणस्थलीयों में से एक है। वैज्ञानिक कार्बन डेटिंग के अनुसार यहाँ मानव 22 लाख से 25 लाख वर्ष पहले आये थे।
”चीन“ शब्द प्रथम दर्ज उपयोग 1555 में किया गया था। ये शब्द चिन से निकला था जो मार्को पोलो द्वारा पश्चिम में प्रचारित किया गया। यह शब्द पारसी और संस्कृत के चीन और अंतत-किन साम्राज्य (778-207 ईसापूर्व) से निकला जो झोऊ वंशावली के समय चीन का सबसे पश्चिमी साम्राज्य था। ऐतिहासिक रूप से चीन को सिना या सिनो, सिने, कैथे या पश्चिमी देशों द्वारा सेरेस के नाम से भी जाना जाता है। चीन का आधिकारिक नाम प्रत्येक वंश के साथ बदलता रहता है और सबसे प्रचलित और आम नात है-झोंग्गुओ जिसका अर्थ है-”केन्द्रिय राष्ट्र“ या ”मध्य साम्राज्य“।
चीन के गृह युद्ध के कारण इसके दो भाग हो गये-
1.जनवादी गणराज्य चीन, जो मुख्य चीनी भूभाग पर स्थापित समाजवादी द्वारा शासित क्षेत्र को कहते हैं। इसके अन्तर्गत चीन का बहुतायत भाग आता है।
2.चीनी गणराज्य, जो मुख्य भूमि से हटकर ताईवान सहित कुछ अन्य द्वीपों से बना देश है। इसका मुख्यालय ताइवान है।
राष्ट्रीय ध्वज-चीन के राष्ट्रीय ध्वज में लाल रंग की पृष्ठभूमि में बायीं ओर उपर पीले रंग का एक बड़ा सितारा एवं उसके दायीं ओर पीले रंग के चार छोटे सितारें अंकित हैं।
05.वीटो पावर-ब्रिटेन (UK)
परिचय
ग्रैट ब्रिटेन और उत्तरी आयरलैंड का यूनाइटेड किंगडम (समान्यत-यू.के.या ब्रिटेन के रूप में जाना जाता है), एक श्रेष्ठ राज्य है जो महाद्वीपीय यूरोप के पश्मिोत्तर तट पर स्थित है। यह एक द्वीपीय देश है। यह एक द्वीप समूह में फैला है जिसमें ग्रेट ब्रिटेन, आयरलैंड का पूर्वोत्तर भाग और कई छोटे द्वीप शामिल हैं। उत्तरी आयरलैंड, यू.के.का ऐसा हिस्सा है जो एक देश की सीमा के साथ है, जो आयरलैंड के साथ साझेदारी पर है। इस देश की सीमा के अलावा, यू.के.अटलांटिक महासागर, उत्तरी सागर, इंग्लिश चैनल और आयरिश सागर से घिरा हुआ है। सबसे बड़ा द्वीप, ग्रेट ब्रिटेन, चैनल सुरंग द्वारा फ्रान्स से जुड़ा हुआ है। यू.के.एक संवैधानिक राजशाही और एकात्मक राज्य है जिसमें चार देश इंग्लैंड, उत्तरी आयरलैंड, स्काॅटलैंड और वेल्स शामिल हैं। यह एक संसदीय प्रणाली द्वारा संचालित है जिनका राजधानी लंदन में सरकार की कुर्सी है। यू.के.के चैदह विदेशी क्षेत्र हैं। ब्रिटीश सरकार के सभी अवशेष जो 1922 में ऊँचाई पर थे, दुनिया के लगभग एक चैथाई हिस्से का घेरकर सबसे बड़ा साम्राज्य बना था। इसके पूर्व उपनिवेशों में भाषा, संस्कृति और कानून प्रणाली का ब्रिटीश प्रभाव आज भी देखा जा सकता है। दुनिया की छठीं बड़ी अर्थव्यवस्था और क्रय शक्ति समानता के हिसाब से सातवाँ बड़ा देश होने के कारण यू.के.एक विकसित देश है। यह दुनिया का पहला औद्योगिक देश था और शुरूआती 19वीं और 20वीं शताब्दियों के दौरान विश्व की अग्रणी शक्ति था। लेकिन दो विश्व युद्धों की आर्थिक लागत और 20वीं सदी के उत्तरार्ध में साम्राज्य के पतन ने वैश्विक मामलों में उसकी अग्रणी भूमिका को कम कर दिया। फिर भी यू.के.अपने मजबूत आर्थिक, सांस्कृतिक, सैन्य, वैज्ञानिक और राजनीतिक प्रभाव के कारण एक प्रमुख शक्ति बनी हुई है। यह एक परमाणु शक्ति सम्पन्न और दुनिया का चैथा सर्वाधिक रक्षा खर्च करने वाला देश है। यह यूरोपीय संघ का एक सदस्य राज्य है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में एक स्थायी सीट धारण करता है।
1 मई, 1707 में, इंग्लैंड के साम्राज्य (जिसमें वेल्स शामिल था) और स्काॅटलैंड के साम्राज्य की राजनीतिक संघ के द्वारा ग्रेट ब्रिटेन साम्राज्य बनाया गया था। यह घटना 22 जुलाई, 1706 को संघ की संधि सहमति का परिणाम था और फिर इंग्लैंड के संसद और स्काॅटलैंड के संसद दोनों ने एक संघ के अधिनियम 1707 के द्वारा इसकी पुष्टि की। संघ के अधिनियम 1800 के द्वारा आयरलैंड का साम्राज्य, यूनाइटेड किंगडम बनाने के लिए ग्रेट ब्रिटेन साम्राज्य के साथ आ गया। अपनी पहली सदी में, यूनाइटेड किंगडम ने संसदीय प्रणाली के पश्चिमी विचारों को विकसित करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। साथ ही साहित्य, कला और विज्ञान में महत्वपूर्ण योगदान दिया। यू.के.के नेतृत्व में औद्योगिक क्रान्ति ने देश को बदल दिया और बढ़ती हुई ब्रिटीश साम्राज्य को उत्तेजित किया। इस समय के दौरान अन्य महाशक्तियों की तरह यू.के.औपनिवेशिक शोषण में शामिल था। इसमें अटलांटिक दास व्यापार भी शामिल है। हालांकि 1807 में दास व्यापार अधिनियम के पारित होने के साथ यू.के ने गुलामों के व्यापार का मुकाबला करने में एक अग्रणी भूमिका निभाई। नेपोलियन के हार के बाद यू.के.19वीं सदी में नौसेना में प्रमुख शक्ति के रूप में उभरा और 20वीं शताब्दी के मध्य तक एक प्रख्यात शक्ति बना रहा। 1921 तक ब्रिटीश साम्राज्य अपने अधिकतम आकार में विस्तारित हुआ। प्रथम विश्वयुद्ध के बाद जर्मन और तुर्क कालोनियों पर राष्ट्रों का संघटन शासनादेश हासिल किया। एक साल बाद, दुनिया के पहला बड़े पैमाने पर अन्तर्राष्ट्रीय प्रसारण नेटवर्क बी.बी.सी.बनाया गया था। द्वितीय विश्व युद्ध ने यू.के.को आर्थिक रूप से क्षतिग्रस्त कर दिया था हालांकि मार्शल सहायता और संयुक्त राज्य अमेरिका और कनाडा दोनों से लिए महंगे ऋण ने ब्रिटेन की पुन-प्राप्ति में मदद की। तुरन्त युद्धोत्तर वर्षों ने कल्याण राज्य की स्थापना देखी जिसमें दुनिया के पहले और सबसे व्यापक सार्वजीनिक स्वास्थ्य सेवाएँ शामिल थीं। अंग्रेजी भाषा के अन्तर्राष्ट्रीय फैलाव का मतलब था-साहित्य व संस्कृति का फैलाव जारी रखना। 1980 के दशक ने प्र्याप्त उत्तरी सागर तेल आमदनी और आर्थिक विकास का आगमन देखा। मार्गरेट थैचर के प्रधानमंत्री पद ने युद्धोत्तर राजनीतिक और आर्थिक सहमति से एक महत्वपूर्ण दिशा परिवर्तन को चिन्हित किया। एक रास्ता जो 1997 के बाद से टोनी ब्लेयर और गार्डन ब्राउन के नई श्रम सरकारों के तहत जारी रहा। 1992 में यूरोपीय संघ की शुरूआत के 12 संस्थापक देशों में से एक यू.के.था। इसके पूर्व 1973 से यह यूरोपीय संघ के यूरोपीय आर्थिक समुदाय का एक अग्रदूत सदस्य रहा। वर्तमान मजदूर सरकार का संगठन के साथ एकीकरण की दिशा में दृष्टिकोण मिश्रित है। सरकारी विपक्ष के साथ, रूढ़िवादी पार्टी जो कुछ शक्तियाँ और सक्षमताओं का पक्ष लेती है उसे यूरोपीय संघ को हस्तांतरित किया गया। 20वीं सदी के अंत ने पूर्व-विधायी संदर्भ के बाद उत्तरी आयरलैंड, स्काॅटलैड और वेल्स के लिए न्यायगत राष्ट्रीय प्रशासन की स्थापना के साथ यू.के.के शासन में कई परिवर्तन देखें।
यू.के.एक संवैधानिक राजशाही है। जिसके अन्तर्गत यू.के.तथा अन्य 15 राष्ट्रमण्डल देश हैं। यू.के.वर्तमान दुनिया के तीन देशों में से एक है जिनमें सुव्यवस्थित संविधान नहीं है। यू.के.का संविधान में ज्यादातर लिखित स्रोत हैं जिसमें संविधियाँ, न्यायाधीश द्वारा बनाए गये कानूनी मामले और अन्तर्राष्ट्रीय संधियाँ शामिल हैं। चूँकि साधारण विधियों और संवैधानिक व्यवस्था के बीच कोई तकनीकी अंतर नहीं है। यू.के.संसद केवल संसद के अधिनियमों को पारित करके संवैधानिक सुधार कर सकते हैं और उनके पास लगभग संविधान की किसी लिखित या अलिखित तत्व को इस प्रकार बदलने या समाप्त करने की शक्ति है, फिर भी कोई भी संसद कानून पारित नहीं कर सकती जो अगामी सरकार नहीं बदल सकती। यू.के.का एक संसदीय सरकार वेस्टमिंनिस्टर प्रणाली पर आधारित है जिसकी दुनिया भर ने नकल की है। ब्रिटीश सरकार की एक विरासत वेस्टमिनिंस्टर के महल में मिलने वाली यू.के.की संसद के दो सदन हैं-एक लोक सदन और एक नियुक्त यहोवा सदन और किसी भी विधेयक को कानून बनाने के लिए शाही स्वीकृति की आवश्यकता होती है। यह यू.के.का अन्तिम विधायी अधिकार है क्योंकि स्काॅलैंड में न्यायसंगत संसद और उत्तरी आयरलैंड और वेल्स की न्यायगत सभा प्रधान निकाय नहीं हंै और यह सन्दर्भित है कि स्थापित होने के बावजूद सार्वजनिक स्वीकृति के बाद यू.के.की संसद द्वारा समाप्त किया जा सकता है।
प्रधानमंत्री का पद जो यू.के.की सरकार के शासक हैं, संसद सदस्य हें जो लोक सदन की बहुमत का विश्वास प्राप्त कर सकते हैं। आमतौर पर सदन के सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी के मौजूदा नेता होते हैं। महारानी साहिबा की सरकार बनाने के लिए राजा द्वारा प्रधानमंत्री और मंत्रीमंडल को औपचारिक रूप से नियुक्त किया जाता है। हालांकि प्रधानमंत्री ही मंत्रीमंडल चुनते हैं और परम्परा के हिसाब से महारानी, प्रधानमंत्री के चुनाव का सम्मान करती हैं। परम्परागत रूप से मंत्रीमंडल को दोनों विधायी सदनों मंे प्रधानमंत्री की पार्टी के सदस्यों से लिया जाता है और अधिकांशत-लोक संदन से। प्रधानमंत्री और मंत्रीमंडल द्वारा कार्यपालिका शक्तियों का प्रयोग होता है जो माननीय महारानी साहिबा का सबसे सम्माननीय गुप्त परिषद् में शपथ लेते हैं और राजत्व के मंत्री बन जाते हैं। यू.के.के अलग-अलग देशों की राजधानियाँ हैं-बेलफास्ट (उत्तरी आयरलैंड), कार्डिफ (वेल्स), एडिनबर्ग (स्काॅटलैंड) और लन्दन (इंग्लैंड)। लन्दन, पूरी तरह से यू.के.की राजधानी है। पौंड स्टर्लिंग यू.के.की मुद्रा है। यू.के.”ब्रिटीश अनुभववाद“ की परम्परा के लिए प्रसिद्ध है। ज्ञान के दर्शन की एक शाखा जिसके हिसाब से अनुभव द्वारा सत्यापित ज्ञान ही वैध है। यू.के और इससे पहले के देशों ने वैज्ञानिकों और इंजिनियर दिए हैं जिन्हें महत्वपूर्ण प्रगति का श्रेय मिला है।
यू.के.का झण्डा, एक संघ झण्डा है-इंग्लैंड का झण्डा, स्काॅटलैंड का झण्डा और सेंट पैट्रिक का झण्डा मिलाकर 1801 में यह झण्डा बनाया गया था। संघ के झण्डे में वेल्स का प्रतिनिधित्व नहीं है क्योंकि इंग्लैंड द्वारा वेल्स पर विजय प्राप्त हुई थी। यू.के.के ध्वज को ”यूनियन जैक“ भी कहते हैं। ध्वज में कई क्रास चिन्ह बने हुए हैं। नीले रंग की पृष्ठभूमि में लाल श्वेत रंग के क्रास बने हुए हैं जो सम्पूर्ण ध्वज को लम्बवत्, क्षैतिज और कोणीय दिशा में विभाजित करते हैं। यू.के.के राष्ट्रीय गान ”भगवान सहेजें राजा को“ में राजा के बदले रानी बोला जाता है जब भी एक महिला अधीश्वर बनती है। परन्तु गाने का नाम वहीं रहता है। ब्रिटानिया यु.के.का एक राष्ट्रीय अवतार है। ब्रिटानिया को भूरे या सुनहरे बालों वाली एक जवान औरत के रूप में प्रतीक किया गया है जिसने एक कोरिंथियन हेलमेट और सफेद वस्त्र पहने हुए है। वह पोसाईडन का तीन आयामी त्रिशूल और एक ढाल धारण करती है जिसमें संघ का झण्डा बना है। कभी-कभी वह एक शेर पर सवारी करती हुई दर्शायी जाती है।
भारत के संविधान के अनुच्छेद-एक में भारत के दो आधिकारिक नाम हैं-(इण्डिया दैट इज भारत) हिन्दी में ”भारत“ और अंगेजी में ”इण्डिया (INDIA)“। इण्डिया नाम की उत्पत्ति सिन्धु नदी के अंग्रेजी नाम ”इण्डस“ से हुई है। भारत नाम, एक प्राचीन हिन्दू सम्राट भरत जो कि मनु के वंशज ऋशभदेव के ज्येष्ठ पुत्र थे तथा जिनकी कथा भागवत पुराण में है, के नाम से लिया गया है। भारत (भा ़ रत) शब्द का मतलब है-”आन्तरिक प्रकाश में लीन“। एक तीसरा नाम ”हिन्दुस्तान“ भी है जिसका अर्थ है-हिन्द या हिन्दू की भूमि, जो कि प्राचीन काल के ऋषियों द्वारा दिया गया था। प्राचीन काल में यह कम प्रयुक्त होता था तथा कालान्तर में अधिक प्रचलित हुआ। विशेषकर अरब/ईरान में। भारत में यह नाम मुगल काल से अधिक प्रचलित हुआ यद्यपि इसका समकालीन उपयोग कम और प्राय-उत्तरी भारत के लिए होता है। इसके अतिरिक्त भारतवर्ष को वैदिक काल से ”आर्यावर्त“, ”जम्बूद्वीप“ और ”अजनाभदेश“ के नाम से भी जाना जाता रहा है। बहुत पहले यह देश सोने की चिड़िया जाना जाता था।
भारत को एक सनातन राष्ट्र माना जाता है क्योंकि यह मानव सभ्यता का पहला राष्ट्र था। भारतीय दर्शन के अनुसार सृष्टि उत्पत्ति के पश्चात् ब्रह्मा के मानसपुत्र स्वायंभुव मनु ने व्यवस्था सम्भाली। इनके दो पुत्र, प्रियव्रत और उत्तानपाद थे। उत्तानपाद भक्त ध्रुव के पिता थे। इन्हीं प्रियव्रत के 10 पुत्र थे। 3 पुत्र बाल्यकाल से ही विरक्त थे। इस कारण प्रियव्रत ने पृथ्वी को सात भागों में विभक्त कर एक-एक भाग प्रत्येक पुत्र को सौंप दिया। इन्हीं में से एक थे-आग्नीध, जिन्हें जम्बूद्वीप का शासन कार्य सौंपा गया। वृद्धावस्था में आग्नीध ने अपने 9 पुत्रों को जम्बूद्वीप के विभिन्न 9 स्थानों का शासन दायित्व सौंपा। इन 9 पु़त्रों में सबसे बड़े थे-नाभि, जिन्हें हिमवर्ष का भू-भाग मिला। इन्होंने हिमवर्ष को स्वयं के नाम से जोड़कर, अजनाभवर्ष प्रचारित किया। यह हिमवर्ष या अजनाभवर्ष ही प्राचीन भारत देश था। राजा नाभि के पुत्र थे-ऋषभ। ऋषभदेव के 100 पुत्रों में भरत ज्येष्ठ एवं सबसे गुणवान थे। ऋषभदेव ने वानप्रस्थ लेने पर उन्हें राजपाट सौंप दिया। पहले भारतवर्ष का नाम ऋषभदेव के पिता नाभिराज के नाम पर अजनाभवर्ष प्रसिद्ध था। भरत के नाम से ही लोग अजनाभखण्ड को भारतवर्ष कहने लगे। विष्णु पुराण, वायु पुराण, लिंग पुराण, श्रीमद्भागवत, महाभारत इत्यादि में भारत का उल्लेख आता है। इससे पता चलता है कि महाभारत काल से पहले ही भारत नाम प्रचलित था। एक अन्य मत के अनुसार दुष्यन्त और शकुन्तला के पुत्र भरत के नाम पर भारत नाम पड़ा परन्तु विभिन्न स्रोतों में वर्णित तथ्यों के आधार पर यह मान्यता गलत साबित होती है। पूरी वैष्णव परम्परा और जैन परम्परा में बार-बार दर्ज है कि समुद्र से लेकर हिमालय तक फैले इस देश का नाम प्रथम तीर्थंकर दार्शनिक राजा भगवान ऋषभदेव के पुत्र भरत के नाम पर भारतवर्ष पड़ा। इसके अतिरिक्त जिस पुराण में भारतवर्ष का विवरण है वहाँ इसे ऋषभ पुत्र भरत के नाम पर ही पड़ा बताया गया है। इस सम्बन्ध में यह ध्यान देना होगा कि 7वें मनु के आगे 2 वंश हो गये थे-पहला इक्ष्वाकु या सूर्यवंश और दूसरा चन्द्रवंश। इसी चन्द्रवंश में दुष्यन्त-शकुन्तला के पुत्र भरत का जन्म हुआ। जिसका स्पष्ट उल्लेख ब्रह्मवैवर्त पुराण में है। इस सन्दर्भ में गीता के विभिन्न श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण, अर्जुन को भारत कह कर सम्बोधित करते हैं। इसके अतिरिक्त ऋषभ पुत्र भरत तथा दुष्यन्त पुत्र भरत में 6 मन्वन्तर का अन्तराल है। अत-यह देश अत्यन्त प्राचीन काल से ही भारत है।
भारत गणराज्य, पौराणिक जम्बूद्वीप, दक्षिण एशिया में स्थित भारतीय उपमहाद्वीप का सबसे बड़ा देश है। भारत भौगोलिक दृष्टि से विश्व का सातवाँ सबसे बड़ा और जनसंख्या की दृष्टि से दूसरा बड़ा देश है। भारत के पश्चिम में पाकिस्तान, उत्तर-पूर्व में चीन-नेपाल-भूटान और पूर्व में बांग्लादेश-म्यांमार देश स्थित है। हिन्द महासागर में इसके दक्षिण-पश्चिम में मालदीव, दक्षिण में श्रीलंका और दक्षिण-पूर्व मंे इण्डोनेशिया है। इसके उत्तर में हिमालय पर्वत है और दक्षिण में हिन्द महासागर है। पूर्व में बंगाल की खाड़ी है तथा पश्चिम में अरब सागर है। भारत में कई बड़ी नदिया हैं। गंगा नदी भारतीय सभ्यता में अत्यन्त पवित्र मानी जाती हैं। अन्य बड़ी नदियाँ नर्मदा, ब्रह्मपुत्र, यमुना, गोदावरी, कावेरी, कृष्णा, चम्बल, सतलज, व्यास हैं। यह विश्व का सबसे बड़ा लोकतन्त्र है। यहाँ 300 से अधिक भाषाएँ बोली जाती हैं। यह विश्व की कुछ प्राचीनतम सभ्यताओं का पालना रहा है जैसे-सिन्धु घाटी सभ्यता और महत्वपूर्ण ऐतिहासिक व्यापार पथो का अभिन्न अंग रहा है। विश्व के चार प्रमुख धर्म-सनातन-हिन्दू, बौद्ध, जैन तथा सिख भारत में जन्में और विकसित हुए।
पषाण युग भीमबेटका मध्य प्रदेश की गुफाएँ भारत में मानव जीवन का प्राचीनतम प्रमाण है। प्रथम स्थाई बस्तियों ने 9000 वर्ष पूर्व स्वरूप लिया। यही आगे चल कर सिन्धु घाटी सभ्यता में विकसित हुई, जो 2600 ईसापूर्व और 1900 ईसापूर्व के मध्य अपने चरम पर थी। लगभग 1600 ईसापूर्व आर्य भारत आए और उत्तर भारतीय क्षेत्रों में वैदिक सभ्यता का सूत्रपात किया। इस सभ्यता के स्रोत वेद और पुराण हैं। किन्तु आर्य आक्रमण सिद्धान्त अभी विवादित है। कुछ विद्वानों की मान्यता यह है कि आर्य भारतवर्ष के स्थायी निवासी रहे हैं तथा वैदिक इतिहास करीब 75000 वर्ष प्राचीन है। इसी समय दक्षिण भारत में द्रविड़ सभ्यता का विकास होता रहा। दोनों जातियों ने एक दूसरे की खूबियों को अपनाते हुए भारत में एक मिश्रित संस्कृति का निर्माण किया।
500 ईसापूर्व के बाद कई स्वतंत्र राज्य बन गये। भारत के प्रारम्भिक राजवंशों में उत्तर भारत का मौर्य राजवंश उल्लेखनीय है जिसके प्रतापी राजा सम्राट अशोक का विश्व इतिहास में विशेष स्थान है। 180 ईसवी के आरम्भ से मध्य एशिया से कई आक्रमण हुए, जिनके परिणामस्वरूप उत्तर भारतीय महाद्वीप में यूनानी, शक, पार्थी और अंतत-कुषाण राजवंश स्थापित हुए। तीसरी शताब्दी के आगे का समय जब भारत पर गुप्त वंश का शासन था, भारत का ”स्वर्णिम काल“ कहलाया। दक्षिण भारत में भिन्न-भिन्न समयकाल में कई राजवंश चालुक्य, चेर, चोल, पल्लव तथा पांड्य चले। ईसा के आसपास संगम साहित्य अपने चरम पर था जिसमें तमिल भाषा का परिवर्धन हुआ। सातवाहनों और चालुक्यों ने मध्य भारत में अपना वर्चस्व स्थापित किया। विज्ञान, कला, साहित्य, गणित, खगोल शास्त्र, प्राचीन प्रौद्यौगिकी, धर्म तथा दर्शन इन्हीं राजाओं के शासनकाल में फले-फूले।
12वीं शताब्दी के प्रारम्भ में, भारत पर इस्लामी आक्रमणों के पश्चात, उत्तरी व केन्द्रीय भारत का अधिकांश भाग दिल्ली सल्तनत के शासनाधीन हो गया और बाद में, अधिकांश उपमहाद्वीप मुगलवंश के अधीन। दक्षिण भारत में विजयनगर साम्राज्य शक्तिशाली निकला। मुगलों के संक्षिप्त अधिकार के बाद सत्रहवीं सदी में दक्षिण और मध्य भारत में मराठों का उत्कर्ष हुआ। उत्तर पश्चिम में सिक्खों की शक्ति में वृद्धि हुई। 17वीं शताब्दी के मध्यकाल में पुर्तगाल, डच, फ्रंास, ब्रिटेन सहित अनेकों यूरोपीय देशों, जो भारत से व्यापार करने के इच्छुक थे, उन्होंने देश की शासकीय अराजकता का लाभ प्राप्त किया। अंग्रेज दूसरे देशों से व्यापार के इच्छुक लोगों को रोकने में सफल रहे और 1840 तक लगभग सम्पूर्ण देश पर शासन करने में सफल हुए। 1857 में ब्रिटीश इस्ट इण्डिया कम्पनी के विरूद्ध असफल विद्रोह, जो कि भारतीय स्वतन्त्रता के प्रथम संग्राम से जाना जाता है, के बाद भारत का अधिकांश भाग सीधे अंग्रेजी शासन के प्रशासनिक नियंत्रण में आ गया।
20वीं सदी के प्रारम्भ में आधुनिक शिक्षा के प्रसार ओर विश्वपटल पर बदलती राजनीतिक परिस्थितियों के चलते भारत में एक बौद्धिक आन्दोलन का सूत्रपात हुआ जिसने सामाजिक और राजनीतिक स्तरों पर अनेक परिवर्तन एवं आन्दोलनों की नींव रखी। 1885 में कांग्रेस पार्टी की स्थापना ने स्वतन्त्रता आन्दोलन को एक औपचारिक स्वरूप दिया। 20वीं शताब्दी के प्रारम्भ में एक लम्बे समय तक स्वतन्त्रता प्राप्ति के लिए विशाल अंहिसावादी संघर्ष चला, जिसका नेतृत्व महात्मा गाँधी, जो कि आधिकारिक रूप से आधुनिक भारत के राष्ट्रपिता से सम्बोधित किये जाते हैं, ने किया। इसके साथ-साथ चन्द्रशेखर आजाद, सरदार भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरू, नेताजी सुभाष चन्द्र बोस, वीर सावरकर आदि के नेतृत्व में चले क्रान्तिकारी संघर्ष के फलस्वरूप 15 अगस्त, 1947 को भारत ने अंग्रेजी शासन से पूर्णत-स्वतन्त्रता प्राप्त की। तदुपरान्त 26 जनवरी, 1950 को भारत एक गणराज्य बना।
भारत का संविधान, भारत को एक सार्वभौमिक, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतान्त्रिक गणराज्य की उपाधि देता है। भारत एक लोकतान्त्रिक गणराज्य है जिसका द्विसदनात्मक संसद वेस्ट मिनिस्टर शैली के संसदीय प्रणाली द्वारा संचालित है। इसके शासन में तीन मुख्य अंग है-न्यायपालिका, कार्यपालिका और व्यवस्थापिका।
भारत चीन के बाद विश्व का दूसरा सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश है। भारत की विभिन्नताओं से भरी जनता में भाषा, जाति और धर्म, सामाजिक और राजनीतिक संगठन के मुख्य शत्रु हैं। भारत में सबसे अधिक हिन्दू हैं। अन्य धर्मो में मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध, जैन, अयावलि, यहूदी, पारसी, अहमदी, बहाई आदि हैं। भारत दो मुख्य भाषा सूत्रों, आर्य और द्रविण का भी स्रोत है। भारत का संविधान कुल 23 भाषाओं को मान्यता देता है। हिन्दी और अंग्रेजी केन्द्रीय सरकार द्वारा सरकारी कामकाज के लिए उपयोग की जाती है। संस्कृत और तमिल जैसी अति प्राचीन भाषाएं भारत में ही जन्मी हैं। कुल मिलाकर भारत में 1652 से भी अधिक भाषाएं एवं बोलियाँ बोली जाती हैं। भाषाई मामले में भारतवर्ष विश्व के समृद्धतम देशों में से एक है। यहाँ मुख्यत-बोली जाने वाली भाषा मराठी, हिन्दी, उर्दू, संस्कृत, राजस्थानी, नेपाली, भोजपुरी, पंजाबी, तमिल, तेलुगु, मलयालम, कन्नड़, गुजराती, बांग्ला, असमिया, ओड़िया, कश्मीरी, लद्दाखी, मणिपुरी, कांेकणी, डोगरी इत्यादि है।
वैश्विीकरण के इस युग में शेष विश्व की तरह भारतीय समाज पर भी अंग्रेजी तथा यूरोपीय प्रभाव पड़ रहा है। बाहरी लोगों की खूबियों को अपनाने की भारतीय परम्परा का नया दौर कई भारतीयों की दृष्टि में अनुचित है। एक खुले समाज के जीवन का यत्न कर रहे लोगों को मध्यमवर्गीय तथा वरिष्ठ नागरिकों की उपेक्षा का शिकार होना पड़ता है। कुछ लोग इसे भारतीय पारम्परिक मूल्यों का हनन मानते हैं। विज्ञान तथा साहित्य में अधिक प्रगति ना कर पाने की वजह से भारतीय समाज यूरोपीय लोगों पर निर्भर होता जा रहा है। ऐसे समय में लोग विदेशी आविष्कारों का भारत में प्रयोग अनुचित भी समझते हैं।
भारत सन् 1000-1400 ई0 के सांस्कृतिक अस्मिता के विलोप काल, सन् 1401-1757ई0 तक की गुलामी के दौर की शुरूआत के काल, अंग्रेजों के काल सन् 1757 से 1947 तक में 10 मई सन् 1857 से पहला स्वतन्त्रता संग्राम के फलस्वरूप 15 अगस्त सन् 1947 को वह स्वतन्त्र हुआ। देश की शासन व्यवस्था को चलाने के लिए जो व्यवस्था अपनायी गई वह है-प्रजातन्त्र या लोकतन्त्र प्रणाली। इस प्रणाली के संचालन के लिए संचालक का निराकार नियम का निर्माण ही संविधान के रूप में सन् 1927, सन् 1930, सन् 1945 के असफल प्रयत्नों के बाद, सत्य मुक्त संयुक्त मनों द्वारा स्वतन्त्रता प्राप्ति के उपरान्त, प्रस्तुत करते हुये उसे 26 जनवरी सन् 1950 से लागू कर भारत को एक गणराज्य के रूप में स्थापित कर संविधान के अनुसार वर्तमान में भी संचालित किया जा रहा है।
केन्द्र सरकार का स्वरूप
01. व्यवस्थापिका (राज्यसभा और लोकसभा)
02.कार्यपालिका (राज्यपाल, मुख्यमंत्री, मंत्री परिषद)
03. न्यायपालिका (उच्चन्यायलय)
गणराज्य का क्षेत्र -36 राज्यों/केन्द्र शासित क्षेत्र में 624 जनपद में 5436 विकास खण्ड में 638365 ग्राम लगभग।
विधायिका में भागीदारी -राज्यों के विधानसभा में कुल 4120 सदस्य
संसद में भागीदारी -संसद के लोकसभा में 545 तथा राज्य सभा में 245 सदस्य
मंत्रालय -लगभग 40 और उनके विभाग।
राजधानी -भारत के लिए नई दिल्ली तथा राज्यों के लिए उनके राज्यों में।
गणराज्यों के स्तर
01.गणराज्यों का संघ-भारत
02.गणराज्य-राज्य
03.गणराज्य-जिला पंचायत
04.गणराज्य-नगर पंचायत, नगर परिषद, नगर निगम
05.गणराज्य-क्षेत्र पंचायत
06.गणराज्य-ग्राम पंचायत।
भारत का एक
भारत का राष्ट्रीय ध्वज-तिरंगाभारत का राष्ट्रीय गान-जन-गण-मन
भारत का राष्ट्रीय गीत-वन्दे मातरम्भारत का राष्ट्रीय चिन्ह-अशोक स्तम्भ
भारत का राष्ट्रीय पंचांग-शक संवतभारत का राष्ट्रीय वाक्य-सत्यमेव जयते
भारत की राष्ट्रीयता-भारतीयताभारत की राष्ट्र भाषा-हिंदी
भारत की राष्ट्रीय लिपि-देव नागरीभारत का राष्ट्रीय ध्वज गीत-हिंद देश का प्यारा झंडा
भारत का राष्ट्रीय नारा-श्रमेव जयतेभारत की राष्ट्रीय विदेशनीति-गुट निरपेक्ष
भारत का राष्ट्रीय पुरस्कार-भारत रत्नभारत का राष्ट्रीय सूचना पत्र-श्वेत पत्र
भारत का राष्ट्रीय वृक्ष-बरगदभारत की राष्ट्रीय मुद्रा-रूपया
भारत की राष्ट्रीय नदी-गंगा भारत का राष्ट्रीय पक्षी-मोर
भारत का राष्ट्रीय पशु-बाघ भारत का राष्ट्रीय फूल-कमल
भारत का राष्ट्रीय फल-आम भारत का राष्ट्रीय खेल-हॉकी
भारत की राष्ट्रीय मिठाई-जलेबी भारत के राष्ट्रीय मुद्रा चिन्ह ()
भारत के राष्ट्रीय पर्व 26 जनवरी (गणतंत्र दिवस) और 15 अगस्त (स्वतंत्रता दिवस)
भारत की राष्ट्रीय योजना-पंच वर्षीय योजना (पहले योजना आयोग अब नीति आयोग)
भारत का राष्ट्रीय शास्त्र-अभी निर्धारित नहीं।
भारत का संविधान
द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद जुलाई 1945 में ब्रिटेन ने भारत सम्बन्धी अपनी नई नीति की घोषणा की तथा भारत की संविधान सभा के निर्माण के लिए एक कैबिनेट मिशन भारत भेंजा जिसमें 3 मंत्री थे। 15 अगस्त, 1947 को भारत आजाद हो जाने के बाद संविधान सभा की घोषणा हुई और इसने अपना कार्य 9 दिसम्बर, 1947 से आरम्भ कर दिया। संविधान सभा के सदस्य भारत के राज्यों की सभाओं से निर्वाचित सदस्यों के द्वारा चुने गये थे। जवाहरलाल नेहरू, डाॅ0 राजेन्द्र प्रसाद, सरदार वल्लभ भाई पटेल, श्यामा प्रसाद मुखर्जी, मौलाना अबुल कलाम आजाद आदि इस सभा के प्रमुख सदस्य थे। इस संविधान सभा ने 2 वर्ष 11 माह 18 दिन में कुल 166 दिन बैठक की। इसकी बैठकों में प्रेस और जनता को भाग लेने की स्वतन्त्रता थी। भारत के संविधान के निर्माण में डाॅ0 भीमराव अम्बेडकर ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई इसलिए उन्हंें संविधान का निर्माता कहा जाता है।
भारत का संविधान दुनिया का सबसे बड़ा लिखित संविधान है। इसमें 444 अनुच्छेद तथा 12 अनुसूचियाँ है। संविधान में सरकार के संसदीय स्वरूप की व्यवस्था की गई है जिसकी संरचना कुछ अपवादों के अतिरिक्त संघीय है। केन्द्रीय कार्यपालिका का सांविधानिक प्रमुख राष्ट्रपति है। भारत के संविधान की धारा 79 के अनुसार केन्द्रीय संसद की परिषद् में राष्ट्रपति तथा दो सदन-राज्यों की परिषद राज्यसभा तथा लोगों का सदन लोकसभा है। संविधान की धारा 74(1) में यह व्यवस्था की गई है कि राष्ट्रपति की सहायता करने तथा उसे सलाह देने के लिए एक मंत्रीपरिषद् होगी जिसका प्रमुख प्रधानमंत्री होगा। राष्ट्रपति इस मंत्री परिषद् की सलाह के अनुसार अपने कार्यो का निष्पादन करेगा। इस प्रकार वास्तविक कार्यकारी शक्ति मंत्रीपरिषद् में निहित है जिसका प्रमुख प्रधानमंत्री है। मंत्रीपरिषद् सामूहिक रूप से लोगों के सदन लोकसभा के प्रति उत्तरदायी है।
प्रत्येक राज्य में एक विधान सभा है। जम्मू कश्मीर, उत्तरप्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, कर्नाटक और आन्ध्रप्रदेश में एक ऊपरी सदन है जिसे विधान परिषद् कहा जाता है। राज्यपाल राज्य का प्रमुख है। प्रत्येक राज्य का एक राज्यपाल होगा तथा राज्य की कार्यकारी शक्ति उसमें विहित होगी। मंत्रीपरिषद् जिसका प्रमुख मुख्यमंत्री है, राज्यपाल को उसके कार्यो के निष्पादन में सलाह देती है। राज्य की मंत्रीपरिषद् सामूहिक रूप से राज्य की विधान सभा के प्रति उत्तरदायी है।
संविधान प्रारूप समिति तथा सर्वोच्च न्यायलय ने इसको संघात्मक संविधान माना है। शक्ति पृथक्करण का सिद्धान्त फ्रंेच दार्शनिक मान्टेस्कयू ने दिया था, उसके अनुसार राज्य की शक्ति उसके तीन भागों-कार्य, विधान तथा न्यायपालिकाओं में बाँट देना चाहिए। ये सिद्धान्त राज्य को सर्वाधिकारवादी होने से बचा सकता है तथा व्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करता है। अमेरिकी संविधान पहला ऐसा संविधान था जिसमें ये सिद्धान्त अपनाया गया था। भारतीय संविधान में इसका साफ वर्णन न होकर संकेत मात्र है। इस हेतु संविधान में तीनों अंगो का पृथक वर्णन है। संसदीय लोकतन्त्र होने के कारण भारत में कार्यपालिका तथा विधायिका में पूरा अलगाव नहीं हो सका है। कार्यपालिका (मंत्रीपरिषद्), विधायिका में से ही चुनी जाती है तथा उसके निचले सदन के प्रति उत्तरदायी होती है। अनु 51 के अनुसार कार्यपालिका तथा न्यायपालिका को पृथक होना चाहिए इसलिए ही 1973 में दण्ड प्रक्रिया संहिता पारित की गई जिस के द्वारा जिला मजिस्ट्रेट की न्यायायिक शक्ति लेकर न्यायायिक मजिस्ट्रेट को दे दी गयी थी।
राष्ट्रपति, संघ का कार्यपालक अध्यक्ष है। संघ के सभी कार्यपालक कार्य उस के नाम से किये जाते हैं। अनु 53 के अनुसार संघ की कार्यपालक शक्ति उसमें निहित है। इन शक्तियों का प्रयोग क्रियान्वयन राष्ट्रपति संविधान के अनुरूप ही सीधे अथवा अधीनस्थ अधिकारियों के माध्यम से करेगा। वह शस्त्र सेनाओं का सर्वोच्च सेनानायक भी होता है। सभी प्रकार के आपातकाल लगाने व हटाने वाला, युद्ध-शान्ति की घोषणा करने वाला होता है। देश का प्रथम नागरिक है तथा राज्य द्वारा जारी वरीयता क्रम में उसका सदैव प्रथम स्थान होता है। भारतीय राष्ट्रपति का भारतीय नागरिक होना आवश्यक होता है तथा उसकी आयु कम से कम 35 वर्ष होनी चाहिए।
प्रधानमंत्री की दशा, प्रधान की तरह है। वह कैबिनेट का मुख्य स्तम्भ है। मंत्री परिषद् का मुख्य सदस्य भी वहीं है। अनु 74 स्पष्ट रूप से मंत्रीपरिषद् की अध्यक्षता तथा संचालन हेतु प्रधानमंत्री की उपस्थिति आवश्यक मानता है। उसकी मृत्यु या त्यागपत्र की दशा में समस्त परिषद् को पद छोड़ना पड़ता है। वह अकेले ही मंत्री परिषद् का गठन करता हे। राष्ट्रपति मंत्रीगण की नियुक्ति उसके ही सलाह से करता है। राष्ट्रपति तथा मंत्री परिषद् के मध्य सम्पर्क सूत्र भी वही है। परिषद् का प्रधान प्रवक्ता भी वही है। वह किसी भी मंत्रालय से कोई भी सूचना मंगवा सकता है। इन सब कारणों के चलते प्रधानमंत्री को देश का सबसे महत्वपूर्ण राजनैतिक व्यक्तित्व माना जाता है।
न्यायिक सक्रियता का अर्थ, न्यायपालिका द्वारा निभायी जाने वाली सक्रिय भूमिका है जिसमें राज्य के अन्य अंगों को उनके संवैधानिक कृत्य करने को बाध्य करे। यदि वे अंग अपने कृत्य संपादित करने में सफल रहे तो जनतन्त्र तथा विधि शासन के लिए न्यायपालिका उनकी शक्तियों-भूमिका का निर्वाह सीमित समय के लिए करेगी। यह सक्रियता जनतन्त्र की शक्ति तथा जन विश्वास को पुर्नस्थापित करती है। इस तरह यह सक्रियता न्यायपालिका पर एक असंवेदनशील-गैर जिम्मेदार शासन के कृत्यों के कारण लादा गया बोझ है। यह सक्रियता न्यायिक प्रयास है जो मजबूरी में किया गया है। यह शक्ति उच्च न्यायालय तथा सुप्रीम कोर्ट के पास है। ये उनकी पुनरीक्षा तथा रिट क्षेत्राधिकार में आती है। जनहित याचिका को हम न्यायिक सक्रियता का मुख्य माध्यम मान सकते हैं।
सुप्रीम कोर्ट, एक तरफ संविधान का संरक्षक, अंतिम व्याख्याकर्ता, मौलिक अधिकारों का रक्षक, केन्द्र-राज्य विवादों में एक मात्र मध्यस्थ है, वहीं यह संविधान के विकास में भी भूमिका निभाता रहा है। इसने माना है कि निरंतर संवैधानिक विकास होना चाहिए ताकि समाज के हित संवर्धित हो। न्यायिक पुनरीक्षण शक्ति के कारण यह संवैधानिक विकास में सहायता करता है। सर्वाधिक महत्वपूर्ण विकास यह है कि भारत में संविधान सर्वोच्च है। इसने संविधान के मूल ढाँचे का अदभुत सिद्धान्त दिया है जिसके चलते संविधान काफी सुरक्षित हो गया है। इसे मनमाने ढंग से बदला नहीं जा सकता है। इसने मौलिक अधिकारों का भी विस्तार किया है। इसने अनु 356 के दुरूपयोग को भी रोका है। सुप्रीम कोर्ट इस उक्ति का पालन करता है कि संविधान खुद नहीं बोलता है यह अपनी वाणी न्यायपालिका के माध्यम से बोलता है।
संविधान का स्वरूप
संविधान में निम्नलिखित चार खण्ड है।
1.खण्ड-एक
संविधान के उद्देश्यों को प्रकट करने हेतु प्राय-उनसे पहले एक प्रस्तावना प्रस्तुत की जाती है। भारतीय संविधान की प्रस्तावना अमेरिकी संविधान से प्रभावित तथा विश्व में सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है। प्रस्तावना के माध्यम से भारतीय संविधान का सार, अपेक्षाएँ, उद्देश्य उसका लक्ष्य तथा दर्शन प्रकट होता है। प्रस्तावना यह घोषणा करती है कि संविधान अपनी शक्ति सीधे जनता से प्राप्त करता है। प्रस्तावना में निम्नलिखित संकल्प हैं-
”हम भारत के लोग, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न धर्म निरपेक्ष समाजवादी लोकतन्त्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए और इसके सब नागरिकों के लिए सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्त, धर्म, विश्वास व पूजा की स्वतन्त्रता, हैसियत तथा अवसर की समानता प्राप्त करने के लिए और राष्ट्र की एकता तथा एक बद्धता बनाये रखते हुये सभी में बन्धुत्व की भावना बढ़ाने के लिए संकल्प होकर अपनी इस संविधान में आज तारीख 26 नवम्बर 1949 ई0 मिती मार्ग शीर्ष, शुक्ला सप्तमी, सम्वत् दो हजार छ-विक्रमी को एतद्वारा इस संविधान को अंगीकृत अधिनियमित तथा आत्मापिर्त करते है।“
2.खण्ड-दो
संविधान के प्रावधान-इस खण्ड में अनेकों खण्डों में अनुच्छेद/ धारा के अन्तर्गत संघ और राज्य क्षेत्र, नागरिकता, मौलिक अधिकार, नीति निर्देशक तत्व, मौलिक कत्र्तव्य, संघीय कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका, राज्य की कार्यपालिका विधायिका और न्यायपालिका, केन्द्र शासित प्रदेशों को शासन, केन्द्र राज्य प्रबन्ध, व्यापार, वाणिज्य और समागम, संघ और राज्यों के अधीन लोक सेवायें, चुनाव आयोग, कतिपय वर्ग विशेष से सम्बन्धित उपबन्ध, राष्ट्रभाषा और प्रादेशिक भाषा, आपातकाली उपबंध, संविधान की प्रक्रिया इत्यादि है।
रूस से प्रेरित होकर 42वें संशोधन द्वारा भारतीय संविधान के धारा-51(ए) के अन्तर्गत नागरिक का मौलिक कत्र्तव्य जोड़ा गया है।
3.खण्ड-तीन
अनुसूची-इसमें खण्ड-दो के अनुच्छेद/धारा के अधीन विस्तृत विवरण है। जैसे-25 राज्य तथा 6 केन्द्र शासित प्रदेशों का विवरण, राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, लोकसभा अध्यक्ष, नियत्रंक व महालेखापरीक्षक के वेतन तथा भत्ते का विवरण। शपथ सम्बन्धी प्रारूप, राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों से राज्यसभा के सीटों का आवंटन, अनुसूचित क्षेत्रों व जातियों के प्रशासन विषयक प्रावधान, असम, मेघालय, मिजोरम की जनजातियों के प्रशासन के सम्बन्ध में प्रावधान। संघ तथा राज्यों के मध्य शक्तियों का विभाजन (संघ सूची 97 विषय, राज्य सूची 66 विषय, समवर्ती 4 विषय), संविधान द्वारा मान्यता प्राप्त भाषाओं का विवरण भू-सूधार सम्बन्धी प्रावधान, दल-बदल अधिनियम, पंचायती राज सम्बन्धी प्रावधान इत्यादि है।
खण्ड 2 तथा 3 मिलकर संविधान की आत्मा तथा चेतना कहलाते हैं क्योंकि किसी भी स्वतन्त्र राष्ट्र के लिए मौलिक अधिकार तथा निति निर्देश देश के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। नीति निर्देशक तत्व जनतान्त्रिक संवैधानिक विकास के नवीनतम तत्व हैं। सर्वप्रथम ये आयरलैंड के संविधान में लागू किये गये थे। ये वे तत्व हैं जो संविधान के विकास के साथ ही विकसित हुए हैं। इन तत्वों का कार्य एक जनकल्याणकारी राज्य की स्थापना करना है। भारतीय संविधान के इस भाग में नीति निर्देशक तत्वों का रूपाकार निश्चित किया गया है। मौलिक अधिकार तथा नीति निर्देशक तत्व में भेद बताया गया है और नीति निर्देशक तत्वों के महत्व को समझाया गया है।
4.खण्ड-चार
परिशिष्ट-इसमें खण्ड दो के अनुच्छेद/धारा के अधीन जम्मू और कश्मीर से सम्बन्धी विवरण है। ये संविधान का मूल स्वरूप है परन्तु संविधान लागू होने से अब तक 64 वर्ष हो गये इस बीच शासन से प्राप्त अनुभव से आवश्यकतानुसार अनुच्छेद/धारा के अन्तर्गत अनेकों बार संशोधन किये गये है और किये जाते रहेंगे।
भारत के विश्वरूप का शास्त्र ही ”विश्वशास्त्र“
भारत के विश्वरूप का शास्त्र ही ”विश्वशास्त्र“ है। जिसकी उपयोगिता एक राष्ट्र-एक शास्त्र के रूप है। वर्तमान समय में भारतीय संविधान को ही राष्ट्रीय शास्त्र के रूप में माना जाता है जबकि श्री लव कुश सिंह ”विश्वमानव“ का कहना है-”किसी देश का संविधान, उस देश के स्वाभिमान का शास्त्र तब तक नहीं हो सकता जब तक उस देश की मूल भावना का शिक्षा पाठ्यक्रम उसका अंग न हो। इस प्रकार भारत देश का संविधान भारत देश का शास्त्र नहीं है। संविधान को भारत का शास्त्र बनाने के लिए भारत की मूल भावना के अनुरूप नागरिक निर्माण के शिक्षा पाठ्यक्रम को संविधान के अंग के रूप में षामिल करना होगा। जबकि राष्ट्रीय संविधान और राष्ट्रीय शास्त्र के लिए हमें विश्व के स्तर पर देखना होगा क्योंकि देश तो अनेक हैं राष्ट्र केवल एक विश्व है, यह धरती है, यह पृथ्वी है। भारत को विश्व गुरू बनने का अन्तिम रास्ता यह है कि वह अपने संविधान को वैश्विक स्तर पर विचार कर उसमें विश्व शिक्षा पाठ्यक्रम को शामिल करे। यह कार्य उसी दिशा की ओर एक पहल है, एक मार्ग है और उस उम्मीद का एक हल है। राष्ट्रीयता की परिभाषा व नागरिक कर्तव्य के निर्धारण का मार्ग है। जिस पर विचार करने का मार्ग खुला हुआ है।“
भारतीय संसद
भारत की राजनीतिक व्यवस्था को या सरकार जिस प्रकार बनती और चलती है उसे संसदीय लोकतन्त्र कहा जाता है। भारत के लिए लोकतन्त्र कोई नयी बात नहीं है। संसार के सबसे पुराने गणतन्त्र भारत में ही जन्मे-पन्पे। संसद पुराने संस्कृत साहित्य का शब्द है। पुराने समय में राजा को सलाह देने वाली सभा संसद कहलाती थी। राजा संसद की सलाह को ठुकरा नहीं सकता था। बौद्ध सभाओं में संसदीय प्रक्रिया सम्बन्धी नियम आजकल की संसदो के नियमों से बहुत मिलते-जुलते थे। खुली बात-चीत, बहुमत का फैसला, ऊँचे पदो के लिए चुनाव, वोट डालना, समितियों द्वारा विचार आदि से हमारी लोकतान्त्रिक संस्थाए हजारों साल पहले परिचित थीं। संसार के सबसे पुराने ग्रन्थ ऋृग्वेद में सभा और समिति के बारे में लिखा हुआ है। समिति एक आम सभा या लोक सभा की तरह हुआ करती थी। सभा कुछ छोटी और चुने हुए बड़े लोगों की संस्था होती थी। उसकी तुलना आज की राज्य सभा या विधान परिषदों से की जा सकती है। ग्राम-पंचायतें हमारे जन-जीवन का अभिन्न अंग रही है। पुराने समय में गांवों की पंचायत चुनाव से गठित की जाती थी। उसे न्याय ओर व्यवस्था दोनों ही क्षेत्र में खूब अधिकार मिले हुए थे। पंचायतों के सदस्यों का राजदरबार में बड़ा आदर होता था। यही पंचायतें भूमि का बँटवारा करती थीं। कर वसूल करती थीं। गांव की ओर से सरकार का हिस्सा देती थीं। कहीं कहीं ग्राम पंचायतों के ऊपर एक बड़ी पंचायत भी होती थी। यह उन पर निगरानी और नियंत्रण रख्ती थी। कुछ पुराने शिलालेख यह भी बताते हैं कि ग्राम पंचायतों के सदस्य किस प्रकार चुने जाते थें। सदस्य बनने के लिए जरूरी गुणों और चुनावों में महिलाओं की भागीदारी के नियम भी इस पर लिखे थे। अच्छा आचरण न करने पर अथवा राजकीय धन का ठीक-ठाक हिसाब न पाने पर कोई भी सदस्य पद से हटाया जा सकता था। पदों पर किसी भी सदस्य का कोई निकट सम्बन्धी नियुक्त नहीं किया जा सकता था। मध्य युग में आकर संसद संभा और समिति जैसी संस्थाए गायब हो गई। ऊपर के स्तर पर लोकतन्त्रात्मक संस्थाओं का विकास रूक गया। सैकड़ो वर्षो तक हम आपसी लड़ाइयों में उलझे रहे। विदेशियों के आक्रमण पर आक्रमण होते रहे। सेनाएं हारती-जीतती रहीं। शासक बदलते रहे। हम विदेशी शासन की गुलामी में जकड़े रहे। सिंध से असम तक और कश्मीर से कन्याकुमारी तक पंचायत संस्थाए बराबर चलती रहीं। ये प्रादेशिक, जनपद परिषद्, नगर परिषद्, पौर सभा, ग्राम सभा, ग्राम संघ जैसे अलग अलग नामों से पुकारी जाती रहीं। सत्य में ये पंचायतें ही गांवों की संसद थीं।
भारतीय स्वतन्त्रता अधिनियम, 1947 में भारत की संविधान सभा को पूर्ण प्रभुसत्ता सम्पन्न निकाय घोषित किया गया। 14-15 अगस्त, 1947 की मध्य रात्रि को उस सभा ने देश का शासन चलाने की पूर्ण शक्तियाँ ग्रहण कर लीं। अधिनियम की धारा 8 के द्वारा संविधान सभा को पूर्ण विधायी शक्ति प्राप्त हो गई। किन्तु साथ ही साथ यह अनुभव किया गया कि संविधान सभा के संविधान निर्माण के कार्य तथा विधानमंडल के रूप में इसके साधारण कार्य में भेद बनाए रखना जरूरी होगा। संविधान सभा (विधायी) की एक अलग निकाय के रूप में पहली बैठक 17 नवम्बर, 1947 को हुई। इसके अध्यक्ष सभा के प्रधान डाॅ0 राजेन्द्र प्रसाद थे। संविधान अध्यक्ष पद के लिए केवल एक नाम श्री जी0वी0मावलंकर का नाम प्राप्त हुआ था इसलिए उन्हें विधिवत चुना हुआ घोषित किया गया। 14 नवम्बर, 1948 को संविधान का प्रारूप संविधान सभा में प्रारूप समिति के सभापति बी0आर0अम्बेडकर ने पेश किया। प्रस्ताव के पक्ष में बहुमत था। 26 जनवरी, 1950 को स्वतन्त्र भारत के गणराज्य का संविधान लागू हो गया। इसके कारण आधुनिक संस्थागत ढांचे और उसकी अन्य सब शाखा-प्रशाखाओं सहित पूर्ण संसदीय प्रणाली स्थापित हो गई। संविधान सभा भारत की अस्थाई संसद बन गई। वयस्क मताधिकार के आधार पर पहले आम चुनावों के बाद नये संविधान के उपबंधों के अनुसार संसद का गठन होने तक इसी प्रकार कार्य करती रही। नये संविधान के तहत पहले आम चुनाव वर्ष 1951-52 में हुए। इसके साथ ही विश्व का सबसे बड़ा संविधान और लोकतन्त्र स्थापित हो गया। पहली चुनी हुई संसद जिसके दो सदन थे-राज्य सभा व लोक सभा, मई 1952 में बनी। 1952 में पहली बार गठित राज्य सभा एक निरंतर रहने वाला स्थायी सदन है। जिसका कभी विघटन नहीं होता। हर दो वर्ष पर इसके एक तिहाई सदस्य अवकाश ग्रहण करते हैं।
भारतीय लोकतन्त्र में संसद जनता की सर्वोच्च प्रतिनिधि संस्था है। इसी माध्यम से आम लोगों की संप्रभुता को अभिव्यक्ति मिलती है। संसद ही इस बात का प्रमाण है कि हमारी राजनीतिक व्यवस्था में जनता सबसे ऊपर है। जनमत सर्वोपरि है। संसदीय शब्द का अर्थ ही ऐसी लोकतन्त्रात्मक राजनीतिक व्यवस्था है जहाँ सर्वोच्च शक्ति लोगों के प्रतिनिधियों के उस निकाय में निहित है जिसे संसद कहते हंै। भारत के संविधान के अधीन संघीय विधानमंडल को संसद कहा जाता है। यह वह धुरी है जो देश के शासन की नींव है। भारतीय संसद राष्ट्रपति और दोनों सदनों-राज्य सभा और लोक सभा से मिलकर बनती है। संसदीय शासन का अर्थ होना चाहिए संसद द्वारा शासन किन्तु संसद स्वयं शासन नहीं करती और न ही कर सकती है। मंत्रिपरिषद के बारे में एक तरह से कहा जा सकता है कि संसद की महान कार्यपालिका समिति होती है। जिसे मूल निकाय की ओर से शासन करने का उत्तरदायित्व सौंपा जाता है। संसद का कार्य विधान बनाना, मंत्रणा देना, आलोचना करना और लोगों की शिकायतों को व्यक्त करना है। कार्यपालिका का कार्य शासन करना है यद्यपि वह संसद की ओर से ही शासन करती है।
भारत के प्रधानमंत्री व उनका कार्यकाल
सं.नामकार्यकाल आरंभकार्यकाल समाप्तराजनैतिक दल
01जवाहरलाल नेहरू15 अगस्त, 194727 मई, 1964भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
02गुलजारीलाल नंदा27 मई, 19649 जून, 1964भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
03लालबहादुर शास्त्री9 जून, 196411 जनवरी, 1966भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
04गुलजारीलाल नंदा11 जनवरी, 196624 जनवरी, 1966भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
05इन्दिरा गाँधी24 जनवरी, 196624 मार्च, 1977भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
06मोरारजी देसाई24 मार्च, 197728 जुलाई, 1979जनता पार्टी
07चैधरी चरण सिंह28 जुलाई, 197914 जनवरी, 1980जनता पार्टी
08इन्दिरा गाँधी14 जनवरी, 198031 अक्टूबर, 1984भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
09राजीव गाँधी31 अक्टूबर, 19842 दिसम्बर, 1989कांग्रेस आई
10विश्वनाथ प्रताप सिंह2 दिसम्बर, 198910 नवंबर, 1990जनता दल
11चंद्रशेखर10 नवंबर, 199021 जून, 1991जनता दल
12नरसिंह राव21 जून, 199116 मई, 1996भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
13अटल बिहारी वाजपेयी16 मई, 19961 जून, 1996भारतीय जनता पार्टी
14एच डी देवगौड़ा1 जून, 199621 अप्रैल, 1997जनता दल
15इंद्रकुमार गुजराल21 अप्रैल, 199719 मार्च, 1998जनता दल
16अटल बिहारी वाजपेयी19 मार्च, 199822 मई, 2004भारतीय जनता पार्टी
17मनमोहन सिंह22 मई, 200422 मई, 2009भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
18मनमोहन सिंह22 मई, 200917 मई 2014भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
19नरेन्द्र मोदी26 मई, 2014अभी तकभारतीय जनता पार्टी
भारतीय सर्वोच्च न्यायालय
न्यायिक सक्रियता का अर्थ, न्यायपालिका द्वारा निभायी जाने वाली सक्रिय भूमिका है जिसमें राज्य के अन्य अंगों को उनके संवैधानिक कृत्य करने को बाध्य करे। यदि वे अंग अपने कृत्य संपादित करने में सफल रहे तो जनतन्त्र तथा विधि शासन के लिए न्यायपालिका उनकी शक्तियों-भूमिका का निर्वाह सीमित समय के लिए करेगी। यह सक्रियता जनतन्त्र की शक्ति तथा जन विश्वास को पुर्नस्थापित करती है। इस तरह यह सक्रियता न्यायपालिका पर एक असंवेदनशील-गैर जिम्मेदार शासन के कृत्यों के कारण लादा गया बोझ है। यह सक्रियता न्यायिक प्रयास है जो मजबूरी में किया गया है। यह शक्ति उच्च न्यायालय तथा सुप्रीम कोर्ट के पास है। ये उनकी पुनरीक्षा तथा रिट क्षेत्राधिकार में आती है। जनहित याचिका को हम न्यायिक सक्रियता का मुख्य माध्यम मान सकते हैं।
सुप्रीम कोर्ट, एक तरफ संविधान का संरक्षक, अंतिम व्याख्याकर्ता, मौलिक अधिकारों का रक्षक, केन्द्र-राज्य विवादों में एक मात्र मध्यस्थ है, वहीं यह संविधान के विकास में भी भूमिका निभाता रहा है। इसने माना है कि निरंतर संवैधानिक विकास होना चाहिए ताकि समाज के हित संवर्धित हो। न्यायिक पुनरीक्षण शक्ति के कारण यह संवैधानिक विकास में सहायता करता है। सर्वाधिक महत्वपूर्ण विकास यह है कि भारत में संविधान सर्वोच्च है। इसने संविधान के मूल ढाँचे का अदभुत सिद्धान्त दिया है जिसके चलते संविधान काफी सुरक्षित हो गया है। इसे मनमाने ढंग से बदला नहीं जा सकता है। इसने मौलिक अधिकारों का भी विस्तार किया है। इसने अनु 356 के दुरूपयोग को भी रोका है। सुप्रीम कोर्ट इस उक्ति का पालन करता है कि संविधान खुद नहीं बोलता है यह अपनी वाणी न्यायपालिका के माध्यम से बोलता है।
भारत के संविधान के खण्ड-दो में अनेकों खण्डों में अनुच्छेद/ धारा के अन्तर्गत संघ और राज्य क्षेत्र, नागरिकता, मौलिक अधिकार, नीति निर्देषक तत्व, मौलिक कत्र्तव्य, संघीय कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका, राज्य की कार्यपालिका विधायिका और न्यायपालिका, केन्द्र षासित प्रदेषों को षासन, केन्द्र राज्य प्रबन्ध, व्यापार, वाणिज्य और समागम, संघ और राज्यों के अधीन लोक सेवायें, चुनाव आयोग, कतिपय वर्ग विशेष से सम्बन्धित उपबन्ध, राष्ट्रभाषा और प्रादेशिक भाषा, आपातकाली उपबंध, संविधान की प्रक्रिया इत्यादि है।
रूस से प्रेरित होकर 42वें संशोधन द्वारा भारतीय संविधान के धारा-51(ए) के अन्तर्गत नागरिक का मौलिक कत्र्तव्य जोड़ा गया है जो निम्नलिखित है-
01.स्ंाविधान के प्रति प्रतिबद्धता, इसके आदर्शो, धाराओं, राष्ट्रीय ध्वज व राष्ट्रीय गान का आदर करना।
02.स्वतंत्रता के लिए संघर्ष हेतु प्रेरित करने वाले सुआदर्शाे का अनुकरण करना व उन्हें चिरस्थायी बनाना।
03.भारत की सर्वोच्चता, एकता और अखण्डता की रक्षा करना तथा समर्थन करना।
04.जब भी आवश्यकता पड़े देश की रक्षा करना व राष्ट्रीय सेवाओं हेतु समर्पित होना।
05.समाज में भाई-चारें की भावना का विस्तार करना, मातृत्व भाव, धार्मिक, भाषायिक, क्षेत्रीय विभिन्नताओं में एकता कायम करना तथा नारी सम्मान आदि का ध्यान देना।
06.अपने मिश्रित संस्कृति का मूल्यांकन करना उसको स्थायित्व देना और इसकी परम्परा को कायम रखना।
07.प्राकृतिक सम्पदा की रक्षा करना जिसमें जलवायु, जंगल, झील, नदियां, जंगली जीवों व समस्त जीवों के प्रति दया का भाव सम्मिलित है।
08.वैज्ञानिक भावना को प्रोत्साहित करना, मानवीय भावनाओं के स्वरूप की परख करते रहना।
09.जन सम्पत्ति की सुरक्षा करना और हिंसा आदि का परित्याग करना।
10.व्यक्तिगत, सामूहिक गतिविधियों के प्रत्येक क्षेत्र में सर्वोच्चता हासिल करना, जिससे राष्ट्र शतत उत्थान, प्रयत्न व प्राप्ति की ओर अग्रसर होता रहे।
11.जो कि माता-पिता या अभिभावक हो, वे अपने 6 साल से 14 साल के बच्चों को शिक्षा या अन्य ऐसे सुअवसरों का लाभ उन्हें मुहैया करावें।
सर्वोच्च न्यायालय का जनहित याचिकाएँ
जनहित याचिकाओं का विचार अमेरिका में जन्मा, वहाँ इसे सामाजिक कार्यवाही याचिका कहते हैं। यह न्यायपालिका का आविष्कार तथा न्यायाधीश निर्मित विधि है। जनहित याचिका भारत में श्री पी.एन.भगवती ने प्रारम्भ की थी। ये याचिकाएँ जनहित को सुरक्षित तथा बढ़ाना चाहती हैं। ये लोकहित भावना पर कार्य करती है। ये ऐसे न्यायायिक उपकरण हैं जिनका लक्ष्य जनहित प्राप्त करना है। इनका लक्ष्य तीव्र तथा सस्ता न्याय एक आदमी को दिलवाना तथा कार्यपालिका-विधायिका को उनके संवैधानिक कार्य करवाने हेतु किया जाता है। ये समूह हित में काम आती हैं, न कि व्यक्ति हित में। यदि इनका दुरूपयोग किया जाये ता याचिकाकर्ता पर जुर्माना तक किया जा सकता है। इनको स्वीकारना या न स्वीकारना न्यायालय पर निर्भर करता है। इनकी स्वीकृति हेतु सुप्रीम कोर्ट ने कुछ नियम बनाये हैं-
1.लोकहित से प्रेरित कोई भी व्यक्ति और संगठन इसे ला सकता है।
2.कोर्ट को दिया गया पोस्टकार्ड भी रिट याचिका मानकर ये जारी की जा सकती है।
3.कोर्ट को अधिकार होगा कि वह इस याचिका हेतु सामान्य न्यायालय शुल्क भी माफ कर दे।
4.ये राज्य के साथ ही निजी संस्थान के विरूद्ध भी लायी जा सकती है।
देश के हर नागरिक को संिवधान की ओर से छह मूल अधिकार दिए गए है। ये हैं-1.समानता का अधिकार, 2.स्वतंत्रता का अधिकार, 3.शोषण के खिलाफ अधिकार, 4.संस्कृित और शिक्षा का अधिकार, 5.धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार और 6.मूल अधिकार पाने का रास्ता।
अगर किसी नागरिक (आम आदमी) के किसी भी मूल अधिकार का हनन हो रहा है, तो वह हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर मूल अधिकार के के लिए गुहार लगा सकता है। वह अनुच्छेद-226 के तहत हाई कोर्ट का और अनुच्छेद-32 के तहत सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकता है। अगर यह मामला निजी न होकर व्यापक जनिहत से जुड़ा है तो याचिका को जनिहत याचिका के तौर पर देखा जाता है। पीआईएल डालने वाले शख्स को अदालत को यह बताना होगा कि कैसे उस मामले में आम लोंगो का हित प्रभावित हो रहा है? अगर मामला निजीहित से जुड़ा है या निजी तौर पर किसी के अधिकारों का हनन हो रहा है तो उसे जनिहत याचिका नहीं माना जाता। ऐसे मामलों में दायर की गईं याचिका को पर्सनल इन्टरेस्ट लिटिगेशन कहा जाता है और इसी के तहत उसकी सुनवाईं होती है। दायर की गई याचिका जनहित है कि नहीं, इसका फैसला कोर्ट ही करता है।
पीआईएल में सरकार को प्रतिवादी बनाया जाता है। सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट सरकार को उचित निर्देश जारी करती है। यानी पीआईएल के जरिए लोग जनहित के मामलों में सरकार को अदालत से निर्देश जारी करवा सकते हैं।
कहाँ दखिल होती है पी.आई.एल
पीआईएल हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में दायर की जा सकती है। इससे नीचे की अदालतों में पीआईएल दािखल नहीं होती। कोई भी पीआईएल आमतौर पर पहले हाई कोर्ट में ही दािखल की जाती है। वहां से अर्जी खारिज होने के बाद ही सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया जाता है। कई बार मामला व्यापक जनिहत से जुड़ा होता है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट सीधे भी पीआईएल पर अनुच्छेद-32 के तहत सुनवाई करती है।
कैसे दािखल करें पी.आई.एल
1.लेटर (पत्र) के जरिये
अगर कोई शख्स आम आदमी से जुड़े मामले में हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट को लेटर लिखता है, तो कोर्ट देखता है कि क्या मामला वाकई आम आदमी के हित से जुड़ा है। अगर ऐसा है तो उस लेटर को ही पीआईएल के तौर पर लिया जाता है और सुनवाई होती है।
लेटर में यह बताया जाना जरूरी है कि मामला कैसे जनिहत से जुड़ा है और याचिका में जो भी मुद्दे उठाए गए हैं, उनके हक में पुख्ता सबूत क्या हैं। अगर कोई सबूत है तो उसकी कॉपी भी लेटर के साथ लगा सकते हैं। लेटर जनिहत याचिका में तब्दील होने के बाद संबंिधत पक्षों को नोटिस जारी होता है और याचिकाकर्ता को भी कोर्ट में पेश होने के लिए कहा जाता है। सुनवाई के दौरान अगर याचिकाकर्ता के पास वकील न हो तो कोर्ट वकील मुहैया करा सकती है।
लेटर हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस के नाम लिखा जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस के नाम भी यह लेटर लिखा जा सकता है। लेटर हिन्दी या अंग्रेजी में लिख सकते हैं। यह हाथ से लिखा भी हो सकता है और टाइप किया हुआ भी। लेटर डाक से भेजा जा सकता है। जिस हाई कोर्ट के अधिकार क्षेत्र से संबंिधत मामला है, उसी को लेटर लिखा जाता है। लिखने वाला कहाँ रहता है, इससे कोई मतलब नहीं है।
दिल्ली से संबंिधत मामलों के लिए दिल्ली हाई कोर्ट में, फरीदाबाद और गुड़गांव से संबधित मामलों के लिए पंजाब एंड हरियाणा हाई कोर्ट में और यूपी से जुड़े मामलों के लिए इलाहाबाद हाई कोर्ट में लेटर लिखना होगा। लेटर लिखने के लिए कोर्ट के पते इस तरह हैं-
कोई भी शख्स वकील के मदद से जनहित याचिका दायर कर सकता है। वकील याचिका तैयार करने में मदद करते हैं। याचिका में प्रतिवादी कौन होगा और किस तरह उसे ड्राफ्ट किया जाएगा, इन बात के लिए वकील की मदद जरूरी है। पीआईएल दायर करने के लिए कोई फीस नहीं लगती। इसे सीधे काउंटर पर जाकर जमा करना होता है। हां, जिस वकील से इसके लिए सलाह ली जाती है, उसकी फीस देनी होती है। पीआईएल ऑनलाइन दायर नहीं की जा सकती।
कोर्ट का खुद संज्ञान
अगर मीडिया में जनिहत से जुड़े मामले पर कोई खबर छपे, तो सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट अपने आप संज्ञान ले सकती है। कोर्ट उसे पीआईएल की तरह सुनती है और आदेश पारित करती है।
भारतीय सम्मान और पदक
1.नागरिक
अ. अंतर्राष्ट्रीय-गाँधी शांति पुरस्कार, इंदिरा गांधी शांति पुरस्कार, इंदिरा गांधी पर्यावरण पुरस्कार
ब. राष्ट्रीय-भारत रत्न, पद्म पुरस्कार-(पद्म विभूषण, पद्म भूषण, पद्म श्री), राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार
राष्ट्रीय बाल पुरस्कार (उत्कृष्ट उपलब्धियों के लिये)
स. केंद्रीय-महापंडित राहुल सांकृत्यायन पुरस्कार, गंगाशरण सिंह पुरस्कार, गणेश विद्यार्थी पुरस्कार
आत्माराम पुरस्कार, सुब्रह्मण्यम भारती पुरस्कार, डॉ.जॉर्ज ग्रियर्सन पुरस्कार
पद्मभूषण डॉ॰ मोटूरि सत्यनारायण पुरस्कार
2.विभिन्न श्रेणियों में
अ. साहित्य-ज्ञानपीठ पुरस्कार, साहित्य अकादमी पुरस्कार
ब. चलचित्र-दादासाहेब फाल्के पुरस्कार, राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार, भारतीय फिल्म हस्ती का शताब्दी पुरस्कार
स. अन्य कलाएँ-संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार
द. खेल-राजीव गांधी खेल रत्न, अर्जुन पुरस्कार, द्रोणाचार्य पुरस्कार (प्रशिक्षण)
ध्यानचंद पुरस्कार (आजीवन उपलब्धियों के लिये)
राष्ट्रीय खेल प्रोत्साहन पुरस्कार
य. विज्ञान और प्रौद्योगिकी-शांति स्वरूप भटनागर विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी पुरस्कार
र. चिकित्सा-डॉ.बी.सी.राय पुरस्कार
ल. ब्लॉग-परिकल्पना सम्मान
व. सेना
युद्ध के समय-परमवीर चक्र, महावीर चक्र, वीर चक्र
शांति के समय-अशोक चक्र, कीर्ति चक्र, शौर्य चक्र
युद्ध अथवा शांति में सेवा एवं वीरता के लिये-सेना पदक, नौ सेना पदक, वायु सेना पदक
युद्ध में विशिष्ट सेवा के लिये-सर्वोत्तम युद्ध सेवा पदक, उत्तम युद्ध सेवा पदक, युद्ध सेवा पदक
शांति में विशिष्ट सेवा के लिये-परम विशिष्ट सेवा पदक, अति विशिष्ट सेवा पदक, विशिष्ट सेवा पदक
श. अन्य-वेब रत्न पुरस्कार, प्रवासी भारतीय सम्मान
भारत रत्न
”भारत रत्न“ देश का सर्वोच्च सम्मान है। इस अलंकरण से उन व्यक्तियों को सम्मानित किया जाता है जिन्होंने देश के किसी भी क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण कार्य किए हों, अपने-अपने क्षेत्रों में उत्कृष्ट कार्य कर हमारे देश का गौरव बढ़ाया और हमारे देश को अंतर्राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त हुई। भारत रत्न उच्चतम नागरिक सम्मान है जो कला, साहित्य, विज्ञान, राजनीतिज्ञ, विचारक, वैज्ञानिक, उद्योगपति, लेखक और समाजसेवी को असाधारण सेवा के लिए तथा उच्च लोक सेवा को मान्यता देने के लिए भारत सरकार की ओर से दिया जाता है। ”भारत-रत्न“ ऐसी विभूतियों का चरित्र-चित्रण है जिनके बिना देश का इतिहास अधूरा है।
यह प्रतिवर्ष दिया जाने वाला अलंकरण नहीं। यह किसी व्यक्ति के संपूर्ण व्यक्तित्व और देश के प्रति उसकी अत्यन्त समर्पण भावना के लिए यदा-कदा दिया जाने वाला अलंकरण है। यह उन आदर्श महान पुरुषों को ही दिया जाता है जिनकी जीवन गाथा पुण्य-भागीरथी के समान है, जिसे जानकर एक साधारण मनुष्य अपने आप को पाप मुक्त और निर्मल पाता है। ”भारत-रत्न“ में ऐसी विभूतियों के दिव्य चरित्र हैं जिन्होंने जीवन को इतनी ऊँचाइयों तक पहुँचाया जहाँ की कोई कल्पना नहीं कर सकता। संभवत-इकबाल ने ऐसे ही महान पुरुषों के लिए कहा था-
”खुदी को कर बुलंद इतना कि हर तकदीर से पहले खुदा बन्दे से खुद पूछे बता तेरी रजा क्या है“
”भारत-रत्न“ अनेक महान व्यक्तियों की जीवन-गाथा के साथ यह भारत के उस काल का इतिहास भी है, जिस काल से इन आदर्श पुरुषों का संबंध रहा। ”भारत-रत्न“ केवल राजनेताओं का ही नहीं वरन् इसमें वे लोग भी सम्मिलित हैं जिन्होंने देश को नई उपलब्धि दी और देश को प्रगति के मार्ग पर अग्रसर करने का यत्न किया।
पदक
मूल रूप में इस सम्मान के पदक का डिजाइन 35 मि.मि.गोलाकार स्वर्ण मैडल था। जिसमें सामने सूर्य बना था, ऊपर हिन्दी में भारत रत्न लिखा था, और नीचे पुष्प हार था। और पीछे की तरफ राष्ट्रीय चिह्न और मोटो था। फिर इस पदक के डिजाइन को बदल कर तांबे के बने पीपल के पत्ते पर प्लेटिनम का चमकता सूर्य बना दिया गया। जिसके नीचे चाँदी में लिखा रहता है ”भारत रत्न“ और यह सफेद फीते के साथ गले में पहना जाता है।
इतिहास
यह पुरस्कार 2 जनवरी 1954 को प्रारम्भ किया गया था। यह पुरस्कार भारत के प्रथम राष्ट्रपति श्री राजेन्द्र प्रसाद द्वारा घोषित किया गया था। दूसरे अलंकरणों के भाँति इस सम्मान को भी, नाम के साथ पदवी के रूप में प्रयोग नहीं किया जा सकता है। शुरू में इस सम्मान को मरणोपरांत नहीं दिया जाता था, किंतु 1955 के बाद यह निर्णय लिया गया और यह मरणोपरांत भी दिया जाने लगा। 13 जुलाई, 1977 से 26 जनवरी, 1980 तक इस पुरस्कार को स्थगित कर दिया गया था।
परम्परा
भारत रत्न पुरस्कार की परम्परा 1954 में शुरू हुई थी।
01.भारत रत्न 26 जनवरी को भारत के राष्ट्रपति द्वारा दिया जाता है।
02.सबसे पहला पुरस्कार प्रसिद्ध वैज्ञानिक चंद्रशेखर वेंकटरमन को दिया गया था। तब से अनेक विशिष्ट जनों को अपने-अपने क्षेत्र में उत्कृष्टता पाने के लिए यह पुरस्कार प्रस्तुत किया गया है।
03.जनता पार्टी द्वारा इस पुरस्कार को 1977 में बंद कर दिया गया था किंतु 1980 में कांग्रेस सरकर ने इसे फिर से दोबारा शुरू किया।
04.1980 में दोबारा शुरू होने पर इसे सर्वप्रथम मदर टेरेसा ने प्राप्त किया था।
05.हमारे भूतपूर्व राष्ट्रपति, वैज्ञानिक डॉ0 ए.पी.जे.अब्दुल कलाम को भी 1997 में यह प्रतिष्ठित पुरस्कार दिया गया।
06.इसका कोई लिखित प्रावधान नहीं है कि ”भारत रत्न“ केवल भारतीय नागरिकों को ही दिया जाएगा।
07.यह पुरस्कार स्वाभाविक रूप से भारतीय नागरिक बन चुकी एग्नेस गोंखा बोजाखियू, जिन्हें हम मदर टेरेसा के नाम से जानते हैं, को दिया गया।
08.दो अन्य अभारतीय-खान अब्दुलगफ्फार खान को 1987 में और नेल्सन मंडेला को 1990 में यह पुरस्कार दिया गया।
09.यह भी अनिवार्य नहीं है कि भारत रत्न सम्मान प्रतिवर्ष दिया जाएगा।
10.मरणोपरांत सर्वप्रथम लालबहादुर शास्त्री को भारत रत्न से सम्मानित किया गया था।
11.श्री सत्यपाल आनन्द ने राजीव गाँधी को मरणोपरांत भारत रत्न देने की प्रक्रिया को मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय में चुनौती दी थी।
विरोधाभास
01.स्वतंत्रता सेनानी नेताजी सुभाषचन्द्र बोस को 1992 में भारत रत्न से मरणोपरान्त सम्मानित किया गया था। किंतु उनकी मृत्यु विवादित होने के कारण अनेक प्रश्नों को उठाया गया था। अतः भारत सरकार ने यह पुरस्कार वापस ले लिया था। यह पुरस्कार वापस लेने का यह एकमात्र उदाहरण है।
02.स्वतंत्र भारत के प्रथम शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आजाद को जब भारत रत्न दिया गया तो उन्होंने इसका विरोध किया। उनका विचार था कि इसकी चयन समिति में रहे व्यक्ति को यह सम्मान नहीं दिया जाना चाहिये। 1992 में उन्हें मरणोपरांत भारत रत्न दिया गया।
“रत्न” उसे कहते हैं जिसका अपना व्यक्तिगत विलक्षण गुण-धर्म हो और वह गुण-धर्म उसके न रहने पर भी प्रेरक हो। पद पर पीठासीन व्यक्तित्व का गुण-धर्म मिश्रित होता है, वह उसके स्वयं की उपलब्धि नहीं रह जाती। भारत के रत्न वही हो सकते हैं जो स्वतन्त्र भारत में संवैधानिक पद पर न रहते हुये अपने विलक्षण गुण-धर्म द्वारा भारत को कुछ दिये हों और उनके न रहने पर भी भारतीय नागरिक प्रेरणा प्राप्त करता हो। इस क्रम में ”भारत रत्न“ का अगला दावेदार मैं हूँ और नहीं तो क्यों? इतना ही नहीं नोबेल पुरस्कार के साहित्य और शान्ति के संयुक्त पुरस्कार के लिए भी योग्य है जो भारत के लिए गर्व का विषय है।
भारत रत्न पुरस्कार 2 जनवरी 1954 को प्रारम्भ किया गया था। सामान्यतः कोई कानून या व्यवस्था बनने के बाद उस दिन से ही लागू होता है जिस दिन से प्रारम्भ होता है। और उन सब पर प्रभावी होता है जो जिवित हैं और कत्र्तव्यरत हैं। परन्तु भारत रत्न पुरस्कार व्यवस्था बनने के बाद 3 (सरदार वल्लभ भाई पटेल, गोपीनाथ बोरदोलोई, मदन मोहन मालवीय) ऐसे व्यक्तित्व को यह पुरस्कार दिया गया जो भारत रत्न व्यवस्था बनने के पहले ही जन्मे और उनकी मृत्यु भी हो गयी। इसमें कोई शक नहीं कि वे इसके योग्य नहीं थे। परन्तु इस अनुसार तो भारत के निर्माण में योगदान देने वाले अनेकों प्रतिभाशाली व्यक्तित्व हो चुके हैं। इसका प्रायश्चित मात्र इससे ही हो सकता है कि हम ”विस्मृत भारत रत्न स्मारक“ का निर्माण कर संयुक्त रूप से ऐसे व्यक्तित्व को याद करें जिन्हें हम वर्तमान में भारत रत्न पुरस्कार से सम्मानित नहीं कर सकते।
सम्पूर्ण भारत की बुद्धि भूतकाल में चल रही है जिसका सबसे बड़ा प्रमाण प्रतिभा की पहचान मृत्युपरान्त करना और पुरस्कृत करना है। “भारत रत्न” पुरस्कार कोई फैशन शो और धन कुबेर का मेरिट लिस्ट नहीं जो वस्त्र, शरीर और धन से प्राप्त किया जाता है। यह भारत और इस पृथ्वी के कल्याण के लिए किये गये कार्य का पुरस्कार है, कार्य करो और पा लो, यह सबके लिए अवसर है।
प्रस्तुत विश्वशास्त्र द्वारा अनेक नये विषय की दिशा प्राप्त हुई है जो भारत खोज रहा था। इन दिशाओं से ही ”आध्यात्मिक एवं दार्शनिक विरासत के आधार पर एक भारत-श्रेष्ठ भारत निर्माण“, मन (मानव संसाधन) का विश्वमानक, पूर्ण मानव निर्माण की तकनीकी, हिन्दू देवी-देवता मनुष्यों के लिए मानक चरित्र, सम्पूर्ण विश्व के मानवों व संस्था के कर्म शक्ति की एकमुखी करने के लिए सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त आधारित एक प्रबन्ध और क्रियाकलाप, एक जीवन शैली इत्यादि प्राप्त होगा। भारत सरकार को वर्तमान करने के लिए इन आविष्कारों की योग्यता के आधार पर मैं (लव कुश सिंह ”विश्वमानव“), स्वयं को भारत सरकार के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ”भारत रत्न“ के योग्य पाता हूँ क्योंकि ऐसे ही कार्यो के लिए ही ये सम्मान बना है। और इसे मेरे जीते-जी पहचानने की आवश्यकता है। शरीर त्याग के उपरान्त ऐसे सम्मान की कोई उपयोगिता नहीं है। भारत में इतने विद्वान हैं कि इस पर निर्णय लेने और आविष्कार की पुष्टि में अधिक समय नहीं लगेगा क्योंकि आविष्कारों की पुष्टि के लिए व्यापक आधार पहले से ही इसमें विद्यमान है।
-लव कुश सिंह ”विश्वमानव“
आविष्कारक-”मन का विश्वमानक-शून्य (WS-0)श्रंृखला और
पूर्ण मानव निर्माण की तकनीकी-WCM-TLM-SHYAM.C“
अगला दावेदार-भारत सरकार का सर्वोच्च नागरिक सम्मान-”भारत रत्न“